Tuesday, May 18, 2021

तुम जैसी जीवन संगिनी …

 

तुम जैसी जीवन संगिनी … 

यार तुम भी बड़ी विचित्र औरत हो। जब पति ज्यादा कमाई करने लगता है तो दुनिया की हर औरत खुश होती है। एक तुम हो कि मुंह फुलाए बैठी हो। 

यह बात मुझसे, मेरा पति सुखबीर गुस्से में कह रहा था। 

मैं पहले ही, सुखबीर से अपने विचार कह चुकी थी। मैं चुप ही रही थी। इससे सुखबीर का गुस्सा और बढ़ गया। उसने शब्दों की गरिमा त्याग कर कहा - 

अब तू मुंह से कुछ बकेगी भी या कुत्ते जैसा सिर्फ मैं ही भौंकते रहूँ?

मैं इस तू तड़ाक का बुरा मानना चाहती थी। मगर सुखबीर के इतने गुस्से में होने पर मुझे हँसी आने को हुई थी क्योंकि उसने स्वयं के कहने को ‘कुत्ते का भौंकना’ कहा था। मैंने अपनी हँसने वाली प्रतिक्रिया पर नियंत्रण किया था। मैंने तब संयत स्वर में दृढ़ता सहित कहा - 

मुझे आपका अधिक कमाना, बुरा नहीं लगता है। यह मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि जिस तरह दवाओं और इंजेक्शन की कालाबाजारी के जरिए आप औरों जैसे बन कर कमा रहे हैं, वह ठीक नहीं है।

सुखबीर मेरे उत्तर दिए जाने से कुछ शांत हुआ था। उसने शब्दों की मर्यादा का पालन करते हुए कहा - 

तुम समझती क्यों नहीं इस तरह अधिक कमाई के अवसर हर समय नहीं आते हैं। मुझ जैसे छोटे मेडिकल स्टोर वाला तो एक साधारण कमाई ही करता हुआ पूरा जीवन बिता देता है। अब अगर मुझे तुम्हारे कुछ सपने साकार करने हैं तो थोड़ा खतरा लेकर यह कार्य करना तो पड़ेगा ही। 

अपने सिद्धांतविहीन कर्मों का आरोप, मुझ पर मढ़ देने वाला सुखबीर का बहाना मुझे दुखी कर गया था। मैंने रुखाई से अपने मोबाइल पर एक पोस्ट जिसका शीर्षक “फिर दिला देना मुझे, नए कंगना …” अपने मोबाइल पर खोल कर, पति की ओर बढ़ाते हुए कहा - 

मुझे जो कहना है उसका सार इस कहानी में है। आप इसे पढ़ लो और स्वतः समझ लो। मैं आपसे बहस में पड़कर, आपको और गुस्सा नहीं दिलाना चाहती। 

मेरी रुखाई और दृढ़ता से सुखबीर कुछ नरम पड़ा था। उसने मेरा मोबाइल लिया और पढ़ने लगा था। मैं रसोई में जाकर काम करने लगी थी। 

रात का भोजन - सुखबीर, मेरे आठ वर्षीय पुत्र सिद्धांत और मैंने एक साथ किया था। तब ऐसा लग रहा था कि सुखबीर मुझसे बात करना तो चाहता है मगर सिद्धांत के कारण कुछ कह नहीं पा रहा था। 

फिर सुखबीर बेडरूम में चला गया था। मैंने जानबूझकर टीवी पर सिद्धांत के पसंद की एक बच्चों की, मूवी लगाई और उसके साथ बैठ गई थी। सुखबीर से बातों में उलझने से बचने के लिए मैं, सिद्धांत का प्रयोग ढ़ाल जैसा कर रही थी। 

डेढ़ घंटे बाद सिद्धांत को उसके कमरे में सुलाकर जब मैं, बेडरूम में पहुँची तो सुखबीर सोया नहीं था। मेरे बिस्तर पर लेटते ही उसने मुझे अपनी ओर खींचा था। मैंने उसके हाथ अपने पर से हटाते हुए कहा - 

मुझे, अभी आपका किया जा रहा काम और आपकी बातों ने मानसिक ठेस पहुँचाई हुई है। अभी आपके साथ देने का मेरा मन नहीं है। आप सो जाओ और मुझे भी सोने दो। 

सुखबीर ने मेरी उससे बचने की कोशिश का बुरा माना था। उसने, मुझसे विपरीत करवट ले ली थी। फिर जब तक मुझे नींद नहीं आई तब तक मैं, सुखबीर पर मानसिक दबाव बनाने की, अपनी तरकीबों को स्वयं ही सही ठहराती रही थी। 

अगले तीन दिनों मैंने हमारे बीच यह तनातनी बनी रहने दी थी। सुखबीर के घर पर रहते मैं, सिद्धांत को अपने साथ रखती ताकि सुखबीर, मुझसे व्यर्थ बातों का अवसर नहीं पा सके। 

चौथे दिन सुखबीर मेरी रुखाई की उकताहट में धैर्य नहीं रख पाया। दोपहर का भोजन करते समय जब सिद्धांत भी हमारे साथ था, वह चुप नहीं रह पाया था। उसने मुझसे कहा - 

तुम क्या समझती हो जिसकी कहानी तुमने मुझे पढ़ने दी है वह लेखक कोई महान समाज सेवा कर रहा होगा? लिखना या कुछ बक देना सरल काम है उसमें ना तो कोई श्रम लगता है और ना ही कोई परेशानी झेलनी पड़ती है। बहुत सरल होता है जो मन में आए लिख दो, जो दिल में आए बोल दो।      

मैं मन ही मन खुश हो रही थी। मुझे लग रहा था कि मेरे निर्मित मानसिक दबाव में उसकी यह खीझ, मेरे प्रयास की सफलता दर्शा रही है। प्रकट रूप से उत्तर में मैंने कहा - 

चलो मान लेती हूँ कि लेखक जो लिख रहा है वैसा वह कर नहीं रहा है। अगर ऐसा है भी तो, उसकी कथनी और करनी में अंतर, लेखक की अपनी समस्या है, हमारी नहीं। फिर भी आप, मुझे एक बात बताओ कि लेखक की कहानी में कौन सी बात सही नहीं है जिसे हमारा मान लेना ठीक नहीं?

