Monday, August 23, 2021

सीजन 2 - मेरे पापा (2)…

 

सीजन 2 - मेरे पापा (2)…

सुशांत के कॉल को आया जानकर, मेरे हृदय में उत्पन्न प्रथम प्रतिक्रिया यह हुई कि आज मेरे प्रियतम के मुख से प्रस्फुटित वाणी में, मैं प्यार की वे बातें सुनने का सुख पाऊँगी। जिसे सुनने के लिए मेरे कर्ण सहित तन का रोम रोम, पिछले 20 दिनों में तरस गया था। मैंने पहले मोबाइल को अपने हृदय से लगाया था फिर मेरी ऊँगली ने स्क्रीन पर बटन को स्वाइप कर कॉल रिसीव किया था। 

तुरंत ही स्क्रीन पर मेरी आँखों के समक्ष भारतीय वायुसेना की वर्दी में, मेरे सुशांत दिखाई दिए थे। इसे देखकर मेरे नयनों को वैसी अभूतपूर्व तृप्ति मिलती प्रतीत हुई थी जिससे मिल रहा सुख कदाचित मेरे जीवन में मुझे कभी मिला हो, मुझे स्मरण नहीं आता था। 

जो दिखाई पड़ रहा था, उससे लग रहा था कि सुशांत ने अपना मोबाइल फोन टेबल पर रखा हुआ है। लग रहा था कि वे अभी ही ड्यूटी से लौटे हैं और अभी अपनी यूनीफार्म चेंज कर रहे हैं। उन्होंने यह करते हुए मोबाइल से दूर रहकर ही, मुझे देखा और फ्लाइंग किस किया था।   

पिछले कई दिनों से वीडियो कॉल पर, मैं उन्हें देखते रहने एवं उनकी मीठी बातें सुनने को मर रही थी। अभी जब प्रत्यक्ष ही, वे कॉल लगाकर मुझे दिखाते हुए अपने कार्य कर रहे थे तब मुझे लगा कि जैसे मैं और वे एक ही कक्ष में हैं। उनके फ्लाइंग किस का उत्तर मैं वाणी से देती, उसके पहले ही मेरी आँखे छलक आईं थीं। अच्छा हुआ तभी वे तौलिया लिए वॉशरूम में चले गए थे। 

मैं उन्हें रोते हुए नहीं दिखना चाहती थी। भारतीय सीमाओं की रक्षा के अपने कर्तव्य निभाने में, मेरे अश्रुओं के कारण मानसिक रूप से उनकी कठिनाई बढ़ जाए, यह मैं कदापि नहीं चाहती थी। मैं सोचने लगी थी कि इस कॉल पर मुझे, उनसे सुनना और उनसे कहना, क्या क्या अच्छा लगने वाला है। यह मेरे पापा, मम्मी एवं सुशांत से मिली संगत का प्रभाव था कि तभी मेरे मन ने कहा - 

रमणीक, तुम सुशांत से अपनी मानसिक पीड़ा बयान करने की कैसे सोच सकती हो? जब सीमाओं पर, सुशांत अत्यंत ही कठिन ड्यूटी निभा रहे हैं उस समय तुम्हें, यह सोचना और करना चाहिए जो उनको अच्छा लगे। यह विचार आते ही तत्क्षण मैंने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण पाया था। 

तब सामने स्क्रीन पर वॉशरूम से नाईट सूट का पैजामा एवं नीली बनियान पहने, बालों को तौलिए से पोंछते हुए, सुशांत दिखाई पड़ने लगे थे।

अब वे अपने मोबाइल के सामने खड़े थे मुझे मुस्कुराते हुए देखते हुए उन्होंने शर्ट पहनी थी। जब वे उसकी बटन लगाने लगे तब मैंने गौर किया कि उन्होंने, वह नेवी रोमांटिक सिल्क नाईट सूट, पहन लिया था जो मैंने भी इस समय पहने हुआ था। दरअसल यह उन सेट में से एक वह कपल सूट था जो हमने, विवाह वाले दिन ही ऑनलाइन बुलवाए थे। मुझे पहने देखकर तुरंत ही, उनका चपलता से यह सूट पहन लेना मेरे लिए अत्यंत ही मनभावन प्रसंग था। मुझे गर्व की अनुभूति हुई कि मेरे वीर योद्धा पतिदेव, मुझे प्रसन्न करने के कितने ही अनूठे ढंग जानते हैं। हम में अब तक कोई बात नहीं हुई थी तब भी सुशांत ने अपने को जिस तरह दिखाया था - यथा वायुसेना पोशाक में, फिर फ्लाइंग किस करके एवं अब मेरे से मैचिंग कपल नाईट सूट में, उससे मैं इतनी आनंदविभोर हुई थी कि मुझे लग रहा था कि क्या कोई कहे गए शब्द मुझे इतना आनंदित कर सकने में समर्थ हो सकते थे जितनी आनंदित मैं उनकी भाव भंगिमाओं (बॉडी लैंग्वेज) से हो रही थी!

वे मुझे प्रेम परिपूर्ण दृष्टि से निहार रहे थे, तब मैंने ही बात प्रारंभ की थी। मैंने पूछा - आप अभी ही ड्यूटी से लौटे लग रहे हैं और आपने नाईट सूट पहन लिया है, क्या आप रात्रि भोजन के लिए नहीं जा रहे हैं?

सुशांत ने हँसते हुए कहा - 

रमणीक, दूर बैठी वहाँ से भी आपको मेरी कितनी चिंता लगी रहती है। टेंशन ना करो मैं आते हुए मेस से खाना पैक करवा लाया हूँ। मैं, तुमसे बात करते हुए अभी ही भोजन ग्रहण करना आरंभ करने वाला हूँ। 

मैंने प्रतिरोध सा करते हुए कहा - 

जी नहीं, आप पहले तसल्ली से भोजन कर लीजिए, बहुत थके हुए आए होंगे। आप कॉल बाद में कर लीजिए, मैं प्रतीक्षा कर लेती हूँ। 

सुशांत ने अपने को दुखी दिखाते हुए कहा - 

इतनी निर्मोही न बनो, रमणीक! क्यों अपने दीवाने को इतना तरसाती हो। प्रतीक्षा तुमसे तो हो जाएगी मगर प्रतीक्षा में मेरा हाल बुरा हो जाएगा। 

यह कहते हुए सुशांत ने डिनर पार्सल खोल लिया था। मैं सोचने लगी थी कि निर्मोही मैं हूँ या वे? इन्होंने तो, मुझे 20 दिन से सूरत तक देखने को तरसा रखा था! फिर तत्क्षण ही मेरे मन में विचार कौंधा कि अगर इन्हें यूँ ही मुझे छेड़ना अच्छा लग रहा है तो यह अच्छी ही तो बात है। जब मुझे कुछ बोलते हुए नहीं सुना तो, सुशांत ने ही फिर कहा - 

रमणीक, मैं खाऊँ और आपको बस देखते रहना पड़े तो क्या, आपको अच्छा नहीं लगेगा? आपने अब तक भोजन तो कर ही लिया होगा, ना?   

मैंने अपनी वाणी को अधिकतम मृदुल रखते हुए कहा - 

सुशांत, आपको खिलाते हुए मुझे जितनी हार्दिक प्रसन्नता होती है, आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। आपको भोजन करता देखने से ही नहीं, अपितु कुछ भी करते देख लेने से मेरे संतप्त हृदय को शीतलता मिलती है। मैं चाहती हूँ कि अभी आप कॉल पर बने रहते हुए, बोलें कुछ नहीं सिर्फ भोजन का रसास्वादन करें।  

सुशांत ने कहा - रमणीक, आपकी ऐसी ही बातों से तो मुझे यह दूरी सहन नहीं होती है।

इस पर मैंने प्रेम से उन्हें झिड़कते हुए कहा - 

नहीं कोई बात की अनुमति अभी नहीं है आपको! आप अभी सिर्फ अच्छे से चबा चबा कर भोजन ग्रहण कीजिए ताकि भोज्य से आपको पर्याप्त पौष्टिकता मिलना सुनिश्चित हो। आपको अभी अपनी अत्यंत कठिन ड्यूटी निभाने के लिए भरपूर बलवान रहने की आवश्यकता है। 

यह सुनकर सुशांत ने मुझे देखते हुए अपने दोनों कान पकड़े थे। फिर होंठों पर ऊँगली रखके, ‘अब न बोलूँगा’ वाली मुख मुद्रा बनाने के बाद भोजन आरंभ कर दिया था। अब उन्हें देखते हुए मेरे मन में उन्हें साथ लेकर कई विचार चलने लगे थे। मैं मन ही मन तय कर रही थी कि यूँ तो मेरा मन कितना कुछ, सुशांत से कह देना चाहता था मगर आज मैं सिर्फ उनके मन की ही सुनूँगी। उनको वह सब कह लेने दूँगी, जिसे वे इस 20 दिन के अंतराल के बाद मुझे कहना चाहते हैं। उन्हें, अपनी कह लेने का सुख प्रदान करते हुए मैं उनके सुख में ही अपनी हर्ष अनुभूतियों का सुख लेने के निर्णय पर पहुँच गई थी। तत्पश्चात मुझे विवाह बाद के पाँच दिनों के उनके साथ का स्मरण आ गया था। 

सुशांत अपने साथ, अपनी बातों और अपने प्यार से उन दिनों में जिस तरह से मेरे पोर पोर को सुख पहुँचाने के उपाय करते थे, उन बातों के, असीम मधुर स्मरण से मैं रोमाँचित हो रही थी। अपने आप में ही लजा रही थी। मैं देख रही थी कि कौर चबाते हुए सुशांत मुझे देखते जा रहे थे।  

भोजन समाप्त करने के बाद सुशांत ने मुझसे कहा - निकी, तुम्हारे सुंदर सलोने मुखड़े के बदलते रंगों को अभी मैं देख रहा था। तुम्हें पता है मुझे तुम्हारे मुखड़े पर आया कौन सा रंग सबसे अच्छा लगता है?

