Tuesday, September 30, 2014

वो अच्छा नहीं है .

वो अच्छा नहीं है .
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अच्छा , सबके लिए अलग -अलग हो सकता है। इसलिए जिसे अन्य अच्छा कहें /मानें वो आपके लिए भी अच्छा ही हो कदापि आवश्यक नहीं है।
लेकिन कुछ "अच्छा" ऐसे होते हैं जो अपवाद में सबके लिए ही निश्चित अच्छा होता है। सर्व मान्य "अच्छा" क्या हैं ?


बच्चा भी इसे अच्छा जानता है
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बच्चा 8-10 वर्ष का होता है ,वह अगर अपने पिता का, अन्य नारी से या माँ का ,अन्य पुरुष से  शारीरिक संबंध होना देखता है या ऐसी नीयत (आकर्षण) अनुभव करता है तो उसे अच्छा नहीं लगता। उसे अच्छा तभी लगता है जब उसके पिता और माँ इस विषय में परस्पर निष्ठावान हों।
इस उम्र का बच्चा (बेटी या बेटा) , भारतीय संस्कृति का जानकार नहीं होता तब भी आरम्भिक समझ में भी पति -पत्नी की आपसी निष्ठा को ही अच्छा मानता है।  मनुष्य परिवार में रहता है , इसके लिए यह अच्छा , प्राकृतिक अच्छा होता है।


कोई हमें ठगे ,यह हम अच्छा नहीं मानते
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व्यक्तिगत राय ली जाये तो सर्वमान्य राय यही होगी - "कोई हमें छले /ठगे ,यह हम अच्छा नहीं मानते हैं" । स्पष्ट है छला या ठगा जाना अच्छा नहीं होता।  अच्छा निच्छल या निष्कपट होना होता है।


हम दोषी हैं
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जिसे हम अच्छा नहीं जानते वह अच्छा हम नहीं करते हम दोषी तब नहीं हैं।  लेकिन जिसे हम अच्छा मानते हैं किन्तु वैसा अच्छा स्वयं नहीं निभाते हैं तब हम दोषी होते हैं।


वैवाहिक जीवन में माँ -पिता का एकनिष्ठ ना होना हमें पसंद नहीं था किन्तु हम अपने दाम्पत्य जीवन में विवाहेत्तर संबंधों के तरफ आकर्षित होते हैं या रखते हैं।  हम दोषी हैं समाज में यह बुराई हमसे है।
प्रेम का दिखावा कर कुछ समय शारीरिक सम्बन्ध बनाये फिर धोखा दे चला जाए , ऐसा छला /ठगा जाना हमें पसंद नहीं होता है। लेकिन चलन से दुष्प्रभावित हो यही छल दूसरों से करते हैं। पुनः हम दोषी हैं समाज में यह बुराई हमसे है।


अपनी बारी इन बुराई में योगदान हम करते हैं। समय परिवर्तन के साथ जीवन में इस बुराई का शिकार जब हमारा कोई अपना होता है तब वेदना होती है। तब इस बुराई के लिये समाज पर दोष रखते हैं, क्यों ?


हम उन्नति नहीं कर रहे हैं , पिछड़ रहे हैं
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विज्ञान और भौतिक वस्तुओं का ज्ञान और जीवन में उस पर निर्भरता आज बड़ी है। आज हम तुलनात्मक प्राचीन समाज के मनुष्य जीवन से ज्यादा सुविधाजनक परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं। "और भी सुविधा"  अपने जीवन में सुनिश्चित करें इस हेतु विज्ञान और भौतिक संसाधनों के प्रति ज्ञान लालसा और चिंतन हम पर हावी हो गया है।इस कारण नैतिक और मानवीय संवेदना विषयक चिंतन हममें कम हो गया है। दूसरे शब्दों में भौतिक और वैज्ञानिक रूप से अति उन्नत होने के साथ आज हम नैतिक और मानवीय दृष्टि से प्राचीन समाज के मनुष्य से पिछड़ रहे हैं।


