Sunday, December 29, 2019

प्रतीक्षायें ....

प्रतीक्षायें  ....

मुझे, मेरी चेतना का आभास जब होना प्रारंभ हुआ, मुझे, सर्वप्रथम गोदी में लेकर दुलारने वाले कुछ चेहरे अनुभव हुए थे। कुछ ज्यादा समझ आने पर जिन्हें, मैंने माँ-पिता दादा-दादी या चाचा, बुआ इत्यादि ( और भी हमारे बड़े) रूप में जाना था।
आरंभ में मुझे बस खाने-पीने को मिलने की प्रतीक्षा होती थी। फिर मेरे साथ कुछ गतिविधियाँ मुझे कष्टकारक लगने लगीं थीं। जैसे मुझे नहलाया जाने पर पानी का ठंडा स्पर्श या आँखों में साबुन से जलन (ऐसे ही कुछ और चीजें) तब मुझे इसके जल्दी ही पूरा हो जाने की प्रतीक्षा होती थी।
फिर मुझे बाल-मंदिर/स्कूल जाना पड़ने लगा। वहाँ मुझे प्रतीक्षा छुट्टी होने की होती थी। छुट्टी मिलने के पश्चात खाना - पीना, खेलना-कूदना तथा अन्य मनोरंजन सुलभ होते थे। अतः छुट्टी की प्रतीक्षा तभी नहीं, चाहे वह वक़्त स्कूल/कॉलेज में पढ़ने का या फिर सर्विस करने का रहा हो, मुझे पूरे जीवन रही थी।
स्कूल/कॉलेज जाना लाचारीवश जब आदत में शामिल हुए, तब प्रतीक्षा शनिवार की शाम आने की रहने लगी थी। जिसके बाद का दिन मुझे तुलनात्मक रूप से, अपनी मनमर्जी की ज्यादा आजादी वाला प्रतीत होता था।
इस बीच ऊधम-मस्ती में मेरे हाथ-पाँव भी टूटते रहे या अन्य चोटें लगती रहीं थीं। तब प्रतीक्षा प्लास्टर/पट्टी के निकाले जाने वाले दिन की होती थी। जिनसे शारीरिक टूट-फूट के दर्द से छुटकारा मिल जाता था।
स्कूल-कॉलेज में ही मानसिक यातनाओं का एक समय बार बार आता था। जी हाँ, आप सही समझ रहे हैं - ये परीक्षाओं का वक़्त होता था। तब इनकी समाप्ति की प्रतीक्षा होती थी। इनकी समाप्ति से ही एक और बात की प्रतीक्षा हो जाया करती थी कि परिणाम आयें और ऐसे आयें ताकि घर में किसी को रोष न हो जाये।
स्कूल/कॉलेज में प्रतीक्षा के ऐसे सिलसिले चलते चलते जीवन में कुछ और बातों की प्रतीक्षा रहने लगीं थीं। यथा बड़े-भाई बहनों के विवाह आदि, कुछ त्यौहार, उत्सव ऋतुओं के आने की तथा ऐसी घड़ियों के आने की, जिसमें प्रिय लगते कोई कोई लोगों के दर्शन मिला करते थे।
क्रिकेट/टेनिस मैच के होने से लेकर अखबार या किसी पत्रिका के नए अंक आने जैसी और कुछ बाते भी मेरी प्रतीक्षाओं में समाविष्ट रहतीं थीं।
स्कूल की अंतिम परीक्षा जिसके परिणाम से कॉलेज तय होना था और कॉलेज की अंतिम परीक्षा जिसके परिणाम से अच्छी नौकरी तय होना था के परिणामों की भी बड़ी प्रतीक्षा मुझे रही थी।
ऐसी सभी प्रतीक्षा का अंत कभी मनोनुकूल भी होता था कभी प्रतीक्षा अधूरी भी छूटतीं और उसका समय निकल जाता था।
प्रतीक्षाओं के इस जीवन क्रम में अवसर ऐसे भी आये थे, जब हमने, नहीं चाहे, अपनों के साथ गँवाये थे। तब हमारे अन्य परिजनों ने समझाया था।इसे जीवन क्षणभंगुरता का कटु यथार्थ का होना निरूपित किया था।
जीवन का यह स्वरूप भी अप्रिय चीज नहीं था। मेरी इसके प्रति ललक टूटने पर पुनः फिर से बन जाने से यह बात अनेक बार प्रमाणित हुई थी।
मेरे जीवन में एक बार मनोहारी मुकाम, प्यार के मौसम का भी आया था। मेरा अच्छी योग्यता अर्जित करने के पीछे छिपा, एक विचार तब यथार्थ हुआ था।
मेरे मन में आयु अनुरूप मधुर भावनाओं के कमल खिले थे। कोई अनजान प्रेयसी मिले, मुझे प्रतीक्षा रहने लगी थी। मेरे जीवन में यथा समय उस मनोवाँछित प्रेयसी का तब आगमन हुआ था। जागी आँखों का देखा सुखद सपना मेरे जीवन में तब साकार हुआ था।
अब प्रतीक्षा अनोखे रूप में सामने आयी थी। जब प्रेयसी का सानिध्य होता तब प्रतीक्षा समय आने का नहीं, यह समय बीत न जाए इसकी होती थी। लेकिन समय का भरोसा करना ठीक नहीं होता, समय ने, यथा अनुसार मुझे यह सिखा दिया था। मधुर लगता समय भी निश्चित ही अतीत होता था।
