Sunday, April 18, 2021

शिखा ..

 

शिखा ..

(तृतीय भाग)

हाउस हेल्प ने शिखा को पहचान ली जाने की दृष्टि से देखा था। उसने, पीछे पलट कर मुझे भी भेद पूर्ण दृष्टि से देखा था। फिर चली गई थी। 

मेड के देखे जाने से मुझे, फिक्र स्वयं को लेकर नहीं थी। मैं तो पुरुष हूँ। मुझे परवाह शिखा की थी कि वह सोसाइटी की बकवाद की लक्ष्य ना बन जाए। हमारा समाज स्त्री को लेकर संवेदनहीन है। शिखा है तो 50 वर्षीया प्रौढ़ महिला लेकिन अपने रस लेने के लिए समाज, उसे भी लक्ष्य बना ही लेगा। मैं इस हो रहे घटना क्रम में कुछ कर नहीं सकता था। 

फिर मुझे ध्यान आया कि शिखा, आज मेरे बुलाने पर आई है। सुध बुध में लौट मैंने, हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा - आइए शिखा जी, स्वागत है आपका। 

शिखा ने ‘जी’ शब्द पर गौर किया था। मेरी अधीनस्थ कर्मी उसे, मुझ से अपने लिए ऐसा आदर अप्रत्याशित था। 

इससे “कुछ कुछ” शिखा को समझ आया था। मगर अनभिज्ञ बनते हुए उसने कहा - सर, मैं आपकी कृतज्ञ हूँ। आपने मुझ पर अनुग्रह किया है। मेरा ट्रांसफर भी किया एवं मेरे विरुद्ध कार्यवाही नहीं की है। 

मैंने कहा - चलो अब भूल भी जाओ इसे। अच्छा हुआ कि आपने अनुशासन की अवहेलना की थी अन्यथा मुझे, आप का बनाया भोजन कहाँ खाने मिलता। 

उत्तर में उसने हँस बस दिया था। वह रसोई की तरफ बढ़ी थी। पीछे मैंने, जाली वाला दरवाजा बंद किया और उसके पीछे हो लिया था। 

मैंने कहा शिखा जी - आप कोई कुक नहीं कि आकर सीधे रसोई में काम करने लगें। आप मेरी आमंत्रित अतिथि हैं। पहले मैं, आपके लिए कॉफी बनाता हूँ। हम, साथ कॉफी पीते हुए गपशप करते हैं। उसके बाद आप भोजन तैयार करना, तब मैं आप की सहायता करूंगा। 

शिखा ने उत्तर में कहा - सर, हम साथ खाना खाते हुए गपशप कर लेंगे। अलग से इस हेतु बैठेंगे तो समय अधिक लगेगा। मेरे पतिदेव जो 8 दिनों से दौरे पर गए हैं वे, चार बजे लौट आने वाले हैं। मुझे उनके इतने दिन बाद लौटने पर संध्या के लिए कुछ विशेष बनाना होगा। अतः मैं घर जल्दी लौटना चाहूंगी। 

इस पर, मेरी अंदरूनी प्रतिक्रिया स्वयं मेरे लिए अपरिचित थी। मुझे, हम दोनों के बीच, शिखा के पति नाम के प्राणी की चर्चा, ‘दाल भात में मूसलचंद’ जैसी लगी थी। 

मैंने स्वयं अपने को समझाया कि ‘यार तू दादा बन चुका बूढ़ा आदमी’ यूँ नवयुवा जैसा नहीं चिढ़। शिखा को तुझसे और तुझे शिखा से प्यार हुआ भी है तो उसे दोनों की प्रौढ़ उम्र के प्रेम जैसा निभा। शिखा के पति नाम से चिढ़ने वाला तू, तेरे तीन बच्चे की माँ, तेरी भी एक पत्नी है, तू यह क्यों भूलता है? 

इस बीच शिखा भोजन बनाने की सामग्री एवं बर्तन देखने लगी थी। मेरी चुप्पी अनुभव कर उसने, बिना मुझे देखे पूछा - क्या सोचने लगे, सर?

शिखा को देखकर मुझे अच्छा लगा कि वह मुझे नहीं देख रही थी। वर्ना मेरे मन के चोर को मेरे मुख के भाव से भांप जाती। मैंने कहा - शिखा आप संकोच में रह गईं। मुझे यह पहले बता देतीं तो आज आपको, मैं यूँ कष्ट नहीं देता। 

शिखा ने कहा - कोई नहीं सर, मुझे अपने लिए भी भोजन बनाना तो था ही। साथ आपके लिए भी बन जाए तो मेरे लिए आनंद अनुभूति ही है। आपके दिए सहारे से आपकी ऋणी मैं, थोड़ा तो ऋण उतारूं, आपका।  

मैं, अब शिखा के प्रेमी से, वापस जिम्मेदार प्रौढ़ व्यक्ति बन गया था। मैंने उसके कृतज्ञ भाव की किसी नीच व्यक्ति की तरह कीमत वसूलने की कोशिश नहीं की। कोई अन्य शायद इतनी बात पर उसे बाँहों में ले लेता, चाहे इससे शिखा का उस पर किया विश्वास उठ जाता। 

मुझमें विवेक बोध था। अपने अधिकार के प्रयोग से एक सामान्य विभागीय प्रक्रिया के माध्यम से मैंने, शिखा को अपना कुछ नहीं दिया है, यह समझता था। वह मेरी ऋणी होना अनुभव करे, मैं ऐसी कोई बात नहीं देख रहा था। सब सोचते हुए मैंने कहा - यदि आपको परेशानी ना लगे तो मैं, खाना बनाने में आपकी हेल्प करूं। इसके लिए मुझे, यहीं आपके साथ रहना होगा। 

शिखा ने कहा - 

सर मुझे, आपसे कोई खतरा नहीं है। मैंने पिछली बार ही यह अनुभव कर लिया था जब आपने, घर में अकेले होने पर, मुझे घर में घुसने नहीं दिया था। फिर मेरे घर में आ जाने पर बाहरी दरवाजा, खुला रखा था। मेरे रहते तक किचन में नहीं आए थे। आपके इस मर्यादित व्यवहार ने ही मेरे मन में आपके लिए श्रद्धा एवं प्यार पैदा कर दिया था। अगले दिन इसे, मैंने ऑफिस में कह कर बता भी दिया था। मैं जानती हूँ कि आप मेरी इस श्रद्धा एवं प्रेम को, अपनी और मेरी गरिमा का ध्यान रख निभाएंगे। 

स्पष्ट है शिखा ने मेरे और अपने बीच मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींची हुई थी। अगर मैं, टुच्चई से इसे पार करने का, अनाधिकृत प्रयास करता तो, शिखा का मेरे प्रति प्रेम भस्म हो जाता। 

अब मुझे यह भी स्मरण आया कि उस दिन राशि आई थी। राशि ने मेरे पिता होने के मान को बनाए रखते हुए, शिखा को देख कर भी मुझ पर संदेह करने वाली कोई बात नहीं कही/पूछी थी। राशि से, किसी अपने का आदर कैसे रखा जाना चाहिए यह अनुकरणीय बात सीख कर, मुझे, शिखा की गरिमा एवं मान बनाए रखना था। 

शिखा ने भोजन तैयार करना आरंभ कर दिया था। मेरे पर दृष्टि डालते हुए मुझे चुप देखकर कहा - सर, आप बीच बीच में कहीं खो जाते हैं, क्या?

