Monday, April 30, 2018

रेप पर मज़हब या धर्म का आज उठता सवाल कैसा
रेप , नारी से पहले उसने अपने मज़हब पर किया है

रेप पर मज़हब या धर्म का आज उठता सवाल कैसा
रेप , नारी से पहले उसने अपने मज़हब पर किया है

कोई धर्म किसी पर रेप को कभी अप्रूव नहीं करता
फिर मज़हब रेपिस्ट का निष्कासन क्यूँ नहीं करता

इक मजहब की बेटी के रेप का बदला दूसरे की बेटी पर ले करते हो
नारी पर ऐसे एक के बाद एक और अत्याचार का सिलसिला करते हो

देश में ख़ुशहाली के लिए - बैर-नफरत को खत्म करना होगा
हममें हरेक को - एक गैर मज़हबी घर का हितैषी बनना होगा




 

Sunday, April 29, 2018

सौ साल पहले दुनिया में और लोग थे
वे, उनके किये अच्छे-बुरे इतिहास हुए हैं
आज हम सभी-कल कोई और होंगे
कर सके अच्छा तो-हम यादगार होंगे

सौ साल पहले दुनिया में और लोग थे
वे, उनके किये अच्छे-बुरे इतिहास हुए हैं
आज हम सभी-कल कोई और होंगे
कर सके अच्छा तो-हम यादगार होंगे


इस तरह न पढ़ें इतिहास कि हम आक्रोश से भर जायें
ख़ूनख़राबा पढ़ें और मरने-मारने का इतिहास दोहरायें

इस नज़रिये से हम पढ़ें कि - प्रेरित सृजन को हों
विध्वंस की नहीं हम - सृजन कि हम यादगार हों

मैं तुम्हारी ज़िंदगी को मेरे नज़रिये से देखने को नहीं कहता
मैं तुम्हारे नज़रिये से ज़िंदगीं को देखने की कोशिश करता हूँ


ज़िंदगी में खुश रहने के तुम्हारे अपने तरीक़े हैं
मेरे तरीक़े से ज़िंदगी जियो तुम कहना मुनासिब नहीं

बेशक़ , ज़िंदगी में - खुश तुम और ख़ुश हम रहें
औरों की ख़ुशी रौंद कर - बस , हमें ख़ुशी न मिले





 

Saturday, April 28, 2018

चाहिए नहीं किसी को कुछ किसी से - नफ़रत क्यूँ रखें
थोड़े परिचित बाकि अज़नबी - बस अज़नबीयत ही रखें

लंबी दूरी तय कर आगोश में खोने आई थी सरिता , समंदर के
आ मिली तो देखा कि कई सरितायें समाई हैं आग़ोश में , उसके

मिठास थी शीतल प्रवाहित आँचल में सरिता के
समंदर से मिलकर सरिता वह मिठास गँवा बैठी

माँ तो माँ है - गर्भ में अपनी बेटी को मार नहीं सकती
दुष्ट मगर दुनिया - स्वाभिमान से उसे पाल नहीं सकती

हम हर चर्चित किस्से - व्यक्ति की समालोचना करने लगते हैं
कभी नहीं खोजते अपने में संभावना कि खुद चर्चित हो सकते हैं

वक़्त का शुक्र - मिटटी का मैं , मुझे ऊँचा उठाता है
थका वक़्त तो - इक दिन मुझे मिटटी में मिलाता है

करना ठान ले तो अपंगता भी बाधा नहीं
जिजीविषा असंभव को संभव बना देती है
नारी जीवन में अपने चुनौती उठा उठा के
हुई सक्षम , असंभव भी करके दिखा देती है

ऐतबार जो तोड़ दे उससे शिकायत कैसी
होती इंसानियत तो वह तोड़ता ही क्यों

चाहत जिससे - उसकी ख़राबी हम माफ़ करते हैं
वजह यही - खराबियों ने ज़िंदगी में जगह ली है

इज्ज़त बचा पाना ही मुश्किल हो जाये
ऐसे समाज में भला नारी कैसे जी पाये















 

Friday, April 27, 2018

#जबरदस्ती
ज़िंदगी हमारी है मगर
इसे जीना - मर्जी से तुम्हारी है

बाहर तुम - खतरे नारी की ज़िंदगी पर उत्पन्न करते
खतरों का बहाना ले के - घर में शर्तें ज़िंदगी पर थोपते


बेटी तो है - माँ के दिल का सुकून
सासु माँ के दिल का भी - बने सुकून

अपना क़रार माँ ने - तुम्हें बेटी दे सौंप दिया
सासु माँ ये क्या किया - उसे नासूर करार दिया

