Wednesday, October 30, 2019
Monday, October 28, 2019
दीपावली का दूसरा दिन ....
दीपावली का दूसरा दिन ....
हॉस्टल में मानसी की फ्रेंड्स ने हँसी-मजाक और शरारत में, छुपाये मोबाइल के माध्यम से वह वीडियो बनाया था, मानसी का जिसमें वॉशरूम में नहाते और कपड़े पहनते हुए शरीर का ऊपरी भाग झलक रहा था। हँसी ठिठोली के बाद मानसी की नाराजी दिखाने पर जिन जिन के पास वीडियो था, उनके द्वारा वह डिलीट कर दिया गया था। मानसी इसे विस्मृत कर चुकी थी, ऐसे में लगभग डेढ़ वर्ष बाद एक अननोन न. से उसके व्हाट्सएप पर यह वीडियो आया था। जिसे देख वह आग बबूला हो गई थी। ट्रू कॉलर में सर्च करने पर वीडियो करने वाले का नाम 'अरिहंत जैन' मालूम पड़ा था। व्हाट्सएप रिप्लाईज् में उसे ज्ञात हुआ था कि अरिहंत उसी के कॉलेज में उसका एक साल सीनियर स्टूडेंट था। फिर ज्यादा पूछताछ किये बिना अगले दिन वह अरिहंत से मिली थी, अरिहंत ने बताया था कि यह वीडियो उसे एक फेक आईडी पर फेसबुक में लगा मिला था। उसने वहाँ से इसे रिपोर्ट कर आईडी डीएक्टिवेट करवा दी थी। उसे यह दिखाई दिया था तो चेहरा परिचित लगने पर उसने मानसी का नाम और न. पता कर उसे सेंड किया था। वीडियो मानसी को सेंड कर खुद अपने पास से भी वह डिलीट कर चुका है।
यह सब करने के पीछे उसकी भावना, मानसी को वीडियो के अस्तित्व से अवगत कराना था। मानसी ने तब यह वीडियो कैसे बना था, के संबंध में सब बताया था। अरिहंत ने तभी मानसी को यह कहा था कि अगर यह वीडियो कभी कोई और, उसके पास लाये और कुछ गलत के लिए दबाव बनाये तो उसके प्रभाव में उसे आना नहीं चाहिए। वीडियो में ऐसा कोई गलत नहीं है, और मूवीज आदि में तो फिल्माया जाने वाले यह एक साधारण सा ही दृश्य है। मानसी ने इस सब पर कृतज्ञता ज्ञापित की थी और उस दिन की उनकी भेंट खत्म हुई थी।
उस दिन मगर भला सा लगा, ये 'अरिहंत', मानसी को अपने नाम के विपरीत एक दुष्ट व्यक्ति प्रतीत हुआ था जब मानसी ने उससे विवाह करने कहा और अरिहंत ने यह कह कर इंकार किया था कि मानसी की जाति, जैन से हीन है और आर्थिक रूप से भी मानसी का परिवार कमजोर है। मानसी को अरिहंत से यह सब सुनना इसलिए भी नागवार लगा था कि वीडियो वाले प्रकरण के बाद में उनमें अफेयर हुआ था और इतना कि चार बार उनमें संबंध भी स्थापित हुए थे। अरिहंत के इंकार से मानसी का दिल टूटा था। उसने अभिशाप सा देते हुए पूछा था कि
"मुझसे संबंध की हद तक पहुँचने के बाद मुझे इंकार करने वाले, तुम्हें तुम्हारी ऐसी पत्नी मिलेगी जिसके पूर्व में संबंध किसी और से रहे हैं तो तुम कैसा अनुभव करोगे?" ,
तुम मुझे ऐसा करके छोड़ रहे हो कि जिससे मैं ऐसे हर मौके पर अपने पति के सामने आत्मग्लानि अनुभव करुँगी, जब जब विवाह पूर्व के संबंधों की ऐसी घटनायें टीवी, अखबार या पास पड़ोस में हमें सामने देखने मिलेंगी।
अरिहंत ने बेपरवाही से कंधे उचकाए थे, फिर लगभग दो वर्ष हुए थे, उनमें कोई मुलाक़ात या बात नहीं हुई थी।
