Saturday, September 11, 2021

सीजन 2 - मेरे पापा (10)…

 

सीजन 2 - मेरे पापा (10)…

गर्भ में आते ही, हमारे शिशु को लेकर हमने सपना देखना आरंभ कर दिया था। रात्रि सुशांत मुझसे कह रहे थे - रमणीक, कुलज्योत या कुलदीपक, हमारे संकीर्ण विचारों के द्योतक शब्द हैं। 

आशय नहीं समझकर मैंने पूछा - संकीर्णता! कैसे?

सुशांत ने कहा - हमारे देश में करोड़ों कुल परिवार हैं। ये सब अपने अपने कुल के चिंतन तक सीमित हैं। फिर भी कोई कुलज्योत या कुलदीपक, अपनी चार पाँच पीढ़ी पहले के पूर्वजों का नाम तक नहीं जानते हैं। हम अपनी ही ले लें, हमें ही पता नहीं कि हम, ज्योति और दीपक होकर किनके कुल को प्रकाशमान् कर रहे हैं। 

मुझे अब इनके कहने का आशय समझ आया था। मैंने पूछा - जी, तो इसे लेकर हमारा वृहत् (Broad) चिंतन क्या होना चाहिए? 

सुशांत ने उत्तर दिया - 

यह सरल है। हमें अपने बच्चे के राष्ट्रज्योति और/या राष्ट्रदीपक बनने की कामना करनी चाहिए। आज देश में करोड़ों परिवार के कुलज्योत और कुलदीपक हैं मगर ये हम, अपेक्षित सुखद समाज परिवेश देने में सफल नहीं हुए हैं। माँ या पिता बनते हुए हमें, अपने बच्चे के ‘कुल-’ नहीं ‘राष्ट्र-’ ‘ज्योति’ या ‘दीपक” होने की कामना करनी चाहिए। इससे और इसे हेतु किए प्रयास से, हमारे बच्चे, परिवार को ही नहीं अपितु भारत राष्ट्र को अपना देखने की दृष्टि पाते हैं। ऐसे संस्कारित बच्चे ही, अपने भारत को एक सुखद परिवेश देने की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। तब ही हमारी पीढ़ियों को, सुखद परिवेश में जीवन अवसर मिलने पर भारतीय होने में, सच्चा गर्व बोध का अनुभव मिल सकता है। 

यह सुनकर मैं चकित हुई, सुशांत को देखने लगी थी। मैं सोच रही थी कि स्वयं किसी राष्ट्रदीपक में ही ऐसे विचार हो सकते हैं। तब मुझे, अपने को देखता पाकर, सुशांत ने प्यार से, अपनी ओर खींच लिया था। 

एक सप्ताह बाद, सुशांत ने मुझे दिल्ली की ट्रेन में बैठाया था। इनसे जुदा होना मुझे उदास तो कर रहा था मगर साथ ही डेढ़ माह बाद, पापा-मम्मी जी से मिलने की कल्पना मुझे रोमांचित कर रही थी। मैं सोच रही थी कि जब मैं, दोनों को बताऊंगी कि आप दादा-दादी बनने जा रहे हैं तो वे कितने प्रसन्न होंगें। 

यात्रा में अन्य यात्रियों की तरफ से उदासीन, मैं अपनी कल्पनाओं एवं विचारों के साथ, अपना चाहा एकांत पा रही थी। मैं, गर्भ में शिशु, पुत्र या पुत्री है इस सोच में खोई-सोई रही थी। मेरी झपकी (Nap), सहयात्रियों के स्टेशन पर उतरने की हलचल से टूटी थी। मैंने स्वयं को अपने गंतव्य पर पाया था। कोच में आए कुली को मैंने, ट्रॉली बेग और पिटठू बेग लेने के लिए कहा था। मैं ट्रेन से उतर कर, मुझे लेने आए, पापा के साथ होकर निश्चिंत हुई, कार में बैठ, घर की ओर चल पड़ी थी। मैं सोच रही थी कि - जब मैं गई थी तब एकल जीव थी और आज लौटी हूँ तब, अपने गर्भस्थ जीव सहित दो हो गई हूँ। 

सुशांत या मैंने, अब तक पापा, मम्मी जी को इस बारे में नहीं बताया था। मैं सोच रही थी कि जब दोनों को, मैं यह शुभ समाचार दूँगी तो इनकी प्रतिक्रिया क्या होगी। 

घर पहुँच कर, आशीर्वचनों की अभिलाषा में, मैंने दोनों के बारी बारी चरण स्पर्श किए थे। जब दोनों ने मुझे आशीर्वाद दिए तब मैंने, अपने पेट की ओर आँखों से संकेत करते हुए कहा - 

पापा-मम्मी जी, अब आप दोनों इसे भी आशीष दीजिए। 

यह देखते-सुनते हुए दोनों के मुख पर अभूतपूर्व प्रसन्नता, मैंने देखी थी। पापा ने मुझे अपने कंधे लगाया तो, मम्मी जी भी हमारे साथ मिल गई थीं। मम्मी जी ने कहा - 

स्वागतम् स्वागतम्! कुल रोशन करने वाले इस शिशु का, अपने गृह आगमन पर हार्दिक स्वागत!    

मैंने लजाते हुए कहा - पापा, सुशांत कहते हैं, गर्भ में आया यह जीव, राष्ट्रदीप या राष्ट्रज्योत होनी चाहिए। 

पापा ने कहा - तथास्तु! मम्मी जी ने भी यही कहा - तथास्तु!

हम सब अत्यंत प्रसन्न हो रहे थे। मैं, पापा-मम्मी जी से जो आशीष अपने शिशु के लिए चाहती थी वह मिल चुका था। 

मुझे दिल्ली लौटे, जब तीन दिन हुए थे तब समाचार मिला कि दीदी को बेटी हुई है। इस नवलक्ष्मी ने, नववर्ष आने की प्रतीक्षा नहीं करके, तीन दिन पहले ही जन्म ले लिया था। मैंने, मेरी मम्मी से बात करके, उन्हें नानी होने की बधाई दी थी। तब मुझे, मम्मी के स्वर में उदासी अनुभव हुई थी। उन्होंने कहा - 

हाँ निकी, सब खुश हैं। मैं और भी अधिक खुश होती, अगर तुम्हारी दीदी को पुत्ररत्न की प्राप्ति होती। 

मैंने कहा - मम्मी, ऐसे न सोचो। काल परिवर्तन के साथ पुत्र या पुत्री का होना पेरेंट्स के लिए अब एक जैसी उपलब्धि हो गई है। 

मम्मी ने कहा - रमणीक, तुम दोनों मेरी बेटियाँ जन्मी थीं। कम ही साथ रहकर तुम्हारे पापा, चले गए थे। अकेले हो जाने पर, तुम दोनों के दायित्व मुझे कठिन लगे थे। सोचती थी कि तुम दोनों में एक, मेरा बेटा होता तो मुझे कम कठिनाई होती। इसी कारण, तुम्हारी दीदी को बेटे की प्राप्ति की हो, मेरी ऐसी अभिलाषा थी। 

तब मैंने, मम्मी से कुछ नहीं कहा था। खुद सोचने लगी थी कि कदाचित, मम्मी की सोच को गलत कहना उचित नहीं होगा। इस की अपेक्षा, उन समाज मान्यताओं और परिवेश को मेरा गलत कहना उचित होगा, जिसमें एक लड़की परिवार के कर्तव्य निर्वहन यथा - शिक्षा पाने, आजीविका अर्जन और कहीं भी बाहर आने जाने, में किसी लड़के की अपेक्षा अधिक, असुरक्षा और चुनौती अनुभव करती है। 

अच्छे बुरे की परख की, नारी के लिए पुरुष से अलग एक कसौटी होना अन्यायपूर्ण होता है। मैं संशय में थी कि, यद्यपि परिवर्तन आरंभ हुआ है मगर कितने और दशक लगेंगे जब एक ही कसौटी पर दोनों की परख की जाने लगेगी। और तब लड़की (नारी) और लड़के (पुरुष) के लिए जीवन में समान अवसर उपलब्ध हुआ करेंगे। 

कुछ दिनों बाद दीदी के घर जाने का प्रश्न उपस्थित हुआ था। अब तक पापा और मम्मी जी, मेरी अवस्था के प्रति अधिक सजग हो गए थे। दोनों ने तय किया कि रमणीक के लिए, अभी कार में लंबी यात्रा ठीक नहीं है। अतः रमणीक घर पर ही रहेगी और वे दोनों दीदी के घर जाएंगे। 

जिस दिन वे दीदी के घर जाने के लिए निकले थे, मैं दो विचार से उदास थी। मैं दीदी की नन्हीं बेटी को गोद लेकर, अपनी आने वाली संभावित बेटी के स्पर्श को अनुभव करना चाहती थी। 

मेरे मन में दूसरा विचार यह चल रहा था कि काश! मैं, दीदी से मिलकर बता पाती कि अब मैं भी माँ होने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी हूँ। यह जानने के बाद दीदी, मुझे मेरे पतिदेव का नाम लेकर अत्यंत प्रिय लगते उलहाने देकर चिढ़ाती। तब चिढ़ना दिखाती हुई मैं उसमें आनंद लेती। मैं पहले प्रत्यक्षतः लजाना दिखा कर मुख पर लाज की वह गुलाबी रंगत लाती जिसे सुशांत, नारी का श्रृंगार कहते हैं। फिर दीदी को निर्लज्जता से बताती कि (अधूरी) मैं इनके साथ से ही पूर्ण होती हूँ। यह कहने के बाद पुनः - ‘लाज, नारी का आभूषण होता है’ अपने मुख पर कृत्रिम भावों को प्रकट करके यह चरितार्थ करती। 

दिन व्यतीत होने लगे थे। तब कोरोना वैक्सीन, देश में सफलता से निर्मित की जाकर वरिष्ठ नागरिकों को लगाए जाने लगी थी। भारत ने मानवता के प्रति मैत्री भाव का पुनः परिचय देते हुए, यह वैक्सीन कई देशों को वायुसेना विमानों से पहुँचाई थी। सुशांत ने भी इस पावन कार्य में हिस्सा लेने का सौभाग्य पाया था। 

मेरे गर्भ के 12 सप्ताह होने पर सोनोग्राफी के माध्यम से, गर्भ की स्थिति की जाँच हुई थी। जिसमें सब सामान्य पता चलना सुखद था। फिर कुछ दिन और बीते थे। तब एक दिन सुशांत आए थे। 

मैंने इनसे कहा कि मेरा वजन असामान्य तेजी से बढ़ रहा है। सुशांत मुझे डॉक्टर के पास ले गए थे। सोनोग्राफी फिर से की गई थी। परीक्षण के बाद डॉक्टर ने मुझसे अलग, सुशांत को बात करने बुलाया था। मुझे आशंका हुई कि कोई चिंता वाली बात तो नहीं! मैं सोच में डूबी थी। तब सुशांत आए थे। उनका, मुझे देख कर मंद मंद मुस्कुराना, मुझे भेदपूर्ण लगा था। मैंने तीव्र जिज्ञासा में पूछा - 

सुशांत, क्या बात है? आप ऐसे मुझे क्यों देख रहे हो?