कभी तो सिर्फ चेहरा देखने से मिला करता है - तुम्हें सुकून
क्या होता फिर जान भी रख दें - तुम्हें मिलता नहीं सुकून

चलो थोड़ी ख़ुशी से अकेला जिया जाए..
दिल दुखाने वालों को शर्मिंदा किया जाए


 

Thursday, April 26, 2018

बेशक तू खेल ले मेरी खुशियों से , ए ज़िंदगी
कुछ ख़ुशियाँ हैं नसीब - तेरे होने से मिलती हैं

बेशक तू खेल ले मेरी खुशियों से , ए ज़िंदगी
कुछ ख़ुशियाँ हैं नसीब - तेरे होने से मिलती हैं

ज़िंदगी - तेरा दोष नहीं कि हम ख़ुश नहीं रह पाते
हमारी कमी कि हम - मिले गमों से नहीं उबर पाते

गमों की क्यों शिकायत करें हम तुमसे , ए ज़िंदगी
कभी-जभी कुछ ख़ुशियाँ तुम उदार हो - हमें देती हो

अज़ीब तकाज़ा - खुद खुश रहना चाहती हो
तुम छोड़ ग़मगीन - हमें भुलाना चाहती हो

गम ए ज़िंदगी हमें यूँ तो कुछ हैं नहीं
मगर तकाज़ा बहुत बातों का रखते हैं


आरज़ू नहीं कि बहुत जगह किसी के दिल में हमारी रहे
आरज़ू मगर कि जितनी भी मिले जगह हमें - अच्छी हो

हमें देख जिनकी आँखों में शंका हुआ करती थी
बहुत है अब उनके होंठों पर मुस्कान हुआ करती है

हमें देख - जिनकी आँखों में शंका हुआ करती थी
बहुत है - अब उनके होंठों पर मुस्कान हुआ करती है

बाँध के हम रखें किसी को - हम ऐसे नहीं , मगर
तारीफ़ हमारी तब - बिन बंधन के कोई हमसे बँधा रहे

दरअसल भाषा विकास प्रगतिशीलता की द्योतक है
किंतु खराबी हममें है - अच्छी चीज का प्रयोग भी हम बुराई से करते हैं

दिल में मोहब्बत थी
इसलिए -
तन्हा भी हम खुश थे








 

Wednesday, April 25, 2018



सब मुल्कों से नेक है भारत
नागरिकों के नेक होने से मुल्क नेक होता है - हम नेक होंगे तो मुल्क़ नेक होगा

दोषारोपण - भारत पर नहीं
अगर भारत अच्छा नहीं लगता तो समझो हम अच्छे नहीं हैं - दोष हमारा है

ग़र जला दो आशियां मेरा - हम फिर नया बसायेंगे
विध्वंस से अच्छा सृजन होता - साबित कर दिखायेंगे

एहसान जब जताता है कोई - उस लम्हें पर खेद होता है
उस एहसान करने वाले का - जब एहसान लिया होता है

व्यक्ति जो करोड़ों के लिए पूज्यनीय था
कामुकता की कितनी बड़ी सजा है - अब पीढ़ी पर कलंक जाना जाएगा


जीवन का वरदान था सुशोभित मैं - करोड़ों की आस्था पर था
ये कैसी चूक मैंने की - अब जीवन मेरा चुकता कारावास में है

अगर आसाराम होते - क्या वह आस्था पर मिले विशेषाधिकार को खोना पसंद करते??
शायद हम इसे बहुत जिम्मेदारी का दायित्व मानते


 

Tuesday, April 24, 2018

अगर हम प्रचलित से कुछ अलग ढंग से नहीं जीते तो वह ढर्रे में जीना है
हमें जीवन प्रयोग की तरह जीना चाहिए ताकि जीवन के नए आयाम खोज सके

अगर हम प्रचलित से कुछ अलग ढंग से नहीं जीते तो वह ढर्रे में जीना है
हमें जीवन प्रयोग की तरह जीना चाहिए ताकि जीवन के नए आयाम खोज सके

पारिवारिक रिश्तों में अपेक्षायें खटास लाती हैं
इन्हें सरल रहने दें - जिससे जो सहज बन पड़ा वह दूसरे के लिए कर दे , बस



तुम्हें , भुला देने की नाकाम एक कोशिश है
जीवन को आसान करने की सिर्फ कोशिश है


मालूम कि हम - तुम परस्पर भ्रम ही साबित होंगे
लेकिन भ्रम अभी तोड़ दें तो - जीना मुहाल होगा

ज़िंदगी अजीब कि टूटे कोई भ्रम तो दूसरा ढूँढती है
जबकि टूट जायें सारे भ्रम तो ज़िंदगी की जरूरत नहीं