सुविधा और भोग साधनों के ज्यादा विकल्प ना होने से , प्राचीन समाज  का मनुष्य आज की तरह अति व्यस्त नहीं था। विज्ञान और आधुनिक ज्ञान पाठ्यक्रम के ना होने से उसका चिंतन धर्म और संस्कृति पर होता था। यही कारण था जिससे आज से पिछड़े कहे जाते हमारे मनुष्य पूर्वजों ने मानवीय मनोविज्ञान को समझा और हजारों वर्षों के अनुभवों से सर्वकालिक मानव हित के धर्म, संस्कृति और परम्परायें स्थापित कर एक भव्य समाज सृजित किया। जिसमें न्याय , त्याग ,दया और मानवता विध्यमान थी।


उन्नति सर्वदिशाओं में करें वह वास्तविक उन्नति है। भौतिक और विज्ञान के पंडित हो जायें।  लेकिन विरासत में मिली भव्य समाज रचना और संस्कृति को ध्वस्त कर मानवता में पिछड़ जायें तो इसे उन्नति नहीं कह सकेंगे।


जीवन - वो अच्छा नहीं है
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होने को तो आलीशान ,वातानुकूलित भव्य शयनरूम और नरम बिस्तर होंगे , लेकिन शैय्या पर साथ निष्ठावान साथी ना होगा .  काम -आवेश के पल तो शायद सुखद लगें। फिर ना तो नींद आये और ना साथ पड़े धोखेबाज साथी को सहा जाये। कैसा जीवन सुख , कैसी उन्नति और उपलब्धि हम पायेंगे ? जीवन - वो अच्छा नहीं है .


अत्याधुनिकता (ULTRA MODERNITY)
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लिव इन रिलेशन पर जायें यह आधुनिकता विनाशी है । विवाह टूटने के प्रमुख कारण  1. छल के अस्थायी शारीरिक सम्बन्ध   2. विवाहेत्तर संबंधों के सम्मोहन से मुक्त हों।  मनुष्य का परिवार में जीवन यापन ही श्रेष्ठ और परीक्षित विकल्प है।  इस संस्कृति को बचाने का दायित्व हम सभी निभायें। यह पुरातनता ही अति आधुनिकता होगी।


--राजेश जैन
30-09-2014













Sunday, September 28, 2014

कैसे हम बहन , पत्नी या बेटी रक्षक

कैसे हम बहन , पत्नी या बेटी रक्षक
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बहन की रक्षा का वचन रक्षा सूत्र -बंधन में , पत्नी के रक्षक का दायित्व , विवाह के समय वचन में और बेटी की रक्षा का भार उसके पिता बनने के साथ हर पुरुष पर हमारी संस्कृति से होता है , हम निभा पाते हैं उसे ? विचार करने के लिए साहित्यकार के शिष्टाचार के साथ कुछ उल्लेख इस लेख में प्रस्तुत हैं।

खिले मुख बुझ जाते हैं
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दो युवतियाँ राह में जा पैदल जा रही हैं , दोनों आपसी बातों में मगन और आनंदित हैं इसमें उनकी राह खिले  मुख के साथ कट रही है।  तब उनके सामने से कुछ युवक क्रॉस करते हैं , कुछ उनसे कहते हैं।  आगे की राह में युवतियों के मुख बुझे हुए होते हैं।

आत्मविश्वास खो जाता है
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एक वर्किंग लेडी ,स्कूटी में खराबी से सिटी बस से आज ऑफिस जा रही है , चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा है , तब आगे निकलने की कोशिश दर्शाता एक प्रौढ़ पुरुष, हरकत करता है। बाद के सफर में उस आत्मविश्वासी नारी मुख से आत्मविश्वास खोया होता है।

कल्पना बिखरती -सपने टूट जाते हैं
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पिता सयानी हुई पुत्री का विवाह करते हैं , बेटी सुखद संसार की भिन्न भिन्न कल्पनाओं के साथ और जीवन सपने लिये पति के घर में आती है।  कुछ दिनों में उसे ज्ञात होता है , पति कामावेग बढ़ाने के कृत्रिम उपाय करता है , और कई भटकी युवतियों से सबंध रखता है। इस नव ब्याहता की कल्पनायें बिखरती हैं और जीवन सपने टूट जाते हैं।

