Sunday, February 24, 2019

जयहिंद के वीरों ...
जायेंगे सभी - हम "शहीद" की पहचान लिए जाते हैं
परिजन बिछोह में - जीवनसुख  त्याग जिए जाते हैं 

Saturday, February 23, 2019

सर इल्ज़ाम ले लिया तो भी अहसान नहीं उस पर
हुस्न के आगोश में जाने की खता ख़ुद हमारी थी
यूँ तो नफरत नहीं किसी से
मोहब्बत है हमें हर किसी से
और बेशक तुम्हें चाहने वाले बहुत लोग होंगे
मगर हम चाहते जिन्हें थोड़े ही लोग होंगे

परम मित्र - माँ

परम मित्र - माँ 

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(लिव इन रिलेशन पर गतांक से आगे पंचम भाग)

अंशुमन के शयनकक्ष में जाने से अब माँ - बेटी अकेली थी। मिताली मान रही थी कि अंशुमन की बातों ने अंशिका पर असर कर दिया था , अब थोड़ी कोई कसर रह गई हो तो उसके प्रयास उसे करने हैं।  मिताली ने सोफे पर अंशिका को अपने पास खींचा और उसके बालों में अपना दुलार भरा हाथ फिराया। माँ के सुपरिचित इस अनुराग तले आकर मिताली का हृदय द्रवित हो गया उसकी सुंदर बड़ी आँखों में अश्रु झिलमिलाने लगे। अंशिका कि उम्र ही क्या थी, 22-23 साल की कोई बेटी  शैक्षणिक योग्यता कितनी ही बड़ी हासिल कर ले किंतु युवा ऐसी कोई लड़की ज़माने के हथकंडो से अंजान ही होती है। मिताली ने अंशिका के चेहरे को अपनी गोद में लिया जिससे अंशिका सोफे पर अधलेटी व्यवस्थित हो गई। मिताली ने अंशिका की आँखों में भर आये अश्रु अपनी दुप्पटे से पोंछे और जब अंशिका ने माँ सानिध्य में स्वयं को संयत कर लिया तब मिताली ने कहा -
"अंशु बेटी तुम अभी छोटी हो, नहीं जानती कि इस उम्र की कोई लड़की जिसमें यौवन और सुंदरता भरपूर हो उसको बरगलाने के लिए ज़माना क्या कुछ हथकंडे नहीं अपनाता।  उन सब हथकंडो का शिकार अभी की पीढ़ियों में लड़कियाँ जो पढ़ने लिखने के लिए हॉस्टल में रहती हैं या और जॉब में महानगरों में आई होतीं हैं, वे हो रहीं हैं. उनसे करीबी सुनिश्चित करने के लिए मर्द अति सक्रिय हो जाते हैं , उनमें ड्रिंक्स की आदतें उत्पन्न कर देना, रात्रि पार्टियों में आने को प्रवृत्त करना, उन्हें सैर सपाटे के लिए प्रोत्साहित करना साथ के सहकर्मियों के विशेष हथकंडे होते हैं।  इन बहानों से उन्हें लड़की का अतिरिक्त साथ हासिल होता है, जिसमें उनकी कोशिश लड़की को उपहारों से उपकृत करने की होती है। उपकृत हुई लड़की उनके झाँसो में आसानी से आने लगती है और तब आधुनिकता के नाम पर वे उनसे शारीरिक संबंध बनाने को उकसाते हैं। इस सब में मार्केट को कमाई मिलती है. कमाई सुनिश्चित करने के मंतव्य से अब नए प्रसिद्ध स्पोर्ट्स, बॉलीवुड और टीवी आर्टिस्ट के माध्यम से लिव इन रिलेशन का नया जाल बुन लिया गया है जिसमें फँसाने के लिए विवाह को दकियानूसी, नारी स्वतंत्रता की दृष्टि से खतरनाक और ज़िंदगी के मजों को खत्म कर देने वाला प्रचारित किया जा रहा है।
वास्तव में नारी - पुरुष में यौवन आकर्षण और उम्र की जरूरत के लिए विवाह वह माध्यम होता है जिससे दो अज़नबी में प्यार की वह मजबूत बुनियाद बनती है जिससे जीवन भर का साथ, सुरक्षा और परस्पर हित सुनिश्चित होता है। लिव इन रिलेशन के माध्यम से लड़की/नारी का यौवन और आकर्षण जब तक कायम है उसे भोगने के लिए लड़के/मर्दों की उपलब्धता है। इसके खत्म होते ही नारी ठगी सी अकेली और अवसाद में रह जाने को बाध्य होती है। आज मजे का लगता जीवन तब एक अभिशाप होता है। लेकिन तब चेतना आना विलंब हो जाना होता है आगे सिर्फ पछतावा ही साथ होता है।
समझो कि पिछले वर्ष तक अति अनुशासित बेटी तुम , ब्रेन वाश का शिकार हुई हो। अभी ज्यादा विलंब नहीं हुआ है सुधार के अवसर अभी हाथ में हैं।"
माँ की कही बातों का असर अंशिका पर हुआ था - वह अब चमकीले परिवेश में दिखाए जा रहे पक्ष से अलग वह पक्ष देखने की कोशिश कर रही थी जो मनुष्य जीवन को अनुशासन और मर्यादा में रखता है।  जिससे समाज में परस्पर प्रेम, दया और सौजन्य के माध्यम से मनुष्य जीवन में पूरा आनंद सुनिश्चित होता है। अंशिका अब इन सारे तर्क सहित इस विषय पर जतिन से बात करने पर विचार कर रही थी। 

