Tuesday, November 27, 2012

माध्यम कैसा जिम्मेदार राष्ट्र का?


माध्यम कैसा जिम्मेदार राष्ट्र का?
-------------------------------------
मात्र एक पुरस्कार को वंचित
देख दुःख वंचित पुत्र के 
आया पिता को रोना बहुत
क्यों न हो , वह ह्रदय पिता का

वर्षों कर प्रशंसा गरीब राष्ट्र ने
दी प्रसिध्दी और बहुत संपत्ति 
स्वयं रहते आधे भरे पेट और
खरीद टिकट देखते सिनेमा वे

वंचित जीवन मूल सुविधा से
ऐसे देश के आधे नागरिक 
उनके प्रति दायित्व था होता
ना करते उन्हें दिग्भ्रमित तो 

यही बहुत सम्मान होता उनका 
गर दिखाते सच्चा जीवन सपना
हित साधने अपने अपने दिया 
उन्हें आडम्बर का थोथा सपना 

माध्यम कैसा जिम्मेदार राष्ट्र का?
बना दिया भ्रम प्रचार फैला कर
कोई कहे महान पिता उन्हें तो  
मुझे या अन्य को नहीं आपत्ति 

पर जब सब कहें महानायक तो
मुझे ना लगती बात वह सच्ची
महानायक वह त्यागे हित स्वयं के 
अपमान शब्द का दें गर ऐसों को
 




प्रेम मूल मन्त्र सुखी समाज लिए होता

प्रेम मूल मन्त्र सुखी समाज लिए होता
--------------------------------------------------

प्रेम एक अति मधुर प्रचलित शब्द
जो प्रथम दृष्टया मिश्री घोलता
मीठे में कीड़े लगने की आशंका
अतः कठिन प्रेम सम्हालना होता

प्रेम डालता प्रेमियों पर जिम्मेदारी
जब ले रहे प्रेम को सीमित अर्थ में

प्रेम भाव प्रमुखतः ह्रदय से होता
किन्तु आज इसे मात्र तन से जोड़ते

पति-पत्नी मध्य जो प्रेम है होता
वह मन अतिरिक्त तन साथ होता
अन्य संबंधों में प्रेम ह्रदय में होता
अति विस्तृत प्रेम की सीमा होती

जहाँ प्रेम वहां सामीप्य में प्रसन्नता
प्रसन्न ह्रदय आत्म विश्वास जगाता
जिनमें प्रेम उनमें आदर भाव जागता
अतः बैर मिटाने प्रेम एक आवश्यकता

जहाँ प्रेम वहां रक्षक भाव भी होता
रक्षा हेतु आती एकता और वीरता
जिससे प्रेम उस पर यदि आता संकट
करुणा,त्याग भाव तब ह्रदय में आता

पवित्रता ,मधुरता,विश्वास , प्रसन्नता
रक्षा , त्याग, करुणा ,एकता और वीरता
जहाँ प्रेम वहां सब अस्तित्व में होते
प्रेम मूल मन्त्र सुखी समाज लिए होता

बहु प्रचारित किया अर्थ आज प्रेम का
प्रेम को जकड़ा सीमित अर्थ में
जब जगती वासना किसी साथ में
उसे बताया जाता प्रेम उनके बीच में

वासना फिसलती वह अति चंचल होती
अतः कई साथ छल करने का कारण होती
प्रेम भाव और प्रेम शब्द अति पावन होता
पर वासना ,छल में छद्म प्रेम बताया होता

प्रेम मिटाता शत्रुता पर बना अब कारण बैर का
मिटाता बैर ,वह प्रेम भारतीय होता
पाश्चात्य प्रभाव से प्रेम छद्म हो लाता बैर
राजेश चाहे उपाय भारतीय प्रेम प्रसार का                                                   

Monday, November 26, 2012

क्षमता सच्चे नायक पहचान की खोते


क्षमता सच्चे नायक पहचान की खोते 

------------------------------------------------

कौन माता-पिता ऐसे जो संतान से कहते 
ज्यादा धन अर्जन के पीछे न पड़िये
स्वच्छ मार्ग और मेहनत से आ जाये 
उस धन से मित व्ययी हो यापन करिये

यदा कदा जहाँ संस्कार ये दिए जा रहे 
वहां बाहर के वातावरण प्रभाव दिखा रहे 
संतान द्वन्द भ्रम भंवर में पड़ रही
क्योंकि लक्ष्य आडम्बर रख भागते सब दिखते


जिनके भव्य गाड़ी , परिधान और बंगले
अहम् जिनके उपलब्धि कारण बड़े हैं
अहम् और आडम्बर को प्रभाव में ले वे
बाध्य ,मासूमों से बहु शारीरिक सम्बन्ध बनाते

आधुनिक माध्यम यह जीवन सफल बताते
युवा उन्हें आज आदर्श व नायक मानते
फिर प्रयास उसी पथ चलने का करते
क्षमता सच्चे नायक पहचान की खोते

दौड़ ,भाग ,चिंता और तनाव में उलझते
उर्जा बचती नहीं विवेक जगा समझते
संक्षिप्त मार्ग धन अर्जन को तलाशते
भौतिक सामग्रियां एक एक कर जुटाते

वही शिक्षा -संस्कार अपने बच्चों को देते
सम्पति जो स्वयं बनाने में असमर्थ रहते
महत्वाकांक्षा इस अधूरी को उन पर डालते
स्वयं और बच्चों को भोगवादी बना डालते

