Wednesday, October 21, 2020

तस्वीर में भी सुरक्षित नहीं (5)

 

तस्वीर में भी सुरक्षित नहीं (5)

पापा ने उत्तर दिया - खराबी प्रसारण माध्यमों में नहीं है। उन्हें प्रयोग करने का तरीका, हमारा ख़राब होने से, उनमें खराबियाँ आ गईं हैं। प्रसारण माध्यमों से दूर रहने के स्थान पर हमें, उनका हितकारी प्रयोग करना चाहिए। 

तब स्पष्ट समझने के लिए मैंने पूछा - पापा, सिनेमा के उदाहरण से बताइये कि इसके दर्शक के, सिनेमा के प्रयोग में, क्या खराबी है?

पापा ने कहा - सिने जगत के लोग किसी समाज सेवा के प्रयोजन से वहाँ नहीं पहुँचें हैं। उन्हें अथाह धन उपार्जन का लोभ वहाँ ले गया है। उन्हें, धन अर्जन का अपना प्रयोजन सिध्द करने के लिए, वैसी सामग्री निर्मित करनी होती है जैसी, दर्शक देखना पसंद करते हैं। अगर बुरी किस्म की बातें दर्शक पसंद करते हैं तो वे बुरा ही निर्माण करते हैं। जो समाज अहितकारी होता है। 

मैंने पूछा - पापा, वे बुरा निर्माण करते हुए भी लोकप्रिय होते हैं, इसका क्या कारण है?

पापा ने बताया - वास्तव में यह उनकी ही नहीं हमारी भी खराबी होती है। हम जानते हैं वे, कोई देश सेवा नहीं करते, कोई समाज सेवा नहीं करते तब भी वहाँ के लोगों के हम सहित, करोड़ों प्रशंसक मिलते हैं। यह हमारी ही खराबी होती है। 

मैंने फिर पूछा - उनके करोड़ों प्रशंसक होना, खराबी क्यों है, पापा?

पापा ने बताया - किसी को लोकप्रियता मिलती है, तब उसे करोड़ों की सँख्या में प्रशंसक मिलते हैं। इससे उनमें से कई का अभिमान रावण से भी अधिक हो जाता है। 

रावण ने तो सीता जी का, अपहरण करने बस का पाप किया था। सिनेमा के कुछ लोग तो इतने अभिमानी हुए हैं कि उन्हें, किसी को गाड़ी से रौंद कर मार देने या नशा करने में एवं लिव इन रिलेशन में रहने में आधुनिकता बताने में शर्म नहीं आती है। 

यही नहीं, देश के विभिन्न हिस्सों से, सिनेमा में काम के प्रयोजन से पहुँची, नई लड़कियों/युवतियों के शीलहरण करने में भी उनका, कोई कुछ बिगाड़ सकता है इत्यादि ऐसी बुरी बातों में, लिप्तता से भी (अनेक को) कोई भय नहीं लगता है। उनके कृत्य, रावण की बुराई से कहीं अधिक बुरे होते हैं। 

मैंने और स्पष्ट समझने के लिए पूछा - मैं यदि, किसी सिने कलाकार की प्रशंसक होती हूँ तो अपना क्या ख़राब करती हूँ, पापा? 

पापा ने बताया - प्रशंसक होकर, सर्वप्रथम तो तुम, अपना समय ख़राब करती हो। तुम सोचो, क्या किसी दुकानदार से कोई वस्तु खरीद के लाने के बाद तुम, उसकी प्रशंसक होती हो? 

फिर मूवीज़ के लिए, पैसा देकर के जब तुम, मूवी देखती हो तो, उन दुकानदारों की प्रशंसक क्यों बनती हो। प्रशंसक होकर के, तुम (सिने) दुकानदारों के बारे में सोचने में, समय लगाती हो। उसके बारे में समाचार सुनने-पढ़ने में समय लगाती हो। उसकी अच्छी बुरी, सभी मूवीज देखने लगती हो। ऐसे अपने जीवन के, अपने कीमती समय का प्रयोग, स्वयं को प्रोमोट करने की जगह (जो निपट स्वार्थी हैं) उन्हें, प्रोमोट करने में लगाती हो। 

मैंने कहा - हाँ, पापा मुझे समझ आ गया। 

पापा ने बताया - इसमें तुम्हारी ही अकेली हानि नहीं होती है। अपितु अप्रत्यक्ष रूप से देश और समाज का नुकसान भी होता है। ऐसे ही अनेक देशवासी जब ऐसा करते हैं तो, उत्पादन की दृष्टि से (लग सकने वाले) अरबों मानव दिवस (मैन डेज) व्यर्थ हो जाते हैं। 

कोई यदि प्रशंसक नहीं होता है तो इन सब बातों के लिए जाया होने से बचा समय, अपनी शिक्षा,व्यवसाय  एवं सृजन के लिए लगा कर, वह स्वयं की प्रतिभा में निखार ला सकता है। ऐसे वह, अपने को प्रोमोट कर सकता है। ऐसा करने पर वह, तुलनात्मक रूप से परिवार, समाज एवं देश की दृष्टि से अधिक उपयोगी जीवन जी पाता है। 

मैंने कहा - जी, पापा मुझे समझ आया है कि मुझे किसी सेलेब्रिटी (दूकानदार) का प्रशंसक नहीं होना चाहिए। सेलेब्रिटी जो करता है, उसका अर्जित धन, अपने ऐशोआराम के लिए करता है। 

देश एवं समाज का उसके द्वारा, कुछ भला नहीं होता है। बल्कि हमारे प्रशंसक होने से उनके लिए पूर्वाग्रह पालते हैं। हम उसकी बुरी बातों को भी, उसकी अच्छाई की तरह देखने लगते हैं। फिर वैसी बुराई में, स्वयं लिप्त होने में हमें शर्म नहीं रह जाती है। 

पापा ने कहा - बिलकुल सही है बेटी। इस दृष्टिकोण से देखें तो ये ख़राब तरह के सेलिब्रिटी ही नहीं, एक उनका प्रशंसक भी समाज में बुराई का, परोक्ष रूप से उत्तरदायी होता है। 

सेलिब्रिटी को, इतने ढेरों प्रशंसक मिलने से उसे, यह सोचने का समय नहीं मिलता है कि उसका जिया गया जीवन देश और समाज के किसी सार्थक काम का हो भी सका है या नहीं? अपने वैभव एवं लोकप्रियता के घमंड में, उसकी दृष्टि देख नहीं पाती है कि वह, “जिस थाली में खाता है, उसी में छेद कर बैठा है। अर्थात जिस देश ने उसे बनाया है, उसी देश की समाज संस्कृति वह बिगाड़ रहा है।”  

पापा ने जिस अच्छी तरह से मुझे समझाया था, उससे मैंने, उस दिन, संकल्प लिया था कि “नहीं, मैं ख़राब तरह के लोगों को बढ़ाने में अपना समय व्यर्थ नहीं करुँगी। मैं, अपने में निहित प्रतिभा से स्वयं, वह व्यक्तित्व बनाऊंगी जो, देश और समाज को सार्थक योगदानों का निमित्त बन सके”।     