इधर इस बीच अरिहंत जॉब में सेटल्ड हुआ था और घर वालों ने उनके परिचितों में से एक परिवार की बेटी, अनु से विवाह तय किया था। इसकी घोषणा के पूर्व अरिहंत ने अनु से एकांत में मुलाकात की थी। जिसमें अनु से साफगोई से यह बताया था कि विवाह बाद वह अरिहंत से संबंध में ईमानदार रहेगी, लेकिन अभी पूर्ण शीलवान वह नहीं रही थी। नासमझी की उम्र में एक परिचित परिवार के लड़के ने अनचाहे उसका दैहिक शोषण किया था। यह बताते हुए अनु ने अरिहंत से पूछा था, क्या यह जानकर अरिहंत उससे विवाह कर सकेगा? अरिहंत, शब्दहीन हो गया था. बात को यह कह कर टाल दिया था कि विचार करके जबाब दे सकेगा।
इस घटना ने उसे मानसी का स्मरण करा दिया था। हृदय पर बोझ सा अनुभव होने पर उस रात उसने अपनी मम्मी अर्चना से मानसी और अनु को लेकर अपना सभी सच बताया था। माँ से ऐसी स्थिति में मार्गदर्शन देने कहा था। अर्चना ने कहा था
"बेटे, मुझे इन दोनों लड़कियों के प्रति क्षमा है, मुझे बहू के रूप में दोनों में से कोई भी मंजूर रहेगी। हालाँकि अनु, जैन परिवार से है और उसके साथ हुआ हादसा उसकी नासमझी की उम्र का है. फिर भी मेरे परामर्श में तुम्हें मानसी से विवाह करना चाहिए। जिसके साथ तुम संबंधों की हद तक गए हो, ऐसी लड़की को धोखा अनुचित है. उस बेचारी का सोचो जो तुम्हारे से प्यार में ऐसी हुई है कि आजीवन अपने पति के समक्ष ग्लानिबोध में रहेगी। ", पता करो अगर मानसी का विवाह नहीं हुआ हो तो हम उसके मम्मी-पापा से उसका हाथ तुम्हारे लिए माँगेंगे।
आज दीपावली का दूसरा दिन है. दीपावली में मानसी को जो उमंग-उल्लास अनुभव नहीं हुआ था, वह उसे आज अनुभव हो रहे थे। उसके मन में रँग बिरंगी फुलझड़ियाँ, अनार और रॉकेट की आतिशबाजी चल निकलीं थीं, जब अरिहंत सहित उसके पापा-मम्मी ने उसके घर आकर उसके पेरेंट्स से मानसी के विवाह का प्रस्ताव रखा था .....
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
28.10.2019
28.10.2019
Friday, October 25, 2019
बेबसी की दीपावली
बेबसी की दीपावली ..
अकोला जाने के लिए सुरभि, पुणे स्टेशन पर देर से पहुँची थी. वह भाग दौड़ कर सेकंड एसी के कोच में किसी तरह चढ़ ही पाई थी कि ट्रेन चल पड़ी थी. पहले उसने अपनी बर्थ पर सामान व्यवस्थित किया था और बैठ कर अपनी श्वाँस नियंत्रित कर रही थी। तब उसे ध्यान हो आया कि अपने कोच तक पहुँचने की जल्दी में उसने एस-2 कोच में सवार होते जिसे देखा था शायद वह सुशील ही था। उसका विचार आते ही उसे 10-12 वर्ष पूर्व का समय याद आ गया।
सुशील के मेधावी होने से वह, उससे इम्प्रेस रहती थी। पढ़ाई में सहयोग लेने के विचार से एक बार वह बात करने के लिए जब उससे मिली थी तो सुशील ने बदनीयत से उसे छुआ था। सुरभि ने उसकी हरकत का प्रतिकार किया था और बिना आगे बात किये वह लौट आई थी। सुरभि ने तत्पश्चात उससे किसी अपरिचित जैसी दूरी बना ली थी और इस घटना का जिक्र किसी से भी नहीं किया था। बाद में सुशील के कुछ लड़कियों से संबंध के विषय में और ऐसे उसका चरित्र ठीक नहीं होने के किस्से, कॉलेज में चर्चा के विषय रहे थे। इस सबके बावजूद जब कैंपस का वक़्त आया था तब सुरभि का प्लेसमेंट उसकी ड्रीम कंपनी में नहीं हो सका था, लेकिन आशा अनुरूप सुशील इनफ़ोसिस प्लेसमेंट में सफल हुआ था।
ऐसे में इनफ़ोसिस जैसी कंपनी में काम करने वाला सुशील, स्लीपर क्लास में क्यूँ ट्रेवल करेगा भला! उसे प्रतीत हुआ कि यह भ्रम ही होगा। उस व्यक्ति का गेटअप भी कुछ साधारण सा ही था अतः उसे यह अपना भ्रम ही लगा.