प्रतीक्षा फिर हुई थी कि प्रेयसी, जीवन संगिनी बने।
यहाँ समय का आभार करूँगा, जिसने तब धोखा नहीं किया था। यहाँ भाग्य का आभार भी करूँगा कि मिली, मेरी प्रेयसी और जो मेरी जीवन संगिनी भी हुईं, वह इतनी अधिक पात्र थीं कि मुझे, "स्वयं" उनके लिए उचित पात्र होने का संदेह बना रहा था।
विवाह हुआ, तब हम दोनों की आयु ऐसी थी जिसमें जोश, उमंग, सकारात्मकता अपने चरम पर थी। तब हमें समय और दुनिया यूँ लगे थे  कि जैसे हमारी ही मुट्ठी में है। समय का इससे बड़ा सुखद भ्रम और कोई नहीं था। इसके बाद, समय ने जीवन को ऐसी चकरघिन्नी बनाया कि 30 वर्ष कैसे बीते पता नहीं चला था।
कुछ नितांत व्यक्तिगत अनुभूतियाँ रहतीं और कुछ स्वार्थ पूर्ति की प्रतीक्षा अर्धचेतन में बनतीं जिनमें कुछ पूरी, कुछ अधूरी होती थीं। प्रत्यक्ष में मैं कई जिम्मेदारी और मजबूरियों को निभाते चलता गया था।
परिवार में तब प्रतीक्षा अनुसार बच्चे जन्मे थे, प्रतीक्षा अनुसार उनके स्कूल, कॉलेज, सर्विस और उनके विवाह हुए थे, इसलिए समय के कई बार निर्मित मेरे भ्रमों/प्रतीति पर भी मैंने धोखे की शिकायत की कोई एफआईआर दर्ज नहीं की।
मैंने तय किया था मगर, जब भगवान से साक्षात्कार करूँगा, इस बात पर अवश्य उनसे अपना विरोध रखूँगा कि अगर अपने परिजन/मित्र जब हमें आप प्रदान करते हो, तो उन्हें हमसे छीन क्यों लेते हो?
दादी-दादा, पिता-माँ, चाचा-चाची, श्वसुर पापा, सासु-माँ बुआ-फूफा और परिजन, गुरु, मित्र और हितैषी आदि मेरे अपने, बारी बारी छिन जाने से बार बार, निर्मित कटु मानसिक स्थिति को लेकर जीवन के ऐसे स्वरूप का विरोध-विचार मन में उत्पन्न होते आया था।
मैं एहसान फरामोश नहीं जो ऐसे हर मौके पर, वक़्त की इनायत का शुक्रगुजार भी रहा था, जो बीतते बीतते हमें वह क्षमता दे जाता था, जिसमें मैं अपनों के विछोह के बावजूद भी जी पाता था। भगवान को धन्यवाद भी लिखूँगा कि वह मुझे विवेक देता था, जिसके कारण मैं इन खो गये सब अपनों को, अपने ही अस्तित्व में सम्मिलित पा लेता था, और फिर फिर आगे कि जीवन यात्रा पर जग के प्रति और अधिक जिम्मेदार होते हुए, निकल पड़ता था।
जिनका वियोग हुआ वे सारे मेरे, अपने अस्तित्व के समाप्ति के बाद मुझमें समा कर मेरी प्रेरणा बनते जाते थे। मेरे मिले इस जीवन को सार्थक करने में मेरे मनोबल होते जाते थे।
ऐसे निभाते मैं बहुत चल गया था। अतः समय मेरी परीक्षा और ना लो यह अनुनय करता था। तुम्हारे कदम मिलाते हुए अब मेरे अपनों के और विछोह के का सामर्थ्य नहीं रह गया था।
नई नई होती प्रतीक्षायें फिर उनके पूरे हो जाने के सिलसिले में कड़ीकड़ी, जुड़-जुड़ मेरी जीवन यात्रा अब अभूतपूर्व मंजिल पर पहुँच गई थी। यात्रा अब प्रतीक्षातुर से प्रतीक्षांत में परिणीत हुई थी।
पीछे जिन राहों पर चलकर यहाँ मैं पहुँचा हूँ, वे जीवन मार्ग सब ध्वस्त होकर, ऐसी गहरी घाटियों में परिवर्तित/निर्मित हुए हैं, जिनमें गिर जाऊँ तब भी अतीत का फिर मिलना संभव नहीं है। अब पीछे के सारा जीवन क्रम मेरा मेरे मानस पटल से विस्मृत भी हो गया है।
आगे के दृश्य में -
"एक बहुत विस्तारित स्वर्णिम पर्वत श्रृखंला है, जिस का ओर छोर नहीं है और जिसकी ऊँचाई आसमान चीर देने वाली प्रतीत हो रही है।  पर्वत के मध्य से स्वच्छ जल एक प्रवाह रूप में धरा पर गिरता हुआ एक दूर तक जाने वाली लंबी सरिता का रूप धारण कर ले रहा है। स्वर्णिम पर्वत पर जहाँ तहाँ गुलाबी आभा लिए दरकीं हुईं झिर हैं ,जिसमें से गिर रहा नीर इस सरिता में मिलता जाता है। 

