Friday, November 13, 2020

दिव्य शक्ति (3) ..

 


दिव्य शक्ति (3) .. 

4 दिन बाद, आयुर्विज्ञान महाविद्यालय में प्रवेश परीक्षा, मैंने आशा अनुसार अच्छी तरह दी थी। अब मेरे पास बारहवीं तथा इस प्रवेश परीक्षा के परिणामों के बाद, आयुर्विज्ञान महाविद्यालय में प्रवेश हेतु 3 महीने का समय था। 

उस रात देखे सपने से, मेरे ध्यान में, मेरा नया जीवन लक्ष्य था। अतः इस अवधि का प्रयोग मैंने, उसकी ओर पग बढ़ाने में करना तय किया। फिर पापा से अनुमति मिल जा जाने पर मैंने, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ प्राइवेट इन्वेस्टीगेशन, नई दिल्ली में, 3 महीने का इन्वेस्टिगेटर कोर्स ज्वाइन कर लिया। 

कोर्स के अंतर्गत सर्टिफिकेशन पूर्ण करने के पहले, तीसरे महीने में, मुझे इंस्टीट्यूट की ओर से 2 प्रकरण, इन्वेस्टिगेशन के लिए दिए गए। 

पहले प्रकरण में, मेरी क्लाइंट एक पत्नी थी। वह, अपने पति के, विवाहेत्तर संबंध होने के संदेह की, जाँच चाहती थी। मैंने, उनसे, उनके पति के फोटो एवं अन्य जानकारी ली थी। 

अपनी क्लाइंट से भेंट के बाद उस रात, डिनर के लिए मैं, एक रेस्टोरेंट में गया। तब मेरे केस की दृष्टि से, सुखद संयोग हुआ। मुझे वहीं, वह रसिक मिजाज पति, एक सुंदर युवती के साथ, पास की टेबल पर आकर बैठता दिखाई दिया।

यह देखते ही, मेरा डिटेक्टिव दिमाग तुरंत सक्रिय हो गया। मैंने, डिनर का विचार टाल दिया। फिर तुरंत ही वहाँ के एक वेटर को, 500 रूपये के बदले अपनी योजना अनुसार काम के लिए राजी कर लिया। तब उस वेटर द्वारा दी गई, कैप और जैकेट मैंने पहन ली। 

योजना अंतर्गत, रेस्टोरेंट किचन से, सामग्री तो वेटर को ही लाना थी। मगर उस टेबल पर आर्डर लेने एवं सर्व करने के लिए, बार बार जाने के अवसर मुझे मिल गए थे। इस काम के बीच, मैंने उन की टेबल के पास दीवार पर, गुप्त रूप से मेरे बेग में रखी, रिकॉर्डिंग मशीन एवं कैमरा, फिट कर दिये। 

इस तरह मैंने, दोनों के बीच की बातें एवं दोनों के फोटो कैप्चर किए। उनकी डिनर के अंत में, बिल की राशि लेते हुए, उन (पति) महोदय से, मेरी आँखे मिलीं थीं। तब मुझे क्षणांश में, एक इंद्रधनुषी किरण, मेरी आँखों से निकल कर उसकी आँखों में जाती दिखाई दी थी। 

इस इंद्रधनुषी किरण ने मुझे, स्वयं आश्चर्य चकित किया था। तब मैंने, इसे अपना भ्रम समझ कर दिमाग से झटक दिया था। अगले दिन मैंने, वहाँ रिकार्ड किये वार्तालाप एवं फोटो, अपने क्लाइंट को सौंपे थे। उनसे, पत्नी के संदेह की पुष्टि होती थी। 

दूसरे प्रकरण में क्लाइंट एक प्रेमिका थी। उसे शक था कि उसका मंगेतर, अन्य लड़कियों से भी, फ़्लर्ट कर रहा है। अपनी क्लाइंट से विवरण लेकर जब मैं लौट रहा था तब, मुझे वहाँ हुए संयोग ने पुनः चकित किया। 

मेरे विशेष यत्न बिना, एक ट्रैफिक लाइट पर मुझे, वह मंगेतर युवक, बाइक पर एक मॉडर्न लड़की के साथ, ग्रीन लाइट की प्रतीक्षा में खड़े मिल गया। 

तब, मैंने वहीं से उनका पीछा करना शुरू कर दिया। उस युवक ने एक पार्किंग में बाइक खड़ी की थी। उसके बाद वे दोनों, एक मॉल में गए थे। मैं किसी कुशल डिटेक्टिव की तरह, उनका पीछा कर रहा था। मॉल गलियारों के साथ ही, जिन जिन शॉप पर वे जा रहे थे मैं, उनके काफी निकट रहते हुए पीछा कर रहा था। साथ ही, उनके बीच हो रही बातों को रिकॉर्ड करते हुए उनका वीडियो शूट करते जा रहा था। 

यह सब करते हुए, मैंने सतर्कता भी रखी हुई थी। मैंने, अपनी डिटेक्टिव वाली हरकतें, मॉल में जगह जगह लगे हुए, सर्विल्लेंस कैमरों से बचाई थीं। मॉल में करीब 2 घंटे तक, यह सिलसिला चला था। 

अंत में जब वे मॉल से निर्गम के रास्ते में थे, मैं अचानक लड़खड़ा जाने के बहाने, उस युवक से टकराया था। फिर सॉरी कहते हुए, उसे गिरने से बचाने का प्रयास दिखाते हुए मैंने, एक क्षण को उससे, करीब से आँखें मिलाई थी। यहां भी, उस क्षण में मुझे, अपनी आँखों से निकल कर, उसकी आँखों में जाती हुई, एक इंद्रधनुषी किरण अनुभव हुई थी। 

दूसरी बार ऐसा होने से मुझे लगने लगा था कि इंद्रधनुषी किरण, मेरा भ्रम नहीं था। 

अगले दिन मैंने मॉल में की गई, रिकॉर्डिंग एवं वीडियो जिनसे, क्लाइंट (प्रेमिका) का शक, सही साबित होता था, उसे सौंप दिए थे। 

ऐसे इन्वेस्टीगेशन पूर्ण करके मैंने, अपने कोर्स की अंतिम रिपोर्ट में, इंद्रधनुषी किरण का जिक्र छोड़ कर, बाकी पूरी घटनायें एवं अपनी की गई जाँच विवरण लिख कर, जमा कर दिए थे। 

फिर मेरा, इन्वेस्टिगेटर (डिटेक्टिव) सर्टिफिकेशन पूर्ण हुआ था। आत्म में, नई दिल्ली छोड़ने के पूर्व, सौजन्य वश मैंने, बारी बारी अपने दोनों क्लाइंट्स से भेंट की थी। उनसे मिला फीडबैक क्रमशः ऐसे था -

पत्नी क्लाइंट् ने बताया - 

“जिस दिन, मैं उनके पति से रेस्टोरेंट में मिला था, उस दिन के बाद से उनके, पति महोदय घर समय पर पहुँचने लगे थे। देर रात तक, उनके बाहर रहने का सिलसिला खत्म हो गया था। पत्नी ने यह भी बताया कि तभी से, पति महोदय, उनसे, 10 वर्ष पूर्व हुये, उनके विवाह के समय वाले प्यार और समर्पण से पेश आने लगे थे। 

अंत में क्लाइंट (पत्नी) ने, मुझसे कहा - मैं, आपका अत्यंत आभार मानती हूँ कि आपने अविश्वसनीय चमत्कार कर दिया है। मैं, अपने पति के साथ अब, पूर्व की भांति बहुत खुश हूँ।”