तब भी सुरभि जिज्ञासा नहीं रोक सकी थी और सहयात्री, ऑन्टी को अगले स्टेशन पर लौट आने का बताते हुए वह दौण्ड जँक्शन में उतर कर एस-2 कोच में चढ़ी थी। ढूँढ़ते हुए उसे सीट न. 33 पर वह व्यक्ति बैठा दिखा था। सुरभि उसके पास जा खड़ी हुई थी और उसे निहारने लगी थी, उस व्यक्ति ने उसे यूँ देखते महसूस किया तो उस पर गौर किया फिर अचरज से कह उठा, सुरभि? तब सुरभि का संदेह सच साबित हुआ। आजू-बाजू भीड़ होने से वह और सुशील दोनों साथ कोच के दरवाजे के पास खाली जगह पर आ गए थे। । कुछ बातें उनमें हँसी-ख़ुशी की हुई थी। तब उसके यूँ अव्यवस्थित से दिखने पर सुरभि ने प्रश्न किया था. प्रत्युत्तर में गमगीन हो सुशील ने जो बताया था वह यों था -
'बी टेक पूर्ण करने के उपरांत उस साल उसने इंफोसिस ज्वाइन किया था। अगले चार वर्षों में उसे दो प्रमोशन भी मिले थे। तब उसकी, अपनी जूनियर कुलीग रेखा से लव मैरिज हुई थी। हम बमुश्किल छह महीने साथ रहे थे कि उसके अन्य लोगों से संबंधों की जानकारी होने पर मैं अलग रहने लगा था। और रेखा को डिवोर्स का नोटिस दिया था। जिसके जबाब में रेखा ने मुझ पर और मेरे पेरेंट्स पर दहेज और गृह हिंसा संबंधी झूठे आरोप गढ़े थे। जिसके कारण मुझे लगभग साल भर जेल में भी रहना पड़ा। मैं, नौकरी से भी निकाल दिया गया और केस में हुए खर्चे और सेट्लमेंट के लिए पचास लाख रूपये देने से मेरी जोड़ी गई पूरी धन राशि भी खत्म हो गई। अब फिर रेप्युटेटेड तो नहीं मगर एक कंपनी में फिर जॉब मिला है, जिससे गुजर चल रही है। दीवाली है और माँ की तबियत कुछ ठीक नहीं इसलिए तीन दिनों के लिए अकोला जा रहा हूँ।
सुरभि ने उससे इस सब पर सहानुभूति जताई थी। सुशील को अपना कार्ड देते हुए यह भी कहा था कि किसी प्रकार की सहायता की जरूरत हो तो मुझे याद करना. तब तक अहमदनगर आ गया था। सुरभि ने विदा ली थी और अपनी बर्थ पर लौटी थी। फिर खाना खाया था और लेट गई थी. उस समय उसके मन में सवाल था -
"सुशील खुद जिस चरित्र का था वैसे चरित्र को लेकर उसका अपनी पत्नी रेखा पर प्रश्न खड़ा करना क्या तर्क संगत था"?
उसे साथ ही यह भी विचार आया कि - "उन दिनों अपने टैलेंट और स्मार्टनेस के सम्मोहन में लेकर कॉलेज की लड़कियों के साथ अय्याशी करते हुए सुशील को अपनी ज़िंदगी का हर दिन दिवाली प्रतीत होता रहा होगा, तब उसने ऐसी कल्पना भी न की होगी कि कभी वह ज़िंदगी में ऐसी बेबसी की दीपावली भी देखेगा"।
यह कदाचित समय प्रदत्त न्याय था, सोचते हुए सुरभि निद्रा के आगोश में चली गई थी।
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
25.10.2019
25.10.2019
Wednesday, October 23, 2019
पब ..
पब ..