मैंने बात बनाते हुए कहा - आप सिर्फ भोजन ही अच्छा नहीं बनाती अपितु इतना अच्छा अच्छा बोलती भी हैं कि मुझे, आपके हर शब्द की प्रशंसा करने का मन होता है। मैं कहता नहीं हूँ, मन ही मन प्रशंसा करने लगता हूँ अतः कभी चुप हो जाता हूँ। 

शिखा हँसी थी। फिर कहा - आप एक फाइबर चेयर लेकर यहीं बैठ जाएं। मुझे अपने परिवार के बारे में बताएं। काम करते हुए मैं अभी सब सुनना चाहती हूँ। 

मैंने कहा - हाँ यह ठीक रहेगा। 

फिर मैं एक चेयर लाकर बैठ गया था। शिखा ने अब पूछा - सर, पिछली बार मैं जब जा रही थी तो एक लड़की आई थी वह आपकी बेटी है क्या, उसकी शक्ल आपसे मिलती है। 

मैंने कहा - हाँ, शिखा जी, वह मेरी छोटी बेटी राशि है। 

शिखा ने पूछा - पिछली बार, मुझे घर से निकलते देख कर राशि ने, हम पर कोई संदेह तो नहीं किया। 

मैंने कहा - शिखा जी, उसने जन्म से अब तक मुझे एक जिम्मेदार पापा देखा है। वह मुझ पर अविश्वास नहीं करती है। उस दिन अगर उसे संदेह भी हुआ होगा तो वह अपने पापा का मान रखना जानती है। बिना ठोस आधार के वह कोई हल्की बात नहीं कर सकती। उसने उस दिन मुझसे कुछ नहीं पूछा था। मैंने ही अपनी ओर से सब बताया था। उसके मन में तब आपको लेकर संवेदना थी। 

शिखा सुनकर प्रसन्न दिखी - उसने कहा, आपके संस्कार ग्रहण किए हैं आपके बच्चों ने, सर। आप मुझे सब के बारे में बताइए।        

तब मैंने अपने पूरे परिवार के बारे में शिखा को बताया था। शिखा मनोयोग से, भोजन भी बना रही थी एवं साथ साथ सुनती भी जा रही थी। अंत में मैंने बताया था - मेरी पत्नी, पिछले दस दिनों से अपने पोते पोती को लाड़ दुलार देने गई हुईं हैं। 

इस बीच जो भोजन तैयार होता जा रहा था। मैं, उसे टेबल पर लगाने का कार्य करते जा रहा था। सलाद भी मैंने ही तैयार की थी। अंत में हम दोनों साथ भोजन करने लगे थे। तब मैंने कहा - आप अपने बारे में भी बताइये, शिखा जी। 

शिखा ने मुँह में लिया कौर चबा चुकने के बाद कहा - सर, मेरी भी राशि से कुछ छोटी इकलौती एक बेटी है। इस समय वह अपनी मास्टर डिग्री के लिए यहां से साठ किमी दूर, कॉलेज छात्रावास में रहते हुए अध्ययनरत है। 

बीच बीच में खाने पर ध्यान देते हुए शिखा चुप होती, फिर बताते जाती थी। उसने बताया था - मेरे पति रसिक स्वभाव के अति कामुक व्यक्ति हैं। वे आप जैसे नहीं कि घर में जैसी अकेली मैं, आप के साथ हूँ वैसे किसी महिला या लड़की के साथ का अवसर मिलने पर वे, आप जैसी शालीनता से पेश आएं। किसी सुंदर युवती के आसपास होने पर मेरे पति, उस पर डोरे डालने लगते हैं। 

उनकी दिलफेंक तबीयत के कारण ही अपने रूप लावण्य को बनाए रखने के लिए, मुझे लाचारी में अतिरिक्त विचार रखना होता है। ताकि वे मुझमें ही बँधे रहे। अब मेरी यौन सुख की पहले जैसी इच्छा नहीं होती है। थके होने पर भी, ना चाहने पर भी नित मुझे उनका साथ देना होता है। सोचती हूँ कि ऐसा ना करूं तो वे अधूरी रही यौन इच्छा के कारण, अन्य स्त्रियों एवं परिवार पर खतरा बन जाएंगे। पहले मुझे पतिदेव के इस स्वभाव से विरोध एवं चिढ़ होती थी। मैं, इन बातों पर उनसे उलझ भी जाया करती थी। फिर अपनी बेटी के भविष्य की खातिर मैंने समझौता कर लिया, सहन करना सीख लिया। मैंने उस दिन आपका आचरण, अपने पति से बिल्कुल ही विपरीत देखा था। जिससे मुझे आप पर श्रद्धा एवं प्यार आ गया। 

वाकई अगर मैं फिर युवा होती और मुझे, अपने लिए वर चुनने का विकल्प दिया जाता तो मैं, आप जैसा व्यक्ति पसंद करती। मुझे आप जैसा गंभीर एवं नारी गरिमा के मान की चिंता रखने वाला पुरुष पसंद है। खैर जाने दीजिए। जीवन संध्या के तरफ बढ़ते हुए, अब क्या - कोई शिकायत और कोई चाहत। अब तो यही सोचती हूँ कि अलग अलग मनुष्य, भिन्न भिन्न उनके स्वभाव और शौक हैं।

अब तक शिखा को जैसा मैं समझ पाया था उससे मुझे लगा कि निश्चित ही शिखा अपनी व्यक्तिगत ये बातें किसी से नहीं कहती होगी। मुझ से शिखा ने यह सब बताया है तो यह उसका मुझ पर अति विश्वास ही है। शायद मुझ से बाँट कर अपने हृदय पर के बोझ को कम करना चाहती थी। अब मैं सोच रहा था कि शिखा ने मुझ से, प्यार होने के मुझमें, कारण एवं गुण बताए थे। वे वास्तव में मुझ में थे तो, मगर जिन्हें शिखा के लिए उत्पन्न प्यार में शायद मैं भुला देता। मुझे याद आया कि कभी मेरे मन में एक कसक रह गई थी कि मैं, मुझे प्यार करने वाली लड़की से शादी करता। 

शिखा ने यह सब कह कर मेरे व्यवहार तथा अपने प्रति मेरे प्रेम को, एक सीमा में बांध देना सुनिश्चित कर दिया था। अगर मैं उसके हृदय में, अपने प्रेमी रूप वाली छवि बनाए रखने को लालायित था तो मुझे अपने में वे कारण बनाए रखने थे। मेरा बूढ़ा मन, युवा तरह के व्यवहार करते हुए, इसे अप्रिय सा मान रहा था। मगर मैं यह भी समझ रहा था कि अप्रिय, वह होता जब हमारे बीच के प्यार में मैं, मर्यादा की सीमा लांघ जाता। मैं अपने भरे पूरे परिवार में, पूजनीय स्थान रखता था। वरिष्ठ अधिकारी होने से अपने विभाग में मेरे दायित्व के साथ ही मुझसे गरिमामय आचरण भी अपेक्षित था।     

अब मैंने शिखा के अपने पति को लेकर कहे गए वाक्य पर चिंतन किया। वैसे तो मैं, उस प्रकार का पुरुष नहीं था मगर मुझे अब अपने पुरुष को इस तरह से नियंत्रित करना था कि मैं अन्य स्त्री और उनके परिवार पर खतरा उत्पन्न करने वाला आचरण नहीं करूं। अंत में शिखा विदा ले रही थी। वह और मैं जानते थे कि हमारी, ऐसी आत्मीय भेंट होना बार बार संभव नहीं हो सकेगा। शिखा ने तब मेरे लिए चिंता बढ़ाने वाली बात कही थी उसने कहा कि - सर, आपकी ही हाउस हेल्प, मेरे टॉवर में मेरी परिचिता श्रीमती आचार्या के यहाँ काम करती है। 

यह बताते हुए भी वह निश्चिन्त थी। मैं चिंतित हुआ था। अंत में शिखा ने कहा - सर, आज हमने अपने विचार शेयर किए हैं। एक सुखद साथ का आनंद उठाया है। अपने निश्चल प्यार को मैंने कहकर एवं आपने अनकहे व्यक्त किया है। हमने कुछ गलत नहीं किया है। पता नहीं, फिर भी हम डरते क्यों हैं कि हमें साथ कोई देख ना ले। 

मैंने कहा - शिखा जी, डरने वाली बात समाज दृष्टि के कारण है। अपने पति से अधिक, आप उनके प्रति निष्ठा रखती हैं। हम दोनों अपनी अवस्था के अनुरूप आचरण करते हैं और हम से समाज अपेक्षा को जानते हैं। इससे चिंता करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए किंतु समाज जो स्वयं करता है वही, जब कोई दूसरा करता है तो उसमें निंदा एवं आपत्ति देखता है। 

शिखा ने कहा - हाँ यह तो है, सर! इसमें, मैं यह भी जोड़ूँगी कि यह समाज दृष्टि किसी नारी को लेकर अधिक क्रूर है। 

फिर शिखा हाथ जोड़ मुस्कुराते हुए जाने लगी थी। मेरा मन युवा प्रेमी जैसा आकुलित था मगर ऊपर से, मैं भी मुस्कुरा रहा था। मैंने भी हाथ जोड़कर उसे विदा किया था। 

लिफ्ट मेरे दरवाजे के सामने ही थी। शिखा ने लिफ्ट की बटन प्रेस की थी। मैं दरवाजे पर ही खड़ा था। लिफ्ट आई, उस का डोर खुला था। शिखा उसमें जाते हुए चौंक गई थी। उसके कदम ठिठके थे। मुझे लगा, जैसे लिफ्ट से कोई बाहर आ रहा है मगर लिफ्ट में से बाहर कोई नहीं आया था। मैं देख नहीं पाया था कि लिफ्ट में कौन है। 

लिफ्ट में प्रविष्ट होते हुए मुझे शिखा का स्वर सुनाई दिया था - अरे, तुम? यहाँ कैसे? फिर वह अंदर चली गई थी। उसके पीछे, लिफ्ट डोर बंद हुआ था। मैं विस्मय की स्थिति में जड़वत खड़ा रह गया था ..          