अपने पापा से, ऐसे सभी तरह की चर्चा और अपने संशय दूर कर लेने की अनुमति होने से आगे, मैंने पापा के रूप में, उन्हें ही, अपना सबसे अच्छा मित्र मान लिया था। 

मैंने देखा था कि मेरी सहपाठी, कुछ लड़कियाँ, अपने संशय-व्दंद अपनी सहेलियों से पूछतीं है। जिनसे उन्हें, कोई समुचित जानकारी नहीं मिलती है। अपितु कुछ तो अपने अंतर्मन की बातों के कह देने के कारण, हममें हास-परिहास का लक्ष्य भी हो जाती हैं। 

मुझे समझ आ गया था कि हमारे सर्वाधिक हितैषी मित्र, हमारे माँ-पापा ही होते हैं। जिनसे किसी भी तरह की चर्चा में, कभी हमारी हँसी नहीं उड़ती है। साथ ही समुचित समाधान भी हमें, उन्हीं से मिल जाते हैं। 

मैं, अब से छोटी सी छोटी अपनी दुविधायें एवं अपने किसी भी तरह के संशय, अपने पापा से पूछ लेती थी। और ऐसे उनके मार्गदर्शन में मैं, क्रमशः बड़ी होने लगी थी। 

फिर आया था मेरी, दसवीं की परीक्षा का समय तब दुर्भाग्य से मुझे डेंगू हो गया था। जिसके कारण मैंने, परीक्षा अपने खराब स्वास्थ्य में दी थी। और जब परीक्षा फल आया तो मैं, पहली बार स्कूल में अपने 4 अन्य सहपाठियों से पिछड़ गई थी। यह अब तक कभी नहीं हुआ था। मैं हमेशा स्कूल में सर्वप्रथम ही आती रही थी। 

इससे मुझ पर छाई उदासी से माँ, दादी दुखी हुईं थीं। उन्होंने, पापा से, मुझे समझाने हेतु कहा था। पापा ने उस शाम मुझे पास बिठाया एवं पूछा था - बेटी, मेहनत सब से ज्यादा एक मजदूर करे एवं पारिश्रमिक दूसरे को अधिक मिले तो क्या, यह अच्छी बात होगी?

मैंने कहा - जी नहीं, पापा। 

तब पापा ने कहा - बेटी, ऐसे ही डेंगू के कारण इस वर्ष तुम्हारे अध्ययन में कमी रह गई। कुछ बच्चों का अध्ययन तुमसे अच्छा रहा। उन्हें, तुमसे, ज्यादा अच्छे अंक मिले हैं तो क्या, यह अच्छी बात नहीं है?

मैंने कहा - जी पापा, यह तो अच्छी बात है। 

तब पापा ने कहा - फिर तुम ऐसे उदास क्यों रहती हो। ख़ुशी मनाओ, उन बच्चों के लिए जिन्हें उनके परिश्रम अनुसार पहली बार, तुमसे अच्छा स्थान मिल सका है। 

पापा द्वारा, मेरे परीक्षा परिणाम को इस दृष्टिकोण से दिखाने से, मेरी उदासी मिट गई थी। मैंने ख़ुशी से मुस्कुराया तो पापा ने भी प्रत्युत्तर में मुस्कुराया था फिर कहा - 

बेटी, वास्तव में हमारा हृदय, छुई-मुई (लाजवंती) सा होता है। जिसे ईर्ष्या का स्पर्श क्षुब्ध करता है और प्रसन्नता की बयार खिला दिया करती है। 

यह हृदय हमारा अपना होता है। इसमें ईर्ष्या को स्थान देने से यह जलता है। जबकि दूसरों की ख़ुशी में भी, खुश होने से, यह प्रसन्नता से धड़कते हुए हमें स्वस्थ रखता है। हम यदि औरों की ख़ुशी में भी, खुश होना सीखें तो हमारे हृदय में, हमेशा प्रसन्नता का निवास होता है। 

मैंने पापा का संकेत समझा था। फिर पापा से, कुछ उपहार मँगवाये थे। जिन्हें मैंने, अपने से अच्छे अंक प्राप्त करने वाले सहपाठियों में, उनसे मिलकर, उन्हें भेंट किये थे। मैं, इसके पूर्व हमेशा प्रथम आई थी। मेरे ऐसे व्यवहार से, उन सहपाठियों की प्रसन्नता कई गुना बढ़ गई थी। 

यह देखकर मैं समझ सकी थी कि दूसरों की ख़ुशी से भी, हम अपनी ख़ुशी प्राप्त कर सकते हैं। 

ऐसे दिन और बीते थे। फिर मैं बारहवीं में आ गई थी। अब मैं स्कूल, स्कूटी से जाने लगी थी। तब मैंने अनुभव किया कि दो लड़के, पिछले कुछ दिनों से बाइक से, स्कूल आने एवं जाने, दोनों ही समय में, निरंतर कभी मुझसे आगे, कभी पीछे चलते हैं। 

इससे परेशानी अनुभव करते हुए मैंने यह बात पापा से बताई। तब उन्होंने पूछा - वे तुमसे कुछ कहते हैं? 

मैंने कहा कहते तो कुछ नहीं हैं। मुझे सुनाने के लिए ऊँची आवाज में, फ़िल्मी गाने गाते रहते हैं। कभी चिकनी चमेली, कभी शीला की जवानी, कभी मुन्नी बदनाम तो कभी जलेबी बाई आदि। 

पापा ने कहा आगे से तुम स्कूटी चलाते हुए (बिना मोबाइल के) दिखावे का इयरफोन एवं हेलमेट लगाया करो। संभव हो सके तो तुम, पढ़ने की लगन रखने वाली, कोई ऐसी फ्रेंड को साथ लेने लगो जो, आसपास से ही साईकिल आदि से स्कूल जाती हो। 

स्कूटी पर तुम्हें यूँ चलना है जैसे तुम, इस बात से अनभिज्ञ हो कि तुमने, उन लड़कों का रोज का पीछा किया जाना नोटिस कर रखा है। लड़के कुछ भी गाते या कहते रहें, तुम्हें, इयरफोन के बहाने अनसुना करना तथा उन्हें, कोई उत्तर नहीं देना है। 

ध्यान रखना है कि लड़कों से, तुम्हारा, गुस्से से कहना भी ठीक नहीं और सामान्य रूप से बात करना भी ठीक नहीं होगा। 

सामान्य ढंग से बात, उनको अगली हरकत को दुष्प्रेरित करेगी। जबकि तुम्हारा गुस्सा दिखाना, उन्हें भड़कायेगा। जिससे वे, अपना अपमान मानकर, बदले की भावना में, तुम्हें क्षति पहुंचाने के लिए कोई बुरी हरकत कर सकते हैं। 

इतने उपाय करने से कुछ दिनों में वे तुम्हारा पीछा छोड़ देंगे। तुम्हारा पीछा करना, उन्हें समय व्यर्थ करना लगने लगेगा। वे, उनकी बहकावे में आ सकने वाली अन्य लड़की की खोज पर निकल जायेंगे। 

मैंने यही किया था। पापा का अनुमान सही था। कोई 7-8 दिनों बाद से ही मुझे उनका दिखना बंद हो गया था।  

इतना पढ़ने के बाद फिर मैंने, ‘मेरी कहानी’ आगे पढ़नी स्थगित की थी। साथ ही मोबाइल रिकॉर्डिंग ऑफ कर दी थी।                                 