सुशांत ने बनावटी दुःख जताते हुए कहा - ये लो! बच्चे के गर्भ में आते ही, मुझ पर अपनी प्रिय पत्नी को निहारने तक की पाबंदी लग गई। 

मुझे डॉक्टर के कहे की सुनने की उतावली हो रही थी। सुशांत के किए परिहास में मुझे हँसी नहीं आई थी। मैंने कहा - जी, मुझे परेशान न कीजिए, सीधी बात बताईये। 

सुशांत ने बताया - निकी, हमारे दो बच्चे साथ आने वाले हैं। बाकी सब सामान्य है। 

सुनकर मुझे समझ नहीं आया था कि मैं हँसू या रोऊँ! जो हजारों में एक के साथ होता है, वह मेरे साथ होता आया था। सुशांत जैसे श्रेष्ठतम पति और जुड़वाँ बच्चों का होना हजारों में से एक के साथ होता है। 

फिर कोरोना की दूसरी लहर अत्यंत घातक रूप लेकर आई थी। पूरे देश में ऑक्सीजन और दवाओं को लेकर हाहाकार मच गया था। यहाँ देश की वायुसेना ने भूमिका ग्रहण की थी। वायुसेना के विमान, ऑक्सीजन और दवाएं देश के विभिन्न हिस्से में पहुँचा रहे थे। सुशांत फिर, इस पावन कार्य में भी सक्रिय रहे थे। 

जब कोरोना लहर नियंत्रित की जा सकी तब तक मेरे पाँच माह पूरे हुए थे। मेरा  वजन 9 किलो बढ़ गया था। अब गर्भ का आकार मेरे लिए कष्टदायक हो गया था। ऑफिस से, मैंने मातृत्व अवकाश ले लिया था। पापा-मम्मी जी, सब मेरी देखरेख में लगे रहते थे। सुशांत भी, बार बार घर आ-जा रहे थे। कष्टदायी इन दिनों में भी मैं, अपने दो बच्चों के आँचल में आने की कल्पना से रोमाँचित होती थी। प्रायः सोचा करती - क्या हमारे, दोनों बेटियाँ होंगी या दोनों बेटे होंगें या एक बेटी और एक बेटा होगा। 

मैं सोचती बेटी या बेटियाँ हुईं तो मैं, उन्हें अपनी दीदी जैसी बनाऊंगी। जो गलत रास्ते पर बढ़ते, अपने पति, भाई या पिता को अपनी सूझबूझ, तर्क और व्यवहार से रोककर, उन्हें सही रास्ते पर लाने में समर्थ होती हैं। 

अगर बेटा या बेटे हुए तो निश्चित ही उन्हें मैं, सुशांत जैसा बनाऊंगी। जो पेरेंट्स के अच्छे बेटे, राष्ट्र के सपूत, समाज की बेटियों के भ्राता और अपनी पत्नी के लिए योग्यतम पति होते हैं। 

मैं सोचती कि क्या! अपने पापा को जल्दी खो देने पर भी मेरा यह जीवन इतना प्रिय हो सकता था। मुझे लगता कि कदापि प्रिय नहीं होता यदि मुझे पुनः ये ‘मेरे पापा’ और सुशांत जैसे वीर और विशुद्ध पुरुष, पतिदेव रूप में ना मिले होते। 

एक दिन जब सुशांत आए तो मैंने उनसे कहा - जी सुनिए, एक साथ दो बच्चों के लालन पालन के लिए मैं अपना यह जॉब छोड़ दूंगी। अब मैं वह जॉब करुँगी जिसमें आपकी पोस्टिंग जहाँ जहाँ होगी, वहाँ वहाँ मेरा ट्रांसफर हो सके। 

सुशांत ने कहा - ऐसी नौकरियों में आपका, आज जितना पैकेज संभव नहीं होगा। 

मैंने कहा - 

ना हो, मुझे चिंता नहीं। मुझे आपका साथ और प्यार की पूर्ति सर्वप्रथम सुनिश्चित करनी है। हमारे बच्चों के आने पर, आपका समय और प्यार उनमें भी बट जाएगा। ऐसे में मेरे लिए आज जितना समय और प्यार आपसे पाना, आपके साथ रहने पर ही सुनिश्चित हो पाएगा। 

सुशांत परिहास के कोई अवसर नहीं चूकते हैं। उन्होंने तुरंत कहा - 

ये लो, इन देवी जो को मेरे द्वारा, अपने बच्चों के लिए प्यार और समय देने की कल्पना भी सताने लग गई है। 

मैंने तुनक कर कहा - जी आप, मुझे ऐसे ना सताओ। मैंने उनके लिए प्यार और समय देने को अनुचित नहीं कहा है। मैंने तो मुझ पुजारन के लिए, अपने (पति)देव के वरदान की निरंतरता की बात कही है। 

सुशांत ने अब गंभीर होकर कहा - 

निकी, मेरी नौकरी को कभी कुछ हुआ तो आपकी कमाई का कम हो जाना कभी हमारे परिवार के लिए अपर्याप्त न हो जाए। यह तो हमारे लिए ‘विकेट छोड़ कर क्रिकेट खेलना’ जैसा हो जाएगा। 

मैंने इनकी अनकही बात को समझा था। स्पष्ट था कि वे राष्ट्र के लिए अपने अल्पजीवन में, बलिदान की आशंका में ऐसा कह रहे थे। अपने अंदर हो रही इस बात की असहनीय वेदना, मैंने मुख पर प्रकट नहीं होने दी थी। मैंने दृढ़ता से कहा - 

जी, परिस्थिति होने पर कभी कभी ‘विकेट छोड़ कर क्रिकेट खेलना’ होता है। मेरे लिए सर्वाधिक जरूरी आपका साथ और प्यार है। मैं यह जॉब निश्चित ही छोडूंगी। 

अंततः मेरा वजन 15 किलो बढ़ गया था। अपनी हर गतिविधि में सावधानी रखना, मेरे लिए असुविधा की इस स्थिति को और असुविधाजनक कर देता था। 

फिर स्वतंत्रता दिवस आया था। प्रसव एक दो दिन में संभावित लग रहा था। मैं फॉल्स लेबर पेन सहन कर रही थी कि प्रसव में सी-सेक्शन न करना पड़े। 

इस बीच अफगानिस्तान में सत्ता का उलट फेर हुआ था। जिसमें सत्ता, तालिबान के हाथों आ जाने वाला समाचार आया था। यह बात विशेषकर अफगानिस्तानी औरतों के लिए और हमारे देश पर आतंकी खतरे बढ़ने की संभावना वाली थी। 

देश पर संकट बढ़ने से, सुशांत की ड्यूटी पुनः खतरनाक हो जाएगी। इस आशंका ने, मेरे साहस और आत्मविश्वास को डिगा दिया था। मैं लेबर पेन सहन नहीं कर पाई थी। 

मैं, जो नहीं चाहती थी, उस सी-सेक्शन से मेरे बच्चों ने जन्म लिया था। एक बेटी और एक बेटा, एक साथ दो नए, नन्हें सदस्यों का हमारे परिवार में पदार्पण हुआ था। मेरा कष्ट बोध, मेरे पापा, दोनों मम्मियों और सुशांत के मुख पर छाई असीम प्रसन्नता से कम हो रहा था। मैं इन सबके साथ, अपने नन्हें शिशुओं को दुलार भरी दृष्टि से देख रही थी। क्या होता है माँ होना, अब मुझे बहुत कुछ समझ आ गया था। 

जब सुशांत अकेले में मेरे सामने थे तब, डिंपल चीमा के जीवन का स्मरण करते हुए मैंने कहा - 

अब आप सहित, ‘आपके अंश’ भी मेरे जीवन में साथ हो गए हैं। 

इन्हें पता नहीं था कि मैं किस भाव वशीभूत, ‘इनके अंश’ हमारे बच्चों के साथ होने पर जोर दे रही थी। 

इस बात से अनजान इन्होंने आत्मविश्वास से कहा - निकी, यह तो होना ही था। 

मैंने इन पर और पास सो रहे बच्चों के मुख पर बारी बारी से प्यार-दुलार की निगाह की थी। तब निद्रा मुझ पर हावी होने लगी थी। उनींदी में, मैं मुस्कुराते हुए कल्पना करने लगी थी कि ये दोनों बच्चे थोड़े बड़े होने पर कैसे इन पर - 

‘मेरे पापा’ - ‘मेरे पापा’ बोलकर, अपना अपना अधिकार जताएंगे ....              

