Saturday, September 19, 2020

मेरे पापा (3) ..

 मेरे पापा (3) .. 

माँ ने, हामी में सिर हिला कर उत्तर दिया था। 

तुरंत ही मैंने जिज्ञासु स्वर में पूछा - क्या बताया, उन्होंने? 

माँ ने कहा - जो उन्होंने बताया उसका सार यह है कि सारिका जी एवं सुधीर जी की शादी 28 वर्ष पूर्व हुई थी। विवाह रस्मों में हिस्सा लेने के बाद लौटते हुए, सारिका जी की बड़ी बहन, बहनोई अपने माता, पिता एवं अबोध शिशु के साथ, जब अपने शहर जा रहे थे तब, राजमार्ग पर देर रात्रि में, उनकी कार, 10-12 नक्सलाईट्स ने अवरोध डालकर जबरन रोकी थी।

उस समय, सारिका जी के बहनोई का आईपीएस अधिकारी होना, नक्सलाईट्स को पता चला था। उन लोगों ने, पुलिस के प्रति अपनी नफरत में, कार में मौजूद सभी लोगों की निर्ममता से हत्या कर दी थी। अगली सुबह, हादसे की सूचना, सुधीर जी को मिली थी। वे शवों के लेने तथा उनके दाह संस्कार करने के विचार से, थाने पहुँचे थे। वहाँ उन्हें शवों के साथ ही, 5 माह का बहनोता, सुशांत जीवित सौंपा गया था। 

सुधीर जी, इस हृदय विदारक हत्याओं से अत्यंत दुःखी हुए थे। उन्होंने, इन मौतों का जिम्मेदार स्वयं को ही माना था। वे सोचते थे कि वे सभी, उनके विवाह में ना आये होते तो, इस तरह मारे नहीं जाते। 

इसके प्रायश्चित में सुधीर जी ने सुशांत का लालन पालन, अपने (हुए होते) बेटे की तरह करने का निर्णय किया। सारिका जी ने, सुधीर जी की भावनाओं का आदर किया था। 

उन दोनों ने मिलकर, अपने विवाह के पहले सप्ताह में ही, यह तय कर लिया कि वे अपनी संतान नहीं करेंगे। उन्हें संदेह था कि स्वयं की संतान होने पर, कहीं दोनों ही, सुशांत एवं अपनी संतान में भेद ना करने लगें। 

सारिका जी ने यह सब ऐसा कहते हुए, बताया कि - सुशांत तक को, यह वास्तविकता नहीं मालूम कि वह मेरा जन्म दिया बेटा नहीं है। सुशांत के विवाह होने के बाद, इस सच्चाई का पता होने से आप लोगों को यह नहीं लगना चाहिए कि हमने, आप से इसे छिपाया था। इस विचार से सुधीर जी ने, मेरे द्वारा अभी ही यह, आपको बताया जाना उचित माना है। 

यह सब सुनकर मेरा नारी हृदय द्रवित हो गया था। वह कोई तर्क मुझे, समझ नहीं आ रहा था जिसमें, कोई इस क्रूरता से अंजान लोगों की हत्या कर देता है। किसी वर्ग विशेष की, अन्य वर्ग विशेष के प्रति ऐसी नफरत, मेरे नारी मन की समझ से परे थी।

नक्सलाइट्स की पुलिस के प्रति नफरत तो समझी जा सकती थी लेकिन, किन्हीं अंजान व्यक्तियों को, पुलिस परिवार के होने मात्र से, ऐसे मार देना मेरी समझ में, हैवानियत पूर्ण एवं सर्वथा अनुचित कृत्य था। 

ऐसा जघन्य कृत्य, किसी भी मानव को, यदि वह इस पर ध्यान पूर्वक, गंभीरता से विचार करे तो  भावनात्मक एवं वैचारिक रूप से उद्वेलित करने वाला हो सकता है। मगर मेरी माँ ने इसे, अपनी अपेक्षाओं से बिना विचारे एक घटना की जानकारी होने जैसा ही लिया था। 

जब ऐसी हृदय विदारक घटना से इस परिवार एवं सुशांत के प्रति उनका हृदय संवेदना से भर जाना चाहिए तब मेरी माँ अपनी बेटी के (मेरे) भविष्य को लेकर ही अपनी मोहपाश में बँधी प्रतिक्रिया दे रहीं थीं। 

साफ़ था एक ही घटना के प्रति इस समय, मेरे और उनके दृष्टिकोण, एकदम विपरीत थे। अपने मनोभाव छुपाते हुए मैंने माँ से कहा - माँ, बताये गए इस विवरण से, सुशांत उनका बेटा नहीं, यह स्वमेव ही महत्वहीन हो जाता है। 

मेरी कही को अनसुनी करते हुए, माँ ने नापसंदगी से कहा - सारिका जी ने यह भी बताया है कि सुशांत, जब हमें सुविधा हो हमारे घर आना चाहता है। मैंने, उन्हें अभी टाल दिया है. मैंने कहा है, रमणीक के ऑफिस के कार्यों में सुविधा अनुसार, हम सुशांत को घर मिलने आने के लिए, दिन एवं समय बता देंगे। निकी तुम, मेरी मानो तो मुझे तो यह प्रस्ताव, इन मालूमातों के बाद स्वीकार करने योग्य नहीं लग रहा है। 

मैं समझ पा रही थी कि उनकी, मेरे से ममता ने, उनकी आँखों पर वह चश्मा डाल दिया था जिसमें, उस परिवार के उत्कृष्ट सिध्दांत एवं विचार भी उन्हें सुहा और प्रभावित नहीं कर पा रहे थे। सुशांत के आर्मी ऑफिसर होने का पता चलने के बाद से उनमें यह परिवर्तन आया था। 

मैं अभी सोच ही रही थी कि माँ ने पूछा - निकी, क्या मुझे, उनसे अभी ही यह नहीं बता देना चाहिए कि हम सुशांत से रिश्ता नहीं जोड़ पाएंगे?

इस समय मैं, माँ से बिलकुल ही विपरीत तरह से विचार कर रही थी। मैं भीतर ही भीतर प्रसन्न थी कि मेरी आशंकाओं के उलट, मेरे साधारण रूप को देखने के बाद भी सुशांत की मुझ में रूचि बनी हुई थी। तब भी मुझे माँ के मनोविज्ञान को समझते हुए ही उनके समक्ष, अपने तर्क रखते हुए, उन्हें रिश्ते के लिए चलते सिलसिले को बढ़ने देने के लिए सहमत करना था। 

मैंने कहा - अभी आप सुशांत से नहीं मिलीं हैं, उसे देख लीजिये, उससे मिल लीजिये। उसके बाद तय कर लेंगे क्या करना उचित होगा। अभी जल्दबाजी में ना करना, मुझे ठीक प्रतीत नहीं हो रहा है। 

जैसे माँ का आदर रखते हुए मैं, बात कह रही थी। वैसे ही अपनी नापसंदगी के बावजूद माँ भी, मेरी भावनाओं को आहत नहीं करते हुए, मुझे समझाने की नीयत से बोली थीं - 

निकी, सुशांत लाख हीरा सही मगर, तुम समझो तो कि वह एयरफोर्स में है और सीमा पर इसी समय युध्द के बादल छाये हुए हैं। मुझे तो उसके साथ, तुम्हारे जीवन की कल्पना से ही भय लगने लगा है। 

मैंने प्यार से उनसे कहा - 

माँ, आपका ऐसे भयाक्रांत होना मुझे समझ आता है। हमारे परिवार में किसी के फौजी होने का इतिहास नहीं है इसलिए हम डरते हैं। जबकि हर सैन्य कर्मी का, देश के रक्षा दायित्वों के साथ अपनी आजीविका चलाना, महान गौरवशाली उपलब्धि एवं कार्य होता है। रात ज्यादा हो रही है, अभी आप सो जाइये । कल सुबह, इस रिश्ते के सभी पहलू पर हम फिर विचार कर लेंगे। 

माँ ने अमनस्कता एवं दुविधा के होते हुए भी मेरी बात का प्रतिरोध नहीं किया बोलीं - 

ठीक है निकी अभी तुम भी निश्चिंत हो सो जाओ। हम कल फिर बात करेंगे। हो सके तो, तुम्हारे जीजू से भी बात कर लेंगे। 