फिर दूसरी क्लाइंट से मैं मिला था। प्रेमिका क्लाइंट् ने बताया कि - 

“आपसे मॉल में टकराने के अगले दिन ही, मेरे मंगेतर ने, मुझसे क्षमा माँगी है। मंगेतर ने मुझे, यह भी बताया है कि उसकी काम भावना, उसे भटका रही थी। वह नई नई लड़की में सुख ढूँढ रहा था। कल से, उसका कई लड़कियों में सुख मिलने का, भ्रम मिट गया है। उसने (मंगेतर ने), मुझे, यह भी बताया है कि अब वह मुझे छोड़कर, अन्य सभी लड़की की ओर जब देखता है तो उसकी दृष्टि में उनमें, उसे, अपनी छोटी बहन की छवि दिखने लगती है। 

उसने, मुझे विश्वास दिलाया है कि वह शीघ्र ही मुझसे विवाह करना चाहता है। आगे आजीवन वह, मेरे प्रति निष्ठा एवं विश्वास सहित मेरा साथ निभाएगा। 

इस क्लाइंट (प्रेमिका) ने भी अंत में यही कहा - आपके माध्यम से, मेरे जीवन में एक चमत्कार सा हुआ है। जिसके लिए मैं, आपकी अत्यंत आभारी हूँ।” 

दोनों ही फीडबैक से मुझे स्पष्ट संकेत मिल रहा था कि निश्चित ही, मेरे भले लक्ष्य पर काम करते हुए, मुझमें कोई दिव्य शक्ति आ जाती है। 

निःसंदेह, दिव्य शक्ति के साथ हुए बिना यह संभव नहीं है कि मेरे किसी प्रयास के बिना, मेरे टारगेट, संयोग से ही मुझे, रेस्टोरेंट एवं ट्रैफिक लाइट पर मिल जाते हैं। 

निश्चित ही यह कोई दिव्य शक्ति है जो, मेरी आँखों से इंद्रधनुषी किरण उत्सर्जित करती है। 

संभवतः क्षणिक रूप से उत्सर्जित यह इंद्रधनुषी किरण, बुरे चरित्र के व्यक्ति की आँखों में प्रवेश करके, उनकी आँखों में पड़े अनैतिक वासना का जाला, नष्ट कर देती है।  

किसी भी मनुष्य की आँखों में पड़े, इस अति वासना के जाले के साफ़ होते ही, व्यक्ति को अपने परिवार एवं समाज दायित्व स्पष्ट दिखने लगते हैं। ज्यों ही ऐसा दायित्व बोध उन्हें होता है। उनकी दृष्टि एवं ह्रदय में हर नारी के लिए माँ, बहन एवं बेटी सा आदर, श्रध्दा एवं स्नेह उमड़ आता है।  

तब आँखों से साफ हो गए, वासना के जाले के फलस्वरूप, किसी भी व्यक्ति की दृष्टि, अपने साथी के प्रति निर्मल एवं समर्पित हो जाती है। फिर इनके आचरण एवं कर्म, इनकी पत्नी /मंगेतर के प्रति आदर्शों से परिपूर्ण हो जाते हैं। 

तत्पश्चात मैं, अपने शहर/घर, लौट आया था। इस बीच मेरे, बारहवीं तथा आयुर्विज्ञान प्रवेश परीक्षाओं के परिणाम, आशा अनुरूप अच्छे आ चुके थे। घर लौटने के चौथे दिन ही तब मैंने, आयुर्विज्ञान महाविद्यालय में प्रवेश संबंधी औपचारिकताएं पूरी कर दीं। 

क्लासेज एवं प्रैक्टिकल की सुविधा की दृष्टि से फिर मैं, महाविद्यालीन छात्रावास में ही रहने लगा। जल्दी ही नये कोर्स एवं नए वातावरण में अढ़ाई महीने बीत गए थे। कल ही दीपावली अवकाश में, मैं घर लौटा था। 

मेरे घर आने से, दादा-दादी, मम्मी-पापा एवं मेरी छोटी बहन, बहुत प्रसन्न हुए थे। 

अब आज दीपावली है। अप्रत्याशित रूप से, अभी मेरे मोबाइल पर डॉ. देसाई का कॉल आया है। उन्होंने बताया कि हमारे परिवार के लिए, दीपावली की शुभकामनाएं देने की भावना से वे, हमारे घर आना चाहते हैं। 

उनके पूछे जाने पर मैंने, उन्हें अपने घर का पता बता दिया। तदुपरांत अपने पापा को बताया कि डॉ. देसाई दोपहर, हमारे घर आने वाले हैं। इस पर पापा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा - इतने प्रतिष्ठित तथा योग्य चिकित्सक का, हमारे घर आना बड़े भाग्य की बात है। 

डॉ. देसाई ने मोबाइल पर नहीं बताया था कि वे सपरिवार आएंगे। इसलिए दोपहर उनका सपरिवार आना, हमारी आशा के विपरीत सुखद आश्चर्य का सबब हुआ। 

घर के द्वार पर ही उनके स्वागत में, हाथ जोड़ कर, मेरे दादा-दादी एवं मम्मी-पापा आ खड़े हुए।

डॉ. देसाई, आंटी एवं उनके बच्चों ने पहले, मेरे दादा-दादी के चरण छूकर उनका आर्शीवाद लिया। फिर डॉ., पापा से एवं आंटी, मेरी मम्मी से गले मिले। अनन्या एवं उसके छोटे भाई ने, मेरी मम्मी, पापा के भी चरण स्पर्श किये। 

मैंने, अनन्या को छह महीने पहले अचेत एवं घायल अवस्था में देखा था। आज, जीवन से भरपूर उसकी आँखे एवं उसका खिला मगर थोड़ा लजाया सा मुखड़ा मुझे, बहुत प्यारा लग रहा है। मुझे लग रहा है मैंने, बहुत लड़कियाँ देखीं हैं लेकिन अनन्या से सुंदर शायद कोई और नहीं है। 

इस अनुभूति से मुझे, प्रसन्नता हुई कि उस दिन, जब उसके प्राणों पर आ गई थी तब, दिव्य शक्ति ने, मुझे उसकी सहायता के लिए, पहले ही वहाँ पहुँचा दिया था। 

मैं, इसी विचार में खोया हुआ था कि मैंने, अपने कंधे पर हाथों का स्पर्श अनुभव किया। मैंने चौंक कर देखा, ये हाथ डॉ. देसाई के थे। वे, मुझसे कह रहे थे - 

हम बहुत दिनों से, यहाँ आने के बारे में सोचा करते थे। मेरी अति व्यस्तता के चलते, आज ही अनन्या की जिद पर हम समय निकाल सके हैं। अनन्या, तुम्हें, उसका, पुनर्जीवन प्रदान करने वाला मानती है। वह तुम्हारे दर्शन के लिए, तब से ही अत्यंत उत्सुक रही है। 

यह सुनकर मेरी दृष्टि, अनायास अनन्या पर गई थी। अपने पापा की ओर से ऐसा बता दिया जाना, शायद उसके लिए अप्रत्याशित था। 

यह सुनकर वह लजा गई थी। अनन्या के किशोरवया मुखड़े पर लालिमा आ गई थी। ऐसे में उसका मुख, नए खिले गुलाब पुष्प की तरह अत्यंत ही मन लुभावना दिखाई पड़ रहा था। 

उसकी पलकें झुक गईं थीं मगर साथ ही, उसके ओंठों पर चित्ताकर्षक एक अत्यंत मोहक सी मुस्कान थी।  

तब आंटी ने, अपनी बेटी पर केंद्रित हो गई चर्चा से, अनन्या की लजा जाने की मनः स्थिति को समझते हुए, चर्चा की दिशा बदलने के अभिप्राय से, हाथ जोड़कर सभी से कहा -

सभी को शुभ, अति शुभ दीपावली ..  

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

13-11-2020  


Wednesday, November 11, 2020

दिव्य शक्ति (2) ..