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

21-10-2020


Sunday, October 18, 2020

तस्वीर में भी सुरक्षित नहीं (4)

 

तस्वीर में भी सुरक्षित नहीं (4)

“मेरी कहानी” मैंने इतनी ही पढ़ कर, रिकॉर्डिंग स्टॉप की थी। फिर इस रिकार्डेड ऑडियो को स्वयं सुना था। मुझे अनुभव हुआ कि मेरा उच्चारण अत्यंत स्पष्ट था। मैंने श्रोताओं के दृष्‍टिकोण से,  इसे परखा था। मैंने पाया कि इसमें विषय वस्तु मेरी उम्र की लड़कियों के भविष्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। 

मुझे प्रतीत हुआ कि प्रस्तुति के लिए एक अच्छा ऑडियो निर्मित हो गया है। इससे अगर थोड़े भी किशोरवया श्रोताओं ने इसमें के, कुछ अंश भी ग्रहण किये तो पापा का लिखना अधिक सार्थक हो जाएगा। 

उस रात सोने के पूर्व, ‘मेरी कहानी’ का यह भाग मैंने, नेट पर अपलोड कर दिया। अब मुझे यह उत्सुकता थी कि पापा के, प्राचीन मानवीय मूल्यों पर आधारित  “मेरी कहानी” एवं ‘मेरी आवाज़’ के सम्मिलन से बनी यह प्रस्तुति, आधुनिक हुई दुनिया में, अब भी पसंद की जाती है, क्या?

अब रात ज्यादा होने से थकान एवं आ रही उबासियों को देखते हुए मैंने, धैर्यपूर्वक समझते हुए पढ़ने की दृष्टि से, इसे पढ़ा जाना अगली रात्रि तक के लिए स्थगित किया था। माँ को जाकर, उनका मोबाइल लौटाया था। पापा से अपने ओंठों की आकर्षक स्मित के साथ, उनसे गले लगी थी।  उन्होंने स्नेह से मेरे माथे पर चुम्मी ली थी। फिर मैं, सोने के लिए बिस्तर पर आ गई थी।  

अगले प्रातःकाल जागने पर, मेरी पहली जिज्ञासा, मेरे अपलोडेड ऑडियो को, क्या प्रतिसाद मिला है यह देखने की थी। तब मैंने, पापा की कभी कही गई, उस बात का स्मरण किया था कि 

“पौधे के लिए बीज बोने के बाद वह अंकुरित हुआ या नहीं, यह देखने के लिए तुरंत ही मिट्टी खोद कर नहीं देखी जानी चाहिए अन्यथा बीज अंकुरित नहीं होने पाता है।”

ऐसे मैंने, अपनी अधीरता को नियंत्रित किया था।  

अपनी नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर एवं कलेवा ग्रहण कर मैं, गणित करने में लगी थी। दोपहर भोजन की टेबल पर मैंने सब को, रात्रि अपने ऑडियो वाली बात बताई थी। तब दादी की जिज्ञासा, मुझसे अधिक, उसे सुनने-जानने की हुई थी। मुझसे, उन्होंने नेट पर, उसे दिखाने के लिए कहा था। 

मम्मी का  मोबाइल लेकर मैंने, परीक्षा परिणाम देखे जाने वाली चिंता से, उसकी लिंक क्लिक की थी। आगे जो था वह, हम सभी के सुखद आश्चर्य की बात थी। उस ऑडियो स्टोरी को 14 घंटे में ही 2308 व्यू मिल चुके थे। साथ ही उस पर, नौ सौ से ज्यादा रिएक्शन एवं कमेंट थे। 

स्पष्ट था कि हमारे प्राचीन आचार-विचार एवं मानवीय मूल्य की महत्ता, मानने वाले मानव, अभी भी अस्तित्व में थे। आनंद पूर्वक सबने पापा की ओर देखा था। पापा ने मुस्कान के साथ कूल रेस्पोंस दिया था और फिर जैसे स्वयं से कह रहे हों, बोले - 

“किसी प्रयास की आरंभिक सफलता में, अपना सिर चढ़ा लेना, प्रयास के सार्थक परिणाम में बाधक होता है।” 

फिर मुझे देखते हुए संबोधित किया -

तुम्हारा हर काम सृजन प्रेरक होता जा रहा है, यह अच्छी बात है। फिर भी तुम्हें समझना होगा कि तुम में निहित क्षमताओं की तुलना में, अब तक का तुम्हारा प्रदर्शन कम ही है। मैं मानता हूँ कि तुम अगर अभिमान, आडंबर एवं किसी की नकल से बच अपना मौलिक सृजन, समाज के सामने रखते रही तो तुम वह योगदान दे सकती हो जिसकी, आज भारत को आवश्यकता है। 

पथ भ्रमित हो रहे किशोरवय बच्चों की तुम प्रेरणा हो सकती है। समाज में सांस्कृतिक विषयों को सही दिशा देते हुए, तुम एक किशोर नेतृत्व हो सकती हो। 

इस बात पर दादी ने पापा से नाराजी दिखाते हुए कहा - तुम तो, बच्चों को, बच्चों के तरह, ख़ुशी में इतराने भी नहीं देते हो। तुम क्या चाहते हो कि ये तुम्हारी तरह परिपक्व एवं नीरस, इस बचपने में ही हो जायें? इससे मेरा घर, घर के स्थान पर, क्या गुरुकुल नहीं लगने लगेगा? 

इस बात पर सब खिलखिला कर हँसे थे। मेरी छोटी बहन भी अधिक कुछ नहीं समझते हुए भी हँस रही थी।

अब दादी ने मुझे, अपने पास खींचा, प्यार से गोद में बिठाया था और कहा - शाबाश बेटी! तुमने बहुत अच्छा काम किया है। 

“हम यदि गुणवान हों तब, अपने अच्छे उद्देश्य के लिए, स्वयं को प्रौन्नत किया जाना, हमारा समाज के साथ न्याय ही होता है।” कीप इट अप माय चाइल्ड!

इसके बाद दादी एवं मम्मी ‘मेरी कहानी’ के (स्वयं) दो व्यूअर बढ़ाने में व्यस्त हो गईं थी। मैं घरेलु कुछ कार्य करने के बाद, अपने अध्ययन में लग गई थी। 

मेरे पापा को हर बात का धैर्य रहता है। उन्हें उतावली नहीं थी कि कहानी पर, मेरी प्रतिक्रिया की जानकारी लें। मैंने भी कहानी पर अपने प्रश्न एवं विचार पापा से कहानी पूरी पढ़ने के बाद ही चर्चा में लेना उचित समझा था। 

रात के भोजन के बाद, आगे की कहानी पढ़ने के पूर्व मैंने, पिछले भाग के प्रदर्शन को जानने के लिए नेट पर दृष्टि डाली थी। अब व्यूअर सँख्या 5018 थी। इसे देख आज पढ़ने में, मेरा उत्साह और आत्मविश्वास कल से दुगुना हुआ था। 

मैंने ‘मेरी कहानी’ को आगे पढ़ने एवं उसकी ऑडियो बनाने का पिछली रात्रि वाला तरीका आज की रात भी अपनाया फिर मैंने पढ़ना शरू किया -

‘मेरी स्टोरी’ भाग-2 

अगले दिन मैं, पापा के पास जाकर बैठी थी। उन्होंने मुझे आया देख, अपना ऑफिस का, लैपटॉप पर किया जाने वाला वर्क सेव करते हुए, मुझसे पूछा - बेटी, कल हमारे, उन आंटी से मिलने एवं उनकी बातों से, तुमने क्या समझा है?