यह कहकर वे अपने कक्ष में चली गईं थी। 

जीजू के नाम के उल्लेख से मेरे मन में वितृष्णा भर गई। सब के सामने अत्यंत सलीके से पेश आने वाले जीजू, उतने अच्छे व्यक्ति नहीं हैं, जितना माँ और दीदी उन्हें समझती हैं। मैंने जीजू की एक बात, उनसे छुपाई हुई है ताकि दोनों के मन में उनके प्रति चिढ ना आ जावे। 

हमारे छोटे से परिवार में, मैं, अपने कारण परस्पर कोई खटास उत्पन्न नहीं करना चाहती थी। मैं, जीजू को इस तय होते दिख रहे रिश्ते में अभी कोई भूमिका देना पसंद नहीं कर रही थी। मैं, माँ को इसके लिए समझा सकूँगी इस विश्वास से मैंने, जीजू को अपने विचारों से बाहर निकाल दिया था।    

अब मुझे अपने पापा की (जब जीवित थे) कही बात याद आ गई थी कि - 

दुश्मन से अगर ज्यादा समस्या हो जाए तो उसी से समाधान पूछना चाहिए। अगर वह भला व्यक्ति होगा तो निःस्वार्थ एवं निष्पक्ष समाधान स्वयं बताएगा। यह जरूरी नहीं कि हमारा दुश्मन ही खराब व्यक्ति होता है। कभी कभी खराबी हम में ही होती है, जिसे हम अनुभव नहीं कर पाते हैं। 

यह सोचते हुए कि यद्यपि सर और उनका परिवार, हमारा दुश्मन तो नहीं था तथापि उनके ओर के प्रस्ताव एवं मेरे भविष्य को लेकर माँ की चिंता से, हम दोनों परिवारों के बीच एक समस्या अवश्य निर्मित हो गई थी। उसके हल के लिए मैंने, सर से ही बात करना उचित समझा।     

मैंने घड़ी पर दृष्टि डाली, देखा 10.20 का समय हो रहा था। मैंने विचार किया कि सर से बात करने का यह समय उचित होगा या नहीं। फिर मैंने उन्हें एक मिस कॉल करने का निर्णय किया। उनका नं मिलाया, एक घंटी बस की, और बंद कर दिया था। यह सर पर छोड़ दिया कि वे अभी बात करें या नहीं। 

दो मिनट में ही उनका कॉल आ गया, उन्होंने पूछा - निकी, कोई विशेष बात है?

मैंने उल्टा प्रश्न किया - क्षमा कीजियेगा सर, क्या आप, अभी थोड़ी बात कर सकेंगे। 

उन्होंने कहा - हाँ, निःसंकोच कहो?

मैंने कहा - सर, आपसे मुझे, पापा वाला मार्गदर्शन चाहिए। क्या दे सकेंगे, आप?

उन्होंने कहा - रमणीक, यह विशेषाधिकार तुम्हें है। मैं तुम्हारी दुविधाओं में, तुम्हारे ही पापा जैसा, मार्गदर्शन करने का प्रयास करूँगा। 

मैंने बिना अन्य भूमिका के उनसे पूछ लिया - सर, कृपया यह बात अपने तक ही रखना, मैं यह जानना चाहती हूँ कि सुशांत जो एक फौजी हैं, मेरा, उनकी जीवन संगिनी होना मेरे हित में होगा?

दूसरी तरफ कुछ क्षणों की चुप्पी रही। साफ था कि सर के लिए मेरा, यह प्रश्न अप्रत्याशित था। उन्होंने उत्तर देने के पहले विचार करने को कुछ पल लिए थे। फिर उत्तर दिया था - 

रमणीक, तुम्हारे प्रश्न में दो मुद्दे हैं। 

पहला - तुम्हारे से, हमारे परिवार की अपेक्षा। इस पर मैं यही कहूँगा कि हमारे बेटे सुशांत की खूबियों एवं कमियों को तुम एवं तुम्हारे परिवार को खुद समझना चाहिए। सुशांत के बारे में मेरे कहने में, उसके पिता होने के पूर्वाग्रह हो सकते हैं। जिनसे मैं, तुम्हें प्रभावित नहीं करना चाहता। 

दूसरा मुद्दा एक फौजी से तुम्हारा, जीवन भर के साथ के, निर्णय लेने का है। इस बारे में मेरा मानना है कि फौजी अकाल शहीद होते हैं, यह भ्राँत धारणा, उन परिवारों में होती है जिनका कोई सदस्य फौजी नहीं होता है। 

फौजी वास्तव में कोई आतंकवादी नहीं होते जो, आतंकवाद का हिस्सा हो जाने के 5 वर्ष के भीतर ही, 80% से अधिक मार गिराए जाते हैं। आँकड़ों को यदि तुम देखोगी तो तुम्हें दिखाई देगा कि 1 प्रतिशत से भी कम ही फौजी अकाल शहीद होते हैं। शेष फौजी, अपना पूरा जीवन, सगर्व जीते हैं। 

अतः आर्मी ऑफिसर की जीवनसंगिनी होने से या उनके परिवार में सदस्य होने से, यह शहादत वाला भय व्यर्थ होता है। अकाल मौत का होना इतने ही प्रतिशत लोगों में तो, सेना में नहीं होते हुए भी रहता है।

आर्मी फैमिली में बहुधा एक अन्य कठिनाई या वेदनादायी स्थिति निर्मित होती रहती है। वह यह कि जब जब सीमा पर या देश के भीतर कोई डिस्टर्बेंस होता है और घर का सेना में शामिल सदस्य, वहाँ तैनात होता है, तब तब उसके जीवन को लेकर, परिवार में गहन चिंता रहा करती है। 

ऐसे में सामान्य बने रहने के लिए मानसिक रूप से दृढ होने की जरूरत होती है। तुम्हें सुशांत से विवाह का फैसला लेने के पूर्व, अपनी मानसिक क्षमताओं का परीक्षण अवश्य करना चाहिए। तुम्हारे प्रश्न पर यही मेरा परामर्श है। 

यह कह कर सर, चुप हुए थे। मैं उन्हें अब तक मंत्र मुग्ध हो सुन रही थी। उनके चुप होने पर मैंने, कहने के लिए शब्द खोजे थे फिर कहा था - 

सर, मुझे लगता है मेरे पापा होते तो शायद वे ही इस तरह से, मेरा मार्गदर्शन कर पाते। मैं, कैसे आपसे अपनी कृतज्ञता व्यक्त करूं, मुझे उचित शब्द ही नहीं सूझ रहे हैं। 

सर की हल्की हँसी सुनाई पड़ी थी। फिर उन्होंने कहा था - 

मुझ में,तुम, अपने पापा की छवि देखती हो फिर क्यूँ इस  औपचारिकता में पड़ती हो। रात ज्यादा हो रही है। अब तुम्हें निश्चिंतता से, सो जाना चाहिए। 

मैंने हँसकर, सर से शुभ रात्रि कहा था उन्होंने भी यही कह कर, कॉल काट दिया था। 

अब मैं, सुशांत से मिलकर लौटने से लेकर, अब तक रहे तनाव से, स्वयं को मुक्त अनुभव करते हुए सो गई थी। 

अगली सुबह मैंने सबसे पहला काम अपने ऑफिस से अवकाश के लिए मेल लिखने का किया था। माँ के साथ चाय लेते हुए उन्हें, सर से रात में की गई, सभी बात बताईं थीं। 

फिर मैंने उनसे कहा था, माँ ये इतने भले लोग हैं इनकी भलमनसाहत हर अगले दिन और अधिक बढ़कर अनुभव में आती है। आप एक बार सुशांत को घर आने दीजिये, उससे मिलकर देख लीजिये। 

माँ ने मेरी भावना को समझा था, वे क्यूँ न समझतीं! पापा के बाद, वे मुझसे ही तो सबसे ज्यादा करीब थीं। उन्होंने कहा - फिर बताओ, सुशांत को कब आने कहूँ?