इनसे यह सुनकर मुझे लग गया था कि मेरे मनोनुभूतियों को इन्होंने भाँप लिया है। यह समझते हुए मैं लजा गई थी। मैंने पलकें झुका लीं थीं। मैं कुछ नहीं कह पाई थी। हमारे बीच कुछ पलों का मौन व्याप्त हो गया था। मैं यह भी अनुभव कर रही थी कि थी उनकी दृष्टि मेरे पूरे तन मन का अवलोकन कर रही है। इससे मेरी लाज और गहरा गई थी। 

मैं इनकी पत्नी होते हुए भी, अपनी नारी सुलभ लज्जा से अपने शरीर को इनकी शरारती दृष्टि से छुपा लेना चाहती थी। मैं अपने आप में सिमट जाने का प्रयास कर रही थी। तभी मुझे इनका स्वर अपने कानों में मिश्री घोलता सा सुनाई पड़ा। ये बोल रहे थे - 

निकी, हाँ बिलकुल यही वाला, आपके मुखड़े का गुलाबी रंग, मुझे बहुत अच्छा लगता है। पता है कोई भी कृत्रिम रंग, इस गुलाबी आभा जितना सुन्दर नहीं बन पाया है। यह जो श्रृंगार नारी पर प्रकृति रच देती है, कोई कृत्रिम श्रृंगार इसके पासंग भी नहीं होता है।   

मुझे लगा अब तो यह अति हो गई है। ना चाहते हुए मेरी वाणी में शिकायत आ ही गई, मैंने कहा - 

जी सुनिए, यह बिलकुल भी अच्छी बात नहीं है। एक तो आपने, मुझे अभी अपने से दूर कर छोड़ा है उस पर मुझमें, आपसे एकाकार होने की ललक जगा दे रहे हो।

सुशांत ने तब कहा - 

चलो, मेरी प्यार की बातें तुम्हें आकुलित करती है तो इसे छोड़ अब मैं अपने मन की राष्ट्र प्रेम की भावना बयान करता हूँ। 

शायद वे कहने के लिए शब्द तय करते हुए चुप हुए थे। तब मेरे मन में उनको लेकर शिकायत बढ़ गई थी। कैसे भोले भाले हैं मेरे सुशांत! झूठमूठ की आपत्ति को भी नहीं समझ पा रहे हैं। अब मैं अपने को ही कोसने लगी, ये इतनी प्यारी प्यारी बातें कर रहे थे। मुझे ऐसा कहने के लिए उन्हें बढ़ावा देने वाली बात कहनी चाहिए थी ताकि वे आगे भी और कुछ कहते। मैंने अपने सुख में भावविभोर होने के अवसर को स्वयं खो दिया था। 

मैंने स्क्रीन पर देखा तो सुशांत जो अब तक एक निराले प्रेमी दिखाई दे रहे थे। अब उनके मुख पर एक दृढ़ प्रतिज्ञ वीर पुरुष सुलभ भाव उभर आए थे। अब उन्होंने कहना आरंभ किया था - 

पता है रमणीक, मैं कैसे एक अच्छा पति हो पाता हूँ? वास्तव में राष्ट्र के लिए मेरा प्रेम बिलकुल वैसा होता है, जैसा एक भारतीय पत्नी का, अपने पति को लेकर होता है। यथा जैसे एक पत्नी, करवा चौथ, शुक्रवार, छठ पूजा के तरह और भी ऐसे, कई व्रत अपने पति के दीर्घ और सुखमय जीवन के लिए करती है वैसे ही मैं अपने भारत के दीर्घ कालिक प्रभुत्व और सुखद भविष्य की कामना किया करता हूँ। अभी देखो भारत पर संकट की घड़ियों में मैं, बीस दिन तक पापा, मम्मी और तुम्हें अपने मन से दूर रख सिर्फ इसकी सेवा में लगा रहा हूँ। इन दिनों में न मुझे भोजन की सुध होती, ना ही निद्रा या विश्राम की कामना होती थी। यह बीस दिन, मेरे बिलकुल एक पत्नी के अपने पति के व्रत जैसे होते थे। मैं दिन रात ‘कॉम्बेट एयर पैट्रोलिंग’ में फाइटर जेट्स राफेल उड़ाता रहा था। आज जब शत्रु ने अपने कदम पीछे खींचे हैं, तब जाकर मैं अपने जीवन के लिए सोचना शुरू कर पाया हूँ। इसे तुम ऐसे समझ सकती हो कि आज जाकर मैंने अपने व्रत का उद्यापन, मोबाइल पर आपकी शक्ल देखते हुए किया है। 

मैं उसे शब्दों में वर्णित नहीं कर सकती, सुशांत के शब्द सुनते हुए, मेरे तन मन का पोर पोर जैसे पुलकित हो रहा था। मैं उनके शब्दों के आनंद में खोई हुई थी तब अपने कर्णों में मुझे उनकी वाणी पुनः सुनाई पड़ी थी। वे अब कह रहे थे -

ऐसे भारत की, पत्नी सी मेरी भावना होने पर मैं समझ पाता हूँ कि अपने पति से एक पत्नी की अपेक्षा क्या होती है। इसलिए अगर आप मुझे, अपना अच्छा पति अनुभव करती हो तो इसके मूल में भारत के लिए मेरी यह वर्णित की गई भावना है। 

अब मैंने कहा - 

सुशांत, आप मेरे अच्छे पति ही नहीं हैं अच्छे बेटे एवं देशवासियों के अच्छे भाई भी हैं। जब बात बेटे या भाई होने की आती है तब आप अपने भारत देश को माता-पिता एवं भाई जैसा अनुभव कर लेते हैं। फिर एक बेटे एवं भाई से अपेक्षित भाव से, आप अपने कर्म एवं आचारण करने लगते हैं। 

तब सुशांत ने कहा - 

निकी, तुम मुझे, स्वयं मुझसे भी अधिक अच्छे से समझती हो। तुमने मुझे अनुभव करा दिया है कि मुझे पापा, मम्मी से भी बात करनी चाहिए। अभी रात अधिक हो गई है कल सुबह मैं, उनसे बात करता हूँ। अब तुम भी सो जाओ। 

कॉल पूरा किया जाने वाला है जानकर, अब पहले फ्लाइंग किस मैंने किया था, इसके आदान प्रदान के बाद, शुभ रात्रि कहते हुए हमने कॉल डिसकनेक्ट किया था। 

बिस्तर पर लेट कर मैं सोच रही थी, विश्व में वैसे तो आठ अरब से अधिक लोग जी रहे हैं मगर पिछले 45 - 50 मिनट को मैंने, जिस असीम प्रसन्नता से जिया है वैसे अन्य किसी ने शायद नहीं जिया होगा। 

इस विचार और सुशांत की बातों से मिली सुख अनुभूतियों में मेरे मग्न रहते हुए ही, सुखद निद्रा ने मुझे अपनी गोद में ले लिया था …             

 --राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

23-08-2021


Saturday, August 21, 2021

सीजन2 - मेरे पापा (1)…

 

सीजन2 - मेरे पापा (1)…

समय रुकता कब है, वह अभी भी नहीं रुका था। पापा एवं मम्मी के स्नेह छाया में रहते हुए हर दिन मेरी, सुशांत से मोबाइल पर प्रेम की मधुर बातें होतीं और हमारे जीवन का हर पल, पिछला पल होता चला जा रहा था। ऐसे चल रहे जीवन प्रवाह में, तब दुर्भाग्यपूर्ण घड़ी आई। जिसमें लद्दाख, जहाँ सुशांत की तैनाती थीं वहाँ दुश्मन से हुए आमने सामने के संघर्ष में हमारे बीस सैनिकों को अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा था। 

सुशांत यद्यपि एयरफोर्स में हैं तब भी इस दुखद समाचार वाले दिन, सुशांत को लेकर मेरी आशंकाओं ने मेरे बदन में ही नहीं अपितु मेरी आत्मा तक में सिहरन उत्पन्न कर दी थी। सुशांत की पत्नी के रूप में, मैं ऐसे परिवार की नई नई सदस्य हुई थी, जिसका कोई सदस्य आर्मी में होता है। दुश्मन निर्मित आपदा एवं चुनौती के ऐसे दिनों में इन परिवारों पर जैसी बीतती है, (मनःस्थिति के) उन भय एवं साहस के बीच विचारों के दोलन (Oscillation) में, अब मुझे धैर्यपूर्वक जीवन यापन करना सीखना था। मेरे लिए यह ऐसा प्रथम अनुभव था। 

पापा एवं मम्मी के मन में क्या चल रहा है, मुझे इसका अनुमान हो रहा था। मैं नहीं समझती कि उन के मन में भय या आशंकाएं मुझसे भिन्न रही होंगी। शायद इससे उनके नेत्र भी सजल हो जाने को होते होंगे, मगर मेरे सामने वे संयत और सामान्य व्यवहार कर रहे थे। कदाचित वो मेरे को लेकर भी सोच रहे थे कि अगर वे कमजोर दिखाई दिए तो मुझ पर क्या बीतेगी। यह अनुमान होते ही मुझे भी अपने पर यह जिम्मेदारी अनुभव हुई कि मैं, अपनी आशंकाओं में रोकर उन्हें भी ना रुला दूँ। 

मुझे स्मरण आ गया था कि दीदी के सुशांत से पूछने पर, सुशांत ने देश की सारी अच्छी लड़कियों में से मुझे, अपनी अर्धागिनी बनाने का आधार यह बताया था -

“रमणीक, मेरे पापा में, अपने पापा की छवि देखती है। और लडकियाँ, सुंदर तो ज्यादा होंगी, मगर उनकी, मेरे पापा-मम्मी के लिए, ऐसी दृष्टि शायद नहीं होगी। यह बात, रमणीक में विशेष है।” 

मुझे यह भी स्मरण आया था कि एक दिन सुशांत ने मुझे कहा था -

“पापा, मम्मी को तुम्हारे और तुम्हें, उनके हवाले कर देने से, मैं, निश्चिंत हो स्वयं को राष्ट्र रक्षा कर्तव्यों के, हवाले करता हूँ।” 

ये बातें स्मरण में आने पर, रो पड़ने की अपनी दशा को मैंने नियंत्रित किया था। मैंने इस सच्चाई को पहचाना था कि मैं युवा हूँ, पापा-मम्मी प्रौढ़ हैं। मुझे अपने कर्म एवं व्यवहार से उनका सहारा होना है। ऐसा कुछ नहीं करना है जिससे उलटे उन्हें ही मुझे सम्हालने या सहारा देने को विवश होना पड़े। यह विचार आते ही मैंने अपने मन को दृढ़ किया था। पापा के पसंद का नाश्ता टेबल पर सजाने के बाद, नाश्ता करते हुए मैंने पापा से परिहास करने के विचार से, मम्मी से कहा - 

मम्मी जी, पापा तो गंभीरता से यूँ विचार करते प्रतीत हो रहे हैं कि सरकार यदि लद्दाख सीमा पर लड़ने की, इन्हें अनुमति दे दे तो पापा ही जाकर 5-10 चीनियों को ठिकाने लगा दें। 