 दिव्य शक्ति (2) .. 


परीक्षा देने जाने निकला तो और ऐसे दिनों कि तरह मैं, विषय मनन नहीं कर रहा था। मन में मेरे दो स्वप्नों पर, विचार मंथन चल रहा था। 

एक मेरा दिवा स्वप्न, जिसमें मैं, आगे के जीवन में स्वयं को आईएएस हुआ, देखा करता था। 

दूसरा - रात बल्कि यह कहें कि इस सुबह देखा मेरा स्वप्न, जिसमें मुझे, प्राइवेट डिटेक्टिव होने में, अपने जीवन का लक्ष्य दिखाई दे रहा था। 

जी हाँ, मेरे जीवन का नया लक्ष्य - इन रोज रोज की दुःखद खबरों के कटु क्रम को रोक देने का था। 

हम नित दिन ही कभी, लड़कियों के बलात्कार की, कभी उसके बाद हत्या की एवं कहीं एसिड अटैक की शिकार होने के समाचार सुन-पढ़ रहे थे। यही नहीं कई युवतियाँ, हमारे आस पास ही मौजूद अय्याश लोगों की वासना पूर्ति के लिए सेक्स रैकेट में फँस रही थीं। 

यह सब तब हो रहा था जब हमें यह तथ्य भली-भाँति पता था कि हमारे समाज में, सभी परिवार के सम्मान में सर्वोपरि बात, परिवार की नारी सदस्याओं की अस्मिता एवं चरित्र का बने रहना है। 

इस द्वंद में, आईएएस होने के मेरे दिवास्वप्न पर, अब नारी दशा सुधार के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वाला सपना, मुझ पर हावी हो रहा था। 

इन विचारों में खोया मैं, परीक्षा केंद्र तक पहुँच गया था। 

मैंने परीक्षा पेपर बहुत अच्छा हल किया था। इससे मुझे, 95% से ज्यादा अंक की आशा हो गई थी।  

परीक्षा खत्म होने के अगले दिन से ही मैंने, पापा से कार सिखाने की इक्छा बताई थी। मैं, अभी 18 का नहीं हुआ होने से मेरा लर्निंग लाइसेंस नहीं हो सकता था। अतः कम ट्रैफिक वाली जगहों में पापा ने मुझे, कार चालन सिखाना आरंभ कर दिया। 

चौथे दिन रविवार था। पापा बाहर गाँव गए थे। मैंने, मम्मी से जिद की थी फिर, सुबह अकेले ही कार लेकर उस सड़क पर पहुँच गया था, जिस पर प्रमुख रूप से स्कूल/कॉलेज स्थित हैं। 

रविवार होने से वहाँ सड़क पर, यदा कदा ही कोई वाहन या लोग चलते मिल रहे थे। अतः यह मेरे अभ्यास का अच्छा अवसर था। उस समय मैं, कार रोक कर डैशबोर्ड पर विभिन्न स्विच आदि के फँक्शन देख रहा था। 

तब सामने मोड़ पर, एक गाय के अचानक सामने आ जने से, स्कूटी पर आ रही लड़की का, हड़बड़ाहट में स्कूटी पर नियंत्रण नहीं रह गया था। लग रहा था कि उसने, अभ्यास की कमी होने से, ब्रेक की जगह क्लच पर हाथ कस दिया था। इससे स्कूटी के चक्के स्लिप हुए थे। लड़की, सड़क पर गिर गई थी। 

मैंने, यह सब होता देखा था। तब, उसकी सहायता की दृष्टि से मैंने, कार स्टार्ट की एवं गिरी हुई लड़की के साइड में ले जाकर रोकी थी। सड़क पर पास में कोई नहीं था। मैं, कार से उतरा तो देखा कि लड़की के शरीर में, कोई हलचल नहीं है। उसके सिर से खून बह रहा था। घाव उसे, पत्थर पर गिरने से लगा था। लड़की, अचेत हो गई थी। 

मैंने, कार में देखा तो उसमें, मम्मी का एक स्कार्फ मुझे मिला। मैंने शीघ्रता से यह स्कार्फ, लड़की के घाव पर कस कर बाँध दिया। फिर लड़की की स्कूटी किनारे खड़ी कर लॉक की थी। मैंने, लड़की को उठा कर, कार की पिछली सीट पर लिटा दिया। सड़क पर पड़ा उसका मोबाइल फ़ोन भी भी उठा लिया एवं फिर कार, इंटरनेशनल हॉस्पिटल की दिशा में दौड़ा दी थी। 

मैंने, हॉस्पिटल की कार पार्किंग में कार खड़ी की थी। फिर, दौड़ कर वहाँ स्टाफ को इमरजेंसी बताई थी। स्ट्रेचर पर लड़की को, आपात चिकित्सा कक्ष में ले जाया गया था। वहाँ उपलब्ध डॉक्टर के चेहरे पर, लड़की की हालत देखते ही, अत्यंत चिंता के भाव दिखे थे। उन्होंने लड़की की जाँच आरंभ कर दी थी। उनके कहने पर मैंने, ओपीडी काउंटर की औपचारिकतायें पूर्ण की थी। 


तब, लड़की के मोबाइल पर रिंग आई थी। मेरे द्वारा, रिसीव करते ही, दूसरी तरफ से आवाज आई - अनन्या, कहाँ हो तुम, कितनी देर हो गई। आ जाओ अब। स्कूटी अब, कल चला लेना। 

मैंने, इतने से ही पूरी बात समझ ली थी। मैंने रिप्लाई में कहा - आन्टी, अनन्या स्कूटी से गिर गई है। उसे, मैं इंटरनेशनल हॉस्पिटल ले आया हूँ। आप जितनी जल्दी हो यहाँ आ जाइये। वैसे आप चिंता नहीं कीजिये, मैंने हॉस्पिटल का आरंभिक शुल्क भुगतान कर दिया है और अनन्या का उपचार आरंभ हो चुका है। 

तब आंटी ने अत्यंत चिंता में कहा - बेटे, इंटरनेशनल हॉस्पिटल में ही अनन्या के पापा, डॉ देसाई हैं। तुम उनसे मिलो। यह सब उन्हें बताओ। कुछ देर में, मैं भी वहाँ आ रही हूँ। 

फिर उन्होंने फोन काट दिया। मैंने पूछताछ की तो पता चला कि डॉ देसाई न्यूरो सर्जन हैं। वे, इस समय एक इमरजेंसी पैशेंट की जाँच में व्यस्त हैं। 

मैं, ओपीडी में वापिस आया वहाँ पता चला कि अनन्या अभी, डॉ देसाई की जाँच में है। 

इससे मुझे संतोष हुआ कि अनन्या अब, एक कुशल डॉ की जांच के साथ ही, अपने पापा के भी पास है। अब हॉस्पिटल शुल्क एवं दवाओं की चिंता से मैंने, स्वयं को मुक्त पाया था। 

मैं, प्रतीक्षा कक्ष में बैठकर, डॉ देसाई के फ्री होने की प्रतीक्षा करने लगा। तब अचंभित हुआ मैं, स्वयं से प्रश्न कर रहा था कि मुझे, कार चलानी तो ठीक तरह आती नहीं थी। यह कैसे मुझसे हो गया कि मैं, शहर के ट्रैफिक में 8 किमी बिना बाधा यूँ, कार चला लाया?  