सरित-नीर अपने रंग में पर्वत की स्वर्णिम आभा, गगन की नीली आभा और गुलाबी झिर के समिश्रण से किसी स्वर्ण हार सदृश्य दिखाई पड़ रहा है ,जिसमें नीलम और गुलाबी नगीने जड़े हुए हैं। ऐसे मनोरम दृश्य के बीच एक छोटे समतल पर मैं एकला खड़ा हूँ। मुझमें किसी बात की प्रतीक्षा अब नहीं बची है। इस मनोरम प्रदेश से एकमात्र मार्ग पर्वत पार करने का है। जिसे कोई 'जीवन' पार करने की कोशिश करे तो सदियों में संभव नहीं है। मगर 'मौत 'ने एक क्षण से भी छोटे समय में मुझे, वह अनंत ऊँचाई वाला लगता पर्वत पार करा दिया है।"

अब पर्वत के उस पार सामने है एक अनुपम दृश्य ...     

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
29.12.2019


Friday, December 27, 2019

कोई न कोई नज़रिया यहाँ
जरूर होता है जिसमें
बहुत अच्छी बात भी कोई
महज़ बेवकूफी लगती है

बात अपनी जरूर कहिये
मगर इस बात को तैयार रहिये
होंगे अपने कुछ यार जरूर जो
कही को बेवकूफ़ी बतायेंगे

वह तो ख़ुदा भी नहीं
जिसके वज़ूद पर सब को एतबार हो
कोई न देता अहमियत तुझे
मतलब ये नहीं कि तेरा कोई वजूद नहीं

मेला है मंदिर में मगर
वहाँ भगवान अकेला है
स्वारथ के जगत में समय किसी को
उसकी सीख समझने का नहीं

Thursday, December 26, 2019

मेरी माँ - कितना अधिक चाहती हैं, मुझसे!

मेरी माँ - कितना अधिक चाहती हैं, मुझसे!