मैंने कहा - आज ही लंच पर आमंत्रित कर लीजिये। मैंने ऑफिस से आज का अवकाश ले लिया है। 

मेरी चिंता में आधी हो रही मेरी माँ ने मेरी अधीरता को पहचाना था। अपनी चिंताओं को, इस क्षण में अपने से परे धकेल, वे मुस्कुराईं थीं। फिर उन्होंने कॉल पर, सारिका आंटी से, सुशांत को 12.30 पर आने का निमंत्रण दे दिया था। 

सुशांत आर्मी ऑफिसर थे ही, समय की पाबंदी से ठीक 12.30 पर घर के दरवाजे पर आये थे। दरवाजे पर स्वागत माँ ने ही किया था। उन्हें बैठक कक्ष में बिठाया था। 

फिर माँ अंदर मेरे पास आईं थीं। उन्होंने धीमे स्वर में बताया - सुशांत, आ गया है। दरवाजे पर ही उसने, मेरे चरण छुए हैं। क्या पर्सनैल्टी है, वाह! लड़का हीरा ही नहीं, कोहिनूर भी है।

मैं, माँ का मुख निहारने लगी थी। मैं जानना चाहती थी कि माँ के श्री मुख से यह बात उनके पैर छुए जाने की ख़ुशी मात्र से निकल रही है या वे युवा आर्मी ऑफिसर के, प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुई हैं?                                       


(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

19-09-2020


Thursday, September 17, 2020

मेरे पापा (2) ..

मेरे पापा (2) .. 

रविवार को मात्र 9 दिन थे मगर बीते यूँ थे जैसे कोई बड़ा अरसा हो। इस बीच मेरे सुशांत से विवाह संभावना को लेकर मिलने जाने की बात मेरी माँ, मेरे जीजू-दीदी से बताना चाहती थी। मैंने उन्हें रोका था। यह बताये जाने पर इसमें मैं, जीजू का अनावश्यक दखल देख रही थी। यह मुझे इस समय सहन नहीं था। माँ, मान गई थीं। उन्होंने यह कहा कि - ठीक है बात यदि आगे बढ़ती है तो बता देंगे। 

फिर प्रतीक्षित वह घड़ी आई थी जब रविवार आया एवं तय अनुसार 12.30 पर मैं उनके घर पर पहुँची थी। इसके पूर्व मैंने गिने चुने अवसरों पर ही साड़ी पहनी थी। लेकिन सर के, सादगी के सिध्दांत को ध्यान में रखते हुए मैंने गुलाबी साड़ी के साथ सुर्ख लाल ब्लॉउज पहना हुआ था। साड़ी में मुझे असुविधा अनुभव हो रही थी। मैं बिना सुशांत को देखे ही, उससे शादी को मरी जा रही थी अतः इंकार की आशंका से मैं अत्यंत मानसिक दबाव में भी थी। 

दरवाजा सर ने ही खोला था। मैं उनके चरण स्पर्श के लिए झुकी थी। उन्होंने मेरे हाथ बीच में ही थाम कर, रोक दिए थे। आशीर्वाद में कहा - सदा खुश रहो। 

उनका स्पर्श, मुझे बिल्कुल अपने पापा के हाथों से मिलता लगा था। वे मुझे, अत्यंत स्नेह से अंदर के कमरे के सोफे तक ले गए थे, उन्होंने मुझे बैठने कहा था। तब उन्होंने आवाज दी थी - सारिका, रमणीक आ गई है।

ऑन्टी का नाम सारिका है, मुझे तब पता चला जब, आवाज सुन ऑन्टी कमरे में हँसते हुए आईं थीं। मैंने उनके चरण छुये थे। उन्होंने ममत्व से मेरे सिर पर हाथ रखते हुए मुझे, सोफे पर अपने साथ बिठाया था। 

अब मेरी जिज्ञासा सुशांत को लेकर बढ़ रही थी कि वह अब तक सामने क्यूँ नहीं आया है? मेरे मन को शायद, सर ने पढ़ लिया था। वे यह कहते हुए उठे थे कि - मैं, सुशांत को लेकर आता हूँ। 

सर के, भीतर जाने के बाद ऑन्टी ने हँसते हुए मुझे बताया कि - यह सुशांत का आइडिया है। वह तुम्हें वह फीलिंग देना चाहता है जैसे पूर्व के दिनों में कोई लड़का, लड़की देखने पहुँचा होता था और उसे, लड़की के घर के सत्कार से मिलती थी। 

सुशांत हमेशा से शरारती रहा है। कहता है, अब दिन बदले हैं। अब लड़कियाँ, लड़कों से हर क्षेत्र में बढ़त लेने को उत्सुक हुईं हैं। 

सुशांत के, मुझे देखने के आने के स्थान पर, ऑन्टी का सुशांत से, मिलवाये जाने के मुझे, विचित्र लगते बुलावे के पीछे की लॉजिक अब मैं समझ पा रही थी। 

मुझे लेकर सुशांत का यह व्यवहार बहुत भाया था। मैं सोचने लगी कि अपने को मिलता महत्व, किसे बुरा लगता है? चाहे वह लड़की ही क्यों न हो, होती तो वह भी लड़कों की भाँति मनुष्य ही है। 

मैं यह सोच ही रही थी कि सर और एक नौजवान कक्ष में आते दिखाई दिए। यह नौजवान ही, कदाचित सुशांत था। उसके हाथ में एक बड़ी ट्रे थी जिसमें, सूखे मेवों एवं फलों के साथ शिकंजी के गिलास थे। 

सुशांत के द्वारा प्रस्तुत किया दृश्य अत्यंत नाटकीय था। सुशांत की आँखे झुकी हुईं एवं चेहरे पर संकोच दर्शित था। मुझे आ रही हँसी को रोकने में, बहुत मेहनत करनी पड़ी थी। साथ ही मेरे मन में यह विचार भी आया कि यह लड़का ना हो, कहीं मंद बुद्धि तो नहीं!

ऑन्टी ने भी मेरी तरह अपनी हँसी रोकी थी। उन्होंने, ट्रे लिए, सामने खड़े सुशांत से कहा था - बेटे, बैठो। 

यह सुनकर सुशांत ने ट्रे सेंटर टेबल पर ऐसे रखी थी कि गिलास कुछ टकराये थे एवं उसमें रखा तरल कुछ छलक आया था, जैसे कि उसके हाथ काँपे हों। फिर वह सिमटा सा, सामने के सोफे पर बैठा था। 

अब मैंने उसे पहली बार गौर से देखा था। वह ऊँचा, गठीले बदन का अत्यंत सुंदर नौजवान था। वह अब वापिस खड़ा हुआ था। उसने ट्रे में से, एक खाली तश्तरी मेरी तरफ बढ़ाई थी। मेरे थामने के बाद उसमें सर्विंग स्पून से, कुछ कटे हुए फल एवं मेवे परोसे थे। 

ऐसी ही प्लेट्स उसने सर एवं ऑन्टी को भी दीं थी। इस समय उसकी सभी गतिविधियां सधी हुईं थीं। जिससे यह साफ था कि टेबल पर रखते हुए ट्रे में, गिलासों का टकराना सुशांत के अभिनय की देन थी। 

सभी को सर्वे करने के उपरान्त सुशांत ने अपने लिए शिकंजी का गिलास लिया था और वापिस सामने सोफे पर बैठा था। सर ने मुझे, नाश्ता ग्रहण करने कहा था। मैंने सुशांत की ओर देखते हुए फ़ल खाना शुरू किया था। साथ ही सब भी खाने लगे थे। मैंने देखा तो सुशांत शिकंजी के घूँट भर रहा था। 

अब ऑन्टी ने मुझसे कहा - रमणीक, यह हमारा बेटा सुशांत है। तुम इसके बारे में जो भी जानना चाहती हो इससे पूछो। 

ऑन्टी के ऐसा कहे जाने पर, कुछ क्षण पूर्व मेरे मन में उठी शंका का मुझे ख्याल आया, यह छबीला सुंदर लड़का मंद बुध्दि तो नहीं? इस प्रश्न पर, उसका परीक्षण करने के विचार से मैंने सुशांत से पूछा - आप कौन सा जॉब करते हैं?

सुशांत ने अब अभिनय करना छोड़ा था। मुझे सीधे देखते हुए उत्तर दिया था - जी, मैं एयर फ़ोर्स में, फ्लाइट लेफ्टिनेंट हूँ। 

उत्तर से चौंकने की बारी मेरी थी कि सुशांत, आर्मी में है। मुझे हाल ही का #अभिनंदन वर्तमान का, अदम्य साहासिक कारनामा स्मरण हो आया। 

मैंने अपने को संयत रखते हुए अगला प्रश्न किया था - आपकी पोस्टिंग कहाँ है? 