उस रात्रि के स्वप्न और आज ऐसे कार चला लेने से मुझे लगा कि कभी कभी, मेरे साथ कोई दिव्य शक्ति हो जाती है। जिससे, चमत्कारी तरह की ये कुछ बातें, मेरे साथ हो रही हैं। 

मैं विचारों में खोया बैठा था कि लगभग 15 मिनट बाद मुझे, ढूँढ़ते एक अस्पताल कर्मी आया, उसने कहा आप आइये, डॉ देसाई ने, आपको बुलाया है। 

मैं, डॉ देसाई के कक्ष में पहुँचा तो उन्होंने अपनी कुर्सी से उठकर, स्नेह से मुझे गले लगाते हुए कहा - 

अनन्या को, अगर तुरंत ही अस्पताल नहीं लाया जाता तो उसके जीवन पर खतरा हो जाता। मैं, अनन्या का, डॉ. ही नहीं अपितु उसका पापा भी हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि कैसे मैं, तुम्हारा आभार व्यक्त करूं। तुम्हारे द्वारा, अनन्या को, समय पर यहाँ लाया जाना, हम सभी पर तुम्हारा महान उपकार है। 

इस पर मैं, कुछ कह पाता उसके पहले, लगभग 40 वय की एक महिला, बदहवास सी कमरे में आईं। डॉ. के व्यवहार से, मैं समझ गया कि ये, अनन्या की मम्मी हैं। डॉ. ने उन्हें बताया -

यही हैं, जो अनन्या को शीघ्रता से अस्पताल लाये हैं। जिससे, अनन्या के जीवन पर बन गए खतरे को समय रहते दूर किया जा सका है। 

आंटी ने, डॉ से पूछा - क्या, अनन्या से मैं अभी मिल सकती हूँ?

डॉ ने कहा - 10 मिनट रुकिए, तब तक उसकी चेतना वापिस लौट आने की संभावना है।  

अनन्या की मम्मी ने तब मुझसे पूछा - कैसे हुआ यह सब?

प्रत्युत्तर में, मैंने उन्हें पूरी दुर्घटना बताई। तत्पश्चात डॉ ने, मुझसे ओपीडी में भुगतान किये शुल्क के बारे में पूछा। मेरे बताने पर उन्होंने गूगल पे के द्वारा, यह राशि मुझे ट्रांसफर की। फिर उन्होंने, मुझे अपना कार्ड दिया और कहा - 

बेटे, किसी भी प्रकार की जरूरत पर आप, मुझे याद करना। आपकी किसी भी प्रकार से सहायता कर सकने में, हमें अत्यंत प्रसन्नता होगी। 

मैंने, तब अनन्या का सेल फोन एवं स्कूटी की चाबी उन्हें लौटाई। फिर कहा - 

सर, मुझे तो अभी ही, आपकी सहायता की जरूरत है। मै, अभी कार चलाना सीख ही रहा हूँ। मुझे पता नहीं कि कैसे मैं, अनन्या की चिंताजनक हालत को देखकर, शहर के ट्रैफिक में, 8 किमी कार चलाकर ले आया। मगर मुझे पता है कि अब मैं, वापिस ऐसे कार नहीं चला सकूँगा। 

तब डॉ ने मुझे ऊपर से नीचे तक आश्चर्य से देखा फिर मुस्कुराते हुए, आंटी को भी देखा फिर मुझसे कहा - 

ओह यह बात है, तुम भी मेरी बेटी की तरह अपनी जिद से गाड़ी लिए घूम रहे लगते हो। (फिर समझाने के स्वर में कहा) - देखो बेटे, तुमने देख लिया है कि 14 साल की अनन्या का कैसा हाल हुआ है। मेरी मानो, जब तक तुम्हें ड्राइविंग नहीं आती और तुम्हारे पास लाइसेंस नहीं हो जाता यूँ, अकेले कार ना चलाया करना। 

फिर उन्होंने अस्पताल स्टाफ में से, एक व्यक्ति को निर्देश देकर मेरे साथ किया। इनका काम मुझे, मेरी कार सहित घर छोड़ने एवं वहाँ से लौटते हुए अनन्या की स्कूटी, उनके घर तक पहुँचाने का था। 

अंत में मैंने, आंटी एवं डॉ. का अभिवादन किया था। मेरे लौटने से पहले आंटी ने कहा - 

बेटे, तुम्हारा फोन नं., गूगल पे करते हुए इनके पास आ ही गया है। हम अनन्या के स्वस्थ होने पर, आपके मम्मी-पापा से भेंट करने आयेंगे। 

डॉ ने इस पर कहा - वैसे सब ठीक है लेकिन सिर की चोट होने से, अनन्या को अगले 3 दिन, अस्पताल में ही, ऑब्जरवेशन में रहना होगा। 

तब मैं वापिस लौटा था। कार में बैठकर यह सोच रहा था कि निश्चित ही यह दिव्य शक्ति थी, जिसके होने से, मैं 14 वर्ष की इस अनन्य सुंदरी, अनन्या का संकट मोचक हो सका था …         

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

11-11-2020   


Tuesday, November 10, 2020

दिव्य शक्ति (1) ..

 

दिव्य शक्ति .. 

कल बारहवीं का आखिरी पर्चा था। रात्रि सोने के पहले मैं, पानी का जग लेकर रसोई से लौट रहा था। तब बैठक कक्ष में टीवी चल रहा था। जैसा प्रायः होता था, दादी-दादा ने समाचार चैनल लगाया हुआ था। 

मुझे तब सुनाई पड़ा -

“17 साल की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी निर्दयता से हत्या कर दी गई।“

17 साल पर मेरा विशेष ध्यान गया, यही मेरी उम्र थी। बिस्तर पर लेटकर नींद आने के पूर्व तक मैं, पढ़े गए अंतिम अध्याय का मनन करना चाहता था। 

मगर इस समाचार से व्यथित हो कर मन, मनन से, उचट गया और मेरे विचारों में वह मार डाली गई लड़की छा गई। मैं, स्वयं अपने से, कई प्रश्न-उत्तर करने लगा कि - 

क्या मेरी, यह उम्र मरने की है 

या 

एक सफल जीवन की बुनियाद रचने की है?

अगर मैं, इस दुर्भाग्यशाली लड़की की तरह यूँ मार डाला जाऊँ तो - मेरे दिवा स्वप्नों का क्या होगा, जिनमें मैं, स्वयं को एक आईएएस बन जाते देखा करता हूँ?

कौन होते हैं ये लड़के जो, मेरे तरह ऐसे  दिवा स्वप्न नहीं देखा करते? कैसे वे, सफल व्यक्ति होने की जगह, बलात्कारी और हत्यारे हो जाते हैं?

उनमें कैसे, ऐसी और इस हद तक क्रूरता आ जाती है जिससे वे, किसी लड़की पर जबरदस्ती और उसकी हत्या तक, कर देते हैं?

अगर मैं, ऐसी घिनौनी वारदात करूँ और फिर फाँसी चढ़ाया जाऊँ तो क्या होगा मेरे मम्मी-पापा का? जिन्होंने हमेशा, खुद से ज्यादा, मेरी खुशियों का ध्यान रखा है और जो सपने, उनके अपने जीवन में, साकार नहीं हो सके, उन्हें वे, मेरे जीवन में साकार होते देखना चाहते हैं?

नहीं नहीं! इस जगत में, किसी भी माँ-पिता का यह सपना तो हो ही नहीं सकता कि - उनका बेटा बड़ा होकर बलात्कारी और/या हत्यारा बने!

और ना ही किसी भी माँ-पिता को, यह सोचना तक पसंद होता होगा कि उनकी लाड़-दुलार से पाली-पोसी गई सुकोमल सी बेटी पर कभी, कोई बलात्कार और उसकी हत्या कर देता है। 

ओह! जब कोई माँ-पिता ऐसा नहीं चाहते हैं तो फिर कैसे, उनके बेटे, ऐसे दुष्ट बन जाते हैं? 

