Saturday, June 4, 2016

विलक्षण प्रतिभा ..

विलक्षण प्रतिभा ..
उसको सौंदर्य बोध करा , जब दुनिया उसे सिने सेलेब्रिटी , मॉडल या गर्लफ्रेंड के साँचे में ढाल उसके व्यक्तित्व को साधारण रूप दे देना चाहती है एवं  उसे बेहिसाब धन तथा उपहारों के माध्यम से चकाचौंध से सम्मोहित करना चाहती है
तब
वह उसे ,उसकी विलक्षण प्रतिभा का बोध करा ,उसके व्यक्तित्व को परोपकारी के रूप में निखार देना चाहता है , क्योंकि वह उसका पापा है . .
--राजेश जैन 
05-06-2016
https://www.facebook.com/narichetnasamman
 

साधारण व्यक्ति ...

साधारण व्यक्ति ..
बहुत आसानी से मैं सफलतम व्यक्ति से भी प्रभावित नहीं होता हूँ। यद्यपि उसने बहुत महान कार्य किये हों , लेकिन मुझे लगता है , जितना उसका सामर्थ्य था उसकी तुलना में वह बहुत थोड़ा ही कर सका है।
साथ ही -
मुझे साधारण व्यक्ति बहुत सरलता से प्रभावित कर देता है , जब मैं देखता हूँ कि विषमतम परिस्थितियों में भी वह छोटे छोटे सद्कार्य कर लेता है। जीवन से संतुष्ट रहते हुए मुस्कुराया करता है।
--राजेश जैन
05-06-2016

 

Thursday, June 2, 2016

अच्छे मम्मी-पापा ..

अच्छे मम्मी-पापा ..
सुखद 'मानव जीवन' के लिए अच्छा अपना घर-परिवार ही नहीं बाहर अच्छे पास-पड़ोस और अच्छे समाज-व्यवस्था की आवश्यकता होती है। परिवार अच्छा रखने के लिए सदस्यों से ज्यादा , बड़ों का दायित्व होता है कि वह अनुकूल पारिवारिक वातावरण बनाये। जब बात पास-पड़ोस या समाज-व्यवस्था पर आती है तो सयुंक्त रूप से यह जिम्मेदारी उसमें रहने वाले हर परिवार के बड़े सदस्यों की होती है कि वे बच्चों और नारी को सुरक्षित जीवनयापन का वातावरण निर्मित करने की भूमिका निभायें।
जब तक, इस लेखक को जीवन का यह सच स्पष्ट हुआ , लेखक दो बच्चों का पापा बन चुका था। उसे अपने सीमित सामर्थ्य का अनुभव भी तभी हुआ कि वह परिवार और समाज में पिता होने के इस अहं दायित्व का निर्वाह अपेक्षित कुशलता से नहीं कर सकता। सच मानिये अगर इसे वह पहले समझ जाता तो बच्चों का पिता होना पसंद नहीं करता। वह ,इस हेतु उतने नये जन्मों की प्रतीक्षा कर लेता जितने जीवन के बाद उसका यह सामर्थ्य विकसित हो जाता।
इतनी लंबी बेकार की बातें पढ़ने वाले इस लेख के आठ पाठकों से लेखक स्पष्ट करना चाहेगा कि उसका यह अभिप्राय कदापि नहीं की वे अपने बच्चे पैदा न करें। वे अवश्य माँ-पापा बनें ,किंतु यह जागरूकता रखें कि अपना घर-परिवार तो अच्छा रखने का कार्य हर कोई करता है ,वे भी करते होंगे लेकिन बाहर समाज को इस तरह विकसित करने में अपनी भूमिका समझें और निभायें।
वास्तव में घर में बंद होकर ही ना नारी रह सकती ना ही छोटे बेटे-बेटियाँ रह सकते , उन्हें विश्राम और पारिवारिक साथ के लिए घर में रहना और शिक्षा ,कार्य और भ्रमण-विचरण और मेल-मिलाप के लिए बाहर जाना होता है। यह हम सभी जानते हैं कि किसी भी कार्य के लिए बाहर गया घर का सदस्य जब तक वापिस लौट घर नहीं आता , हमारे देश में हमारे अंतर्मन में उसके सकुशल होने की चिंता बनी रहती है।
निर्जन या रात्रि के सूने में हमें यह भय लगा होता है कि हमारे साथ लूटपाट और उसमें हिंसा न कर दे। हम यदि नारी हैं तो असामाजिक तत्व के लिए सॉफ्ट टारगेट होते हैं , जिनसे कम प्रतिरोध में लूटपाट तो की ही जा सकती है इसके अतिरिक्त शारीरिक शोषण भी किया जा सकता है। यह सभी मानेंगे की दुनिया में निर्जन मनोरम स्थल अनेकों हैं , जिनका आनंद हम निर्भय होकर नहीं उठा सकते।
यह लेख करना भी यहाँ उचित होगा कि उस देश और समाज में कमजोर व्यवस्थायें भी कारगर होती हैं जहाँ के नागरिक देश-समाज के प्रति कर्तव्य बोध रखते हुए कर्म और आचरण करते हैं। हम भारतीय सभी अपने देश और समाज में व्याप्त बुराई से रुष्ट हैं। अगर हम कानून व्यवस्था के सहयोगी तथा देश के अच्छे नागरिक बनेंगे तो हमारे देश में कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार नेता-मंत्री और लोक सेवक भी हम अच्छे नागरिकों में से होगा। वह सेवा देने के अपने कर्तव्य को भ्रष्टाचार बिना निभायेगा। लेने और देने वाले अच्छे होंगे तो सहज ही शिकायतें और बुराई कम होंगी।
जब हम उपर्युक्त अनुसार आचार-विचार और कर्म कर सकेंगे तभी बेटे-बेटियों के सही मायनों में हितैषी माँ-पापा होंगे। और मनुष्य जीवन के उत्कृष्ट आनंद लिए जा सकने की दुनिया और वातावरण बना सकेंगे
--राजेश जैन
02-06-2016