सुशांत ने बताया - अभी तक मैं तिरुअनंतपुरम मुख्यालय में पदस्थ था। मेरे 20 दिन के अवकाश खत्म होने के बाद, मुझे नई दिल्ली मुख्यालय में रिपोर्ट करना है। 

अब सुशांत को लेकर मेरी सभी शंकायें खत्म हो चुकी थीं। सुशांत की, इम्प्रेससिव पर्सनालिटी एवं ऐसे सेंस ऑफ़ हुमूर से, मैं उसकी दीवानी हुई थी। 

सर एवं ऑन्टी को मैं पहले ही जानती थी। अतः मैंने और प्रश्न नहीं किये थे। अपितु सुशांत से, मेरे बारे में उसकी चाही, जानकारी लेने कहा था। सुशांत ने मेरी शिक्षा एवं जॉब को लेकर कुछ प्रश्न किये थे। जिनका विवरण, मैंने अपने उत्तर में दे दिये थे। 

फिर उन सभी के साथ ही मैंने लंच लिया था। और अढ़ाई बजे, उनके घर से विदा ली थी। 

लौटते हुए मेरा मन बुझा जा रहा था कि सुशांत ने मुझसे अकेले में बात करने की कोशिश या प्रस्ताव नहीं किया था। सुशांत से विवाह को लेकर मुझ पर निर्मित हुआ, मानसिक दबाव मुझे आशंकित कर रहा था कि शायद सुशांत ने, मुझे पसंद नहीं किया है। 

मेरे कमजोर पड़ रहे मन में इस आशंका को पुष्ट करने वाला विचार भी आया था कि सुशांत के सजीले-सुंदर एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व के तुलना में, मेरा साधारण रूपवान होना, मुझे उसके योग्य नहीं बनाता है। उस जैसे स्मार्ट एवं एयरफोर्स ऑफिसर के लिए तो अच्छी से अच्छी अनेक लड़कियों के रिश्ते आसानी से मिलेंगे। ऐसे योग्य-बुद्धिमान लड़के पर तो कॉलेज के दिनों में ही, अनेक अच्छी लड़कियाँ अपना दिल, उसे दिए फिरतीं रहीं होंगी। 

अब मैं अपने भाग्य से शिकायत करने लगी थी। मेरे भाग्य, अगर तू ही मेरे साथ रहा होता तो क्यूँ मैं, अपनी  17 वर्ष की छोटी उम्र में ही अपने पापा को खो देती? तू अगर आज साथ देता तो मेरे, इस परिवार से जुड़ने के सपने पूरे हो रहे होते। 

तू मेरे साथ होता तो तूने मुझे सुशांत जैसी योग्यता दिलवाई होती या सुशांत को कुछ कम सुंदर और कम योग्य बनाया होता। 

देख भाग्य, तेरी निष्ठुरता से मुझ पर ऐसे योग्य लड़के को, जो किसी लड़की के सम्मान एवं स्वाभिमान की अनूठी एवं भली तरह रक्षा करता है, रक्षक होना जिस लड़के का स्वभाव एवं कार्य है, तेरे साथ न देने से, मैं उसे खो दूंगी। 

तब मुझे यूँ प्रतीत हुआ जैसे मेरा भाग्य मुझे कोई उत्तर दे रहा है, जैसे वह मुझसे कह रहा है कि - मैं साथ नहीं होता तो, हे भोली लड़की, उससे तुम्हारे मिलने के संयोग ही क्यूँ बनाता। दुनिया में अनेकों लड़के हैं जिनसे तो मैंने, तुम्हारे मिलने के संयोग बनाये नहीं, लेकिन तुम्हें, सुशांत से मिलवाया है। तुम यूँ अधीर क्यूँ होती हो? धैर्य धारण कर के आगे तो देखो कि मैं, कैसे तुम्हारा साथ देता हूँ। 

इन ख्यालों में डूबी मैं अपने घर पहुँची, तो उदासी मेरे चेहरे पर पुती हुई थी। 

बेटी की उदासी, माँ से छिपती नहीं है। मेरी माँ ने इसे, मेरे मुखड़े पर पढ़ लिया था। माँ ने आशंकित स्वर में पूछा था - निकी, क्या हुआ बेटी? सब ठीक तो रहा? क्या सुशांत तुम्हें पसंद नहीं आया?

मैंने माँ को चिंता में नहीं डालने के विचार से अपने ओंठों पर झूठी मुस्कान बिखेरी एवं कहा - नहीं माँ ऐसी कोई बात नहीं है। लड़का योग्य है एवं एयरफोर्स में ऑफिसर है। वहाँ मुझे सब कुछ, ठीक लगा है। अब देखना यह है कि आगे उनकी तरफ से, कैसी बात आती है। 

माँ मेरे उत्तर से चिंताग्रस्त दिखीं उन्होंने कहा - एयरफोर्स में ऑफिसर? यह तो ठीक नहीं। वैसे भी अभी दुश्मन देशों ने हम पर युध्द के खतरे उत्पन्न किये हुए हैं? तुमने देखा होगा पिछले वर्ष हमारा ऑफिसर कैसे दुश्मन के बीच फँस गया था। 

मैंने कहा माँ - उनकी शूरवीरता ने देश में कितना मान एवं प्रशंसा दी। यह गर्व की बात भी तो है। 

माँ ने कहा - जब अभिनंदन, वहाँ पकड़े गए तो उनका परिवार किस मानसिक वेदना से गुजरा होगा इसकी कल्पना है तुम्हें?

मैं सोचते हुए चुप हो गई। उनकी यह प्रतिक्रिया, उनके तरफ से मुझे आश्वस्त कर रही थी। यदि इस रिश्ते में इंकार भी होता है, तो माँ ऐसा सोचते हुए बुरा नहीं मानेगी। 

मैंने अपनी अन्य चिंता उनसे छिपाते हुए कहा - हाँ, माँ यह तो है। फिर वहाँ से हाँ ही होगी, ऐसा भी तो नहीं है। उनकी ना हुई तो आपको भी, कोई धर्म संकट नहीं रहेगा। 

फिर मैंने कहा - माँ, सर ने मुझे ज़बरदस्ती बहुत खिला दिया है अतः मुझे नींद आ रही है। मैं थोड़ा सोना चाहती हूँ। 

माँ ने कहा - हाँ निकी, तुम, थोड़ा सो लो। और दिनों में, तुम्हें आराम भी तो नहीं मिलता है। 

फिर मैं अपने कमरे में आई थी। मैंने चिंता में डूबे रहते हुए अपनी साड़ी बदली थी। तब बिस्तर पर लेटकर सोचने लगी थी कि बेकार ही सर की तरफ से यह प्रस्ताव आया था। 

ऐसा न होता तो विवाह की मनाही से, हम दो परिवारों के बीच आ जाने वाली संभावित खटास, पापा के रूप में मिले सर से, मेरा बना आत्मीयता का रिश्ता खत्म होने की कोई आशंका तो नहीं रहती। 

सुशांत जितना सुंदर एवं योग्य है वह भला क्यों कर, मुझ जैसी साधारण लड़की को पसंद करेगा?

इन विचारों ने मुझे भावुक कर दिया था। मेरी आँखों में अश्रुओं से नमी आई थी। 

अकेले में यूँ रोते हुए मुझे सर की माँ का स्मरण हो आया। जिसने मुझे अन्य तरह से विचार को प्रेरित किया। मैं सोचने लगी अगर उनके तथा सर के आदर्शों ने मुझे प्रभावित किया है तो मुझे सिर्फ कहने-सुनने के लिए आदर्श पसंद नहीं करने चाहिए बल्कि मुझ में उन्हें जीने का साहस होना चाहिए। 

इस विचार ने मुझे दृढ़ता प्रदान की, कि नहीं मुझे अपने लिए ही, सुख की अभिलाषा नहीं होना चाहिए। मुझसे जुड़ने में सुशांत को अपने जीवन में सुख दिखाई देता है तब ही मेरा उनसे विवाह उचित होगा। मैं अपने पापा को खो कर भी तो जी रही हूँ। उस परिवार से न जुड़ पाना, इससे बड़ी जीवन रिक्तता तो नहीं होगी। इस विचार ने मुझ में साहस का संचार किया तब थोड़ी देर में निद्रा ने मुझे अपने आगोश में ले लिया था। 

रात में जब हमने भोजन कर लिया था तब, मेरे मोबाइल पर कॉल आया था। मैंने देखा तो, स्क्रीन पर, सर का चेहरा दिखाई पड़ रहा था। अपने तीव्र धड़कते हृदय के साथ, लपक कर मैंने रिप्लाई किया था - हेलो सर!

