Wednesday, November 25, 2020

गर्भवती फिरदौस …

 गर्भवती फिरदौस … 

फिरदौस के दिन पति हरिश्चंद्र जी से मिलते सम्मान एवं प्यार में, हँसी ख़ुशी बीत रहे थे। उनकी बेटी भी, फिरदौस को मम्मा-मम्मा कहते पीछे पीछे घूमा करती थी। अब बेटी, हरिश्चंद्र जी से ज्यादा, फिरदौस पर निर्भर हो गई थी। 

फिरदौस का, बेटी से बिलकुल माँ जैसा, मेल भाव (मेलजोल) देख, हरिश्चंद्र प्रसन्न होते। अवसरों पर वे, फिरदौस की इस बात पर भी, प्रशंसा करने में नहीं चूकते, कहते - 

फिरदौस, आज देखने से मुझे, लगता ही नहीं कि बेटी को, आपने नहीं किसी और ने जन्मा है। 

फिरदौस हँस कर कहती - आप, इस बात को आप भूल जाइये। जब मैंने, आपको पति स्वीकार किया उसी समय से, बेटी भी किसी और की नहीं मेरी हो गई है। 

हरिश्चंद्र-फिरदौस के विवाह को, जब लगभग एक वर्ष हो गया तब, एक रात्रि अंतरंग पलों में हरिश्चंद्र जी ने, फिरदौस से कहा - 

मेरी प्राण प्रिया, अब समय आ गया है कि हम अपने परिवार को पूरा करने की प्लानिंग करें। 

फिरदौस ने कहा - परिवार, अपना तो यूँ ही पूरा है। 

तब हरिश्चंद्र ने कहा - 

हाँ, मेरी पूर्व पत्नी जीवित होतीं तो मैं, यही मानता। मगर आज जब आप, मेरी प्राणप्रिया हैं तब, अपना परिवार एक और बच्चे के आने से पूर्ण होगा। 

इस पर फिरदौस ने कहा - 

आप हर बात इतनी सुलझी कहते हैं। फिर इसमें, इतना क्यों उलझते हैं कि बेटी, मेरी, जन्मी नहीं है।

हरिश्चंद्र ने कहा - मैं, नारी तो नहीं हूँ। नारी को मैंने, पढ़ने-देखने से जाना समझा है। ऐसे मैं, जानता हूँ कि नारी में ईश्वर प्रदत्त विशेष क्षमता होती है। जिसे, नारी में मातृत्व की योग्यता होना कहते हैं। 

कोई नारी जब, अपने गर्भ में शिशु का होना अनुभव करती है, शिशु को जन्मती है, तब उससे मिली अनुभूति, उसे विशेष आनंदकारी होती है। पूरा जीवन, अपने बच्चे को देख (माँ बन गई) नारी, उसमें अपना ही नया रूप देखती है। इस आधार पर मैं मानता हूँ कि आपके द्वारा, एक बच्चे को जन्म दिए जाने पर अपना परिवार पूरा होगा। 

इसे सुन फिरदौस ने मुहँ से कुछ कहने के स्थान पर, हरिश्चंद्र के सीने में अपना चेहरा गड़ा दिया था। फिरदौस की सहमति के, इस प्रेममय अंदाज ने हरिश्चंद्र जी का मन मोह लिया था। 

इस बात को बीते छह माह और हुए थे। फिरदौस अब, पाँच माह की गर्भवती थी। उसने कोर्ट जाना बंद कर दिया था। 

आज अभी, हरिश्चंद्र कोर्ट एवं बेटी स्कूल गई हुई थी। कुक भी जा चुकी थी। अकेली सोफे पर बैठ फिरदौस विचार में डूबी, अपने बढ़ गए पेट पर हाथ रख अपने गर्भस्थ शिशु को अनुभव करते हुए सोच रही थी -

मेरा गर्भाशय जो पहले था, वही आज है। यदि पिछले शौहर ने मुझे, जलील न किया होता और मुझे डिवोर्स के लिए विवश नहीं किया होता तो मेरे गर्भ में पलने वाला शिशु, उसका अंश होता। 

तब मेरे द्वारा जन्म देने के साथ ही नवजात शिशु, उसके धर्म का मानने वाला होता, उसके खानपान की आदत ग्रहण करता। जबकि अब ये बातें भिन्न होंगी।  

अगले विचार में फिरदौस को, सुनसान में पिछले शौहर के द्वारा, उसे दिए गए तीन तलाक की विषादपूर्ण एवं भयभीत कर देने वाली अपनी स्थिति का स्मरण आ गया। इससे फिरदौस सोचने लगी -

अगर पूर्व शौहर से मेरा कोई शिशु जन्म लेता ऐसे में, यदि वह बेटा होता तो वह ऐसे ही (पूर्व शौहर जैसे) किसी की बेटी को तीन तलाक से अपमानित कर सकता था। 

और 

यदि बेटी होती तो, उस के सिर पर अपने निकाह के बाद, तीन तलाक की तलवार ताउम्र लटकी होती।  

ऐसा सोचने के उपरान्त फिरदौस ने, इस बात के लिए ईश्वर का धन्यवाद किया कि ईश्वर ने बदमिज़ाज शौहर से, मेरे तलाक की परिस्थिति उत्पन्न की थी। जिस के कारण तात्कालिक रूप से तो तब, मेरे प्राण पर बन गई थी। मगर ऐसा होने से, आज जो सब मुझे मिल गया वह मेरा आनंद से भरपूर जीवन सुनिश्चित कर रहा है।  

बेटी के स्कूल से लौट के आने पर, फिरदौस की विचार तंद्रा भंग हुई थी। तब वह बेटी के साथ व्यस्त हो गई थी। 

एक रात हरिश्चंद्र जी ने अपने आलिंगन में उसे हल्के से लेते हुए, फिरदौस की पलकों पर चुम्मी ली थी। फिर पूछा - 

फिरदौस, अपने विवाह को एक साल से अधिक हो गया है। तब से आप कभी अपने अब्बा-अम्मी के घर नहीं गईं हैं। क्या, आप का, वहां जाने का मन नहीं करता है?

फिरदौस, पति के प्यार भरे आलिंगन का सुख अनुभव करने में व्यस्त थी। जिसमें वह अभी कोई विघ्न नहीं चाहती थी। फिरदौस ने इसे अनसुना किया था। 

गालों पर लाज की लालिमा एवं पलकें झुका, फिरदौस का चेहरा, हरिश्चंद्र जी को किसी अप्सरा से कम नहीं लग रहा था। 

फिरदौस गर्भावस्था के कारण सहज रूप से कुछ मोटी हो गई थी। जिससे उसका मुखड़ा, पहले से अधिक खिला एवं आकर्षक हो गया था। 

हरिश्चंद्र के मन में उस पल एक द्वन्द उभर आया कि फिरदौस का तन ज्यादा सुंदर है या मन? 