यह बात कहने के, मेरे मंतव्य अनुसार ही इसे सुनकर पापा और मम्मी के मुख पर विद्यमान गंभीरता छू हुई थी। हँसते हुए पापा ने कहा -

सच कहती हो रमणीक! इतनी सही तरह से तुम मेरे मन की पढ़ लेती हो। वास्तव में मेरी इच्छा तो अभी यही हो रही है, मगर मेरी बूढ़ी हो रही रगों में, खून का ऐसा खौल उठना भी राष्ट्र हित में अच्छा परिणाम नहीं दिला पाएगा। 

मैंने कहा - 

मगर पापा, आप अपनी प्रौढ़ अवस्था अनुसार अपने दायित्व निभाने में पीछे कहाँ हैं। पहले ही आप समाज बुराई से, लड़ कर उन्हें मिटाने वाले सैनिक हैं। देश के एक प्रबुद्ध नागरिक होने का दायित्व तो आप यथा प्रकार निभा ही रहे हैं। 

मेरी इस बात पर मम्मी ने मजाक आगे बढ़ाते हुए कहा - 

सही कहती हो रमणीक, ये तो ऐसे सैनिक बने फिरते हैं, जिन्हें अपने पीछे की इस प्रौढ़ा पत्नी और (तुम) मासूम बेटी का, दिनोंदिन तक कोई विचार नहीं रहता है। ये कभी नहीं सोच पाते हैं कि मन बहलाव के लिए हमें कहीं पर्यटन को ही ले चलें। 

पापा ने समझ लिया कि मम्मी भी मेरी तरफ हो गईं हैं, उन्होंने हँसते हुए कहा - 

इस कोरोना त्रासदी में भी अगर आप दोनों घूमना चाहो तो मैं, अपने प्राणों की चिंता छोड़ सकता हूँ। जहाँ कहो घूमने ले जा सकता हूँ। 

मेरे ऑफिस का समय हो रहा था अतः मैंने कहा - 

चलिए छोड़िए पापा, कोरोना थम जाने के बाद हम घूमने जाने का प्रोग्राम तय कर लेंगें। 

ऐसे नाश्ता खत्म करके, मैं ऑफिस के लिए चल दी थी। रास्ते में, मुझे सुशांत को लेकर भय नहीं रहा था अपितु मैं ‘मेरे पापा’ एवं मम्मी जी के दीर्घ जीवन की कामना कर रही थी। मैं एक बार अपने पापा को खो चुकी थी। अब इन (सुशांत के) पापा की छत्रछाया अपने पर, अपने पूरे जीवनकाल के लिए चाहती थी। 

सुबह से लेकर रात तक सुशांत के दो तीन कॉल नितदिन आ जाया करते थे। आज मगर उनका कोई कॉल नहीं आया तो ऑफिस से लौटते हुए, मैंने ही सुशांत को कॉल किया था। जिसे उन्होंने काट दिया था। घबराई हुई जब मैं घर के द्वार पर पहुँची, तब सुशांत का कॉल आया था। इसमें उन्होंने सिर्फ इतना बताया कि - 

रमणीक, अभी मैं अत्यधिक व्यस्त हूँ। मैं पूरी तरह ठीक हूँ। अभी कुछ दिनों मैं कॉल न भी कर पाऊं तब भी, तुम मेरी चिंता करके परेशान ना होना। 

मैं सिर्फ जी कह पाई थी। तभी उन्होंने बाय कहकर कॉल काट दिया था। इसी बीच, पापा ने द्वार खोले थे। परेशान चिंतित घर में प्रवेश करते हुए मैं, उनसे नितदिन की तरह मुस्कुराहट आदान प्रदान करना भूल गई थी। उन्होंने मेरे सिर पर स्नेह से थपथपाया तब मुझे अपनी भूल याद आई थी। तब अपने मनोभावों पर सप्रयास नियंत्रण पाते हुए मैंने उनकी ओर देखकर मुस्कुरा दिया था। 

पापा ने मुझे ऐसे निहारा था जैसे मुझे आश्वस्त कर रहे हों कि, ‘रमणीक चिंता न करो, जल्द ही सब ठीक हो जाएगा’। मैंने एक बार फिर मुस्कुरा दिया था। इस बात का मुझे अहसास नहीं था कि सम्हालते सम्हालते भी तब मेरे नेत्र सजल थे। पापा ने यह नोटिस कर लिया था। उन्होंने कहा - 

मेरी रमणीक, तो एक बहादुर बेटी है। 

मुझे लगा अगर मैंने पापा से दृष्टि मिलाई तो मैं रो पड़ूँगी। मैंने उतावली में पापा से कहा - 

पापा, मैं वॉशरूम से आती हूँ। 

फिर उनसे दृष्टि चुराते हुए मैं तेज कदमों से अपने कक्ष में आ गई थी। मैंने अपने पीछे शयनकक्ष का डोर लॉक किया था। मैं कपड़े तक बदलने की शक्ति अनुभव नहीं कर रही थी। मैंने जैसे तैसे कपड़े चेंज किए थे। अब तक धारण किया मेरा धैर्य तब चुक गया था। मेरी काया बिस्तर में ढह गई थी। मैं फफक फफक कर रो पड़ी थी। अश्रुओं का कुछ मिनट तक बह जाने के बाद मेरा जी कुछ हल्का हुआ था। तब मुझे विवाह तय होते समय में पापा की कही बात याद आई थी। उस समय उन्होंने कहा था -

“आर्मी फैमिली में बहुधा कठिनाइयों की, वेदनादायी स्थितियां निर्मित होती रहती हैं। जब जब सीमा पर या देश के भीतर कोई डिस्टर्बेंस होता है और घर का सेना में शामिल सदस्य, वहाँ तैनात होता है, तब तब उसके जीवन को लेकर, परिवार में गहन चिंता रहा करती है। ऐसे में सामान्य बने रहने के लिए मानसिक रूप से दृढ़ होने की जरूरत होती है। तुम्हें सुशांत से विवाह का फैसला लेने के पूर्व, अपनी मानसिक क्षमताओं का परीक्षण अवश्य करना चाहिए।”

इसके स्मरण आने के बाद मैंने अपनी शक्ति संजोई थी और वॉशरूम जाकर हाथ-पाँव, आँखें एवं मुख धोए थे। फिर मैं बाहर आई थी। मैंने देखा, मम्मी किचन में थीं। मैं रसोई के काम में उनका साथ देने लगी थी। मैं चुप थी। शायद उनका मन भी बात करने का नहीं हो रहा था। 

आवश्यक थोड़ी बातों के साथ हम काम कर रहे थे। अब मैं, अपनी छोड़ मम्मी के बारे में सोच रही थी। मैं सोच रही थी कि मेरे से अधिक विकट स्थिति तो मम्मी की हो रही होगी। सुशांत के साथ, जहाँ मेरा वर्तमान एवं भविष्य था, वहीं मम्मी जी के साथ तो सुशांत का अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों ही थे। वे चाहे प्रत्यक्ष में सुशांत की चिंता करती नहीं दिखें मगर निश्चित ही मन में सुशांत को लेकर वे आशंकित तो होंगी ही। कदाचित उन्हें मेरी मनःस्थिति का भी आभास होगा, जिससे वे भावुकता में कुछ कह देने की जगह चुप रहने का विकल्प चुन रहीं थीं। 

रात्रि का भोजन पापा, मम्मी जी एवं मैंने साथ किया था। थोड़ी बातें हममें अवश्य हुईं थीं मगर वे अन्य दिनों की तुलना में अत्यंत ही कम थीं। हमारे सैनिकों के बलिदान के साथ ही, चीनियों के मारे जाने से युद्ध की आशंका के बादल गहरा गए थे। सुशांत अब तक तो कुशल थे मगर युद्ध हुआ तो कुछ भी हो सकता था। रात में, जीने के लिए आवश्यक होता है सिर्फ इसलिए हम सभी ने भोजन किया गया था। हममें से किसी को स्वादिष्ट भोजन में कोई रस नहीं आया था। 

भोजन के बाद मैं अपने कमरे में आ गई थी। मैं अनमनी ही गूगल पर भारत-चीन के विवाद का अतीत और वर्तमान खोजने-पढ़ने लगी थी। पापा-मम्मी जी, सोने के पहले दूध पिया करते हैं। अतः उन्हें दूध के गिलास देने के विचार से मैं रसोई में आई थी। दूध लेकर जब बैठक कक्ष में पहुँची तो मैंने देखा, दोनों टीवी देख रहे हैं। मेरी दृष्टि टीवी पर पड़ी तो, उस पर राफेल उड़ता दिखाया जा रहा था। एंकर आसमान पर उड़ते राफेल को दिखा कर भारत-चीन की सैन्य क्षमताओं की तुलना करते हुए सभी तथ्य बता रहा था। 

यहाँ बात राफेल की की जा रही थी। सुशांत ने मुझे बताया हुआ था कि राफ़ेल पायलट के तौर पर उन्होंने फ़्रांस से प्रशिक्षण लिया है। अतः दूध के गिलास पापा-मम्मी जी को देने के बाद, अपनी उत्सुकता के कारण मैं भी उनके साथ टीवी देखने लगी थी।

टीवी पर तुलना करते हुए यह बताया जा रहा था कि चीन विश्व की पहले नं. की सैन्य ताकत है जबकि भारत चौथे नं. पर है। चीन पर भारत की बढ़त जिन बातों में है उसमें भारत के पास राफेल, ब्रम्होस मिसाइल एवं आईएनएस विक्रमादित्य होना प्रमुख है। 

यह सुनकर मुझे लग रहा था कि चीन से ताकत में भारत के कम होने से, यदि युद्ध हुआ तो भारत के पक्ष का बहुत कुछ दारोमदार राफेल पर रहेगा। इससे स्पष्ट था कि आसन्न युद्ध में सुशांत पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी के साथ उन पर खतरा भी अत्यंत अधिक था। यह सोचते हुए मेरा हृदय बैठा जाता लग रहा था। चिंता में मेरे मुख से निकल गया - 

पापा, यह हम पर कितनी बड़ी विपत्ति खड़ी हो गई है। 

पापा ने मेरे साहस बढ़ाने के लिए कहा - 

रमणीक, यह तुलना सुनकर थोड़े भी चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। चीन, हमसे युद्ध नहीं करेगा। वह सिर्फ धौंस दे रहा है। भले ही हम शक्ति में उससे कम हैं, तब भी यदि युद्ध हुआ तो हम चीन को बहुत बड़ी क्षति पहुँचाने की स्थिति में हैं। चीन यह भलीभांति जानता है। इससे वह युद्ध छेड़ने से बचते रहेगा। यही बात हमारी वह शक्ति होगी जिससे हमारी स्वमेव ही रक्षा होगी। 

मैंने कहा - 

मगर पापा, युद्ध होता सा दिखने का यह परिदृश्य मुझे चिंता में डाल रहा है। 

मैंने भय शब्द का प्रयोग जान बूझकर नहीं किया था। मगर पापा ने इससे ही अपनी बात आरंभ की थी। कहा - 

भयभीत न रहो, बेटी! मालूम है रमणीक, हम जैसे परिवारों में एक विशिष्ट बात होती है।       

मैंने मरे स्वर में पूछा - वह क्या, पापा!

