Monday, June 29, 2015

मैं ,नारी हूँ

मैं ,नारी हूँ
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कद-काठी में छोटी , मन से कोमल होती हूँ
शोषण से व्याकुल ,विवश अकेले में रोती हूँ

चीरे-सुई* से डरती थी ,गजब साहसी होती हूँ
बोझ न सहनन थी ,महीनों शिशु को ढोती हूँ 

मरने से डरती दुनिया ,मैं मरने को होती हूँ
प्रसव-वेदना सह शिशु जन्म दे ,माँ होती हूँ

मेरे जाये पुरुष ही ,नारी त्याग न समझते हैं
अपमानित मैं ,नारी हूँ ,विवशता पर रोती हूँ
(चीरे-सुई* Operation - Injection)
--राजेश जैन
30-06-2015
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कोई किसी का नहीं होता है ?

कोई किसी का नहीं होता है ?
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"कोई हमारा हो ,से पहले हम ही तो हमारे हों
जीवन सुखद बनें जिनसे ऐसे कर्म हमारे हों
अनेकों का सहयोग है ,हम जीवन जी लेते हैं 
ऐसी अनुभूति से आभार के विचार हमारे हों"
यह कहना "कोई किसी का नहीं होता है" , गलत है। यद्यपि ,कोई किसी का हर समय नहीं होता , किन्तु जीवन भर कोई-कोई और कई-कई हमारे अपने होते हैं , जिनके साथ एवं सहयोग से हमारा जीवन सफर तय होता जाता है। इसी तारतम्य में हम भी कोई के और कई के होते रहते हैं, जिनका हम साथ एवं सहयोग करते हैं। किसी के साथी होना या सहयोगी होने से अभिप्राय ,उसे सुख और सरलता देना है। चूँकि हम सदा किसी को सुख और सरलता नहीं पहुँचा सकते हैं इसलिये यह वाक्य "कोई किसी का नहीं होता है" अक्सर कहने -सुनने में आता है।
सच कहा जाये तो ,सदा तो हम स्वयं ही अपने नहीं होते। वास्तव में हमारे कर्म कभी-कभी स्वयं अपने सुख के दुश्मन होते हैं ,हमारे अपने लिए कठिनाई बनते हैं। अतः जब हर समय ,हम ही हमारे नहीं होते तो कोई अन्य जितना भी हमारे लिए कर देता है , उतना तो हमारा होता है।
--राजेश जैन
29-06-2015
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Sunday, June 28, 2015

नारी पर अत्याचार

नारी पर अत्याचार
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"कितनी ही विज्ञान उन्नति कर ले ,
नर-नारी , नारी गर्भ से ही जन्मेंगे
माँ का दूध पिया है जिन जिन ने
नारी पर अत्याचार कभी ना करेंगे "

ऐसा कहा जाता है , पुरुष -नारी को वस्तु की तरह भोगता है , यह गलत है। अवश्य ही तुलनात्मक रूप से , पुरुष में छल ज्यादा है , और इस अधिकता के कारण अनेकों जगह पुरुष नारी को शोषित करता दिखता है। किन्तु अनेकों पुरुष ऐसे भी हैं जो आनेस्टी से नारी को सहयोग करते हैं।
कुछ की दुष्टता से नारी और पुरुष का साथ कभी समाप्त नहीं हो सकेगा। मानव सभ्यता का तकाजा है दुष्टता अवश्य ही, समाप्त की जानी चाहिये।
--राजेश जैन
28-06-2015
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Friday, June 26, 2015

अग्रणी भी किन्तु - आशंकित नारी

अग्रणी भी किन्तु - आशंकित नारी
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बच्चे के प्रश्न पर एक युवा डॉक्टर कहती हैं ,  देश में जनसंख्या समस्या है , और देश का ढाँचा और अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती जनसंख्या को झेल पाने में अपर्याप्त है अतः राष्ट्र का प्रश्न है तो एक ही संतान (चाहे बेटी या बेटा) होना चाहिये। यह कथन ,उस जिम्मेदारी और राष्ट्रनिष्ठा को अभिव्यक्त करता है , जिसकी हमारे समाज और देश को , प्रगति और खुशहाली की दृष्टि से जरूरत है। नारी देश हित में विचारशील है , सहयोग करने को तत्पर है। उनका स्वयं का एक नौ वर्षीय बेटा है। किन्तु अगला कथन , अग्रणी नारी को भी आशंकित किये हुये है , वे कहती हैं  …
एक बच्चा तो होना चाहिये , अन्यथा समाज के दबावों को झेलना कठिन चुनौती है।
राष्ट्रहित की अनिवार्यता और समाज की सोच में , यहाँ विसंगति परिलक्षित होती है। देश में ऐसी अनेक विसंगतियाँ हैं इसलिये हम 68 वर्ष की स्वतंत्रता के बाद भी देश को वाँछित उन्नति दिलाने में असमर्थ रहे हैं। 
एक बड़ी विसंगति है , नारी जो जनसंख्या का आधे से थोड़ा ही कम हिस्सा है , असुरक्षित है , नित अपमानित है , उनकी शिक्षा और जीविकोपार्जन में पग पग पर चुनौतियाँ हैं।
हम अनदेखा कर रहे हैं , अपने स्वार्थ और वासना में उन्हें शोषित करते जा रहे हैं। आधी जनसँख्या को यदि हम कुंठित रखेंगें तो उनके साथ ही उनसे गुथे -बुने अपने जीवन को भी सुखदता से जी पाने से हम वंचित रहेंगे।
--राजेश जैन 
26-06-2015