हरिश्चंद्र जी तो जज थे। सभी पक्ष पर विचार, उनका स्वभाव बन चुका था। अपने इस द्वंद में उन्होंने, मन के पक्ष में निर्णय दिया। उनका न्याय कहता था कि तन का आकर्षण कुछ वर्षों की बात है, जबकि मन की सुंदरता की आवश्यकता आजीवन रहती है। 

कुछ मिनट यूँ ही बीते तब, फिरदौस से, हरिश्चंद्र जी ने प्रश्न दोहराया था। इस बार, उनींदे स्वर में फिरदौस ने कहा - 

मेरा मन, अब आपसे दूर जाने का नहीं होता है। यह भी तो है ना कि अब्बा-अम्मी, महीने दो महीने में यहां ही तो आ जाया करते हैं। 

तब हरिश्चंद्र जी ने, फिरदौस की पीठ पर, अपने हाथों का दबाव हल्का बढ़ाते हुए कहा - 

मेरी प्रियतमा जी, ना चाहते हुए भी कुछ दिनों की ऐसी दूरी, समाज परम्परा के लिए सहन की जाती है। 

फिर तीसरे दिन फिरदौस, बेटी को लेकर अपने अब्बा-अम्मी के घर पहुँच गई थी। वहां पहुंचते ही सबसे पहले अम्मी से, फिरदौस ने कहा - 

अम्मी, तीन चार या जितने दिन मैं, यहाँ रहूंगी। तब तक कृपया, घर में मांस न पकवाया कीजिये। 

अब्बा सुन रहे थे, वे बोले - बेटी फिरदा, आप, कितने जायके ले लेकर खाया करती थीं। हरिश्चंद्र साहब ने सब छुड़वा दिया, आपसे?

फिरदौस ने उत्तर दिया - अब्बू, उन्होंने नहीं छुड़वाया है। पहले मैं भी सोचती थी कि मैं, यहाँ आकर अपने खाने के शौक पूरे किया करूंगी। मगर अब उसकी इच्छा नहीं रही। 

अम्मी ने व्यग्र होकर पूछा - आखिर क्यों, फिरदा?

फिरदौस ने कहा - दो बात हैं। पहली, मेरे साथ बेटी है। जिसे मैं, मांस (पकता) दिखाना नहीं चाहती। 

अब्बू ने पूछा - और दूसरी?

फिरदौस ने कहा - मेरे गर्भ में पल रहा बच्चा, मेरे शाकाहारी पति का है। मैं नहीं चाहती की मेरे गर्भ में उसका पोषण, मांसाहार से मेरे शरीर को मिले तत्व से हो। 

अब्बू-अम्मी आश्चर्य में थे। अम्मी ने कहा - 

कितनी गहराई से सोचने लगी हो, आप फिरदा! 

फिरदौस ने कहा - अम्मी, सब अच्छे पति की संगत का असर है। उसके (पूर्व शौहर) साथ रहती तो जीवन की यह गहराई, कभी अनुभव नहीं कर पाती ..                         

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

25-11-2020


Tuesday, November 24, 2020

दिव्य शक्ति (7) ..

 दिव्य शक्ति (7) .. 

अनन्या को मैं, उसके बँगले के गेट पर छोड़ रहा था। तब उसने अंदर चल कर आंटी से मिलके जाने की बात कही थी। आंटी के मान के विचार से मैं, मना नहीं किया था। मुझे आया देख आंटी, बहुत खुश हुईं थीं। उन्होंने लंच के लिए बहुत आग्रह किया था। मैं पहली बार उनके घर आया था, उनके इस आग्रह का मैंने आदर किया। फिर हम तीनों ने, साथ लंच लिया था। 

लंच खत्म किये जाते ही आंटी का कोई कॉल आ गया था। अनन्या और मुझे बातें करने को कहते हुए वे, कॉल सुनने अलग कमरे में चलीं गईं थीं। 

अनन्या मुझे, लॉन में ले आई थी। वहाँ, लॉन चेयर्स पर हम बैठ गए थे। अब, तक अनन्या की बताई गई बातों पर मुझे क्या कहना है मैं, तय कर चुका था अतः यहाँ वार्तालाप, मैंने आरंभ किया। अनन्या से मैंने कहा - अनन्या, जैसा आपने बताया है कि

“दो वर्षों में आपका स्कूल लड़कियों के चाल चलन की दृष्टि से आदर्श सा हो गया है”,  

उससे मुझे, यह लगता है कि आपके साथ में कोई दिव्य शक्ति है। जिसके दिव्य प्रभाव से, आपके आस पास के बुरे लड़के-लड़कियों के आचरण भी अच्छे हो जाते हैं। मैंने, दिव्य शक्तियों के विषय में पढ़ा है कि उसके साथ होने पर, ऐसी शक्ति की चर्चा किसी अन्य से करने एवं अपने स्वार्थवश किसी से छल करने पर वह, साथ छोड़कर चली जाती है। 

अतः मेरा परामर्श है कि आप, इस बारे में किसी से नहीं कहें। और ना ही स्वार्थवश कभी किसी से कोई छल करें। आपके साथ दिव्य शक्ति का होना, आपके जीवन में आपसे, समाज भलाई के कार्य करवाएगा। (फिर प्रश्नात्मक स्वर में ) अनन्या, समझ रहीं हैं ना आप, मैं क्या कह रहा हूँ?

यह सब सुनते ही अनन्या चौंक गई थी वह बोली - ओह, मैंने कॉलेज से वापिस आते हुए अपने जिस सपने वाली बात आप से कही थी। उस सपने के अंत में अभी जो आप कह रहे हैं लगभग ऐसे ही शब्द आपने, मुझसे कहे थे। 

कल का मेरा सपना और आज आप का वैसा ही कहना मुझे, साधारण संयोग नहीं लग रहा है। मुझे, निश्चित ही लगता है कि आप के बताये अनुसार, ऐसी कोई दिव्य शक्ति मेरे साथ है। 

फिर अचानक वह अपनी कुर्सी से उठी और मेरे पास आकर मुझसे बोली - आप, मुझसे आँख मिलाइये तो जरा? 

अनन्या के अचानक ऐसा करने से, यह सोचकर मैं, सकपका गया कि अनन्या आखिर चाहती क्या है? फिर यही प्रश्न लिए मेरी आँखे, उसकी आँखों से मिल गई थीं। 

तब अनन्या अत्यंत ही आवेशित स्वर में कह उठी - 

देखिये, देखिये तो, हमारी आँखों से जो इंद्रधनुषी किरणों का आदान प्रदान हो रहा है। उस में, किरणें पहले आपकी आँखों से उत्सर्जित हो रही हैं। जो मेरी आँखों में प्रविष्ट होने के बाद तब, मेरी आँखों से निकल कर आपकी आँखों में पहुँच रही हैं। 

मुझे लगता है जो आप, मुझमें बता रहे हैं वैसी दिव्य शक्ति आप में, मुझसे अधिक प्रखरता में है। 

अनन्या का आईक्यू बहुत अच्छा था वह, तीव्रता से तथ्य जान ले रही थी। मैंने तब कहा - 

अनन्या, मैंने आपको बताया है ना कि शक्ति की चर्चा करने से, उसके साथ छोड़ने का खतरा होता है।

अनन्या ने सिर हिलाया फिर वापस अपनी सीट ग्रहण की। वह मेरी बात में साइलेंट “हाँ”, मेरे बिना कहे समझ गई थी। अब उसने कहा - 

आपने, एक और बात मुझे बताई है कि स्वार्थ में पड़ने से भी यह शक्ति, साथ छोड़ सकती है। इससे मुझे एक बात का डर लग रहा है। 

मैंने पूछा - किस बात का?