पापा ने बताया - 

देश पर आशंका की इन परिस्थितियों में भारत के 35 करोड़ परिवार, जब भारत की सीमाओं एवं हित की चिंता करते हैं और इसे लेकर भयभीत होते हैं, तब 35 लाख परिवार जिनके बेटे-बेटी सेना में हैं, जिनमें एक हमारा परिवार भी है, एक अतिरिक्त आशंका अनुभव कर रहे होते हैं। हमारी कामना होती है कि हमारे बेटे, भाई, पति या पिता सुरक्षित रहकर विजयी हों और उन्हें कुछ क्षति न उठानी पड़े। यह 35 लाख की, 35 करोड़ परिवारों पर विशिष्टता है। आज हमें भय नहीं गौरव करना चाहिए कि हमारे सुशांत पर यह एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। 

पापा की कही गई बात पर मैं विचार करने लगी थी। कुछ पल मेरा भय, कम हुआ प्रतीत हो रहा था। मैंने उठकर, श्रद्धा से पापा एवं मम्मी के चरण छुए थे। दोनों के कहे आशीर्वचनों को सुनकर भी, मैं अपना भय पूरी तरह से दूर नहीं कर पाई थी। 

तब डर से मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने दूध के खाली हुए गिलास उठाए थे। मुझसे असावधानी हुई थी। कंपकंपा रहे मेरे हाथ में ली गई ट्रे में से, काँच के गिलास धरती पर गिर कर फूट गए थे। पापा और मम्मी ने तुरंत उठकर काँच के टूटे, टुकड़े समेटने में मेरी सहायता की थी। 

दोनों ने बारी बारी मुझे गले लगाकर हिम्मत रखने की बात कही थी। तत्पश्चात मैं अपने शयन कक्ष में आ गई थी।

मैंने कभी सुना था कि काँच का टूटना अशुभ संकेत होता है। इस विचार से मैं, पहले से भी अधिक भयाक्रांत हो गई थी। मैं सोचने लगी थी, पापा-मम्मी भी यदि इसे अशुभ होना मानते होंगे तो अभी वे कैसे भयभीत हो रहे होंगे।  

तब मैंने अंधविश्वास के इस विचार को यह सोचते हुए अपने मन से निकाला था कि दूर कहीं कुछ होने में, यहाँ काँच के टूट जाने का संबंध भला कैसे हो सकता है। यह सब पुरातन अंधविश्वास हैं, जिसमें सुबह किसी निर्दोष मनुष्य की शक्ल को देखना भी अपने लिए अशुभ मान लिया जाता है। यह सब मनुष्य के कमजोर मन का भय एवं कल्पना मात्र होता है, यथार्थ से इसका कोई संबंध नहीं होता है। 

मैं बेड पर आई थी। बिस्तर पर लेट कर मेरा मन सुशांत की पत्नी होने पर गर्व करना चाहता था। मैं मगर, सुशांत की पत्नी होने से ही, अधिक भयभीत थी। मैं डर रही थी कि वीर योद्धा पति के साथ की मेरी कहानी, कुछ ही दिनों की न रह जाए। 

विवाह के पहले सुशांत से दो दिनों में कुछ घंटों का साथ और विवाह के बाद पाँच दिनों के साथ में, हमारी केमिस्ट्री जिस तरह मैच करते रही थी, उससे मुझे कोई संदेह नहीं रह गया था कि सुशांत से मेरा साथ, कई जन्मों से रहा है। 

इस जन्म में भी मुझे मिल गए उनके साथ का, मैं भरपूर सुख उठाने की अभिलाषी थी। अभी भारत माता पर जो संकट आया था उससे मुझे उनका साक्षात सानिध्य नहीं मिल पा रहा था। अभी सुशांत के लद्दाख में होने पर, उनके मोबाइल कॉल्स ही वह माध्यम थे जिससे, उनसे विरह की मेरी वेदना को मलहम लग जाया करती थी। मेरे संतप्त हृदय को इसी बात से शीतलता मिला करती थी। सोने के पहले सुशांत की कही गईं प्रिय बातों से मेरी निद्रा सुलभ हो जाया करती थी मगर आज उनका मोबाइल कॉल भी नहीं आया था। आज मेरा सो पाना कठिन हुआ था। बिस्तर पर करवटें बदलते हुए नींद मुझे कई घंटों बाद लग पाई थी।  

फिर आगे के दिनों में, सुशान्त का मोबाइल कॉल नहीं आना सामान्य बात हो गई थी। अब उनकी कुशलता का अनुमान करने के लिए, प्रसारित समाचार ही एकमात्र माध्यम रह गए थे। न्यूज़ चैनलों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थिति तनावपूर्ण होने पर भी कोई और बलिदान न होना तथा युद्ध छिड़ जाने का समाचार न होना, मेरे मन को राहत देता था। 

सुशांत फाइटर जेट राफेल के पायलट हैं यह मुझे पता था। पापा मम्मी को भी यह पता है या नहीं, मैं नहीं जानती थी। समाचारों में कभी कभी एलएसी से‌ सटी एयर स्पेस एवं लेह-लद्दाख के आसमान में दिन रात, कॉम्बेट एयर पैट्रोलिंग करते हुए शक्तिशाली फाइटर जेट राफेल दिखाया जाता था। मैं इस विचार से रोमांचित हो जाती थी कि कदाचित इसे मेरे सुशांत उड़ा रहे हैं। एक क्षण को मेरा हृदय गर्व भाव से ओतप्रोत होता, अगले ही पल में मैं डरने लगती थी। 

मुझे एहसास था कि अभी हमारा सामना अत्यंत ही शक्तिशाली शत्रु ड्रैगन से हो रहा है। मुझे संशय एवं भय होता था कि वे राफेल तक को भेद लेने की क्षमता तो नहीं रखते हैं। मेरे मन में इसे लेकर भी डर होता कि राफेल उड़ाने का सुशांत का अनुभव बहुत अधिक नहीं है। कहीं कोई चूक या गलती सुशांत ही न कर बैठें। इन विचारों से मेरा हृदय काँप काँप जाता था। 

सुशांत के कॉल नहीं आना इन दिनों सामान्य बात हो गई थी। मैं सहमी सहमी रहती थी। मुझे यह भी अनुमान होता था कि भले ही वे प्रकट नहीं करते मगर पापा मम्मी जी के दिन भी ऐसे ही सहमे सहमे बीत रहे थे। 

अंततः बीस दिन बाद, सभी के मन को राहत देने वाला समाचार आया था कि चीन की सेना ने पीछे हटना शुरू कर दिया है। तब उस रात भी, मैं सो नहीं पा रही थी। मैं बिस्तर में, करवटें बदलती हुई अपने मोबाइल फोन को बड़ी आशा से निहार रही थी। भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि इसकी स्क्रीन पर सुशांत के मुस्कुराता चेहरा मेरी आँखों के समक्ष उभरने के साथ ही कर्णप्रिय वह रिंगटोन मुझे सुनाई पड़े जो मैंने सिर्फ सुशांत के इनकमिंग कॉल के लिए सेट की हुई है। 

आज लगता है मेरा ईश्वर अपनी इस पुजारन पर प्रसन्न था। एकाएक मोबाइल से वही रिंगटोन गूँज उठी थी। मैंने बड़ी आशा और प्रेम से मोबाइल हाथ में लेकर स्क्रीन देखी तो उसमें मुस्कुराते हुए मेरे सुशांत दिखाई दे रहे थे …. 

 --राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

21-08-2021

Wednesday, August 11, 2021

मैं, नीरज चोपड़ा की माँ ….

 मैं, नीरज चोपड़ा की माँ ….  

(मनःस्थिति एक कल्पना) 

4 अगस्त 2021 को नीरज के फाइनल में पहुंचने के समय से ही, मेरे मन में 7 अगस्त के फाइनल होने की प्रतीक्षा चल रही थी। मेरी व्यग्रता समाप्त हुई थी, आज वह दिन आ गया था। प्रातः काल से ही मेरी व्यग्रता, अब घबराहट में परिवर्तित हो गई थी। 

भारत की एक बेटी हमारी अदिति अशोक, से पूरे देश को पिछले कुछ दिनों से मेडल की आशा लगी हुई थी। दुर्भाग्य से आज सुबह, अदिति का प्रयास पदक के बहुत पास आकर थम गया था। आज यह देखना मुझे अत्यंत दुखी कर गया था। इसे देखकर मैं, नीरज के साथ भी ऐसा अशुभ हो जाने को लेकर आशंकित हो गई थी। मैं सोच में पड़ गई थी कि ठीक अदिति की तरह ही तो, नीरज पर पूरे देश की आशा लगी हुई है। मैं भी तो अपने भारतवासियों जितनी ही नीरज से पदक जीतने की अभिलाषा कर रही हूँ। 

चढ़ते सूरज के साथ साथ, मेरे मन में कई प्रश्न उत्पन्न हो रहे थे। मेरे सहित करोड़ों भारतीयों का, मेरे बच्चे नीरज पर अपनी अभिलाषाओं का इतना भार लादना, क्या उचित है? मेरे अल्पायु बेटे नीरज के दिमाग पर, क्या सबकी आशाओं के इतने भार से अहितकारी प्रभाव तो नहीं पड़ रहा होगा? 

मैं सोच रही थी कि नीरज की भी तो महत्वाकांक्षा ओलंपिक से अपने भारत के लिए पदक लाने की है। अगर वह भी, बेटी अदिति की तरह पदक जीतने से चूक गया तो? 