(जारी)
राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
23-2-2019

Friday, February 22, 2019

जो बीत गई बात फिर ना दोहराई जा सकती है
अच्छी नई बात मगर फिर भी की जा सकती है

Thursday, February 21, 2019

मैं एक पापा

मैं एक पापा 

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मैं अति महत्वाकाँक्षी रहा हूँ , विशेषकर अपनी बेटियों को लेकर. सामान्यतः हम सभी के माँ-पापा हमें वह नाम देते हैं जिसके अच्छे अच्छे अर्थ होते हैं. यह करने के पीछे उनकी अभिलाषा अपने जीवन में बच्चे उसे सार्थक करें यह देखने की होती है। लेकिन अपवाद रूप में मैंने अपनी दोनों बेटियों के वह नाम रखे जिनके कोई मीनिंग नहीं हैं। इसलिए उनके साथ यह होते आया है कि उनके सहपाठी और परिचित और आज सहकर्मी अक्सर उनके नाम का मतलब उनसे पूछते हैं।  बचपन में स्कूल से आकर मेरी बेटियाँ यह बतातीं कि उनकी फ्रेंड्स / मेम उनके नाम का अर्थ क्या है पूछती हैं, इसलिए मुझे अर्थ बताने कहतीं। जब वे छोटी हीं थीं , मैं उन्हें कहता कि तुम्हारे नाम का अर्थ तुम्हें देना है। उन्हें मेरे जबाब का अर्थ उस समय समझ नहीं आता था। वे यह जबाब अपनी फ्रेंड्स / मेम को देतीं तो वे हँस देते थे। 
वास्तव में मनुष्य में योग्यता / संभावनायें प्रकृति ने अनेक दीं हुईं हैं। इसलिए किसी भी उपलब्धि पर मैं ना तो बहुत खुश ही होता हूँ , ना ही संतोष करता हूँ। मुझे हमेशा लगता है कि प्रदत्त योग्यता की तुलना में अभी बहुत कम ही हम परफॉर्म कर सकें हैं। अभी बहुत सी उपलब्धियाँ हैं जो हमारे स्वयं के अतिरिक्त हमारे निमित्त से घर/परिवार/समाज/देश/दुनिया और मानवता के हक में हासिल होना बाकि हैं। 

मगर अवश्य इस अवसर पर थोड़ी ख़ुशी जाहिर करूँगा कि - "अब हर वह ख़ुशी जिसमें बच्चे खुश होते हैं , हम उनके माँ -पापा भी खुश होते हैं"। 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन 
22-02-2019

Wednesday, February 20, 2019

क्या था उसके पास

क्या था उसके पास ..