अभिनव कुशाग्र बुध्दि का होने से, बी कॉम प्रथम वर्ष में क्लास टॉपर था। अतः सहपाठी उसे सम्मान देते थे, उससे करीबी चाहते थे। रीति भी ऐसे ही अभिनव से मित्रता रखती थी। वह अति संपन्न और खानदानी उद्योग घराने की बेटी है। बी कॉम के दूसरे वर्ष में, रीति को अपने प्रति अभिनव के व्यवहार एवं दृष्टि बदली सी लगने लगी थी। अभिनव उससे अकेले में बात करने के बहाने तलाशता लगता था। पिछली तीन बार के ऐसे एकांत में अभिनव उसे साथ पब चलने का आग्रह कर रहा था। रीति ने मित्र की तरह सोचा तो उसे चिंता हुई कि अभिनव का इन चक्करों में परीक्षा परिणाम प्रभावित हो सकता है। अतः मम्मी अनुमति नहीं देगी कहकर उसे टालती रही। कोई सप्ताह भर बाद अभिनव ने ऐसा एकांत का अवसर पाया तो इस बार ज्यादा जिद करने लगा। रीति ने तब कहा कि देखो कोशिश करती हूँ, 10-15 दिन में जब भी कोई बहाना होगा, पब चलूँगी।
उसी दिन रीति ने एक प्राइवेट डिटेक्टिव की सेवा ली। उससे मिली सूचनाओं पर एक दिन, खुद से अभिनव को एक पब तय कर रात नौ बजे वहाँ पहुँचने का निश्चित किया।
उस रात रीति पब में पहले ही पहुँच गई, और बाहर लॉन में प्रतीक्षा करने लगी। अभिनव, जब वहाँ आया तो एकदम बदले गेट अप में ज्यादा ही स्मार्ट लग रहा था। कुछ तलाशते हुई सी रीति उसके साथ अंदर पहुँची. वह अभिनव का हाथ पकड़ वहाँ ले गई जहाँ कुछ जोड़े ड्रिंक्स ले रहे थे। अभिनव ने वहाँ जैसे ही एक लड़की को, किसी लड़के के साथ देखा वह रीति का साथ छोड़ गुस्से में उस लड़की के सामने जा पहुँचा. वह लड़की उसे देख अचकचा गई। अभिनव ने उसका हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए उसे पब के बाहर ले गया। रीति ने पीछा करते हुए अभिनव को आवाज दी, अभिनव कहाँ जा रहे हो? अभिनव ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया। रीति ने लड़की को अभिनव से कहते सुना भैय्या, हाथ छोड़ो दुख रहा है। फिर अभिनव लड़की को बाइक पर बिठा वहाँ से चला गया।
उसके बाद कॉलेज में अभिनव, रीति के साथ अपरिचित जैसा व्यवहार करने लगा। रीति ने बात करने की कोशिश भी की तो किसी तरह उससे बचते रहा। ऐसे में रीति ने एक दिन कॉपी के एक पन्ने पर कुछ लिखा और अवसर मिलने पर अभिनव के बेग में डाल दिया।
अभिनव को वह पन्ना अगले ही पीरियड में दिखाई दे गया। पीछे से, रीति ने अभिनव को पढ़ते हुए देखा, पन्ने पर लिखा था-
"अभिनव जिस दिन अपनी बहन के बारे में तुम यह तय करना बंद कर दो कि वह क्या करे क्या न करे, किसके साथ, कहाँ जाए कहाँ न जाए, उस दिन मुझे पब चलने कहना। ऐसे विषय मैं अभी, अपने मम्मी-पापा के उचित अनुचित तय किये जाने के अनुसार करती हूँ। अभी पढ़ रही हूँ, स्वयं ऐसे निर्णय नहीं करती हूँ।"
रीति ने देखा, पढ़कर अभिनव ने सिर झुका लिया था। तीन दिन बाद अभिनव ने अकेले में उसे पाकर सॉरी कहा था। तब से अभिनव लड़कियों के तरफ से उदासीन रहने लगा था। बाद में रीति को यह देख कर ख़ुशी हुई थी कि अभिनव बी कॉम के बाकि दो वर्षों में भी कॉलेज टॉपर रहा था।
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन24.10.2019
Tuesday, October 22, 2019
उसे यूँ प्रतीत हुआ था, कठिन होगा जीना उसके बिना ...
उसे यूँ प्रतीत हुआ था, कठिन होगा जीना उसके बिना ...
नुसरत जहां को ये तो समझ आता था कि जिनका साथ होश सम्हालते ही सत्रह वर्षों से मिला (अब्बा, अम्मी, भाई आदि), उनमें से किसी का भी विछोह होने पर तो जीना दुश्वार हो जाएगा, लेकिन जिसे कॉलेज में आये तीन महीनों से ही जाना-पहचाना था। जिसका सामीप्य कुछ दिनों ही महसूस किया था, उसकी अपने प्रति उदासीनता से कैसे जी पायेगी वह?
