Wednesday, March 11, 2020

तुम मिलो तो
समस्त पूर्वाग्रह त्याग अपने
मैत्री भाव
मेरे जीवन में शोध विषय है

जीता आया मनुष्य, अनादि से
क्या हारा, क्या जीता उसने
और उत्कृष्ट क्या पाया उसने
मेरा ये अनुसंधान विषय है

जीत के क्या हारा मैं उससे
हार के उससे क्या जीत लिया मैंने
समझने में ये कठिन प्रश्न
मेरे अनुसंधान का विषय है

अपने आग्रह समक्ष नत मस्तक उसे कर दूँ
या उसके आग्रह नत मस्तक मैं हो जाऊँ
ये चलता मानसिक व्दंद
मेरे अनुंसधान का विषय है

स्वारथ की धुरी पर घूमती ये दुनिया
निःस्वार्थ की धुरी पर कैसे ले आऊँ
अनमोल जीवन को उसमें लगाऊँ कैसे
प्रश्न मेरे जीवन विज्ञान का विषय है



Tuesday, March 10, 2020

न भूलूँ मै कि
है आज जीने की बारी
मेरी मगर
कल मरने की बारी होगी

लाचारियों का ये कहना है
है जीवन तो मुझे ढोना है
मुस्कुराने पर मेरे न जाना
हँसी दिखावा भीतर मुझे रोना है


Saturday, March 7, 2020

भानुमति का पिटारा ...

भानुमति का पिटारा ...

(केवल रोने का मन करे तभी पढ़ें)