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

18-04-2021   

Friday, April 16, 2021

 

शिखा ..

(द्वितीय भाग)

राशि ने, शिखा को जाते हुए तो देखा मगर उस पर विशेष ध्यान नहीं दिया था। वह सदा की भाँति मुस्कुराते हुए मेरे पास आई थी। मेरे कंधे पर सिर रख कर मुझसे मिली और पूछा - मेरे पापा, कैसे हो?

मैं राशि द्वारा, शिखा के देखे जाने की चिंता से स्वयं को अब तक उबार नहीं सका था। राशि के सहज व्यवहार ने, मुझे इसमें सहायता की थी। राशि का सिर चूँकि मेरे कंधे पर था। अतः वह मेरे मुख के असमंजस वाले भाव देख नहीं पाई थी। राशि की पीठ स्नेह से थपथपाते हुए मैंने उत्तर में प्रश्न किया - राशि, बिना बताए अचानक कैसे आई हो, सब ठीक तो है ना? 

राशि अब मेरे से अलग हुई थी। हँसते हुए बोली थी - पापा, आपको सरप्राइज देने के विचार से, मैंने अपने आने के बारे में बताया नहीं। 

फिर चुप होकर राशि मेरे मुख को निहारने लगी। मेरी स्थिति बड़ी ही विषम हो रही थी। मुझे सरप्राइज देने की कोशिश में, शिखा को मेरे साथ अकेले में देखना, स्वयं राशि के लिए सरप्राइज हो गया है। मुझे यह विचार परेशान कर रहा था। निश्चित ही मैं, परेशानी के ये भाव राशि से छुपा नहीं पाया था। 

मेरी बेटी ने शायद अपने पापा की विषम स्थिति के प्रति संवेदना अनुभव की थी। राशि ने जैसे मेरी मदद की हो उसने, मुझसे दृष्टि हटाते हुए, मेरे कुछ कहने की प्रतीक्षा नहीं की और कहा - 

पापा, मेरी एक फ्रेंड है उसे हुए डेंगू के खतरनाक हो जाने से, 3 दिन से यहां हॉस्पिटल में भर्ती है। मैं, उससे ही मिलने, उसे देखने आई हूँ। मेरे पास घर की अतिरिक्त चाबी है। अतः मैंने, आप घर पर होंगे या नहीं इसकी चिंता नहीं की। 

अब तक मैं अपनी मनः स्थिति ठीक कर सका था। मैंने उसका ट्रॉली बेग लिया और बेडरूम की तरफ बढ़ते हुए पूछा - अभी स्नान करोगी या भोजन करना पसंद करोगी। 

राशि ने कहा - हल्का शॉवर ले लेती हूँ। माँ यहाँ नहीं है पता होने से मैं, टिफिन घर से चलते हुए साथ लाई हूँ। वॉशरूम से आकर खा लेती हूँ। (फिर पूछा) आपने भोजन किया या नहीं?

राशि के प्रश्न सहज थे। चोर मेरे मन में था। मैं उसके सहज प्रश्नों से परेशान हो रहा था। दुविधा में यह नहीं बता पाया कि मैंने, शिखा के साथ भोजन कर लिया है। कुछ पल के विलंब से मैंने कहा - राशि, मैंने अभी ही भोजन किया है। 

तब राशि वॉशरूम में चली गई थी। मैं सोफे पर आकर ढ़ह गया था। सोच रहा था कि मैंने कुछ किया ही नहीं है। शिखा मेरे बुलाने पर तो आई नहीं थी। शिखा ने, भोजन भी अपनी इच्छा से बनाया और खिलाया-खाया था। इसमें कौन सी बुरी बात मैंने की थी कि मुझ पर, अपराध बोध यूँ हावी हो रहा था। मैंने धिक्कार ज्ञापित किया व्यर्थ की समाज मर्यादाओं  पर, जो पुरुष-स्त्री के सहज मिलने पर भी प्रश्न खड़ा करती हैं। राशि के वॉशरूम से आने के पहले मैंने तय कर लिया कि उसके द्वारा कुछ पूछते ही मैं, शिखा को लेकर सब सच कह दूँगा। 

राशि आई तो बेग से निकाला गया टिफ़िन उसके हाथ में था। मैंने कहा - राशि यह तुम अभी फ्रिज में रख दो। डिनर में इसे हम साथ खा लेंगे। अभी फ्रिज में रखा भोजन ले लो, तुम्हें खाना अच्छा लगेगा। 

राशि ने कहा - ठीक है पापा। 

फिर वह रसोई में गई थी। उसके, पीछे पीछे मैं भी था। राशि क्रॉकरी लेने-रखने, यूटिलिटी में गई थी। वहाँ सिंक में प्लेट्स आदि इतनी थीं जिनसे साफ था और इस बात की चुगली हो रही थी कि अभी ही, दो लोगों ने साथ भोजन किया है। फ्रिज में रखा भोजन भी, किसी कुक के हाथ का नहीं अपितु किसी गृहिणी के हाथ का बना लग रहा था। 

राशि ने अपने लिए उसमें से भोजन लिया और डाइनिंग टेबल पर आकर खाना शुरू किया था। मैं भी उसके सामने बैठ गया था। भोजन करते हुए राशि ने कहा - भोजन बहुत स्वादिष्ट है। 

तब मैंने फ्रिज से निकाल कर और कुछ सामग्री माइक्रोवेव में गर्म की थी। फिर राशि के लिए ले आया था। मैंने, राशि को स्नेह और आग्रह से ज्यादा खिला दिया था। 

इस सबके बीच मेरी बेटी ने, मेरा (अपने पापा का) मान एवं मुझ पर विश्वास बने रहने दिया था। राशि ने देखा तो बहुत कुछ था मगर प्रत्यक्ष में उस पर, कोई शंका या (गलत) प्रश्न नहीं किया था। यह मुझे पता नहीं कि उसके मन में क्या था। 

उसके भोजन कर लेने के बाद मैंने कॉफी बनाई थी। साथ कॉफी पीते हुए मैंने स्वतः ही शिखा को लेकर, हुआ सब सच बता दिया था। सुनकर सरलता से राशि ने इसे सच मान लिया और कहा - पापा, शिखा निश्चित ही अपने विरुद्ध कार्यवाही से डरी हुई है। आप कल उस पर से कार्यवाही की लटकाई तलवार हटा लेना। अनुशासन आवश्यक तो है मगर उसने जो किया है उतनी अनुशासनहीनता तो अब बहुत सामान्य बात हो गई है। 

मैंने सहमति में सर हिला दिया था। तब राशि अपनी फ्रेंड से मिलने गई थी एवं मिलकर वापस आई थी। उसकी फ्रेंड की हालत में अब काफी सुधार हो गया था। अगली सुबह राशि चली गई थी। उस दिन मैं, अपनी उत्सुकता सहित ऑफिस गया था कि अनुशासनात्मक कार्यवाही से बचने के लिए शिखा, मुझसे किन शब्दों में प्रार्थना करती है। हालांकि मैं, उस के द्वारा दिए किसी भी स्पष्टीकरण को अनदेखा कर, शिखा पर कोई कार्यवाही ना करने का मन बना चुका था। 

शिखा जब अगले तीन घंटे, स्वयं मेरे कक्ष में नहीं आई तो मैंने ही उसे बुलवाया था। वह कल वाली दयनीय स्थिति में नहीं लग रही थी। आज उसके मुख पर आत्मविश्वास झलक रहा था। मैंने, उसे बैठने कहा तो वह सामने बैठ गई थी। फिर मेरे पूछने के पहले ही बोलने लगी - 