नुसरत तब गर्ल्स स्कूल में पढ़कर, जुलाई में कॉलेज आई थी। जहाँ पहिली बार लड़के भी उसकी क्लास में थे। यहाँ, अनूप वह लड़का था जो उसे पहले कनखियों से देखा करता था. एक बार नुसरत के उसे देख हँस बस देने से अब सीधे ही लगातार निहारने लगा था। ऐसा होने से नुसरत को पहले तो डर सा लगा था। मगर कोई महीना ही बीता होगा। उसे, उसका यूँ देखना अच्छा सा लगने लगा था। दूसरे ही महीने उसके इशारे मिलने पर कॉलेज कैंपस में छिपकर किसी कोने में वह, उसे मिलने लगी। पहली पहली मुलाकातों में कुछ प्यार भरी बातें हुईं साथ जीने, मरने की कुछ कसमें दोनों ने लीं। नुसरत का मन अब पढ़ाई में नहीं लगता था।वह क्लासेज में भी और घर में भी उसी के ख्यालों में गुमसुम रहने लगी थी। दूसरे महीने सिलसिला कुछ आगे बढ़ा अनूप और वह क्लासेज से बंक मार पार्कों और मॉल में जाने लगे थे। इस बीच अनूप मॉल से कुछ गिफ्ट दिलाने लगा थाऔर पार्कों के छिपे कोनों में उसके बदन को छूने लगा था। नुसरत को यह सब प्यारा तो लगता था मगर एक अपराधबोध से वह डरी भी रहती थी। घर में शिक्षा-सँस्कार में यह सब वर्जित बताया गया था। और गैर मुस्लिम को काफिर बताते हुए उनसे करीबी साथ न रखने की हिदायत भी थी। लेकिन दिल से मजबूर हुई नुसरत, नित अनूप से छिपे कोनों में मिलने लगी थी। पिछली तीन मुलाकातों में अनूप तो उसे चेहरे और होंठो पर किस भी करने लगा था। नुसरत मना करते हुए भी उसको धक्का दे दूर करने का प्रयास नहीं कर पाती थी।
फिर वह हादसा हो गया था। अक्टूबर के महीने में अनूप ने गरबा कार्यक्रम में उसे बुलाया था। नुसरत ने अम्मी-अब्बा को, सहेलियों की जिद के बहाने से, इस हेतु बहुत मुश्किल से राजी किया था। नुसरत की ताकीद की गई थी कि घर से उसे गरबे के परिधान के ऊपर बुर्का ओढ़के जाना और आना होगा और हर हर हाल में रात साढ़े दस बजे तक घर लौटना होगा। उस रात साढ़े आठ बजे वह गरबा स्थल पर पहुँच गई थी। आधे घंटे अनूप के साथ गरबा किया था. फिर अनूप के कहने पर वह उसके साथ एक होटल रूम में पहुँची थी। अनूप की योजना का उसे अंदाजा भी हुआ था, डर भी लगा था मगर सम्मोहित सी वह अनूप का साथ देती जा रही थी। कमरे में उसे, अनूप ने बेड पर साथ लिटा लेने को दो तीन मिनट ही हुए थे कि दरवाजा भड़भड़ाये जाने से वे अलग हुए थे। नुसरत को वॉशरूम भेज अनूप ने दरवाजा खोला था।दरवाजे पर नुसरत के अब्बा थे। तमतमाये नुसरत के अब्बा ने अनूप पर घूसों से पीटा था. नुसरत को वॉशरूम से बाहर लाकर बुर्के में घर ले जाया गया था।
अगले एक महीने फिर नुसरत कॉलेज नहीं आ सकी थी। बहुत अनुनय विनय और वादे किये जाने के बाद नुसरत के अब्बा ने उसे कॉलेज की अनुमति दी थी। अब अनूप उसकी ओर देखता भी नहीं था। घर में किये वायदों के अनुसार यह ठीक तो था मगर नुसरत को अचरज होता साथ ही दिल भी दुखता था कि अनूप जो साथ जीने मरने की कसम लेता रहा था कैसे बदल गया था। नुसरत ने घर में अनूप से, बात न करने और न मिलने का भरोसा तो दिलाया था। मगर उसके लिए प्यार रख कर पढ़ाई करने का उसका इरादा किया था। उन दिनों उसे यूँ प्रतीत हुआ था, "कठिन होगा जीना अनूप के बिना" मगर ज़िंदगी को कुछ और मंजूर था।
अब्बा से तो नहीं मगर अकेले में अम्मी से उसने तर्क किये थे, 'जिन बातों पर भाई को कोई बंदिशें नहीं उनके लिए उस पर क्यूँ बंदिशें हैं?' अम्मी ने कहा था - औलाद होने पर हम पेरेंट्स पर जिम्मेदारी और भार तो आता ही है, मगर बेटों के लिए जितना, उससे अतिरिक्त बहुत भार हम पर बेटियों के लिए आता है।