पढने की मगनता में विघ्न आ जाता है
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बारहवीं क्लास में ब्रेक के पहले तन्मयता से टीचर द्वारा पढ़ाया जा रहा विषय पढ़ रही एक बेटी , लंच ब्रेक में मोबाइल पर कोई sms /mms देखती है , ब्रेक के बाद क्लास में उसका मन उचटा दिखता है उसकी मगनता में विघ्न स्पष्ट देखा जा सकता है।

ऐसे और कई तरह के किस्से (अपराध) हमारी बहन-बेटियों के साथ होते हैं , जिनके विरुध्द कार्यवाही या अपराध सिध्द करवा पाना कठिन होता है। घर में वे पिता ,भाई या पति जो उनके रक्षक होते हैं को इस भय से नहीं कहती की हरकत/छेड़छाड़ या चरित्र से बिगड़ा पुरुष उनके पिता ,भाई या पति पर भारी पड़ कर उन्हें क्षति पहुँचा सकता है।  ये अपराध , बहुत बड़े नहीं होते हैं , लेकिन नित होते हैं नारी के खिले मुख ,आत्मविश्वास ,सपने या पढने की मगनता को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। 

हममें से ही कुछ पुरुष , नारी की कमजोर शारीरिक शक्ति , और मानसिक करुणा (परिजन उनके कारण विपत्ति न ले बैठे ) के कारण छिपे तौर पर घटियापन करते हैं। कुछ नारी तो वीरता दिखा पाती हैं , और प्रतिरोध करती हैं , अधिकाँश प्रतिरोध का साहस नहीं कर पाती हैं। शक्तिशाली पुरुष कमजोर को शिकार बनाने की कायराना दुष्कर्म करते हैं। वह शक्तिशाली है या कायर है ?  इस तरह के पुरुष समाज में फैले पड़े हैं।  इनकी भी बहन -पत्नी और बेटी होती  हैं जो दूसरे इसी तरह के पुरुषों द्वारा ऐसे शोषण की शिकार होती हैं।

इसलिए विकराल यह प्रश्न उठता है , कैसे हम बहन , पत्नी या बेटी के रक्षक हैं ?

-- राजेश जैन
29-09-2014



Saturday, September 27, 2014

अनमैरिड प्रोफेशनल्स

अनमैरिड प्रोफेशनल्स
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स्पेशली वे जो मेट्रोस में भविष्य बनाने और धन कमाने , घर से दूर रहने जा रहे हैं। चाहे वे बेटे हों या बेटियाँ हों , हमारे जैसे किसी परिवार के। स्वयं उनकी तथा उनसे माँ -पिता उनके भाई -बहनों और परिजनों की कल्पना /अपेक्षा उनके सुखद ,प्रतिष्ठित और दूसरों के लिये अनुकरणीय तरह के व्यक्तित्व निर्माण की होती है।

घर से दूर जा रहा बेटा और बेटी , अपने माँ -पिता ,भाई -बहनों और परिजनों की चिंताओं को दूर करने के लिये उन्हें हर तरह से आश्वस्त करता है। परिजनों को उसमें शंका होती है , तब भी वे बेटे-बेटी के आश्वासनों पर विश्वास करते हैं। 

