Monday, May 28, 2018

लौट आओ तो बेहतर , नहीं तो उम्मीद कोई और करना होगा
ज़िंदगी का सफ़र अनोखा - उम्मीद बिन कटना मुश्किल होगा

Friday, May 25, 2018

जब औरों की ख़ुशी को तरज़ीह देने लगते हैं
तब हम ज़िंदगी का मतलब समझने लगते हैं

कर दिखाने के लिए बहाने का इंतजार ठीक नहीं
कर दिखा बेमिसाल सा कि तुझे ज़िंदगी मिली है

हसरतों की भागदौड़ में भूलता ख़ुद को है
तू ज़िंदगी का मक़सद सोचता मौत पर है

ऐसी ही आँखों ने - देखे हैं दुनिया की ख़ुशहाली के सपने
जिनसे सिर्फ़ अपनी ख़ुशी के सपने देख - हम नहीं थकते

लिखे क़लम ऐसा कि  - ज़िंदगी फूल बन जाये
पढ़ने वालों को - अल्फ़ाज़ों में ख़ुश्बू मिल जाये






Thursday, May 24, 2018

नज़ाकत थी उसमें - तब उसका शोषण कर रहा था
पत्थर सी हो रही - अब कहता नारी सुलभता न बची

सारा शहर देख रहा था और ज़ुल्म उस पर हुआ था
ख़ाक उम्मीद कि अदालत को गवाह कोई मिलेगा

जो इंसान तरह के नहीं - उनका लिहाज़ करना कैसा
खफ़ा हो भी गए तो - ऐसे लोगों की कहीं कमी नहीं

इस तरह बँधी हूँ -  इतनी भी तो नहीं मुझे आज़ादी
कि नारी हूँ  - नारी होने का मतलब मैं समझा पाती

सच  से है निकट का रिश्ता - तो और रिश्ते होना न होना महत्वहीन है
सच जन्म के पहले से , ज़िंदगी में - और मृत्युपर्यन्त भी साथ निभाता है

कुछ नज़रें लगती तो साधारण सी हैं मगर
ज़िंदगी के सभी पहलुओं को एकबारगी देख लेती हैं

असीमित_में_सीमित_जिंदगी
होता बहुत कुछ है - मगर दृष्टि कुछ पर ही सीमित कर लेते हैं
और फिर देख उतना ही पाते - जितना देखना चाहते हैं

नशा है अल्फाज लिखने का हमें - मगर होश इतना है
ऐसे लिखें कि पढ़ने वालों में इंसानियत का नशा चढ़ा दें

हरेक की ख़्वाहिश - ज़िंदगी में सितारों सी चमकने की होती है
क्यों बुझते जाते हम - ज्यों ज्यों ज़िंदगी यौवन क्रॉस करती है








#धर्मसंकट
पास खिलाने भोजन नहीं, रहने को घर नहीं,पहनाने को वस्त्र नहीं,पढ़ाने का इरादा नहीं
उसे पिता कैसे लिखें-गुनहगार लिखना अनुचित

रूहानी मोहब्बत

रूहानी मोहब्बत ....

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हमने चाहा कि हम भी उसी IIT में पहुँचते , लेकिन अभी किस्मत को मंज़ूर नहीं हुआ कि हम मिलते। हममें अधैर्य , हमें विचलित सा कर रहा था , किंतु आपमें का धैर्यवान पुरुष अविचलित था। आपकी किसी पोस्ट से कहीं कोई जल्दबाज़ी परिलक्षित नहीं होती थी। आप इश्क़ को सहज उस तरह पका रहे थे - जैसे पेड़ पर पूरा पक कर आम मज़ा देता है। तभी आपने एक दिन डरा देने वाली पोस्ट डाल दी
"हादसे अगर हों - और भले इस ज़िंदगी में हम नहीं मिल पायें
हसरत मगर कि - मेरे हुज़ूर ज़िंदगी जीने के क़ाबिल बन जायें "
पढ़कर हमारा नारी सुलभ भावुक मन घबड़ा गया। एक दो दिन लग गए थे हमें घबराहट से उभरने में। फिर हमारी नज़रों में इश्क़ का पाक़ मंज़र साफ़ हो गया। आपका हमारी खुशियों के प्रति फ़िक्रवान होना हमें समझ आ गया। अब तक तो सिर्फ तसव्वुर ही था हमारा कि आप सब हमारे लिए लिखते हैं। कहीं नहीं था कोई प्रूफ़ कि आप हमसे इश्क़ करते हैं. लेक़िन
"आप मेहरबां मेरे - आपको हम कैसे बतलायें 
 अपुष्ट इश्क़ में हमारे - इक मज़ा अनोखा है"