मैं सोचने लगी थी कि मेरी तो छोड़ो, असफल रह जाने पर नीरज के मन पर क्या बीतेगी? वहाँ दूर टोक्यो में, मैं, उसके पापा या घर का कोई भी तो साथ नहीं, जो, अगर नीरज हार जाए तो उसे सम्हाल पाए। मेरा मन किया कि मैं मोबाइल पर, नीरज से बात करुं। फिर सोचते हुए, यह विचार भी मैंने छोड़ दिया कि बात करते हुए, मेरे स्वर में कंपन का अनुभव करके मेरा नीरज, भावुक न हो जाए। इससे कहीं, आज उसके प्रदर्शन पर बुरा प्रभाव न पड़ जाए।      

इन्हीं आशा-निराशा के बीच मैं, गृह कार्य करते जा रही थी। घर में सब नीरज के जीतने और हार जाने की संभावनाओं को लेकर ही विभिन्न अटकलें लगाते हुए बात कर रहे थे। मैं, उनके वार्तालाप में भाग लेने से बच रही थी। मुझे भय लग रहा था कि मैं भावुक होकर, सबके सामने रो ही न पडूँ। 

दोपहर का भोजन भी, मैं किचन में अकेले में करने बैठी थी। मैं, अपने पति के सामने आने तक से बच रही थी। अपने सयुंक्त परिवार में, घर और रसोई के कार्य करने के बाद मुझे, अच्छी भूख लग जाया करती है, मगर आज मुझे भोजन करना रुचिकर नहीं लग रहा था। जैसे तैसे ही कुछ निवाले मैंने, हलक से नीचे उतारे थे। 

परिवार में मैं ही, सुबह सबसे पहले जागती हूँ। दोपहर के भोजन के बाद तक मेरी थकान, मुझे बिस्तर पर फैल कर सो जाने को विवश कर देती है। आज का यह दिन और दिनों से भिन्न था। आज मेरे पर अकेली थकान ही नहीं अपितु अभूतपूर्व तनाव और चिंता भी छाए हुए थे। अपनी मानसिक व्यथा को छुपाए हुए मैं, शयनकक्ष में आई थी। यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ था कि दोपहर में कभी आराम न करने वाले, नीरज के पापा बिस्तर पर आंखें मींचे लेटे हुए थे। मेरी आहट सुनकर उन्होंने आंखें खोलकर मुझे देखा था। वे बोले कुछ नहीं थे। बस मुझे देखकर, उठ खड़े हुए थे। मैं कुछ समझ पाती उसके पूर्व ही उन्होंने, अपनी बाँहे फैलाकर मुझे गले लगा लिया था। 

अब मुझे कल्पना हुई थी कि बेटे से अभिलाषाओं का दवाब, मुझ पर ही नहीं उन्हें भी चिंतातुर किए हुए है। सुबह से ऊपरी तौर पर नियंत्रित रख पाई मैं,  अब कोशिश करने पर भी, अपनी भावनाओं को सामने आने से रोक नहीं पाई थी। मैंने, उनकी पीठ को अपने हाथों के घेरे में ले लिया था। उन्होंने भी यही किया था। तब मैं, उनके कंधे पर सिर रख फूट फूट कर रो पड़ी थी। 

नीरज के पापा भी रो रहे हैं, इसका आभास मुझे तब हुआ जब मैंने, अपने सिर पर उनके नयनों से बहते अश्रुओं की नमी अनुभव की थी। 

मेरे ‘ये’ अत्यंत सशक्त पुरुष हैं। परिवार पर कभी आए मातम के अवसर के अतिरिक्त मैंने, इन्हें कभी विलाप करते नहीं देखा था। इनके ऐसे रो पड़ने ने मुझे मेरी अपनी व्यथाएं भुला दीं। मैं रोते रोते चुप हो गई थी। अपने हाथों से, उनके मुख को दूर करते हुए मैंने इन्हें देखा था। मेरे ‘ये’, आँखें मींचे हुए बिना ध्वनि किए रोए जा रहे थे। अब मैंने, इनका सिर अपने कंधे पर रख लिया था। मैं चाहती थी कि ये रो लें। रो लेने से ही इनका जी हल्का हो पाएगा।

मैं कल्पना करने लगी थी कि जब हमारी यह हालत है तो मेरे बेटे नीरज की, भारत की उससे अपेक्षा के दवाब में हालत कितनी विकट होगी। इन्होने स्वयं को, कुछ मिनटों में संयत कर लिया था। तब हम पलंग पर साथ-साथ लेट गए थे। हममें व्याप्त चुप्पी को मैंने तोड़ा था। मैंने कहा - सुनो जी, नीरज से स्वर्ण पदक की हमारी और देश की अभिलाषा, मेरे बेटे पर ज्यादती है। 

इन्होंने कहा - अभिलाषा करना तो सरल बात है, आज तो सोने से कम की कोई नहीं कर रहा है। 

मैंने कहा - वहाँ तो सभी 31 प्रतियोगी, स्वर्ण अभिलाषा को लेकर आए थे। 23 की आशा तो टूट चुकी है। अब नीरज सहित बचे 12 तो, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ भाला फेंकने वाले हैं। मेरा नीरज तो काँसा भी ले आए तो हमें प्रसन्न होना चाहिए। 

इन्होने कहा - सरोज, तुम माँ हो। यह तो अपने बच्चे के लिए तुम्हारी ममता कह रही है। तुम देखो तो पदक तालिका को, हमारे भारत को अब तक सोना, एक भी नहीं है। देशवासियों की तो छोड़ो, हमारे तो प्रधानमंत्री तक मन ही मन चाह रहे होंगे कि नीरज स्वर्ण पदक जीते। अगर नीरज यह नहीं कर पाया तो इस ओलंपिक में भी हमें बिना सोने के रह जाना पड़ेगा। अब हमारे किसी और खिलाड़ी की चुनौती भी तो शेष नहीं बची है। 

मैंने पूछा - जी, मैं किसे निष्ठुर कहूं, समय को या देशवासियों को जो नीरज से सोना माँग रहे हैं?

इन्होंने अब मेरे सिर पर थपकियाँ दीं थीं। फिर मुझे निद्रा आ गई थी। विचित्र बात थी कि यथार्थ में अपनी ओर से, नीरज पर स्वर्ण पदक की रिआयत कर देने पर भी, मेरे स्वप्न में नीरज मुझे स्वर्ण पदक जीतता दिखाई दिया था। शायद आधे घंटे से कम ही, मेरी आँखें लगी रह पाईं थीं। घर के कामों एवं नीरज के फाइनल की चिंता से मैं उठ गई थी। देखा तो, नीरज के पापा पहले ही शयनकक्ष से जा चुके थे। 

रसोई में चायपान की तैयारी, नीरज की ताई और चाची कर रहीं थीं। मैं भी उनका साथ देने लगी थी। और दिनों से अलग, आज हम सब चुप चुप ही थे। सबके मन पर आज की होनी-अनहोनी के विचार चल रहे थे। लगभग एक घंटे तक चलने वाले फाइनल को देखते हुए खाने, पीने के लिए सामग्री उपलब्ध रहे इस हेतु, चाय, लस्सी, छाछ सहित इनके साथ लिए जाने वाली पर्याप्त भोज्य सामग्री हम सबने मिलकर बना ली थी। हम तीनों ही, सब सामग्रियां ट्रे एवं प्लेट्स में लिए, घर के बड़े हाल में पहुँची तब तक घर का हर छोटा बड़ा सदस्य, टीवी के सामने अपना स्थान ग्रहण कर चुका था। हमने वहाँ टेबल पर सभी पेय सहित सामग्रियाँ रख दीं थीं। 

आज कोई हमसे आशा नहीं कर रहा था कि हम ही सब उन्हें परोंसे। हमने टीवी के सामने अपने आसन ग्रहण किए थे। सब बड़े-बच्चे अपने अपने पसंद की सामग्री-पेय स्वयं लेने लगे थे। मेरी दृष्टि टीवी स्क्रीन पर गई तब, बजरंग (पुनिया) काँस्य पदक के लिए कुश्ती लड़ रहे थे। तुरंत ही नीरज के प्रदर्शन को लेकर अपनी चिंता भूल मैं, कुश्ती देखने लगी थी। बजरंग, एकतरफा जीतते दिख रहा था। यह दृश्य मुझे आनंदित कर रहा था। अंततः बजरंग जीत गए थे। हम सब के मनोमस्तिष्क पर प्रसन्नता छा गई थी। 

किसी को किसी बात का कोई विचार नहीं रह गया था। व्यग्रता और उत्साह दोनों के रहते, चाय के बाद तुरन्त लस्सी, या छाछ के बाद तुरन्त ही चाय पीना, ठीक नहीं होता है, आज हम सब मानो यह विवेक खोए हुए थे। 

मैं भी भूली हुई थी कि अभी ही तो मैंने चाय पी है। मैंने लस्सी का बड़ा गिलास उठा लिया था। उसे ओंठो तक पहुंचाया ही था कि टीवी स्क्रीन पर, स्टेडियम में नीरज प्रविष्ट होते दिखाई दिया था। यह देखते ही मेरा मन किया था कि जैसे में उसके बालपने में, उसे गोद में उठाया करती थी वैसे ही, अभी नीरज को अपनी गोद में उठा लूँ। फिर यथार्थ की सोचते हुए मैं निराश हुई थी। यह अब संभव कैसे हो सकता था। 

अभी तो वह दूर टोक्यो में था और यदि मेरा बेटा पास भी होता तो अब तो वह मेरे से लंबा और इतना बलिष्ठ हो गया है कि उल्टा वह ही मुझे गोद में उठा, गोल गोल घुमा देता है। और जब मुझे वापस खड़ा करता है तो मुझे चक्कर आता है। 

एक के पीछे एक कुल 12 खिलाड़ी स्टेडियम में आए थे। जिन्हें देख मुझ पर फिर भय हावी हो गया था। इनमें अधिकतर तो मेरे बेटे से बलिष्ठ एवं बड़े कद के थे। मुझे लग रहा था कि इनमें तो शक्ति, नीरज से अधिक दिखाई पड़ रही है। कैसे मेरा नीरज, इनसे अधिक दूर भाला फेंक पाएगा। मुझे लग रहा था, मेरा देखा स्वप्न झूठा है। मेरी अभिलाषाएं मात्र कल्पना रह जाने वाली हैं, यह यथार्थ नहीं हो पाएगीं। नीरज स्वर्ण तो छोड़ो, कांस्य भी जीत नहीं पाएगा। मेरे मन में नीरज को लेकर करुणा उभरी थी। मैं भूल रही थी कि भले ही वे ओलंपिक नहीं थे, मगर पिछले पाँच वर्षों में नीरज विभिन्न प्रतियोगिताओं से एकाधिक गोल्ड मेडल ही तो लेकर लौटता आया था। जिसे लाकर वह सबमें पहले, मेरे गले में ही डाला करता था। 