नहीं नहीं! मैं ऐसा, दुष्टों वाला काम करके अपने मम्मी-पापा का सिर लज्जा एवं कलंक से नीचा होते नहीं देख सकता। कभी भी मैं, फाँसी चढ़कर या दंडित हो कारावास जाकर, मुझे लेकर, उनके देखे जा रहे सपनों की हत्या नहीं कर सकता। 

इन सब विचारों से मेरे शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ गई। तब मैं, उठकर वॉशरूम गया फिर वापिस आकर मैंने, एक गिलास जल पिया और बिस्तर पर जा लेटा।

मैं, अत्यंत दुःखद इस समाचार से, मन में उत्पन्न विषाद को मन से झटक कर, विषय मनन में ध्यान लगाने का प्रयास करने लगा। इस प्रयास में पता नहीं कब मेरी नींद लग गई। 

रात के गहराने के साथ साथ, मेरी निद्रा भी गहरी होती चली गई। फिर रात्रि के अंतिम पहर में, निद्रा हल्की होने लगी और सोने के पूर्व, रात्रि चले विचारों ने, मेरे अर्धचेतन मन में, एक स्वप्न स्वरूप खींच दिया। जिसमें मैं देख रहा था कि - 

रोज रोज लड़कियों, औरतों पर बलात्कार और हत्या के समाचारों ने मुझे ऐसा व्यथित किया कि मैंने, बारहवीं की परीक्षा दे देने के बाद एक दिन पापा के लेटर पेड पर कुछ पंक्तियॉं लिखी -

पूज्यनीय दादा-दादी, पापा एवं मम्मी, 

मन की शांति के लिए कुछ समय के लिए मैं, अज्ञात वास पर जा रहा हूँ। आप सभी चिंता नहीं कीजियेगा, परीक्षा परिणाम आने के पूर्व तक मैं, सकुशल वापिस आ जाऊँगा। मेरे बारे में कोई कुछ भी पूछे तो उन्हें यह बताइए कि मैं, अवकाश होने से, अपने मित्रों के साथ भ्रमण पर, केरल गया हूँ। मैंने, मम्मी के लॉकर से 5000 रूपये लिए हैं। जिनसे इस प्रवास में, मैं, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करूँगा। क्षमा याचना सहित। 

यह पत्र छोड़कर अगली सुबह, घर में किसी के जागने के पूर्व दबे पाँवों, एक पिट्टू बेग लेकर, मैंने घर छोड़ दिया। अगले दो दिनों में, मैंने कहीं ट्रेन में और कहीं बस में यात्रा की एवं मैं, केदारनाथ पहुँच गया। 

केदारनाथ में रहने का स्थान बनाने के पूर्व, मैंने अपने लिए दो जोड़ी गेरुवी लुंगी और कुरता, खरीद लिए। फिर एक सराय में रहने लगा। 

अगले दिनों में मेरी दिनचर्या सुबह ही स्नान आदि से निवृत्त होकर मंदिर जाने, वहाँ की भक्ति एवं धर्म विद्वान के सत्संग सुनने को हो गई। मैं, भोजन आदि, धर्मालुओं के द्वारा, वहाँ चलाये जाते किसी भंडारे या किसी भोजनालय में कर लिया करता। 

अपनी सुनी गई धर्म चर्चा पर मैं, प्रत्येक रात्रि सोने के पहले, मनन किया करता। जिसमें इस प्रश्न का उत्तर खोजता कि मुझे, यह मनुष्य जीवन, किस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मिला है। 

ऐसे 15 दिन-रात तक यह क्रम चलता रहा। तब एक रात्रि मैं, निष्कर्ष पर पहुँच गया कि मेरा जीवन, मुझे, समाज में नारी की दशा में सुधार लाने एवं परिवार-समाज में, उन्हें आदर तथा पुरुष समान, उन्नति अवसर दिलाने के लिए, कार्य करने हेतु मिला है। 

उस रात्रि मैंने संकल्प लिया कि -

जीवन में, मैं, कभी भी किसी नारी के साथ छल नहीं करूँगा। यह भी कि कभी कोई भटकी (जो मेरी पत्नी नहीं) नारी, मुझमें रूचि ले या किसी लाचारी में अपना सर्वस्व मुझे सौंपने को तैयार भी हो, तब भी मैं, उसकी देह को भोगने की जगह उसे, उसके शील बनाये रखने की प्रेरणा दूँगा।         

साथ ही यह कि जितना मेरा सामर्थ्य होगा उस अनुसार मैं, किसी जरूरत मंद नारी की सुरक्षा, सम्मान और उसके भरण पोषण की व्यवस्था बनाने में उसकी सहायता करूँगा। 

यह भी कि जब भी, दुष्टों द्वारा छली जा रही किसी भी नारी का पता मुझे, मिलता है तो मैं, उसे, उनके चंगुल से मुक्त कराऊंगा। 

यह सब संभव हो सके इस हेतु मैं, शिक्षा उपरांत प्राइवेट डिटेक्टिव के रूप में कार्य करूँगा। ऐसा डिटेक्टिव होकर मैं, जीविकोपार्जन के लिए किसी व्यक्ति को सर्विस नहीं दूँगा। मैं, स्वप्रेरणा से यह कार्य उन प्रकरण की खोज खबर के लिए करूँगा, जिनमें कोई दुष्ट व्यक्ति नारी शोषण का अपराध करना चाहता या करता है।  

मैं, नारी अस्मिता पर संकट के लिए, दोषी व्यक्ति से धन वसूली किया करुंगा। यद्यपि चालू शब्दों में इसे ब्लैक मेलिंग करना कहा जाता है मगर मेरे  उद्देश्य की पवित्रता की दृष्टि से, यह भयादोहन से अर्जित धन ना होकर मेरा पारिश्रमिक हुआ करेगा” 

यह सपना चल ही रहा था तभी मैंने सुना, मेरी मम्मी कह रहीं हैं - उठो बेटा छह बज गये हैं। नौ बजे से, आज तुम्हारी परीक्षा का अंतिम पेपर है। 

मम्मी की आवाज से, मेरी नींद खुल गई थी। जिसे देखना, मैं पसंद कर रहा था और शायद जो आगे भी जारी रहता, हो रही इस नई सुबह का यह मेरा, स्वप्न भंग हो गया था। 

किसी को मैंने इस सपने के बारे में, कुछ नहीं कहा। इस प्रातःकाल, पेपर देने के लिए जाने की तैयारी के बीच मै, सोच रहा था कि मुझे, यह स्वप्न यूँ ही नहीं आया है। अपितु इसे दिखाने के पीछे निश्चित ही कोई दिव्य शक्ति है  …. 

(क्रमशः)

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

10-11-2020


Sunday, November 8, 2020

मैं, यह सब देख लूँगी . .

 

मैं, यह सब देख लूँगी . . 

स्टेशन पापा आये थे। घर तक उनके साथ कार में, मैं अकेली थी। रास्ते में उन्होंने कहा - 

बेटी, मेरे मित्र हैं अनुराग, जयपुर रहते हैं। शायद तुम्हें याद होगा, दस साल पहले कभी, सपरिवार वे घूमने आये थे। तब अपने घर ही रुके थे। 

मैंने कहा - जी, पापा मुझे याद है। उनका बेटा, मोटा है, उसे मैं मोटू कह कर चिढ़ाया करती थी। 

पापा ने कहा - मोटा है नहीं, था। अब स्मार्ट हो गया है। 

मैंने पूछा - क्या वह फिर कभी मिला है, आपसे ?    