मोबाइल पर सर की नहीं, आंटी की आवाज सुनाई पड़ी थी। वे कह रहीं थीं - रमणीक, माँ से बात कराओ। 

यह सुन मेरी आशंका बढ़ गई थी कि उनका इंकार वे, मुझे नहीं, मेरी माँ से कहना चाहती हैं। बुझे मन से मैंने, मोबाइल माँ को दिया था, बताया था कि - ऑन्टी, आपसे बात करना चाहतीं हैं। 

यह कहते हुए फिर मैं वहाँ से हट गई थी। 

करीब दस मिनट बाद माँ, मेरे पास आईं थीं। उन्होंने मुझे बताया कि - निकी, उनमें एक और बात ठीक नहीं है।  

मैंने तत्परता से पूछा - कौन सी बात माँ। 

माँ ने कहा - सुशांत, उनका जन्मा बेटा नहीं है। 

इस पर मैं अवाक् हुई, मैंने चिंतित स्वर में पूछा - माँ क्या आपसे, यह ऑन्टी ने कहा है? 


(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

18-09-2020


Wednesday, September 16, 2020

पापा ..

 पापा .. 

ऑफिस जाने के समय में वे प्रायः दिखाई पड़ते थे तब ज्यादा समय नहीं होता था कि मैं, उनसे विस्तृत कुछ कह पाती। आज मेट्रो से वापसी के समय में भी, जब पहली बार वे प्रौढ़ व्यक्ति स्टेशन पर खड़े दिखाई पड़े तो मैं, अपने को रोक न सकी थी। वापसी होने से, आज समय था कि वे यदि सहमत करें तो मैं, उनसे बात कर सकूँ । 

मैं उनके पास ही जाकर खड़ी हो गई थी। उनका ध्यान, अपनी ओर खींचने के लिए मैंने कहा - नमस्ते सर, मैं रमणीक हूँ। आपके समय पर ही, ऑफिस जाते हुए प्रायः मेट्रो में, आपके साथ ही यात्रा किया करती हूँ। 

उन्होंने उत्तर में कहा - हाँ, मेरे नोटिस में भी यह बात आई है। 

तभी मेट्रो ट्रेन, प्लेटफॉर्म पर आते दिखी थी। अतः बात बीच में खत्म हुई थी। मैं, सप्रयास, उनके पीछे ही मेट्रो में चढ़ी थी एवं जिस सीट पर वे बैठे, उनके साथ वाली खाली सीट में लपककर, जा बैठी थी। 

फिर मैंने, उनसे पुनः बात छेड़ी, मैंने पूछा - सर आप ग्रेटर कैलाश ही जायेंगे ना?

उन्होंने मुझे गौर से देखते हुए संक्षिप्त उत्तर दिया - जी हाँ। 

मैंने फिर कहा - अगर आपके पास थोड़ा समय हो तो किसी रेस्टोरेंट में, मैं आपसे कॉफी के साथ कुछ बात करना चाहती हूँ। 

इस पर वे थोड़े विचार में पड़ते दिखाई दिए, फिर उन्होंने हामी में सिर हिलाया। 

इसके बाद के 20 मिनट के सफर में वे अपने लैपटॉप पर एवं मैं अपने मोबाइल पर कोई कोई काम में व्यस्त रहे थे। ग्रेटर कैलाश में उतरने के बाद, मैं ही उन्हें एक अच्छे रेस्टोरेंट में ले गई। मैंने कॉफी एवं कुछ स्नैक्स आर्डर किये। फिर बात आरंभ करते हुए कहा - 

सर पिछले चार महीनों से ऑफिस के जाने के समय में मैंने, कई बार आपके साथ यात्रा की हैं। शायद आपने ज्यादा ध्यान नहीं दिया है मगर इन यात्राओं में मेरा ध्यान एक तरह से आप पर ही केंद्रित रहा है। आपने इसे यदि अनुभव किया हो तो आप अन्यथा कुछ तो नहीं सोचते हैं, मुझे यह शंका हुई है। अतः अपनी सफाई में कहने के लिए ही मैंने कॉफी हेतु आपसे आग्रह किया है। 

उन्होंने खामोशी में ही मुझे प्रश्नवाचक दृष्टि देखा। तब मैंने आगे अपनी बात कही - 

सर, मैं 2009 में अपने पापा को खो चुकीं हूँ। तब में बारहवीं में पढ़ती थी। यह एक संयोग है कि आप मेरे पापा के हमशक्ल हैं। यही कारण है कि जब से आपको मैंने देखा है, मैं यात्रा में जान बूझकर आपके आसपास ही रहती आईं हूँ। मेरी दृष्टि आपको, मेरे अपने (दिवंगत) पापा जैसे ही देखती है। आप में अनायास मेरी रूचि इस कारण है।  

मेरी कही बात के बाद उन्होंने पहली बार अपने बारे में बताया कि - मैं सुधीर पाण्डे, एनडीएमसी में मुख्य अभियंता हूँ एवं दो महीने बाद रिटायर हो जाने वाला हूँ। 

यह सुन कर मैं चौंक गई थी। तब बेयरा हमारा आर्डर सर्व करने आ गया था। बेयरे के जाने के बाद, कॉफी का घूँट भरते हुए मैंने जिज्ञासा पूर्वक जानना चाहा - सर, आप इस रैंक के अधिकारी हैं फिर भी मेट्रो में चलते हैं? 

उन्होंने कहा - हाँ ऑफिस तक पहुँचना मेरा निजी कार्य होता है। इसलिए इसके लिए मैं विभागीय गाड़ी प्रयोग नहीं करता हूँ। 

उनकी बात ने मुझे प्रभावित किया मैंने कहा - आज ऐसा करते देखा नहीं जाता इसलिए मुझे तनिक अचरज हुआ, मगर ऐसे ही आदर्श मेरे पापा के भी होते थे। किसी दिन मैं, आपको लंच पर अपने घर आमंत्रित कर आप को एलबम दिखाऊँगी आप स्वयं देख सकेंगे कि मेरे पापा, आपसे दिखने में कितने समान थे। 

उन्होंने हँस कर उत्तर दिया - जरूर बेटी। मैं अपनी पत्नी सहित आकर आपके आमंत्रण का मान रखूँगा। 

फिर मैंने अपना मोबाइल नं उन्हें दिया था एवं उनसे, उनका नं लिया था। हमने अपने अपने निवास की जानकारी भी शेयर की थी। उनके एवं मेरे घर में आधे किमी की ही दूरी थी। 

कॉफी के बाद, बिल मेरे चाहने के विपरीत उन्होंने अदा किया था। फिर हम अपने अपने घर की ओर चल दिए थे। उस दिन मैं, एक घंटे विलंब से घर पहुँची थी। तब चिंता से बुझा हुआ मेरी माँ का चेहरा, मुझे आया देख, खिल उठा था। उन्होंने पूछा - निकी, देर क्यूँ हुई है?

मैंने चहक हुए उत्तर दिया - माँ, मै उन सर के साथ, कॉफी लेकर आई हूँ।  

दरअसल पापा जैसे दिखते उन सर की चर्चा मैंने माँ से पहले ही कर रखी थी। मेरे उत्तर पर माँ परेशान हुईं बोलीं - बेटी क्यों अंजान व्यक्ति से मिलने का खतरा ले रही हो ? पापा जैसे दिखने से कोई पापा हो तो नहीं जाता! तुम जानती तो हो उस पत्रकार की करतूत, जिसने अपनी बेटी की सहेली तक से नीयत खराब की थी। 

मैंने कहा - माँ, मगर वे मुझे वैसे नहीं लगते हैं। मैंने उनसे लंच के लिए किसी दिन घर पर आमंत्रित करने की स्वीकृति ली है। जिस दिन वे घर आएँगे आप स्वयं देख लेना। 

माँ के मुखड़े पर चिंता की लकीरें उभर आईं वे बोलीं - हे भगवान, तुम खतरों को ऐसे क्यों घर का रास्ता दिखाती हो?