सर, कल आपके घर आना मेरे लिए नए तरह का अनुभव रहा है। जिससे मैं सच कहूँ तो मुझे, आपसे प्यार हो गया है। कल मैं, अपने पर कार्यवाही नहीं करने की याचना लिए आप के घर आई थी। आज मुझे इसका विचार नहीं है। मैंने आपको अत्यंत जिम्मेदार तरह का व्यक्ति पाया है। आज मैंने अपना स्पष्टीकरण, गोपनीय लिफाफे में जमा कर दिया है। आप मुझ पर जो भी कार्यवाही करेंगे वह मुझे स्वीकार होगी। मैं आपके कर्तव्य निर्वहन में कोई अड़चन नहीं होना चाहती हूँ। यह, मैं, आपने बुलाया है तो ही कह रही हूँ। अन्यथा लिखित में दिए स्पष्टीकरण के अतिरिक्त मुझे अलिखित कुछ नहीं कहना था। 

मैंने ध्यान से उसके एक एक शब्द सुने फिर कहा - ठीक है मैं, आप का रिप्लाई देख लूंगा। आप अपनी सीट पर जाकर बेखटके अपने कार्य कीजिए। 

शिखा चली गई थी। मैं अपने काम में लग गया था। अपने काम के बीच में ही ईआरपी में मैंने, शिखा की सर्विस प्रोफाइल देखी थी। वह 28 वर्ष से विभागीय सेवा में थी। वह दिखने में जितनी दिखती थी उससे कहीं बड़ी, 50 वर्ष की उम्र की थी। यह मेरे अचरज का विषय था। 

शाम को मैंने डॉक् पैड में से उसका जमा किया गोपनीय लिफाफा खोल कर, उसकी रिप्लाई पढ़ी थी। शिखा ने अपनी गलती लिख कर स्वीकार की थी। लिखा था कि उसे, अगले दिन दौरे पर जाने वाले अपने पति की सेवा में लग जाना पड़ा था। इस कारण पिछले दिन उसे रुचिकर, एक वेब सीरीज के अंतिम चार मिनट का भाग देखना शेष रह गया था। क्या हुआ है अंत, इसकी उत्सुकता होने से उसने मोबाइल नेट पर उतना भाग, कार्यालय में देख लिया था। जिस सहकर्मी ने उसकी  शिकायत मुझ से की है शिखा ने, उसके, उसे लेकर ख़राब मंसूबे पूरे नहीं होने दिए थे। इस कारण वह शिखा से चिढ़ रखता है। फिर भी जो भी रहा हो, यह लिखकर शिखा ने, मेरे आदेश का उल्लंघन करने की अपनी गलती मानी थी। उसने लिखा कि इस कार्यालय में कार्य एवं अनुशासन मुझ पर जिम्मेदारी होती है। मैं जो उचित समझूँ, उसके विरुद्ध वह कार्यवाही करूं। इसी में आगे उसने निवेदन किया कि मैं उसे इस कार्यालय से ट्रांसफर करदूँ ताकि उसको, परेशान करने वाले सहकर्मी से पीछा छूट सके। वह दूर रहकर अपना विभागीय काम कर सके। 

मैंने अगले दिन अपने अधीनस्थ एक मैदानी कार्यालय में, शिखा के स्थानांतरण का आदेश जारी कर दिया था। मैंने, शिखा पर अन्य कोई कार्यवाही नहीं की थी। फिर उसी शाम शिखा को अपने कार्यालय से कार्य मुक्त कर दिया था। मेरे मातहत ने इसे शिखा पर, उसकी अनुशासन भंग करने की कार्यवाही जैसा माना था। शिखा, पिछले दस वर्षों से इसी कार्यालय में कार्यरत थी। अतः उसके सहकर्मियों ने शाम के समय पार्टी करके उसे भावभीनी विदाई दी थी। 

उस शाम मैंने अपने कक्ष में शिखा से कहा था - शिखा, अगले अवकाश पर हो सके तो कष्ट करके आप, पुनः अपने हाथ का भोजन खिलवाइये तो मुझे प्रसन्नता होगी। 

शिखा ने अपने मुख पर कोई भाव नहीं आने दिए थे। सिर्फ कहा था - सर, आपको पता नहीं कि मेरा फ्लैट भी आपकी सोसाइटी में अन्य टॉवर में है। मुझे कोई कष्ट नहीं होगा। मैं रविवार 11 बजे आकर आपकी यह इच्छा पूरी कर दूंगी। यह करने में मुझे भी प्रसन्नता होगी। 

अब शिखा मेरे कार्यालय में नहीं थी। मुझे “कुछ कुछ” हुआ था। जिसके कारण अगले चार दिन में कोई विशेष काम नहीं होते हुए भी मैं, उस मैदानी कार्यालय में गया था जो मेरे कार्यालय से चार किमी दूर था। जिसमें अब शिखा कार्यरत हुई थी। अपनी सेवानिवृत्ति की उम्र में, मुझमें आ रहा यह परिवर्तन, समाज मर्यादा अनुरूप नहीं था। 

शनिवार रात मेरा ध्यान सिर्फ शिखा पर केंद्रित था। मुझे शिखा को लेकर जो “कुछ कुछ” हुआ था उसे “प्यार” निरूपित करना ही उचित शब्द था। ऐसा क्यों हुआ, इसका कारण मैंने अपने मन में टटोला था। मुझे कारण, दो मिले थे। एक उसका पाँच मिनट तक मेरे दरवाजे पर खड़े रहना। दूसरा, शिखा के द्वारा अपनी कही बात में, मुझसे प्यार होना कहा जाना।  

सच लिखूँ तो उस रात अगले तीन घंटे मुझे नींद नहीं आई थी। जीवन में पहली बार मुझे किसी लड़की से प्यार होने की (पत्नी से तो मेरी पत्नी रूप होने पर हुई थी) अनुभूति हुई थी। मैं शिखा को लेकर रोमांटिक ख्यालों में खो गया था। मुझे वह सच लगा जो कहा जाता है ‘प्यार दिन का चैन और रातों की नींद उड़ा देता है’। 

कुक को इस रविवार की छुट्टी देना मैंने, शनिवार को बता दिया था। अगली सुबह से ही मैं उस घड़ी का अधीर होकर प्रतीक्षा कर रहा था जब शिखा आए। 

मैं नहीं चाहता था, मगर ना जाने क्यों, हाउस हेल्प आज ज्यादा तल्लीनता से घर की सफाई कर रही थी। मैं उस दिन यह चाहता था कि वह जल्दी जाए ताकि जब शिखा आए तो हम दोनों के अतिरिक्त घर में कोई ना हो। 

इसे ही मर्फीज़ लॉ (Anything that can go wrong will go wrong)  कहा जाता है - अर्थात रोज जो होता है, हमारे चाहे जाने वाले दिन वैसा नहीं होता है। तब मुझे, प्रतीक्षा दो बातों की थी  कि कब मेड, काम करके जाए और उसके जाने के बाद कब शिखा आए।यह दोनों ही बातें एक साथ हुई थी। हाउस हेल्प, काम करके दरवाजे से निकल रही थी तभी शिखा दरवाजे पर आई थी। मेड ने मेरे ना चाहने पर, शिखा का मेरे घर आना देख लिया था।    

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

16-04-2021


 हौसला रख के दौरे दहशत में जी सकता मगर

क्या करूं मैं कि सब पर से दहशत मिट जाए 

Wednesday, April 14, 2021

 पीछा करूं या आगे चलूँ ध्यान रखूं मैं 

कि अरमान किसी के कुचल ना जाएं 

सभी है मुझ जैसे ही जीवन अभिलाषी 

स्वाभिमान किसी के कुचल ना जाए 

शिखा ..

 

शिखा .. 