सुखबीर कुछ उत्तर नहीं दे पाया था। फिर भोजन पश्चात वह शॉप पर चला गया था। उस रात सुखबीर देर से घर आया था। सुखबीर के आ जाने पर तब चल रहीं मेरी चिंताएं मिटी थीं मगर उत्सुकता बनी रही थी। मैंने पूछा - 

आप इतनी देर से कभी नहीं लौटते, आज क्या हो गया जो 10 बजा दिए? सिद्धांत भी सो गया, आपका इन्तजार करते करते। 

सुखबीर ने हँसकर कहा - 

कोई नहीं सो जाने दो सिद्धांत को, वह थक गया होगा। अब तुम खुश हो लो कि तुमने मेरे में सिद्धांत जगा दिया है। पिछले दिनों से जिन इंजेक्शन और दवाओं की कालाबाजारी चल रही है और जिससे मुझे अधिक कमाई मिल रही थी, उसका बचा स्टॉक आज मैं डीलर को, कुछ घाटे में लौटा आया हूँ। मुझे घर आने में देर उसी के हिसाब किताब में हो गई है। 

इस बात से मैं खुश हुई थी। तब सुखबीर ने फ्रेश होकर खाना खाया था। उस रात बिस्तर पर हम दोनों विपरीत करवट नहीं सोए थे। हममें अब संबंध फिर सामान्य और सुखद हो गए थे। 

इस बात के छह दिन बाद, दिन में असमय ढाई बजे डोर बेल बजने पर, मैंने दरवाजा खोला तो सामने चार पुलिस वाले खड़े थे। मैंने कहा - 

मेरे पति अभी शॉप पर हैं। घर में मैं अकेली हूँ। 

तब उनमें जो इंस्पेक्टर था वह बोला - 

यह बात हम जानते हैं। दरअसल आपके घर और दुकान का सर्च वारंट जारी हुआ है। आपकी दुकान की जांच दूसरी टीम कर रही है। घर की जांच करने हम आए हैं।  

मैंने उनके द्वारा दिखाया वारंट देखा था। फिर उन्हें बिना किसी प्रतिरोध के, जांच करने दी थी। पूरे समय मेरा बेटा सिद्धांत सहमा खड़ा रहा था। उन्होंने जांच के नाम पर पूरा घर उलट पुलट दिया था। लगभग एक घंटे में वे चले गए थे। 

मुझ पर घर वापस व्यवस्थित करने का बड़ा काम आ गया था। जिसे परेशान होकर करते हुए भी मैं खुश थी। हमारे घर से आपत्ति जनक कुछ भी बरामद नहीं किया गया था। जैसा सुखबीर ने मुझे बताया था उससे, शॉप से भी जांच दल को कुछ आपत्तिजनक मिलेगा इसका भय मुझे नहीं था। 

उस रात भी सुखबीर देर से घर लौटा था। वह थका हुआ मगर खुश था। उसने आते ही मुझसे कहा - 

तुम्हारी वे बातें मुझे उस समय बहुत बुरी लग रहीं थीं मगर उन्हीं के कारण आज मैं, जेल जाने से बच पाया हूँ। किसी ने शिकायत की थी कि मेरे पास नकली इंजेक्शन एवं दवाओं का स्टॉक है। जिसके कारण पुलिस ने हम पर दबिश दी थी। धन्य है तू, तेरे कारण छह दिन पहले ही, मैं वह सब स्टॉक डीलर का लौटा आया था। अब आज, वह डीलर तो हिरासत में चला गया मगर मैं आज़ाद हूँ। 

मन ही मन विचार करते हुए मैंने कहा - 

यह अच्छी बात है किंतु आपने अनजाने में ही सही, कुछ दिन पूर्व तक, नकली दवाएं बेचीं हैं। मरीजों को इससे परेशानी झेलनी पड़ी होंगी। उसका तो प्रायश्चित हमें करना ही चाहिए। 

मेरी बात सुनकर सुखबीर कुछ सोचने लगा था। फिर उसने कहा - 

हाँ, यह तुम ठीक कहती हो। मैं प्रायश्चित करूंगा। अब से, जब तक कोरोना खतरा खत्म नहीं होता मैं, अलग अलग कंपनी की दवाओं पर मुझे मिलते मार्जिन के अनुसार उन पर प्रिंटेड अधिकतम दर से, 20% या 10% कम दर पर, ग्राहकों को औषधियां बेचूँगा। 

मैं खुश हुई थी। मुझे महसूस हो रहा था कि कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में अब हम सरकार के साथ भागीदारी करने जा रहे हैं। 

उस रात सुखबीर ने स्नान किया था और फिर भोजन किया था। बाद में बिस्तर पर, हम जब सोने पहुँचे तो सुखबीर ने मुझे प्रणय आलिंगन में लेते हुए कहा - 

आज मुझे समझ आया है कि अपने बेटे का नाम सिद्धांत रख देने मात्र से उसका अच्छा नागरिक बनना सुनिश्चित नहीं हो जाता है। अपितु इसके लिए हमें उसके सामने सिद्धांत पालन करते हुए स्वयं जी कर दिखाना होगा। उसी से उसमें सही संस्कार पड़ेंगे और वह अच्छा नागरिक बन सकेगा। 

मैंने सुखबीर के सीने में सिर गढ़ाते हुए ‘हूँ’, बस कहा था। तब सुखबीर ने ही आगे कहा - 

तुम तो सिद्धांत प्रिय जीवन पहले से जीती आ रही हो। अब तुम्हारी प्रेरणा से मैं भी वैसा ही अच्छा जीने का तरीका अपनाउंगा। अगर तुम जैसी जीवन संगिनी सभी को मिले तो हमारा यह भारत, अपनी प्राचीन भव्यता पुनः प्राप्त कर सकता है। 

अपनी प्रशंसा से तब मैं चिर निद्रा में सो जाना चाहती थी। मुझे डर लग रहा था कि जागने के बाद यह मेरी मधुर अनुभूति किसी कटु यथार्थ में गुम ना हो जाए …      

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

18-05-2021


 

   


