Sunday, April 23, 2017

आफरीन-आदिल (8. नारी ही - मासूम नारी के अधिकार और विश्वास को ठेस पहुँचाने की दोषी)

आफरीन-आदिल (8. नारी ही - मासूम नारी के अधिकार और विश्वास को ठेस पहुँचाने की दोषी)
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आदिल के मशवरे अनुसार बेहद संयत-सधे लेखन से तैयार आलेख को आफरीन ने प्रेषित कर दिया। कुछ दिनों उपरांत - उसे अखबार देखकर प्रसन्नता हुई , उसका आलेख ज्यों का त्यों - पब्लिश हुआ था. पर आफरीन की शाम तक प्रसन्नता गायब हो गई। आलेख के इस अंश ने - *
 
"प्रगतिशील आज के समाज में भी नारी की यह कैसी विडंबना है ,वह पति की बहुपत्नियों में से एक हो जीने को लाचार है। उसका प्रेम तो एक पति के प्रति संपूर्ण निष्ठा और समर्पण से होना अपेक्षित है । वहीं दूसरी तरफ पति प्यार को अनेकों में बाँटता है। यह कैसा मानदंड है? जो न्याय की तुला पर खरा नहीं। नारी की विडंबना का यहीं अंत भी नहीं। अपनी शक्ति संख्या से बढ़ाने के नाम पर - इन पत्नियों से कई कई संतानें पैदा की जाती हैं (एक तरह से अत्याचार)। घर में ना संतान को और ना ही पत्नियों को पोषक खिलाने , लालन-पालन और यथोचित शिक्षा दिलाने की सामर्थ्य , लेकिन पुरुष दंभ , कुछ सुनने को तैयार नहीं। क्या अपढ़-गँवार , भूखे बच्चे और अवसादग्रस्त नारी के साथ बहुसंख्यक हो जाना , कोई शक्ति होती है? या शक्ति परिपक्व सोच और मन की प्रसन्नता और जीवन उमंगों से होती है। नारी की विवशता यहीं तक नहीं - अनेक व्यभिचारी तथा बूढ़े धनवान को 70 वर्ष की उम्र में भी बिस्तर पर अल्प-वयस्का पत्नी चाहिए होती है जो परिवार के अभावों वाले परिवार से सौदेबाजी कर उन्हें उपलब्ध हो जाती है।
70-75 की उम्र में वह क्षमता भी नहीं कि यौवन की दहलीज पर आई ऐसी पत्नी की प्रेम अपेक्षा की पूर्ति कर सके . उस व्यभिचारी के जीते जी और मरने के बाद यह अल्प आयु पत्नी ,परिवार के और अन्य पुरुष के बहकावे में शोषित होने को विवश होती है। और चरित्र से भटकी नारी ही इस तरह अन्य पुरुषों को अपनी अतृप्त वासना के घेरे में लेकर , चरित्रहीन पुरुषों के परिवारों की मासूम नारी के अधिकार और विश्वास को ठेस पहुँचाने की दोषी बन जाती हैं। हम नारी एकजुट हों , पुरुष के विरुध्द नहीं अपितु उस पक्ष को समाज के सम्मुख लाने के लिए। ताकि हम न्याय और नारी जीवन अपेक्षा का चित्र समाज के सम्मुख ला सकें . जिससे नारी के प्रति सामाजिक सोच में परिवर्तन आये , और नारी भी अपना जीवन सम्मान से जी सकने में समर्थ हो सके।"
 