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क्या था उसके पास - एक घर जो किराये का था , उसमें कुछ अपने थे , कुछ अपने नहीं रहे थे उनकी स्मृति साथ थी। कुछ तस्वीरें थीं जो जीवन के उस अतीत की साक्षी थी जिसमें वह जीवन ऊर्जा से भरपूर , कुछ आकर्षक बच्चा या युवा था। कुछ अपने सुख की अभिलाषा और कुछ परोपकार कर किसी के सुख का कारण बन जाने की योजना। 
क्या था उसके पास - जीवन का बड़ा समय व्यतीत हो गया था , खेद था कि कुछ बातें बहुत देर से समझ आईं थीं , संतोष था थोड़ा कि थोड़ी जो बुध्दि थी उसने निपट स्वार्थी होने से रोका था।
क्या था उसके पास - बचे कुछ दिन और कुछ रातें थीं जीवन की , दिन में जीवन यापन के लिए कुछ कमा लाने के लिए के घर से निकलने की लाचारी और रात में थक हार में सो जाने का क्रम।  और कभी कभी सिधाई के व्यवहार और आचरण के कारण, धूर्त दुनिया द्वारा छल लिए जाने के दुःख और मिले तनाव में करवट बदलते घंटों गुजार दी जानी वाली अनिद्रा।
क्या था उसके पास - अतीत की कुछ धुँधली होती हुईं यादें जिससे 'पहले ज्यादा सुखी था', यह एक भ्रम जबकि पूरे जीवन कोई न कोई परेशान कर देने वाली बातें हमेशा रहीं थीं उसके पास।
क्या था उसके पास - व्यर्थ की एक धर्म विशेष की आस्था जिसमें दूसरों को पराया समझने ,दुश्मन मान के उन्हें हेय देखना या उनसे नफरत रखने के विचार। जबकि उन दूसरों के पास भी थीं यही भ्राँत बातें। उस जैसे ही सबकी मजबूरी मिले जीवन को जी लेने की थी. साथ ही थी उसके आसपास बना दी गईं धर्म, जाति और राष्ट्र विशेष की सीमाओं में सिमट रह जाने सभी की ही मजबूरी थीं। 
क्या था उसके पास - किसी की मौत पर व्यर्थ जश्न मनाने कुबुध्दि जिसमें उसके जीवन को कुछ मिलना नहीं था। धिक्कार भी नहीं था उसके पास अपनी कुबुध्दि के लिए। 
क्या था उसके पास  - औरों की नकल कर लेने की प्रवृत्ति उसे सरल मार्ग लगती थी। इसके अधीन वह मानवता खो रहे व्यक्तियों की नकल कर लिया करता था। और जैसे एक सियार के हुआ बोलने पर सब हुआ हुआ करते हैं वैसे ही कुछ को कहते देख अनर्गल सब वह भी कहता था। 
क्या था उसके पास  - बेहद संकीर्ण दायरा और सोच जिसमें पूरे जीवन अनुभव नहीं कर सका था कि यही जमीन है यही समाज है जिसमें उसे जीना और मर भी जाना है जिसे अच्छा बना देने में अपना सहयोग देता तो औरों का पथ प्रदर्शन कर उनकी प्रेरणा भी बनता। 
क्या था उसके पास - अब थोड़ा और कुछ समय जिसमें रोग ग्रस्त रहकर क्रमशः निष्क्रिय होते हुए चार कन्धों एक दिन चल देने की नीयती। 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
21-02-2019