आप हमें चाहते हैं या आपकी दर्शित हो रही चाहत किसी और के लिए है यह तो बाद कि ज़िंदगी में हमें पता होने वाला था। किंतु हमारी छोटी समझ में यह आ गया था कि यह इश्क़ बेमिसाल होगा जो - मध्दिम आँच में धीरे धीरे मगर निरंतर पक रहा है। एकबारगी ख़्वाब सा लगता यह सब - हमें मालूम था यदि यह हक़ीक़त हुआ तो हम दोनों को बेमिसाल सच्चा और अच्छा इंसान बनाएगा।
मालूम नहीं कि आप हमारे तरफ से फेसबुक पर किसी पोस्ट का इंतजार करते थे या नहीं किंतु हम व्यग्रता से आपकी पोस्ट का इंतजार किया करते थे। जब आप वॉल पर ख़ामोश रहते तो हम अनुमान यह लगाते कि पढ़ाई का भार अभी ज्यादा हो गया है। यह हमारा विचार , हमें भी पढ़ने में एकाग्र चित्त कर दिया करता था।
जिंदगी में चल रहा अभी वक़्त , बेहद बेहतरीन था। हम कम्प्यूटर साइंस में ही प्रवीण नहीं हो रहे थे अपितु रूहानी मोहब्बत का मतलब जानने में समर्थ हो रहे थे। इकतरफा हमारे इश्क़ में हमारी बेचैनी अब ना रही थी बल्कि हमें चैन इस बात से आ गया था कि
"अच्छा कि इश्क़ का हममें - इक़रार होना अभी बाकि था
इश्क़ हमारा- रूहानी मोहब्बत का दर्जा पास कर रहा था"

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
24-05-2018
https://www.facebook.com/narichetnasamman/

Wednesday, May 23, 2018

दर्द दो होते हैं
एक अपना होता है - एक उसका होता है
उसका उसे पता - हमें अपना पता होता है

हमदर्द मिला करते थे कभी - हमारे दर्द उनके होते थे
हताशा दूर करके वे - ज़िंदगी जीने का हौसला देते थे

हम होते तन्हा अब - अपने सारे दर्द के साथ
जब निकलता है चाँद - निहारा उसे करते हैं

अपने अपने दर्द के साथ - ख़ुद ही जीना होता है
इन नए रिवाजों का नाम - उन्नत सभ्यता होता है

पहले की हसीं दुनिया देखी थी - हम पुनर्जन्म ले आये थे
निष्ठुर अब की दुनिया में - हम लौट कभी फिर ना आएंगे

ये दुनिया मुबारक़ उसको - नफ़रत दिल में रख जी लेता है
हमें तो थी 'ख्वाहिश ए मोहब्बत' - दुनिया से नदारद वो है

उस शख्स के क्या कहने - जो वर्तमान को जी लेता है
ज़माना तो अतीत याद कर के - यहाँ रोता मिलता है


ज़िंदगी भी ऐसी विचित्र होती है कि जिस तरह भी जी लो
सोचती है यार ऐसे नहीं वैसे - जी कर बितानी चाहिए थी

सच पर तो चलें मगर - राह की पहचान कठिन है
कि
कोई कहता यह सच है - कोई कहता वह सच है

क्या उचित , अपनों पर निर्भरता से शिकायत - कि हर्ट अपने ही करते हैं
खुले दिमाग़-आँख से यह सोचें-देखें कि - अपने ही बहुत किया करते हैं

हमारा परंपरागत "मैं" तो स्वयं को सबसे ज्ञानवान जानता है
और इसलिए अपने हर किये को ही "सबमें सच्चा" मानता है

जिसमें ख़ुश तुम - वह तुम जरूर करना
 हमारी ख़ुशी - तुम्हें ज़िंदगी में ख़ुश देखना

बढ़ती जाए उम्र - तो जिम्मेदारी बढ़ा लो
ख़ुशी बाँटते हुए - ज़िंदगी को निभा लो








Tuesday, May 22, 2018

आईना मैं - क्या दिखाऊँ मुझे ड्यूटी ना  समझाओ
नज़रें दुरुस्त करके - ख़ुद  ज़माने को समझ जाओ

श्मशान रोज जाने कि इल्तिजा क्या कीजिये
श्मशान पर ही सफ़र ख़त्म होगा जान लीजिये

अच्छा कि इश्क़ का हम में - इक़रार होना अभी बाकि था
हमारा इश्क़ - रूहानी मोहब्बत का दर्जा पास कर रहा था

चाँद की तमन्ना करो तो -  मिलेगा अमावस की रात में भी
अंधकार में ज्ञानी के ज्ञान का होना - खत्म होता नहीं कभी

ज़िंदगी की डगर पर - आगे मैं चल रहा था 

इंसान हूँ ना - आगे की ब
ताना फ़र्ज मेरा था




ज़िंदगी की डगर पर - आगे मैं चल रहा था


इंसान हूँ ना - आगे की बताना फ़र्ज मेरा था
ज़िंदगी की डगर पर - आगे मैं चल रहा था
इंसान हूँ ना - आगे की बताना फ़र्ज मेरा था

ताल्लुक हम रखें या न रखें किसी से - अहमियत कुछ नहीं
अहम यह है कि - हमारे दौर का इंसा , इंसान होना चाहिए

अपनी ख़ुशी के लिए  ख़्वाहिश होना तो - आम बात है
ज़िक्र उस ख़्वाहिश का हो - फ़िक्र जिसमें आम की हो