उनकी शंका अपने बेटे-बेटी की किसी कमी या खराबी के कारण नहीं होती (ऐसे कमी वाले बेटे-बेटी तो बाहर भेजे जाने की योग्यता ही प्राप्त नहीं कर पाते ). उनकी शंका क्यों होती है ,कि बेटे-बेटी से ऐसी गलतियां ना हो जायें ?  जिस के कारण विशिष्ट रही उनमें योग्यता के बाद भी उनका भविष्य और जीवन समस्याग्रस्त हो जाये। उत्तर, इस प्रश्न का पढ़ने वाले सभी जान रहें हैं।
माँ -पिता को बाहर के (मेट्रोस) के ख़राब चलन के कारण ये शंका होती है , इस ख़राब चलनों में उनका पाल्य परिवार के मार्गदर्शन और देखरेख से भी दूर रहता है , इसलिये उनकी आशंकायें बढ़ती हैं। ख़राब चलन तो अनेकों हैं।  दुष्प्रभावित अगर हो गए तो वो युवाओं का भविष्य , असाधारण उनमें प्रतिभा के होते हुए भी , बेहद साधारण से बुरा बना छोड़ सकता है।
बहुत से ग्रामीण माता -पिताओं को तो ख़राब चलन होते हैं , इतना ही मालूम होता है , लेकिन वे किस हद तक ख़राब हैं उनकी कल्पना भी उन्हें नहीं होती।  लेकिन प्रतिभावान अपने बेटे-बेटी के भविष्य की चिंता में और पढाई पर किये सामर्थ्य से अधिक व्यय का प्रतिफल बच्चों के जीवन में प्राप्ति के लिये वे खतरा उठाते हैं।

सभी युवा तो निश्चित ही भटकावे में नहीं पड़ते। उन्हें माँ-पिता अपेक्षा और अपने भले -बुरे का ज्ञान संस्कारों से मिला होता है। वे , आत्म -नियंत्रण से आसपास फैली अनेकों बुराइयों से अपना बचाव कर लेते हैं। अपनी प्रतिभाओं अनुरूप अपना जीवन ऐसा बनाते हैं जो ना सिर्फ परिवार अपितु समाज और राष्ट्र के लिए उपलब्धि होता है।  उनका जीवन अनुकरणीय होता है , जिसका अनुकरण कर दूसरे भी अपना हित करते हैं।

लेकिन कुछ युवा भटकावों और बुरे चलन की चपेट में आ जाते हैं। क्या हैं भटकावों के लिए मुख्य जिम्मेदार खराबियाँ जो मेट्रोस में सरलता से मिलती हैं?   अनेकों है लेख में सभी की चर्चा लेख को बोरिंग कर  सकता है।  एक प्रमुख का उल्लेख ही कर रहा हूँ।

युवा बेटे और बेटियाँ जब जॉब के लिये बाहर जाते हैं तब रहने के लिए , पुरुष -पुरुष (बेटे ) अलग और नारी (बेटियाँ) अलग रेंटल फ्लैट शेयर करते हैं।  मल्टी-नेशनल कंपनी'यों में वीक एंड दो दिनों का होता है। इन दिनों दो रातों में कुछ पुरुष , नारी वाले फ्लैटों में पहुँचते हैं या मित्रता के बहाने नारियों को अपने फ्लैट में डिनर को निमंत्रित करते हैं।

मौज मस्ती के नाम पर गेम्स , अच्छे स्वादिष्ट भोज्य तो वहाँ होते ही हैं , ड्रिंक्स और अश्लील वीडियो का भी प्रबंध वहाँ कर लिया जाता है।  जिन बेटे -बेटियों को ऐतराज होता है , उन्हें भी तानों और आधुनिकता और मौज मजे के नाम पर राजी कर लिया जाता है। रात्रि , ड्रिंक्स और अश्लील वीडियो के दुष्-प्रभाव में वे अपने पर पारिवारिक -नैतिक और सामाजिक दायित्वों को भुलाते हैं , रात्रि में साथ रहते हैं। प्रारम्भ में अगली सुबह अपनी रात में की करतूतों का पछतावा भी करते हैं।  फिर अभ्यस्त होने पर वह भी छोड़ते हैं।