मैंने बताया - पापा, कल के पूर्व मैं, कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि हमारे नगर में कोई मौहल्ला ऐसा भी होगा जहाँ घरों से, परिवार के, भावनात्मक अवयव लुप्त हो गए हैं। 

पापा ने मेरी बात से उत्साहित हो कहा - अच्छा अवलोकन है तुम्हारा, थोड़ा विस्तार से कहो।     

इससे प्रसन्न होकर मैंने कहा - यह कि कोई घर ऐसे, कैसे हो सकता है जिसमें, आपस में बिना रिश्ते के पुरुषों से धोखा खाईं हुईं, सिर्फ स्त्रियाँ रहती हों। जिनके लिए पुरुष का अर्थ, मात्र उनकी देह को भोगने वाला एक स्वार्थी प्राणी है। 

अर्थात पिता, भाई, पति या बेटा जैसा पुरुष, उनकी दुनिया में कोई है ही नहीं। 

फिर प्रश्नात्मक स्वर में आगे कहा - पापा क्या उन्हें लगता होगा कि वे, मनुष्य हैं?

आगे अपना अनुमान/उत्तर स्वयं बताते हुए बोलना जारी रखा - उन्हें तो लगता होगा कि वे मात्र जानवर हैं, जिनसे, अपनी प्रजाति के अन्य प्राणियों का सरोकार, सिर्फ उनके देहिक भूख की पूर्ति बस होता है। 

पापा ने तब कहा - मुझे, तुम पर बेटी गर्व है कि इतनी छोटी सी उम्र में तुम, ऐसी स्पष्ट एवं सूक्ष्म दृष्टि से, किसी वस्तु को, उसकी संपूर्णता में देख सक रही हो। अन्यथा और कोई बच्चा तो क्या, कई बड़े व्यक्ति भी, हाथी को पैर, सूंड, कान या पुंछ मात्र निरूपित कर पाते हैं। 

मैं पापा की ओर देखते हुए ख़ुशी से मुस्कुराई थी। मगर पापा, अब गंभीर दिखाई पड़ रहे थे। उन्होंने कहा - 

बेटी यह विडंबना है कि तुमने, उनके घर में जिस परिवारिक भावनात्मकता का ना होने का साक्षात्कार किया है, वही सिर्फ, आज के समाज की समस्या नहीं है। 

परोक्ष रूप से इन पारिवारिक भावनात्मकता की आवश्यक मात्रा, हम जैसे परिवारों में भी कम होने लगी है। उस बस्ती जैसे घर तो, देश के कुछ क्षेत्र विशेष में ही सीमित हैं। मगर ऐसे दूसरे प्रकार के घर परिवार, पूरे देश में व्यापक होते जा रहे हैं। 

मेरी मुख मुद्रा, उनकी बातों को समझने के प्रयत्न वाली देख, उन्होंने आगे कहा - 

चलो, इसे छोड़ो बेटी। यह समझ सकने के लिए तुम्हें और बड़ा होना होगा। अभी बताओ कि तुम्हारे पूछे शब्दों के अर्थ तुम जान सकी हो?

मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा - हाँ पापा! कुछ समझ तो आया है। 

तब पापा से समझाते हुए कहा - एक अवस्था आने पर, युवाओं में यौनेक्छा अनुभव होने लगती है। गाँव के धोखेबाज पुरुष साथियों ने तब, आंटी एवं कला की अनुभव की जा रही, ऐसी यौनेक्छा को ही, अपने कुत्सित प्रयासों से उकसाया था और अपनी काम पिपासा उनसे पूरी करते रहे थे। 

कला के प्रकरण में, बाद में उसे, उसके मास्टर ने, दिल्ली की होटलों में, उन लोगों को उपलब्ध कराया, जिनकी घर में पत्नी भी होती हैं। इस तरह के लोगों की अति कामुकता, उन्हें अन्य स्त्री से वासना पूर्ति के लिए संबंध को दुष्प्रेरित करती है। मास्टर ने कला की देह उन्हें पेश करके, धन कमाया। इन काम रोगियों ने कला की विवशता का लाभ लेकर उस पर दुष्कृत्य किया। अब अर्थ अधिक स्पष्ट हुआ, तुम्हें?

इन शब्दों के अर्थ मुझे अब समझ आ गए थे। मगर पापा के बताने पर, मेरे मन में अन्य प्रश्न उभर आया, मैंने पूछा - तो पापा, क्या यौनेक्छा बुरी बात होती है? 

पापा ने कहा - नहीं बेटी, संतति क्रम जारी रखने के लिए यह, प्राणियों में सृष्टि प्रदत्त होती है। मानव समाज में, इसकी पूर्ति के लिए पति-पत्नी का रिश्ता बनाया गया है। 

मैंने फिर पूछा - तो पापा विवाह नहीं होने तक. इसका क्या समाधान है? 

पापा ने कहा - संयम एवं स्वयं को उन बातों से दूर रखना, जिनसे इसकी तीव्रता बढ़ती है। इसके लिए सभी को अपने अध्ययन, कला निखार, अपने गृह-परिवार दायित्व एवं व्यवसायिक कार्यों में अपने को व्यस्त रखना उचित होता है। 

मैंने बात, समझ लिए जाने की तरह, अपना सिर हिलाया। 

तब पापा ने बताया - हमारे समाज में, हमारे ही आसपास, ऐसे काम पिपासु लोगों का होना ही, परिवारों में बेटियों पर अतिरिक्त बंधन को विवश करता है। एक लड़की का भाई या पिता, इतने सारे कामवासना  भूखे लोगों को, सुधार पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है। तब वह, अपने घर के अनुशासन को ही बहन-बेटी की सुरक्षा एवं सम्मान के लिए उचित समझता है।      

मेरे दिमाग में नया प्रश्न उठा, मैंने पूछा - ये लोग खुद भी किसी परिवार के हिस्सा होंगे। क्या इन्हें बेटियों जैसे अनुशासन में नहीं रहना चाहिए?

पापा ने बताया - इस काल में, प्रसारण तंत्र पर, सिनेमा, टीवी एवं नेट के घटिया सामग्रियों का बोलबाला है। जो देश में ड्रग्स एवं नशीली वस्तुओं के साथ यौनेक्छा भड़काने वाले दृश्य/वीडियो प्रदर्शित करते हैं। जिनके दुष्प्रभाव में पुरुष-स्त्रियों के द्वारा, परिवार से मिले संस्कार एवं अनुशासन भुला दिए जाते हैं। 

मैंने पूछा - फिर तो पापा हमें इन प्रसारण माध्यमों से दूर रहना चाहिए, है ना?    