फिर दिला देना मुझे, नए कंगना …

 फिर दिला देना मुझे, नए कंगना …

सीमा पर अभी पिछले कुछ दिनों से, दुश्मन की ओर से हरकतों में बहुत कमी आई थी। ऐसा मैंने पिछले एक दशक में सीमाओं पर अपनी तैनाती के दौरान कभी नहीं देखा था। अतः यह मेरी सेना की सर्विस में मुझे अपने प्राण पर सबसे कम संकट वाला समय प्रतीत हो रहा था।
पिछले कई वर्षों की दुरूह क्षेत्रों में अपनी तैनाती से, मैं कठिन परिस्थितियों में रहने का अभ्यस्त हो चुका था। अभी मेरी तैनाती ऐसी ही एक मुश्किल सीमा पर थी जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता था। कुछ समय से गश्त देने के अपने कार्य में हमें, कोई चुनौती नहीं लग रही थी। इस से हम खाते पीते और अपने साथियों के साथ बातें और मौज मस्ती में दिन बिता रहे थे। किसी किसी दिन रसद के लिए मुझे, समीपस्थ कैंप में जाने का अवसर मिलता था। तब मैं अपनी पत्नी आरती, अपने दो छोटे बेटे और अपने परिजनों से मोबाइल पर बात किया करता था।
आज जब ऐसा ही मौका मुझे मिला तो मैंने आरती से मोबाइल पर बात की थी। मुझे छह माह से अधिक समय हो गया था जब मैं अपनी विगत छुट्टी, परिवार के साथ बिताकर लौटा था। आरती इस कारण मेरे से विरह की वेदना फोन पर कहा करती थी। आज की बात में वह विरह वेदना से भी अधिक दुखी लगी तो मैंने पूछा - आरती क्या बात है, मेरे कॉल पर भी आज तुम खुश नहीं लग रही हो?
आरती ने बताया -
पिछले 15 दिनों में गाँव में कोरोना का प्रकोप बहुत बढ़ गया है। हर तीसरे चौथे घर में लोग बुखार खाँसी से परेशान हैं। अभी तक तो हमने अपने घर में कोरोना प्रवेश को रोक रखा है। तब भी हम सभी बहुत डरे डरे रहते हैं। अभी हम सब उतने ही डरे हुए हैं जितना सीमा पर डिस्टर्बेंस के समय आपकी कुशलता को लेकर डरते हैं।
मैंने अभी हाल में छुट्टी से लौटे अपने साथियों से कोरोना की दूसरी लहर से भयावह हो रही परिस्थितियों के बारे में सुन रखा था। फिर भी सरकार वैक्सीन और मरीजों के उपचार की भरसक कोशिश कर रही है यह भी पता होने से मैंने आरती को समझाते हुए कहा -
आरती अब तो सरकार ने 18 वर्ष से ऊपर के लोगों को वैक्सीन की अनुमति दे दी है। तुम सब वैक्सीन क्यों नहीं लगवा रहे हो? वैक्सीन लगने पर, सबका कोरोना का डर मिट जाएगा।
आरती ने बताया - यहां गांव के लोगों की बातों में आकर पिताजी और माँ ने अपनी बारी पर वैक्सीन नहीं लगवाई थी। अब जब हर घर कोरोना से प्रभावित होते जा रहा है तो जेठ जी अन्य की छोड़, उन्हें लेकर बहुत चिंतित रहते हैं। अब वैक्सीन के केंद्र पर भीड़ इतनी है कि जेठ जी कहते हैं वहाँ की धक्का मुक्की में कोरोना होने का खतरा, वैक्सीन से मिलने वाली राहत से अधिक हो गया है। वैक्सीन के लिए वहाँ पहुंचने वाले लोग कई कई बार बिना वैक्सीन के लौट रहे हैं। वैक्सीन की उपलब्धता पहले तो थी अब कम पड़ रही है।
मैंने सांत्वना देते हुए कहा - आरती, अधिक डर के रहने से इम्यूनिटी कम हो जाती है। सावधानी सहित निर्भय होकर रहो।
आरती ने बताया -
मुझे तो बहुत डर लग रहा है। हर दूसरे, तीसरे दिन गाँव में कोई मर रहा है। उपचार के लिए दवाएं और इंजेक्शन नहीं मिल पा रहे हैं। जेठ जी बता रहे हैं कि जिन्हें मिल पा रहे हैं उन्हें उसकी कई कई गुनी कीमत देना पड़ रही है। अस्पताल एवं दवाओं के बिल/कैश मेमो भी नहीं दिए जा रहे हैं। अगर अपने घर में किसी को जरूरत पड़ी तो हमारा दवा खरीदना और अस्पताल में उपचार करा पाना मुश्किल होगा। कैश मेमो नहीं मिलने से आप भी सेना ऑफिस से मेडिकल बिल नहीं ले सकेंगे।
अंत में मैंने आरती का ढांढस बढ़ाने का प्रयास करते हुए कहा - आरती, तब भी चिंता करने से कोई लाभ नहीं। सब लोग सावधानी रखो और कोशिश करो कि वैक्सीन लग जाए।
इस तरह हमने बात खत्म की थी। यह पहली बार था कि हम आपस में प्यार की कोई बात नहीं कर पाए थे। मैं आरती के मुंह से उसकी पसंद के गाने की दो पंक्तियाँ नहीं सुन पाया था - “एक तेरा साथ हमको दो जहां से प्यारा है, ना मिले संसार तेरा प्यार तो हमारा है”।
रसद लेकर वापस पहुंचा तो मेरा मन बोझिल और उदास था। रात मुझे देर तक नींद नहीं आई थी। आरती को तो मैं समझाते रहा था मगर माँ-बाबूजी को लेकर स्वयं मैं बहुत चिंतित हो गया था। मैं सोच रहा था देश की सीमाओं की रक्षा का भार मुझ पर था जिसे मैं भली भांति निभाता हूँ। देश में आई महामारी से, देश की अन्य एजेंसीज अर्थात सिविलियन को निबटना है। क्यों ये एजेंसी अपने पर दायित्व को मुझ जैसी नैतिकता एवं साहस से नहीं निभा पा रहे हैं।
सप्ताह भर मैं ड्यूटी करता रहा था मगर हृदय में विषाद बना रहा था। आठवें दिन परिवार के हाल चाल ले पाऊं इस हेतु, मैंने स्वयं ही रसद लाने की ड्यूटी ली थी। उस दिन आरती से जब बात हुई तो पता चला कि माँ-पिता, दोनों की हालत ठीक नहीं होने के कारण हॉस्पिटल में भर्ती करवाना पड़ा है। उनकी दवाओं एवं उपचार के लिए खर्चा बहुत आ रहा है। अतः आरती और उसकी जेठानी को अपने अपने कंगन बेच देने पड़े हैं।
तब मुझे याद आया था कि आरती को ये कंगन मैंने अपनी बचत राशि से खरीद कर, प्रथम प्रणय रात्रि पर अपने हाथों से पहनाए थे। मैंने कहा -
आरती, मेरी प्यार का दिया प्रथम उपहार बेचकर तुम दुखी हो क्या?