* - कुछ पुरुषों के दंभ को आहत किया , और एक उद्वेलित पुरुष का फोन उसे आया - जिसमें उस पर अपशब्दों की वर्षा करते हुए कहा - हम समझ रहे हैं तू किस पर इशारा कर रही है , अपनी औकात में रह नहीं तो पछताएगी। वह आगे भी कुछ कह रहा था लेकिन उसने फोन काट दिया और फिर उसका फोन नहीं उठाया।
शाम को आदिल ने आफरीन को गुमसुम देखा ,पूछने पर आफरीन ने सब बताया। आदिल ने उससे नंबर लेकर उसकी इस बाबत सहायता के फोन नंबर पर रिपोर्ट दर्ज करा दी। आफरीन को विश्वास दिलाया घबराने के जरूरत नहीं , आजकल कानून व्यवस्था इन बातों पर सख्त है , और उस सिरफिरे पर कार्यवाही अवश्य होगी। फिर अखबार में आफरीन के आलेख को शांतचित्त पढ़ा और आफरीन की लेखनी की मुक्तकंठ प्रशंसा की। आफरीन के अशांत मन को चिंता के विचार से छुटकारे की दृष्टि से आदिल ने आफरीन से कहा आज डिनर हम , बाहर लेंगें। फिर दोनों तैयार हुए और सैर को बाहर निकल गए।
--राजेश जैन
24-04-2017
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Saturday, April 22, 2017

आफरीन-आदिल (7. जरूरत से ज्यादा तीव्र प्रहार - समाधान का कारण नहीं बनता , अपितु समस्या को जटिल बना देता है। )


आफरीन-आदिल (7. जरूरत से ज्यादा तीव्र प्रहार - समाधान का कारण नहीं बनता , अपितु समस्या को जटिल बना देता है। )
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आफरीन का टीवी पर दिखना फिर एक मौका ले आया। एक दिन उसे भास्कर , न्यूज़ पेपर की तरफ से फोन आया जिसमें , 'नारी चेतना' विषय पर आर्टिकल भेजने को कहा गया। जिसने आफरीन को खुद के खास होने का अहसास कराया।
रविवार अवकाश होने से , आज इसका उपयोग इस कार्य के लिए करने के इरादे से आफरीन लिखने बैठ गई -
 
"दुनिया की आधी आबादी हमेशा जनाना होती है। जनाना को ईश्वर ने मर्द के मुकाबिले ढेरों खासियत दीं हैं किंतु शारीरिक तौर पर उसे बलिष्ठ नहीं बनाया है. पुरुष अपनी शारीरिक शक्ति के जोर पर ,नारी पर आरंभ से ही डॉमिनेशन रखता आया है। उसने कभी सामाजिक मर्यादाओं के नाम पर , कभी धर्म के नाम पर और कभी परिवार की इज्जत के नाम पर , नारी पर पाबंदियाँ लगाई हुईं हैं। उसे चाहरदीवारियों और पर्दों में कैद रखता है। खुद अपनी मनमानी करता है। जब इंसानी समाज में धन-दौलत ईजाद की गई , बाहर के कार्य में पुरुष ने ही खुद को आगे किया। हमेशा उसने जनाना को अपना निर्भर बताया है। पेट को दो रोटी देकर , अहसान यह जताया है जैसे नारी , पुरुष की बनाई कोई कृति है जिस पर किसी अजीव वस्तु पर होता ,उस जैसा मालिकाना हक़ पुरुष का है। यहाँ तक कि पुरुष ,हरम में कई कई बीबियाँ रखता रहा है। उससे धर्म मनवाने के ऐसे तरीके भी निर्धारित किये कि नारी पर धर्मालयों में अनेकों बंदिशें लागू हैं। जबसे -पढ़ना लिखना चलन हुआ है ,नारी को उसके भी अवसर नहीं या कम दिये गए हैं। सारांश यह कि नारी , पुरुष की पिछलग्गू बनी रहे ,यह विचार ही हर जगह पुरुष मुख्य करता रहा है।
खुद पुरुष ने जिस दृष्टि से देखना चाहा ,धूर्तता से वही दृष्टि नारी की भी बना दी है। किचन के कार्य में, बच्चों को जनने में , बच्चों की परवरिश में , और गृहस्थी के ढेरों कार्य में पूर्णतः नारी का आश्रित है पुरुष। लेकिन वह नारी को ,नारी की ही दृष्टि में पुरुष आश्रिता दिखाने में सफल होता रहा है। "
 
