नारी -पुरुष साथ मधुर इतना हो ..
वृक्ष की टहनी सा मै
लिपटी तुम लता सी हो
रात्रि का आकाश मेरा मन
तुम चन्द्रमा सी विचरण करती हो
धरा सा आँचल तुम्हारा हो
मेरा अस्तित्व सूरज बन छा जाता हो
रात दिन सा नित जीवन चक्र चले
सूरज चन्द्रमा से हम घूमें
प्रकृति पर पतझर सावन ऋतुओं जैसे
दुःख सुख हम पर साथ गुजरें
हमारे प्यार का अस्तित्व भी
पृथ्वी आकाश सा अनंत अनादि हो
--राजेश जैन
06-03-2016
वृक्ष की टहनी सा मै
लिपटी तुम लता सी हो
रात्रि का आकाश मेरा मन
तुम चन्द्रमा सी विचरण करती हो
धरा सा आँचल तुम्हारा हो
मेरा अस्तित्व सूरज बन छा जाता हो
रात दिन सा नित जीवन चक्र चले
सूरज चन्द्रमा से हम घूमें
प्रकृति पर पतझर सावन ऋतुओं जैसे
दुःख सुख हम पर साथ गुजरें
हमारे प्यार का अस्तित्व भी
पृथ्वी आकाश सा अनंत अनादि हो
--राजेश जैन
06-03-2016

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