यह भगवान की विशाल प्रयोगशाला थी। जिसमें से, इस बार फिर जन्म लेने के पूर्व, एक स्टोरेज डिवाइस मेरे हाथ लग गई थी। इसमें अनादि समय से मेरी रूह की चल रही यात्रा की रिकॉर्डिंग थी। अपने पूर्व के अनंत जीवन में से, मैंने छिप कर वह अंश देखे थे जब जब मुझे मानव जीवन मिला था।
मेरे सर्वप्रथम मानव जीवन में मै, ऐसे मनुष्य के बीच था, जो जानवर की तरह जंगलों में निवास करते थे। तब हमारी भाषा की कोई लिपि नहीं थी। भाषा में सीमित शब्द थे। हमारी भावनायें, हाव भाव और मुखाकृति से परस्पर समझी जाती थी। हम मनुष्य में तब, पुरुष और नारी होना ही सिर्फ भेद थे।
बहुत काल बाद, मेरा अगला मानव जन्म तब हुआ, जब मनुष्य बहुत परिष्कृत हो गया था। तब उसका जीवन जानवरों से बहुत भिन्न हो गया था। भाषा शैली विकसित हो गई थी। पुरुष-नारी के अतिरिक्त कई और भेद जीवन में जुड़ गए थे। जाति भेद आविष्कृत हो गया था। मैं तब जाति से धोबी हुआ था। मैंने देखा शिक्षा अभाव में मेरा मुहँ, तब विवेक प्रयोग बिन चला करता था। उस जीवन में मैंने राज्य की, माता जैसी रानी, के चरित्र पर प्रश्न खड़ा किया था। फलस्वरूप उन्हें अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा था।
नारी चरित्र पर प्रश्न उठाने के परिणाम स्वरूप, कालांतर के मानव जन्म में, मैंने नारी रूप में जीवन पाया था। उस जीवन में जाति के अतिरिक्त कुछ अन्य भेद हो गए थे। हमने जाना था कि बाहर भी कई देश और उनकी उनकी सँस्कृति हैं। उनकी सँस्कृति विकसित नहीं थी अतः वहाँ के लोग व्यापार तथा हमारी समाज/भवन एवं नगर सँस्कृति से ज्ञान अर्जित करने प्रवास पर आते थे। इस जीवन में मैं प्रलय की साक्षी हुई थी।
प्रलय में सिंधु/सरस्वती नदी/घाटी की बेहद उन्नत सँस्कृति/मानव सभ्यता  के मोहन-जोदाड़ों तथा हड़प्पा प्रदेश जमींदोज हुए थे। जिसमें मैं आये भूचाल में काल कवलित हुई थी।
इसके हजारों वर्ष बाद, पूर्व तक के जीवन से बहुत दूर इस बार दुनिया के दूरस्थ हिस्से में मानव जीवन मेरे हिस्से आया था। तब में एक शौक़ीन समुद्री यात्री के हुआ था। जिसे दुनिया ने क्रिस्टोफर कोलम्बस के नाम से जाना था।
पूर्व तक के मानव, जमीन के जुड़े प्रदेशों में विचरण करते थे। मेरे कोलम्बस रूप के जीवन में जहाज के आविष्कार और निर्माण होने से महासागरों से विभक्त प्रदेश में भी विचरण की प्रवृत्ति जन्मने लगी थी। इस प्रवृत्ति अधीन मैंने अपने उस जीवन में संसार की यात्रा की थी। खतरनाक तूफानों से बचते बचाते और दूर दूर तक सिर्फ रहस्यमय विशाल जल प्रदेश, जिसमें कोई ओर छोर नहीं सूझता था, में मैंने भ्रमण ही भ्रमण किये थे। सिंधु सभ्यता काल और इस जीवन काल के बीच संसार में बहुत बदलाव आ चुके थे।
भगवान के कई अवतार, मसीहा एवं पैगंबर के हो चुकने के बाद कई धर्म भेद और उनके अनुयायी/धर्मावलंबी के हो जाने से विश्व कई संप्रदायों में विभाजित हो गया था। मानव यात्रा के इसके अतिरिक्त भी दुनिया में कई भेदभाव पैदा हो गए थे। भाषा, नस्ल, शिक्षा एवं देश-प्रदेश के नये भेद जन्म ले चुके थे।समय सूचक मानव निर्मित कैलेंडर एवं घड़ियाँ आ चुकीं थी। पूर्व पीढ़ियों के लेखा जोखा इतिहास में समाहित किये जाने लगे थे। परस्पर वर्चस्व की प्रवृत्ति से युध्द लड़े जाने लगे थे। उसमें होती विभीषिका में मारे गए परिवार और नस्ल के लोगों में इतिहास पढ़ पढ़ कर अधिप्लावित प्रभाव के परिणाम स्वरूप नफरत का विध्वंसकारी भाव मानव मन में घर करने लगा था। मेरे इस तरह छिप के अनाधिकृत अपने पूर्व जन्म की रिकार्डिंग देखते हुए ही मैं धर लिया गया था। उपरान्त जल्दबाजी में मेरे अगला जीवन तय हुआ और मेरी मेमोरी में आये ये तथ्य इरेज़ किये जाने में, वहाँ चूक हो गई।अब मेरा यह जन्म हुए एक वर्ष बीता है। मैं नन्हीं बेटी रूप जन्मी हूँ। मैं अन्य मनुष्य से अनूठी/विलक्षण हूँ। मैं अपने कुछ, पूर्व जन्मों की स्मृतियाँ के साथ जन्मीं हूँ।

 यूँ अभी मुझे बोलना/चलना नहीं आया है मगर पूर्व जन्म से सीखा, समझा और स्मृतियाँ, विलक्षण मस्तिष्क में होने से, जो देख रही हूँ वह बहुत सरलता से समझ आता है। मेरी माँ, मुझे गोद में लिए, पिछले कुछ दिनों से 1 धरने-प्रदर्शन में भाग ले रही है। नित, मुझे साथ लाती है।

यहाँ मेरी माँ सहित बहुत सी महिलायें भाग लेती हैं। जिनकी शिक्षा और जानकारी कम है। वे जल्दी ही ऐसी किसी भी बात में आ जाती हैं, जिन्हें घर में पुरुष बताते हैं। यहाँ नित भाषण बाजी हो रहीं हैं। इसे अधिकारों की लड़ाई कहा जा रहा है। प्रत्यक्ष में जो कहा जाता है, दबी जुबानों में, मुझे उससे विपरीत योजनायें, सुनने मिलती हैं। 