आफरीन इतना ही लिख पाई थी कि आदिल आ गये . उन्होंने पूछा क्या कर रही हो। तब आफरीन ने सब बताया और अब तक लिखे पर उनकी राय चाही। आदिल ने पढ़ने के बाद पहले प्यार की नज़र से आफरीन को देखा , फिर गंभीर हो आलोचक से स्वर में बोला -
 
"मेरी प्यारी आफरीन , भास्कर हिंदी दैनिक है - आपके लिखे में , इंग्लिश -उर्दू शब्दों का प्रयोग अजीब लग रहा है। आप नारी पर सच तो लिख रहीं हैं , किंतु आपको समझना होगा कि पाठक - अलग अलग आयु वर्ग के होने के साथ ही समझ में भी कम -ज्यादा होंगे. आप यह तो मानती हैं ना ? कि पुरुष -नारी साथ अनंत है , फिर आप कम पढ़ी-लिखी , कम वय की अति उत्साही लड़की के तरह प्रस्तुति न बनाओ कि पुरुष और नारी दो दुश्मन से हो जायें।
आप अपने प्रहार की तीव्रता बहुत ही सधी हुई रखें , जरूरत से ज्यादा तीव्र प्रहार - समाधान का कारण नहीं बनता , अपितु समस्या को जटिल बना देता है। आप इस दृष्टि से सुधार करते हुए लिखें। आपका लिखा मार्गदर्शक बन जाएगा - इस पीढ़ी के लिए। "
 
आफरीन ये सब मंत्र मुग्ध सी सुन भी रही थी और अचरज भरी दृष्टि से आदिल को एकटक देखे भी जा रही थी। उसे आदिल का समझदार होना तो ज्ञात था किंतु उनका इतना स्पष्ट विज़न उसे हैरत में डाल रहा था।
आफरीन ने अपनी बाँहों का हार आदिल के गले में डाल - उनकी आँखों में प्यार से झाँकते हुए शुक्रिया कहा। और फिर आदिल की सलाह अनुसार अपने आर्टिकल को एडिट करने और पूरा करने पुनः टेबल पर आ बैठी .
--राजेश जैन
23-04-2017
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Friday, April 21, 2017

आफरीन-आदिल (6.हलाला)

आफरीन-आदिल (6.हलाला)
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आफरीन के टीवी पर व्यक्त प्रगतिवादी विचार जो काम कर रहे थे उसका अनुमान आफरीन को नहीं था। एक दिन उसे फ़ोन कॉल आया। उस पर जनाना आवाज थी। उसने पूछा ,आप आफरीन हैं ? उसकी हामी पर उसने कहा मैं आयशा हूँ ,अपनी समस्याओं पर सलाह के लिए आपसे मिलना चाहती हूँ। आफरीन ने जो मुकर्रर किया उस समय पर आयशा उससे मिली। बाद में आफरीन ने आदिल को बताया -
 
"एक गैर मुस्लिम लड़की ने प्यार में अपने घरवालों से विद्रोह कर एक मुस्लिम युवक से शादी की। शादी को तीन माह ही हुए कि सरकारी आदेश से उस युवक का बूचड़खाना बंद हो गया। बंद होने के बाद भी वह घर से ही अवैध ठहराया गया व्यापार करने लगा . आयशा के बार बार मना करने और रोका-टोकी से एक दिन उसे इतना गुस्सा आ गया कि उसने आयशा पर जुबानी तलाक दे दिया। कुछ दिन बाद ही आयशा से प्रेम की यादों ने उसे पछतावे से भर दिया है। लेकिन घर और समाज के रिवाज अनुसार ,फिर से निकाह के पहले अब आयशा पर हलाला होना जरूरी है। आयशा - मानसिक रूप से इस बात को कतई राजी नहीं ."
 