आरती ने शायद मुझे दुखी ना करने के लिए उत्तर सोच रखा था उसने कहा -
कोई नहीं जी, अभी माँ-बाबूजी अच्छे हो जाएं बाद में आप फिर दिला देना मुझे, नए कंगना।
मैं आरती के मुख की कल्पना करने में लगा था कि कैसे उसने अपने सजल नेत्रों को अपनी ओढ़नी से पोछ कर यह कहा होगा।
जब मैं लौट रहा था तब मेरी उदासी बढ़ गई थी। अगले दिन से शत्रु सेना ने अचानक गोलाबारी एवं फायरिंग शुरू कर दी थी। हमें उत्तर में कार्यवाही करना पड़ा था। पंद्रह दिन लगे थे जब शत्रु को सबक सिखाने के लिए हमें निरंतर मुस्तैद रह कर सख्त कार्यवाही करना पड़ा था।
हमारी बटालियन से हमारे तीन साथी वीरगति को प्राप्त हुए थे। इसी बीच मुझे सेना मुख्यालय से तीन दिनों के अंतर से दो बार सूचित किया गया था। मुझे, पहली बार पिताजी के एवं दूसरी बार माँ के देहांत की सूचना दी गई थी। सीमा पर हालात ऐसे थे कि बाबूजी एवं माँ के नहीं रहने पर भी मैंने छुट्टी की माँग करना उचित नहीं समझा था। अपनी ऐसी लाचारी और अपने पालकों को खोकर मैं अत्यंत भड़का हुआ था।
देश के नैतिकता हीन अवसरवादी लोगों पर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था। जिन्होंने काला बाजारी और स्वयं के अधिक लाभ के लोभ एवं अन्य तरह से अपने हित साधने की कुत्सित भावना वशीभूत होकर, कोरोना पीड़ित लोगों के लिए सही व्यवस्था के हमारे सरकार के प्रयासों में सहयोग नहीं किया था।
अपना यह गुस्सा मैंने शत्रु सेना पर उतारा था। दुश्मन के छह जवानों को मैंने अत्यंत निर्ममता से मारा था। इसे सेना में मेरी वीरता माना गया एवं मुझे तुरंत पुरस्कृत करने की अनुशंसा सरकार को भेजी गई थी।
पंद्रह दिन से जारी सीमा पर बिगड़े हालात जब सुधर गए तो मेरे मांगने के पहले ही मुझे अवकाश स्वीकृत किया गया था। मैं गाँव पहुँचा था। मैं अत्यधिक व्यथित था। मेरे हर अवकाश पर मेरे घर पहुँचने की ममता से प्रतीक्षा करने वाले मेरे बाबूजी एवं माँ सदा के लिए जा चुके थे।
अभी की लड़ाई में, मेरी वीरता के किस्से प्रदेश एवं गांव तक, मेरे पहुंचने के पहले पहुंच गए थे। इस कारण गाँव एवं आसपास के बड़ी संख्या में लोगों के साथ ही, प्रदेश के मुख्यमंत्री संवेदना देने मेरे गाँव आए थे।
इस बड़ी भीड़ की प्रत्याशा में, सोशल डिस्टन्सिंग का विचार रख मेरे माँ-बाबूजी की तेरहवीं पर श्रद्धांजलि सभा बड़े मैदान में आयोजित की गई थी। इसी सभा में ही मुख्यमंत्री ने मुझे सम्मानित भी किया था। इस सभा में मुझे बोलने के लिए कहा गया था। मैं अत्यंत भाव विह्वल था।
माइक के सामने पहले तो मैं 2-3 मिनट खड़ा रह गया था। मैं कुछ नहीं बोल पाया था।
सभा में पिन ड्रॉप साइलेंस था। सब मेरे मुँह को ही तक रहे थे। तब मेरे व्यथित और रोष से द्रवित हृदय के रास्ते होते हुए, मेरे मुख पर यह शब्द आ पाए थे। मैंने कहा -
मेरे माँ-बाबूजी के संस्कार से मैंने नैतिकता, सिद्धांत एवं साहस की शिक्षा ली। आज मैं इस योग्य हूँ कि देश पर खतरा बनते प्रत्यक्ष शत्रु पर अपने मारक प्रहार से मैं, उनका वध कर देता हूँ। इस तरह से देश की सीमाओं पर आया संकट, टालने में मैं समर्थ रहता हूँ।
आज चहुंओर प्रत्यक्ष दिखाई नहीं दे सकने वाले कुत्सित, नैतिकता विहीन, स्वार्थी एवं अमानवीय विचार, मेरे देशवासियों के मन पर हावी हैं। वे इस महामारी के समय में भी परस्पर सहयोगी कर्म नहीं कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मैं ऐसा अनुभव कर रहा हूँ। मुझे अपनी इस लाचारी पर अत्यंत क्षोभ है कि इन अदृश्य विचारों पर भी मैं, दुश्मन पर किए जैसे मारक प्रहार नहीं कर सकता हूँ।
इन बुरे विचारों से दुष्प्रेरित मेरे बहुत से देशवासी, रोगियों की दवाओं एवं उपचार में भी अधिक से अधिक लाभ लिए जाने की जुगत में लगे हुए हैं। हम सभी जानते हैं कि दवाओं सहित सभी दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर लागत से, कई कई गुना अधिकतम मूल्य अंकित होता है। यह कैसी राष्ट्र निष्ठा है कि इस विपदा काल में भी, अधिकतर निर्माता या विक्रेता अपना लाभ कम लेकर, एमआरपी पर डिस्काउंट देने का साहस और नैतिकता नहीं दिखा पा रहे हैं। उलटे इनकी कालाबाजारी करने में लगे हुए हैं।
ऐसे राष्ट्र अहितकारी विचारों पर, मैं मारक निशाना साध पाने में असमर्थ हूँ। सब लोग समझते हैं कि देश की रक्षा सैनिक का ही दायित्व होता है। अपने माँ-बाबूजी को कोरोना में खोकर, मैं यह मानता हूँ कि देश रक्षा का दायित्व सेना से अधिक, सिविलियन का है। ये हमारी आगामी पीढ़ी को ऐसी घिनौनी परंपरा नहीं दें, जिसमें गिद्ध से अधिक, किसी मरे व्यक्ति को खुद मनुष्य ही नोच नोच कर खाने का दृश्य प्रस्तुत करता है।
अगर देश में ऐसे विचार विद्यमान रहेंगे तो राष्ट्र सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकेगी। ऐसा चलता रहा तो देश को सुरक्षा देने वाली सेना के, सभी प्रयास व्यर्थ हो जाएंगे। हम देश की सीमा तो बचा सकेंगे मगर देश की आत्मा नहीं बचा सकेंगे। आज देश एवं उसकी आत्मा की सुरक्षा, सैनिक के हाथों से अधिक सिविलियन के हाथ में है।
कहकर मैं माइक पर ही बिलख कर रो पड़ा था …
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
17-05-2021