अनन्या ने बताया - मैं, उस एक्सीडेंट के बाद, आपके बारे में मम्मी-पापा से सुनने पर, तभी से अपने हृदय में आपके लिए प्यार अनुभव करने लगी हूँ। कहीं ऐसे में यह शक्ति मुझसे, रूठ तो नहीं जायेगी?

यह सुनकर मैं, हतप्रभ हुआ कि किस सहजता से अनन्या ने अपना, मुझसे प्यार होना बता दिया है। मैंने उससे कहा - 

अनन्या प्यार का होना तो अत्यंत निर्मल भाव है। देखो ना, ईश्वर तो सभी प्राणियों के लिए प्यार रखते हैं। प्यार होने से आप के साथ रहने वाली शक्ति, आपसे रूठेगी नहीं। जब तक कि इसमें, कोई छल या आपकी, अपनी अपेक्षा नहीं जुड़ जायेगी। 

अनन्या कम बताओ ज्यादा समझ लेने वाली लड़की थी। मेरे उत्तर से उसने समझ लिया कि उसका प्यार एकतरफा नहीं है। उसने प्रत्युत्तर में कहा - 

मैं, समझ गई आप मुझे, अपने इस प्यार को, ऐसे ही रखने की कह रहे हैं जैसे, आप मुझसे निरपेक्ष रुप से प्यार करते हैं। 

अब मेरा उससे ना या हाँ कहना औचित्यहीन था। मैंने, एक मधुर मुस्कान के साथ विदा ली थी। अनन्या भी ऐसे ही मुस्कुराई थी। अब उसके मुख पर उसके आत्मविश्वास में वृद्धि साफ़ परिलक्षित थी। 

फिर कॉलेज का नया शिक्षा सत्र प्रारंभ हुआ था। अनन्या गर्ल्स हॉस्टल में आ गई थी। वह कभी कभी मुझ से, कॉलेज कैंपस में कहीं कहीं मिलने आया करती थी। कॉलेज में मेरे साथ दिव्य शक्ति होने से, पहले ही छात्रों में आदर्श चरित्र का वातावरण बना हुआ था। अनन्या के भी आ जाने से, नए आये विद्यार्थियों में द्विगुणा तेजी से, यह अच्छाई आने लगी थी। 

अतः मुझे, हम दोनों के साथ होने पर, दिव्य शक्ति का हममें, पहले से अधिक शक्तिशाली रूप में होना, प्रतीत हो रहा था। 

ऐसे में नवरात्रि पर्व आ गए। पढ़ाई एवं क्लासेज के साथ साथ मैंने, डिटेक्टिव तौर पर शहर घूमा था। मुझे सूचनायें मिली थीं कि बहुत से ऐसे लोग, जिनकी श्रद्धा धर्म तथा देवी माँ में कम (या नहीं) है, वे भी माता रानी की भक्ति में आयोजित गरबा कार्यक्रम में, फ्लिर्टिंग के लक्ष्य से भाग लेने वाले हैं। 

तब मैंने, दिव्य शक्ति के अधिक शक्तिशाली रूप के, अपने विचार की पुष्टि के लिए, एक योजना तय की। नवरात्रि की पूर्व संध्या पर, अनन्या, मुझसे मिली तो मैंने, उससे रोज रात्रि आयोजित होने वाले गरबा में साथ हिस्सा लेने का प्रस्ताव किया। अनन्या ने निःसंकोच उसे मान लिया। 

उसी रात्रि हमने, गरबा परिधान के कुछ जोड़े खरीदे। अगली रात्रि हम, डांडिया लेकर हजार से अधिक जोड़ों के बीच गरबा डांडिया कर रहे थे। नृत्य करते हुए, हम देख रहे थे कि हमारी आँखें, जब जब मिलती तब तब इंद्रधनुषी किरणें हम दोनों की आँखों से निकल कर स्क्वायर (वर्गाकार क्षेत्र में) होकर, पूरे स्थल में प्रसारित हो रही थी। 

यह देखना मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय था। इसके पूर्व जब मैं, अकेला था और किसी की बुरी दृष्टि वाले की आंखों में देखा करता तब ये किरणें पंक्तियों में (लीनियर) उसकी आँखों में प्रविष्ट होती थीं। अर्थात तब का नेत्र उपचार, वन टू वन होता था।  

मगर अनन्या एवं मेरी दृष्टि के मिलने से अब किरणें, स्क्वायर हो रही थीं। जो वहाँ वर्गाकार क्षेत्र में फ़ैल कर एक साथ अनेकों की आँखों में प्रविष्ट होकर उनकी अनैतिक तथा अति कामुक वासना के जाले को साफ़ कर रहीं थीं। वहाँ बार बार चमक जाती इंद्रधनुषी किरणें, हमें पता थी कि हमसे उत्सर्जित हैं। जबकि लोगों को ऐसा, डेकोरेटिव लाइटिंग के कारण होता लग रहा था। 

ऐसे इन इंद्रधनुषी किरणों ने अपना काम कर दिखाया था। तुरंत ही जोड़ों के आचरण में निर्मलता देखने मिलने लगी थी। बहुत से लड़के जो बिना श्रद्धा लड़कियों से फ़्लर्ट करने वहाँ आये थे। इन इंद्रधनुषी किरणों के प्रभाव से सुधर कर गरबा छोड़, चले जा रहे थे। ऐसा नौ दिनों, हमने किया था। हमें इसका व्यापक अच्छा प्रभाव देखने मिला था। 

शहर के बहुत से बुरे लड़कों के संस्कार ठीक हो गए थे। शहर में अचानक ही लड़कियों, युवतियों आदि को लेकर अपराध में कमी आने लग गई थी। समाचारों में इसे, इस नवरात्रि का अच्छा परिणाम निरूपित किया गया था। अनन्या और मैं, अपनी इस सफलता को समझ रहे थे। मगर हमने आपस की बातों में भी, यह चर्चा नहीं की थी।  

अब मुझे सुनिश्चित हो गया कि दिव्य-शक्ति, अनन्या और मुझे साथ रख हमारे माध्यम से, राष्ट्रीय स्तर पर, बड़े समाज की रीति नीति सुधार देगी।  इस सफलता से हम दोनों अभिभूत थे। 