"क्यूँकि बेटी को हम गैर कौम में निकाह करने नहीं दे सकते और निकाह के पहले बेटी के जिस्मानी रिश्ते किसी को बर्दाश्त नहीं है। इन मर्यादाओं के बाहर, ऐसा होने पर तुम्हारी ज़िंदगी सलामत नहीं होगी. हम भी कौम में गुजर नहीं कर पायेंगे। तुम इसे साफ़ समझ लो तो तुम्हें पढ़ने का मौका देंगे। अन्यथा तुम्हारे निकाह के लिए जल्दी दूल्हा देख लिया जाएगा।"
प्रेमी से धोखा और घर से लड़की होने के कारण एक तरफा पाबंदी किसी पर नैराश्य भाव और अवसाद का कारण हो सकती है लेकिन नुसरत की प्रकृति भिन्न थी।
अनूप के अपने बदन पर स्पर्श, जो उस समय सुख देते लगते थे उनका स्मरण से अब उसे घिन होती। मुस्लिम लड़के को अन्य संप्रदाय की लड़कियों से प्रेम की अनुमति और लड़कियों पर इस हेतु पाबंदी, इस दोहरी कसौटी पर उसका तर्क आपत्ति करता। साथ ही अपने मजहब के अतिरिक्त अन्य धर्मी लोगों को काफिर ठहराने की सोच में भी उसे संकीर्णता दिखाई देती। नुसरत के मन में इन बातों से विद्रोह उत्पन्न हो गया। इसके परिणाम स्वरूप उसने मन ही मन एक संकल्प ले लिया कि वह घरवालों को शिकायत का कोई मौका दिए बिना पढ़कर अपनी ऐसी हैसियत बनाएगी जिसके होने से समाज से 1. बेटे-बेटी के लिए भेदभाव पूर्ण व्यवहार, 2. मजहबी आधार पर इंसान और काफिर ठहराने की संस्कृति इन दोहरी कसौटियों से मुक्त करने के लिए वह काम कर सके।
उम्र जनित आवेग जिसे अनूप के स्पर्श ने ज्वाला दी थी। किसी लड़की के लिए ऐसे में इस सुख को कड़ाई से त्याग देना आसान नहीं होता। अक्सर ऐसे में लड़कियाँ प्रेमी के धोखे की स्थिति में अन्य लड़कों के साथ को लालायित होती हैं। नुसरत ने मगर अपने संकल्प को विस्मृत नहीं होने देकर इन लालसाओं पर नियंत्रण कर लिया था।
समय बीता, नुसरत के पढ़ाई में प्राप्त हर वर्ष के नतीजे परिवार के लिए चौंकाने और गौरव दिलाने वाले होते गए। जिनसे परिवार वाले अनूप के साथ नुसरत के किस्से भूल गए थे। अपने संकल्प अनुसार नुसरत ने आई ए एस किया। इस मुकाम पर पहुँच नुसरत, अपने तर्क अनुरूप काम को आज़ाद हो गई थी। बाद में उसने अपने साथी आई ए एस निखिल से विवाह किया तब घर में कोई एतराज नहीं कर सका। इसका उद्देश्य नुसरत का अपने मार्फत, समाज को यह संदेश देना है कि मुस्लिम लड़के ही नहीं अब मुस्लिम लड़की भी गैर संप्रदाय में शादी करने लगी है। नुसरत का मानना है इससे अंर्त-संप्रदाय सौहार्द्र कायम करने में मदद मिलेगी।
साथ ही आज, डीएम अलीगढ होकर उसने मोबाइल ऍप के जरिये लड़कियों और युवतियों को अपने विरुध्द कहीं भी हो रही ज्यादतियों पर शिकायत करना सुलभ कराया हुआ है। जिसमें छोटी भी ज्यादती करने वालों को नोटिस के जरिये परिवार सहित जिलाधीश कार्यालय के हाल में दिन दिन भर बिठाया जाता है।
इससे दिन दिन भर कामकाज और पढ़ाई के होने वाले नुकसान को देखते हुए, साथ ही जगहँसाई के कारण लड़के और पेरेंट्स अपने और बेटों के व्यवहार को लेकर ज्यादा सावधान हो गए हैं। आज, अलीगढ़ में अब कोई शोहदा कॉलेज/स्कूल जाती किसी लड़की की स्कर्ट उठाने या अन्य छेड़छाड़ का दुस्साहस नहीं करता है ....
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
23.10.2019
Saturday, October 19, 2019
Thursday, October 17, 2019
शादी का झाँसा देकर .....
शादी का झाँसा देकर .....