मुझसे उसने सलाह और मदद की गुहार लगाई है , हम उसके लिए क्या कर सकते हैं ? इस सवाल पर आदिल-आफरीन ने गंभीरता से विचार किया। और जो उपाय निकाला उस अनुसार - आयशा का निकाह आदिल से करवाया गया। जैसा आयशा को विश्वास दिलाया गया था , तीन दिन बाद आदिल ने बिना आयशा से जिस्मानी संबंध किये उसे तलाक दे दिया। समाज की नज़र में आयशा , हलाला होने से अपने पूर्व शौहर से निकाह कर सकती थी। उनका निकाह हो गया। आफरीन -आदिल की युक्ति यद्यपि मौलवियों की नज़र में नापाक थी , किंतु गैर मुस्लिम रही आयशा के लिए पवित्र थी , जो भावनात्मक रूप से अपने हस्बैंड के अतिरिक्त किसी भी अन्य से शारीरिक संबंध को सर्वथा वर्जित मानती है।
आदिल के सहयोग से आफरीन अपने पूरे प्रयास लगा देना चाहती है जिससे वह वैचारिक धारणा बदल जाए जिसमें , मुस्लिम जनाना थर्ड डिग्री इंसान होने का दर्जा पाती है। जो फर्स्ट डिग्री इंसान (मर्द) और सेकंड डिग्री इंसान (अन्य समाज की नारियाँ) के बाद उसका ऐसा दर्जा सबसे बुरे हालातों में जिंदगी गुजर करने को विवश करता है।
--राजेश जैन
22-04-2016
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Thursday, April 20, 2017

आदिल -आफरीन (5. हारून की मोहब्बत)

आदिल -आफरीन (5. हारून की मोहब्बत)
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"दायरे में औरों को देखना चाहते ,जब
अपने लिए भी हम ,तय करें दायरे कुछ"
आदिल -आफरीन के दिन , घर -अपने अपने ऑफिस और प्यार की बातों में ख़ुशी ख़ुशी गुजर रहे थे। उन के बीच उसूल -विचार पर चर्चा भी रोजाना की बात थी। एक दिन आफरीन की मम्मी , मोबाइल पर आफरीन से बात में बहुत चिंतित लगीं , उन्होंने बताया कि आफरीन का भाई हारून गैर मुस्लिम लड़की से निकाह की जिद पकड़े हुए है। मम्मी ने यह भी कहा कि ,आफरीन उसे समझाये। बाद में आफरीन ने ,आदिल से यह वाक्या बताया। आदिल ने सुनने के बाद आफरीन से कहा कि ऐसे मसले फोन पर नहीं सुलझेंगें। हारून को यहाँ बुलाना ठीक होगा।
आदिल के कहने पर हारून ,तीसरे दिन आया। हँसी ख़ुशी की बातों के बाद , आदिल ने यह मसला उठाया। आफरीन ने , हारून से उस लड़की के साथ किस हद तक संबंध बढ़े हैं इसकी जानकारी ली। उसे जब पता चला कि हारून का लड़की के आगे-पीछे लगे रहने के बाद सिर्फ पार्क में मोहब्बत की बातों तक का सिलसिला है , तो उसे राहत आई।
आफरीन ने तब हारून से अपने गैर मुस्लिम के प्रेम की बात , बताई। और यह भी बताया कि ,हारून को ही यह सख्त नापसंद होगा इस लिहाज से , उसने इस प्रेम को सिर्फ दिल में रख लिया। हारून को आश्चर्य हुआ कि कैसे आफरीन , आदिल मियाँ के सामने इस बात का इजहार कर सकती है। आगे आदिल ने कहा हारून हमें उसूल दोनों ही तरफ लागू करने चाहिए। अगर आपको , अपनी बहन का रिश्ता गैर मुस्लिम से पसंद नहीं आता तो आपको यह हक भी नहीं कि किसी गैर मुस्लिम की बहन - बेटी से तुम निकाह की बात सोचो। हारून को विचार करता देख ,आफरीन ने आगे बात बढ़ाई कि आप जानते हो मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में संबंध दोनों ही पक्षों को बहुत आक्रोशित करते हैं। खून खराबा के कारण बनते हैं ,तो इस सच्चाई को जानते हुए हमें ऐसे काम नहीं करने चाहिए।
"पहले हम अपने समाज और परस्पर रिश्तों को इस तरह स्वस्थ करने के लिए कार्य करें और जिस दिन यह समझ सभी संप्रदायों में आ जाए तब बेहिचक इस तरह की शादी हम करें। " और भी बातें हुई। अंततः आदिल -आफरीन का , हारून को बुलाने का मकसद कामयाब हुआ।
आदिल का पूरा लिहाज करते हुए दूसरे दिन हारून , वादा करके विदा हुआ कि वह अपनी उस प्रेमिका से माफ़ी माँग संबंध को यहीं खत्म कर लेगा . वह यह भी कह गया कि इंशा-अल्लाह ठीक वक्त यह समझ मुझे आ गई . हमारा संबंध अभी इस हद में है कि उस लड़की को धोखा देने का इल्जाम मुझ पर न आएगा।
--राजेश जैन
21-04-2017
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Wednesday, April 19, 2017