मेरा यह मानना था कि हमारे समाज का बड़ा वर्ग, सिने सेलिब्रिटी को फॉलो करता है। 

और, 

यदि इन सेलिब्रिटी की आँखों से अनैतिक वासना का ज्वाला साफ़ किया जाये तो समाज में सुखद अच्छे परिणाम शीघ्रता से देखने मिल सकते हैं।   

इस तथ्य के ध्यान आने पर, मेरे जननक्षम दिमाग में एक योजना आई कि वार्षिक सिने पुरस्कार समारोह में जिसमें, अनेक सेलिब्रिटी एक साथ उपस्थित होते हैं उसमें, किसी तरह अनन्या एवं मैं साथ जायें। फिर गरबा में हमसे उत्सर्जित तरह की रेनबो स्क्वायर रेज़ से, एक साथ अनेकों की नेत्र दृष्टि का उपचार करें। 

मगर 

मेरी समस्या यह थी कि उस समारोह में हमें, प्रवेश कैसे मिले। तब, अपनी योजना एवं समस्या मैंने, अनन्या को बताई। 

इस पर अनन्या ने कहा - मेरे पापा (डॉ. देसाई) के एक मित्र, बड़े फिल्म निर्माता हैं। उनसे, कार्यक्रम के दो फ्री पास की कोशिश की जा सकती है। 

मैंने कहा - अनन्या, इस कार्यक्रम को लेकर अपना क्रेज़ दिखाते हुए, पापा से दो फ्री पास के लिए कहो। 

फिर अनन्या ने ऐसा ही किया। भाग्य हमारे साथ था। वार्षिक सिने पुरस्कार वाले दिन के पहले हमें दो पास आ गए थे। कार्यक्रम में हम दोनों, पूरे समय उपस्थित रहे थे। वहाँ साथ बैठे हमने, अपनी आँखे अनेकों बार, चार की थी। जिस से अनेकों बार पूरे स्थल में इंद्रधनुषी किरणें फैली थीं। इस समारोह के कवरेज के लिए अनेकों न्यूज़ मीडिया के लोग भी थे। सभी रेनबो रेज़ में एक्सपोज़ हुए थे। 

फिर हम वापिस आ गये थे। कार्यक्रम की रिपोर्टिंग इस बार गरिमा पूर्ण ढंग से हुई। सिने लोगों की चर्चायें, उनके लिव इन रिलेशन या एकाधिक प्रेम प्रसंगों के चटकारे लेकर और उन्हें महिमामंडित किये जाने वाले फूहड़ अंदाज में होनी बंद हुईं। 

वहाँ के लोगों में जो लिव इन रिलेशन में रह रहे थे, उन्होंने विवाह कर लिए। वहाँ विवाहेत्तर संबंधों के सिलसिलों पर विराम लगने लगा। वहाँ बहुत से कास्टिंग काउच एक्सपोज़ हुए। कुछ पर केस चले, उन्हें सजा भी मिली। 

सब में बड़ी उपलब्धि तब मूवीज की थीम सामाजिक प्रेरणा को देने वाली हो गई। 

मूवीज में से हत्या, बलात्कार, उन्मुक्त प्रणय दृश्य, फूहड़ डायलॉग्स-गाने तथा गालियों के दृश्य को विराम लग गया। संक्षेप में कहें तो मूवीज ऐसी बनने लगीं जिनसे संस्कृति, शालीन-शिष्टाचार, अनुशासन तथा गरिमा युक्त सौहार्द व्यवहार की प्रेरणा का प्रसारण होता था। 

दर्शक अब, मूवी देखते तो उन्हें, उसमें से अपराध करने के नए नए ढंग नहीं सूझा करते बल्कि आदर्श में जीने के विचार मिलते थे। 

यह सुधार अचानक उस रात के इवेंट से कैसे ट्रिगर हो सका, यह कोई नहीं जानता था। सिर्फ अनन्या और मैं, इसे जान रहे थे और अत्यंत प्रसन्न हो रहे थे ..         

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

24-11-2020


Monday, November 23, 2020

नई फिरदौस ...

 नई फिरदौस ...

इन दिनों में इधर, हरिश्चंद्र सोचने लगे थे कि फिरदौस, उनसे हुए अलग कौम के विवाह को निभाने के लिए बड़े त्याग कर रही है। जबकि उधर, फिरदौस के प्रत्यक्ष में बदले लग रहे व्यवहार का कारण कुछ और ही था। 

फिरदौस ने इसका राज, पति हरिश्चंद्र पर खोलने में, कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई थी। वह सोचती थी कि हरिश्चंद्र जी के भी इस विवाह के पीछे, इसमें मिलने वाले सुख के अतिरिक्त, कुछ पावन लक्ष्य निश्चित ही होंगे। कौनसा वे, अपने इन विचारों को, फिरदौस से शेयर करते हैं।

विवाह को, अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं। हरिश्चंद्र जी, फिरदौस को पूरी तरह अभी ही जान लें इसकी जल्दबाजी की जरूरत, अभी ही क्या है? 

फिरदौस सोचती कि आजीवन का साथ निकल जाता है। तब भी प्रायः पति-पत्नी के बीच कुछ राज, उनके कुछ विचार या परस्पर सुखमय साथ के लिए किये गए त्याग से, पति-पत्नी अनजान ही रह जाते हैं। 

एक दूसरे से छुपा लेना, कोई बुरी भावना से ही थोड़ी होता है। कभी कभी अच्छा किया जतला देना, उसकी अच्छाई कम कर देता है। यह सोचकर भी अपनों में, अपनी की जा रही अच्छाई छुपा ली जाती है। ऐसे छुपा जाने में आनंद अधिक आता है। 

यह भी तथ्य फिरदौस जानती थी कि पति और पत्नी कुछ समय के साथ में ही, दूसरे की बिन बताये की जा रही (बुराई)-अच्छाई, परस्पर अनुभव कर लेने की समझ प्राप्त कर लेते हैं।     

अपने, नए साथ, नए घर में फिरदौस का जीवन चल निकला था। तब एक दिन, कोर्ट में फिरदौस का कोई भी केस सुनवाई में नहीं लगा था। उस दिन उसने, कोर्ट जाने की जगह घर में आराम करना पसंद किया। दोपहर तक बिटिया स्कूल से वापिस आ चुकी थी। दोनों ने भोजन भी कर लिया था। बेटी, माँ (फिरदौस) के साथ ख़ुशी ख़ुशी खेल-थक कर सो गई थी।

तब बिटिया के बाजू में, बिस्तर पर लेटे-लेटे फिरदौस, पिछले कुछ दिनों के बीते घटनाक्रम को याद करते हुए उसमें डूब गई थी। कुछ ही माह के समय में, उसके जीवन में अत्यंत बड़े बड़े बदलाव आ गए थे। 