(समाप्त)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

11-09-2021

Thursday, September 9, 2021

सीजन 2 - मेरे पापा (9)…

 

सीजन 2 - मेरे पापा (9)…

स्वर्ण जयंती शताब्दी एक्सप्रेस से सुबह 7.20 बजे, मैं अंबाला के लिए चल पड़ी थी। मैं अनेक बार किसी किसी गंतव्य के लिए चलती रही थी, मगर आज का मेरा गंतव्य विशेष था। आज मैं उस गंतव्य पर पहुंचने वाली थी, जहाँ मेरी आत्मा पहले ही पहुँची हुई थी (मेरी आत्मा तो मेरे पतिदेव से बंधी हुई थी) और अब 150 मिनट बाद मेरे शरीर को वहाँ पहुंचना था। 

आसपास अन्य यात्रियों की तरफ मेरा ध्यान नहीं था। आरंभ में, मेरा ध्यान सुशांत को साथ लेकर मधुर कल्पनाओं में रहा था। फिर अनायास ही मुझे परमवीर बलिदानी, विक्रम बत्रा की प्रेयसी डिंपल याद आ गईं थीं। विक्रम के जाने के बाद जिन्होंने, स्वयं को उनकी पत्नी मानकर जिया था। वे स्वयं को अन्य किसी से जोड़ नहीं सकीं थीं। मैं सोच रही थी ऐसे में यदि विक्रम से, उनके बच्चे होते तो डिंपल के लिए कितना अच्छा होता। डिंपल के पास एक लक्ष्य होता कि वे परमवीर विक्रम जैसा ही उन्हें भी बनाती और इस तरह से विक्रम तो नहीं मगर विक्रम के अंश साक्षात, जीवन भर उनके साथ होते। 

यह कल्पना किसी भी युवती के लिए भीषण वेदनादायी होती है कि उसके पति, उसे छोड़ अनंत में विलीन हो सकते हैं। डिंपल पर दुखद बीती के स्मरण से, वेदनाकारी यह आशंका मुझे भी होती थी। सुशांत के बच्चे की माँ हो जाने की उतावली मुझे इसलिए रहती थी। इस कटुतम कल्पना में रहते हुए मैं, आज यथार्थ उस गंतव्य पर पहुँचने वाली थी जिसमें सुशांत का साथ मुझे मिलना था। साथ ही मुझे यह भी सुनिश्चित लग रहा था कि इस बार के साथ में, उनका अंश मेरे गर्भ में आ जाने वाला है। 

लगभग अढ़ाई घंटे की यात्रा में रही मेरी इस तंद्रा में, तीन बार सुशांत के ही कॉल से व्यवधान पड़ा था। अंततः ट्रेन अंबाला कैंट स्टेशन पर आ खड़ी हुई थी। 

मेरे कोच के बाहर ही वायुसेना की वेशभूषा में सुशांत दिखाई दिए थे। इन्हें देख मुझे संशय हुआ कि पहले कभी मैंने, इनका इतना अधिक आर्कषक रूप देखा है या नहीं। प्लेटफार्म पर उतरते हुए मेरा मन हुआ था कि मैं इनकी बाँहों में यूँ समा जाऊं, इनके अधरों पर यूँ चुंबन अंकित कर दूँ, ज्यूँ पश्चिमी जोड़ों में खुलेआम देखा जाता है। 

अपनी संस्कृति के स्मरण आ जाने से, मैंने अपनी भावनाओं को नियंत्रण किया था। मैंने अपना ट्राली बेग हैंडल, इनके हाथ में थमाया था। अपने कंधे पर टँगे बेग को व्यवस्थित किया था। फिर शालीनता से मैं, इनके कंधे से लग गई थी। इन्होंने, मुझे एक हाथ से हल्का सा अपनी ओर दबाया था। इस प्रेम भाव से हुए मिलन में मैंने इनके स्पर्श और इनके शरीर की गंध को अपने में रचाते - बसाते हुए परम सुख अनुभव किया था। 

फिर साथ हम प्लेटफॉर्म के बाहर आए थे। मैं, इनके साथ सामने खड़ी कार में पहुँची थी। मेरा सामान इन्होंने कार में रखा था। तब मैं इनके साथ साइड सीट पर बैठकर, हमारे प्रेम बसेरे की ओर चल पड़ी थी। 

सुशांत, ऑफिस से स्टेशन, मुझे घर तक छोड़ने के लिए आए थे। इन्होंने मुझे घर में अंदर छोड़ा फिर कहा - 

रमणीक, तुम खुद ही यहाँ की व्यवस्था समझना, मुझे ड्यूटी पर जल्दी पहुँचना है। मैं शाम को जल्दी आने की कोशिश करूंगा। 

कहते हुए इन्होंने मुझे अपने सीने से लगाकर हल्के से दबाया था। मैं इनसे ऐसे ही लगा रहना चाह रही थी मगर इन्होंने, मेरी दोनों पलकों को हल्के से चूमा था, फिर मुझे छोड़कर, बाय कहते हुए चले गए थे। 

मैंने निरीक्षण किया तो घर व्यवस्थित लगा था। तब डोरबेल बज उठी थी, खोला तो दरवाजे पर कुक था। शायद उसे, सुशांत ने मेरे बारे में बता दिया था। वह अभिवादन करके किचन में जाकर काम करने लगा था। फिर से दरवाजे पर कोई आया जानकर जब मैंने दरवाजा खोला तो इस बार एक साफ सुथरी, अधेड़ महिला मीरा थी। घर की साफ़ सफाई, बर्तन इनके जिम्मे था। महिला होने से ये, कुक जितनी शांत नहीं थी। मीरा, मुझसे कुछ कुछ कहते, पूछते हुए काम कर रही थी। मैं उसकी जिज्ञासा पर उत्तर देते रही थी। कुक काम करने के बाद, टिफिन लेकर जाते हुए बता गया कि वह, सुशांत के लिए टिफिन, ऑफिस गॉर्ड को देता जाएगा। उसने यह भी बताया कि आज वह, देर से आया है अन्यथा वह जल्दी आता है और सुशांत स्वयं अपना टिफिन ले जाते हैं।

ऐसे आने के बाद के दो घंटे में, मैंने यहाँ की सब व्यवस्था समझ ली थी। अब मेरे पास समय था। मैं वर्क फ्रॉम होम, माध्यम से अपनी ऑफिस की जिम्मेदारी निभाने लगी थी। संध्या के समय सुशांत आ गए थे। फिर रात्रि से अगली सुबह तक का पूरा समय नितांत हमारा था। 

अगले दिन से हमारी यही दिनचर्या बन गई थी। हम लव बर्ड्स की तरह अपने बसेरे में प्रेम से रह रहे थे। 

ओवुलेशन के लिए पिछले दो मासिक चक्र के अपने प्रयोग एवं अध्ययन से मुझे अंबाला आने के पाँचवे दिन ओवुलेशन संभावित लगा था। उस दिन से अगले पाँच दिन मैं, पतिदेव से कुछ कहे बिना, विशेष रूप से सजग-सावधान रही थी। 

ये दिन मेरे चाहे अनुसार बीतने के बाद मेरी जिज्ञासा, बच्चों को लेकर सुशांत उपयुक्त समय क्या मानते हैं, यह जानने की हुई थी। मैंने उस रात इनसे, इस विषय की चर्चा छेड़ते हुए पूछा - जी, क्या, अब हमें अपनी सयुंक्त अनुकृति संसार में लाने की सोचना नहीं चाहिए?

सुशांत ने ‘अनुकृति’ प्रयुक्त शब्द से हमारे बच्चे वाला, मेरा आशय समझ लिया था। वे हँसते हुए बोले - 

निकी, इसमें सोचने वाली कोई बात कहाँ है। हम जब भी मिलकर साथ रहे हैं, हमने कोई साधन प्रयोग किया ही नहीं है। इससे स्वतः स्पष्ट है कि हम दोनों में परस्पर सहमति रही है। सहज ही हमारी अनुकृति का जन्म, जब ईश्वर चाहे हम तैयार हैं। 

मैं लजा गई थी। मुझे समझ आ गया था, मेरे पतिदेव भोले नहीं हैं। चूँकि मैंने कभी (साधन प्रयोग की) अन्यथा कोई बात नहीं कही थी। अतएव इन्होंने भाँप लिया था कि मैं, हमारी संतति शीघ्र संसार में लाने की इच्छुक थी।

मैंने फिर कुछ नहीं कहा था। अपना चोर भाव, पकड़े जाने की शर्मिंदगी छुपाने के लिए मैंने, अपना चेहरा इनके सीने से सटा दिया था। सुशांत, कभी हास्य के लिए किसी कमजोरी का लक्ष्य नहीं करते हैं। तब भी विनोदी स्वभाव अनुरूप उन्होंने मुझे छेड़ते हुए कहा था - 

अब और नहीं बाबा! मुझे कल ऑफिस ड्यूटी के लिए भी तो अपनी शक्ति बचाए रखनी है।  

मैंने लजाते हुए कहा - कुछ भी! मैंने ‘और के लिए’ कब कहा है। 

सुशांत ने कहा - निकी, क्या मुख से निकली वाणी ही कुछ कह सकती है? तुम्हारा स्पर्श भी तो मुझसे कुछ कुछ कहता लगता है। 

मैंने कहा - फिर तो आप इस स्पर्श के भाव समझने में भूल कर गए हैं, पतिदेव जी!

इन्होंने तब प्यार से कहा - हो सकता है। मैं, इस शारीरिक हाव-भाव की भाषा (body language) का विशेषज्ञ नहीं हूँ। 

फिर हम सोने की चेष्टा करने लगे थे। सुशांत यह नहीं जानते थे कि उनसे गोपनीय रखते हुए मैंने अपना मंतव्य सिद्ध कर लिया था। जिसकी सफलता-असफलता का परिणाम लगभग पच्चीस दिनों में पता होने वाला था। यह सुखद बात थी कि तब तक मुझे, इनके साथ रहने का अवसर मिलने वाला था। 

ड्यूटी, सुशांत की और वर्क फ्रॉम होम से मेरी भी, चलती जा रही थी। सुखद दिन व्यतीत हो रहे थे। फिर जब समय पर, मेरे पीरिएड्स नहीं आया, तब मुझे आशा बँध गई कि अब शायद मुझे अपने मंतव्य में सफलता मिल गई है। उचित प्रतीत हो रहे दिन, मैंने सुशांत से कहा - जी सुनिए, ड्यूटी से लौटते हुए आप, प्रेगनेंसी टेस्ट किट लेते आइएगा। 

इन्होंने मुझे अपने आलिंगन में लिया और कहा - लगता है आपकी खुशी के माध्यम से मुझे खुशी मिलने वाली है। 

मैंने ओंठों पर प्यार भरी मुस्कान बिखेर कर, मौन उत्तर दिया था। तब ये ऑफिस चले गए थे। 

रात्रि, मैं सोने के ठीक पहले सोच रही थी कि प्रातःकाल बिना इन्हें डिस्टर्ब किए चुपचाप टेस्ट करूंगी। ताकि यदि टेस्ट नेगेटिव रहा तो मेरे मुख पर तुरंत संभावित उदासी और मेरी व्यथा के भाव, ये देख न पाएं। 

अगली सुबह, इस तय बात से विपरीत बात हुई थी। ये नितदिन से उलट, मुझसे पहले जाग गए थे। जब मैं वॉशरूम जाने को उठी तो ये भी मेरे साथ उठ गए। इन्होंने कहा - निकी, डोर खुला रहने दो। 

मैं ऐसा नहीं चाहती थी, मगर इनके कहने का विरोध मुझे कभी उचित नहीं लगता था। दो मिनट पीछे ये वॉशरूम में आए थे। तब तक लिया गया सैंपल, कार्ड पर मैं अप्लाई कर चुकी थी। इन्होंने मुझे अपने पास खींच कर मेरे कन्धों पर अपनी बाँह रख दी थी। मुझे इनके साथ होने से टेस्ट नेगटिव का भय भी लग रहा था मगर इनका साथ भा भी रहा था। हम दोनों निरंतर कार्ड पर टकटकी लगा कर देख रहे थे। तब कार्ड पर कंट्रोल एवं टेस्ट वाली दोनों लाइन उभर आईं थीं। अर्थात मेरी प्रेगनेंसी, पॉजिटिव आई थी। 

मैंने अपनी प्रसन्नता इनसे छुपाने के लिए, अपना चेहरा इनके सीने में छुपा लिया था। इन्होंने समझा कि मैं लजा रही हूँ। अपनी विनोदप्रियता अनुरूप इन्होंने मेरा मजा लेते हुए कहा - निकी, बात इस हद तक पहुँचने के बाद भी मुझसे लजा रही हो। क्या जीवन भर यूँ ही लजाती रहोगी, मुझसे!