आफरीन- आदिल (4. जहाँ नहीं समाधान -वहाँ ढूँढना व्यर्थ समय गँवाना है)


आफरीन- आदिल (4. जहाँ नहीं समाधान -वहाँ ढूँढना व्यर्थ समय गँवाना है)
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आज आदिल टूर पर गया था , आफरीन रात्रि अकेली थी। बिस्तर पर आई तो नींद नहीं लगी - पुरानी बातें उसे याद आने लगीं। आफरीन - अपने 3 बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी थी। पापा जिनिंग मिल में काम करते थे। अर्निंग , बहुत नहीं थी , उस पर चाचा के परिवार से जायदाद के विवाद जब तब कलह के कारण बनते उसने देखे थे। मम्मी , इन अभावों में कैसे चार , छोटे बच्चों की माँगों की पूर्ति को जूझती रहतीं उसने देखा था। पापा मिल के मालिक और काम पर अक्सर भुनभुनाते आते और भाई के द्वारा खड़ी की जाते कलह से गुस्से में रहते। उन्हें यह देखने की फुर्सत नहीं होती की चार-चार औलादों की बचपन सुलभ माँगों को ,थोड़ी सी आमदनी में कैसे पूरा किया जाये। खाने के बीच अच्छी लगती चीज पर बच्चों की खींचतान बीच , मम्मी को बासी और कम अच्छी चीज से जैसे तैसे पेट भरते और उस पर पानी पी लेते , आफरीन ने महसूस किया था। अपने फट रहे कपड़े को सी -सी कर अंग ढँकने के उपाय में हलाकान मम्मी का चेहरा , उसने देखा था। एक बार पापा को अच्छे मूड में देख नौ वर्ष की अपनी उम्र में ,उनसे एक सवाल मासूमियत में कर दिया था - पापा , हम दो ही बच्चे होते तो मेरी मम्मी भी कुछ अच्छा खा -पहन लेती। पापा यह सुनते ही गुस्से में भर गए , एक चाँटा उसे अपने कोमल गालों पर झेलना पड़ा - उसने सुना छोटी सी उमर में तेरी जुबान बड़ी हो गई है।
आफरीन ,यह शुक्र मानती है कि पापा के गैर मुस्लिम मिल मालिक इस तरह से उदार थे कि उनने ,उसके पापा से कह रखा था , बच्चों को पढ़ाओगे तो किताब - फीस और यूनिफार्म का खर्च वह देंगे. उस मदद से ,उसके मौहल्ले के लड़के तक जबकि ज्यादा नहीं पढ़-लिख रहे थे , आफरीन - इससे डीसीए तक पढ़ सकी। एक बार ओलिम्पिक में