मुझे लगता है दुनिया में अनेकों प्रचारित भेद के दुष्प्रभाव में यहाँ की महिलायें अपनी नस्ल एवं धर्म की श्रेष्ठता के गर्व बोध में डूबी हैं। इससे यहाँ के तथाकथित लीडर के भडकावों में इस श्रेष्ठता बोध के वशीभूत अन्य नस्ल एवं धर्म अनुयायी को अपने से हीन देखने का भ्रम इन के दिलोदिमाग पर छाया है। उनके प्रति इनके मन में नफरत की विषाक्त भावना, प्रबल की जा रही है।

दिमाग में नफरत के इस विषाक्त वायरस के पहुँच जाने से दिमाग कुंद हो जाता है। फलस्वरूप, जिस राष्ट्र और समाज में पुश्तें रहतीं आईं हैं एवं जहाँ आगे की भी उनकी पुश्तें बसर करेंगी उसे ही कमजोर करने में अपने अहित दिखाई नहीं पड़ते हैं। ऐसे संक्रमित दिमाग वालों का इस्तेमाल अपने पीछे हुजूम पसंद लोग करते हैं। अपने रुग्ण भावनाओं को पोषित करने के लिए अपने पीछे के हुजूम का जीवन दाँव पर लगाते हैं। स्वयं अपने को सुरक्षित दायरे में रख कर, औरों को उकसाई हिंसा में झोंकते हैं।   दिमागी शक्ति प्रबल मगर शिशु अवस्था के सीमित शारीरिक सामर्थ्य से मैं, इन बहकावों में आ रही महिलाओं की कोई मदद नहीं कर सकती हूँ। मेरे पूर्व जन्मों में देखे जीवन में, मैंने बिना भेदभाव के मानव जीवन से लेकर अनेकों भेदभाव के इस जीवन का अनुभव किया है। यह बताता है कि कुंद बुध्दि के वशीभूत इतने भेदभाव चलाये रखना, मानव प्रजाति के लिए आत्मघातक सिध्द होगा। मगर असहाय मुझे सिर्फ साक्षी रहना है। फिर एक दिन मैंने सुना राष्ट्र का कोई अतिथि आया है, जिसका विश्व में प्रभावशाली स्थान है। उसके समक्ष स्वयं को शोषित एवं पीड़ित दिखाने के लिए धरने समर्थक लोगों ने योजनाबध्द दंगे करवाए हैं। जो बाद में इनके 'कुत्सित लक्ष्य 'की दृष्टि से , अब बेअसर साबित हुए हैं। 

अंत में मैंने सुना विश्व पर कोरोना वायरस का फैलाव हुआ है। इस वायरस ने बिना किसी सीमा, धर्म तथा नस्लीय आदि भेदभाव के लोगों को अपनी चपेट में लिया है। मानव के बीच प्रचलित भेदभावों पर, इस वायरस ने साबित किया है वह इनमे कोई भेदभाव नहीं देखता है। 

अनेकों की जानें इसमें गईं हैं। इस घातक वायरस के भय से मेरे माँ सहित अनेकों महिलाओं ने धरने में हिस्सा लेना छोड़ा है। सब कुछ तो जैसा का वैसा रहा है। लेकिन धरना मेरी दृष्टि से बुरा सिध्द हुआ है। धरने के दौरान ही मैं कोरोना वायरस से संक्रमित हुई हूँ। आज, मेरी इम्युनिटी स्ट्रांग नहीं होने से इस जन्म में मैं अल्पायु में ही मारी गई हूँ। भगवान की प्रयोगशाला में मेरी चालाकी से अर्जित विलक्षणता जो संसार के लिए कल्याणकारी सिध्द होती, मेरे यूँ बेमौत मारे जाने से व्यर्थ चली गई है ....  