मैंने अपना मुखड़ा उनके सीने पर रखे हुए ही बहाना करते हुए कहा - नहीं जी, अभी हमने दाँत ब्रश नहीं किए हैं। इसलिए मैं, आपसे छुप रही हूँ।

तब इन्होंने मेरे ऊपरी हिस्से पर दबाव बढ़ा कर, मुझे अपने सीने से भींचा फिर कहा - तो निकी आप, मेरी बधाई ऐसे लीजिए। 

मैंने भी उनकी नकल में ऐसा ही किया और कहा - जी आपको भी बधाई। 

मुझे इनकी खुशी का अनुमान तो नहीं था, मगर अपने नित्य कर्म करते हुए मैं अत्यधिक आनंदित थी। 

उसी दिन से, हमारे अंश से मेरे गर्भ में आया जीव भी, हमारी चर्चा में प्रमुख एवं प्रिय विषय हो गया था। 

उस रात्रि मैंने कहा - हमारी, कुलज्योति अब मेरे गर्भ में है। 

इन्होंने कहा - निकी, इतने विश्वास से कैसे कह रही हो, कुलदीपक भी तो हो सकता है। (फिर मुझे छेड़ने के लिए) ऐसा भी तो हो सकता है कुलज्योति और कुलदीपक दोनों एक साथ हों।

मैंने यह तो सोचा ही नहीं था। इनके कहने से जब मुझे यह कल्पना हुई तो मेरे हर्ष की सीमा नहीं रही। तब भी प्रत्यक्ष में, मैंने दिखावटी शिकायत के स्वर में इनसे कहा - 

चलो जी, आपको ऐसा कहते हुए मुझ पर दया नहीं आती! मैं कश्मीर की नाजुक सी कली, कैसे इतना सह पाऊँगी। 

सुशांत ने मुख पर समर्पण भाव लाते हुए कहा - निकी, चलो ठीक है, अपनी बात क्षमा सहित मैं वापस ले लेता हूँ। मगर मुझे यह तो बताओ कि आपने, गर्भ में अपनी कुलज्योति होने की घोषणा कैसे की है?

मैंने तब राज खोलते हुए इन्हें बताया - जिस सुबह मुझे अंबाला के लिए रवाना होना था, उसके दो रात पहले मुझे एक स्वप्न आया था। जिसमें मैंने देखा कि हमारी प्यारी छोटी सी एक बेटी है। वह आपको अपनी बाल सुलभ मधुर वाणी में कह रही है - 

‘मेरे पापा’ ….                     

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

09-09-2021

Tuesday, September 7, 2021

सीजन 2 - मेरे पापा (8)…

 

सीजन 2 - मेरे पापा (8)…

मैं, गर्भवती होना चाहती थी इस दृष्टि से अभी जो हुआ था वह, हमारा मिलन अधूरा था। इस मिलन को सुशांत भी अधूरा मानते होंगे, मुझे नहीं लगता था। मेरी जैसी, अपने बच्चे के लिए उतावली शायद उन्हें नहीं थी। मुझे इन दिनों लगता रहा था कि यह अच्छी बात है जो हम दूर थे। दूर होने से अन्तःकरण की भावनाओं का पति-पत्नी का आपस में अनकहे समझ पाना संभव नहीं होता है। जबकि साथ रहने पर पति-पत्नी, वाणी से कहे बिना भी एक दूसरे के हृदय में चलती भावनाओं को समझ लेते हैं। 

अतः मेरी भावनाओं से अनभिज्ञ, प्रायः अब सुशांत कॉल में की जातीं बातों में, एलएसी पर तनाव में अपनी राफेल फाइटर जेट की उड़ानों के बारे में, उत्साह से बताया करते थे। वे कहते कि इन उड़ानों को देखकर दुश्मनों के हौसलें पस्त होते हैं। मैं हँसकर कहती कि आपकी यही उड़ानें, कभी युद्ध में हुईं तो मेरी आँखों की नींद और मन की शांति उड़ा देंगी। सुशांत मृदुता से कहते - 

रमणीक, तुम्हारी नींद और शांति हमेशा बनी रहेगी। हमारा कोई दुश्मन, हमसे सीधा युद्ध करने की भूल नहीं करेगा। 

ऐसे, दिन व्यतीत हो रहे थे। कभी मैं सोचती कि अपने अपने पति को लेकर अन्य  नागरिकों की पत्नियाँ भी क्या, यूँ चिंता और तनावों में रहती होंगी जैसी मैं, एक सैनिक की पत्नी!

मेरा मन कहता - हाँ, चाहे कोई सेना में नहीं हो फिर भी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर आशंकित खतरे तो होते ही हैं। निश्चित ही सभी पत्नियां जो किसी भी कारण से कभी भी अपने पतिदेव से दूर रहतीं हैं, उन के मन में मेरे तरह की घबराहट तो होती ही होगी। तभी तो इतने व्रत उपवास वे, अपने पति के दीर्घायु होने के लिए करती हैं। 

इसी विचार श्रृंखला में मेरे मन में प्रश्न उठता कि - क्या सिर्फ पत्नियाँ, ऐसी चिंतित रहती हैं? क्या पति अपनी पत्नियों को लेकर चिंतित न रहते होंगे?

इस पर मेरा मन, मानव मनोविज्ञान का अनुमान करता था। फिर उत्तर देता - 

पुरुष, भावनात्मक रूप से, नारी से अधिक मजबूत होते हैं। अतः प्रत्यक्ष में वे ऐसी चिंता करते प्रतीत नहीं होते हैं मगर अपनी पत्नी की सुरक्षा को लेकर विचार हरेक पति के मन में निरंतर चलते रहते होंगे। तब ही तो वे, सारा जीवन पत्नी के सुख सुनिश्चित करने के लिए दुनिया में भटकते घूमते रहते हैं। वे, अपनी पत्नी के लिए एक बसेरा निर्मित करना चाहते हैं, जिसमें उनकी पत्नी रानी की तरह, सुख वैभव में रहते हुए सुरक्षित रहे। 

तब पति हृदय की सोचते हुए मुझे, सुशांत पर इतना प्यार आया कि मैंने, साइड टेबल पर रखी हमारी तस्वीर को उठाकर, पहले उसमें सुशांत को चूम लिया, फिर उसे अपने वक्ष से लगा लिया था।  

ऐसी ही अवस्था में, मेरे मन में एक और विचार आ गया कि उस दिन जब, इनकी फ्लाइट पर खतरा आया था, तब सुशांत क्या सोच रहे होंगे? मेरे मन ने उत्तर दिया - निश्चित ही वे कॉकपिट में जाते हुए, मेरे लिए ही, अपने प्राण बचा लेना चाहते रहे होंगे। 

फिर उस रात जब सुशांत का कॉल आया तो मैंने, उनसे पुष्टि के लिए यही पूछ लिया था। पतिदेव के मुख पर तब प्रेम भाव दृष्टिगोचर हुए थे। उन्होंने कहा - 

निकी, यह सच है कि तब मुझे अपने प्राण बचा लेने का विचार, सर्वप्रथम तुम्हारी सोचते हुए ही आया था। पीछे पापा, मम्मी और फिर विमान में सवार क्रू और यात्री थे। अपनी इसी भावना के कारण मैंने अपनी वाहवाही की चाह नहीं की थी। 

इनके इस उत्तर पर मैं बाद में, कई दिनों तक विचार करते रही थी। मैं सोचा करती, सुशांत कितने अलग और अच्छे व्यक्ति हैं जो अपने वास्तविक अधिकार से अधिक थोड़ा भी कुछ नहीं चाहते हैं। अन्यथा अनेकों ऐसे सेलिब्रिटीज हैं जो देश और समाज का कुछ भला नहीं करते हुए यह दिखाने में सफल होते हैं कि उनसे अधिक राष्ट्रनिष्ठ व्यक्ति दूसरा नहीं है। उनमें यही कामना दिखती है कि जैसे भी हो अधिकतम पैसा, प्रतिष्ठा और सुख उन्हें ही मिले। 

तब इससे मुझे गर्व होता था कि ऐसे साहसी, न्यायप्रिय और निर्दोष व्यक्ति, सुशांत मेरे जीवनसाथी हैं। मैं सोचती कि - 

नहीं चाह कि सबसे धनी व्यक्ति की 

मैं पत्नी कहलाऊँ!

नहीं चाह कि सबसे प्रसिद्ध पति की                         

मैं पत्नी समझी जाऊँ!!

जब जब जन्म मुझे दो भगवन 

मैं इनकी पत्नी होने का सौभाग्य पाऊँ!!!