मैंने कहा - नहीं माँ, आप चिंता न करो वे ख़राब व्यक्ति नहीं हैं। उन्होंने स्वीकृति देते हुए अकेले आने की जगह अपनी पत्नी को साथ लेकर आने की बात कही है। इससे आप समझ सकतीं हैं कि वे पारिवारिक संबंधों के तौर तरीकों को जानते हैं।    

माँ को इस उत्तर से तसल्ली हुई तब भी वे बोलीं - तुम्हारे जीजू को मगर यह पसंद नहीं होगा। 

जीजू के जिक्र से मुझे वितृष्णा से हुई मैंने कहा - माँ, आप दीदी या उन्हें यह मत बताना। उन्हें घर न बुलाने से मुझे दुःख होगा। 

माँ चुप हो गईं थीं। वे मुझे उदास देखना पसंद नहीं करतीं थीं। फिर एक रविवार दोपहर पर वे सपत्नीक हमारे घर आये थे। साथ ही एक तनिक भारी सा उपहार उनके हाथों में था जिसे मैंने सहायता कर सेंटर टेबल पर रखवाया था। साथ ही कहा था - सर, इस औपचारिकता में पड़ने की क्या आवश्यकता थी। 

उनकी पत्नी ने उत्तर दिया था - रमणीक, जब तुम इनमें अपने पापा को देखती हो फिर अगर ये तुम पर अपनी बेटी की तरह दृष्टि रखें तो वह औपचारिकता तो नहीं कहलाएगी। 

मेरी माँ, दोनों को देख और ऑन्टी के इस उत्तर से निश्चिंत दिखने लगीं थीं। मैंने लंच के पूर्व उन्हें पुराने एल्बम दिखाये थे। जिसे देख ऑन्टी ने ही परिहास में कहा - सच में तुम्हारे पापा एवं ये, भगवान द्वारा एक ही साँचे में गढ़े गए लगते हैं। 

मेरी माँ, ऑन्टी की बात से भावुक दिखाई पड़ीं उन्होंने सहमति में कहा - सच में मुझे भी यही लगता है। 

सर कम बोलते हुए, हँसते-मुस्कुराते हुए, हम सबके साथ का आनंद लेते रहे। फिर हम सभी ने एक साथ लंच लिया। उन्होंने मेरी माँ से प्रशंसा करते हुए कहा - भाभी जी, आपने एक एक सामग्री अत्यंत स्वादिष्ट बनाई है। हमें रमणीक ने आमंत्रित नहीं किया होता तो निश्चित ही इसके स्वाद से वंचित होते। 

मेरी माँ ने उत्तर में कहा - भाई साहब, इसके लिए प्रशंसा, रमणीक की ही कीजिये। यही सुबह से, मेरे साथ रसोई में लगी है। इसने यह कहते हुए सब सामग्री तैयार करवाई है कि पापा के लिए बनानी है। 

इस पर सर, ने मुझे स्नेह से देखा एवं मुस्कुराये थे मगर कहा कुछ नहीं था। लंच के बाद फिर कुछ समय वे रुके थे। तब मैंने पूछा था - सर, आपके तौर तरीके आपकी बड़ी पोस्ट से कुछ भिन्न हैं। आप आज के चलन के विपरीत ऐसा कैसे कर लेते हैं? 

इस पर उनका उत्तर अत्यंत प्रेरणादायी था, उन्होंने कहा - बेटी कुछ बातें मैंने अपनी माँ के जीवन से बिना उनके कुछ कहे-सुने सीखीं थीं। उन्हें ही अपने आचरण एवं व्यवहार में मैंने लिया है। 

मेरी उत्सुकता जागी थी मैंने पूछा - कौन सी बातें, सर ?

उन्होंने बताया - मैंने बचपन से ही देखा था कि माँ, हमारे सयुंक्त परिवार में घर की आधार स्तंभ थीं। रसोई से लेकर हमारे लालन पालन एवं शिक्षा, सभी में उनकी प्रमुख भूमिका होती थी। मगर घर के बाहर उनकी पहचान अत्यंत सीमित थी। तात्पर्य यह कि परिवार एवं समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान उनका होता था, मगर उसका प्रत्यक्ष श्रेय, कुछ उन्हें मिलता दिखता नहीं था। पूरे घर परिवार के लिए समर्पित रहने से उन्हें आराम को समय नहीं होता। हम सबको तो अच्छा खिलातीं-पिलातीं एवं पहनातीं मगर स्वयं के उपभोगों के प्रति उदासीन रहतीं थीं। अपनी इंजीनियरिंग की पढाई के बाद मैंने एक दिन उनसे पूछा था - माँ, आपने सबके सुख की चिंता तो रखी है मगर अपने लिए जीवन में सुख की चिंता नहीं की है। आपको अपने त्याग का श्रेय भी कुछ कहीं मिलता नहीं, कैसे ऐसा सब कर लेतीं हैं, आप? इस पर उन्होंने हँसते हुए उत्तर दिया था - बेटे, तुम्हें यह देखने की दृष्टि मिल गई है। यह मेरे लिए इतनी सुखद अनुभूति है कि जिसके आगे कोई पहचान या किसी श्रेय से मिलने वाला सुख, छोटा ही लगता है। 

मैंने फिर उनसे पूछा - लेकिन आपकी माँ ने कभी यह कहा था कि आप सादगी का जीवन जीना?  

सर ने उत्तर दिया - ऐसा उन्होंने नहीं कहा था। उनका कार्य क्षेत्र, घर एवं परिवार रहा था। जिसमें उन्होंने सादगी में सुख की परिभाषा बताई थी। मेरी शिक्षा अनुरूप मेरा कार्य क्षेत्र एक सार्वजनिक सिस्टम रहा है। मैंने देश और समाज को अपना घर एवं परिवार समझा है एवं माँ जैसे ही अपनी पहचान एवं श्रेय के झमेले में नहीं पड़ा। मैंने भी प्रत्यक्ष उपभोगों में मिलने दिखने वाले सुख की अपेक्षा अपने दायित्वों के साथ न्याय करने की अनुभूति में सुख अनुभव किया है। इसलिए तुम मुझे ऐसे सादा रूप में देख रही हो। 

सर एवं ऑन्टी फिर चलीं गईं थीं। उनके हमारे घर आने की घटना एवं उनसे सुनी बातों ने पैसे की चकाचौंध से प्रभावित मेरी सोच पर शंका उत्पन्न कर दी थी। मेरे दिमाग में कितने ही प्रश्न उत्पन्न किये थे। 

मैं सोचने लगी थी कि जीवन सार्थकता, क्या आडंबर विहीन सादगी में है ? 

या 

आडंबर एवं मान प्रतिष्ठा एवं प्रसिध्दि की जीवन शैली में है ?

क्या अपनी कोई पहचान प्राप्त कर, उपभोग-प्रधान जीवनशैली जिसमें समाज या मानवता, के प्रति दायित्व बोध नहीं, में सफलता है?

 या 

बिना पहचान बनाये समाज और राष्ट्र के लिए अपने निःस्वार्थ योगदान में सफलता है?

मैं सोच रही थी कि सर की माँ की तरह ही, मैं भी एक नारी हूँ। क्या नारी, किसी पुरुष को अपने निश्छल कर्मों से इस कदर प्रभावित कर सकने में समर्थ होती है? 

यदि ऐसा है तो मुझे भी, सर की माँ की तरह ही क्यों नहीं परिवार की ऐसी धुरी बनना चाहिए? 

एवं 

क्यों नहीं, सर की तरह सादा जीवन रखते हुए इस समाज को, जिसे जरूरत भी है, अपने कर्मों से बेहतर योगदान देना चाहिए?

उस संध्या, मेरी माँ की कही बात ने, मेरे संशय मिटा दिए थे। उन्होंने कहा कि भगवान ने इन सर और तुम्हारे पापा का सिर्फ सूरत की साँचा ही एक नहीं रखा है अपितु सीरत का साँचा भी समान ही रखा है। तुमने इन्हें सही पहचाना है। जिस भी व्यक्ति का आदर्श उसकी माँ होती है, वह पुरुष किसी बहन, बेटी या अन्य नारी के लिए कभी खतरा नहीं हो सकता है। 

फिर दिन व्यतीत होने लगे थे। मेरी उनसे मेट्रो में मुलाकातें एवं मोबाइल पर बातें होतीं रहीं थीं। एक शाम सर ने ऑन्टी से मेरी माँ की बात करवाई थी। ऑन्टी ने माँ से कहा - मैं, रमणीक से अपने बेटे सुशांत की मुलाकात करवाना चाहती हूँ। और यदि रमणीक एवं सुशांत एक दूसरे को पसंद करें तो रमणीक को अपनी बहू रूप में, बेटी बनाना चाहती हूँ। 

क्या आप एवं रमणीक को यह प्रस्ताव स्वीकार होगा? इन दिनों हमारा बेटा, अवकाश में घर आया हुआ है।           