देश के जीते मेडल पर चर्चा हो रही थी , तब स्कूल में उसके टीचर ने यह कहा था कि जनसँख्या उपलब्धि नहीं होती , थोड़ी सँख्या का एक ग्रुप अपने कार्य की क्वालिटी से बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकता है। इस बात का कन्फर्मेशन उसे अपने मोहल्ले के परिवारों पर नज़र डालने से हो गया था। जहाँ - परिवार तो बड़े -बड़े थे , लेकिन किसी के कार्य और सोच ज्यादा सही नहीं थे। दकियानूसी और रंजिश की बातों ने उनके मन में डेरा डाल रखा था। वहाँ लोग सृजन की नहीं विनाश की गतिविधियों में उलझे रहते थे।
शुक्र तमाम अभाव और बुरे हालातों का ,जिसने आफरीन को छोटी उम्र से बेहतर और तर्कसंगत सोच की बुनियाद दे दी। उसे बचपने में ही हैरत होती कि 'बड़े बड़े अपने को बड़ा जानकार समझने वाले वहाँ के लोग' - अपने परिवारों की अपढ़ता-अभावों और जनानाओं की विवशताओं से बेखबर किन अजीब बातों में अपना मन और समय ख़राब करते हैं , वे जहाँ नहीं समाधान -वहाँ ढूँढने की कोशिश में समय और जीवन व्यर्थ करते हैं।
आफरीन को जॉब मिल गया , उसने पापा के दबावों के बावजूद अपनी शादी को देर तक टाला . अपनी आमदनी से मम्मी और भाई-बहनों का भला कर सकने में अपने को समर्पित किया। और थोड़े विलंब से जब शादी की तो आदिल जैसा समझदार शौहर मिलने पर आज अपनी किस्मत पर उसे नाज हो रहा है।
अब तक मिले तमाम हालात ने उसे जो सबक सिखाये हैं उस अनुरूप उसे अपनी गृहस्थी को आकार-सँस्कार देना है .उसे आदिल से सहयोग ले अपने कार्यों से वह अंजाम देना है जिससे "जहाँ नहीं समाधान -वहाँ ढूँढना व्यर्थ समय गँवाना है" वाली मूर्खता उससे नहीं हो जाये।
उसे इसी देश और इसी समाज को अपने कार्यों से वह जागृति देना है , जिसमें दिमागों में रंजिशों की जगह खुशहाली के ख्याल भर जायें।
--राजेश जैन
20-04-2017
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Tuesday, April 18, 2017

आफरीन आदिल (3. मजहब का सर्वोच्च मशवरा - उचित करना होता है)