उसका शौहर, उसका ससुराल, उसका खान पान उसका पहनावा बदल गया था। और तो और उसे, अपनी धार्मिक आस्था भी बदलती प्रतीत होने लगी थी। वह सोचने लगी थी कि शायद ये बदलाव इतने आसान नहीं होते- 

अगर उसके पूर्व शौहर ने उसे, तीन तलाक कह कर, उस दिन, उस सुनसान जगह बाइक से उतार ना दिया होता। वह जगह, शौहर के जाने के बाद फिरदौस को अत्यंत भयावह लगी थी। डर कर वह, एक पेड़ के पीछे छुप कर बैठ गई थी। 

वह छुपी रहते हुए, सड़क पर इस आशा से दृष्टि डालती कि कोई महिला सड़क पर आते जाते दिखे तो उसके साथ वह वीरान जगह से सुरक्षित निकले। तब, ग्रामीण सड़क होने से, उस पर से यदा कदा कोई राहगीर या वाहन निकलता दिखाई पड़ रहा था। वे सभी ही पुरुष थे, दुर्योग से उस दिन उनके साथ कोई औरत नहीं दिखी थी। 

लगभग दो घंटे की यातना देने वाली प्रतीक्षा में, उसके नकारात्मक विचारों ने उसे अत्यंत भयभीत कर दिया था। उसके पूर्व कभी उसे लड़की/औरत होने का इतना डर नहीं लगा था। 

मनो-मस्तिष्क पर नकारात्मक विचार हावी होने से उस पर गहन निराशा छा गई थी। उसके शौहर के द्वारा तलाक दे दिए जाने से उसे, अपना भविष्य अंधकारमय दिख ही रहा था। सुनसान जगह पर बीत रहा हर पल उसे युगों सा लंबा लग रहा था। 

ऐसे में उसे एक डरावना विचार आ गया था कि कोई इंसान वेश में फरिश्ता उसे, यहाँ मिल ना सकेगा। फिर रात हो जायेगी, तब अंधकार में उसके खाँसने-छींकने की आवाज सुन कर कुछ मर्द उसे पेड़ के पीछे से, खोज लेंगे।

वे सब उस पर सामूहिक तथा कई कई बार दुराचार करेंगे। फिर सुबह का उजियारा होने के ठीक पहले, उसकी गर्दन मरोड़ कर उसे मार डालेंगे। 

इस विचार से वह सिहर गई थी उसका गला सूख गया था मगर तर कर लेने को उसके पास, पानी भी नहीं था। 

तब उसे लगा कि उसका भविष्य अंधकारमय है यह तो कम मुश्किल की बात है। अधिक दुःखदायक तो उसका कोई भविष्य ही नहीं बच पाना दिख रहा है। 

निराशा के इस हद तक बढ़ जाने ने तब उसमें, आश्चर्यजनक साहस का संचार कर दिया था। उसने सोचा अभी छुपे रहकर, रात में इसी पेड़ के पीछे मारे जाने से बेहतर, यहाँ से पैदल ही चल देना है। हो सकता है, वह सुरक्षित निकल जाए या कोई खुदा का बंदा या फरिश्ता उसका मददगार बन कर आ जाये। 

तब फिरदौस ने अपना बुर्का ठीक किया और सड़क पर आ गई थी। निराश एवं प्यासी होने से उससे चला नहीं जा रहा था। संध्या का धुंधलका छाने लगा था ऐसे में तब उसे, अपने पीछे से एक कार का क्रमशः पास आता शोर सुनाई दिया था। 

फिरदौस ने, अपनी सारी हिम्मत बटोर कर उसे रोकने के लिए हाथ दिया था, जिससे कार रुकी थी। उसे लिफ्ट मिल गई थी। उसे, कुछ मिनट लगे थे तब उसने, कार वाले प्रौढ़ व्यक्ति का, सज्जन होना जान लिया था। 

उस दिन कार में बैठे बैठे, उसने अनुभव किया कि पूर्व वाली फिरदौस, उस पेड़ के पीछे मर चुकी है। यह फिरदौस अब नई जन्मी फिरदौस है। कार में ही उसने, तय कर लिया था कि यह “नई फिरदौस”, दुनिया को अब नई दृष्टि से देखेगी। 

पिछली सभी धारणाएं जो उसके मन में घर किये बैठी हैं। उन्हें वह, मन से निकाल फेकेंगी। अपने दिलो दिमाग को खुला रखेगी एवं अपने में, उन परिवर्तनों का स्वागत करेगी जो उसे तर्कसंगत प्रतीत होंगे। ऐसे इस नई फिरदौस की नई सोच की उम्र, अब छह महीने की हुई थी। 

इसमें ही उसने शक्की एवं दक़ियानसी पूर्व शौहर को, उसके कानून विरुध्द कार्य (तीन तलाक) का दंड दिलवाया था। फिर पूर्व शौहर के रजामंदी की पेशकश को ठुकरा कर, खुद कानून मान्य विधि से डिवोर्स लिया था। 

जज हरिश्चंद्र के विवाह प्रस्ताव को, कार वाले व्यक्ति की भलमनसाहत का स्मरण करते हुए स्वीकार किया था। हरिश्चंद्र जी ने उसे पहली ही रात बुर्का उपहार किया था। पेड़ के पीछे उस दिन पुरानी फिरदौस, बुर्का पहन कर ही बैठी थी। बुर्के के होने से तब उसका भय कम नहीं हो सका था। 

वास्तव में, कोई युवती बुर्के के होने या ना होने से निर्भया नहीं हो जाती है। बुर्के में होना तो उस दिन उसके अन्य कौम की होने की साफ पहचान दे रहा था। जिससे कार वाला व्यक्ति, उस पर दुराचार को अधिक उत्सुक हो सकता था। 

यह दुःखद तथ्य तो स्वयं अधिवक्ता होने से फिरदौस भली तरह जानती थी कि कौमी वैमनस्य की बलि, कोई अन्य कौम की औरत ही ज्यादा चढ़ती है। 

अतः नई फिरदौस ने, इस तर्क पर बुर्का त्याग दिया कि सभी नारी, बुर्के में या बुर्के बिना, समान रूप सुरक्षित या असुरक्षित रहती हैं। तब बुर्के की बंदिश को, अपने नए घर में जहाँ इसकी बाध्यता नहीं है, आखिर क्यों ढोना?  

