Monday, December 2, 2019

न्याय ...

न्याय ...

न्याय की आशा उस तंत्र से
स्वयं जो भ्रष्ट है
न्याय की आशा उसे
स्वयं जो कर्तव्यच्युत है


न्याय पाने के लिए हमें
कर्तव्य पर खरा उतरना होगा
कर्तव्य परायणता लिए हमें
तंत्र में विराजमान होना होगा

बे-ईमान खुद, ईमान की आशा
औरों से करते हैं
निश्चित उन्हें अब निराशा होगी
अब चालाकी की हिकमत सब करते हैं

शिक्षा से चालाकी नही हमें
नैतिकता ग्रहण करनी होगी
भूल अपनी अपेक्षायें राष्ट्र से
पहले राष्ट्र अपेक्षायें पूरी करनी होगी

शिक्षा की पूर्णता हमें
नैतिकता सिखा जाती है

गर शिक्षा से तुममें
सिर्फ चालाकियाँ भर आईं हैं
समझना 'राजेश' कि तुमने
शिक्षा अधूरी पाई है

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
03.12.2019


Saturday, November 30, 2019

लड़की है, लड़कियों से कभी, गलती हो जाती है!

लड़की है, लड़कियों से कभी, गलती हो जाती है!


बलात्कार रोज हो रहे हैं दिन में ही कई कई हो रहे हैं लेकिन देश के मीडिया एवं सोशल साइट्स पर कोई कोई प्रकरण ही चर्चा का केंद्र बनता है। जनमानस को जो झकझोरता/आंदोलित करता है।
ऐसा ही हाल ही का प्रकरण #प्रियंका रेड्डी का है जिसने हर घर में, अपनी अपनी बहन/बेटी, पत्नी आदि की अस्मिता रक्षा को लेकर हर किसी को चिंतित किया है। चिंतातुर हममें से हर कोई ऐसे में अपनी अपनी समझ से अपने अपने सुझाव रख रहा है ताकि सभ्यता के इस दौर में ऐसी  पैशाचिक घटनायें, वर्तमान या भविष्य न रहकर इतिहास के काले अध्याय में सिमट जायें।
व्यक्तिगत रूप से ऐसी नृशंस घटनायें जब सुनने/पढ़ने या देखने में आती हैं तो मुझे निस्तब्ध करती हैं। कभी यह भी लगता है कि रोकथाम के सभी उपाय लोगों ने कह/लिख दिए हैं, विरोध भी पुरजोर हो चुका है। शासन/प्रशासन और न्यायालय भी संज्ञान लेकर समुचित कार्यवाही करने में जुट गया है। ऐसे में मेरा कुछ लिखना बनता नहीं है। मगर चूँकि हिंदी लेखक के रूप में सोशल साइट्स पर मेरी सक्रियता रहती आई है। मेरा एक छोटा सा पाठक समूह, इसे लेकर मेरे मन में क्या आया है, इसे जानने को कदाचित उत्सुक होगा। इसे अनुभव कर अपनी अवाक स्थिति से पार पाते हुए मैं लिख रहा हूँ, जो इस समाज के प्रति मेरे उत्तरदायित्व में होना भी मैं सम्मिलित मानता हूँ।
विषय पर लौटते हुए ऐसे क्रूर और घिनौने दुष्कृत्यों के कारण की खोज में निकलता हूँ तो देखता हूँ - मुझे "देश का सारा पुरुष वर्ग" (प्रकट है मेरे सहित) कोई कम या कोई ज्यादा, मुझे दोषी दिखाई देता है। इसे पढ़ने वाले मेरे पुरुष मित्र अगर मुझसे असहमत हो जायें तो मेरा सविनय आग्रह है कि वे सिर्फ निम्न प्रश्नों को लेकर स्वयं आत्मवलोकन करें - 
  • 1. क्या हमने अभिभावक होने की पात्रता के बाद संतान पैदा कीं हैं?
  • 2. संतान जन्मने के विचार से पहले यह विचार किया है कि हमारी कितनी संतान का होना यह देश सहन कर पायेगा?
  • 3. एक पुरुष होकर हमने छोटी या बड़ी छेड़छाड़ किसी लड़की/युवती से क्या कभी नहीं की है?
  • 4. क्या हम बहाने-बहाने से *शराब और देर रात्रि पार्टी के अंग नहीं होते हैं?
  • 5. क्या हम *पॉर्न वीडियो को देखना सामान्य रूप में स्वीकार नहीं कर चुके हैं? ( उपर्युक्त *4. एवं *5. "का व्यापार" मिलने वाले ग्राहक से फला-फूला है. दुर्भाग्य इसने भी रेप बढ़ाये हैं)
  • 6. बेटियों और बेटे को लेकर क्या हमारे विचार/सँस्कार में विचित्र भिन्नता नहीं है?
(प्रश्न और भी हैं मगर मुझे लगता है, इतने ही पर्याप्त हैं जो हममें से लगभग हर पुरुष को स्वतः ही कठघरे में कमोबेश दोषी मान लेने को मजबूर कर देंगे)
बेटे को लेकर कोई कह देता है "लड़के हैं लड़कों से गलती हो जाती है", क्या हमने बेटी को लेकर कभी सुना या स्वीकार किया, "लड़की है लड़कियों से कभी गलती हो जाती है"? लड़की का कुछ क्षम्य नहीं, वह ऑनर किलिंग की शिकार हो जायेगी या दुश्चरित्र कही जायेगी। अगर यही मानदंड हमारे बेटों को लेकर होते और वे भी ऑनर किलिंग के शिकार होते या दुश्चरित्र ठहराए जाते तो बलात्कार का कोई अध्याय इस समाज में लिखा ही नहीं जाता।अगर ऐसा होता तो बलात्कार को लेकर हमारा विरोध मात्र दिखावा सा नहीं लगता और जो यह सिर्फ दिखावा नहीं होता तो बलात्कार की रोकथाम हो जाती। और किसी प्रियंका के जीवन का अंत इस तरह दर्दनाक एवं अकालिक नहीं होता। क्षमा सहित, सभी को अपराधी ठहराने के दुस्साहस के लिए।
और
बेटी प्रियंका रेड्डी, क्षमा आपसे, हम वह देश, वह समाज नहीं हो पाए जिसमें आप अपना अनमोल जीवन पूरा तथा गरिमा से जी लेतीं।  