भविष्य और जीवन पर इस स्वछंदता की बुरी परछाई क्या होती है , जो समस्या बनती है और सुख और प्रतिष्ठा का हरण करती है ?
भारतीय पुरुष (पति) परम्परा से पसेसिव स्वभाव का होता है ,अपनी पत्नी के प्रेम और सुंदरता पर एकाधिकार पसंद होता है।  ऐसे में भले ही दुष्प्रेरित कर उसने अनेकों युवतियों का दैहिक शोषण किया हो , उसे अपनी पत्नी पर इसी तरह की कुशंकायें सताती हैं , जहाँ पत्नी की कमाई तो चाहता है , किन्तु पत्नी के कार्यालीन साथी पुरुष से व्यवहार पर रुष्ट रहता है।  ये शंका उसे इसलिये रहती है कुछ नारियों के चरित्र बिगाड़ को प्रत्यक्ष उसने देखा / उसका स्वयं कारण रहा होता है। इस बुरे कर्म की छाया और भारतीय पुरुष पारम्परिक मानसिकता  उसके  दाम्पत्य जीवन का सुख चुरा लेती है।  वैवाहिक सम्बन्ध भी आजीवन नहीं चल पाते हैं।  और बच्चे माँ-पिता की संयुक्त छाया से वंचित होते हैं।

क्या Do's  और डोंट's होने चाहिये
Do's
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घर से आते माँ -पिता को दिये आश्वासनों अनुसार जिम्मेदार व्यवहार ,आचरण और कर्म
Dont,s 
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रात्रि पार्टी  , ड्रिंक्स (दोनों ही विशेषकर नारी ) , अश्लील वीडियो

--राजेश जैन
28-09-2014

Friday, September 26, 2014

अभिवादन

अभिवादन
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पाश्चात्य संस्कृति ने हमें प्रभावित किया . उसका हमारे समाज में निर्वाह होने लगा ।  अभिवादन करने की शैली हमारी बदल गई ।  एक हाथ उठा कर , सिर हिलाकर अभिवादन भारतियों ने भी करना अपना लिया।

अभिवादन करना तो कोई भी शैली हो अच्छा ही होता है।  लेकिन लेखक को लगा एक हाथ उठा कर या  सिर हिलाकर अभिवादन में उतनी विनम्रता नहीं झलकती जितनी , हमारी संस्कृति अनुसार दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन में झलकती है।  अतः कॉलेज समय में सीखी एक हाथ उठा कर या  सिर हिलाकर अभिवादन के स्थान पर लेखक ने हाथ जोड़कर अभिवादन करना आरम्भ कर दिया।

आपको अच्छा लगेगा यह जानकर कि इस ढंग से अभिवादन करने से, जिसे अभिवादन किया गया होता था , धीरे -धीरे उन्होंने भी प्रत्युत्तर में हाथ जोड़ना आरम्भ कर दिया। 

अगर कोई उनसे बोलता कि आप हाथ जोड़कर अभिवादन किया करें तो शायद वे इसे ना मानते।  लेकिन हमारे हाथ जोड़ने से उन्होंने हाथ जोड़ने में कोई हिचक नहीं दिखाई।

हमारे या सभी के विनम्र होने से समस्याये और परस्पर टकराव घटते हैं।  इसलिये विनम्रता अनुकरणीय होती है।  हमारी संस्कृति हमें विनम्रता सिखलाती थी।  अगर हमें इसे जीवित रखना है। तब अपने व्यवहार ,आचरण और कर्मों में पहले इसे स्वयं लाना होगा। तब दूसरे भी संस्कृति अनुरूप आचरण करना आरम्भ कर सकते हैं। 

अन्यथा , भारतीय संस्कृति पर चलो , उसे अपनाओ , सलाह या आज्ञा देना उतना प्रभावकारी ना होगा। ये वाक्य दूसरों को दिये जाने वाले उपदेश मात्र बनकर रह जायेंगे।  एक दिन ऐसा भी आ सकता है,  जब कोई उपदेश देने वाले से पूछे , क्या है ,"भारतीय संस्कृति ? तो उपदेशक ही निरुत्तर रह जाए।

-- राजेश जैन

मुस्कराहट

मुस्कराहट
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अभी कुछ नहीं बिगड़ा , लौटा के वह आदत ले आयें
सुबह भी हम हँसते उठे और शाम तक भी मुस्कुराएं


यह तब ही संभव है जब नित परोपकार हम करते हैं
परोपकार के साथ ही अपने पर उपकार हम करते हैं