मैंने उस लड़की से शादी की थी जिसे मेरे लिए, मेरे पिता जी एवं माँ ने पसंद किया था। विवाह उपरान्त शुरू में मुझे ऐसा लगता था कि अगर मेरे पालकों ने, मुझे स्वयं चयन का अवसर दिया होता तो शायद मैं, अपनी पत्नी होने का सौभाग्य अन्य लड़की को देता। 

विवाह हो चुका था। तब अनिच्छा होने पर भी, परिवार के सदस्यों विशेषकर माँ, पिता, बड़े भाई बहन की इच्छा को मान देना पारिवारिक परिपाटी थी। जैसे उस समय, सब निभाते थे वैसे मैंने भी अपना दांपत्य निभाना आरंभ कर दिया था। मेरे मन में एक कसक अवश्य रही थी कि काश मैं, मुझे प्यार करने वाली किसी लड़की से शादी कर सकता। तब भी अपनी पत्नी के, मेरे प्रति आदर एवं मेरी सेवा के, समर्पण वाले भाव अनुभव करने के कारण मुझे, उससे प्यार हो गया था। अन्य शब्दों में कहूं तो “प्यार करने वाली कोई लड़की से मेरी शादी तो नहीं हुई थी मगर जिससे शादी हुई उसे, मुझसे और मुझे, उससे प्यार हो गया था”। 

फिर क्या था जैसे समाज में, अन्य परिवार होते हैं वैसा ही एक, मेरा परिवार हो गया था। तब कभी कभी मैं सोचता कि ठीक ही हुआ अगर किसी से मैं प्यार में पड़ा होता और उससे मेरी शादी होती तो मुझे, सदा उससे चाहे-अनचाहे प्यार जताते दिखना होता। उसके मन में, मेरे लिए प्यार तो होता मगर शायद ऐसा नहीं होता जैसे मेरी पत्नी के मन में मेरे लिए था। मेरी पत्नी के मन में मैंने, मेरे लिए प्यार से भी अधिक, श्रद्धा होना अनुभव की थी। 

हमारे तीन बच्चे हुए थे। यथा प्रकार पत्नी और मैंने, उनका लालन पालन किया। समय गुजरता गया। बच्चे पढ़ लिख गए। बच्चों ने, हमेशा अपनी माँ और मुझे परिवार के प्रति, समर्पित भाव से काम एवं सुविधाओं की फ़िक्र में लगा देखा था। इससे बच्चों में संस्कार भी अच्छे आ गए। वे, हमें बहुत चाहते एवं हमारा आदर भी करते थे। 

वे योग्य हुए, उनका विवाह हुआ तो बेटियां ससुराल चलीं गईं। बेटे ने अपनी पसंद की, हमारे लिए बहू ला दी। 

और पाँच वर्ष बीते तो हमारा, एक लाड़ला पोता और एक सुंदर पोती हो गई। कुछ समय बेटे एवं मेरी नौकरी एक ही स्थान पर रही तो हमें पोते-पोती को खिलाने, लाड़-दुलार करने का सुख मिल गया। फिर मेरी सेवा निवृत्ति को दो वर्ष रहे, तब मुझे प्रोन्नति मिली एवं मेरा स्थानांतरण नोएडा हो गया। यहाँ मैं और मेरी पत्नी, पोते पोतियों से दूर होने की उदासी लिए आए थे। 

मेरी पत्नी, अब अपने जीवन में सब कुछ देख लिया, इस संतुष्टि का स्थाई भाव ग्रहण करके अपना, परलोक सुधारने के लिए धर्म/प्रभु शरण में अधिक रहने लगी थी। करना मेरे लिए भी यही अपेक्षित एवं उचित होता। शायद मैं भी अपनी अवस्था अनुसार इसी पथ का अनुगामी होता मगर मेरी प्रोन्नति एवं नोएडा पद स्थापना ने मुझे अन्य पथ पर ला दिया। 

मेरे अधिकार बढ़ गए थे। नोएडा के ऑफिस में वातावरण अधिक आधुनिक था। मेरे मातहत कर्मी, मेरे साथ एवं आपस में अधिक खुला व्यवहार करते थे। प्रोन्नत किए जाने से विभाग की मुझसे अपेक्षा अधिक हो गई थी। मेरा दायित्व, अधीनस्थ कर्मियों से अधिकतम काम लेकर बड़ा लक्ष्य पूरा करना था। मेरे लिए बड़ा लक्ष्य चुनौती पूर्ण इसलिए था कि यहाँ, अधिकारी एवं कर्मचारी गण अपने काम से अधिक मोबाइल एवं नेट पर अधिक समय बिताया करते थे। तब मैंने अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए, नेटवर्क फ़ायरवॉल के जरिए, कार्यालीन नेटवर्क पर अनावश्यक साइट्स ब्लॉक करवा दीं। इसके साथ ही मैंने, व्हाट्सएप्प पर कार्यालयीन समय में, सिर्फ विभाग के ग्रुप पर एक्टिव रहने के निर्देश का परिपत्र जारी किया था। 

मेरी इन व्यवस्थाओं से अधीनस्थ कर्मियों में, मेरे प्रति रोष रहा मगर तब उनकी बढ़ी हुई कार्य उपलब्धियां एवं क्षमता स्पष्ट दिखने लगीं थीं। 

एक दिन मेरी पत्नी को पोते पोती की याद अधिक आने लगी। मैंने उन्हें महीने भर के लिए बेटे के पास भिजवा दिया था। दो दिन बाद मेरे एक कर्मचारी ने, मुझे व्हाट्सएप पर एक वीडियो भेजा जिसमें, मेरे ही मातहत काम करने वाली शिखा, कार्यालय में बैठकर एक वेब सीरीज देखने में तन्मय दिख रही थी। 

इसे देखकर, आदेश के उल्लंघन के लिए मैंने, शिखा को कारण बताओ नोटिस जारी किया। उसमें पूछा कि कार्यालयीन समय में वेब सीरीज देखने के लिए क्यों ना, शिखा के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए। 

घटना के अगले दिन अवकाश था। मुझे उस दिन अपनी पसंद का भोजन स्वयं बनाने की इच्छा हुई थी। मैंने रसोईये को छुट्टी दे दी। मैं स्वयं रसोई बनाने में लगा था तब, डोर बेल बज उठी थी। हाउस हेल्प अभी अभी ही घर का झाड़ू पोंछा, कपड़े-बर्तन का काम निबटा कर गई थी। रसोई में, मेरे रुचिपूर्वक काम करने में आई यह विघ्न मुझे अप्रिय लगी थी। फिर भी कौन आया है यह देखना आवश्यक था। 

मैंने बेसिन में हाथ धोए एवं जाकर दरवाजा खोला। सामने शिखा खड़ी थी। मैंने पूछा - शिखा, क्या बात है, मेरे घर का एड्रेस कैसे पता चला तुम्हें, ऐसे मेरे घर क्यों आई हो?

शिखा ने कहा - सर, मुझे आपसे बात करनी है। 

मैंने, उसे घर के अंदर आने के लिए नहीं कहा था। दरवाजे पर ही उस से कहा - जो भी बात है कल ऑफिस में ही कर लेना। 

स्पष्ट था कि मैं उसे दरवाजे से ही टाल देना चाहता था। 

शिखा ने याचना के स्वर में कहा - सर प्लीज, आज ही अपनी बात, मुझे कह लेने दीजिए। रात चिंता के कारण मैं सो नहीं सकी हूँ। अभी अपनी बात नहीं कह पाई तो शायद आज रात भी सो ना पाऊंगी। मेरी तबियत बिगड़ जाएगी। 

मुझे भय लगा कि यह, मुझे षड़यंत्र में तो फँसाने की कोई कोशिश तो नहीं। मैंने कहा - शिखा, घर पर मैं अकेला हूँ। ऐसे में मेरा तुम्हें घर में बिठा कर बात करना उचित नहीं है। तुम्हारी जो भी चिंताएं हैं उन्हें एक दिन के लिए त्याग दो। कल ऑफिस में मुझसे बात करना। मैं, संभव सहायता करके तुम्हें चिंता मुक्त करने का प्रयास करूंगा। 

शिखा रुआंसी एवं निराश दिखी। तभी रसोई से आवाज सुनाई दी, यह कुकर की थी। लगता था कुकर का सेफ्टी वॉल्व फट गया था। मुझे संदेह हुआ कि कुकर में मैंने पानी डाला भी था या नहीं। इस चिंता में, मैं शिखा को भूल, रसोई में चला गया। 

देखा कि यह कुकर का सेफ्टी वॉल्व ही था। मैंने गैस बंद किया। रसोई में दीवार एवं प्लेटफार्म पर फ़ैल गई सामग्री की साफ़ किया। तब मुझे ध्यान आया कि जल्दी में, मैंने दरवाजा बंद ही नहीं किया था। मैं दरवाजा बंद करने गया तो देखा, पाँच मिनट होने पर भी शिखा वहाँ वैसी ही खड़ी थी।

शिखा मुझसे बीस बरस छोटी रही होगी। कार्यालय में कभी मैंने, गौर नहीं किया था। आज सामने उदास खड़ी वह, मुझे आकर्षक लग रही थी। मुझे उस पर दया आई थी। मैंने कहा - शिखा, आप गईं नहीं अभी तक! कब तक यहीं ऐसे खड़ी रहोगी? 