गुलाबी गद्दे बिछे थे, सुनहरे गाव तकिये लगे हुए थे, चार लड़कियाँ और दो लड़के उन पर अपनी, अपनी जगह बैठ गये थे। परदा अभी खुला नहीं था। पर्दे के उस तरफ उद्घोषिका कह रही थी। इस वार्षिक साँस्कृतिक आयोजन में अब हम एक गोष्ठी का मंचन कर रहे हैं , जो नवयुवतियों और किशोरवया छात्राओं में चेतना जगाने की दृष्टि से मंचित की जा रही है। दैनिक अख़बारों को अगर आप पलट कर देखें तो ऐसा कोई दिन नहीं होता जिसमें 'शादी का झाँसा देकर दुराचार' तरह के शीर्षक से कोई घटना नहीं छपी हो। आज के 'समाज माडेल' की इस बड़ी बुराई पर गोष्ठी में भाग ले रहे छात्र-छात्राओं के नाम हैं क्रमशः - भारती, सुविधि, दीपा, नयना, प्रशांत और फारुख।
उद्घोषिका यह कहते हुए, जाती है. तब पर्दा उठता है ....
फारुख अपने मित्रों को अखबार की एक खबर दिखाते हुए कहता है - यार, तुम्हें अजीब नहीं लगता, कोई लड़की महीनों शारीरिक संबंध सहमति से करती है, फिर शादी का दबाव बनाती है, सफल नहीं होने पर दुराचार का आरोप लगा कर थाने में रिपोर्ट लगा देती है।
नयना तीखी प्रतक्रिया में भृकुटि पर बल देकर कहती है - इसमें अजीब क्या है, अगर लड़के ने शारीरिक संबंध बनाये हैं तो उसे शादी करनी ही चाहिए। हमारी सँस्कृति शारीरिक संबंध , सिर्फ पति-पत्नी में उचित कहती है।
इस पर प्रशांत पूछता है - फिर पति-पत्नी होने के पूर्व क्यूँ राजी होती है कोई लड़की, अजीब नहीं है यह?
सुविधि गुस्सा प्रदर्शित करते हुए - वाह, प्रशांत यानि जिम्मेदारी सिर्फ लड़की की है। लड़का प्रेम दिखावा करते हुए, क्यूँ फुसलाता है ऐसा करने के लिए?
फारुख हँसते हुए - आप क्या कहना चाहती हैं, लड़की संबंध के लिए कभी चिरौरी नहीं करती है?
भारती असहमति के भाव दर्शाते हुए - हाँ, ज्यादातर केसेस में लड़की शुरुआत नहीं करती, हमारे पारिवारिक सँस्कार आज भी हम लड़कियों के लिए इस मर्यादा में रहने के हैं।
प्रशांत - तो फिर लड़कियां क्यूँ मिलतीं हैं अकेले में लड़कों से?
दीपा, प्रशांत की ओर देखते हुए - अगर मुझे तुमसे प्रेम हो जाए और मेरा दिल प्रेम इजहार को चाहे तो क्या मैं, इतने दर्शकों के बीच कहूँ कि 'प्रशांत, मुझे तुमसे लव हुआ है?'
मंच और दर्शक सभी इस बात पर अनायास हँसते हैं। दर्शक दीर्घा के तरफ से एक कमेंट सुनाई पड़ता है, नहीं दीपा, मोबाइल पर कहना।
कमेंट अनसुनी करते हुए सुविधि, प्रशांत से पूछती है - अगर दीपा तुमसे प्रेमवश अकेले में मिलने लगे तो क्या इसका अर्थ तुम यह लगाओगे कि वह तुमसे संबंध को आतुर है?
प्रशांत - जी, बिलकुल नहीं। लेकिन नशे में मैं बहक जाऊँ और प्रतिरोध वह भी न करे तो, संबंध हो जाना आशंकित तो होगा।
नयना- प्रेमवश अगर दीपा अकेले में तुमसे मिले तो तुम नशा क्यूँ करोगे। तुम्हें उसकी भावना की कदर नहीं होनी चाहिए ?
सुविधि धिक्कार भरे स्वर में - वाह, अभी पिताजी के धन पर पलते-पढ़ते-बढ़ते हो उसमें नशा भी करोगे और बलात्कार भी करोगे, क्या कहूँ इस नीच सोच पर मैं?
फारुख- जो प्रेम होने पर संबंध किया जाए उसे बलात्कार नहीं कहते।
दीपा - प्रेम है, संबंध भी है फिर विवाह की बात आये तो इंकार कैसा?
प्रशांत- प्रेम उस समय का सच होता है, बाद में उससे अच्छी लड़की से प्रेम हो जाने पर, विवाह से इंकार किया जाता है। आखिर विवाह तो एक से ही संभव होगा ना?
फारुख - और फिर लड़के के दिल में शंका भी तो आ जाती है कि मुझसे संबंध कर बैठी यह लड़की किसी और से भी संबंध कर सकती या कर चुकी होगी.