    (क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

18-10-2020


Friday, October 16, 2020

तस्वीर में भी सुरक्षित नहीं (3)

 

तस्वीर में भी सुरक्षित नहीं (3)

मैंने (और शायद मेरे पापा ने भी) वहाँ 2 युवतियों को घरेलू/रसोई के कार्य में व्यस्त देखा था। दो बंद कमरों से आ रही आवाजों से अनुमान हुआ था कि उनमें, कुछ स्त्री-पुरुष, और थे। 

आंटी (उस औरत) ने, एक युवती को संबोधित करते हुए कहा था - कला, हमारे ये अतिथि, अन्य से अलग तरह के हैं। घर में सभी से कह दो, इनके होते तक घर में शालीनता एवं शिष्टाचार का ध्यान रहे। साथ ही, इनके यहाँ रहते तक, घर में नये ग्राहक नहीं लिए जायें। 

फिर आंटी ने पापा से मुखातिब हो पूछा था - कहिये साहेब, मुझ से किस तरह की बात, इस बिटिया की जिज्ञासाओं के लिए उचित रहेंगी। 

पापा ने उनसे कहा - संक्षिप्त शब्दों में आप, अपनी और यहाँ के अन्य सद्स्यों की, यहाँ तक पहुँचने की कहानी एवं यहाँ किये जाने वाले काम का विवरण बताइये। आपसे प्रार्थना है कि मेरी बेटी की, वय एवं समझ को ध्यान में रख, आप शिष्ट एवं सरल शब्दों का ही प्रयोग करें। 

आंटी ने थोड़ा विचार किया फिर कहना आरंभ किया - 

मैं, करिश्मा, इस घर की प्रमुख हूँ। लगभग 25 वर्ष पूर्व दरभंगा से मैं, यहाँ धोखे से लाई गई थी। तब मैं 17 वर्ष की थी। वहाँ, एक लड़के से मुझे प्यार हुआ था। तब वह, मुझे हीरोइन जैसी सुंदर बताया करता था। मुझ में समझदारी नहीं थी। प्रशंसा के पीछे छिपे उसके कुत्सित मंतव्य, मैं समझ नहीं पाई थी। 

उसने शादी करने के वादे करके मुझे, अपने साथ संबंध बनाने को उकसाया था। मुझे सिनेमा में काम करने मिलेगा यह झूठा भरोसा दिलाया था। मैं, उसकी बातों में फंसकर उसके साथ मुंबई जाने के लिए घर से भाग निकली थी। वह धोखेबाज था, उसने मुझे यहाँ लाकर बेच दिया था। 

यह स्थान कोठा कहा जाता है। यहाँ औरतें, देह व्यापार से, अपनी आजीविका चलाती हैं। मुझे जिस कोठे मालकिन ने खरीदा था, वह 2 साल पहले मर चुकी है। तबसे मैं यहाँ की मालकिन हुई हूँ। यहाँ, चार और लड़कियाँ हैं। दो को, आप दोनों देख पा रहे हैं। दो, अपने ग्राहकों के साथ कमरे में हैं। 

पापा ने पूछा - क्या ये लड़कियाँ, आपकी हैं?

आंटी ने बताया - नहीं, सामान्यतः कोठे में रहते हुए, हम अपनी औलाद नहीं करते हैं। इन लड़कियाँ में से दो नेपाल, एक बँगला देश से खरीद एवं तस्करी कर यहाँ लाई गईं हैं। 

फिर रसोई में दिखाई दे रही लड़की के तरफ इशारा करते हुए हमें आगे बताया - इसका नाम, कला है। मुझे मिले जैसे एक धोखेबाज ने, इसको, इसके गाँव से भगा लाया था। यहाँ लाकर बेच गया था। ये सभी लड़कियाँ, उन्हें लाने वालों को कीमत देकर खरीदीं गईं हैं। 

पापा ने पूछा - जब आप खुद भुक्तभोगी रहीं हैं, तब इनसे आप, ऐसा अशोभनीय पेशा क्यों कराती हैं?

आंटी ने लंबी श्वास के साथ व्यथा प्रदर्शित करते हुए कहा -

साहेब, हम जैसी दुर्भाग्यशाली स्त्रियों के पास इसके अतिरिक्त कोई जीवन विकल्प नहीं रह जाता है। कला को, यदि उसके परिवार वालों के पास, वापिस पहुँचाया जाए तो वे ही, इसे मार डालेंगे। कला की हत्या में ही, इसके परिवार वालों को अपनी #गौरवरक्षा दिखाई देगी। 

फिर आंटी ने आवाज देकर, कला को हमारे सामने बुलाया था। उसे अपनी आपबीती, हमें सुनाने को कहा था। यद्यपि कला का लाज-शर्म बोध यहाँ आने के बाद बाकी नहीं रह गया होगा। मगर हमारे सामने आकर, अपने पर बीती बताने में उसे लज्जा आई थी। सकुचाते हुए उसने बताया - 

तब मैं, दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। एक दिन हमारे मास्टर ने, अपने मोबाइल से, मेरी फोटो ली थी। उसके अगले दिन उसने मुझे अकेले में बुलाकर, मुझे एक वीडियो दिखाया था। उस वीडियो में, मेरी ली गई फोटो को प्रयोग करके, नकली बनाया गया, एक अश्लील वीडियो मुझे दिखाया था। उस वीडियो को देखने से यह भ्रम होता था कि जैसे, उसमें बुरा काम मैं ही कर रही हूँ। फिर वह, मेरे साथ ज़बरदस्ती करने लगा था। मैंने आपत्ति की थी तो उसने धमकाया कि वह इस वीडियो को सबको दिखा कर मुझे गाँव में बदनाम कर देगा। 

गाँव में अपनी बदनामी से ज्यादा मुझ पर, अपने भाइयों के ख़ूँख़ार होने का भय था। जो दूसरों की लड़कियों से, अपनी हवस की पूर्ति के जुगत में तो रहते थे मगर अपनी मुझ बहन के, ऐसे शोषण के शिकार होने की जानकारी होने पर, मुझे तथा मास्टर की जान ही ले लेते।    

मैं डर गई थी। मास्टर ने मुझ पर, मेरी 15 साल की छोटी उम्र में ही, अपनी ज़बरदस्ती कर डाली थी। मेरा भयादोहन वह और कई दिनों तक करता रहा था। फिर एक दिन उसने कहा कि तू, मेरे शहर चल मैं, अपने घरवालों के सामने, तुमसे शादी करूँगा। 

उससे किसी तरह की मनाही का मुझ में साहस नहीं रह गया था। तब उसके ही कहने पर, शादी के लिए, मैंने अपने घर से जेवरात चुराये थे। वह, झाँसे से मुझे, यहाँ दिल्ली ले आया। उसने मुझे कई दिनों तक विभिन्न होटलों में कई लोगों के साथ सोने को मजबूर किया। अंत में मेरे जेवरात हड़प कर वह, मुझे यहाँ आंटी के पास बेच गया। मेरा वास्तविक नाम कला नहीं है। 

हमारी कौम लड़की  मामले में अत्यंत खतरनाक होती है (कहते हुए कला की बड़ी आकर्षक आँखों में अश्रु छलक आये थे, रुआँसे स्वर में आगे कहा था)। मैं, अपना यह कालिख पुता चेहरा लेकर, उनके सामने जाऊँ तो वे मुझे मार डालेंगे। अब जीने के लिए, अपनी इस हालत से समझौता ही, मेरे पास एकमात्र विकल्प है। 

यह सब बता कर, कला चुप हो गई थी। आंटी ने उसकी पीठ पर थपकी देकर, उसे रसोई के काम में वापिस भेज दिया था। उसके जाने के बाद, आंटी से पापा ने पूछा - आप, अपनी कमाई एवं ग्राहक के बारे में कुछ बता सकती हैं?