आरंभ में, अपने नए इस घर में फिरदौस ने मांसाहार की इच्छा भी की थी। लेकिन कुक के अभिमान पूर्वक यह कहने से कि -

“नहीं, नहीं मैडम जी, हम मांसाहार ना तो खाते हैं ना ही बनाते हैं, हम ब्राह्मण हैं”। 

नई फिरदौस ने, शाकाहार में अभिमान होने की बात क्या है, अनुभव करने का फैसला किया था। फिर हरिश्चंद्र जी के चाहे जाने पर भी घर में, मांसाहार पकाने को दृढ़ता से मना कर दिया था। 

इतना सब सोच कर फिरदौस स्वयं ही हँस पड़ी थी। उसने, हरिश्चंद्र जी पर दया अनुभव कि वे, जिसे फिरदौस के त्याग समझ रहे हैं। वह वास्तव में नई फिरदौस की तार्किक अच्छी बातों को स्वीकार करने का संकल्प है। फिर फिरदौस की नींद लग गई थी।  

अगले दिन कुक ने छुट्टी ली थी। संयोग से वह दिन रविवार था। हरिश्चंद्र जी ने फिरदौस से कहा - 

चाय नाश्ता आप बनाइये, लंच, आज मैं बनाऊँगा। 

फिरदौस ने हँसकर कहा - 

जी, आप के द्वारा बनाया, खाना कुछ गिने चुने लोगों के भाग्य में ही होगा। मैं, भाग्यवान हूँ जिसे वह खाने को मिलेगा।  

दोपहर, डाइनिंग टेबल पर हरिश्चंद्र जी ने अपने हाथों से टेबल पर अपना बनाया खाना लगाया था। फिर, बेटी, फिरदौस सहित स्वयं उन्होंने, साथ ही भोजन आरंभ किया था। 

हरिश्चंद्र ने पूरी-छोले एवं आटे का हलुआ बनाया था। साथ ही फ्रूट एवं वेजिटेबल सलाद, सुंदर सजावट के साथ टेबल पर रखी थी। फिरदौस ने जब यह सब खाया तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उसने चटकारे ले लेकर खाते हुए कहा - 

मैं, कुछ दिनों पहले तक यह सोच भी नहीं सकती थी कि शुद्ध शाकाहारी भोजन इतना स्वादिष्ट हो सकता है। और बड़ी बात यह भी है कि इसमें प्याज-लहसून तक नहीं है। आप विश्वास करो, आज के पहले मुझे खाना इतना रुचिकर कभी नहीं लगा, जितना रुचिकर आज लग रहा है। 

हरिश्चंद्र ने परिहास करते हुए कहा - 

कोई और खाना, आपको इतना अच्छा लग ही नहीं सकता था, कारण किसी अन्य के बनाये खाने में मेरा, आपके लिए वाला प्यार, मिलाया ही नहीं जा सकता था। 

फिरदौस खिलखिला कर हँस पड़ी थी साथ ही बेटी भी हँसने लगी थी। फिर फिरदौस ने ओवर ईटिंग की और कहा - 

बस, अब आगे से कभी आप, भोजन नहीं बनाया कीजियेगा अन्यथा मैं, मोटी हो जाऊंगी। 

हरिश्चंद्र हाजिर जवाब किस्म के व्यक्ति थे। उन्होंने कहा - तब तो मुझे, बार बार भोजन बनाना होगा। 

फिरदौस ने कारण जानने की उत्सुकता से पूछा - जी, वह क्यों?

हरिश्चंद्र जी ने फिरदौस की नकल करते हुए कहा - जी, वह यों कि मुझे, अपनी पत्नी का मोटी होना बहुत पसंद है। 

ऐसे, किसी दिन जीवन की आशा खो बैठी फिरदौस के दिन अब इतनी हँसी ख़ुशी में बीतने लगे थे, जितनी ख़ुशी से बिरली किसी औरत के बीतते हैं …  

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

23-11-2020

Sunday, November 22, 2020

दिव्य शक्ति (6) ..

 दिव्य शक्ति (6) .. 

अनन्या से मेरी, तीन मुलाकातें और हुईं थीं और 2 वर्ष बीत गए थे। अनन्या के एक्सीडेंट वाले दिन के बाद ऐसे उससे, मेरी कुल 5 भेंट हुई थी। जो सभी हमारे पेरेंट्स की उपस्थिति में हुई थीं। 

अनन्या, मेरी छोटी बहन आयुषी की फ्रेंड हो चुकी थी। ऐसे में यह सहज बात होती कि अनन्या, आयुषी की देखा देखी मुझे, भैया संबोधित करने लगती। तब भी, अब तक मेरे से हुए उसके संक्षिप्त वार्तालाप में उसने, कभी मुझे भैया नहीं कहा था। बल्कि यह भी तथ्य था कि मुझे, देखने के बाद उसकी पलकें झुक जाया करती थीं। 

मैंने अनन्या को लेकर जब कभी भी विचार किया था तब उसे अपनी बहन जैसे नहीं सोचा था। उसे प्रेयसी, जैसा देखना मेरे लिए गए संकल्प, अनुसार इस समय के लिए वर्जित था। अपनी भावनाओं पर तो मेरा नियंत्रण था मगर यदि अनन्या, मुझे अपने ह्रदय में अपने साजन जैसा स्थान देती हो तो उस पर मेरा कोई वश नहीं था। 

मेरा छठा सेमेस्टर पूरा हुआ था और मैं, अवकाश में घर आया हुआ था। तब एक दिन अनन्या घर आई। अभी मैं, बीस वर्ष का और वह 17 वर्ष की थी। अन्य बार से अलग इस बार वह अपनी मम्मी के साथ न होकर, अकेली कार खुद लेकर आई थी। मैंने, उसे कार से उतरते हुए देखा था। मुझे लगा वह आयुषी से मिलने आई है। 

कुछ देर में आयुषी, अनन्या को लेकर मेरे पास आई एवं मुझसे बोली - 

भैया, अनन्या आपसे बात करना चाहती है। तब मैंने, अनन्या की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा था। इस क्रिया में हमारी आँखे मिली थीं। रैनबो रेज़ का आदान प्रदान हमारी आँखों में होता हुआ, मैंने फिर देखा था। इससे मुझे यह स्पष्ट समझ आ गया कि हम दोनों के बीच विशेष कुछ है। जिसे मैं नहीं जानता हूँ। 

फिर अनन्या ने पलकें झुका ली थीं। ऐसे ही अपनी पलकें झुकीं रखते हुए अनन्या ने, हाथ जोड़कर मुझसे नमस्कार किया था। मैंने भी हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया था। तब वह कुछ बोलती इसके पूर्व ही मैंने, अनन्या से पूछा - आपके पास ड्राइविंग लाइसेंस है?

वह डर गई थी उत्तर में कहा - नहीं, अभी मेरी लाइसेंस की उम्र नहीं हुई है?

मैंने थोड़े शुष्क स्वर में कहा - आप, पिछले हादसा भूल गई हो क्या?  

अनन्या ने दबी आवाज में कहा - मैं, ड्राइवर के साथ में होने पर ही कार चलाया करती हूँ। आज ड्राइवर काका, नहीं आये हैं। आपसे बात करनी थी इसलिए अकेली आ गई, सॉरी। 

अनन्या के ऐसे डरने से मुझे उस पर दया आई। मैंने स्वर में मिश्री घोलते हुए कहा - 

चलो, आगे ध्यान रखना। (फिर पूछा) बताओ क्या बात करनी है?