Wednesday, May 5, 2021

मानव प्रेम ….

 

मानव प्रेम …. 

उसका, मुझसे यह प्यार बचपन से रहा था। जबकि मुझे घर से मिली प्रेरणाएं अलग थीं। अतः किशोर वय के आकर्षण को प्यार मानकर, मुझे इसमें समय व्यर्थ नहीं करना था। मुझे पढ़ना था, मुझे कुछ बनना था। पता नहीं और भी किसी को रहा हो मुझसे प्यार मगर उसे समझने और उसके चक्कर में पड़ने का मेरे पास समय नहीं होता था।  

मैंने मानव के मुझसे प्यार को तब जाना था, जब मुझे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में प्रवेश हेतु सफलता मिली थी। मानव प्रवेश परीक्षा में विफल रहा था। तब एक दिन उसने, पहली एवं अंतिम बार मुझसे, अकेले में भेंट कर कहा था -

पिछले छह वर्षों से मैंने, पढ़ने से ज्यादा मन, तुमसे प्यार की अपनी अनुभूतियों में लगाया है। तुम मेरे प्यार से अनभिज्ञ पढ़ते रहीं और आज वहाँ पहुंच रही हो, जहाँ मुझ जैसे पिछड़ गए लड़के के हृदय में रह गए, तुमसे प्यार का कोई महत्व नहीं रह जाता है। तुम्हें, वहाँ से तुम्हारे समतुल्य प्रतिभा वाले लड़के मिलेंगे, जिनका साथ तुम्हें ज्यादा अच्छा लगेगा। मेरा यह बताने का प्रयोजन मात्र इतना है कि तुमसे, हुए प्यार को, मुझे कुछ बनने की प्रेरणा बनाना चाहिए था। वह मैं नहीं कर पाया हूँ। मैं वह प्रेमी बन गया जो प्यार में बर्बाद हो जाता है। 

मुझे उसके ऊपर दया आई थी। मैंने पूछा - मैं सब समझ गई हूँ। अब बताओ कि यह बताने के बाद क्या चाहिये है तुम्हें, मुझसे?

उसके नेत्र सजल हुए थे। उसने कहा - कुछ नहीं, अपनी शुभकामनाएं ही कहने आया हूँ। तुम, जिसके प्रति प्यार में मेरा ह्रदय कई वर्षों तक भरा रहा, मेरे उस  हृदय की हर स्पंदन कामना करती है कि तुम उन्नति करो और जीवन भर सुखी रहो। 

तब उसके लिए मेरे हृदय में, प्यार तो नहीं मगर करुणा अवश्य आई थी। मैंने कहा था - अपना ख्याल रखना। तुम अभी भी बहुत कुछ पा सकते हो और कुछ अच्छा बन भी सकते हो। मुझसे प्यार करते रहे हो तो अब कुछ बनकर दिखा सकोगे तो मुझे ख़ुशी होगी। शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। 

फिर मैं शिक्षण संस्थान में पढ़ने चली गई थी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में अध्ययन एवं वातावरण में ,मैं मानव को बिल्कुल ही भूल गई थी। पढ़ने के बाद मैंने डॉक्टरेट भी की और प्रौद्योगिकी संस्थान में ही प्रोफेसर होकर पढ़ाने लगी। मेरे जीवन के लिए अनुकूलता, इसमें ही थी कि अपने लिए वर भी मैं किसी प्रोफेसर को चुनूँ।  

ऐसा ही मैंने किया भी था। सह प्राध्यापक, अभिषेक मेरे पति हो गए थे। देखते ही देखते जीवन के 30 वर्ष बीत गए। एक मानव था मुझे प्यार करने वाला, 40 वर्ष हो जाने से इस बात का, मुझे कोई स्मरण भी शेष नहीं रहा था।   

फिर आया कोरोना का दुखद समय। मुझे कोरोना संक्रमण हुआ। मेरी रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी रही थी। संक्रमण माइल्ड लेवल का रहा और मैं घर पर ही ठीक हो गई थी। बहुत सावधानी के बाद भी संक्रमण मेरे पति, बेटे एवं बहू को भी हो गया। 

घर में संक्रमण से अछूती सिर्फ मेरी 2 वर्षीय पोती रह सकी थी। मेरे बेटे, बहू भी उपचार घर में लेते रहे थे और उनका संक्रमण नियंत्रित हो गया था। मगर मेरे पतिदेव, अभिषेक की हालत चिंताजनक हो गई थी। बड़ी कठिनाई से उन्हें अस्पताल में आईसीयू बेड मिल सका था। हम सब उन्हें लेकर बहुत चिंतित थे। डॉक्टर ने बताया कि अगर ‘बी-’ प्लाज़्मा मिल सके तो, अभिषेक को संक्रमण की दूसरी से तीसरी स्टेज में जाने से बचाया जा सकता है। 