आंटी ने उत्तर में बताया - प्रत्येक लड़कियाँ हर दिन 4 से 8 ग्राहकों के जरिये, लगभग तीस हजार रूपये महीने कमा लेती हैं। ऐसे कमाये सवा लाख रूपये में से, दलाली एवं रिश्वत के, देने के बाद, 80-90 हजार महीने की, शुद्ध कमाई हो जाती है। 

हमारे ग्राहक, अधिकतर दिल्ली में काम करने आये बाहर गाँव के, सिंगल तथा दिल्ली के ही अनब्याहे रह गए मर्द होते हैं। अपवाद में कुछ अन्य तरह के लोग भी, यहाँ आते हैं। इन लोगों की काम क्षुधा यहाँ आने से शांत होती है।

पापा ने तब कहा - जी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया। मेरी बेटी को, ये ही बातें मैं, घर पर बता सकता था, मगर जो मैं, समझाना चाहता हूँ वह, इसे, यहाँ के सोचनीय दृश्य दिखा देने के बाद, प्रभावी रूप से सरलता से, समझ आएगा। 

फिर पापा ने कुछ रूपये आंटी को देने चाहे थे। जिसे उन्होंने विनम्रता से लेने से मना कर दिया था। उन ने मेरी ओर देखते हुए उन्होंने कहा था - 

बेटी, तुम बहुत भाग्यवान हो। काश! मुझे भी तुम्हारे जैसे, अपने बच्चे का हित समझ सकने वाले पापा मिले होते तो मैं, जीवन में इस निकृष्टता के, यूँ दर्शन करने को विवश नहीं होती। 

काश! मुझे और कला जैसी अन्य अल्पवयस्क लड़कियाँ को सुलझी सोच रखने वाले परिवार मिलते। 

काश! हम अपने पिता से, अपने संकोच त्याग कर, बुरे लोगों के बहकावे वाली बातें बता सकतीं।

काश! हमारे बड़े-बुजुर्ग, बच्चों के संशय, धैर्य से सुनने वाले होते तो, हम जैसी लड़कियाँ, झाँसों में फंसकर कभी इस नर्क में ना पहुँचतीं।   

तब पापा ने हाथ जोड़कर उनसे विदा ली थी। घर लौटते हुए पापा चुप थे। मैं भी अप्रत्याशित रूप से बीते समय के, सदमे से बोलने की हालत में नहीं थी। जो कुछ समझ सकी थी उससे यही लग रहा था कि पालकों/अभिभावकों की चूक उनकी बेटियों को किस नारकीय जीवन को विवश कर सकती है। 

घर पहुँच कर, हमने स्नान किया था। भोजन के उपरांत, मम्मी ने पापा से पूछा था - आप, एक बेटी को घर में छोड़, अकेले इसे कहाँ घुमाने ले गए थे?

पापा तब चुप रहे थे। फिर जब मेरी, मुझसे चार वर्ष छोटी बहन, दादी के साथ उनके कमरे में गई थी तब, पापा ने मम्मी को सारी बात बताई थी। 

मम्मी ने सुनकर, नाराजी से कहा था - यह कैसा विचित्र काम किया आपने, बेटी पर इसके दुष्प्रभाव की कल्पना है, आपको? वहाँ के ख़राब लोग यदि आप और इसे, नुकसान पहुँचा देते तो क्या होता?

पापा ने कहा - नियति, तुम नाराज़ मत होओ। मेरी एवं बेटी की योग्यता पर विश्वास करो। बेटी को ऐसी जानकारियों का, मेरे सामने मिलना, भविष्य में उसकी भलाई का कारण ही बनेगा। 

दुनिया में हो रही खराबियों से, हम आँख मींच लेने से नहीं बच सकते। हमें और हमारी बड़ी हो रही बेटी को, आँख एवं कान खुले रखकर चलना होगा। तभी हम निकृष्ट बातों से, इन्हें बचा सकेंगे एवं इनके श्रेष्ठ जीवन की बुनियाद दे सकेंगे। 

मैंने पापा का समर्थन करते हुए कहा - हाँ मम्मी, पापा का तरीका विचित्र एवं एक अपवाद तो है मगर कारगर तरह से संदेशपरक है। 

यह सुनकर मम्मी, का गुस्सा कुछ शांत हुआ लगा था। 

उस रात मैं अपने कक्ष में, बिस्तर पर लेट कर उस बात का स्मरण कर रही थी जो आंटी ने, अंत में मुझसे कहा था। मैं, अपने पापा के लिए गर्व अनुभव करते हुए सो गई थी।           

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

16-10-2020


Thursday, October 15, 2020

आज के समय में मम्मी एवं पापा होने की पात्रता?

 समय पुराना था, बेटियाँ 12-14 वर्ष की वय में ब्याह दी जातीं थीं। जीवन में अपना अच्छा-बुरा वह ससुराल के सानिध्य में पहचानती थी। अब बेटियों के विवाह की उम्र दुगुनी हो गई है। आशय यह कि वह जीवन को समझने के आरंभिक काल में बेटियाँ अधिक समय अपने माँ-पिता के सानिध्य में रहती है। अब उन्हें अपने अच्छे-बुरे की पहचान, माँ-पिता के मार्गदर्शन में करनी होती है। 

तात्पर्य यहाँ यह लिखने का है कि - 

माँ-पिता होने की पात्रता, दायित्व एवं उनकी भूमिका, कालांतर में बदल गईं है। मैं अपने स्तर से अब पापा होने की परिभाषा एवं पात्रता, (अपनी समझ से) अपनी, नई लिखी जा रही धारावाहिक (सामाजिक) कहानी के माध्यम से लिख रहा हूँ। 

मैं जानता हूँ इस लंबी कहानी पढ़ने का समय, हर किसी के पास नहीं होगा। 

इस संक्षिप्त पोस्ट के माध्यम से मेरा अनुरोध है कि मेरे आदरणीय/आदरणीया प्रबुध्द मित्र अपने खाली समय में विचार अवश्य करें कि क्या हो गई है अब, आज के समय में मम्मी एवं पापा होने की पात्रता? 