पापा, मम्मी जी एवं सुशांत की संगत में मेरे विचार, नित दिन क्रमशः अधिक सकारात्मक हुए जाते प्रतीत होते थे। 

संतान अभिलाषी मैं अब, चाहते हुए भी कोई स्त्री गर्भवती क्यों नहीं हो पाती, नेट सर्फिंग करते हुए, इससे संबंधित पेज पढ़ने लगी थी। तब मुझे ओवुलेशन विषयक जानकारी हुई थी। अपने शरीर की तासीर समझने के लिए तब मैंने, (बेसल बॉडी टेम्परेचर समझने हेतु) हर सुबह बिस्तर छोड़ने के पहले तापमान लेकर नोट करना आरंभ किया था। 

तभी देश में कोरोना ने जोर पकड़ा था। मेरा ऑफिस बंद हो गया था। मुझे वर्क फ्रॉम होम करना होता था। इसी बीच सुशांत, अंबाला आ गए थे। एक दिन उन्होंने बताया कि वे अब डिफेंस कॉलोनी में एक आरामदेह घर में रहने लगे हैं। कुछ और व्यवस्था हो जाने पर वे, मुझे, मेरे वर्क फ्रॉम होम के दिनों में अपने साथ बुला लेंगें। 

मेरी जागी-सोई आँखों में मेरा पूर्व का सपना फिर चलने लगा था। यद्यपि मैं सोचती तो यह थी कि सुशांत आज ही मुझे अपने साथ रहने के लिए बुला लें, तब भी ऐसा उनसे कहती नहीं थी कि वे अनावश्यक परेशान न हो जाएं। 

ऐसे में इनकी बातों से जब मुझे ऐसा लगने लगा कि 3-4 दिनों में वे मुझे अंबाला आने के लिए कहने वाले हैं, तभी अपने एनजीओ से कोरोना पीड़ितों को सहायता करने में लगे, पापा कोरोना पॉजिटिव हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया था। साथ ही, मम्मी जी एवं मेरा भी टेस्ट सैंपल लिया गया था। मेरा टेस्ट तो नेगेटिव आया मगर मम्मी जी पॉजिटिव आईं थीं। उन्हें माइल्ड इन्फेक्शन था। उन्हें घर में आइसोलेशन में रहने के लिए कहा गया था। सुशांत, तब दिल्ली आना चाहते थे। मैंने मना किया कि मैं सब मैनेज कर लूँगी। मैं उन पर कोरोना का कोई खतरा देखना नहीं चाहती थी। 

हालांकि 15 दिनों में पापा स्वस्थ होकर घर आ गए थे, और मम्मी भी ठीक हो गईं थीं, मगर मेरे जीवन ने मुझे एक बार फिर बताया था - 

मैं (जीवन), किसी की कल्पना अनुरूप नहीं चलता हूँ। अपितु जैसे मैं चलता हूँ, मुझे जीने वाले को उससे सामंजस्य बनाना होता है। 

दिन व्यतीत होते जा रहे थे। सुशांत अब फिर व्यस्त हो गए थे। उनसे नियमित हो जाते कॉल ही मुझे अपने सपनों से, और कुछ समय समझौता कर लेने का आत्मबल प्रदान करते थे। तब एक दिन सुशांत ने बताया कि अब उन्हें एक बार फिर फ़्रांस जाना है। मैं न्यूज़ देखा करती थी। अतः मैंने उनके कहने के पहले कहा था - हाँ जी, मैं समझ रही हूँ राफेल की सेकंड बैच आनी है। 

सुशांत ने कहा था - मैं जानता हूँ मेरी वाइफ ब्यूटीफुल ही नहीं स्मार्ट भी है। 

मैं मुस्कुराने लगी थी। वीडियो कॉल में भी, पतिदेव मेरी वाणी से प्रकट (भ्रम) भाव में नहीं, बल्कि मेरी आँखें जो कह रहीं थीं, उस विरह भाव को भाँप रहे थे। मुझे खुश करने के लिए तब इन्होंने कहा - निकी, बस थोड़ा और धैर्य रखो। वहाँ से लौटते ही या तो मैं दिल्ली आऊँगा या तुम्हें ही अपने पास बुला लूँगा। 

मैंने झूठ कहा था - नहीं, कोई जल्दबाजी नहीं है, जब सभी के लिए सुविधाजनक होगा तब ही हम साथ होंगे। मुझे, पापा-मम्मी जी के साथ रहना भी अच्छा लगता है। 

यह सच तो था मगर पूर्ण सत्य नहीं, सुशांत के साथ बिना मेरा सुख अपूर्ण होता था। मैं ऐसा कहकर, सुशांत को अपने तरफ से निश्चिंत बस करना चाहती थी। वे चिंता में रहें मुझे यह भी तो गवारा नहीं था। फिर वे फ़्रांस चले गए थे। 

तब एक दिन मैंने, दीदी से मिलने जाने की इच्छा पापा-मम्मी जी से कही थी। दीदी गर्भवती हैं, इससे उनके गर्भस्थ शिशु पर कोई खतरा न बने इसके लिए तब, हम तीनों ने और मेरी मम्मी ने कोरोना से बचाव की अधिक सावधानियाँ रखना प्रारंभ कर दीं थीं।  

सुशांत जब फ्रांस से राफेल लेकर अंबाला वापस आए तब उनके मिशन में सफल होने की मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। जब इन्होंने कॉल पर पूछा - निकी, क्या अभी एक माह के लिए अंबाला आ सकती हो?

इनके साथ की मेरे मन में हार्दिक भावना होते हुए भी मैंने इनसे कहा - जी, अभी एक बार दीदी से मिलने जाने का मेरा मन हो रहा है। क्या मेरा 15 दिन बाद आना आपको पसंद होगा?

सुशांत तो एक अलग तरह के व्यक्ति थे। इन्हें अपनी खुशी से ज्यादा, मुझे, पापा-मम्मी जी एवं अपनी सेवाओं के माध्यम से देश को खुश देखना अधिक प्यारा था। सुशांत मेरे मन में क्या है शायद इसे समझने की कोशिश कर रहे थे। प्रकट में उन्होंने कहा - बिलकुल पसंद होगा। आपका मेरे साथ होना, अभी भी और कभी भी मुझे दुनिया की हर उपलब्धि से बड़ी उपलब्धि लगता है और सदा ही लगा करेगा। 

ऐसा ही मेरे साथ भी था मगर बीच के दो मासिक चक्र में लिए बेसल बॉडी टेम्परेचर के ग्रॉफ से मुझे, अपने ओवुलेशन के दिनों का पता चल गया था। अंबाला अभी जाना, मुझे अपने ओवुलेशन के समय की जानकारी होने से फलदायी नहीं लग रहा था। 

यह पक्का तो नहीं था मगर तब मुझे लग रहा था कि जैसे सुशांत, मेरी वाणी से नहीं, मेरे मन को पढ़कर मेरी भावना समझ रहे थे। फिर भी कुछ सोचकर वे चुप रहे थे। 

हम दीदी के घर पहुँचे थे। अब दीदी का वजन 8 किलो बढ़ चुका था। उनका पेट भी काफी दिखने लगा था। दीदी के गर्भ में बच्चा पूर्ण विकसित हो गया था। साथ ही दीदी के मुखड़े पर सुंदरता अधिक निखर आई थी। इन दोनों बातों से दीदी के लिए मेरा प्रेम द्विगुणित हुआ लग रहा था। मैं सोच रही थी काश! दीदी जैसी यह अवस्था शीघ्र ही मेरी हो जाए। 

दीदी बहुत प्रसन्न थीं। उन्होंने बताया - निकी, विवाह को चार वर्ष होने पर भी, हमारा कोई बच्चा नहीं था। इस बारे में रिश्तेदार, परिचितों में तरह तरह की बातें सुनकर मैं त्रस्त हुई थी। अब जब शिशु का आगमन तय हुआ है, मैं अत्यधिक प्रसन्न हूँ। 

तब चिढ़कर मैंने पूछा - दीदी, तुम्हारे होने वाले बच्चे के लिए, रिश्तेदार और परिचित, कुछ कर देने वाले हैं क्या? जब उन्हें इसके लिए कुछ करना नहीं तो व्यर्थ बातें करके विवाहित जोड़ों पर अनावश्यक मानसिक दबाव क्यों निर्मित करते हैं, ये लोग?  

दीदी हँसी थीं फिर कहा था - हमारे समाज में बिन पैसे के मनोरंजन के रूप में यह शगल अस्तित्व में होता है। अपने पर बीती का ध्यान रख, किसी युगल के निजी विषयों में हम व्यर्थ बातें नहीं करेंगें, हमें यह शपथ लेनी चाहिए। 

फिर मेरी मम्मी, दीदी के घर रुक गईं थीं। हम लौट आए थे। उस रात सुशांत से कॉल पर मैंने पूछा था - 

पतिदेव जी, एक बात बताइये कि आप जैसे सैनिकों की हम, पत्नियाँ और परिजन अपने पति, बेटे को मोर्चे पर होने से इतने तनाव और चिंता में रहते हैं। क्या दुश्मन के सैनिकों के पत्नी, परिजन नहीं होते हैं? वे ऐसे ही चिंतित नहीं रहते होंगे?

सुशांत ने कहा था - क्यों नहीं रहते होंगे, वास्तव में दुश्मन देशों के शासक एवं सरकार, अपनी विस्तारवादी, धार्मिक और कौमी महत्वाकांक्षाओं के लिए अपनी प्रजा और सैनिकों का प्रयोग कर उनके प्राण पर खतरा निर्मित करते हैं। ऐसा करते हुए उनकी सत्ता और वे तमाशबीन बने रहकर सुरक्षित रहते हैं। 

मैंने पूछा - क्या ऐसा ही भारतीय सरकार करती है?

इन्होंने उत्तर दिया - नहीं, भारत की सोच न तो विस्तारवादी है और न ही जबरन अपने धर्म के प्रसार की है। हम हमारी सीमाओं पर निर्मित दुश्मन के खतरों से बचाव के लिए लाचारी में लड़ते हैं। 

इनसे, यह मैंने समझा था। फिर मेरा तीसरे दिन अंबाला जाना तय किया गया था। पास दिख रहे मिलन संयोग से मैं बहुत प्रसन्न थी। 

उस रात मुझे मधुर स्वप्न आया था। मैंने देखा कि हमारी प्यारी छोटी सी एक बेटी है। वह सुशांत को अपनी बाल सुलभ मधुर वाणी में कह रही है - ‘मेरे पापा’ ….                                 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

07-09-2021

Saturday, September 4, 2021

सीजन 2 - मेरे पापा (7)…

 

सीजन 2 - मेरे पापा (7)…

उस संध्या, मम्मी जी का एक उपन्यास पढ़ने में मन लगा हुआ था। उन्हें विघ्न दिए बिना, मैंने डिनर भोज्य तैयार करना शुरू किया था। तब पापा मेरी सहायता के लिए रसोई में आ गए थे। 

पापा जिन्होंने, अपने आरंभिक जीवन में समाज और परिवार में पुरुष की प्रधानता देखी थी, वे जीवन से सीखने और अपने विचारों को परिष्कृत करते जाने के अपने स्वभाव के कारण, अब तक ‘अच्छे से’, ‘बहुत अच्छे’ व्यक्ति बन चुके थे। जीवन मंच पर, पुरुष के बराबर पहुँचने की ‘आज की नारी में ललक’ को वे पारिवारिक तथा सामाजिक न्याय निरूपित करते थे। 