Monday, May 30, 2016

भारतीय रिश्तों एवं संस्कृति के हम दुश्मन

भारतीय रिश्तों एवं संस्कृति के हम दुश्मन ..
पुरुष को - श्वसुर  , पिता ,पति , बेटे और भाई आदि के रूप में  बेटी ,बहू ,पत्नी ,बहन और माँ आदि के लिए स्वयं कम खा कर ,भोजन में से उनके लिए बचाते हुए देखा है। यही और इससे बड़े त्याग - माँ , सासु माँ ,पत्नी , बहन , बेटी और पत्नी के रूप में नारी ने भी प्राचीन समय से पुरुष के लिए किये हैं।
फिर क्यों आज इन भारतीय रिश्तों एवं संस्कृति के हम दुश्मन बन रहे हैं?
बाजार और दानवी प्रवृत्ति ने यह भ्रम जाल फैलाया हुआ है कि घर-परिवार ,नारी-पुरुष के परस्पर सुख और उन्नति को बाधित करता है। इस जाल में फँस हममें से अनेक अनायास इनके एजेंट बन गए हैं। और ये गरिमा सम्मान और प्यार के रिश्ते नित हमारे जोक्स , मजाक और रोष के शिकार हो रहे हैं। जबकि पुरुष और नारी के सच्चे सम्मान इन रिश्तों में ही सुरक्षित होते हैं।
घर-परिवार में यदि खराबी आ गईं हैं , तो उन्हें गिरा या सुधार कर पुनः वह घर-परिवार एक बेहतर बुनियाद पर निर्मित करने की जरूरत है , ना कि इन्हें गिरा , इनसे बाहर निकल - पुरुष के लिए अलग और नारी के लिए अलग दुनिया रचाने की। जिसमें पुरुष और नारी एक दूसरे के बैरी होकर आमने-सामने होते हों।
हम यदि प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में परिवर्तित करने के मनुष्य सामर्थ्य का प्रयोग करें तो , इन्हीं रिश्तों में नारी-पुरुष मधुर साथ सहित सभी का जीवन सुखद बनाने के उपाय कर सकते हैं।
अधीर हो समस्या को विकराल रूप देने की नहीं -आज आवश्यकता समस्या का सही समाधान निकालने की है।
--राजेश जैन
31-05-2016
https://www.facebook.com/narichetnasamman

 

Friday, May 20, 2016

क्या है , एक मनुष्य जीवन ?