तस्वीर में भी सुरक्षित नहीं (2)

 

तस्वीर में भी सुरक्षित नहीं (2)

इसके 4 दिन बाद, दोपहर में मुझे, पापा ने अपनी, इलेक्ट्रानिकली लिखी गई “मेरी कहानी” के प्रिंट आउट, एक फोल्डर में यथावत रखकर दिए। मैंने वह, अत्यंत हर्ष से उनसे, लिए थे। 

अपनी उत्सुकता पर नियंत्रण रख मैंने, इसे रात सोने के पूर्व, तसल्ली से पढ़ना तय किया। उस रात्रि मुझे, एक अभिनव विचार आया। जिसे क्रियान्वित करने के लिए मैंने, माँ से, उनका मोबाइल लिया और अपने कक्ष में अध्ययन टेबल पर जा कर बैठी थी। मैंने, मोबाइल में वॉइस रिकॉर्डिंग ऑन की फिर, कहानी को उच्चारित कर पढ़ना आरंभ किया - 

मेरी कहानी 

मैंने अब तक की कक्षाओं में जैसा प्रदर्शन किया था उससे मुझे, मुझ में कुशाग्र बुध्दि होने का आभास था। 

मैं अपनी मम्मी के साथ, उनके घरेलु कार्य में सहयोग करती, उससे मुझे, मुझ में कर्तव्य परायण होने का, गुण बोध भी था। 

लॉकडाउन में मैंने, लगन से चित्रकारी सीखी फिर अपनी तस्वीर, दक्षता से कैनवास पर खींच दी थी। तस्वीर इतनी जीवंत थी, कि देखने वालों को मैं ही सामने, साक्षात बैठी लगती थी। मेरी निर्मित यह तस्वीर, इस बात का द्योतक थी कि मुझ में, उत्कृष्ट कलाकार की संभावनायें निहित थीं। साथ ही मुझे, अपने अत्यंत रूपवान होने का भी ज्ञान था। 

स्पष्ट था कि भगवान ने सभी कुछ, यथा - सुंदरता, बुध्दिमत्ता, कला, लगन, क्षमताओं की अनुभूति एवं कर्तव्य विवेक, जन्म जात मुझ में संपूर्णता से दिया था। मुझ में, अपनी ऐसी योग्यताएं होना, मुझे अपनी 12 वर्ष की आयु में ही, समझ आ गए थे। 

यद्यपि उस दिन दादी एवं मम्मी की बातों से मुझे अनुभव हुआ कि भगवान जिसे लड़की बनाता है उसमें बड़ी कमी दे देता है। तब भी मुझे प्रतीत हो रहा था कि मेरी #तस्वीर और #तकदीर भगवान ने अच्छी गढ़ी थी।

मेरे पापा कहा करते हैं कि सब कुछ ईश्वर ही नहीं करता है। वह, मनुष्य के करने पर भी कुछ छोड़ता है। यह याद आने पर, मैंने तय किया कि अगर लड़की होना कमी समझी जाती है तो मुझे जीवन में अपनी बुध्दिमत्ता से, वह #तदवीर करनी है जिससे सिध्द हो सके कि लड़की होना, कोई कमी नहीं होती है। 

मम्मी एवं दादी से पूछने पर मेरी अधिकतर जिज्ञासाओं के बारे में उन्होंने, मेरे पापा से पूछा जाना उपयुक्त बताया था। अतः मैंने यह उचित माना कि अपनी तदवीरें मैं, पापा के मार्गदर्शन में करूँ। 

एक दिन, मैंने अपना संशय लेकर पापा से प्रश्न किया - पापा, लड़कियों से, लड़कों के समान रूप से बर्ताव क्यों नहीं किया जाता है? हममें क्या दोष होता है जिसके कारण हमसे भेदभाव किया जाता है?  

पापा ने बताया - दोष, लड़की होने में नहीं है और ना ही दोष, लड़की के किये का होता है। अपनी अपनी विशेषताओं के साथ लड़की एवं लड़के दोनों ही परिपूर्ण एवं समान मनुष्य होते हैं। 

मैंने पूछा - पापा, लेकिन सभी के हमसे व्यवहार में हमें, समानता अनुभव नहीं होती है, ऐसा क्यों है?

पापा ने बताया - बेटी, अपनों के बीच बेटे, बेटियाँ समान रूप से ही देखे-जाने जाते हैं। 

मैंने कहा - पापा, हम तो दोनों बहने हैं, हमें अपनों के बीच कोई अंतर मालूम नहीं पड़ता है। मगर, मेरी फ्रेंड अनु एवं उसका जुड़वाँ एक भाई है। वह मुझे बताती है कि घर में जो अनुमतियां, भाई को होती हैं, वह उसे नहीं होतीं हैं। घर में वे दोनों ही, अपनों के बीच होते हैं, तब भी उनमें भेदभाव किया जाता है। 

पापा ने बताया - मैं नहीं समझता कि अनु के लिए, उनके अपनों के बीच वास्तव में, कोई भेदभाव होगा। निश्चित ही ये दोनों भाई-बहन, अपने माँ-पापा के समान लाड़ दुलारे होंगे। ज़माने में अन्य की बेटी को देखे जाने वाली परायों की बुरी नज़र के कारण, उनमें अनुमतियों का अंतर, पालकों की विवशता के कारण होगा। 

पालक कोई भी हों, अपनी बेटी की सुरक्षा एवं सम्मान पर आशंकाओं को देखकर ही वे, उनके लालन-पालन में अंतर को विवश होते हैं। 

मैंने फिर पूछा - पापा, जब हम भारत में रहते हैं तो यहाँ (पराया) बाहरी कौन हैं। क्या सभी यहाँ, अपने नहीं होते हैं?

पापा ने बताया - जो तुम कह रही हो वह परिदृश्य प्राचीन भारत में था। जिसमें सभी, अपने होते थे। तब किसी भी घर परिवार की बहन-बेटियाँ, समाज के सभी परिवारों में, अपनी बहन-बेटी जैसी दृष्टि से देखीं-समझीं जातीं थीं। लगभग 900 वर्ष पूर्व, बाहरी आक्रमणकारियों ने हमें ग़ुलाम बना कर हम पर अपना शासन स्थापित किया।

दुर्भाग्य से उन्होंने, हमें शत्रु रूप मानते हुए, हमारी बहन-बेटियों के माध्यम से हमारे मान-सम्मान को लक्ष्य किया। शत्रु की बहन-बेटियों को जोर जबरदस्ती से, अपनी कामुकता का शिकार बनाना, हमारे देश में उनकी दी गई बुरी परंपरा है। 

तभी से अपहरण, दुष्कृत्य एवं हत्या के भय से, बहन-बेटियों को घर एवं परिवार में सीमित रखने एवं उनके अतिरिक्त परदों में रहने का रिवाज, हमारे भारत में आया। अन्यथा इसके पूर्व तक हमारी संस्कृति में हमारा यदि कोई शत्रु भी यदि होता था तो वह भी हमारी बहन बेटियों के आदर-स्वाभिमान का रक्षक ही होता था।  

मैंने पूछा - अब तो हमारा भारत स्वतंत्र है, फिर भी लड़के-लड़कियों में यह भेदभाव, क्यों जारी हैं? 

पापा ने बताया - दुर्भाग्य है बेटी, उन आक्रांताओं ने धूर्तता से अपनी कुसंगत से हम भारतीयों की नज़रों में भी खराबियाँ पैदा कर देने का बुरा कार्य किया। यह ख़राब नीयत-नज़र की अप संस्कृति, हम भारतवासियों को परस्पर अपनों सा नहीं बल्कि बाहरी शत्रु जैसा व्यवहार को दुष्प्रेरित करती है। यही अपने हुए पराये, देश में मौके मौके पर देश की बहन-बेटियों को अपनी कामुकता का शिकार बनाते हैं।  उन्हें बरगलाते हैं, उनके अपहरण, दुष्कृत्य एवं हत्या किया करते हैं। 

मैंने प्रश्न किया - पापा, अगर ऐसा है तो अनुमतियों पर ऐसी पाबंदी, बेटी की जगह तो बेटे पर होनी चाहिए?  