आरंभ से ही आरंभ करना उचित होगा। अबोध से मैं जब सुबोध होने लगा, मैंने, मिला घर भरापूरा पाया था। मुझे सब के बीच माँ का सामीप्य उनका दुलार ज्यादा सुहाता था। घर में भाई बहन भी थे, मेरी माँ को बच्चों, घर, परिवार, समाज और धर्म के दायित्व देखने होते थे। इन सब के बीच उन्हें समय कम होता था। मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो देखा वे सभी से थोड़ी ज्यादा सरल एवं शाँत चित्त थीं। उन्हें गुस्सा या चिड़चिड़ाते मैंने कभी नहीं देखा था। यह सब तो तब शायद हर माँ और हर गृहणी की विशेषता होती थी।
समय बीतते गया और जब मुझे चींजे और स्पष्ट दिखने लगीं तो मैंने अनुभव किया कि उनमें, एक ऐसी विशेषता थी जो मुझे परिवार-नातेदार में किसी और में दिखाई नहीं पड़ती थी। वह उनकी निशर्त जीवन शैली थी। 


"उनको घर परिवार, पास पड़ोस और समाज में सभी की शर्त स्वीकार्य होती थी जबकि ऐसा करते हुए उनकी अपनी कोई शर्त नहीं होती थी। "

आज जब मैंने जगत देख लिया अब मुझे समझ आता है कि यह बात साधारण नहीं होती। मेरी माँ, यूँ तो देखने में एक साधारण मनुष्य ही समझीं/कही जायेंगी। मगर वे साधारण नहीं असाधारण हैं। 

"कोई आसान खेल नहीं अपने अस्तित्व को औरों के अस्तित्व में विलोपित कर देना। वह भी कुछ पल या कुछ दिन नहीं, अपितु संपूर्ण जीवन में यही कर दिखाना। "


वे कुछ अपवाद रहे मनुष्य में समाविष्ट हैं। उनकी सरलता, सहजता, शाँत चित्तता और निशर्त जीवन शैली के जीवन में, मैंने कभी कभी थोड़ा अपवाद देखा है। उनका अपना मायका ऐसा था,जिसमें उनके पिता और उनके बड़े भाई, उनकी आठ वर्ष की उम्र तक ही चल बसे थे। तब हमारी नानी और मेरी माँ का जीवन यापन, हमारे मौसा जी के परिवार के साथ होता था। बचपन में वहाँ नानी जी, मौसा जी एवं मौसी जी को मिलने पर हमें पता चलता था कि मेरी माँ में ये विशेषतायें कैसे आयीं थीं।
अपवाद की जो बात मैंने की है, यहाँ उनके मायके में मेरी माँ में हमें देखने मिला करती है (अब जब नानी जी, मौसा जी एवं मौसी जी नहीं हैं तब भी)। ललितपुर उनका मायका है।  जहाँ होने पर उनके स्वर और व्यवहार में कुछ अधिकार बोध का होना प्रकट होता है। यहाँ परिस्थिति से सभी साधारण किंतु विचार और आचरण से महान, हमारे अपने, निवासरत रहे/हैं। जिन्होंने मेरी माँ को हृदय से यथोचित आदर और अनुराग दिया है।  मुझे यह देख कर प्रसन्नता होती है, मेरी माँ के जीवन में अपने लिए रहीं थोड़ी शर्तें कभी कभी यहाँ होकर पूरी होती रहीं हैं।
मैं फिर स्वयं पर और मेरी माँ की चर्चा पर लौटता हूँ। वे स्वयं धार्मिक सँस्कार में पली बड़ी होने से, हम बच्चों से (हम चार भाई बहन हैं) भी उनकी अपेक्षा धार्मिक पाठ को पाठशालाओं में जाकर समझना और कंठस्थ करने की होती थी। मेरे भाई-बहन इन अपेक्षाओं पर खरे थे, मगर मेरी पढ़ने में रूचि कम रही है अतः मैं यह नहीं कर पाता था। बाद में मैं इंजिनीयरिंग पढ़ने बाहर रहा और फिर बाहर ही सर्विस करने लगा था। 

धार्मिक क्रम में, मैं जो पिछड़ा, वह पिछड़ापन मेरा आजीवन बना रहा है।  पाँच वर्ष हुए हमारे पिता जी का साया हम सब पर से उठ गया। माँ, तब से नित कमजोर होती गईं। अब पिछले दो वर्ष से जोड़ों की अकड़न से वे बिस्तर पर हैं। मेरे छोटे भाई के परिवार में उनकी यथोचित देखभाल और सेवा हो रही है। उनका वजन अब 25-30 किलो से ज्यादा नहीं रह गया है। लेकिन उनमें विपरीत शारीरिक स्थिति में भी विशेषतायें बनी हुईं हैं। वे सिर्फ एक समय भोजन ग्रहण करती हैं। लगभग पूरे समय मोक्षमार्ग का ध्यान करती हैं। शिथिल शारीरिक स्थिति में भी वे मानसिक रूप से पूर्ण सक्रिय हैं। जीवन भर पढ़े-गुने, धार्मिक पाठ का स्मरण उनका सदा बना रहता है। 