उन्हें रसोई में आया देख, मैंने कहा - पापा, मैं कर लूँगी, आप परेशान मत होइए। 

पापा, अच्छा सोचते तो थे ही, कहते उससे भी अच्छा थे। निश्चित ही वे जिनके साथ होते थे उन्हें, अपने सहयोग और शब्दों से अच्छा बनने को प्रेरित कर देते थे। पापा ने कहा - बेटी, मेरे लिए यह परेशानी की बात नहीं है। तुम्हें रसोई तैयार करते देखना, मेरे लिए सीखने का अवसर है। 

मैंने कहा - मैं भाग्यशाली हूँ, अपने पापा को खो चुकने के बाद, इसी जीवन में आपके रूप में ‘मेरे पापा’, मुझे फिर मिल गए हैं। 

पापा, अपने पास किसी का कुछ नहीं रखते हैं। उन्होंने, मेरे शब्दों से बढ़कर लौटाया था, कहा - रमणीक, इसे मेरा सौभाग्य कहो कि इस उम्र में, मुझे ईश्वर ने तुम्हारे रूप में, पली पलाई एक बुद्धिमान बेटी दे दी है। 

हममें बातें होती रहीं थीं। आज, मैं पापा की पसंद का, विशेष ध्यान रखकर रसोई बना रही थी। जिसे बाद में टेबल पर, सबके साथ मम्मी ने न केवल ग्रहण किया था बल्कि भूरि-भूरि प्रशंसा भी की थी। 

मैं, बिस्तर पर जब पहुँची तो मेरा मन प्रफुल्लित था। मैं, सुशांत के कॉल की प्रतीक्षा करते हुए, विचारों में खो गई थी। मैं सोच रही थी कि अभी हमारे विवाह को छह माह भी पूरे नहीं हुए हैं। तब माँ बनने की मुझे इतनी उतावली क्यों मची है, जो मैं प्रेगनेंसी टेस्ट किट ले आईं हूँ? मुझे गर्भ ठहरा या नहीं, वैसे भी तो कुछ दिनों में पता चल ही जाना है। 

वास्तव में मैंने डिंपल चीमा के बारे में पढ़ा था, मेरी उतावली का कारण यही था। डिंपल, दुर्भाग्य से विक्रम बत्रा जैसे अत्यंत साहसी एवं बलिदानी पुरुष की, प्रेयसी बस रह पाईं थीं। यह दुर्भाग्यजनक था कि औपचारिक रूप से उनका विवाह नहीं हुआ और डिंपल, विक्रम के संयोग से, उनके अंश को अपनी गर्भ में पाल कर देश को, विक्रम जैसे ही साहसी पुत्र या पुत्री देने से वंचित रह गईं थीं। 

मैं सोच रही थी कि - सुशांत भी भारत माता के एक अत्यंत वीर पुरुष हैं। ‘युवती’ जो सुशांत के बच्चे को जन्म दे सकती है, वह सौभाग्यशाली एकमात्र मैं ही हो सकती हूँ। 

मेरे मन में तब जो विचार आया, उसकी कल्पना किसी भारतीय पत्नी के लिए अत्यंत पीड़ादाई होती है। मैं सोच रही थी कि ना हो कभी, मगर ऐसा हुआ कि विक्रम बत्रा जैसा बलिदान, सुशांत की भी परिणति हुई तो!, इस कल्पना की भीषण वेदना से, मेरे नयनों से अश्रु की धार बहने लगी थी। बह रहे मेरे अश्रुओं से तकिया गीला हो गया था। मैं सोच रही थी कि यही कारण है जो प्रेगनेंसी टेस्ट के लिए मुझे उतावला कर रहा है। सुशांत से वियोग की कल्पना मेरे लिए असहनीय थी। तब भी संभावनाओं पर विचार रख, मैं उनके अंश से (हमारे) बच्चे को शीघ्र से शीघ्र जन्मता देखने की व्यग्र अभिलाषी थी। 

तब सुशांत के कॉल की रिंग सुनाई दी थी। मैंने अश्रुओं से भीग गए तकिये को अलग हटाया था। उठकर वॉशरूम गई थी। अपने आँखों पर पानी के छींटे मारे थे। दर्पण में सुनिश्चित किया था कि मैं उदास तो दिखाई नहीं पड़ रही हूँ। तब मैं शयनकक्ष में वापस आई थी। मैंने मोबाइल उठाकर देखा तो पाया कि रेस्पोंस न मिलने से, व्यग्रता में सुशांत, चार बार कॉल कर चुके थे। मैंने उन्हें कॉल किया था। उन्होंने पहली रिंग पर ही कॉल रिसीव कर लिया था। चिंतित स्वर में पूछा - 

निकी, कोई परेशानी है क्या?

मैंने सप्रयास मुखड़े पर मुस्कान सजाते हुए उत्तर दिया - नहीं जी, मैं वॉशरूम में थी। 

तब हममें प्यारी प्यारी अनेक बातें हुईं थीं। मैंने प्रेगनेंसी टेस्ट को लेकर, सुशांत को कुछ नहीं बताया था। मैं नहीं चाहती थी कि अपनी माँ बनने की व्यग्रता बता कर पतिदेव पर अपने बच्चे को लेकर, अनायास कोई तनाव या दबाव निर्मित कर दूँ। मैं चाहती थी कि मेरे सुशांत हमेशा प्रसन्न रहें, उनके मुख पर सदा वह मुस्कान रहे जो उनकी सुंदरता में चार चाँद लगाती है। 

कॉल खत्म होने के बाद, एक शंका (Probability) ने कि टेस्ट अगर नेगेटिव आया तो, क्या हाल होगा मेरा!, मेरी आँखों से निद्रा को कोसों दूर कर दिया था। 

फिर देर रात, नींद तो लग गई थी मगर टेस्ट की जिज्ञासा ने पाँच बजे ही, मुझे जगा दिया था। मैं शीघ्रता से किट लेकर वॉशरूम में गई थी। टेस्ट रिजल्ट पाँच मिनट में आता है लेकिन कार्ड पर मेरी दृष्टि लगातार बनी हुई थी। अंततः परिणाम आया था। 

कार्ड पर सिर्फ कंट्रोल वाली लाइन आई थी। टेस्ट वाली दूसरी लाइन नहीं आई थी। मेरे लिए घोर निराशा की बात थी। यह प्रेगनेंसी, नेगेटिव होना दर्शा रहा था। मन की शक्ति क्षीण होने से तब मुझे लगा कि मैं चक्कर खा कर गिर पड़ूँगी। मैं वॉशरूम की दीवार से टिक गई थी। फिर मेरे घुटने मुड़ने लगे थे। दीवार से टिकी हुई मैं फर्श पर बैठ गई थी। ऐसे ही कुछ मिनटों बैठे रहकर, मैं सोच रही थी कि क्या मेरी मानसिक पीड़ा किसी से कहना उचित है? या इसे मुझे अकेले ही सहना चाहिए? 

सुशांत से बताकर उन्हें दुखी करना ठीक नहीं होगा सोचते हुए, मैं साहस बटोरकर खड़ी हुई थी। अगले आधे घंटे अनमने ही मैं नित्य क्रिया में व्यस्त रही थी। दाँत और जीभ साफ कर लेने के बाद, मैं शयनकक्ष में आई तो अशक्त अनुभव कर रही थी। मैं बिस्तर में पड़ गई थी। बिना आवाज किए मैं सिसक रही थी। अश्रु बहते रहे थे, फिर मेरी नींद लग गई थी। 

दरवाजे पर नॉक किए जाने के शोर से मेरी नींद टूटी थी। वॉल क्लॉक पर दृष्टि गई तो 9.15 बज रहे थे। सामान्यतः 9 बजे के पूर्व मैं रसोई या/और डाइनिंग रूम में पहुँच जाया करती थी। बिस्तर से उठी तो मेरा सिर चकरा रहा था। जैसे तैसे दरवाजा खोला तो सामने पापा को खड़े पाया। वे पूछ रहे थे - क्या, बात है निकी तबियत तो ठीक है। 

कहने के साथ उन्होंने अपनी हथेली, मेरे माथे पर रख दी थी। फिर कहा - बेटे, तुम्हें तो तेज ज्वर है। 

सहारा देकर उन्होंने वापस मुझे बेड तक लाकर बैठाया था। फिर कहा - निकी, मैं क्रोसिन लाता हूँ उसे खाने से फीवर उतर जाएगा। फिर जाकर डॉक्टर से जाँच करा लेंगे। 

वे वापस गए थे। वापस आए तो उन्होंने एक गिलास में जल के साथ मुझे टेबलेट दी थी। उसे मैंने निगल लिया था। पाँच मिनट पीछे, मम्मी जी ट्रे में चाय और ब्रेड स्लाइस ले आईं थीं। पापा सामने कुर्सी खींचकर बैठ गए थे। मम्मी जी, बेड पर ही बैठ गईं थीं। सबके बीच ट्रे रखकर हम तीनों ने चाय ब्रेड ली थी। फिर मम्मी ने मुझे लेट जाने कहा था। मैं लेटी तब मुझे, पापा ने ओढ़ा दिया था। बेडरूम से जाते हुए उन्होंने कहा - 

रमणीक, बॉस को कॉल करके छुट्टी की सूचना दे दो। मैं नहा लेता हूँ फिर तुम्हें क्लिनिक लिए चलूँगा। 

मैंने जी हाँ कहते हुए मोबाइल उठा लिया था। पापा तैयार होकर आए थे तब ज्वर उतर गया था। मैंने कहा - पापा, आज क्रोसिन से ही देख लेते हैं। लाभ नहीं हुआ तो कल डॉ. को दिखा देंगे। 

पापा ने थर्मामीटर से चेक किया तो 98.6 आया था। पापा ने कहा - ठीक है आज तीन बार टेबलेट ले लेना ठीक रहेगा। 

फिर ज्वर नहीं आया था। ली गई सिक लीव का प्रयोग उस दोपहर, मैंने लेटे हुए विचार मंथन के लिए किया था। मैं सोच रही थी कि निश्चित ही विक्रम बत्रा महान वीर पुरुष थे। उनके किए जैसे साहस के उदाहरण बिरले ही हैं। भारत भूमि की रक्षा में उन्होंने अपने प्राण न्यौछावर किए हैं। फिर भी विक्रम की तरह साहसी और उनके जैसे बलिदान देने के साहस रखने वाले और भी वीर सपूत भारत में होते हैं। जिन्हें ऐसे कठिन मोर्चे पर लड़ने के अवसर नहीं मिलते हैं। वे ऐसे चरम बलिदान नहीं दे पाने से परमवीर चक्र नहीं पाते हैं। तब स्व-विवेक ने, मेरे घबराए मन को समझाया था। हर वीर सेनानी चरम बलिदान न देते हुए भी महावीर होता है। पूरा जीवन जीते हुए भारत की रक्षा और भारत के लिए, दुश्मन एवं बुराइयों के समक्ष अदम्य साहस से खड़ा रहता है। 