आफरीन आदिल   (3. मजहब का सर्वोच्च मशवरा - उचित करना होता है)
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उस रात्रि आदिल ने एक न्यूज़ चैनल खोला तो , उसकी दीर्घा में आफरीन को देख उसे आश्चर्य हुआ। तभी एंकर माइक ले आफरीन के पास आई .उसने आफरीन को माइक देकर , उससे नाम पूछा और फिर आफरीन से प्रश्न किया - आफरीन ,मर्द के एक से अधिक विवाह पर आपकी क्या राय है? आफरीन ने जबाब दिया यह अनुचित है। एंकर ने सवाल किया -क्यों - आफरीन ने जबाब दिया , स्त्री और पुरुष में अनुपात 50:50 का है , ऐसे में एक मर्द एक से ज्यादा बीबी करता है तो कुछ औरतों को एक से ज्यादा मर्द करने होंगें , जो अनुचित होगा इसलिए। आफरीन के इस उत्तर पर दीर्घा में बैठी नारियों की तालियां बजती दिखाई दीं। एंकर ने पॉज लेकर पुनः हँसते हुये कटाक्ष किया - लेकिन इस्लाम के मानने वाले तो चार शादियों को उचित कहते हैं। आफरीन के मुख पर तनिक विचार के भाव दिखे फिर उसने जबाब दिया - मजहब का सर्वोच्च मशवरा - उचित करना होता है। मेरा मानना है कि सर्वोच्च मशवरे पर हमारी दृष्टि होना चाहिए। अगर आप इजाजत दें तो मैं आपको एक सलाह देना चाहती हूँ। एंकर को इस बात पर हैरत हुई लेकिन जिस इंट्रेस्ट से दीर्घा में आफरीन को सुना जा रहा था - उसे ध्यान में रख एंकर को कहना पड़ा - बेशक दीजिये। तब आफरीन ने गंभीर मुखमुद्रा में कहा - हम भारत में रहते हैं , जिन शब्दों से हमारे देश -समाज में सौहाद्र के स्थान पर बैर फैलता है , उसे तूल देकर कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। मजहब - हमारे आचरण में होना चाहिये , अपनी ताकत के प्रदर्शन के लिए इसकी - दुहाई अनुचित है। आप अपने कार्यक्रम में इस्लाम शब्द पर तूल न दिया कीजिये। तब तालियाँ की गड़गड़ाहट गूँजी और एंकर अन्य लोगों के तरफ बढ़ गई . बाद के प्रसारण में एंकर बार बार आफरीन के कहे शब्द "मजहब का सर्वोच्च मशवरा - उचित करना होता है" को दोहराते हुए दीर्घा में बैठे अन्य लोगों से सवाल करती रही ।
आफरीन उस समय किचन में थी। आदिल - वहाँ गया उसने आफरीन से पूछा आपने टीवी के कार्यक्रम में अपने शिरकत की बात मुझे बताई नहीं? आफरीन ने वापिस प्रश्न किया -क्या टीवी पर दिखाया गया है ? मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरा वाला हिस्सा वे टेलीकास्ट करेंगें। आदिल ने प्रशंसा में कहा आपने बहुत प्रभावशाली तरीके से अपने विचार कहे , मुझे आप पर गर्व है। आफरीन ने रिप्लाई में प्यार भरी मुस्कान दी।
आदिल बाद में उस रात बिस्तर पर लेटा सोच रहा था कि उसकी जिंदगी में उसे कोहिनूर मिला है , उसके ऊपर उसे बेहद सतर्कता से प्रयोग का दायित्व आया है। आदिल के चेहरे पर उस समय एक दृढ़ता परिलक्षित हो रही है , जब वह मन ही मन संकल्प कर रहा है कि वह आफरीन के इन पाक विचारों और व्यक्तित्व को विकसित करने में अपना पूरा साथ देगा , उसे पूरे ईमान से प्रोमोट करेगा।
मज़हब-
शारीरिक या सांगठनिक ताकत नहीं
यह आचारिक-वैचारिक ताकत की बात है
--राजेश जैन
19-04-2017
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Monday, April 17, 2017

आफरीन - आदिल (निरंतर)