पापा ने बताया - अनुराग का कल वीडियो कॉल आया था। उसमें सुचित को भी, मैंने देखा था। अनुराग, कह रहे थे कि यदि तुम पसंद करो तो सुचित से, तुम्हारा विवाह करना चाहते हैं। 

मैं चौंक गई थी। मैं इस बात के लिए तैयार नहीं थी। मुझे सूझ नहीं सका कि पापा से, क्या कह कर इस रिश्ते के लिए मना करूं। मैं, चुप दिखी तो पापा ही आगे बोले - सुचित, आईसीआईसीआई बैंक, जयपुर में ऑफिसर है। 

यह सुनते ही मुझे उत्तर सूझ गया मैंने कहा - पापा, उम्र हो गई है शादी तो मैं भी करना चाहती हूँ। पर सुचित और मेरे जॉब में कोई मेल नहीं है। मैं एमएनसी, में इंजीनियर और वह बैंक में है। मैं पुणे में तो वह जयपुर में है। अगर शादी के लिए मैं, अपना जॉब छोड़ूँ तो मेरी पाँच साल की सीन्यॉरिटी चली जायेगी। 

पापा ने उत्तर  दिया- इसमें कोई समस्या नहीं या तो सुचित, पुणे ट्रांसफर ले लेगा या तुम जयपुर में किसी अच्छी कंपनी में स्विच कर लेना। जिसमें भी तुम्हारे, इस कंपनी के अनुभव और पैकेज अनुसार तुम्हें, ठीक हाईक मिल जाये। 

इस पर मुझे, फिर चुप रह जाना पड़ा। तब तक कार घर के सामने पहुँच गई थी। जहाँ मम्मी एवं छोटा भाई गेट पर मेरी प्रतीक्षा करते मिले। 

मुझे देख उनके चेहरे प्रसन्नता से खिल गए थे। हम सभी आपस में अत्यंत ख़ुशी से मिले थे। 

फिर पापा लंच लेकर, अपनी शॉप पर चले गए। भाई भी पढ़ने के लिए अपने कमरे में चला गया। मम्मी को अकेला देख कर अब, मुझे अपनी बात कहने का मौका मिला। मैंने, अपनी बात कही - मम्मी, कार में पापा, सुचित से मेरे विवाह के प्रस्ताव की बता रहे थे। मैं, यह शादी नहीं कर सकती हूँ। 

मम्मी ने कहा - भला! क्यों नहीं? अनुराग भाई साहब का घर हमसे बीसा अच्छा है। मैंने, सुचित को कल मोबाइल पर देखा है। वह भी दिखने में, तुमसे अच्छा ही कहा जाएगा। 

मैंने, तब साफ़ कह देना ही उचित समझा। मैंने, उन्हें बताया - मम्मी, मेरी ही कंपनी में रॉबर्ट, मेरा कॉलीग्‌ है। मैं, उसे पसंद करती हूँ। 

मम्मी ने चिंतित हो कर कहा - बेटी, अनुराग और हम, एक से, रीति रिवाज और खानपान वाले परिवार हैं। विवाह बाद आपसी तालमेल, तुम्हारे लिए, सुचित के साथ आसान रहेगा। 

मैंने कहा - मम्मी, सुचित से मुझे प्यार नहीं, रॉबर्ट से मुझे प्यार है। यह सिंपल सी बात, आप क्यों नहीं समझ रही हैं?

मम्मी ने समझाते हुए कहा - बेटी, विवाह के समय मुझे भी एक अन्य लड़के से प्यार था। तुम्हारे नाना जी ने, तुम्हारे पापा से विवाह करने कहा, मैंने इन्हें देखा था। मै, पिताजी की बात भी टाल नहीं सकती थी। विवाह कर लिया। तुम्हारे पापा से, मुझे मिले प्यार में, कब भूल गई कि मैं, किसी अन्य से प्यार करती थी, पता नहीं।

मैं, आज सोचती हूँ तो नहीं लगता कि तुम्हारे पापा जैसे आदर और मेरे स्वाभिमान से मुझे कोई और निभा पाता। विवाह के समय आखिर, उम्र ही कितनी होती है जिसमें कोई जीवन की इन गहन भावनाओं को सही तरह से समझ सके।

वह उम्र तो अच्छे चेहरे पर आसक्त कर देती है। गुण एवं अन्य अच्छाई तब अनावश्यक से मानदंड लगते हैं। मेरा विश्वास करो, सुचित से विवाह करके बेटी, तुम भी, यह सच्चाई समझ जाओगी।  

मैंने मम्मी की दृष्टि में निर्लज्ज सी होकर कहा - मम्मी, आपकी विवाह के समय आयु 21 थी। मैं, आज 27 की हूँ। आप समझो (फिर रहस्य खोलने जैसे दबे स्वर में) मम्मी, रॉबर्ट से कभी कभी मेरे शारीरिक संबंध भी रहे हैं। 

मम्मी यह सुन सदमे में आ गईं, उनके मुख को देखा तो मुझे ऐसा लगा जैसे उन्हें काटो तो खून नहीं! वे इतना ही कह सकीं - 

तुम्हें, तुम्हारे पापा ने आर्थिक आत्मनिर्भरता की दृष्टि से शिक्षा एवं जॉब के लिए पुणे भेजा था। यह करके तुमने, हमारा विश्वास तोड़ा है। तुमने तो निर्लज्जता कर ली, मुझे कह दिया। मैं, कैसे उन्हें, यह बता पाऊँगी? 

फिर वे रोने लगीं थीं। मैं जानती थी कि उन्हें मैं चुप नहीं करा सकूँगी। वे स्वयं ही, भाई एवं पापा के सामने सम्हल जायेंगी, सोचते हुए मैंने, उनके सामने से हट जाना उचित समझा था। फिर मैं सोचने लगी कि क्यों, यह प्रसंग बना। इससे तो परिवार में इस दीपावली, समस्त आनंद एवं उल्लास ही मिट जाएगा। 

फिर मैंने, अपने कमरे में आकर रॉबर्ट को कॉल किया। उससे, कहा - पापा-मम्मी, मेरी शादी की बात कह रहे हैं। हम कब तक शादी करें, बताओ?

रॉबर्ट का उत्तर अचंभित करने वाला था। उसने कहा - कैसी बात कर रही हो? हम में, शादी को लेकर कोई कमिटमेंट (वचन बद्धता) कब हुआ था?       

इस बात से मुझे, इतना क्रोध आया कि मैंने, आगे कुछ सुने-कहे बिना कॉल डिसकनेक्ट कर दिया। 

रात पापा ने डिनर करते समय बताया - परसों, सपरिवार अनुराग यहाँ आ रहे हैं। सब ठीक रहा तो वे लोग शायद, रोका करना चाहेंगे। 

मम्मी यह सुनकर भी गंभीर ही दिखीं तो पापा ने पूछा - क्या बात है, तुम खुश नहीं दिख रही हो?

मम्मी ने झूठी हँसी दिखाते हुए कहा - नहीं, नहीं! मैं तो बहुत खुश हूँ। बस उनके स्वागत के लिए, तैयारी की सोचने लगी थी। फिर मम्मी ने कनखियों से मेरी तरफ देखा। मैंने उन्हें देख कर मुस्कुरा दिया था। 

अगले दिन अकेले में, मम्मी ने मुझे कहा - तुम, सुचित से ऐसे पेश आना कि सुचित ही विवाह को हाँ नहीं कह सके। यूँ पूर्व संबंध किसी और से रखकर,  विवाह किसी अन्य से करना ठीक नहीं होगा। 

इस पर कटु मगर, सच बात कहने से मैंने स्वयं को नहीं रोका था। मैंने कहा -

मम्मी, रॉबर्ट से कल, मैंने विवाह के लिए पूछा था। वह विवाह में रूचि नहीं रखता है। सुचित को आने दीजिये, उससे विवाह को मैं राजी हूँ। 

मम्मी ने दुःख एवं हैरानी से पूछा - ये कैसी विचित्र बात करती हो। किसी और से संबंध के बाद, अन्य से विवाह को, तुम्हारी अंतरात्मा कैसे स्वीकार कर सकती है?