पापा ने बताया - जब कोई उत्पाद, मात्रा में बढ़ाया जाता है तो प्रायः उसकी गुणवत्ता में कमी आ जाती है। ऐसे ही, हमारी देश की जनसँख्या बढ़ी है। कई कई संतानों का बोझ, माता-पिता होने की भूमिका में उन्हें असफल करते हैं। ऐसी असफलता में, पालकों ने बेटियों पर सख्ती की एवं बेटों को स्वछंद छोड़ा। ऐसे संस्कारहीन बेटों को कोई अन्य माता-पिता सुधार नहीं सकते।अन्य वे, लाचारी में बिगड़ैल लड़कों बचाने के लिए बहन-बेटियों पर ही पाबंदी एवं रोकटोक रखने को विवश होते हैं।  

पापा की कुछ बातें मुझे, समझ- आईं थीं, कुछ नहीं आईं थीं। इस पर और कुछ ना कहते हुए मैंने पूछा -  पापा यह, दुष्कृत्य, काम रोगी, कामुक, काम पिपासा, अनियंत्रित यौनेक्छा आदि बातें, मुझे प्रायः सुनने -पढ़ने मिलतीं हैं। इनके अर्थ क्या होते हैं? 

पापा ने कहा - बेटी, आज शाम मैं, तुम्हें अपने साथ एक जगह ले जाऊँगा। वहाँ से, तुम्हें बहुत से प्रश्न के उत्तर मिल सकेंगे। यद्यपि वह, ऐसी जगह है जहाँ कोई पिता, अपनी बेटी को लेकर नहीं जाता है। 

मैंने पूछा - पापा, ऐसा है तो आप, मुझे क्यूँ ऐसी जगह लेकर जा रहे हैं?

पापा ने कहा - बेटी, पापा होने के कारण मैंने तुम में वह गुण होना देखा है जिससे तुम किसी भी वस्तु में अच्छी-बुरी बातों को पृथक पृथक देख लेती हो। फिर उस वस्तु में से, अच्छाई ग्रहण करती हो एवं बुराई त्याज्य रखती हो। 

अपनी प्रशंसा से मैं प्रसन्न हुई थी। मैंने पूछा - पापा, मुझ में कौन सी बात देखकर, आपने यह निष्कर्ष निकाला है। 

तब पापा ने बताया - बेटी, प्रायः हर वस्तु में, कुछ ग्रहण योग्य एवं कुछ त्याजनीय बातें होतीं हैं। ऐसे ही स्कूल भी होता है। तुम स्कूल से ग्रहण करने वाली बात अर्थात अध्ययन में तो अपना ध्यान लगाती हो, जबकि वहाँ अपने सहपाठियों की बुराइयों में नहीं पड़ती हो। 

इस पर मैंने सोचा फिर कहा - हाँ पापा, यह तो है तभी मैं, प्रथम आया करती हूँ। 

वास्तव में, यह बाद के जीवन में मुझे, रियलाइज होना था कि मेरे गुण से अधिक, यह मेरे पापा में गुण था कि वह स्नेह एवं प्रशंसा के माध्यम से, मेरे सीखने-समझने को सहज ही सही दिशा दे दिया करते थे। ये पापा ही थे जो, हर वस्तु में अच्छाई एवं बुराई का (आभास) भेद, उस वस्तु तक, मेरे पहुँचने के पहले ही यथा प्रकार, मुझे करा दिया करते थे। 

उस शाम मेरे पापा मुझे स्वामी श्रध्दानंद रोड ले गए थे। वहाँ का दृश्य, मेरी अब तक देखी दुनिया से भिन्न था। 

वहाँ घरों के बाहर कम वस्त्रों में नवयुवतियाँ दिख रहीं थीं। वहाँ सड़कों पर नशा किये हुए पुरुष ज्यादा थे। विचित्र भंगिमाओं में, ये युवतियाँ आवाजें लगा कर उन पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित कर रहीं थीं। ऐसा देख कर मैंने, अपने पापा का हाथ थाम, स्वयं को उनके पीछे कर लिया था। 

तब सामने घर के दरवाजे पर बैठी एक अधेड़ सी औरत (आंटी) ने मुझे घूरते हुए, मेरे पापा से कहा - कहाँ से उठा लाया है? माल तो अभी कच्चा है। इसे पकाने में 2-4 साल लग जायेंगे। 

मुझे कुछ समझ नहीं आया था। उस आंटी की दृष्टि से मैं, घबरा गई थी। पापा मगर अविचलित थे, जैसे कि इस व्यवहार एवं बातों का उन्हें पूर्व अंदेशा रहा हो। 

वे, उस आंटी के पास रुके थे। आंटी से, उन्होंने बोला - यह मेरी बेटी है। आप जो समझ रहीं हैं वैसा कुछ नहीं है। मेरी इस बेटी के कुछ प्रश्न हैं, जिनके उत्तर दिलाने के लिए मैं, इसे यहाँ लाया हूँ। 

आंटी हँसी थी - तुम पागल तो नहीं, मैंने कोई बाप नहीं देखा जो 11-12 साल की लड़की को सिखाने के लिए हमारे क्षेत्र में लाता हो। फिर हमारा समय, फ़ालतू भी नहीं कि हम मुफ्त ऐसी समाज सेवा करें। 

पापा ने कहा - जी, सिनेमा, टीवी, नेट या अपने समवयस्क बच्चों से प्राप्त आधे अधूरे तरह का ज्ञान, मेरी बेटी को पथ भ्रमित कर सकता है। इसे, ऐसे भ्रम ज्ञान से बचाने के लिए मुझे उचित प्रतीत हुआ है कि मैं स्वयं ही, इसे सच्चे मित्र की भाँति, इसके संशयों का सही उत्तर दिलाऊँ। 

इसी विचार से मैं, इसे यहाँ लाया हूँ। आप सही कह रहीं हैं, आप निश्चिंत रहें, मैं मुफ्त आपका समय ख़राब नहीं करूँगा। आपका थोड़ा समय, बेटी के सामने आप से बात करने में लेकर, मै एक ग्राहक जितनी कीमत, आपको अदा करूँगा। 

मुझे ग्राहक एवं कीमत जैसी बातें समझ नहीं आईं थीं। उस आंटी के मुख पर पापा की बात से विचार करने जैसे भाव दर्शित हुए थे। फिर उन ने कहा था - 

कीमत लेकर तो हम, समाज सेवा रोज ही किया करते हैं। आज, मगर बिना कीमत लिए, आपकी जैसी ही विचित्रता से, एक समाज सेवा के कार्य में, जितना आप और ये बेटी चाहेगी, मैं सहर्ष अपना समय दूँगी। 

कहते हुए आंटी ने, हमें दरवाजे से अंदर प्रवेश करने को स्थान दिया था। उनके स्वर में अब पापा के उपहास की जगह सम्मान परिलक्षित हुआ था। इससे मेरा भय मिटा था। पापा सहित मैं, आंटी के साथ अंदर एक कक्ष में पहुँचे थे। जिसमें रखे, एक पुराने से सोफे पर, उस आंटी ने हमें बिठाया था। 

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

15-10-2020