अन्य अगर हमारे सहारे से मित्रों , जब मुस्कुराते हैं
अपने सुबहोशाम मुस्कुराने का इंतजाम हम करते हैं


--राजेश जैन
26-09-2014

Thursday, September 25, 2014

ज़माना दिखाता वही क्यों देखते हैं? ……… (3)

ज़माना दिखाता वही क्यों देखते हैं? ……… (3)
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प्यार
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प्यार की अनुभूति मधुरतम होती है. प्यार की महिमा इतनी होती है कि प्यार शब्द ही मिश्री की मिठास का बोध कराता है। जिनसे  प्यार हमें होता है उनसे हमारे बैर ,ईर्षा , प्रतिद्वंदिता ,कटुता और ह्रदय से दूरियाँ स्वतः समाप्त होती हैं।  जिनसे हम प्यार करते हैं , उनकी प्रसन्नता , प्रगति और सुरक्षा हमारी निजी प्रसन्नता का कारण बनता है। आज प्यार की बातें सबसे ज्यादा होती हैं।

बेटी से पिता का और पिता से बेटी का प्यार बहुत अनूठा कहा जा रहा है।  वर्ष में एक दिन "फादर्स डे" की परम्परा आरम्भ हो गई है।  सबसे ज्यादा बेटी  "फादर्स डे" पर अपने पापा से सम्मान और प्यार प्रदर्शित करती हैं।
माँ से पुत्र का पुत्र से माँ का प्यार तो अत्यंत प्रगाढ़ होता है।   वर्ष में एक दिन "मदर्स डे"  भी बडे उत्साह से मनाया जाता है , पुत्री और पुत्र दोनों ही इस दिन सम्मान और प्रेम से माँ को उपहार  और शुभकामनायें देते हैं।
युवाओं में विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षण और प्यार भी आज अत्यंत उत्साह और मनलुभावन ढंग से प्रदर्शित किया जाता है।  "वेलेंटाइन डे " आज लगता है युवाओं को वर्ष में सबसे ज्यादा प्रिय दिन लगता है। इस दिन बढ़चढ़ कर प्रेम दिखाने की होड़ उनमें होती है।
मित्रो में प्रेम प्रदर्शित करने के लिए आजकल वर्ष में एक दिन 'फ्रेंड'स डे' भी मनाया जा रहा है।
इन बातों से कहा जा सकता है कि आज प्रेम की गंगा  पूरी दुनिया में बह रही है।
प्रेम प्रदर्शन में हम यह नहीं देख पाते हैं ?
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इतना प्यार यदि परस्पर सबमे होता तो क्यों आज बैर ,ईर्षा , प्रतिद्वंदिता ,कटुता और ह्रदय से दूरियाँ इतनी होती ? प्यार का अस्तित्व तो इन्हें ख़त्म करता है।
क्यों , युवतियाँ और बच्चियाँ प्यार नाम से छली जा रही हैं ? जो प्रेमी बन उन्हें मिलता है क्यों कुछ समय में उनका जान का दुश्मन बनता है ? क्यों उनसे छुटकारा चाहता है। 
प्यार , बेटी के प्रति इतना सच्चा होता तो , क्यों पिता अपने घर आँगन में बेटी नहीं देखना चाहता है ? बल्कि मालूम पड़ जाये कि गर्भ में शिशु -कन्या है तो उसको नष्ट करवाने की कोशिश करता है।
बेटी , जो पापा से अगाध प्यार रखती है क्यों उनके मार्गदर्शन में ना चलकर , छलियों के फुसलावे में आकर अपनी और पिता-परिवार का जीवन नरक बनाती है ?
प्यार बेटे का माँ के प्रति प्रगाढ़ था तो क्यों स्वयं का परिवार होने के बाद , माँ का यथोचित सम्मान और उनकी देखभाल नहीं कर पाता है ?
क्यों युवक प्यार नाम से धोखा देकर प्रेमिका को छलते हैं ? क्यों पुरुष दूसरे परिवार की नारी पर शोषण -दुराचार और उनकी हत्या कर अपनी जननी (माँ ) को अपमानित करते हैं?  जो ऐसे बेटे की माँ होने से निपूती रहना बेटे के अत्याचार से दुखी हो सोचने को बाध्य होती है।
पति -पत्नी के बीच इतना अनुराग होता है तो क्यों वे एक दूसरे के पेरेंट्स के प्रति उनके दायित्व निर्वहन में बाधक बनते हैं ?
जब मित्र-प्रेम विशाल है तो। क्यों मित्रों में आपसी प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या है कि मित्र की उन्नति इतनी खटकती है ?