-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
09.03.2020

Tuesday, March 3, 2020

सिर्फ पछतावा रह गया है ..

सिर्फ पछतावा रह गया है ..

पुलिस ने मुझे दूसरे शहर से गिरफ्तार किया था, जहाँ मैं पिछले 4 दिनों से छिप कर रह रहा था।
दरअसल मैंने दंगों में गोली चलाई थी। जिससे दूसरे पक्ष के कुछ लोग हताहत हुए थे। फिर मैं वहाँ से फरार हुआ था। लेकिन चूँकि दंगे की शुरुआत में मेरी क्रिया की प्रतिक्रिया ने, दंगे को विकराल रूप प्रदान कर दिया था। हजारो लोग दुष्प्रभावित हुए थे। सार्वजनिक और अन्य की निजी संपत्तियों को बहुत क्षति हुई थी।
इससे मेरा अपराध संगीन हो गया था। टीवी फुटेज से मेरी पहचान कर सरगर्मी से मेरी तलाश की गई थी।
आज मेरे हाथों में हथकड़ियाँ पहना कर दंगा स्थल पर लाया गया है।
मुझे हैरत हो रही है, जो हमारे लोग मुझे उस दिन गोली चलाने को उकसा रहे थे, आज उनमें से कोई सामने, मेरे साथ नहीं आया है।
मुझे मालूम है कि थर्ड डिग्री की प्रताड़ना देकर, पुलिस मुझसे मेरे अपराध कबूल करवा लेगी।
मुझे यह भी ज्ञात है कि मेरी ज़िंदगी के कई वर्ष, अब कारावास में कट जाने वाले हैं। मुझे साफ़, यह भी पता है कि मेरे अपने परिजन, मेरी चिंता और अदालती चक्करों में अधमरे होने वाले हैं।
अगर भाग्य ने साथ दिया भी और मैं जीते जी सजा मुक्त किया गया तब भी, इतने वर्ष बीतने वाले हैं कि
मैं, युवा से अधेड़ हो जाने वाला हूँ। अर्थात जीवन के अनमोल समय जिसमें सृजनशीलता उच्चतम होती है, जिसका उपयोग कर मैं इंसानियत के लिए मिसाल हो सकने वाले कार्य कर सकता था, वह कैद के कारावास और अवसाद में व्यर्थ होने वाले हैं।
जिसको बदला नहीं जा सकता वह कार्य मैंने किया है।
मुझे अनुभव नहीं था। कौमी नेता, अपनी राजनीति और धार्मिक दुकान चलाये रखने के लिए, जिसको हमारी खुशियों और जीने की राह निरूपित कर रहे थे, उनके ऐसे बहकावों में उस पर चलकर मैंने अपनी और अपने परिजनों की ज़िंदगी की खुशियाँ मिटा डाली थी।
मैं ट्रैप में फँस गया था। दूसरे पक्ष ने हमें उकसाया था। उस उकसावे में, हमने अपराध किये थे। दंगे शांत हो गए थे। अब हम पर कानून का शिकंजा कस गया था। हम जैसे अनेकों दंगाई कैद हो गए थे।
हमारे अपराध प्रवृत्ति के कई लोग धर लिए जाने से, दूसरे पक्ष के लोग निशंक खुशियों में जीवन के अवसर पा सकेंगे, मुझे यह दिखाई दे रहा था। काश! हम भी देश और समाज बनाने में लगते। हम और वे साथ साथ खुशियों से जीवन यापन करते लेकिन अब -सिर्फ पछतावा रह गया है .. 


-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
04.03.2020
पद चिन्ह अपने छोड़ेंगे कि
बाद पीढ़ी विश्वास कर सके
अहिंसा के मार्ग पर कभी
मानव भी चला करते थे

Monday, March 2, 2020

वे न्याय के लिए लड़ रहे हैं!

वे न्याय के लिए लड़ रहे हैं! ...