क्या है , एक मनुष्य जीवन ?
संसार में मनुष्य जन्म , एक छोटे से शिशु रूप में होता है। उसकी आरंभिक पहचान , एक परिवार के बच्चे , एक देश के एक नागरिक ,एक मातृभाषा और एक धर्म के उपनाम के साथ होती है ,वह नारी या पुरुष लिंगीय होता है।
उसे मिले परिवेश और शिक्षा से उसकी जीवन शैली , समझ और उसका कर्म क्षेत्र तय होता है। 80-100 वर्ष के एक सामान्य जीवन में उसका भौतिक स्वरूप बना रहता है। उसको जानने और समझने वालों का एक दायरा होता है , कुछ मित्र और कुछ उसके बैरी होते हैं , और अनेकों उससे अपरिचित और उसके सुख दुःख से उदासीन होते हैं।
फिर एक दिन उसकी मौत हो जाती है , उसकी स्थूल काया संसार से विलुप्त हो जाती है। उसका निराकार अस्तित्व  कुछ अपनों और कुछ अपने दुश्मनों के हृदय में रहा आता है। उन हृदयों में उसकी स्मृति ,अच्छाई एवं बुराई और चर्चा शेष रहती है. फिर जिन्होंने उसको देखा ,समझा और जाना होता है ,वे भी अपने हृदयाधीन स्मृति सहित काल के गाल में समा जाते हैं।  इस तरह एक सामान्य मनुष्य का आकार और निराकार अस्तित्व लगभग 150 वर्ष में पूर्णतया समाप्त हो जाता है।
उसने अपने जीवन में क्या अच्छाई और क्या बुराई कीं वह उस तरह मिट जाती है , जैसे किसी समय किसी भवन की ईंट भवन टूटने के बाद पृथक होकर चूर चूर हो जाती है और जल धार और चलने वाली निरंतर बयार के थपेड़ों में धरती की माटी में इस तरह एकाकार हो जाती है ,जैसे कि उसकी कभी कोई अलग पहचान रही ही नहीं थी।
ध्यान दीजिये ,हम अपने चार पीढ़ी पहले के पूर्वजों के बारे में कोई जानकारी नहीं रखते। उनके जीवन उपलब्धियाँ क्या थी ,उसे जानने की हमारी न तो कोई रूचि रहती है और ना ही इसके लिए हमारे पास समय होता है।
हम नारी या पुरुष थे ,धनवान या निर्धन थे , सुंदर या कुरूप थे , हिंदू जैन ,बुध्द ,सिक्ख ,ईसाई या मुसलमान थे , हिंदी या अन्य भाषी थे , हमारे सारी पहचान महत्वहीन हो जाती है। परोक्ष-अपरोक्ष महत्व सिर्फ इस बात का ही रह जाता है कि मानव सभ्यता के विकास के क्रम में हमने क्या और कितना योगदान किया था?
उदाहरण एक दिव्य आत्मा , ऐपीजे अब्दुलकलाम साहब का लें। 84 वर्ष के जीवन में उन्होंने ऐसे कर्म और आचरण किये की मरने के बाद उनकी स्मृति अनेकों (करोड़ों) के हृदय में विध्यमान है। अगले सैकड़ों वर्ष उनके योगदान की चर्चा इतिहास पृष्ठों पर रहने वाली है। उनके योगदान देश से भी ऊपर , मानवता के लिए हैं , उनके कर्म न नारी हैं , न पुरुष हैं , न हिंदू , न मुसलमान हैं , न हिंदी न उर्दू हैं , और ना ही धनवान , न गरीब हैं। उनके कर्म सिर्फ और सिर्फ मानवता हितकारी हैं।
यह एक मनुष्य के जीवन का सम्पूर्ण अस्तित्व है , यही उसकी अनंत क्षमता होना भी उल्लेख करता है , चाहे कोई अपने जीवनकाल में उस अनुरूप जी सके अथवा नहीं।
--राजेश जैन
21-05-2016 
https://www.facebook.com/events/1790783784484813