मेरे बेटा-बहू भी संक्रमित होने से होम आइसोलेशन में थे। कोई और कुछ नहीं कर सकता था। जो कुछ कर सकती थी वह मुझे ही करना था। मुझ पर अबोध पोती का दायित्व भी था। आसपास परिचित, रिश्तेदार और दोस्त सब इतने भयाक्रांत थे कि कॉल पर बात तो कर रहे थे मगर अपने घरों से निकल कर हमारी सहायता करने नहीं आ पाए थे। लाचारी में मुझ से सिर्फ इतना हुआ कि मैंने फेसबुक पर यह पोस्ट लिख दी- 

#urgent_help  #Plasma #Bnegative

Plasma needed (‘B-’ blood group)

Name: Abhishek Sinha

Age: 57 

O2 Level: 85-87 (with constant oxygen support)

Hospital's name: Continental

mobile  No.: 98###23###

मैं, हॉस्पिटल में अभिषेक के पास रह नहीं सकती थी। उनसे दूर उनकी स्थिति से घबराई मैं, रात भर सो नहीं पाई थी। मैंने अगले दिन पूरी कोशिश कर ली थी। हमारे रिश्तेदार, दोस्त एवं परिचित जो भी प्रभावशाली थे, सबसे कॉल पर बात कर ली थी। सबसे सहायता उपलब्ध कराने हेतु याचना कर ली थी। सभी ने आश्वासन भी दिया मगर कोई बात बन नहीं पाई थी। 

हॉस्पिटल से शाम सात बजे बताया गया कि अभिषेक की हालत सुधर नहीं पा रही है। आज ही प्लाज्मा की व्यवस्था जरूरी है। अन्यथा सुबह तक उनके स्वास्थ्य में और गिरावट आ जाएगी। 

मैं विवश थी कुछ हो नहीं पा रहा था। घर में बैठी रो रही थी। नन्हीं पोती मेरा मुख देख, समझ नहीं पा रही थी कि दादी उसके जैसे क्यों रो रही है। तब रिंग सुनाई दी। किस का कॉल है देखने के लिए मैंने मोबाइल उठाया। कॉल मेरे स्टोर्ड नं. से नहीं आ रहा था। ट्रू कॉलर में कॉलर नेम, मानव खरे दिख रहा था। मैंने निराशा में ही रिप्लाई किया था। दूसरी और से कहा गया - 

मैं, इस समय कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल के सामने हूँ। भीड़ के कारण हॉस्पिटल से कोई, रिस्पांस नहीं दे रहा है। मैं, आपकी पोस्ट से प्रेरित होकर प्लाज़्मा देना चाहता हूँ। आप बताएं कि मैं क्या करूं? 

मैं सुनकर स्फूर्ति से भर गई। मैंने कहा - कृपया आप वहां ठहरिए। मैं डॉक्टर को आपका नं. दे रही हूँ। डॉक्टर खुद, आपसे आपके नं. पर संपर्क करेंगे। 

मैंने डॉक्टर को फोन लगाया। उन्हें विवरण बताए थे। डॉक्टर ने कहा आप चिंता ना करें। मैं अभी ही सब अरेंज करता हूँ। 

फिर किसी का कोई फोन नहीं आया था। मैं आशा कर रही थी कि सब ठीक हो जाने वाला है। मैं पिछली रात सो ना सकी थी। अतः आज मुझे नींद गाढ़ी लग गई थी। 

सबेरे डॉक्टर से बात करने पर पता चला कि मैचिंग प्लाज़्मा मिल गया है। अब आशा है अभिषेक को बचा लिया जा सकेगा। मैं पिछले 20 दिनों में पहली बार ख़ुशी अनुभव कर रही थी। स्नान आदि के बाद सब में पहला काम, घंटे भर श्री राम जी आराधना और पूजा में बिताया था। 

10 दिन बाद अभिषेक अत्यंत कमजोर मगर स्वस्थ होकर घर लौट आए थे। डॉक्टर ने बताया था वीकनेस दूर होने में कुछ समय लगेगा मगर अब चिंता की कोई बात नहीं रही है। इस बीच बहू-बेटा भी ठीक हो गए थे। परिवार पर चलते खतरे टल गए थे। हम सब खुश हो ड्राइंग रूम में बैठे थे। 

अभिषेक ने बताया - मुझे ऐसे लग रहा था कि मुझे ले जाने के लिए यमदूत आ गए हैं। अचानक तब एक देवदूत आ गया था। वह पिछले महीने ही कोरोना से ठीक हुआ था। मेरे हृदय को अभी और धड़कते रहना था। अतः उसका ब्लड ग्रुप ‘बी-’ ही था। अस्पताल से छुट्टी देने के समय डॉ. ने मुझे बताया वह देवदूत प्लाज़्मा देने नहीं आया होता तो मेरा बच पाना संदिग्ध हो गया था। 

तब मैंने खुश होकर बताया - यह मेरी फेसबुक पर सहायता की पुकार से संभव हुआ था। 

अभिषेक ने अचंभित होकर पूछा - वह , तुम्हारी प्रार्थना पर आया था?

मैंने बताया - हाँ, उसने मुझे कॉल कर बताया था कि हॉस्पिटल में कोई रिस्पांस नहीं मिल पा रहा है। 

अभिषेक के मुख पर आश्चर्य के भाव आए, पूछा - वह तुम्हारा कोई परिचित था? तुमने, उसको, हमारा कृतज्ञ होना बताया और उसका धन्यवाद किया है? 

मैंने कहा - नहीं, वह कोई परिचित नहीं था। हाँ, मगर उसका नं. कॉल हिस्ट्री से पता चल सकता है। 

अभिषेक ने कहा - तो देखो, मैं उससे बात करता हूँ। जिसने मेरा जीवन बचाया है, और कुछ नहीं तो कम से कम हमें, उसका आभार तो मानना ही चाहिए । 

मैंने तब डेट एंड टाइम याद की थी और कॉल हिस्ट्री से उसका नं. निकाल के अभिषेक को दिया था। अभिषेक ने कमजोरी के कारण, मुझसे ही कॉल करने कहा था। मैंने, कॉल लगते ही स्पीकर ऑन कर दिया ताकि सभी की जा रही बातें सुन सकें। 

उसने मेरे कहने से पहले ही पूछा था - आपके पति अभिषेक, अब ठीक तो हो गए हैं ना?