हम दो रूह करीब आये थे। अभी अभी हमारी हत्या कर हमारी लाशें नाले में फेंकी गईं थीं।
उस रूह ने मुझसे पूछा- तुम कैसे मारे गए हो?मैंने बताया-
मैं 15 वर्ष की लड़की के शरीर में थी। आज कोचिंग से लौट रही थी। जबरन उठा कर मुझे उस चार मंजिलें घर में लाया गया था। घंटों उनके सामूहिक दैहिक एवं मानसिक यातनाओं की शिकार बनी थी। आखिर में खंजर घोंप मेरी हत्या कर दी गई है और अब मेरा नग्न शरीर, वह, नाले में ला फेंका गया है।
यह बताते हुए, फिर, मैंने, उस रूह से पूछा था- आप कैसे जुदा हुए अपने शरीर से?उसने यूँ बताया-
मैं सरकारी महकमे में गुप्तचर जानकारी के दायित्व लिए काम करता था। इस एरिया में पिछले कुछ दिन से बने हालात से निपटने के लिए मेरे बॉस ने यहाँ चल रही गति विधियों की ख़ुफ़िया जानकारी इकठ्ठी करने का कार्य मुझे सौंपा था। मैं पिछले कई दिनों से यह कार्य करता रहा था। आज उनमें से कुछ अपराधी किस्म के लोगों का मुझ पर शक हो गया था। कई ने इकट्ठे, मुझ पर हमला कर दिया था फिर उन्होंने मुझे भी उठा कर उसी इमारत में ले गए थे। उतने सारे लोगों से लड़कर, मैं बचने में नाकामयाब रहा। जब मेरी रूह शरीर से निकल भी चुकी तब भी मेरे उस मुर्दा शरीर पर उन्होंने चाकू खंजर के 40 से अधिक वार किये हैं। अब मेरी लाश वह तुम्हारे ही लाश के समीप नाले में फेंकी गई है। कहते हुए वह रूह, चुप हो गई है।
शायद वह रूह भी सुन रही है, धीमे होते स्वर में तब के, मेरे इस प्रलाप को- जिन्हें नारी स्मिता का आदर करना नहीं आया, वे अपनी माँ बहन के अधिकार को लड़ते दिख रहे हैं। जिन्होंने मृत शरीर का सम्मान नहीं सीखा, मरने के बाद भी शरीरों को घिनौने तौर से नोंचा भोगा और लहुलुहान किया फिर घसीट नाले में फेंका है, वे अपने अधिकार का तर्क देते हैं और कहते हैं- वे न्याय के लिए लड़ रहे हैं!मुझे अनुभव हुआ कि अब, वह रूह पास नहीं है। मेरी रूह के भी स्मरण मिटने लगे हैं। शायद अगले जन्म के लिए यह रि फॉर्मेट की जा रही है। अंत में मेरा विचार यह रह गया है-
हे ईश्वर, इस रूह को किसी ऐसे कट्टर शरीर में न डालना, जो अपने जीने के अधिकार सुरक्षित करने के लिए, किसी अन्य के जीने का अधिकार छीने ...


-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
03.03.2020

Sunday, March 1, 2020

तेरे मेरे सँस्कारों में
जमीन आसमान जितना विरोध होता है
मुझे पसंद देखना, ज़िंदगी का मुस्कुराना
तुझे पसंद, मौत का रुलाता मंजर होता है

तेरे ख्यालों में तुझे कत्लेआम में
तेरी जीत दिखती होती है
न भूल मगर तू कि तुझे
इसके लिए ज़िंदगी ही चाहिए होती है

बेजान पड़े इंसान के सामने तू
अट्टहास लगाता है
ख़्याल कर तेरी मौत होगी सामने
तब तू गिड़गिड़ाता तो नहीं

अपनी मौत के सामने
तू हँसता हुआ जा सके
इसके लिए तुझे मरते इंसान को
मौत नहीं ज़िंदगी बख्शनी होगी