इस पर तीव्र प्रतक्रिया के साथ भारती ने कहा - तुम तो चुप ही रहो फारुख, तो अच्छा है. अपनी बहनों को तो बुर्के से बाहर की आज़ादी नहीं देते हो, यहाँ विवाह पूर्व संबंधों पर सवाल करते हो कि जिसने तुमसे संबंध किया और किसी से भी रखती हो सकती है। तुम एक से अधिक संबंध करलो माफ़ है तुम्हें, लड़की ने किये, न भी किये पर तुम्हें संदेह होता है, धिक्कार है तुम पर।
प्रशांत - सुनो लड़कियों, तुम यही क्यों मानती हो कि विवाह पूर्व जिनमें संबंध हुए हैं, ऐसे सारे लड़के, उन लडकियों से शादी को इंकार करते हैं, सौ में से पचास ऐसे प्रेमियों के विवाह भी तो होते हैं।
दीपा - मालूम है तुम्हें प्रशांत कि ऐसे 100 प्रेम किस्से भी तो हैं जिनमें विवाह पूर्व कोई संबंध नहीं, फिर भी अस्सी में विवाह हो जाता है? तुम शादी पूर्व संबंध की वकालत में ही क्यूँ पड़े हुए हो?
प्रशांत - शादी पूर्व संबंध को वर्जित करनी वाली सँस्कृति, अब पुरानी है अब जीवन में पूरे मजे लेने की सँस्कृति है, हमारे सिने सितारों को देखो पचास पचास वर्ष तक खुद शादी किये बिना मजे लेते हैं, लिव इन रिलेशन में रहते हैं, बिग बॉस बना कमाते हैं।
नयना - फिर तुम ऐसी आजादी मुझे क्यूँ नहीं देते प्रशांत? कहते हुए प्रशांत की ओर देखती है।
प्रशांत कनखियों झाँकता है, उसे कोई उत्तर नहीं सूझता है।
तब नयना, कोई राज सा खोलते हुए कहती है, मालूम मित्रों प्रशांत मेरा जुड़वाँ भाई है. हम पहले दिन से एक ही परिवार में अपने बड़ों और मम्मी-पापा से एक सा लालन पालन और एक से सँस्कार पा रहे हैं। धिक्कार है कि मेरा यह भाई इतना गैर जिम्मेदार है, जो हमारे घर के गरिमामय संस्कारों को बिग बॉस तरह के प्रसारण को देख, भूल जाता है।
तब सुविधि खड़ी होती है, अब वह मंचासीन मित्रों से नहीं बल्कि दर्शक दीर्घा की तरफ मुखातिब हो कहती है -
हमारे उपस्थित पालक और गुरुजनों और मेरे सहपाठी साथियों - हम सभी को मालूम है अगर पल्स पोलियो ड्राप न भी दी जाए तो 100 में से अस्सी बच्चों को पोलियो नहीं होता। लेकिन सभी 100 बच्चों को इसलिए वेक्सीनशन दिए जाते हैं ताकि 20% की आशंका खत्म हो सके. हमारा समाज आज भी अपने बेटों के दुष्कृत्यों पर शर्मिंदा नहीं होता। उसे शर्मिंदगी तब होती है, जब कोई बेटी प्रचलित मर्यादा को लाँघती है। माना कि हर उन प्रकरणों में धोखे नहीं जिनमें विवाह पूर्व संबंध हों, लेकिन 100 में से दस में भी धोखा होता है (अखबार के छपे समाचार को दिखाते हुए) जो हर दिन के समाचार से प्रमाणित है, तो हमें फुसलावों से बचना होगा। यह समाज विडंबना है कि जिंदगी के मजे लेना कहने वाले ऐसे प्रशांत या फारुख खुद तो इस नारे पर छह लड़कियों से संबंध रखेंगे। मगर अपनी पत्नी में उन्हें वह लड़की चाहिए होगी जो इस दृष्टि से सिर्फ उनकी हो। अतः तब हमें अपने जीवन पर मँडराती आशंका मिटाने के लिए विवाह पूर्व संबंधों के फुसलावों या फिसलन से बचना होगा। इस धोखे में हम न सिर्फ अपना जीवन अपितु अपने परिवार का जीवन अभिशापित करते हैं। हम इस प्रस्तुति में अदाकारा लड़कियाँ, यह आव्हान करते हैं कि इनके फुसलावों में ना आयें फिर देखें जीवन के मजे लेने को इच्छुक ये निपट स्वार्थी, कैसे मजे लेते हैं?
कहते हुए सुविधि अभिवादन की मुद्रा में हाथ जोड़ती है। सभी अन्य पात्र भी खड़े होकर यह करते हैं। दर्शक दीर्घा में तालियाँ की गूँज के बीच मंच पर पर्दा खिंचता है ....
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
18.10.2019
18.10.2019
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