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
01.12.2019
     

Thursday, November 28, 2019

आनंद तुझ में ही समाया भीतर, 'राजेश' पहचान तो जरा
संसार की हर चीज में फिर, नज़र आएगा तेरा आनंद भरा

तू पति - वह पत्नी

कई शिकायतें उससे तुझे

कई उसे भी तुझसे हैं

गर चाहता कहना उससे, उसकी भी तू सुन पूरी

चाहता कि वह बदले, तू भी खुद को बदल दिखा

Tuesday, November 26, 2019

यार का वेश धर कर यहां, लोग बहुत मिलते हैं
दगा खाकर उनसे, हम चारों खाने चित गिरते हैं

वह आदर्श जिसे पढ़ पाना ही होता बहुत मुश्किल
है कल्पना, उसे जी पाना होगा कितना मुश्किल

Monday, November 25, 2019

ज्यूँ ज्यूँ लेख कठिन होते गये
त्यूँ त्यूँ पढ़ने वाले बिरले हुए
आज के युग में रसास्वादन के
अब परंपरा व दिन अतीत हुए 

कदाचित! मै भी पुरुषोत्तम हूँ ....

कदाचित! मै भी पुरुषोत्तम हूँ .... 

अंजान नं. से कॉल आ रहे थे, ट्रू कॉलर में भी नाम नहीं बताया था। वह इन्हें अनदेखा करता रहा था। मगर जब पिछले चार घंटे में पाँचवी बार घंटी आई तो यह सोचते हुए कि कोई आपात स्थिति तो नहीं उसने स्वाइप कर कॉल रिसीव किया था -
दूसरी ओर से : (एक ग्रामीण युवती का स्वर सुनाई पड़ता है) परसोत्तम कहाँ है, उससे बात कराओ!
वह : यह पुरुषोत्तम का नं. नहीं है, आप सही नं. देख के लगाओ! (कहते हुए कॉल काटता है)
यह गलत कॉल परसोत्तम के लिए था, वह निश्चित ही उस युवती का परसोत्तम नहीं था। किंतु इस कॉल से उसका चिंतन ट्रिगर होता है।  "कदाचित! पुरुषोत्तम तो वह है"
फिर, उसका अपने आप से पुरुषोत्तम के मानकों पर परखने की प्रक्रिया यूँ आरंभ होती है।
( मानकों के तरफ के परीक्षण के प्रश्न, उसे 'मानक' रूप में एवं उसके उत्तर 'मैं', में  वर्णित हैं)
मानक : क्या पुरुषोचित कर्तव्य बोध है, तुममें?

मैं : हाँ, मैं परिवार,समाज, देश और मानवता के प्रति अपने कर्तव्य बोध रखता हूँ।
मानक : पुरुष में न्याय प्रियता होती है, है तुममें?

मैं : हाँ, अपनी तर्क क्षमता में मै, सर्व पक्ष परख, न्याय से पेश आता हूँ। 
मानक : तुममें, पुरुषोचित साहस है, नारी रक्षक हो खड़े होने का?

मैं : जी हाँ, मैं नारी दुर्दशा के प्रति संवेदनशील हूँ, मै उसे देखने की समाज दृष्टि लाने की, चेतना के लिए प्रयासरत रहता हूँ।

मानक : कहीं, तुम ईमानदारी पर, अपनी स्वार्थ लोलुपता तो हावी नहीं होने देते?

मैं : जी नहीं, मैं धन अर्जन में नैतिकता का विचार सदा रखता हूँ।
मानक : जीवन में पुरुषार्थ की प्रेरणा क्या तुम ग्रहण करते हो, औरों को भी क्या इस हेतु प्रेरित करते हो?

मैं : जी, पुरुषार्थरत रहने को मैं, जीवन सार्थकता जानता हूँ, अतः इससे स्वयं प्रेरित रहता हूँ , और अन्य को भी प्रेरित करने के उपाय करता हूँ।

"पुरुषोत्तम" होने के लिए इतने परीक्षण एवं उनकी पुष्टि होना उसे संतुष्ट करते हैं। 

वह 'मानदंड' पर, और परखे जाने को, आवश्यक नहीं मानता, तब लिखना आरंभ करता है -
"कदाचित! मै भी पुरुषोत्तम हूँ .... " 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
26.11.2019