मेरे भय-अभय के बीच प्रतियोगिता आरंभ हुई थी। पहले ही प्रयास में नीरज ने 87 मीटर से अधिक दूर भाला फेंक दिया था। मेरे अतिरिक्त सब अपने स्थान पर खड़े हो कूदने लगे थे। लगभग हर कोई कह रहा था, इससे पार कोई और नहीं फेंक पाएगा। सोना पक्का कर लिया नीरज ने तो। मेरा मन इन सबकी वाणी पर विश्वास करने का हो रहा था। मगर मैं समझ पा रही थी कि हर माँ का हृदय, प्रसन्नता की ऐसी घड़ियों में भी कितना काँपता रहता है। 

सब अपने अपने में उठ रही प्रसन्नता में अभिभूत थे। किसी का ध्यान मेरी ओर नहीं था। मैं जड़ हुई अपनी कुर्सी पर चिपकी बैठी थी। मेरी निगाहें टीवी पर निरंतर जमी हुई थी। मैं हर प्रतियोगी के फेंकने की दूरी को देख रही थी। जब तक उनका फेंका भाला हवा में रहता था मेरा हृदय बैठा जाता था यह सोच कर कि उनका फेंका भाला धरती पर नीरज से अधिक दूर तो नहीं जा बैठेगा। पहला चक्र पूरा हुआ था। किसी भी अन्य का फेंका भाला, नीरज की तरह 85 मीटर की वृताकार रेखा के पार नहीं जा पाया था। 

तब दूसरा चक्र आरंभ हुआ था। नीरज के दूसरे प्रयास में भाला पहले से भी अधिक दूर 87.58 दूर जाकर धरती में गड़ गया था। मेरा हृदय बल्लियों उछलने लगा था। सब नाचने लगे थे। तभी बेटियाँ, संगीता, सविता और नैंसी मेरे पास आईं थीं। संगीता ने कहा - मम्मी, अब तो नच लो, अब निज्जू भैया का तो स्वर्ण पदक पक्का हो गया है।

मेरा मन नहीं किया था। स्वर्ण की आशा में नृत्य कर लेने पर यदि स्वर्ण नहीं आया तो कितनी ग्लानि होगी, मुझे। मैंने कहा - संगी, अभी नहीं, मुझे टीवी देखते रहने दे। 

मेरी दृष्टि टीवी स्क्रीन पर गड़ी हुई थी। अब मैदान में 85 और 90 मीटर की रेखाओं के बीच में एक और रेखा दिखने लगी थी। कोई कह रहा था यह, नीरज की 87.58 मीटर की रेखा है। यह जान लेने के बाद फेंके जा रहे हर भाले को मेरी दृष्टि, इसके पहले ही रोक देने को व्यग्र हो रही थी। अब अपने अगले प्रयासों में निज्जू ही इससे ऊपर भाला फेंके, मैं मन ही मन यही प्रार्थना कर रही थी। निज्जू के अगले प्रयास फ़ाउल रहे थे। इस बीच चेक गणराज्य के एक खिलाडी ने 86.44 मीटर फेंक दिया था। इस चेक खिलाड़ी के साथ ही, मुझे जर्मनी के खिलाड़ी के थ्रो से भय लग रहा था। जिसका व्यक्तिगत रिकॉर्ड 90 से अधिक मीटर का था। पाँचवे चक्र में जब निज्जू भाला फेंकने दौड़ पड़ा था, मैं चाह रही थी मेरी दृष्टि उसे सहारा देकर 90 से अधिक दूर तक ले जा पाए ताकि अंतिम चक्र में कोई इस बड़ी चुनौती को पार कर ही न पाए। मगर ऐसा नहीं हुआ था। मैं मन ही मन खीझ रही थी। मैं भयाक्रांत सी हुई बैठी थी। अभी पूरा एक चक्र बाकी था।

आज मेरा भगवान, हमारे साथ था। छटवें चक्र में सब भाला फेंक चुके तब भी कोई मेरे बेटे के प्रदर्शन से खिचंवा दी गई रेखा को पार नहीं कर सका था। भारत को गोल्ड मिल गया था। 

यहाँ सब डांस करने लगे थे। वहाँ अंत में निज्जू की बारी थी। कोई कह रहा था - नीरज पर अब कोई दवाब नहीं है अब इस प्रयास में इसे नया ओलंपिक रिकॉर्ड बना देना चाहिए। इसे सुनकर मैं चिढ़ रही थी। मैं सोच रही थी कि इन्हें दया नहीं आती बिल्कुल ही, मेरा निज्जू कितना थक चुका होगा। निज्जू का अंतिम प्रयास 84 मीटर से कुछ अधिक पर रह गया था। तब भी मुझे संतोष हुआ था। मैं सोच रही थी कि आज तक के हुए ओलंपिक में कुल नौ स्वर्ण पदक थे। मेरे 23 साल के बेटे ने आज दसवां जीत लिया, क्या यह ही कम बड़ी उपलब्धि है। 

अब घर में और घर के बाहर शोर बढ़ गया था। मैं टीवी पर समाचार देखने लगी थी। समाचार चैनल पर सुनील गावस्कर, नीरज की इस सफलता पर प्रसन्नता अतिरेक में नाचते दिखाए जा रहे थे। नीरज के पापा कह रहे थे जिन सुनील गावस्कर के शतकों पर पूरा भारत खुशी से नाचा करता था। आज वे गावस्कर, नीरज के स्वर्ण पदक पर नच रहे हैं। 

इनके कहने से अब मुझे समझ आ रहा था कि नीरज की यह उपलब्धि कितनी बड़ी है। मेरे बेटे के कारनामे से लगता है भारत का हर नागरिक, मुझसे भी अधिक आनंद में डूब गया था। अब मुझे एक ही बात की प्रतीक्षा रह गई थी कि निज्जू वापस जल्दी लौट कर आ जाए। 

तभी कोई भीतर कहते आया था कि समाचार चैनल के रिपोर्टर्स, इस अवसर पर मेरा इंटरव्यू लेना चाहते हैं। यह सुनकर मैं घबड़ा गई थी। मैंने कहा - 

ना बाबा, मुझे नहीं आता ऐसा बोलना जो देश में सुने जाने योग्य हो। 

नीरज के पापा ने कहा - ये रिपोर्टर्स हमारी ना को आज मानने वाले नहीं हैं। 

मैंने कहा - 

मगर मैं क्या कहूँगी, ना जाने वे क्या पूछेंगे। मुझे उनके उत्तर सूझ भी सकेंगे? देश में देखने वाले लोग क्या सोचेंगे, मैं दिखने योग्य, सुनने योग्य कुछ न कर पाऊंगी।   

इन्होंने समझाते हुए मुझसे कहा - जो सूझ पाए वह, कम से कम शब्दों में कह देना। बनावटी कुछ नहीं, सब सच कह देना। नीरज ने अपने कारनामे से सरोज, तुम्हारी विशेष पहचान बना दी है। अब इसमें, ना तो तुम्हें अपने पर कोई आडंबर ओढ़ने की आवश्यकता है और ना ही कोई बड़े शब्द कहने की जरूरत। समाचार चैनल वाले और देश, इस अवसर पर नीरज की माँ कौन है, आज क्या कुछ कहतीं हैं, इतना ही देख-सुनकर अभिभूत हो जाएंगे। आज ख़ुशी के दिन रिपोर्टर्स को नहीं कहना उचित नहीं है। 

मैंने हार जाते से हुए कहा - घर में आप हैं, इतने सब और हैं। उनका इंटरव्यू करा दो, ये मेरे से ही क्यों बात करना चाहते हैं। 

नीरज के पापा ने समझाया - ये तो गली, गाँव में लोगों से पूछ रहे हैं। हमारे घर से भी एक एक से बात करेंगें। तुम तो नीरज की मम्मी हो तुमसे कुछ सुने बिना उनके प्रसारण अधूरे रहने वाले हैं। तुम समझो ना, हमारे नीरज की हर छोटी बड़ी जानकारी आज देश जानना चाहता है। वे दिखलाना चाहते हैं कैसे कोई बालक, ‘नीरज चोपड़ा’ बनता है। 

मैंने प्रतिरोध करना त्यागा था। मैं इंटरव्यू देने रिपोर्टर्स के सामने आ गई थी। 

नीरज के बचपन से संबंधित सब जानकारी अपनी सामान्य बोलचाल से भी अधिक हिंदी के प्रयोग करते हुए मैंने, उन्हें बता दी थी। 

वे पूछ रहे थे - आप नीरज के गोल्ड मेडल जीतने पर कैसा अनुभव रही हैं?

मैं सोचने लगी, क्या भाषा में कोई शब्द है जिससे में अपनी अभी की अनुभूतियाँ व्यक्त कर पाऊं। मुझे लग रहा था मैं, भाषा में इतनी पारंगत नहीं कि अपनी अनुभूतियों को सही शब्द दे पाऊं। अंततः इतना कह दिया - जी, बहुत ख़ुशी हो रही है। 

अब रिपोर्टर पूछ रही थी - आप, बेटे नीरज के लौटने पर उसे क्या बनाकर खिलाएंगी? क्या पसंद करते हैं, नीरज खाने में?

एक ही पल में इस पर मेरे मन में कई विचार आए थे, दुनिया भर में एक से एक भोज्य व्यंजन चल रहे हैं अगर में शुद्ध देशी चूरमा, जो नीरज को पसंद है इसका उल्लेख करुं तो लोग हँसेंगे तो नहीं! फिर मुझे नीरज के पापा की कही बात स्मरण आ गई कि बिना लागलपेट के जो सच है वही कह देना। मैंने निर्भीक होकर कह दिया - जी, बेटे को चूरमा बहुत प्रिय है। 

नीरज ने तो आज भारत के लिए एक नया इतिहास रचा था। मेरी कही यह बात एक रहस्य के उद्घाटन होने की तरह, रिपोर्टर ने बहुत पसंद की थी। 

अब रिपोर्टर ने प्रश्न किया था - गोल्डन बॉय नीरज की माँ होने पर आप कैसा अनुभव कर रही हैं?