माँ ने बिना मुझसे पूछे उन्हें सहर्ष सहमति दे दी। इसके अनुसार मुझे अगले रविवार, उनके घर जाकर सुशांत से मुलाकात करनी थी। यह हुई सब बातें माँ ने मुझे बाद में बताई। 

मुझे इस प्रस्ताव से अत्यंत हर्ष अनुभव हुआ। मुझे यह विचार अत्यंत पुलकित कर रहा था कि यदि सुशांत और हमारा विवाह होता है तो मैं सर को, पापा कहने का अधिकार पा सकूँगी। अर्थात मेरे खोये पापा, मुझे 11 वर्षों बाद अपने ही रूप, में पुनः प्राप्त हो जायेंगे। 

मेरे आनंद का विषय यह विचार भी था कि उस परिवार की सदस्य होकर मुझे, सर के तरह की, लुप्तप्राय मानव प्रजाति एवं परंपरा को संरक्षित कर सकने का, अवसर मिलेगा। मैं प्रस्ताव को लेकर अति उत्साहित थी एवं रविवार की प्रतीक्षा व्यग्रता से करने लगी थी। 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

16-09-2020








Saturday, September 12, 2020



#कँगना #रिया हमारी कुछ नहीं
मगर #भारत_की_ही_बेटियाँ हैं

#बॉलीवुड_बुराईयों में रहतीं थीं दोनों
वे बुराई से निर्लिप्त रहतीं कैसे?
बुराई विरुध्द आवाज उठाती अब #कँगना
हमें उसके सुर मिलाना है
बुराई में बह गई #रिया को
कुछ तो #सबक सिखाना है

#बेटियों के अतीत में नहीं झाँकना हमें
इन्हें सुनहरा भविष्य दिखाना है

RCMJ

 चलो तुम्हारे लिए मैं, स्वयं से पहले सोच सकता हूँ

धर्म से ऊपर सोच सकता हूँ

अपने देश से ऊपर सोच सकता हूँ

तुम मगर मानवता के साथ जीकर तो दिखाओ

Monday, August 31, 2020

 अकेला जो होता है

जीवन में अकेले होने का सत्य समझ पाता है

घिरा रहता जो भीड़ से

उसे सबके साथ होने का भ्रम हो जाता है

Friday, August 28, 2020

गद्दार ... 8. कश्मीर - रच गया नया इतिहास

गद्दार ...  

8. कश्मीर - रच गया नया इतिहास 

8. कश्मीर - रच गया नया इतिहास 


रात में नींद आने के पहले, मैं आने वाले कल को लेकर विचार में मग्न था। तब 

पाकिस्तान में संगठन प्रमुख के मोबाइल पर इनकमिंग कॉल की रिंगटोन गूँज रही थी। 

प्रमुख ने कॉल लिया, दूसरी ओर से कहा गया - 

उसके अम्मा-अब्बू रात में घर से कब निकले यह तो हमें, पता नहीं चल पाया। मगर रात 12.30 बजे बाइक से दोनों अपने घर लौटे तब, हमें शक हुआ कि शायद वह, यही कहीं है और शायद ये, उसे मिलने ही कहीं गए थे। सामान्यतः इतनी रात गए इनका, बाहर से आना कभी होता नहीं है। 

प्रमुख के चेहरे पर नाराज़गी दिखाई दी, लेकिन उसने, अपनी आवाज में नरमी रखते हुए कहा - 

कल से ऐसी लापरवाही न करना। अब तुम, उसके अब्बू के पीछे साये की तरह लगे रहो। अगर वह यहाँ कहीं है तो उसका अब्बू, फिर उससे जरूर मिलेगा। 

दूसरी ओर से कहा गया था - जी साहेब, बिल्कुल दुरुस्त। अब ऐसी लापरवाही नहीं होगी। हम कल ही उसका सुराग लगा लेंगे। 

प्रमुख ने कहा - ठीक है। (फिर काट दिया था।)

सूर्योदय के साथ ही अगली सुबह युवक, अपनी भेड़ों को लेकर, वापिस अपने गाँव लौट गया था। 

निर्धारित किये गए अनुसार, अब्बू आये थे। मैंने कपड़े बदले थे एवं गुज्जर लोगों द्वारा पहने जाने वाली वेशभूषा उतार कर उस पर जलती तीलियाँ डाल दी थीं। मैं, इतना सतर्क इसलिए था कि मेरे सहायक हुए, गुज्जर परिवार को, मेरा राज छुपाने को लेकर, कोई परेशानी न झेलने पड़े। 

मैं ऐसा कोई निशान नहीं छोड़ना चाहता था जिससे समझा जा सके कि पिछले आठ दिन मैंने, बकरवाल परिवार की सहायता से छुप कर गुजारे थे।  

मैं अब्बू के साथ बाइक में बैठा था। हम 100 मीटर ही चले होंगे कि मुझे पास ही दूसरी बाइक की आवाज सुनाई दी। उस वीरान स्थान में यह अप्रत्याशित बात थी। मेरा माथा ठनका, मैंने अब्बू से कहा - अब्बू भागो। 

अब्बू ने सुनते ही स्पीड तेज की। पीछा करने वालों ने, पीछे से हम पर फायर किया मगर, उनका निशाना चूक गया था। मैंने पलट कर देखा तो बाइक पर दो लोग, हमारे पीछे लगे हुए थे। पीछे बैठे आदमी के हाथ में गन थी। वही मौका देख कर फायर करते जा रहा था। 

अब्बू, बाइक लहराते हुए चला रहे थे। इसलिए उसके निशाने चूक रहे थे। 

दोनों ही बाइक की स्पीड 100 से अधिक थी। आगे हमारी बाइक, मोड़ पर घूम कर बढ़ी ही थी कि तभी सड़क पर पीछे, जंगल की तरफ से भेड़ों का एक झुंड आ गया। 

पीछे के बाइकर को मोड़ होने से यह झुंड, अचानक दिखाई दिया था। गति ज्यादा होने से वह संभल नहीं सका जिससे उनकी बाइक, कुछ भेड़ों को टक्कर मारते हुए, साइड के गड्ढे में जा गिरी। 

मैंने देखा कि झुंड हाँक रहे बकरवाल ने, अपनी भेड़ों का यह हाल देखा तो वह, दहाड़े मार कर रोने लगा था। कोई और समय होता तो हम रुक कर, उसकी सहायता करते। 

बाइक सवारों को गंभीर चोटें लगीं लगती थी। वे खड़े नहीं हो पा रहे लगते थे। 

बाइक पर बैठे ये लोग निश्चित ही, हमारे आतंकी समूह के लोग थे। यह दूसरी बार था कि कुछ ही अरसे में, मेरे भाग्य में किसी गुज्जर द्वारा अनायास ही मुझे बचा लिया गया था। 

मुझे यह मालूम नहीं था कि पाकिस्तानी आतंक प्रमुख ने, मेरे पीछे लगे उन लोगों को रात ही, लापरवाही नहीं करने को कहा था। तब भी वे चूक कर गए थे। उन्हें, मुझे घेरना तब चाहिए था जब मैं, कपड़े बदल रहा था। चलती बाइक से निशाना साधना अपेक्षाकृत कठिन था। उसमें ऐसे हादसे के होने का खतरा होता ही है। 

अब हमारा काम आसान था। 5 मिनट बाइक पर आराम से चलते हुए, हम थाने पहुँचे थे। वहाँ मैंने आत्मसमर्पण कर दिया था। 

वहाँ थाना इंचार्ज इंस्पेक्टर को सर्वप्रथम मैंने, अपने पीछा करने वाले आतंकियों की सूचना दी। मेरी सूचना पर दुर्घटना स्थल से, दोनों को घायल अवस्था में पकड़ लिया गया। ये उस समय मोबाइल पर अपने संगठन से मदद पहुँचाने की बात कर रहे थे। उनमें से हम पर फायर करने वाला आतंकवादी था। बाइक चला रहा लड़का, उसे मदद करने वाला घाटी का ही लड़का था।     

मेरी सूचना पर उन्हें दबोचे जाने से, पुलिस एवं सेना में मेरा अच्छा प्रभाव पड़ा। आगे के दिनों में मेरी आशा से, अत्यंत अधिक अच्छी बातें हुई थीं। 