तीस चालीस वर्ष में ही रोग उन्हें आ घेरते
व्यस्तता ऊपर उपचार हेतु समय कारण से
समय कमी माँ-पिता प्रति कर्तव्य निभाने
न रही अच्छी संतान अब गूँज सब दिशा में

चेताया था वैयक्तिक भोगवाद एक विषधारा
कर रचना पचास वर्ष पूर्व राष्ट्र-कवि ने सबको
'राजेश' करते हुए यह उल्लेख दाद नहीं चाहे
समस्या उन्मूलन हेतु विवेक विचार मात्र चाहे

Saturday, November 24, 2012

'राजेश' का आव्हान 'सरोवर'


'राजेश' का आव्हान 'सरोवर'
-------------------------------

रचते स्वयं वे साहित्य पुष्प हैं 
सजाने एक साहित्य सरोवर को 
पर जब लगाते पुष्प गुच्छ हैं 
वे चुनते अन्य रचित पुष्प हैं 

उनकी भावना उतनी ही पावन
गई थी लिखी अभिलाषा पुष्प की
मुझे तोडना वनमाली तुम और
करना समर्पित मातृभूमि वीर को   

भावना से सजता साहित्य सरोवर
वह उत्कृष्ट और अनुकरणीय होती 
साहित्यकार दे निस्वार्थ योग अपना 
रूप देते निर्मल साहित्य सरोवर का 

ऐसे भाव यदि रखें अन्य भी
अपने अपने कार्यक्षेत्र में 
स्वार्थ रहित कुछ योगदान से
प्रेरणा मिले यदि आज युवा को 

समवेत प्रयास से कुछ साहसी के
तब बनेगे कुछ चिकित्सा सरोवर
न्यायालय निर्मल न्याय सरोवर
होंगे सब धर्मालय ,धर्म सरोवर  

बनेगे कई निर्मल ज्ञान सरोवर
होगा निर्मल एक समाज सरोवर 
कहलायेगा पवित्र राष्ट्र सरोवर 
प्रेरित होगा सम्पूर्ण विश्व सरोवर 

चलें पथ निर्मित करने सरोवर
करें सार्थक यह मनुष्य जीवन 
पछतावा मौत सम्मुख हमें ना 
क्योंकि होंगे पूरे दायित्व हमारे 

'राजेश' का आव्हान 'सरोवर'
निर्मित करें अपने कार्यक्षेत्र में  
सबके कार्य अति महत्वपूर्ण है
संपन्न यदि हो पूर्ण न्याय से  




पाश्चात्य प्रभाव में खोया अर्थ

पाश्चात्य प्रभाव में खोया अर्थ
-------------------------------------

पाश्चात्य प्रभाव में खोया अर्थ
प्यार के किस्से जो हुए आम
प्यार शब्द मनो-विकृति पर्याय
प्यार नाम से नित नए धोखे

इस धोखे से कई हो प्रभावित
क्षमता होती जब उच्च जीवन

युवा जाते हैं अवसाद में तब
मै ना करूँ शब्द प्यार उपयोग

जहाँ होता था भाव त्याग का
जहाँ होता था निस्वार्थ लाड़
मै सबसे रखता लाड़ हूँ अतः
नहीं कहूंगा करता प्यार आपसे

असमय मौत नहीं कोई समाधान है

असमय मौत नहीं कोई समाधान है
---------------------------------------------

किसी मौत पर उत्सव नहीं उचित
मौत मिटाती आशा परिजन ह्रदय की
जिन बुराईयों के होने से किसी की
हमें लगती मौत उत्सव सी उसकी

सब की हो कामना ऐसी ख़त्म उसमें
हों बुराइयाँ जीवन में मौत के पहले ही
...

साथ ही प्रयास निर्मूल वे कारण हों
जिनसे उपजती बुराई ऐसी किसी में

यद्यपि दिखती बुराई मनुष्य छोटे में
जबकि यह असफलता समाज पूरे की
बढ़ने के पहले बुराइयाँ इस सीमा तक
क्यों ना मिलती प्रेरणा पहले रोक की

असमय मौत नहीं कोई समाधान है
उचित करना और प्रेरणा दे सकना
सब का जीवन लक्ष्य हो ,समाधान है
करें साहस नष्ट बुराई विष बीज हों

"कहते ज्ञान खोल देता चक्षु"

 "कहते ज्ञान खोल देता चक्षु"

-------------------------------
छीन के कुछ किसी से कोई
कितने दिन सम्हाल रख पायेगा
या जो नहीं छीना भी किसी ने
कितने दिन कोई सम्हाल पायेगा

बारी जाने की तो बिना छीने
किसी के स्वयं छिन जायेगा
कैसा अंधत्व दिखता रोज पर
होता नहीं स्पष्ट यह सच हमें है

धन लोलुपता में प्राण ले लिए
अमर है क्या? जो धन को इस
अपने पास बचा रख पायेगा
छोड़ यहीं स्वयं वहीँ चला जायेगा

कहते ज्ञान खोल देता चक्षु ऐसे
भेद उचित अनुचित बीच में होवे
और कहते ज्ञान अर्जित कर रहे
आज लोग अपेक्षा पहले से ज्यादा

फिर आज का ज्ञान है ये कैसा ?
उठती दीवार गृह बीच भाइयों में देखी
न मिली खुदाई मोहन जोदड़ों में ऐसी
हीन? विकसित या वह सभ्यता बोलो..