उनका जीवन एक कमरे में सिमट गया है मगर उसमें भी उनकी कोई शर्त नहीं है। उनसे कोई अलग किस्म की बात करें उसमें उनकी कोई रूचि नहीं है। मेरी बड़ी बहन वडोदरा में है उन्होंने इस बात को समझा है। वे नित दिन फोन पर उन्हें कोई कोई धार्मिक पाठ सुनाती हैं। मेरी बहन जो सुनाती हैं उन्हें सब याद है फिर भी वे आनंद पूर्वक सुनती हैं। 


उपरोक्त में जैसा मैंने लिखा धार्मिक क्रम में मैं उनका पिछड़ा हुआ बेटा हूँ। मै दूर से उनके लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाता हूँ ( जब मैं सपत्नीक इंदौर जाता हूँ तब हम उनकी सेवा सुश्रुषा कर पाते हैं )।  मुझे लगभग दो महीने पहले अहसास हुआ कि उन्हें यदि धार्मिक पाठ मैं भी सुनाऊँ तो उन्हें ज्यादा प्रसन्नता होगी। तब से मैं प्रत्येक अवकाश के दिन 1 घंटे उन्हें धार्मिक पाठ सुनाने लगा हूँ। उन्हें इससे बहुत ख़ुशी होती है। वे मेरे अवकाश के दिन में मेरे मोबाइल कॉल की प्रतीक्षा करती हैं। 


वे मुझसे अलग अलग पाठ सुनाने कहती हैं। पिछले दो सप्ताह से वे मुझसे #भक्तामर पाठ भी सुनाने कह रहीं हैं। इस मंत्र में #संस्कृत के 48 कठिन #श्लोक हैं। जिन्हें सही उच्चारित करना मेरे लिए बड़ी कठिनाई का सबब होता है। उन्हें सब कंठस्थ है लेकिन मुझसे सुन कर उन्हें बहुत अच्छा लगता है।
सप्ताह में 1 बार 1 घंटा ऐसा करना किसी को भी लगेगा कि-

"कितना थोड़ा सा चाहती है मेरी माँ, मुझसे। यह वे जानती हैं और मैं जानता हूँ कि मुझसे वे कितना विशाल चाहती हैं।" 

वास्तव में मुझसे मेरी सद्गति के लिए मोक्षमार्ग पर चलने की अपेक्षा करती हैं। जानने वाले जानते हैं यह बहुत दुष्कर कार्य होता है। उनका विश्वास है कि उनकी प्रेरणा से मैं ऐसे धार्मिक पाठ में लग कर यह कार्य कर सकूँगा।
निशर्त प्रतीत होते उनके जीवन में एक और बहुत अद्भुत संगम मैं देखता हूँ। हमें लगेगा कि उनका जीवन
"अपने लिए जिये तो क्या जिये -तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए"
इस पँक्ति को चरितार्थ करता है। 

उनके जीवन में इस लौकिक प्रतीति की जीवंतता से मिलता, स्वयं उनके स्व-हित की महान भावना का संगम मुझे दिखता है, जिसमें वे मोक्ष प्राप्त कर जन्म मरण के चक्कर से मुक्त होने की अभिलाषी होती हैं।

बचपन से बहुत अच्छाई की शिक्षा उन्होंने हमें दी है। मेरी दो बेटियों को दीं हैं। उनके छत्रछाया में उनकी दो बहुओं के जीवन को बहुत निखार मिला है। वे अपने सभी नाती-पोते-पोतीनों की प्रेरणा स्त्रोत रहीं हैं। वे कहती रहीं हैं -

"बुराई की चर्चा से भी बुराई को प्रसार मिलता है। बुरी बातों का जिक्र न करके अच्छाई पर बात करने से बुराई मिटती है ... " 


--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
27.12.2019

Tuesday, December 24, 2019

हूँ तो, मैं एक अम्मा ही ...