शिखा ने कहा - सर, मैं अपनी बात तो कल कह लूँगी लेकिन अभी मेरी इच्छा आप की सहायता करने की है। 

मैंने कहा - कैसी सहायता? 

शिखा ने कहा - सर, कुकर का सेफ्टी वॉल्व ख़राब हो गया लगता है। ऐसे में आपको भोजन तैयार करने में कठिनाई होगी। मैं, आपके लिए भोजन बना देती हूँ। 

मैंने सोचते हुए कहा - नहीं कठिनाई कोई नहीं है, मेरी पत्नी बहुत सुघड़ हैं। उनकी रसोई में कई कुकर रहते हैं। मैं भोजन बना लूँगा, लेकिन चलो पहले मैं तुम्हारी बात सुन लेता हूँ। 

अब शिखा के उत्तर ने मुझे अचंभित किया। उसने कहा - सर, बात तो ऑफिस की है अब वह कल मैं ऑफिस में ही कर लूँगी। अभी मेरी रिक्वेस्ट यह है कि मुझे, आज अपने हाथ से तैयार भोजन, आपको खिला सकने का अवसर दे दीजिए। 

ना जाने क्यों, मेरा किसी षड्यंत्र का संदेह उस समय दूर हो गया था। मेरा स्वभाव, स्त्री जाति को परेशान ना देखने का है। मैंने, शिखा की ख़ुशी समझते हुए उसे अनुमति दे दी। मेरी अनुमति से उसने अपने पाँव, मेरे घर में रखकर रसोई के तरफ बढ़ा दिए थे। 

ऐसा होते ही मेरा मन में दूसरी चिंता उठ खड़ी हुई कि सूने अकेले घर में, मेरे साथ शिखा के होने की बात मुझे पत्नी से छुपानी या बता देनी होगी। छुपाना तो ठीक नहीं था तब परेशानी यह थी कि यह क्या कहकर उनसे बताऊंगा। 

मैं इस दुविधा में था। तब ही किचन से, शिखा की आवाज आई वह पूछ रही थी - सर, कुछ विशेष खाने की इच्छा है, आपकी? 

मैंने रसोई में गए बिना ही कह दिया - नहीं, उपलब्ध सामग्री में जो आप, उचित समझें वह बना लीजिए। और हाँ, आप भी यहीं खा सकें, इतना बना लीजिए। 

कह कर मैं चुप हो गया था। 

शिखा ने फिर कुछ नहीं कहा। मैं सोचने लगा कि मैंने रसोईए को छुट्टी, उसे आराम देने और खुद अपने हाथ के खाने के लिए दी थी। आज संयोग मगर कुछ और होना था। मुझे भोजन, शिखा के हाथ का मिलना था। तब मेरा ध्यान, अपनी पत्नी को कही जाने वाली बात पर पुनः चला गया था। मैंने उचित समझा कि बिना लाग लपेट के जो सच है वही मैं उन्हें बता दूंगा। हमारा, कम नहीं 35 वर्ष का परस्पर परायण साथ था। पत्नी को इस सब में कोई संदेह क्यों होगा। 

शिखा को एक घंटा लगा था। इस बीच शिखा किचन में ही रही थी। मैंने भी शिखा के होते तक किचन में नहीं जाने का निश्चय कर रखा था। मैंने सामने के दरवाजे भी खुले ही रहने दिए थे। 

अब मुझे अपनी नहीं शिखा की चिंता थी कि कोई देखे तो वह, शिखा के यहाँ होने से उस पर व्यर्थ शक नहीं करे। जो भी हो शिखा मेरी मातहत कार्यरत थी। कार्यालयीन कार्यों के दायित्व अपेक्षा के साथ ही किसी मातहत से मेरा, उन्हें लेकर पिता या बड़े भाई की तरह चिंता रखने का अपना दायित्व बोध याद रहता था। 

शिखा अब बनाया भोजन डाइनिंग टेबल पर लगा रही थी। फिर उसने, मुझे टेबल पर आने के लिए कहा था। मैं टेबल पर गया था। मैंने देखा, तरतीब से लगाई सलाद के साथ पालक पूरी, बूंदी रायता, बेसन के चीले एवं मीठे चावल टेबल पर सजे हुए थे। 

मेरे, शिखा से आग्रह पर वह सामने बैठी थी। फिर हम दोनों ने मौन रहकर भोजन ग्रहण किया था। आज अपने हाथ से मैं, जो तैयार करके खाने की सोच रहा था, उससे बहुत अच्छा भोजन मुझे खाने मिला था। 

भोजन करने के बाद, शिखा ने ही, जूठे प्लेट्स, गिलास आदि यूटिलिटी सिंक में रखे थे। उसी ने बच गई सामग्री फ्रिज में रखी थी। यह सब करता देख शिखा में, सुघड़ता मेरी पत्नी जैसी ही लगी थी। 

मैं जब सोच रहा था कि बिन कहे कोई बात कैसे कह दी जाती है यह शिखा को अच्छी तरह से पता है। तभी शिखा ने मुझसे कहा था - सर, मुझे देर हो गई है। अब मैं जाउंगी। 

मैंने धन्यवाद कहने की औपचारिकता नहीं की थी। मुस्कुरा बस दिया था।  

तब विचित्र संयोग हुआ। जब खुले दरवाजे से शिखा निकल रही थी तभी, दरवाजे पर मेरी छोटी बेटी राशि का, अचानक पूर्व सूचना बिना आगमन हुआ था  …     

(प्रथम भाग समाप्त)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

14-04-2021


Tuesday, April 13, 2021

 लक्ष्य के पीछे नहीं 

मुझे, आगे चलना होगा

लक्ष्य करे मेरा पीछा 

मुझे कुछ वह करना होगा 

Monday, April 12, 2021

आयशा की नकल

 

आयशा की नकल 

प्रभुत्व एवं देवांशी, दोनों में प्रेम एक ही कंपनी में साथ कार्यरत होते हुए हुआ था। जिसकी परिणति उनका विवाह सूत्र में आबद्ध हो जाना था। 

आरंभिक वैवाहिक जीवन ने, उन्हें ऐसा आभास कराया था कि जैसे आपस में उनमें का प्यार किसी और युगल में होता ही नहीं है। 2 साल बीते थे, अब देवांशी 5 माह की गर्भवती थी। सोनोग्राफी रिपोर्ट के आधार पर, देवांशी को प्रभुत्व से संबंध में सतर्कता का परामर्श दिया गया था ताकि गर्भस्थ शिशु पर कोई खतरा उत्पन्न नहीं हो। 

इससे देवांशी की उदासीनता ने, प्रभुत्व को चिढ़ा दिया था। प्रभुत्व आजकल ऑफिस से तो देवांशी के साथ निकलता फिर, किसी किसी बहाने से बाहर रहकर, घर देर रात लौटता। पहले देवांशी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। एक दिन ऑफिस में देवांशी, प्रभुत्व के पास ही थी तब, प्रभुत्व के मोबाइल पर किसी का कॉल आया था। देवांशी ने अनुभव किया था कि कॉल पर बात करते हुए, देवांशी की उपस्थिति से प्रभुत्व असमंजस में रहा था। देवांशी ने इसे सहज में लिया और उठकर अपनी सीट पर चली गई थी। 

थोड़ी देर बाद प्रभुत्व, देवांशी के पास आया और उसने कहा - देवांशी, एक क्लाइंट से बाहर मीटिंग है, मैं उसमें जा रहा हूँ। 

देवांशी ने प्रभुत्व के आँखें चुराकर बात करना नोट किया था। तब भी निर्भाव, सहमति में सिर हिला दिया था। देवांशी के मन में प्रभुत्व को लेकर उस दिन शक उत्पन्न हुआ था। आगे पंद्रह दिन में प्रभुत्व की, अपने प्रति उपेक्षा ने आखिर देवांशी को बाध्य किया कि वह डिटेक्टिव की सेवा लेकर, प्रभुत्व की गतिविधियों की जाँच करवाए। 

डिटेक्टिव की ख़ुफ़िया रिपोर्ट ने देवांशी के दिल को तोड़ दिया था। प्रभुत्व घर से देर रात तक बाहर रहकर, एक बड़ी उम्र की क्लाइंट महिला के साथ प्यार की पींगे बढ़ा रहा था। प्रेम विवाह करने के बाद भी, एक दूसरे के प्रति निष्ठावान नहीं रह जाना, ऐसे उदाहरण आजकल समाज में बहुत देखने में आते हैं।

उस रात जब प्रभुत्व घर आया तो देवांशी ने कहा - प्रभुत्व, ये मैं क्या सुन रही हूँ कि तुम, किसी क्लाइंट के साथ अवैध रिश्ते में हो? 