मैंने कहा - मम्मी आपकी शादी को अब, 30 वर्ष का समय निकल चुका है। अब यह इतनी बड़ी बात नहीं है।  रॉबर्ट से पहले भी कुछ समय मेरे ताल्लुकात, एक कॉलेज समय के मित्र से थे। रॉबर्ट से भी मेरी शादी में यही बात होती। आप, निश्चिंत रहो मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। 

मेरे नये नये खुलासों से मम्मी के दुःख और तीव्रतर होते जा रहे थे। वे फिर रोने लगीं। उन्होंने रोते हुए कहा - 

तुम्हारे पापा एवं मेरे जैसे सच्चरित्र पालकों को भगवान, ऐसी नाक कटाऊ बेटी कैसे दे सकते हैं!

मैंने उन्हें दिलासा दी - मम्मी, कृपया आप ऐसे नहीं रोयें। मैं, यह सब देख लूँगी। 

मम्मी ने तब कहा - नहीं, अनुराग भाई साहब के अच्छे परिवार को ऐसे धोखे में रखना ठीक नहीं। हमें उनसे यह सच्चाई कहनी होगी। 

मैंने कहा - मम्मी, उनसे कहने की आवश्यकता नहीं है। वे, आपकी तरह के विचारों वाले होंगे। आप विश्वास रखो, यह विषय, सुचित एवं मेरे बीच का है। मैं, सुचित से कल एकांत में यह बात कहूँगी। फिर सुचित चाहेगा तो ही विवाह करुँगी अन्यथा नहीं। 

अगले दिन सब आये थे। भोजन के उपरांत पापा ने, सुचित और मेरे बीच बात के लिए, बाहर सैर कर आने को कहा था। तब रेस्टोरेंट के केबिन में कॉफी पीते हुए, मैंने सुचित से कहा - 

सुचित, बाकी सारी बातें आगे तो हमारे हाथ में होंगी। जिसे आप और मैं सहमति से निभा सकेंगे, ऐसी आशा है। मगर पिछली अपनी एक सच्चाई, जिसे बदला नहीं जा सकता वह मैं, तुम्हें बताना चाहती हूँ। 

यह सुनकर, सुचित चिंताग्रस्त दिखे। मगर प्रकट में उन्होंने पूछा - कहो, क्या बात है?      

तब मैंने कहा - सुचित, कॉलेज में एक एवं जॉब में अभी एक, लड़के से मेरे संबंध, शारीरिक स्तर तक गये हैं। 

फिर मैं चुप हो गई और सुचित के चेहरे पर आते जाते भाव को देखते रही। विचार कर लेने के बाद सुचित ने पूछा - 

अगर हम शादी करते हैं तब भी क्या, यह लड़के या तुम एक दूसरे के पीछे लगे तो ना रहोगे?  

मैंने बताया - नहीं, विवाह बाद मैं तुमसे वचन बध्द रहूँगी। और जहाँ तक उन लड़कों की बात है वे, मुझे लेकर गंभीर कभी नहीं थे। अतः उनके तरफ से भी ऐसी कोई बात नहीं होगी। 

सुचित ने कहा - तब मुझे, विवाह पर कोई आपत्ति नहीं। 

मुझे, सुचित की ओर से इतने कम प्रतिरोध की आशा नहीं थी। मैंने संदेह पूर्वक पूछा - 

सुचित, क्या तुम्हारा भी ऐसा कोई इतिहास है?

सुचित ने कहा - नहीं, पहले मैं पढ़ने में एवं अब अपने काम में इतना व्यस्त रहा हूँ कि मुझे इन बातों का समय नहीं रहा। अगर समय होता भी तो मेरे संस्कार मुझे रोक लेते। 

मैं चकित हुई। मैंने तब पूछा - आप सुशील होते हुए भी, मेरे तरह की लड़की से शादी के लिए कैसे हाँ कर रहे हो?

सुचित ने कहा - तुम्हारी, इस सच्चाई के कारण कि तुमने, मुझे, मेरे द्वारा पूछे बिना, यह सब बता दिया है। आज जो चल रहा है उसमें और भी कुछ लड़कियाँ ऐसी होंगी। मगर कोई अन्य, नहीं लगता कि मुझे, यह सब कहने का नैतिक साहस जुटा सकती। 

सुचित के महान विचारों को जानकर उसके प्रति श्रद्धा में, मैं मन ही मन नतमस्तक हुई। साथ ही मम्मी के प्रति भी आभारी हुई जिनसे, मुझे इस सच्चाई के कहने की प्रेरणा मिली थी। मैं, सोचने लगी कि काश हर लड़की को ऐसी गलती ना करने का विवेक मिले। 

मैंने आभार जताते हुए कहा - आपकी मेरे लिए क्षमा के लिए बारंबार आभार। 

सुचित ने कहा - मेरा विवेक, लड़कों की खराबियों के लिए लड़की अकेले को दोष देना ठीक नहीं मानता है। यह लड़कों का भी दोष है जिससे, लड़की अपने पति के बाँहों में, बेदाग़ इतिहास के साथ नहीं जा रही हैं। 

वे लड़के यूँ तो अपने लिए, बेदाग़ लड़की चाहते हैं। लेकिन उन जैसे लड़के और भी हैं ऐसे में किस किस को, कोई बेदाग लड़की मिल सकती है? 

ग्लानिबोध में सोच रही थी - मुझे मिल गए सुचित, लेकिन असंभव है मेरी जैसी किसी और लड़की को कोई सुचित मिले!

अपनी सीट से उठकर मैं उनके पास गई थी। मैंने, ग्लानि सहित, सुचित के कंधे पर अपना सिर रखा था। 

तब सुचित अपने हाथों से, मेरी पीठ पर थपकियाँ दे रहे थे, ऐसे, जैसे, कोई पिता दुलार से, अपनी बेटी को आगे गलती ना करने को प्रेरित करता हो  …. 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

08-11-2020


Sunday, November 1, 2020

क्या अंतर रहेगा?

 

क्या अंतर रहेगा? 

मैंने पूछा - माँ, सुजाता, दिखाई नहीं दे रही कहीं गई है क्या?

माँ ने बताया - बाजार में कुछ काम है, कह कर 3 घंटे पहले गई है। 

मैंने हैरत से कहा - मुझे, मोबाइल करके कुछ बताया नहीं, उसने।      

माँ ने बताया - सुजाता, तो प्रायः हर रोज ही कोई कोई कारण बता कर, बाहर जाया करती है। मैंने, तुमसे इसलिए नहीं कहा कि मुझे लगा वह, तुमसे पूछ-बता कर ही जाती होगी।    

मैं सिर दर्द होने कारण आज, ऑफिस से जल्दी लौट आया था। सोचा था कि घर पर ही सुजाता के साथ बैठकर, चाय पियूँगा तो आराम मिल जाएगा। मैंने, चाय स्वयं बनाई थी। फिर मैं, बिस्तर पर सिरहाने से टिकाकर, छोटी छोटी चुस्कियाँ लेता हुआ चाय पी रहा था। 

तब सुजाता आई थी। मुझे घर में देख चौंकी थी। वह कुछ कह पाती, इसके पूर्व ही मैंने पूछ लिया - सुजाता, क्या ले आईं बाजार से?

वह अचकचा गई थी। उसने कहा - नहीं, कुछ लाने नहीं गई थी। एक सहेली से मिलने गई थी। 

माँ का यह बताना कि वह रोज ही बाहर जाती है। फिर अभी, उसका मेरे पूछने पर हड़बड़ा जाना, मेरे मन में प्रश्न उत्पन्न कर रहा था। लेकिन फिर भी मैंने, सुजाता से और कुछ नहीं कहा या पूछा। 

सुजाता ने ही पूछा - आज आप, जल्दी आ गए ऑफिस से?