आफरीन - आदिल (निरंतर)
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आदिल की उस रात ढाई बजे नींद खुल गई . मध्दिम नाईट लैंप की रोशनी में बाजू में सो रही , आफरीन के खूबसूरत चेहरे पर उसकी नज़र पड़ी और फिर उसे आफरीन के बताये उस प्रेमी का ख्याल आ गया , जिससे आफरीन को प्रथम प्रेम की अनुभूति हुई थी . आदिल को अपने मन में उससे ईर्ष्या का ख्याल आ गया . फिर वह सोचने लगा - वह भी क्या करे आफरीन है ही बला की खूबसूरत - कौन होगा? जो इस रूप की मन ही मन तारीफ़ न करे . ऐसे सारे पुरुषों से उसे एक तरह की चिढ सी अनुभव हुई - जो उसकी आफरीन की खूबसूरती को सराहें या चाहें . उसके अंदर के ईर्ष्यालु पुरुष ने इस का उपाय सजेस्ट किया - क्यों ना आफरीन को वह हिज़ाब में बाहर आने जाने कहे? लेकिन स्वयं उसने इस आइडिये को रिजेक्ट किया कि नहीं - उस अतिरिक्त लबादे को लादे रहना कोमलांगी आफरीन के लिए अत्यंत कष्टकर होगा।
आदिल बैचैन हो गया .वह सारे ख्याल झटक सोना चाहता था लेकिन फिर उसकी नज़र आफरीन की खूबसूरती पर पड़ी जो , आदिल की दिली हालत से बेखबर , नींद के आग़ोश लेटी हुई थी . पुनः हस्बैंड वाले पजेसिव तथा ईर्ष्यालु विचार ने उसे सुझाया क्या वह आफरीन को जॉब छोड़ने कहे ? लेकिन तभी इस विचार को भी ,बेवकूफ़ी भरा मानना पड़ा . इस तरह आफरीन के जीवन अवसर को वह कम करने का प्रयास करेगा तो क्या आफरीन अपने उस मूक प्रेम की याद और तुलना में न पड़ जायेगी - कि आदिल से अच्छा तो वह प्रेमी होता जिसके घर में नारी के प्रति खुली सोच तो थी।
आफरीन - उस प्रेमी के बारे में सोचेगी - यह कल्पना उसे नागवार लगी . आदिल ने बेचैनी में आफरीन के दूसरे तरफ करवट लेकर - ईर्ष्यालु विचार पर काबू करने की कोशिश की , लेकिन हाय आफरीन की खूबसूरती और हाय पुरुष मन का पत्नी पर एकछत्र आधिपत्य वाला स्वभाव! आदिल फिर उपाय खोजने में व्यग्र हुआ - तभी उसके दिल में एक और ख्याल आ गया - क्यों ना ? वह जल्दी जल्दी चार-छह औलादें पैदा कर ले. जिससे छह बच्चों की अम्मा हो जाने से आफरीन की खूबसूरती कम भी हो जाए - और लोगों का उसके प्रति आकर्षण भी खत्म हो जाए , एकबारगी यह उपाय उसे ठीक लगा , लेकिन तभी इसमें भी बेवकूफी नजर आई . इससे तो आफरीन पुनः उस प्रेमी के बारे में सोचा करेगी जो - एक या दो बच्चे से ज्यादा नहीं चाहता , जिससे आफरीन को बार-बार औलादें पैदा करने का कष्टकर कार्य नहीं करना होता . आदिल को अपने स्वयं के बाल नोच लेने की इक्छा हुई। आदिल सोचने लगा इससे तो बेहतर होता आफरीन इतनी खूबसूरत न होती . किंतु उसे हँसी आई अपने पर ,फिर तो वह बाहर की खूबसूरती देख ललचाया घूमता रहता।
वास्तव में आदर्श और मन की कमजोरी के यथार्थ के बीच हमेशा द्वन्द रहता है, जिसके बीच बहुत लोगों को - पूरे जीवन झूलना होता है। आदिल की इस रात की मनः स्थिति इसलिए कोई अपवाद नहीं थी।
अंततः आदिल ने एक तरह से निर्णय किया कि - नहीं नहीं वह आफरीन को सिर्फ जिस्मानी ही नहीं रूहानी प्रेम का अहसास कराएगा - जिससे बाहर उस पर कोई पहरे नहीं रख कर भी - आफरीन के दिल का एकमात्र बादशाह सिर्फ आदिल होगा।
"धन्य नजर , हुस्न के भीतर रूह देख सका
उससे मोहब्बत अपनी ,मैं रूहानी कर सका"
इस निर्णय के बाद उसके दिल को राहत आई . उसने आफरीन के तरफ करवट ली ,उसके सुंदर मुखड़े को प्यार से निहारने लगा और किसी पल उसे आफरीन जैसे ही नींद ने अपने आगोश में ले लिया।
--राजेश जैन
18-04-2017
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