हूँ तो, मैं एक अम्मा ही ...

यहाँ की भाषा में हमें शरणार्थी कहा जाता है। हमें रहने के लिए जो जगह दी गई है उसे कैंप कहा जाता है। यहाँ आये हमें दो साल हुए हैं। अपनी और अपने छह छोटे बच्चों के पेट भरने के लिए मुझे कैंप से निकल कर खेतों में मजदूरी तलाश करनी होती है। जिस दिन मजदूरी नहीं मिलती उस दिन अपने दो दूध मुहें बच्चों (लाचारी दिखाने) को लेकर मैं भीख माँगा करती हूँ।
आज, मैं आधे घंटे से उस दुकान पर खड़ी हूँ, जहाँ भीख में पहले मुझे 5 रू का सिक्का भी मिला है। लेकिन दुकान पर बैठे आदमी का ध्यान मेरी तरफ नहीं है। वह  तन्मयता से टीवी देख रहा है। अब, मैं भी वही देखने- सुनने लगी हूँ। उस आदमी का ध्यान अब, वहाँ से हटा है, उसने दया से देखते हुए आज मुझे 10-10 के दो सिक्के दे दिए हैं। बीस रूपये में खाने का बहुत सा बासा सामान मिल गया है। जिसे, मैंने कैंप में आ कर अपने बच्चों में बाँट दिया है। थोड़ा मैं लेकर पास के एक वृक्ष के नीचे आ बैठी हूँ।
धीरे धीरे खाते हुए मैंने टीवी पर जो देखा सुना है उसके बारे में सोच रही हूँ। उस पर, यहाँ के पुलिस वालों ने चार लोगों को मार दिया दिखाया जा रहा था, जिन्होंने एक लड़की के साथ जबरदस्ती करने के बाद उसे मार डाला था। उसे सोचते हुए मुझे अपनी याद आ गई थी।
वह पहला देश था, जहाँ मैं पैदा हुई थी। मालूम नहीं मैं कितने साल की हुई थी। दो तीन बार, उस वक़्त, कुछ कुछ दिनों में मुझे खून आने लगा था। जो कुछ दिन बाद अपने आप ठीक हो जाता था। अम्मा को बताया था, उसने कहा था ठीक हो जाएगा। ऐसे समय वह पुराने फ़टे कपड़े मुझे दे देती थी। जिसे मुझे बाँध लेना होता था।
तब शायद यह चौथी बार हुआ था। उस दिन ऐसे ही कपड़े बाँधे थे और अम्मा के साथ खेत पर काम कर रही थी। कपड़ा बदलने में थोड़ी दूर आई थी। छिपकर मै, यह कर रही थी। तब मेरे बाप जैसी उमर का एक आदमी आया था। उसने मेरा मुहँ बंद कर जो काम किया था, वैसा मैंने, कभी कभी अपनी अम्मा के साथ बाप को करते देखा था। मेरे साथ ऐसा होते हुए और लोगों ने देखा था। मुझे दर्द बहुत हो रहा था फिर भी, तीन ऐसे और लोगों ने यही मेरे साथ किया था। 
मुझे होश नहीं रहा था। फिर आधे होश में मालूम हुआ था, अम्मा आई थी ढूँढ़ते हुए। मुझे लादा था और घर ले गई थी। इस बार खून बंद होने में बहुत दिन लग गए थे। मैं घर में पड़ी रहती थी।
टीवी पर देखी घटना से अलग जबरदस्ती करने वालों ने मुझे जलाया नहीं था। अब समझ आता है मुझे, उस देश में हमारे साथ ऐसा करने वाले को सजा का डर नहीं होता था। इसलिए मेरी जान नहीं ली गई थी। मेरी अम्मा और बाप ने भी कहीं शिकायत नहीं की थी। ना ही वहाँ की पुलिस ने उन जबरदस्ती करने वालों मारा था।
जब मै ठीक हुई थी। मेरे बाप ने, मेरे से बहुत बड़े आदमी के साथ, मेरी शादी कर दी थी। वह, कहता था मुझे प्यार कर रहा है। मगर करता वैसी ही जबरदस्ती था जैसी, उन चार लोगों ने की थी।