स्पष्ट था, मेरी फोन बुक में उसका नहीं मगर उस की में मेरा नं. स्टोर्ड था। इसलिए मेरे परिचय दिए बिना उसने, मुझे पहचान लिया था। 

मैंने पूछा - आप, मुझे कैसे जानते हैं?

उसने कहा - याद कीजिए, मैं मानव हूँ। स्कूल में हम साथ पढ़ते थे। मैं फेसबुक पर आपको खोज कर, फॉलो करता रहा हूँ। 

अब मुझे स्मरण आया था उस लड़के का जिसने, मुझसे अपना प्यार व्यक्त करते हुए एक दिन शुभकामनाएं दीं थीं। 

मैंने कहा - मैं, अभिषेक की हालत से इतनी घबराई हुई थी कि उस दिन मैं, आपसे कुछ और बात नहीं कर सकी थी। 

तब उसने कहा - अगली ही सुबह मेरी नागपुर वापसी की फ्लाइट थी तो मैं खुद भी आपसे बात नहीं कर सका था। 

मैंने कहा - आप इतनी दूर से अभिषेक को प्लाज़्मा देने आए थे? आपका हृदय तल से आभार, अभिषेक स्वस्थ होकर कल ही अस्पताल से लौटे हैं। 

मानव ने कहा - यह मेरा भाग्य है कि मैं, आपकी कोई सहायता कर सका। 

मैंने कहा - अब आप यहाँ जब भी आएं, तब हमारे घर पर ही ठहरिए। 

मानव ने कहा - जी, अवश्य। कृपया आप भी सपरिवार कभी नागपुर मेरे घर पधारिए। 

मैंने कहा - जी हाँ, यह आपदा का समय बीतने दीजिए हम आएंगे।    

फोन डिस्कनेक्ट होने के बाद, 40 वर्ष पूर्व का स्मरण करते हुए मैंने, मानव से अपनी एकांत में हुई एकमात्र मुलाकात की बात, परिवार में सभी के सामने कही थी। 

अभिषेक ने तब कहा - जिसमें कोई भी अपेक्षा नहीं, ऐसा निर्मल होता है ‘मानव प्रेम’ ….                   

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

05-05-2021

 

 



Tuesday, May 4, 2021

क्या होता है मानव होना?

क्या होता है मानव होना?


जैसा परिदृश्य आज का

उसे इतिहास यूँ लिखेगा


कि नित लोग मर रहे थे

हम वह देखते और कहते

हमारा नहीं उसका मरा है

फिर हमारा कोई मर गया

उस ने देखा और फिर कहा

हमारा नहीं उसका मरा है

सावधानी और सबक

ना हमने लिया ना उस ने 

मौत तांडव मचाती रही 

जिसमें दोनों इतिहास हो गए 


काश परिदृश्य दूसरा होता 

इतिहास कुछ यूँ बनता कि 


मॉस्क पहने डिस्टेन्सिंग में

यह सोच हम रहते थे कि 

शायद मैं संक्रमित हूँ, मुझसे

कोई संक्रमित ना हो जाए 

हमारा समाज सभ्य था यूँ 

विवेक विचार चलता गया 

प्रश्न मेरे ही बचने का नहीं 

उसके बचने का भी बन गया   

मेरा क्या था मैंने जी लिया 

और देख ली थी दुनिया 

दुनिया क्या है देखने को 

खुशी, बेचारा वह बच गया 


तब इतिहास उसने यूँ लिखा कि

 

मैं इतिहास वह लिख रहा हूँ 

जो इतिहास वह रच गया था

देकर अपनी साँसे वह, मुझे 

जीने का अवसर दे गया था 

भव्य इतिहास लिखने के लिए 

परोपकारी मुझे छोड़ गया था

क्या होता है मानव होना, वह  

मर कर मुझे दिखा गया था


--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

04-05-2021

 




Saturday, May 1, 2021

मर्सी किलिंग …

 

मर्सी किलिंग … 

मेरे पिता ने परिवार पर छत्र छाया बड़ी उम्र तक बनाई रखी थी। जब 88 की उम्र में जग छोड़ गए थे, मैं 61 वर्ष का हो चुका था। पाठशाला में मैं, अध्यापक मेरी सेवानिवृत्ति को तब 1 वर्ष शेष था। 

पिता जी अपनी पूरी उम्र स्वस्थ रहे थे। अपने अंतिम वर्ष में कुछ वर्षों से अनदेखी की गई मधुमेह के कारण उनके गुर्दे (किडनी) ठीक तरह से काम नहीं कर रहे थे। अपनी विषम वित्तीय स्थिति में भी मैं, उन्हें डायलिसिस के लिए ले जाया करता था। पहले वे तैयार होते थे। फिर उन्होंने मना किया यह कहते हुए कि - 

बेटा अब डायलिसिस और महँगी दवाओं पर खर्च बंद कर दो। मैं इन पर भी चार-छह महीने से अधिक ना जी पाऊंगा। तुमने अभी ही अपने दो बेटे और एक बेटी के विवाह पर अपनी सारी बचत व्यय कर दी है। एक साल में तुम सेवानिवृत्त भी हो जाओगे। बचा सब और उधार का पैसा लगाकर, मेरे उपचार के लिए खुद पर संकट नहीं बुलाओ। मैंने बहुत जी लिया, तुम कुछ थोड़ा अपने जीवन के लिए भी रख छोड़ो। 

मैंने कहा था - पिताजी हम पर जब आएगी तब देखेंगे। मैं अभी आपको ऐसे जाने नहीं दे सकता। 

पिता नहीं माने थे। अस्पताल ना जाने एवं दवाएं ना लेने के लिए, वे बिलकुल अड़ गए थे। मैंने भी सुना था कि अंतिम छह महीने जीने के लिए व्यक्ति, अपनी जमा पूंजी का 60% तक खर्च कर देता है। लाचार होकर मैंने, उनके जीवन पर खतरे को आने दिया था। 10 दिन में ही उनकी हालत अत्यंत बिगड़ गई। 

मैंने कहा - पिताजी, दवाएं ले आता हूँ। मुझसे, आप के कष्ट नहीं देखे जाते। 

रात भर वेदना में तड़फते रहे, कराहते हुए पीड़ा से चिल्लाते रहे थे तब भी उन्होंने हाथ उठा कर मुझे इसके लिए मना कर दिया था। 