प्रभुत्व चौंका था उसने पूछा - यह तुमसे किसने कहा?

देवांशी ने कहा - मुझ से किसने कहा, तुम्हारा यह जानने से अधिक जरूरी यह है कि तुम मुझे बताओ यह बात सच है या झूठ?

देवांशी तो सच्चाई जान चुकी थी मगर प्रभुत्व क्या कहता है उसे, प्रभुत्व के मुँह से सुनना था। प्रभुत्व ने झूठ बोलने की जगह ढिठाई से कहा - 

यह सच है, मगर तुम कंपनी में काम करते हुए जानती हो ना कि यह, अब आम बात हुई है। इसे अवैध कहना अब उचित नहीं। तुम यह भी तो जानती हो कि तुम्हारी गर्भावस्था के कारण, मेरी जरूरतें पूर्ण नहीं हो रहीं हैं। 

देवांशी को, प्रभुत्व के ऐसे स्वार्थीपन ने क्रुद्ध किया था। उसने चीखते हुए कहा - प्रभुत्व अभी अधिक दिन नहीं हुए हैं जब हम, एक दूसरे के प्रेम और साथ को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानते थे। मेरे जिस गर्भ के हवाले से तुम, अपने दुष्कर्म को उचित ठहरा रहे हो वह मेरा गर्भ, तुमसे ही तो है। तुम इतना गिरा काम कैसे कर सकते हो? तुम ऐसी बुरी बात कह ही कैसे सकते हो?

प्रभुत्व ने बेपरवाही से कहा - मैंने कहा ना कि मेरा किया, अब कोई निराली बात नहीं रह गई है। एक दो से कभी कभार संबंध हो जाना अब बुरा नहीं होता है। इसे, मेरी जरूरत समझ कर तुम मुझे निभा लो। अभी मुझे और तुम्हें, शांत होकर सो जाना चाहिए। 

देवांशी रो पड़ी, उसने पूछा - तुम ऐसे कह रहे हो जैसे कि एक दो से मेरे संबंध हो जाएं तो तुम बड़ी शांति से उसे निभा सकोगे, बताओ ऐसा कर सकोगे?

प्रभुत्व ने बिना किसी पछतावे के कहा - जब ऐसा होगा तब सोचूँगा।अभी मुझे नींद आ रही है। तुम्हारे लिए भी गुस्सा छोड़, अभी आराम करना ठीक होगा। 

कहकर वह सोने के पूर्व के कामकाज में लग गया। देवांशी लाचार रोते रोते बिस्तर पर लेट गई। 

अगले दिन देवांशी ने ऑफिस से छुट्टी ली थी। वह, घर में बैठकर तय कर रही थी कि बन गई इस अप्रिय स्थिति में उसका क्या किया जाना उचित होगा। तब तीन बजे, डिटेक्टिव ने कॉल कर बताया कि प्रभुत्व, उस महिला के साथ लॉन्ग ड्राइव पर जा रहा है। यह सुनते ही देवांशी ने एक निर्णय ले लिया। उसने डॉक्टर की बताई सावधानी की उपेक्षा कर अपनी स्कूटी ली थी और घर से निकल पड़ी थी। 

स्कूटी पर उसके मन में साबरमती रिवर फ्रंट पर, पति की दगाबाजी से त्रस्त, आयशा की आत्महत्या वाला प्रकरण चल रहा था। देवांशी, हाईवे पर नदी के ऊपर के ब्रिज के बीचों बीच पहुंची थी। 

फिर देवांशी ने प्रभुत्व एवं अपने पापा को कॉल किया, मोबाइल कैमरे को अपने पर फोकस करते हुए मोबाइल रेलिंग पर रखा और खुद रेलिंग पर बैठ गई। प्रभुत्व एवं पापा के कॉल पर आते ही कहा - अलविदा प्रभुत्व, तुम्हारे बच्चे की तरफ से भी पापा को अलविदा, मैं नदी में कूदकर प्राण दे रही हूँ। 

यह दृश्य देखकर, प्रभुत्व और कार में उसकी साथ बैठी महिला, दोनों की घिग्घी बंध गई। प्रभुत्व ने कहा - नहीं देवांशी, यह नहीं करो। मुझे क्षमा करो, तुम अपने साथ, हमारे बच्चे को भी ऐसी निर्ममता से कैसे मार सकती हो?

देवांशी के पापा ने भी समझाते हुए कहा - देवी, किसी भी समस्या का समाधान, आत्महत्या नहीं है। वापस आ जाओ जो भी तुम्हारी समस्या है उसे, हम सब मिलकर देख लेंगे।  

देवांशी ने पापा की बात को अनसुनी करते हुए कहा - अब पानी सिर से ऊपर हो गया है। प्रभुत्व, तुम उसी महिला से शादी करके बच्चा पैदा कर लेना। पापा मुझे माफ़ करना, मैं जीने का हौसला खो चुकी हूँ। मैं अब नदी में कूद रही हूँ। 

प्रभुत्व गिड़गिड़ाया था - देवांशी, हमारे होने वाले बच्चे की कसम, मैं अब कोई अवैध रिश्ता नहीं रखूँगा। प्लीज रेलिंग से उतर जाओ, मुझे बताओ तुम कहाँ हो मैं, अभी ही वहाँ पहुँचता हूँ। 

देवांशी का विचार, प्रभुत्व को धमकाने बस का था जिससे वह सुधर जाए। रेलिंग पर मगर देवांशी अनियंत्रित हो गई, वह डगमगा कर फिसली एवं नदी में जा गिरी थी।
प्रभुत्व ने रेलिंग से गिरते हुए देवांशी को देखा था। उसकी आत्मा काँप गई थी। 

महिला भी अत्यंत भयभीत हो गई थी। वह चिंता में पड़ गई कि देवांशी की आत्महत्या की पुलिस जाँच में, उसकी बुरी पहचान सामने आ जाएगी। इस अवैध रिश्ते की बलि, उसके मध्यमवर्गीय परिवार की ख़ुशी चढ़ जाएगी। अपने दो छोटे बच्चे एवं पति के सामने उसकी कामुक छवि कितनी शर्मनाक होगी। ऐसी चिंतित वह प्रत्यक्ष में प्रभुत्व से कह रही थी - 

कैसे कैसे काम कर जातीं हैं यह लड़कियाँ। आयशा प्रकरण की दुष्प्रेरणा ने देवांशी से, नकल में वह काम करवा दिया है जिससे हमारी फांसी तय हो गई है।

इधर, देवांशी का नदी में गिरना हुआ और मेरी कार का ब्रिज पर पहुंचने का संयोग हुआ था। 

मैंने देखते ही, अपने ड्राइवर से कार रोकने कहा था। मैं स्विमिंग पूल में अच्छी तैराकी जानती थी। कार के रुकते ही बिना ज्यादा सोचे समझे मैंने, देवांशी के पीछे नदी में छलांग लगा दी थी। मुझ पर तब, एक जीवन बचा लेने का जुनून सवार था। 

नदी में तभी, वह लड़की एक बार डूब कर, सतह पर आई थी। मैंने उसे गिरेबान से थामा था, वह अचेत थी। तैरते हुए मैंने, उसे जैसे तैसे अपनी पीठ पर लादा था। उसके साथ, नदी के प्रवाह वेग में साथ तैर पाना, स्विमिंग पूल में तैरने जितना सरल नहीं था। मुझे, मेरी ही जान पर बन आई लग रहा था। बहुत ही मुश्किल से मैं, उसे लेकर किनारे पर पहुँच सकी थी। 

मैंने, उसे खींच कर रेत पर पेट के बल लिटाया था और पीठ पर मालिश और थपकियाँ देके उसका गटक लिया पानी निकालना आरंभ किया था। 