मैं, बिलकुल भी पढ़ी लिखी नहीं हूँ। इसे प्यार कहूँ या जबरदस्ती जिसमें, मैं छह औलादों की अम्मा हो चुकी हूँ। यहाँ कैंप में मेरे से मेरी उम्र पूछने पर मैं जबकि, बता नहीं सकी तो पूछने वाले ने मुझे अठारह साल की बताया था और कॉपी में लिख लिया था।
इस बीच शादी होने से लेकर अब तक, हम देश देश भटकते हुए, इस तीसरे देश में आये हैं। कहते हैं, हम यहाँ शरणार्थी हैं। इस देश की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा होने वाली है, अतः हमारे लिए यहाँ जगह नहीं है। हम सबको वापिस जाना पड़ेगा।
मैं बिना पढ़ी लिखी 18 साल में छह बच्चों की हुई अम्मा को, यह समझ नहीं आता कि यह क्या हो रहा है मेरे साथ? जिस देश मै हम रहते थे, वहाँ से हमें खदेड़ा गया। दूसरे देश से भी हमें खदेड़ दिया गया। यहाँ कहते हैं, हमारे लिए यहाँ भी जगह नहीं। 
हालात ये हैं तो, मुझे पैदा क्यों किया गया? मेरे सिर्फ  18 साल की होते तक ही, प्यार या जबरदस्ती कहूँ, मुझ से,  छह औलादें क्यों पैदा करवा दी गईं हैं। मैं तो, भूखी रह लूँ, रहते ना बने तो किसी कुएं मै कूद मरुँ। मगर इन मासूम को कैसे छोड़ूँ? प्यार मुझे दुनिया में किसी से नहीं! लेकिन कैसी है मजबूरी?  मेरी असहाय हालत में, मुझसे प्यार के नाम पर जबरदस्ती पैदा किये गए, इन छह मासूमों के लिए! मैं, कैसा अजीब है यह मन मेरा ? यह भी नहीं मान सकती कि इनसे मुझे प्यार नहीं!
मैंने सुना है बहुत सुंदर सुंदर सड़कें हैं, दुनिया में बड़े बड़े आलीशान घर हैं। बहुत बहुत पढ़े लिखे एक से बढ़कर एक कई महान लोग हैं। बहुत दौलत है इनके पास। 
अरे ओ दौलत वालों, अरे ओ पढ़े लिखे लोग, अरे ओ आलीशान बँगलों में रहने वालों - जरा मेरी सोचो। मुझे पैदा होने से रोको। मुझसे कई कई औलादें पैदा होने से रोको
और ऐसा अगर रोकने की ताकत नहीं तो, मुझे वह देश दे दो, एक छोटा घर दे दो। जहाँ मुझे भले कोई प्यार करने वाला न हो, मगर जबरदस्ती करने वाला कोई न हो। मुझे निकालो उस आदमी के चँगुल से जो कहता घरवाला हूँ तेरा। कहता है प्यार, और करता है जबरदस्ती मुझ पर, और साल बीतते न बीतते एक और औलाद रख देता है मुझ पर। 
दया करो मुझ पर, पैदा हो गए जो मुझसे उन्हें प्यार न करूं तो क्या करूं - अम्मा हूँ इनकी
मेरी तंद्रा में यह सब चल ही रहा है कि अब तीन बड़े बच्चे जो चल लेते हैं, मुझे ढूँढ़ते हुए यहाँ आ गए हैं। मैं शिकवे शिकायत और नहीं रख सकूँगी इन्हें देखना है मुझे अब -
ओ दौलत वालों, बँगलों में रहने वालों, पढ़े लिखे महान लोगों, तुम और तुम्हारी औलादें सलामत रहें! तुम्हें तुम्हारे जो भी हैं देश मुबारक रहें!
मेरे मन में आये अनर्गल विचारों के लिए मुझे माफ़ करना! अभी छह हैं! कुछ और हो जायेंगे, शायद!  चाहे बेइज्जत करो! चाहे लाचार करो! चाहे हवस अपनी मुझ पर शाँत करो! 