इस मंथन ने मुझे विश्वास दिलाया था कि सुशांत की परिणति भी विक्रम जैसी ही होगी यह कोई नियम नहीं है। मेरा मन विश्वास करने को हो रहा था कि ‘मेरे सुशांत’, अवसरों पर अदम्य साहस का परिचय देते हुए मेरे लिए पूरा जीवन जियेंगे। 

पहले मैं एक भारतीय पत्नी की तरह पतिदेव के जीवन पर आशंकाओं की कल्पना से भयाक्रांत हो रही थी। फिर मैंने आशाओं का दामन थाम लिया था। लेटे लेटे दोनों हाथों की मुठ्ठियाँ भींच मैं दृढ़ता अनुभव कर रही थी। मैं सोच रही थी, नहीं! नहीं! मैं, पतिदेव के जीवन के लिए, सती सावित्री की तरह जूझना पड़ा तो जूझूँगी। तब मैं निराशा से उबर गई थी। 

मन को जीतते ही मैं स्वस्थ हो गई थी तथा डिनर तैयार करने के लिए किचन में आ गई थी। मम्मी जी के मना करने पर भी मैं उनके साथ किचन में सक्रिय हो गई थी।  

फिर रात जब फोन आया तो सुशांत बता रहे थे - 

मालूम है निकी, बहुत से बातें सार्वजानिक नहीं की जाती हैं मगर उनका अस्तित्व होता है। उस दिन मेरे द्वारा, फ्लाइट को खतरे से निकालने की घटना, एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स से होते हुए, प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुँची थी। आज मुझे प्रधानमंत्री हस्ताक्षरित प्रशस्ति एवं बधाई पत्र, हमारे वायुसेनाध्यक्ष के हाथों समारोहपूर्वक प्रदान किया गया है। 

मैंने पूछा - जी, यह बताइये कि आप, अपनी अच्छे कामों को अंजाम देने वाले कारनामों को छुपाते क्यों हैं?

सुशांत ने हँसकर कहा - हाँ निकी, मेरी पहचान छुपाने से तुम्हें अनुभव होने वाले गर्व बोध से तुम्हें वंचित तो अवश्य होना पड़ता है, मगर हम वीर सेनानी ऐसी पहचान सार्वजानिक करके, देश में एवं देश के बाहर के दुश्मन के निशाने पर आने से, अपने परिवारों को बचाते हैं। मैं ‘विंग कमाण्डर अभिनन्दन वर्धमान’ की तरह खतरे से खेलने का हौसला रखता हूँ। मैं नहीं चाहता कि कोई मेरा हौसला तोड़ने के लिए तुम या पापा-मम्मी, किसी पर ही बुरी दृष्टि रखे। 

मैंने पूछा - अशोक, कीर्ति और शौर्य चक्र प्रदान करके सरकार द्वारा, आर्मी के वीरों की पहचान सार्वजानिक की जाते, मैंने देखा है।

सुशांत ने कहा - यह अपवाद होता है, हजार वीरता के कारनामों में से कुछ ही इस तरह  पुरस्कृत होते हैं।    

यह बात मुझे समझ आ गई थी। 

रात करवटें बदलते हुए फिर एक बार, मैं पतिदेव को लेकर अपने मन में बैठी आशंकाओं से विचलित हो रही थी …        

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

04-09-2021


Thursday, September 2, 2021

सीजन 2 - मेरे पापा (6)…

 

सीजन 2 - मेरे पापा (6)…

सुशांत, सुबह आ रहे हैं, इस विचार ने मेरे हृदय को आह्लदित कर दिया था। आनंद की अधिकता में भी नींद उड़ जाती है, यह मैंने इस रात जाना था। निद्रा देवी देर तक मुझसे रूठी रहीं थीं। मैं कभी चहलकदमी करती, कभी पानी पीती और कभी बिस्तर पर करवटें बदलती रही थी। जैसे तैसे निद्रा देवी कृपालु हुईं थीं, फिर सुबह मेरी नींद जल्दी टूट गई थी। 

जागने पर मुझे पहला विचार वही आया था जो निद्रा के पूर्व रात में रहा था। अब कुछ ही समय में सुशांत आने वाले हैं। उनके सीने से लग उनकी धड़कनों को अनुभव कर सकने का अवसर, अब मुझसे दूर नहीं अनुभव करते हुए मैं प्रसन्न हुई थी। सुबह उठ कर दो गिलास जल पीना मेरी आदत में था। मेरी दृष्टि साइड टेबल पर काँच के जग पर गई, जिसमें का जल, रात में मैंने पी लिया था। मैं जल लेने के लिए किचन की तरफ चल दी थी। 

ड्राइंग रूम में पापा एवं मम्मी जी, टीवी देख रहे थे। दोनों अर्ली राइजर थे। अतः यह देखना अस्वाभाविक नहीं लगा था। जब मैंने, उन्हें ध्यान से देखा तो दोनों के मुख पर तनाव दिख रहा था। उनकी दृष्टि का पीछा करती मेरी दृष्टि स्क्रीन पर पड़ी तो उस पर आसमान में उड़ता प्लेन दिखाई पड़ रहा था। 

मैं जल लेने की सुध भूलकर खुद भी टीवी एंकर की कही जा रही बात को ध्यान से सुनने लगी। वह कह रही थी -

जी, हाँ अब यह प्लेन दिल्ली के हवाई अड्डे पर, कुछ ही मिनटों में लैंड होने वाला है। कहने के साथ एंकर ने कमर्शियल ब्रेक ले लिया था। पापा मम्मी जी का ध्यान, मेरी और नहीं था। अब दोनों रिलैक्स्ड दिखाई देने लगे थे। तब मैंने किचन से जल लिया था। मैं वापस कमरे में आने के बाद वॉशरूम गई थी। कोई प्लेन दिल्ली में लैंड होने जा रहा है, यह तो एक सामान्य बात होती है। इसे समाचार में दिखाए जाने का रहस्य क्या है। यह जानने की उत्सुकता में दैनिक क्रियाओं के बाद, मैंने अपने रूम का टीवी ऑन करके न्यूज़ चैनल लगाई थी। 

न्यूज़ एंकर कह रही थी - हमारा चैनल अपने दर्शकों तक यह समाचार सबसे पहले पहुँचा रहा है। सुबह 6.50 को लेह के ‘कुशोक बकुला रिंपोचे’ से दिल्ली के लिए उड़ान लेने के 25 मिनट बाद, दोनों पॉयलट की तबियत बिगड़ जाने से प्लेन में सवार यात्रियों और क्रू मेंबर्स को, जब अपने प्राणों का भय सताने लगा। तब एक सुखद संयोग हुआ। तब विमान में ही सवार एक पॉयलट ने प्लेन की उड़ान जारी रखते हुए प्लेन को सकुशल अंतर्राष्ट्रीय विमानतल, दिल्ली में उतार दिया है। 

हम अपने संवादाता के माध्यम से इस पॉयलट के बारे में जानकारी प्राप्त करके आप तक पहुँचाने की कोशिश में हैं। 

यह कहने के बाद एंकर ने हवाई अड्डे पर अपने संवादाता की उस प्लेन पर सवार रही, एक महिला यात्री से की जा रही वार्ता दिखाना शुरू की थी - 

सुनयना (यात्री) बता रही थी कि लेह से उड़ान भरने के थोड़ी देर बाद, डरी हुई दिख रही एयर होस्टेस ने स्पीकर पर हमें बताया कि विमान के कमांडर पॉयलेट की तबियत बिगड़ गई है और अन्य पॉयलेट की तबियत भी खराब हो रही है। अतः विमान की, श्रीनगर विमानतल पर इमर्जेन्सी लैंडिंग के प्रयास किए जा रहे हैं। विमान में कोई यात्री डॉक्टर हो तो निवेदन है कि वे पॉयलेट्स की जाँच और उपचार करें। 

संवाददाता ने प्रश्न किया - सुनयना, हमारे दर्शकों को बताओ कि क्या कोई डॉक्टर विमान में था?

सुनयना ने बताया - अनाउंसमेंट सुनने पर हम सभी यात्रियों के मुख पर हवाइयाँ उड़ने लगी थी। हम सभी यात्री भय में अपनी सीट से चिपक गए थे। तब हमने एक साथ दो यात्रियों को अपनी सीट से उठकर कॉकपिट की तरफ रश करते देखा था। फिर कुछ मिनट में परिचारिका ने खुश होकर बताया था - हम सब विमान में सवार लोगों का भाग्य है कि यात्रियों में एक पॉयलेट मिल जाने से विमान उड़ान का जिम्मा उन्हें दिया गया है। आप सभी से निवेदन है आप सभी रिलैक्स होकर यात्रा को एन्जॉय कीजिए। यात्रियों में रहे एक डॉक्टर के द्वारा अस्वस्थ हुए दोनों नियमित पॉयलेट का उपचार भी किया जा रहा है। 

कुछ ही मिनट बाद होस्टेस ने फिर बताया कि एयर कंट्रोलर्स की अनुमति मिल जाने पर अब विमान, श्रीनगर एयरपोर्ट में नहीं उतारा जा रहा है। हमें आशा है कि निर्धारित समय पर ही यह विमान सकुशल दिल्ली हवाई अड्डे पर उतर सकेगा। 

तब संवाददाता ने सुनयना को धन्यवाद कहा था। सुनयना ने उत्तर में कहा था - आज प्राणों के बच जाने की ख़ुशी के साथ एक और बात की ख़ुशी भी है कि मुझे आपके न्यूज़ चैनल पर पूरा देश देख रहा है। ये अनुभव मुझे पूरे जीवन याद रहेंगे। 

तब संवाददाता सुनयना के साथ हँसा था। फिर उसने बताया कि जिस युवक ने इस आपात स्थिति में देवदूत जैसे प्रकट होकर सबकी जान बचाई है, वह अपनी पहचान छुपा कर यहाँ से जा चुका प्रतीत हो रहा है। हमें विमानतल अधिकारियों से भी उस अज्ञात पॉयलेट की जानकारी नहीं मिल पा रही है। 

मैंने टीवी ऑफ कर दिया था। मुझे अनुमान हो रहा था कि यह मेरे पतिदेव सुशांत ही हैं, जो यह फ्लाइट दिल्ली लाने के साथ ही, स्वयं भी दिल्ली आ गए हैं। मैं हर्षातिरेक में दीवानी हुई जा रही थी। सब कुछ भूल सी गई मुझे, तब मेरे नियमित दैनिक क्रम के लिए भी दिमाग पर जोर लगाना पड़ रहा था। स्नान आदि के बाद मैंने गुलाबी वस्त्र पहने थे, यह रंग सुशांत को पसंद था। अब किसी भी क्षण वे घर आने वाले हैं विचार करते हुए मैं किचन की तरफ बढ़ी थी। 

तभी डोर बेल गूँजी थी। मेरे कदम ठिठके थे। मैं संकोच में थी कि अपनी उतावली प्रदर्शित करके सभी को हँसने का अवसर दूँ या नहीं। 

तभी पापा ने पुकारा - रमणीक कहाँ हो तुम? बेटी जरा जाकर देखो तो कि इस समय कौन आया है?