बाद में, उनको पेशाब लगते हुए भी हो नहीं रही थी। मैंने अस्पताल ले जाने के लिए ऑटो ले आया था। वो कराहते हुए क्षीण स्वर में बोले थे - 

नहीं, मुझे घर पर ही मरने दे। दवा नहीं कराओ, हो सके तो विष ले आओ। जिसे खाकर जल्द मरुं तो मुझे इस पीड़ा से मुक्ति मिले। 

वे अपने दवा नहीं लेने के निश्चय पर इस असहनीय वेदना में भी दृढ़ थे। 

तब मुझे पहली बार विचार आया था कि यदि देश, सस्ता उपचार सुलभ नहीं करा सकता था तो मर्सी किलिंग की ही व्यवस्था कर देता। इससे, पिता को और साथ ही मुझे उनको कष्ट में देखने की, पीड़ा से शीघ्र मुक्ति मिल सकती। 

भयंकर वेदना सह कर अगली दोपहर उन्होंने प्राण त्याग दिए थे। उनके जाने के बाद पिछले दस साल जब तब उनकी ऐसी मृत्यु का स्मरण एवं अपनी असहाय स्थिति मुझे ग्लानि से भर देते थे। 

ऐसी ग्लानि में मैं सोचा करता कि जब क्षमता कम होने पर, कोई भी उत्पाद अधिक मात्रा में निर्मित किया जाता है तो उत्पाद की मात्रा तो बढ़ती है मगर गुणवत्ता नहीं रह जाती है। ऐसा मैं, अपने देश की जनसंख्या को देख कर सोचा करता था। जो 70 साल में तीन गुनी से भी अधिक हो गई थी।  

जब जनसंख्या 40 करोड़ थी तो नागरिकों में मानवीय गुण देखे जाते थे। स्वास्थ्य की देखभाल करने वाले, सेवा भाव से शुल्क कम लेते थे और परामर्श एवं औषधियाँ की शुद्धता सुनिश्चित रखते थे। 

देश में क्षमता से अधिक औलाद पैदा की जाने की प्रवृत्ति ने परिवेश ऐसे खराब किया है कि चिकित्सा क्षेत्र से सेवा के भाव वाले, गुण लुप्तप्राय हो गए। दवा एवं चिकित्सकीय परामर्श में मिलावट आ गई। नकली दवाओं एवं महंगे उपचार से रोगी की क्या दशा हो रही, इसे देखने की किसी को फुरसत एवं करुणा नहीं रही। 

औषध निर्माता एवं चिकित्सक तो अधिक हो गए मगर सेवा और औषधियों की गुणवत्ता कम हो गई। 

मैं ग्लानि बोध में रहा करता और यह देख व्यथित होते रहता कि अपने समर्पित भाव से किए अध्यापन से भी मैं, अपने शिष्यों में समाज समर्पित विचार एवं संस्कार नहीं डाल पाया था। वे गणित, विज्ञान में तो प्रवीण हुए थे। अंग्रेजी फर्राटेदार बोलने एवं लिखने लगे थे मगर नैतिक शिक्षा उन्होंने, मात्र अंक अर्जित करने के लिए ग्रहण की एवं भुला दी थी। 

तब आ गए कोरोना के समय में, वरिष्ठ जनों के लिए घर में ही रहना अनुशंसित किया गया था। मुझे घर में रहना चाहिए था। मगर हर किसी में आपदा की स्थिति में अधिक धन कमाने की होड़ देख, मैं व्यथित हुआ। मैं क्या कर सकता हूँ, इस पर मैंने गंभीरता से विचार किया था। फिर अपने छोटे प्रयास में, मैं सब्जी-फल का हाथ ठेला लिए शहर की गलियों में घूमने लगा। कम दरों पर लोगों को ये उपलब्ध कराते हुए, मुझे संतोष मिला करता था। 

मगर इसका परिणाम, बुरा निकला। 

मैं कोविड की घातक, दूसरी लहर में संक्रमित हो गया। अपने बेटों के मना करने के बाद अपनी मनमानी करके, मैंने उन पर संकट खड़ा कर दिया था। उन्होंने अपने दादा की घर में, बहुत कष्टप्रद मौत देखी थी। उन्होंने मेरे लाख मना करने के बाद भी मुझे, कोविड अस्पताल में भर्ती करा दिया। 

मेरे बेटों ने, डॉक्टर के परामर्श पर, 25000 की महंगी दरों पर मेरे लिए, 6 इंजेक्शन का प्रबंध किया। इंजेक्शन लगाए जाने पर भी मुझ पर अच्छा असर नहीं दिखा। इस बीच जिससे बेटों ने इंजेक्शन खरीदे थे, वह पकड़ा गया। पता चला कि उसने नकली इंजेक्शन बनाए और बेचे थे। 

तब शायद परोपकार की मौत के रूप में मेरी मौत सामने खड़ी थी। उसी रात गरीबी में आटा गीला होने जैसी बात हुई। ठसाठस भरे अस्पताल में श्वास लेने की परेशानी में, मैं जाग रहा था। आसपास के बिस्तरों पर बूढ़े रोगियों को कोरोना से तड़फता देख, मेरा ह्रदय द्रवित था। तब मैं सोच रहा था कि यदि हमें उपचार नहीं दिया जा सकता है तो मर्सी किलिंग की अनुमति ही दे दी जाए। जिससे इन्हें और मुझे, कम से कम, परिजनों पर भार बने बिना, कम तकलीफ में मौत मिल सके। 

दिमाग में यह विचार ही मेरा अंतिम रह गया था। 

मैंने देखा, हमारे हाल में धुआं भरने लगा था। हम सब मरीज जो पहले ही खांसी से परेशान थे सबकी खांसी और बढ़ गई। तब ही हाल के एक तरफ, आग की लपटें दिखाई पड़ने लगी थीं। आग, तेजी से पास पास लगे बिस्तरों में फैलते हुए, मुझ तक भी पहुंच गई थी। 

कोई कुछ कर पाता उस के पहले ही मैं झुलस कर मर गया था। मुझे पता नहीं मेरी मौत, कोविड से हुई मौत मानी गई या आग से जलने से …  

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

01-05-2021