लेकिन हूँ तो, मैं एक अम्मा ही, इन्हें पालना होगा मुझे ..   ...       

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
25.12.2019

Monday, December 23, 2019

बेशक वह मर्ज ना था
वह अर्ज करना मेरा
 फर्ज समझ करता हूं
 हुआ जो गर्जना मेरा


इन पगडंडियों पर कदम बढ़ा
 वीरानो तरफ चले जाएंगे

दुनिया यही रहेगी
मुसाफिर हम चले जाएंगे

Sunday, December 22, 2019

दिमाग़ के बंद कपाट खोल डालो
समझो सारी बात फिर
चाक चौबंद ज़िंदगी अपनी
खुशियों में सपाट जी डालो

#समझ_यार_मेरे कहते हैं नासमझी किसी की माफ़ कर देना इंसानियत है मगर नासमझ ही नहीं, जो नासमझ नहीं वह भी भुगत रहा है

दंगाई ..

दंगाई .. 

और लोग जाते हुए देखे थे, मैंने। देख मैं भी गया था उनके साथ। पत्थर उठा मैं भी लग गया था, आड़ ले लेकर पुलिस वालों पर बरसाने। कई पत्थर फेंके थे मैंने। तब मेरा फेंका हुआ एक पत्थर, जा लगा था एक पुलिस वाले के चेहरे पर। मेरे इस निशाने की साथी दंगाईयों ने दिल खोल कर तारीफ़ की थी। मैं भी अपनी इस बहादुरी पर फख्र करता घर आया था।
रात मैंने सभी के बीच अपना कारनामा लहक लहक कर घर में सुनाया था। सुनकर उन्हें समझ नहीं आया था - खुश हों, मेरे (बेटे के) कारनामे पर या इस बात का रंज मानें। फिर रात का खाना खाकर अपने बिस्तर पर सोने के लिए आया था। तब पीछे, मेरी बहन आई थी। राज की बात बताने के अंदाज में बोली थी, भाई- आप जो बता रहे थे बाहर किसी और को न कहना। पड़ोस के मुजीब चच्चा के घर में शाम से कोहराम मचा है।  चच्चा, अस्पताल में भर्ती हैं उन्हें आज भीड़ के द्वारा फेंका हुआ एक पत्थर लगा है। उनकी एक आँख फूट गई है। यह सुनकर मैं सन्न रह गया था। मुझे याद आया मुजीब चच्चा पुलिस इंस्पेक्टर हैं। वही हैं जिनकी बेटी, शमीम पर मैं दिल ओ जान से फ़िदा हूँ।
मुझे अब दंगाईयों में शामिल होने का बेहद अफ़सोस हो रहा था। हो न हो मुजीब चच्चा ही शायद मेरे पत्थर के शिकार हुए थे। अब उल्टा मैं, बहन से इल्तिजा करने लगा था, सायरा तुम मेरी पत्थर वाली बात बाहर किसी से न कहना। नहीं तो शमीम तो मेरी जानी दुश्मन हो जायेगी। सायरा भी फिक्रमंद दिखाई दे रही थी।
रात मैं सो न सका था। चच्चा की फ़िक्र में करवटें बदलता रहा था। शमीम से मेरा एक तरफा इश्क, इस कड़ुवी सच्चाई से खतरे में पड़ा हुआ दिखाई पड़ रहा था।
सुबह खैरियत पूछने के बहाने, मैं उनके घर गया था। मैंने अफ़सोस ज़ाहिर किया था। शमीम का भाई बेहद भड़का हुआ था। कह रहा था - कमीना, (और भी कई अपशब्द कहता है) बस पता चल जाये वह पत्थर मारने वाला कौन है। दोनों आँखे फोड़ कर रख दूँगा उसकी। उसका प्रलाप सुनकर मेरी घिग्घी बँध गई थी। जल्द एक तरह से पीछा छुड़ा कर वहाँ से उठा था, मैं।
मैं सदमे की हालत में था। दिन में घर से निकल नहीं सका था। दोपहर खाना खा कर लेट गया था। रात नींद नहीं हुई थी, सो नींद लग गई थी। सायरा ने झिझोड़ कर जगाया था।  वह कह रही थी, भाई, बाहर चलो, पुलिस आई है। हड़बड़ाकर मै आँगन में आया था। #पुलिस ने मेरे हाथों में हथकड़ी डाल दी थी। मुझे किसी #सीसीटीवी कैमरे से #पत्थरबाज के रूप में पहचाना गया था।
पुलिस मुझे ले जा रही थी। पीछे पलट कर मैंने देखा था।  शमीम ने मुझे देखते हुए देखा था, और उसने खँखार कर सामने थूक दिया था ..   

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
22.12.2019