Monday, June 22, 2015

परवाह होनी चाहिए

परवाह होनी चाहिए
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दुनिया से ,हम अनेक शिकवे -शिकायत रखते हैं , ये कम रहें इसलिए हमें दुनिया की परवाह होनी चाहिए। परवाह होने पर ही हमारे कर्म -आचरण इस तरह मर्यादित हो सकते हैं जो अन्य को अप्रिय नहीं लगते हों। लेकिन , हम भूल करते हैं कि दुनिया को हमारी परवाह नहीं ,तो हम दुनिया की परवाह क्यों करें ?
वैसे तो समय के साथ मानव यात्रा स्वचालित (ऑटोमैटिक) चलती है , बिना विचारे भी रहें और अकर्मण्य रहें तो भी ऑटोमैटिक जीवन व्यतीत होता है। लेकिन ऑटोमैटिक चलने वाली किसी यात्रा का अंत सही लक्ष्य तक पहुँचेगा यह जरूरी नहीं है।  वृक्ष से टूटकर फल नीचे ही गिरता है , जल प्रवाह ऊँचाई से नीचे की ओर ही होता है , दोनों ऑटोमैटिक बातें हैं। 
मनुष्य बिना विचारे अपना जीवन ऑटोमैटिक चलने दे तो , वह ऊँचाई से नीचे (पतन) की ओर ही चलेगा। जीवन में हमें ऊर्जा मिलती है , उसका प्रयोग कर हमें पतन की ओर न चलकर , जहाँ उचित है , ऊँचाइयाँ हासिल करनी चाहिये। ऐसा करने पर ही हम समाज और संसार को ऐसी मंजिल पर ला सकेंगे , जहाँ हमारा ही नहीं अपितु अधिकाँश का जीवन सुखद हो सकेगा। और हमारे दुनिया से शिकवे शिकायत कम हो सकेंगे। अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ी और समाज के प्रति हमारे यह उत्तरदायित्व होते हैं। हम विचारशीलता से अपने कर्म -आचरण करें , ऑटोमैटिक नहीं बल्कि अपने जीवन के हर क्षण पर अपना नियंत्रण रख अपना जीवन जियें।  स्वयं भी ऊँचाइयों को प्राप्त करें और अपने समाज को मधुरता की ऊँचाई पर स्थापित करें।
--राजेश जैन
22-06-2015

Thursday, June 11, 2015

भय लगता है

भय लगता है (पुरुषों से अतिरिक्त नारी भय)
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द्वार-बाहर …
कॉलेज ,ऑफिस में पास बैठ कोई हरकत न करदे इससे …भय लगता है        …
सार्वजनिक जगहों में जाने पर अंगों को घूरती नज़रों से …भय लगता है
बस -ट्रेन, यात्रा, भीड़ में बहाने से रगड़ ना दे कोई इससे …भय लगता है
रूचि नहीं सम्पर्क नहीं मेरा ,उनकी मुझमें रूचि से मुझे …भय लगता है
घर -परिवार …
माँ -पापा उच्च शिक्षा अवसर देंगे या नहीं इस ख्याल से …भय लगता है
माँ -पापा को मेरे विवाह पर परेशानी होगी इस ख्याल से …भय लगता है
विवाह बाद अपरिचित परिवार में निभ सकूँगी ख्याल से …भय लगता है
शारीरिक-नारी संरचना …
किस अवसर किस जगह पीरियड आ जायेगें इस भय से …भय लगता है
माँ बनना तो ख़ुशी इसके पहले प्रसव वेदना के ख्याल से …भय लगता है
सामाजिक परिदृश्य …
पापा ,भाई ,पति एवं स्वयं मेरी ,मुझ पे खतरे की चिंता से …भय लगता है
--राजेश जैन
11-06-2015
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Wednesday, June 10, 2015

मैं , नारी हूँ

मैं , नारी हूँ
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गर्भ से ही , मेरी चुनौती आरम्भ होतीं हैं
मार दी न जाऊँ तो ही जन्म लेती हूँ

बेटी तो, पापा की लाड़ दुलारी होती हैं
बाहर , कुदृष्टि के तीरों से आहत होती हूँ 

बेटी पर बेटे की तुलना में पाबंदियाँ होती हैं
उन्नति अवसर न मिलते मन मार लेती हूँ 

शादी किसी के बेटे का ,मुझ बेटी से होती है
पापा, को नतमस्तक देख पीड़ा सह लेती हूँ

प्रेमिका रहती जब तक नारी प्रिया होती हैं
पत्नी होकर मिलती ,पति उपेक्षायें ,सहती हूँ

माँ , छोटे बच्चों की प्राण से प्यारी होती हैं
बढ़े हुये ,एकतरफा उनसे ममता रखती हूँ

नारी यौवन-रूप जब तक ,आकर्षण केंद्र होती हैं
घटते ही ,दूध की मक्खी सी निकाल फेंक दी जाती हूँ  

मनुष्य हूँ , स्वाभिमान मेरे भी होते हैं
ना चाहूँ साथ तो बहलावे-फुसलावे देखती हूँ

मनुष्य होकर मैं ,जानवर सी प्रयोग की जाती हैं
क्योंकि पुरुष नहीं , मूक सी ,मैं नारी रहती हूँ

क्या लूँ बदला , सब तो मेरी संतान होती हैं
बदलूँगी अब लेकिन स्वयं , मैं नारी कहती हूँ
--राजेश जैन
11-06-2015
https://www.facebook.com/narichetnasamman