अनन्या अब सहज हुई, उसने कहा - 

मेरा मेडिकल प्रवेश परीक्षा का परिणाम आ गया था। मुझे, आपके वाले कॉलेज में ही एडमिशन मिल रहा है। कल कॉलेज जाकर प्रवेश की औपचारिकताएं पूरी करनी है। 

मैंने बीच में ही अनन्या की बात काटी और प्रसन्नता से हँसते हुए कहा -

अनन्या बहुत बहुत बधाई, आप ने डॉक्टर बनने का लक्ष्य रखा था। इससे वह, अब आपके लिए सुलभ हो गया है।

तब आयुषी ने अनन्या के गले में बाहें डालकर, उसके गाल पर चूमते हुए कहा - वाह वाह अनन्या! बधाई, बधाई, बहुत बहुत बधाई! 

आयुषी ने शरारत से हर बधाई कहने के बीच में, अनन्या के गालों को चूम लिया था। मेरे सामने होने के कारण, आयुषी की इस हरकत पर, अनन्या लजा गई थी। ऐसे में उसके मुख पर सूर्योदय की सी लालिमा उभर आई थी। तब उसका किशोरवय आभावान मुखड़ा, सूर्य के भांति ही दमक गया था। उसकी घनी पलकें झुक गईं थीं। 

मैंने, आयुषी की शरारत के लिए, उसे आँखें दिखाई थीं। आयुषी ने, अपने कान पकड़ कर, आँखों में ही क्षमा याचक से भाव दिखाए थे। अनन्या की पलकें झुकी होने से, वह इसे नहीं देख सकी थी।  

तब सप्रयास अनन्या ने स्वयं को संयत किया था। उसने अपने साथ लाया मिठाई का उपहार पैक मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा - 

यह मम्मी ने आप सभी का मुहँ मीठा कराने के लिए भिजवाया है। मैंने, वह पैक ग्रहण किया था। 

उसे छेड़ने वाली कोई बात न कहते हुए मैंने, स्नेह एवं सरलता से कहा - आभार, आपका। 

अनन्या ने तब पूछा - मुझे यह पूछना है कि क्या कल आप, मेरे साथ कॉलेज चल सकते हैं? कल पापा, ज्यादा व्यस्त रहने वाले हैं। 

मैंने कहा - बिल्कुल अनन्या, मैं चल सकता हूँ। 

अनन्या ने कुछ कहने की जगह हाथ जोड़कर ही, आभार प्रदर्शित किया था। फिर वह आयुषी के साथ अलग कमरे में चली गई थी। 

अगले दिन मैंने, अनन्या को उसके घर से पिक किया था। मुझे स्मरण आया कि कार में इसके पूर्व जब, वह मेरे साथ थी तब, अचेत होने के कारण, मेरे द्वारा पिछली सीट पर लिटाई गई थी।  यह पहली बार था कि आज वह, मेरे साइड वाली सीट पर बैठी थी। 

मुझसे पिछली भेंटों की अपेक्षा इस बार, उसमें पूर्ण आत्म-विश्वास दर्शित था। मैं, चुप ही कार ड्राइव कर रहा था। तब सामने सड़क की ओर देखते हुए उसने मुझसे कहा - आपको एक बात बताऊँ? आप विश्वास नहीं करेंगे। 

मैंने सरलता से कहा - हाँ, कहो। 

अनन्या ने कहना आरंभ किया - 

दो अवसरों पर एक विचित्र बात, मैंने अनुभव की है कि मेरी आँखे, जब आपकी आँखों से मिलती हैं तब, आपकी और मेरी आँखों से मुझे, रेनबो रेज़ निकलती और आँखों में प्रविष्ट होते दिखती हैं। पहली बार जब ऐसा हुआ तब मुझे, यह अपना भ्रम लगा। साथ ही मैंने सोचा कि यदि यह अगर, मेरी आंखों का कोई रोग होता तो मुझे, अन्य किसी को देखते हुए भी ऐसा लगना चाहिए था। मगर अन्य किसी को देखते हुए मेरे साथ, ऐसा कभी नहीं हुआ। 

फिर जब कल मैं, आपसे मिली तब दूसरी बार, मेरी और आप की दृष्टि आपस में मिलने के समय मैंने, ऐसा अनुभव पुनः किया है। क्या आप, विश्वास करते हैं कि ऐसा होना संभव है? और अगर ऐसा हो रहा है तो क्या यह सामान्य बात है?

अनन्या के बताने से मुझे पुष्टि हो गई थी कि हमारे बीच ऐसा होता है। 

तब भी अनन्या को उत्तर देते हुए मैं, अत्यंत सतर्क रहना चाहता था। 

मैं नहीं चाहता था कि इसके पीछे दिव्य शक्ति होने की बात, अनन्या से कही जाने से ऐसा प्रचार हो जाए। मैंने कहा - 

अनन्या, यह कोई असामान्य बात नहीं है। ऐसा होने में मुझे, विशेषता मात्र यह लगती है कि आप, मुझे, अन्य सभी से अलग दृष्टि से देखती हो। 

अनन्या ने तब कहा - जी हाँ, यह बात तो है। आपने उस दिन मेरे प्राण रक्षा किये थे। अतः मेरी दृष्टि, आपको विशेष श्रद्धा से देखती है। 

इस पर मैंने कहा - आपके प्राण रक्षा मैंने नहीं, आपके पापा के उपचार ने किये थे। आपको, मेरे प्रति ऐसी श्रद्धा रखने की आवश्यकता नहीं है। 

अनन्या ने कहा - 

मुझे, मम्मी ने बताया था कि उस समय आपको कार चलाना ठीक से नहीं आता था। तब भी आपने, मुझे गंभीर घायल देखा तो आप किसी संभावित हादसे की परवाह नहीं करते हुए, कार से मुझे, शहर के बीच स्थित इंटरनेशनल हॉस्पिटल तक ले आये थे। ऐसे में क्यों मैं, आपको अपना नवजीवन प्रदाता नहीं मानूं?

मैं ऐसा श्रेय नहीं चाहता था अतः मैंने कहा - अनन्या इसे दूसरे कोण से देखो, मैंने ऐसा करके तब कितने राहगीरों और वाहनों पर दुर्घटना की आशंका उत्पन्न कर दी थी। 

अनन्या सरल हृदय लड़की थी। उसने सहमति से सिर हिलाते हुए कहा - 

जी हाँ, यह बात तो थी। किसी भी नौसिखिया को ऐसे अन्य किसी के ऊपर खतरा नहीं बनना चाहिए। मगर आपने, मेरे प्राणों पर संकट देख यह खतरा उठाया था। यह भी तो सत्य है,ना? 