इतना प्यार जितना दिखाया जा रहा है का कुछ अंश भी सच्चा होता तो समाज में छल -ईर्ष्या और द्वेष का अस्तित्व ना होता।  एक दूसरे की प्रगति से हम खुश होते और हमें दूसरे की सुरक्षा अपने से बढ़ कर प्यारी होती।

हम करें तो किसी से सच्चा प्यार करें और नही तो प्यार शब्द के झूठे प्रयोग से किसी को छल कर प्यार नाम की पावन भावना को कलंकित ना करें।

--राजेश जैन  
26-09-2014

उपलब्धि और गर्व

उपलब्धि और गर्व
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मार्ग में चलते हुये ऐसे स्थान  हैं जहाँ किसी प्रदूषण के कारण दुर्गन्ध होती है, आते -जाते हैं । वयस्क व्यक्ति तो , श्वाँस रोक कर उस दुर्गन्ध से बचता है। लेकिन बच्चे कुछ समय श्वाँस रोकने का अभ्यास नहीं रखते। वे दुर्गन्ध को भुगतते हैं। कई बच्चों को रुमाल नाक पर रखने की सीख होती है। वे दुर्गन्ध से इस तरह बच लेते हैं।
श्वाँस रोककर या रुमाल नाक पर रख , दुर्गन्ध से बचाव तभी संभव होता है , जब दुर्गन्धमय स्थान ज्यादा बड़ा नहीं होता. अगर यह विस्तृत है  तब इसके सिवा कोई उपाय नहीं रहता की दुर्गन्ध के कारक को ही समाप्त किया जाये।
वातावरण के प्रदूषण की तरह देश और समाज के प्रदूषण (बुराई )  भी हैं .  थोड़ी बुराई है तो उससे बचने के अपने -अपने ढंग से सब निबट लेते हैं। लेकिन बुराई की व्याप्तता अधिक हो तो उसके कारकों को ढूँढ/समझ  कर नष्ट करने की आवश्यकता होती है।
व्यापक हो गई बुराई को एक या कुछ के प्रयास से नष्ट करना कठिन होता है। उसे हमारे अथक और दीर्घ , सयुंक्त प्रयासों या असाधारण अच्छाई के पुँज किसी अवतार तरह के व्यक्ति द्वारा नष्ट किया सकता है।
हमारे समाज में भी ऐसी बुराई बढ़ रहीं हैं। उससे अपना अकेला बचाव करने में हमें असफलता मिलेगी।  वह इतनी बड़ी हो रही है कि हम सभी को चंगुल में रही है। सम्भावना कम है कि कोई अवतार अभी हमें  मिलेगा। 
अतः  हमें अपने और हमारे बच्चों के सुखद भविष्य/जीवन को सुनिश्चित करने के लिए समन्वित/सयुंक्त और गंभीर प्रयास करने चाहिये। अन्यथा जिस गति से बुराइयाँ बढ़ रहीं हैं वे जटिल से जटिलतम हो जायेंगी.जिनका निर्मूलन या उपचार असाध्य हो जाएगा।
आज हम समझ लें तो आगामी संततियों के प्रति दायित्व हम पूरे कर सकेंगे ।वे आज हमारे किये त्याग और उपलब्धि पर गर्व करेगी .  अन्यथा आगामी पीढ़ियाँ हमारी पीढ़ी पर रोयेंगी और उसे कोसेंगी ।

-- राजेश जैन 
25-09-2014