मेरे मन में विचार आया कि उसे हरियाणा का वीर बेटा कहूँ। फिर इस विचार में संकीर्णता का अनुभव करते हुए मैंने प्रत्यक्ष में कहा - जी, नीरज तो देश का बेटा है। उसे लेकर आप सहित सब जैसा गौरव अनुभव कर रहे हैं। ऐसा ही गौरव मैं, उसकी माँ भी कर रही हूँ। 

एक रिपोर्टर के द्वारा इंटरव्यू पूरा किया गया तो, दूसरे आ गए। अब तो मेरा संकोच चला गया था। बाद के इंटरव्यू में तो नीरज की माँ की पहचान के साथ, कैमरों के सामने आना मुझे आनंदित करने लगा था। ऐसा लग रहा था देश के सारे के सारे चैनल के रिपोर्टर्स हमारे घर पर थे। वे घर का जो सदस्य उन्हें मिल जाता उससे पूछने और टीवी पर दिखाने लग जा रहे थे। 

अपनी अपनी चैनल के व्यावसायिक हित की उनकी चिंता, इस गौरवशाली क्षणों में भी छुपाए नहीं छुप रही थी। उनमें होड़ लगी हुई थी कि वे हममें से किसी से भी पता करके, नीरज के बारे में कोई अनोखी और अब तक अज्ञात बात दर्शकों के सामने रख दें। 

रात बाद में, मैं टीवी पर अपने इंटरव्यू देख रही थी। उन्हें देख मुझे प्रसन्नता हो रही थी। मैं ग्रामीण परिवेश की सीधी सादी महिला हूँ। इससे गर्व प्रदान करने वाले इन क्षणों में भी, मेरी भाव भंगिमाओं में देखे जाने में अखरने वाला गर्व अतिरेक कहीं नहीं था। कहीं पर भी मेरे मुख पर अभिमान या दंभ नहीं झलक रहा था। 

बाद में अपने शयनकक्ष में नीरज के पापा और मैं फिर गले लग कर रो रहे थे। कोई देखता तो उसे दोपहर और अब के इस दृश्य में अंतर नहीं दिखता। यह सिर्फ हम जानते थे कि हमारा दोपहर में रोना, अत्यंत मानसिक दवाब के कारण था और अब हमारे नेत्र, आनंद अतिरेक में भीग रहे थे। 

अगले दिन हमने टोक्यो से दी गई नीरज की प्रतिक्रिया को सुना देखा था। नीरज अपना पदक, मिल्खा सिंह जी, पीटी उषा जी आदि के नामों के उल्लेख सहित उनके देखे सपनों को समर्पित कर रहा था। मैं सोच रही थी कि 60 वर्ष पहले किये गए मिल्खा सिंह जी के कारनामे का स्मरण, नीरज को आज आ रहा है। क्या मेरे नीरज का अभी का कारनामा ऐसे ही वर्षों तक भारत स्मरण रखेगा? इस विचार से मैं गौरवान्वित अनुभव कर रही थी कि नीरज सहित हमने उस विलक्षण पल को अपने जीवन में जिया है जिसकी स्मृति दशकों तक हमारे पुनः भव्य हो रहे भारत में ताजी रह पाने वाली है। 

फिर टोक्यो ओलंपिक का समापन हुआ था। आज 9 अगस्त को नीरज सहित भारतीय दल लौट आया था। हम सब गाँव से लेकर राजधानी दिल्ली तक, देश में मन रही खुशियों के साक्षी हो रहे थे। 

अंततः कई मंचों और स्थलों पर सम्मानित होने के बाद मेरा निज्जू घर आया था। उसने गोल्ड मेडल मेरे गले में पहनाया था। इसके पहनते ही मुझे, आज तक धारण किए सभी आभूषण इसके सामने फीके लग रहे थे। मैंने पूछा - निज्जू, मैंने, तुम्हें चूरमा पसंद है अपने इंटरव्यू में इसका उल्लेख किया है। तुम्हें, मेरे इस देहातीपने पर चिढ़ तो नहीं हो रही है?

नीरज ने मेरे गले से लग कर उत्तर दिया - मम्मी, यह कहने में अगर देहातीपना भी है तो बुरा क्या है। तुमने अपने सच्ची बात से चूरमा को इतनी चर्चा प्रदान कर दी है कि मुझे डर है कि कोई अंतराष्ट्रीय कंपनी, चूरमा को पेटेंट करवा कर चॉकलेट आदि भोज्य पदार्थ की तरह बंद डिब्बों और आकर्षक पैकेजिंग में बेचना न आरंभ कर दे। 

नीरज की बात पर घर के सब सदस्य खिलखिला कर हँसने लगे थे। तब मैं लजा रही थी। 

पिछले महीनों से ओलंपिक में नीरज के प्रदर्शन को लेकर, फिर ओलम्पिक होने के कारण मेरे मन में रहती आई चिंताओं एवं तनावों से, अब जाकर मुझे मुक्ति मिल पाई थी। गाँव और बाहर से, बधाइयाँ देने के लिए मिलने आने वालों का जो ताँता लगा था, अब वह कम पड़ने लगा था। जीवन पुनः शांत-सहज चलने लगा तो एक दोपहर बिस्तर पर अकेले लेटे हुए मैं मन में उमड़ते विचारों में खोई हुई थी। मुझे विचार आया कि इन मीडिया वालों ने मेरे बहुत इंटरव्यू लिए लेकिन उनके द्वारा मुझसे जो प्रश्न किए जाने थे वे किए ही नहीं। मैं सोच रही थी कि यदि वे मुझसे पूछते -

नीरज जैसे बेटे की माँ की हैसियत से आप भारतीयों को क्या संदेश देना चाहेंगी?

तो मैं एक दार्शनिक की तरह विचार करते हुए कहती कि -

देखो मेरे भारतवासियों, छोरियों को गर्भ में ही नहीं मार डाला करो। उन्हें भी जन्म लेकर आदर सहित जीवन जीने दो। अन्यथा मेरे नीरज जैसे योग्य और समर्थ बेटे, विदेशी छोरियों से ब्याह करने लग जाएंगे। 

रिपोर्टर फिर पूछती - आप, और भी कोई संदेश देना चाहेंगी? 

इस प्रश्न का उत्तर, मैं अपना ज्ञान बघारते हुए देती और कहती - 

ओलम्पिक में हर राउंड का परिणाम डिस्प्ले करने में, मेरे निज्जू को लीडर दिखाया जा रहा था। वहाँ लीडर का अर्थ था, नीरज के इस सेट लक्ष्य के पार पाने का प्रयास अन्य प्रतिद्वंदियों को करना है। ऐसे ही मेरा बेटा, एक बहुत भला लड़का है। वह कोई नशा नहीं करता, कोई ड्रग्स नहीं लेता है। साथ ही वह लड़कियों और युवतियों से शालीनता से पेश आता है। ऐसे मेरे लीडर बेटे के सेट आदर्श को, देश के सभी बेटे पार करने की कोशिश करें। मैं चाहती हूँ कि भारत के हर बेटे नीरज से भी अच्छे बेटे होकर दिखलाएं ...  

(रचना मेरी मनगढ़ंत है। इसे प्रभावी बनाने के विचार से इसमें मैंने, चर्चित और विख्यात वास्तविक व्यक्तियों के नाम का उल्लेख किया है। किन्हीं सुप्रसिद्ध ऐसे व्यक्ति को इसमें अपने नाम का लिखा जाना पसंद नहीं आए तो उनसे मैं क्षमाप्रार्थी हूँ) 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

11-08-2021    

Sunday, August 8, 2021

 सुनहरे पल और राष्ट्रगान … 

अंततः प्रतीक्षा थी जिस बात की, वह सुखद परिणाम आया था। हर भारतवासी की हार्दिक अभिलाषा थी कि टोक्यो ओलिंपिक में, हमारा कोई एक बेटा या बेटी, भारत के लिए कम से कम एक स्वर्ण पदक तो जीते। अंततः हम भारतीयों की यह अभिलाषा, बेटे #नीरज_चोपड़ा के माध्यम से पूर्ण हुई थी। 

वैसे तो हम भारतवासी एक दूसरे की प्रसन्नता में, परस्पर समस्या एवं चुनौती खड़ी कर देते हैं। हमारे समाज में दूसरे की ख़ुशी में, हमारा खुश हो जाना कम ही देखने में मिलता है। यह मगर, इस स्वर्णिम पल की विलक्षणता थी 

कि इस क्षण में हममें से प्रत्येक आनंद विभोर एवं गर्वित अनुभव कर रहा था।  

मैंने भी जैवलिन थ्रो के इस फाइनल का टीवी पर प्रसारण अपनी धड़कनों को नियंत्रित रखते हुए पूरा देखा था। आनंद के इन पलों में, रचना (पत्नी) भी आनंदित हो पाए इस भावना से, जब विक्टरी सेरेमनी आरंभ होने को हुई तब मैंने रचना को टीवी के सामने बुला लिया था। हम दोनों ही टकटकी लगाए स्क्रीन को निहार रहे थे। चेक रिपब्लिक के दो मेडलिस्ट, खिलाडियों को मेडल वितरित किए जा चुके थे।

अब पोडियम पर आने के लिए नीरज ने, अपना प्रथम पग ऊपर रख दिया था। 

हमारे समक्ष, जीवन में कभी कभी आती उस अपार प्रसन्नता की घड़ी, बस आने ही वाली थी। टोक्यो के ओलिंपिक स्टेडियम से, गुंजायमान होने वाली, हमारे #राष्ट्रगान की धुन हमारे कर्णों से होती हुई, हमारे तन मन को प्रसन्नता से ओतप्रोत करने ही वाली थी। तभी बिजली का व्यवधान आ गया। 

विशाल जनसंख्या वाले हमारे देश में, ऐसी सर्व व्याप्त प्रसन्नता के पल कम ही होते हैं। बिजली प्रदाय अवरोध से अभी मिलने वाले आनंद में, हम दोनों के सामने विघ्न उपस्थित हो गया था। इससे हमें अत्यंत खीझ हो रही थी। 

मैंने बिजली विभाग में जीवन भर अपनी सेवा दी हैं। अतः बिजली व्यवधान में मेरे मुँह से ऐसे अपशब्द नहीं निकले थे, जिनकी आजकल की वेब सीरीज में बौछार लगी रहती है। 

अपशब्दों को हम अपनी पुरातन पंथी में अपने बेटे-बेटियों को सुनते-कहते देखना, अच्छा नहीं मानते थे। यहाँ कटुता बोध सहित मैं लिख रहा हूँ कि कुछ ऐसे अपशब्द डिस्ट्रीब्यूशन में सेवा देते हुए, अक्सर दिन रात, मुझे फोन पर सुनना पड़ते थे। 

हमारी सोसाइटी में बिजली का बैकअप उपलब्ध है। व्यवधान के एक मिनट से कम समय में उससे बिजली प्रदाय रिस्टोर कर दिया गया था मगर टीवी फिर स्टार्ट होने में और ‘सोनी लाइव’ आरंभ करने में कुछ समय लग गया था। इस प्रक्रिया में लग गए, लगभग तीन मिनट में प्रसारण पुनः दिखाई देने लगा था, तब तक स्वर्णिम पल में हमारा राष्ट्रगान बज कर समाप्त हो चुका था। स्क्रीन पर वीमेन्स हाई जम्प दिखलाया जाने लगा था। 

एक सहज एवं अभूतपूर्व प्रसन्नता मिलने का अवसर हमारे सामने से खो गया था। हम दोनों मन मसोसकर रह गए थे। शिकायत किससे और क्या लिखूँ, मैं ही नहीं मेरे भारतवासी, आप भी तो मन मसोसकर रह लेने के आदी हैं। 

हममें से हर कोई व्यक्तिगत सुख तो चाहता है। फिर भी हम ऐसा समाज निर्मित कर पाने में सहयोग कहाँ कर पाते हैं, जिसमें हम सभी का सुख और हमारे बच्चों का सुखद भविष्य सुनिश्चित होता हो। 

कुछ प्रश्न रख कर मैं, अपने #मन_की_बात समाप्त कर रहा हूँ कि -

हम में से वे लोग जो अपशब्द के चलन को आधुनिकता जैसे परोस रहे हैं, क्या वे इस देश या इस समाज को, वास्तव में अपना मानते हैं? 