मैं, चुप रह कर यह विषय बदलना चाह रहा था। मैंने, यह दर्शाया कि मेरा पूरा ध्यान अपने वाहन चालन में सड़क पर है। तब अनन्या ने अगली बात में मुझे घेर लिया था। 

उसने कहा - मैं, आपको विस्मित कर देने वाली एक और बात बताना चाहती हूँ। 

मैं ने संदिग्ध दृष्टि से उसे निहारा इसी क्रम में, हमारी आंखें मिली और फिर इंद्रधनुषी किरणों ने हमारी आँखों से आँखों तक जाने आने का मार्ग तय किया। 

इसे देख अनन्या ने फिर कहा - ओह! देखिये फिर वही किरणें। क्या आपने देखीं?

मैं असत्य कहना नहीं चाहता था। मैंने, अपने कंधे यूँ उचकाए जैसे कह रहा हूँ कि कैसी विचित्र बात करती हो,अनन्या? फिर अपनी दृष्टि सड़क पर केंद्रित कर ली। 

अनन्या आगे बताने लगी - 

हाँ, मैं बता रही थी कि दो वर्ष पहले जब आपकी और मेरी आँखों के बीच मैंने, इन इंद्रधनुषी किरणों को देखा था। तब से एक और बात मैंने अनुभव की है कि मेरी कुछ फ्रेंड्स, जिनके कुछ बॉयफ्रैंड्स थे और जो स्कूल में पढ़ने की जगह बेकार की बातों में पड़ती थीं, उन्होंने तब कुछ ही दिनों में ऐसी बात एवं हरकतें करनी बंद कर दीं थीं। बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि दो वर्षों में हमारा स्कूल लड़कियों के चाल चलन की दृष्टि से आदर्श सा हो गया है। 

अब मुझे लगा कि मेरे साथ की दिव्य दृष्टि, अनन्या के साथ भी काम कर रही है। अंतर यह बस है कि मुझे दिव्य शक्ति साथ होने का आभास है, अनन्या को नहीं है। 

यही सोचते हुए मुझे शंका हुई कि मुझे मेरा बारहवीं की परीक्षा के समय सपना देने वाली दिव्य शक्ति का डेरा, उस दुर्घटना स्थल पर था। उसी ने एक दुर्घटना के बहाने वहाँ अनन्या एवं मुझे इकट्ठा कर दिया था। संभवतः तब ही वह दिव्य शक्ति, मुझमें और अनन्या में समा गई। फिर दिव्य शक्ति ने मुझसे भली प्रकार से कार चलवा दी थी। उस समय मैं, पूर्ण चेतन अवस्था में था एवं अनन्या अचेतन थी। अतः दिव्य शक्ति की तीव्रता का अंतर दोनों में रह गया है। 

मुझे, विचारों में खोया देख अनन्या चुप रही थी। तभी हम कॉलेज की पार्किंग में पहुंच गए थे। ऐसे मुझे, अनन्या से इस विषय में आगे क्या कहना चाहिए और क्या नहीं, यह विचार करने का समय मिल गया था। 

कॉलेज में अनन्या की प्रवेश औपचारिकताएं पूर्ण करने में हमें अढ़ाई घंटे लगे थे। इस बीच हमने, कैंटीन में कॉफी भी पी थी। अब अनन्या से बात करते हुए, अनन्या से ज्यादा, मेरी पलकें झुकी हुईं थीं। मै अनन्या को इंद्रधनुषी किरणों पर फिर चर्चा का अवसर नहीं देना चाहता था। 

कॉलेज से लौटते हुए हम कार में फिर अकेले थे। आज जैसे अनन्या ने मुझे छेड़ने की जैसे शपथ ले रखी हो। 

कार कॉलेज गेट से बाहर निकलते ही उसने मुझसे पूछा - एक और अचंभित करने वाली बात बताऊँ, आपको? 

जैसे मैं, उससे हार गया हूँ, ऐसे समर्पण करता हुआ सा मैंने कहा - 

अनन्या हाँ बताओ, घर पहुंचने तक कोई तो बात करनी ही होगी, आप वही कह दो। 

अनन्या ने तब बताया - आज रात आप मेरे सपने में आये थे। आप इंद्रधनुष के रंगों का अर्थ मुझे बता रहे थे। 

ओह, मैं इन देवी के सपने तक में पहुंच गया, विचार करते हुए मुझे, हँसी आने को हुई जिसे, सप्रयास मैंने रोक लिया। फिर जिज्ञासा एवं अचरज से मैंने पूछा - 

भला रंगों में कैसा अर्थ होता है जो सपने में ही सही मैंने, आपको बताया है। 

तब अनन्या ने कहा - इसे रंगों में अर्थ कहिये यह इन का संदेश कहिये आप मुझे बता रहे थे कि -

एक दिव्य दृष्टि होती है। जिसके पास यह होती है उसकी आँखों से इंद्रधनुषी किरण निकलती है। इस दृष्टि से निकले रंग मानवीय दृष्टि में बुरी नीयत वाले दोषों का उपचार करते हैं। जिन आँखों में, एक बार दिव्य दृष्टि से उत्सर्जित यह इंद्रधनुषी किरण प्रविष्ट हो जाती है। उन आँखों की दृष्टि निर्मल हो जाती है वे आँखें यदि पुरुष की हों तो रंग अनुसार आदर्श संस्कार ग्रहण कर लेती हैं। उनकी आँखों के माध्यम से हृदय में यह स्थाई भाव समा जाते हैं -  

(बैगनी) - बहन बेटी को विश्वास दिलाता है कि उन्हें 

(आसमानी) - आदर पूर्वक एवं उनके आत्मसम्मान से समाज देखेगा। वे  

(नीला) - निर्भया रहकर जीवन यापन कर सकेंगी। वे  

(हरा) - हत्या-दुराचार एवं पुरुष छल की आशंका से मुक्त होंगी। उन पर पुरुष दृष्टि 

(पीला) - पिता-भाई जैसी स्नेहमयी होगी। हमारे समाज में माँ, बहन, बेटी एवं पत्नी का 

(नारंगी) - नारी गरिमा सहित जीवन, विश्व के लिए प्रेरणा बनेगा कि कैसे संपूर्ण नारी जाति, भारतीय नारी का अनुसरण करे। जिससे उनमें 

(लाल) - लाज का होना, विश्व में उन्हें, मनुष्य नहीं देवी तुल्य प्रतिष्ठित होना सुनिश्चित करे। 

ऐसे ही इंद्रधनुषी किरण यदि किसी पथभ्रष्ट नारी की आँखों में प्रविष्ट होती है तो उसका असर ऐसी नारी की दृष्टि ठीक कर देगी। उसमें नारी गरिमा का वास हो जाएगा। तब कोई पुरुष, उसके द्वारा छले जाने से निर्भय रहेगा। 

मैं कार चलाता जा रहा था एवं मंत्रमुग्ध, अनन्या को सुन रहा था। अनन्या चुप हो चुकी थी। 

मैं सोचने लगा था कि कदाचित दिव्य शक्ति ने, समाज को प्रभावित कर सकने में कम समय लगाने के लिए, अनन्या को भी माध्यम बना लिया है .....                         

(क्रमशः)  

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

22-11-2020