पुलिस एवं सेना के पूछताछ में मैंने - 

निर्दोष लड़की की मेरी बाँहों में हुई मौत, होना बताया था। 

उस लड़की से अपनी प्रियतमा की तुलना से, मेरा हृदय परिवर्तन होना बताया था। 

मैंने, उसके बाद देखा गया अपना, सपना बताया था। 

यह भी बताया कि सपने से मुझे, छह शताब्दी पूर्व का, हमारा वंश एवं धर्म, हिंदू होना ज्ञात हुआ था। 

सपने से ही मुझे, सुल्तान प्रोत्साहित, आततायियों के अत्याचारों का पता चला था। इन अत्याचारों से पीड़ित होकर ही, हमारे पूर्वजों सहित अनेक कश्मीरियों की धर्म  परिवर्तन करने की विवशता, मैंने देखे गए सपने अनुसार उन्हें, वर्णित करके बताई थी।

मैंने यह भी बताया कि अन्य कुछ कश्मीरियों सहित, ऐसे कुछ धर्म परिवर्तित किये गए लोगों के द्वारा भी, बीसवीं शताब्दी के अंत के वर्षों में, पुनः कश्मीरी हिन्दुओं पर अत्याचार किया गया था। यह, सुल्तान के समय जैसा ही अत्याचार था। इसे, इस रूप से देखकर, मैं व्यथित हुआ हूँ। इस कारण मैं, वापिस अपने मूल धर्म को स्वीकार करने को प्रेरित हुआ हूँ। मेरा आत्मसमर्पण करने का कारण भी यही है। 

इन भावनात्मक बातों के अतिरिक्त मैंने आतंकवादी संगठन के यहाँ सक्रिय लोगों की सूचनायें दीं हुआ। इन सूचनाओं से तीन आतंकवादी मार दिए गए। छह अन्य सहित घाटी में, उनके कुछ सहायक पकड़े लिए गए। मेरे एवं पकड़े गए लोगों से, पाकिस्तान स्थित संगठन के, आगामी दिनों में की जाने वाली आतंक की वारदातों का, पर्दाफ़ाश भी हुआ। मेरा आत्मसमर्पण ऐसे देश के हित में अत्यंत उपयोगी साबित हुआ। 

मेरे, इस सहयोग के अतिरिक्त चूँकि मेरे आतंकवादी हुये, अधिक समय नहीं हुआ था। साथ ही मैंने कोई जघन्य वारदात को अंजाम नहीं दिया था। अतः मुझ पर, कोर्ट में पेश किये गए आरोप पत्र में, वादा माफ़ गवाह बनाने के अनुशंसा की गई। 

मेरे बारे में सेना एवं पुलिस से मिली सूचना के आधार पर मीडिया ने, इस पूरी स्टोरी को बार बार प्रसारित किया।

इस प्रसारण का उनका उद्देश्य, भटक गये और लड़कों को, मेरे तरह ही आत्मसमर्पण करने को प्रोत्साहित करना था।  मेरी आपबीती पर आधारित, वेबसेरीज़ भी बनाई गईं, जो भारतीय दर्शकों में अत्यंत लोकप्रिय हुई।

मेरा आत्मसमर्पण एवं मेरा हरिहर भसीन बनना, कश्मीर के इतिहास में, टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। 

प्रारंभ में, कश्मीर घाटी में, मेरे धर्म परिवर्तन कर लिए जाने से लोगों ने, मुझे एक खलनायक की तरह देखा। 

उनके हिंसात्मक प्रतिक्रिया की आशंका से, मेरे परिवार को सेना से मिली सुरक्षा में रहना पड़ा। जेल में मुझे भी, अलग कोठरी में रखा गया ताकि कैदी के भेष में आकर, कोई आतंकवादी मुझे मार ना दे। 

मुझसे जेल में ही, एक लोकप्रिय टीवी चैनल ने, साक्षात्कार लिया। इसमें मैंने बताया कि -

मेरा धर्म परिवर्तन करना इस्लाम मज़हब का विरोध नहीं है। इस मज़हब को हमारे खानदान ने छह पीढ़ी तक निभाया है। मेरा वापिस हिंदू होना मेरे, इस विश्वास से प्रेरित है कि हम पूर्व में हिन्दू थे। 

मेरा ऐसा कोई आह्वान नहीं कि कोई और मेरे जैसे ही धर्म परिवर्तन करे।

मेरी अपील यह है कि इस्लाम मानने वाले, इस्लाम की सच्ची शिक्षा पर चलें। सच्चा मुसलमान आतंकवादी नहीं होता। सच्चा मुसलमान, इस्लाम की इबादत करते हुए किसी अन्य पर, आतंक नहीं फैलाया करता है। 

वैश्विक समाज के नए समय में आज जरूरत है कि इस्लाम मानने वाले सभी लोग, अन्य नस्ल या कौम की तरह ही शिक्षित होने को प्राथमिकता दें। 

शिक्षित होकर ही वे कुरान पाक से सच्ची सीखें, सीधे हासिल करेंगे। उस अनुसार चल कर नेक इंसान हो सकेंगे। 

उच्च शिक्षित होकर मुसलमान, अनर्गल बरगलावों से स्वयं को बचा सकेंगे। इस्लाम के नाम पर बाहरी देश के एवं यहाँ के ख़ुदग़र्ज़ लोगों की, अपने मतलब के लिए प्रचारित की जा रही गलत शिक्षा के झाँसे में आत्मघाती करतूत करने से बच सकेंगे।  

ऐसा हो सकने से, घाटी एवं समाज में शांति-सौहार्द्र बढ़ेगा। 

इसमें मुसलमान की यही नहीं, आगामी पीढ़ियाँ भी अपने सपने को साकार करते हुए ज़िंदगी जी सकने के अवसर मिलेंगे। 

कुछ कट्टरपंथी लोगों के अलावा, साधारण मुसलमान पर, इस प्रसारण का अच्छा असर पड़ा। जब ज्यादा बड़ा वर्ग उनके बरगलावों में आने से बचने लगा तब कश्मीर में आतंकवाद का विषैला वृक्ष सूख गया। 

मुसलमान पर रहती आई देश की संदिग्ध दृष्टि में भी, बदलाव आने लगा। घाटी में कुछ परिवारों ने मेरी तरह, अपने पूर्वजों के मूल धर्म में वापसी की। 

जिन्होंने ऐसी वापसी नहीं की, उनके मन में भी संशय हुआ कि वे भी परिवर्तित मुसलमान तो नहीं! 

जो भी हो मगर इन सब बातों से मुसलमान में नरमाई आन परिलक्षित हुई। वे, अपने पूर्वाग्रह त्याग सके एवं हिंदुओं पर अत्याचार करने एवं दिल में नफरत रखने से विमुख कर हुए। 

घाटी में परिवर्तन की इस लहर ने, कश्मीर से विस्थापित हुए पंडितों को, कश्मीर वापिस आने का साहस दिया। पूर्व में विस्थापित हुये में से, अनेक पंडित परिवार कश्मीर लौटने लगे। 

फिर मुझे कोर्ट ने माफ़ी प्रदान कर मेरी रिहाई का आदेश पारित किया। कश्मीर के स्थानीय लोगों से सपोर्ट नहीं मिलने के कारण, पाकिस्तान से प्रायोजित किये जाने वाले, आतंक की जड़ें नष्ट हो गईं। 

अब मैं, कश्मीर के नये युग का आधार बन गया था। नबीहा का परिवार भी वापिस हिंदू हो गया था। 

इस तरह नबीहा को गैर कौम में विवाह करने का साहस नहीं करना पड़ा। 

मुझसे, विवाह करते हुए नबीहा गौरवान्वित अनुभव कर रही थी। नबीहा ने इसे अपना भाग्य माना कि जिसे खो दिया लगता था, उसका वह मंगेतर (मैं) उसे फिर मिल गया था।

मुझसे विवाह करते हुए उसे गर्व हो रहा था कि उसे मिला जीवन साथी कश्मीर ही नहीं, भारत का वास्तविक नायक था।          

नबीहा ने अपना नया नाम “मातृभूमि” पसंद किया था। अब मुझ पर दायित्व था कि उसके मन में मेरी नायक की छवि अपने कार्य से सिध्द करूँ। 

अब मुझे, इस मातृभूमि (भारत, कश्मीर) एवं इस मातृभूमि (मेरी अर्ध्दागिनी) दोनों ही मेरी अपनी की, मुझसे अपेक्षाओं पर सच्चा एवं अच्छा सिध्द करना था ..     


(अभी के लिए समाप्त) 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

28-08-2020