भाग्य की बात थी कि अधिक विलंब नहीं होने से, फेफड़ों में भरा पानी निकलते ही उसकी चेतना लौट आई थी। अब वह कराह और हाँफ रही थी। हाँफ, मैं भी रही थी मगर यह देख खुश थी कि सुखद संयोग ने देर नहीं होने दी थी। युवती का जीवन बचा लिया गया था। मैंने, ध्यान से उसे देखा तो, मुझे समझ आया कि मैंने एक नहीं दो जीवन बचाए थे। युवती गर्भवती दिख रही थी। मैंने नाम पूछा, उसने देवांशी बताया था।   

अब तक ड्राइवर, कार को ब्रिज से उतार कर नदी के किनारे कच्चे रास्ते पर ला चुका था। युवती अब कुछ स्वस्थ अनुभव कर रही थी। मुझसे थैंक यू कहते हुए उसके चेहरे पर कृतज्ञता के भाव थे। हम दोनों के कपड़े गीले थे। मैंने उसको सहारा देते हुए कार तक लाया था। 

तब ड्राइवर ने पछतावे में कहा - मैडम जी, नदी में इनके प्राण रक्षा के लिए, मुझे कूदना चाहिए था। एकाएक मैं वह साहस नहीं कर पाया जो आपने किया। 

मैंने कहा - जब इन्हें बचा लिया गया है तो इसका महत्व नहीं रह गया है कि कौन साहस नहीं कर सका। अब बंगले पर चलो। 

ड्राइवर ने कहा - जी, मैडम जी। और कार चला दी थी। देवांशी ने तब चिंतित हो कर कहा - मेम मेरी स्कूटी एवं मोबाइल ब्रिज पर ही है। 

मैंने कहा - चिंता ना करो, चल कर ले लेते हैं। 

तब ब्रिज पर आकर मेरे कहने पर ड्राइवर ने देवांशी का मोबाइल, उसे दिया था। फिर स्कूटी स्वयं बंगले तरफ बढ़ा दी थी। भीगे कपड़ों में मैं, कार ड्राइव कर रही थी। साइड सीट पर देवांशी भी भीगी ही बैठी थी। 

मैंने पूछा - आज मरने का इरादा था?

उसने कहा - नहीं, आत्महत्या करने का अभिनय दिखा कर, पति को डराना चाहती थी मगर संतुलन बिगड़ने से मैं नदी में गिर गई। मैं सच में मर जाती अगर आपने यह साहस नहीं दिखाया होता। 

कहते हुए उसकी आँखों में आँसू थे। मैंने पूछा - यह खतरनाक स्टंट करने की जरूरत क्यों पड़ी? 

इस पर देवांशी ने कारण बताने के लिए, अपने एवं प्रभुत्व के विवाह से लेकर, अब तक की बातें विस्तार से बताई थीं। मुझे प्रभुत्व की नीचता पर क्रोध आया था। तब हम, मेरे बंगले पर पहुँच चुके थे। भीतर पहुंचकर मैंने, कपड़े बदलने के लिए देवांशी को अपना एक गाउन सहित अन्य वस्त्र दिए थे। साथ ही मैंने भी अपने वस्त्र बदले थे। फिर गरमा गरम कॉफी पीते हुए मेरे कहने पर, देवांशी ने कॉल किया एवं अपनी मम्मी पापा को, मेरे बंगले पर आने के लिए कहा था। मैंने, देवांशी को प्रभुत्व से अपने बच जाने की बात बताने से मना किया था। 

देवांशी के मम्मी-पापा आए थे तब मैंने, उनसे कहा कि वे, प्रभुत्व को कॉल करके कहें कि ‘तुमने मेरी बेटी को मार डाला जिसकी कठोर सजा तुम्हें दिलवाई जाएगी’। 

देवांशी के पापा ने अभिनय में रोते हुए, प्रभुत्व से कहा - प्रभुत्व तुमने मेरी बेटी को आत्महत्या के लिए उकसा कर मरवा दिया है। अब मैं, तुमको नहीं छोड़ूँगा। 

प्रभुत्व ने पश्चाताप भरे स्वर में कहा - हाँ, पापा मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई है। मैं नदी के ब्रिज तक होकर आया हूँ। वहाँ मुझे देवांशी का कोई चिन्ह नहीं मिलने से मैं स्वयं पुलिस स्टेशन आकर अपना अपराध दर्ज करवा रहा हूँ। 

इतना सुनते ही देवांशी के पापा ने फोन काट दिया और मुझे प्रभुत्व की कही बात बताई। फिर पूछा कि अब क्या करना चाहिए?

मैंने कहा आप दोनों अब घर जाओ। देवांशी को यहीं रहने दो। एक दो दिन देवांशी के बचने का, प्रभुत्व को पता नहीं होने दो। उसे हवालात की हवा और पुलिस की लातें खाने दो। फिर तय करेंगे कि देवांशी को आगे क्या करना है। 

उसी शाम मैं, देवांशी को अपनी मित्र, गयनेकोलॉजिस्ट से जांच कराने ले गई थी। सुखद बात थी कि देवांशी का गर्भस्थ शिशु ठीक था। अगले दो दिनों में मैंने, देवांशी से की गई बातों में जान लिया था कि वह, प्रभुत्व को क्षमा कर देगी यदि आगे प्रभुत्व, उसके साथ निष्ठापूर्वक रहे। ये दो दिन, देवांशी के वीकेंड हॉलीडेज थे। अतः मेरे आतिथ्य में रह पाने एवं मुझसे फ्रेंडशिप बढ़ा पाने में देवांशी को असुविधा नहीं हुई। 

उधर प्रभुत्व ने, महिला से संबंध को गुप्त रखा था। देवांशी एवं अपने बीच, मतभेद से हुए विवाद को देवांशी की आत्महत्या का कारण बताया था। ये दो दिन न्यायालय में भी अवकाश के थे। पुलिस की हवालाती खातिरदारी के बीच, दो दिन प्रभुत्व गहन पश्चाताप में रहा था। वह सोचता रहा कि उसकी अच्छी खासी नौकरी, प्यार करने वाली पत्नी एवं उसका होने वाले बच्चा सब उसकी अपनी मूर्खता के भेंट चढ़ गए हैं। अब ना जाने कितने वर्ष उसके जेल में बीतेंगे। 

इस बीच पुलिस की खोजबीन में देवांशी का कोई अता पता नहीं मिला था। 

रविवार शाम, मैं, देवांशी को लेकर उस पुलिस स्टेशन गई थी जहाँ प्रभुत्व हिरासत में था। इंस्पेक्टर मुझे पहचान गया था। उसने पूछा - वकील साहिबा कैसे तकलीफ की यहां आने की?  

मैंने देवांशी का परिचय देते हुए कहा - देवांशी ने पति को सबक देने के लिए, एक नाटक रचा था। आशा है अब दो दिनों में, इनके पति प्रभुत्व की बुद्धि, आपकी आवभगत से ठिकाने पर आ गई होगी। अतः प्रभुत्व की प्रथम सूचना रद्द करते हुए, उसे रिहा कीजिए। मैंने, तत्संबंध में देवांशी का हस्ताक्षरित आवेदन, थाने में प्रस्तुत करवा दिया था। औपचारिकताएं पूर्ण किए जाने पर, प्रभुत्व को रिहा कर दिया गया था।

सब कुछ इस तरह से हो गया था कि यह कांड, कंपनी तथा प्रभुत्व - देवांशी के परिचितों की जानकारी में नहीं गया था।   

देवांशी, प्रभुत्व के साथ चली गई थी। देवांशी, अब पूर्ववत प्रेम से ना रहकर, सहमी उदास सी रहती थी। यह देख प्रभुत्व, उससे अत्यंत प्यार से पेश आता और स्वयं को ही धिक्कारा करता था। 

देवांशी, मेरे साथ मोबाइल पर संपर्क में रह कर, प्रभुत्व के साथ किस तरह पेश आए उसके लिए टिप्स लिया करती थी।  

प्रभुत्व, अब प्रतीक्षा करता था कि कब बीतते समय की मलहम, उनके बच्चे का जन्म और देवांशी से उसका, प्रेममय व्यवहार और उसकी सेवा, देवांशी को सामान्य करें, ताकि दोनों में पूर्ववत प्रेम का बसेरा हो जाए और वे पुनः अपने को उत्कृष्ट प्रेमी मानने लगें  …  

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन 

12-04-2021