पापा कभी ऐसे, मुझे द्वार खोलने को नहीं कहते हैं। द्वार की तरफ कदम बढ़ाते हुए मैं सोच रही थी कि इन बड़े लोगों को हम छोटों का पूरा मनोविज्ञान समझ आता है। मुझे लग रहा था, मेरे मन में क्या है यह मुझसे अधिक, पापा जान रहे थे। मैंने कहा - जी पापा, मैं देखती हूँ। 

मैंने द्वार खोले थे, सामने मेरी दुनिया, मेरी ज़िंदगी, मेरे साजन, जिनसे मेरा हृदय धड़कते रहना चाहता है, मेरे पतिदेव साक्षात खड़े थे। उन्होंने अपनी दोनों भुजाएं फैलाईं थीं। आसपास कोई है भी या नहीं, मेरे मन से यह विचार हट गया था। मैं अपने प्रियतम के सीने से लगकर रो पड़ी थी। इनका एक हाथ मुझे इनसे भींच रहा था और दूसरे से मिलतीं प्यार भरी थपकियाँ, मुझे अपने सिर, गाल, कंधे एवं पीठ पर अनुभव हुई थीं। कुछ क्षण हम ऐसे ही खड़े रहे थे। तब पापा की आवाज आई थी - बेटी, कौन आया है?

सुशांत ने कहा - पापा कितने बन कर पूछ रहे हैं। इनको, मैंने 10 मिनट पहले कॉल कर बता दिया था। निकी, क्या पापा आपको ऐसे ही छेड़ा करते हैं? 

मैं रोते रोते हँस पड़ी थी। 

सुशांत ने कहा - अभी आपको देखकर लग रहा है जैसे आसमान में सूर्य प्रकाश इंद्रधनुष रंगो की छटा बिखेर रहा है और साथ में बरसात हो रही है। 

ऐसी तुलना से खुश होने के साथ मैंने तेज स्वर में कहा - पापा, आपके बेटे आए हैं। 

फिर सुशांत और मैं, ट्राली बैग लिए भीतर आए थे। सुशांत ने डाइनिंग रूम में पापा एवं मम्मी जी के चरण छूकर आशीर्वाद लिए थे। फिर अपने विनोदी स्वभाव अनुरूप कहा - देखो न पापा, रमणीक ऐसे कह रही है जैसे इसका रिश्ता सिर्फ आपसे है। मेरे से कोई रिश्ता नहीं है। 

पापा ने सुशांत का साथ देते हुए कहा - हाँ, निकी यह तो गलत बात है। सही बताओ कौन आये हैं। 

मैंने सोचा था फिर मिल रहे अवर्णनीय सुख के लिए शब्द तय करते हुए मैंने कहा - 

पापा मेरे वो आए हैं जिनके लिए मेरे मन की वाणी ये शब्द पाती है, ‘ओ मने पल पल पल पल याद तेरी तड़पावे से - हाय तेरा रूप जिगर में रड़के आग लगावे से’ 

सब खिलखिला के हँस दिए थे। यह परिवार अभी कुछ ही महीनों पहले मेरा नहीं था। इसमें सभी, जैसे मुझे प्रसन्न रखने को उत्सुक रहते हैं यह देख मुझे लगता था कि जन्म जन्मांतरों से यही मेरा परिवार है। यहाँ मुझे बहू और बेटी दोनों रूपों में माना जाता है और मुझे मन की कहने-करने की हर स्वतंत्रता देता है। मेरे अनुचित किए-कहे को अपने बच्चों की गलती की तरह इग्नोर भी करता है।

फिर सुशांत वॉशरुम में गए थे। कुछ मिनट में चेंज करके वे, नाश्ते के लिए आ गए थे। हमने साथ नाश्ता किया था। मैं, इसके बाद ऑफिस के लिए निकल गई थी। पाँच दिन के अवकाश के आवेदन करने से, मुझे कल से नौ दिनों का सुशांत से पूरा साथ मिलने वाला था। इसके पहले, आज ऑफिस का अंतिम दिन था। मुझे ऑफिस में यह बात ध्यान में रख बहुत से काम निबटाने थे। उस दिन मैं पूरे समय बहुत व्यस्त रही थी। फिर संध्या के समय, अपने मन में फूटते लड्डू और जलती फुलझड़ियों के साथ मैं घर लौटी थी। 

मम्मी जी से पता चला कि लंच के लिए उठने के अतिरिक्त सुशांत, पूरे समय सोते रहे हैं और अभी भी सो रहे हैं। सुनकर मैं मन ही मन प्रसन्न हुई थी कि सुशांत और मैं अब रात देर तक आसानी से जागे रह पाएंगे। 

मैं शयनकक्ष में आ गई थी। मैंने सुशांत को जगाने का प्रयास नहीं किया था। कुछ पल उनके मुखड़े को प्रेम से निहारा था। फिर बिना शोर किए वॉशरूम में जाकर शॉवर लिया था। गाउन पहन कर फिर मैं भी बिस्तर में उनके साथ लिपट कर लेटी थी। फिर उनके माथे पर चूमते हुए उन्हें जगाया था।  

डिनर पर उस दिन, मम्मी जी ने पूछा - बेटा, तुम ही होना जिसने, आपात स्थिति में आज विमान उड़ा कर दिल्ली लाया और विमान में सवार सौ से अधिक व्यक्तियों की प्राण रक्षा की है। 

सुशांत ने मुस्कुराते हुए हामी में सिर हिलाया था। 

मम्मी जी ने ही तब पूछा - फिर जब न्यूज़ चैनल वाले तुमको खोज रहे थे तब तुम पहचान छुपाते हुए उनसे बच कर क्यों निकल आए थे? 

मम्मी जी के उत्तर में सुशांत कुछ कहते, उसके पहले ही पापा ने कहा - 

सारिका, अपने बेटे को धर्म’पत्नी के दर्शन की उतावली थी इसलिए इसने सबसे बचते हुए, घर की ओर मुँह कर के दौड़ लगा दी थी। 

इस पर सब हँसने लगे थे। मैं लजाई हुई हँस रही थी। तब सुशांत ने मुझे प्रेममय दृष्टि से देखा फिर कहा - मम्मी, आप नहीं समझ पातीं मगर पापा मेरे मन की सब समझ जाते हैं। 

पापा ने कहा - क्यों नहीं समझ पाऊंगा! मैं पिता हूँ तुम्हारा! 

सबने किए जा रहे परिहास का पुनः आनंद लिया था। अंततः सुशांत ने गंभीर होकर बताना आरंभ किया - 

जब आपात स्थिति का पता चला तो मैंने, एयर होस्टेस को अपनी आईडी बताई थी और विमान उड़ाने की इच्छा कही थी। कॉकपिट में होस्टेस ने एयर कंट्रोलर्स से बात करके मेरा विवरण दिया था। मुझसे बात कर, कंट्रोलर्स के संतुष्ट होने पर विमान का कंट्रोल लेने के लिए मुझे अनुमति दी गई थी। तब मैंने विमान को ऑटोपॉयलेट से अपने नियंत्रण में लिया था। कुछ ही मिनट के बाद मुझे विमान दिल्ली एयरपोर्ट तक ले आने के निर्देश मिले थे। 

इस बीच मेरे रिक्वेस्ट पर ही, मेरी एयरफोर्स ऑफिसर की पहचान को गुप्त रखने की सहमति हुई थी। इसलिए मुझे सबसे छुपकर, रमणीक के दर्शन को जल्दी पहुँचने का अवसर मिल गया था। 

अंतिम कहे वाक्य में सुशांत ने पापा की तरह ही, मुझे लक्ष्य बना लिया था। पापा बेटे के द्वारा, बातों से मुझे गुदगुदाए जाने पर भरपूर आनंद मिल रहा था, साथ ही लाज भी बहुत आ रही थी। 

मम्मी जी ने फिर पूछा - जिन्हें हीरो कहा जाता है वे अच्छाई ना होते हुए भी अपनी अच्छाई की बातें प्रचारित करते रहते हैं। एक तुम हो कि इतने अच्छे काम करके भी उसे छुपा लेते हो अपनी प्रशंसा के अभिलाषी नहीं होते हो। 

सुशांत ने कहा - मम्मी, आर्मी वाले सभी की, एक आम पहचान फौजी की ही होती है। और हमें विशेष पहचान सामान्यतः बलिदान के बाद ही मिल पाती है। 

यह कटु बात पतिदेव से सुनकर मेरे मुख पर, ‘श्रृंगार’ से बदल कर ‘करुण’ रस वाले भाव आ गए थे। तब पापा ने कहा - 

इतने दिन तुमने, निकी को अपने दूर किए रखा है। और जब आज मिले हो तो ऐसी अप्रिय बात कहकर, क्यों इसे रुला देने पर तुले हो?

पापा मेरी मनोदशा सही समझ रहे थे। मेरी आँखों से अश्रु झरने लगे थे। सुशांत ने उठकर अपने रुमाल से मेरे आँसू पोंछते हुए कहा था - सॉरी, रमणीक!

फिर समय को पंख लग गए थे। नौ दिन तेजी से बीते थे। दिन ऐसी चर्चाओं में और मेरी रात, सुशांत के सुखद साथ में बीतती थी। 

कल ही आए और आज जा रहे हैं जैसी दुखद अनुभूति के साथ दसवें दिन हम सबने सुशांत को विदा किया था। 

फिर नितदिन सुशांत से कॉल पर होतीं बातों के बीच बीस दिन मेरे, कभी रोते, कभी सुखद कल्पनाओं में व्यतीत हुए थे। इक्कीसवें दिन ऑफिस से लौटते हुए मैं मेडिकल शॉप से प्रेगनेंसी टेस्ट किट ले आई थी ….   

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

02-09-2021