क्या ऐसा किया जाना, उनके राष्ट्र और समाज दायित्व बोध का द्योतक है?

और - 

क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं कि जिन गालियों एवं अपशब्दों में हमारी माँ, बहन और बेटियों की अस्मिता, शाब्दिक रूप से तार तार की जाती है, वे अपशब्द, हमारी बहन, बेटियाँ भी स्वयं उनके अर्थ समझे-नासमझे (आधुनिक कहलाने के लिए) प्रयोग करने लगी हैं?  

हमें गौर करना होगा कि हमारी हर पुरानी परंपरा त्याज्य और आधुनिक चलन ग्राह्य करने योग्य है या नहीं …. 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

09-08-2021  

Friday, July 30, 2021

(मेधा) लड़कपन ....

 लड़कपन .... 

मैंने तब शिकायती स्वर में मम्मी से कहा - मम्मा, मेरी उनसे इस भिन्नता का मेरी फ्रेंड्स, मजाक बनाया करती हैं। 

मम्मी ने पूछ लिया - मेधा, क्या कहती हैं तुमसे, वे फ्रेंड्स?

मैंने बताया - वे कहती हैं कि मेधा में लड़कपन तो आया ही नहीं है। बचपन के बाद सीधे ही यह मैच्योर लेडी हो गई है। 

मम्मी ने कहा - इसे तुम अनसुना कर दिया करो। उन लड़कियों की लड़कपन की परिभाषा गलत है। लड़कपन का अर्थ कदापि अनुशासनहीन, अविश्वसनीय या लापरवाह होना नहीं होता है। 

मैंने जिज्ञासु होकर पूछा - मम्मी, लड़कपन का सही अर्थ क्या होता है?

मम्मा ने कहा - अपने इस प्रश्न का उत्तर तुम ही देने की कोशिश करो, मेधा। इसकी हिंट तुम्हें, मैं देती हूँ कि तुम्हारी (मैं) मम्मा, एक मैच्योर लेडी और (तुम) किशोरवय लड़की की दिनचर्या में, क्या अंतर तुम देखती हो?

मैंने विचार किया फिर कहा - 

मैं अभी पढ़ती हूँ। मैं अभी घर के और किचन के काम का कोई सीधा दायित्व अपने पर अनुभव नहीं करती हूँ। मैं अभी कमाने के लिए कोई काम नहीं करती हूँ। ऐसा नहीं होने से मैं, पढ़ने के अपने कर्तव्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी दायित्व से मानसिक रूप मुक्त रहती हूँ। अपने सोने, उठने कुछ भी खाने, पीने, खेलने और जो मुझे पसंद है, वह काम करने में स्वयं को स्वतंत्र पाती हूँ। यह इसलिए है कि यह उम्र मेरे लड़कपन की है। इससे भिन्न, मेरी मम्मा आप, कमाने के लिए सर्विस करती हैं। घर और किचन के दायित्व पूरे करती हैं। मेरी मम्मा होने से पापा के साथ ही, मेरे भविष्य निर्माण का कर्तव्य अपने पर अनुभव करती हैं। समाज में रहने से पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवहार निभाती हैं। इन्हें करते हुए कई बार आप अपनी नापसंद एवं असुविधा की दिनचर्या रखने को विवश होती हैं। यह होना आपको, मैच्योर लेडी निरूपित करता है। (फिर प्रश्न करते हुए) मैंने ठीक बताया ना, मम्मा?

मम्मी ने मुझे प्रशंसात्मक दृष्टि से देखते हुए मुस्कुराते हुए कहा - कदाचित! लड़कपन की इतनी ठीक परिभाषा तो मैं भी नहीं सोच पाती, मेधा!

मैं संशय में रही थी कि मम्मी ने यह बात मुझे प्रोत्साहित करने के लिए कही है या वास्तव में, मैंने लड़कपन को इस अच्छी तरह से अभिव्यक्त किया है ...  

(बड़ी होती बेटी को जीवन दर्शन प्रदान करती माँ, इस विषयवस्तु पर लिखी जा रही मेरी उपन्यास 'मेधा' से उद्धृत अंश) 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

30-07-2021


Tuesday, July 27, 2021

मेधा (2) …

मेधा (2) … 

मम्मी ने कहा - तुम यह तो जानती ही हो की मौसी मुझसे बड़ी एवं मैं, तुम्हारे नाना नानी की छोटी बेटी हूँ। 

मैंने कहा - जी, मम्मी। 

मम्मी ने आगे कहना आरंभ किया - यह मुझे बाद में पता चला था कि ‘जब मेरा जन्म होने वाला था तब घर में एक बेटी होने से सब यह चाहते थे कि तुम्हारी नानी का अब बेटा पैदा हो’। 

मैंने कहा - हाँ, मम्मी सब ऐसा चाहते थे तो इसमें गलत क्या था। मुझे भी लगता है कि यदि हमारे यहाँ भी मुझसे छोटा कोई आता तो उसका भाई होना ही मुझे भी पसंद आता। 

मम्मी ने कहा - 

अपनी छोटी समझ और तुम्हारी अपनी इच्छा में ऐसा होना कोई गलत बात तो नहीं है। मगर तुम मेरी सोचो कि जब सब चाहते थे बेटा हो ऐसे में मेरा बेटी जन्मना यह बात सबके लिए कितनी कटु हुई थी। बड़े होने पर जिस दिन मुझे यह सब पता चला तो मैं बहुत रोई थी कि मैं अपने दादा, दादी, पापा और मम्मी की अवाँछित (Unwanted) बेटी हूँ। 

मैंने कहा - ओह्ह, आई सी! फिर तो सबसे जितना लाड़ प्यार, मुझे मिलता है उतना आपको नहीं मिला होगा।   

मम्मी ने बताया - मेधा, ऐसा भी नहीं था। अपने बच्चे तो मम्मी पापा को प्रिय होते हैं। मुझे भी प्यार मिलने लगा था। बस मुझे यह बात बुरी लगती थी कि घर के बड़ों की लड़के की मन्नत होने पर, मैंने आकर उसे अधूरी रहने दिया था। दादा-दादी ने तब मेरी मम्मी, तुम्हारी नानी से यह चाहा था कि वे तीसरी संतान, बेटा पैदा करें। 

मैंने कहा - मम्मी, फिर यह क्यों नहीं हो पाया। आपके कोई भाई तो हैं, नहीं।  

मम्मी ने बताया - 

मेरे पापा प्रगतिशील आधुनिक विचार के थे। उन्होंने तीसरा बच्चा करना, जनसंख्या की दृष्टि से मातृ भूमि से अन्याय करने का अपराध जैसा माना था। तब मेरी दादी ने उनसे कहा था, ‘तुम्हारा एक बेटा हो जाए तो मैं शांति से परलोक जा सकूँ’। इस पर उन्हें पापा ने कह दिया था, बेटा ही हो इसकी संभावना 50% की है ऐसे में तीसरी भी बेटी हुई तब? इस पर उनकी माँ ने कहा था मैं तीर्थ धाम की यात्रा कर आती हूँ तब लड़का ही होगा। पापा ने मना कर दिया था कि माँ इस बात के लिए धाम की यात्रा से कुछ नहीं होगा। विज्ञान के अनुसार इसमें माँ-पिता भी कुछ नहीं कर सकते हैं। 

मैं सोचने लगी थी कि जन्मने वाला बच्चा लड़का या लड़की कैसे तय होता है। मुझे सोच में पड़ा देखकर मम्मी ने कहा -

बड़ी कक्षाओं में बच्चे के जन्मने की पूरी प्रक्रिया तुम्हें जीव विज्ञान में पढ़ने मिलेगी। तब तुम्हें पता चलेगा कि गर्भ स्थापना के पल में होने वाले प्राकृतिक संयोग से बच्चे का लिंग स्वतः ही तय होता है। पूजा पाठ या अन्य कोई बात इसे प्रभावित नहीं करती है। 

मैं चाह रही थी कि अभी मम्मी ही मुझे यह बताएं तो अच्छा हो, फिर मैंने स्वयं को समझाया कि मम्मी यदि मुझे अभी बताना उचित नहीं समझती हैं तो मुझे कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए। विश्वास करना चाहिए कि मित्र मम्मी, यदि नहीं बता रही हैं तो अभी इसमें ही मेरी भलाई होगी। फिर मैंने अपनी मम्मी की यह बात जानने के बाद की मनोदशा की कल्पना की और पूछा -

आप, मेरी इतनी सुंदर मम्मी तो फिर मन ही मन दुखी रहती होगी कि आपके होने से घर में बेटे की आस पूर्ण नहीं हुई। 

मम्मी ने बताया - 

हाँ मेधा, यह सच है। मेरे लालन पालन में कोई कमी नहीं होने पर भी मुझे शिकायत समाज संरचना से रहती थी कि प्रकृति से प्रदत्त समान महत्व की मनुष्य होने पर भी, मानव निर्मित परंपरा और संस्कृति में नारी को पुरुष से इस तरह से हीन क्यों माना जाता है कि कोई माँ, खुद एक नारी भी अपनी संतान का बेटी नहीं बेटा होने की कामना को विवश होती है। 

मुझे जितना कुछ समझ आया था उस आधार पर मैंने पूछ लिया -

मम्मी, क्या आप यह बताना चाह रही हैं कि मैं भी आपकी बेटी की जगह बेटा होती तो आपको अच्छा लगता? ....

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

27-07-2021