मैंने बताया - हाँ, सिर दर्द लग रहा था। सोचा घर पर तुम्हारे हाथ की, साथ में चाय पीने से आराम आ जाएगा, इसलिए जल्दी आ गया था। 

सुजाता सकुचाते हुए मुस्कुराई बस थी। उसने फिर कुछ नहीं कहा था। 

हमारी शादी को अभी छह माह हुए थे। घर में पापा-मम्मी एवं हम दोनों कुल चार सदस्य थे। 

पापा पोस्ट ऑफिस में कार्यरत थे। उन्हें अगले साल रिटायर होना था। मैं, नगर निगम में क्लर्क था। पापा एवं मैं, अपने अपने काम पर चले जाते थे, अतः सुजाता एवं माँ ही दिन के समय, घर पर रहती थीं। 

अगले दिन से मैंने नया क्रम शुरू कर दिया था। मैं, सुजाता से कुछ नहीं पूछता, मगर किसी किसी बहाने से, माँ से जानकारी ले लिया करता कि सुजाता, बाहर से कब लौटी है। 

सप्ताह में एक या दो दिन ही, माँ यह बतातीं कि आज, सुजाता बाहर गई ही नहीं है। 

यद्यपि पूर्व की भाँति ही ऐसे, प्रायः नित दिन घर से बाहर जाने की, कभी कोई बात सुजाता ने, मुझसे नहीं कही थी। इस कारण से, मेरे मन में उसे लेकर संदेह होने लगा था। 

आखिर लगभग 1 माह बाद मैंने, एक रात पूछ ही लिया - सुजाता, तुम दिन में रोज बाहर जाती हो, क्या कोई काम करने लगी हो?

सुजाता ने थोड़ी नाराजी से पूछा - क्या, यह आपसे मम्मी जी, ने बताया है?

मैंने सच कहा - हाँ, एक माह से, मैं ही उनसे तुम्हारी, जानकारी लेता रहा हूँ। मुझे यह बात अटपटी लगी है कि तुम प्रायः रोज बाहर जाती हो, मगर तुमने मोबाइल द्वारा या कभी भी घर में मुझे, इस बारे में कुछ बताया नहीं है। 

सुजाता इस बात से रुष्ट हो गई एवं मुझसे कहा - लगता है आप, मुझ पर शक कर रहे हैं?

मैंने कहा - हाँ, यह शक करने वाली बात इसलिए हुई है कि तुमने, ऐसे प्रायः नित दिन, बाहर जाने का कारण, अपनी ओर से मुझे कभी बताया नहीं है। 

सुजाता ने मेरे प्रश्न को गोल कर दिया एवं गरमा-गरमी दिखाते हुए कहा - आप, पत्नी पर अविश्वास करने वाले शक्की पुरुष हो। 

फिर वह मेरे साथ बिस्तर पर ना सो कर, ड्राइंग रूम में सोफे पर जाकर सो गई थी। उसका ऐसा किया जाना, पापा एवं माँ के सामने मुझे, हमारे लिए लज्जाजनक लगा था।   

ऐसे शादी के प्रथम वर्ष में ही, अगली रात से हम दोनों का, बिस्तर पर विपरीत करवट लेकर सोना शुरू हो गया। सुजाता ने, मेरे सहित माँ-पापा से भी अनबोला सा कर लिया था।

फिर कुछ दिनों में मुझे, कार्यालय में सहकर्मियों की, मेरे पीठ पीछे अक्सर सुगबुगाहट होती अनुभव होने लगी। 

एक दिन इस संबंध में, मेरे बहुत पूछ जाने पर, मेरी सहकर्मी, नीना ने मुझे बता दिया कि चीफ साहब एवं तुम्हारी बीबी के बीच रंगरेलियाँ चल रहीं है, आजकल। स्टाफ उसी में, तरह तरह की बात बना कर रस लिया करता है। 

सुनकर मेरा चेहरा एकदम बुझ गया था।  मैं यह तो जानता था कि  चीफ साहब, रसिक होने के साथ ही विधुर आदमी हैं।  

मुझे दुःखद रूप से हैरानी इस बात से हुई कि - चीफ साहब एवं सुजाता का परिचय तो हमारी शादी के रिसेप्शन में हुआ था। उसके बाद फिर कोई संयोग नहीं हुआ था कि उनकी भेंट हुई हो। फिर इनमें ये अवैध संबंध कैसे हो गए हैं। 

फिर चीफ साहब को लेकर मुझे वितृष्णा हुई थी। मै धिक्कार रहा था कि वरिष्ठ पद पर विराजित यह अधिकारी, अपने ही मातहत कर्मी की, नई बसी गृहस्थी में, अपनी घिनी करतूत से, कलह मचाने की निकृष्टता कर रहा है।  

उस रात मैंने सुजाता से, इस अवैध संबंध पर ऐतराज किया। इसे विराम देने के लिए कहा।  तब निर्लज्जता से उसने, मुझसे कहा - 

आज के आधुनिक समय में भी, आप अत्यंत संकीर्ण सोच रखने वाले व्यक्ति हैं। आप स्वयं ने तो अनेक संबंध किये होंगे। मगर ऐसे एक संबंध को लेकर, अपनी पत्नी पर आपत्ति कर रहे हो। 

अपने बचाव में सुजाता का, मुझ पर, यह व्यर्थ का दोषारोपण था। मैंने यथाशक्ति से शांति रखते हुए ही कहा - सुजाता, मैं इस रूप में, तुम्हारे सिवाय किसी और को नहीं जानता हूँ। 

वह बिना बात रोने लगी और रुदन पूर्ण चिल्लाहट में मुझसे कहा - झूठ बोल रहे हो, आप। आजकल ऐसा कोई युवक नहीं होता जिसका, 28 वर्ष के होने पर भी कौमार्य बना रहता है। 

फिर मुझे, लगा कि जैसे, सुजाता को इसी दिन और इसी तरह की बात की प्रतीक्षा रही थी। उसने अगले दिन ही, इस बात के आधार पर, घर छोड़ दिया था। वह अपना सभी सामान लेकर, मायके चली गई थी। 

मेरी माँ के द्वारा ऐसे ना जाने के अनुनय करने की भी, उसने उपेक्षा कर दी थी। 

फिर कुछ दिनों में ही, मुझे कूरियर द्वारा 498ए के अधीन भिजवाया गया, उसके वकील का नोटिस मिला था। जिसमें, मुझ सहित मेरे माँ-पापा पर भी दहेज प्रताड़ना का उल्लेख था। 

मैं, जानता था कि यह सब झूठी बात है। वह इसे न्यायालय में सिध्द भी नहीं कर सकेगी। 

सुजाता कुछ महीनों मेरी पत्नी रही थी, इस तथ्य को ध्यान में रखकर, मैं नहीं चाहता था कि हमारा प्रकरण न्यायालय में जाए एवं मुझे, स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करने के लिए, उसके अवैध संबंध की सच्चाई वहाँ, कहनी एवं प्रमाणित करनी पड़े। 

हमने, सुजाता के मायके वालों एवं उससे संपर्क कर, समझौता करते हुए आपसी सहमति से, डिवोर्स की बात कही थी। 

इस पर उन्होंने, समझौते के लिए विवाह एवं दहेज पर, उनके हुए 10 लाख के खर्चे की बात करते हुए, हमसे 11 लाख रूपये माँगे थे। 

मै, जानता था कि लगभग पूरा विवाह खर्च हमने उठाया था। उनकी आर्थिक स्थिति तो 1 लाख भी खर्च करने की नहीं थी। 

तब भी, हमने इसे स्वीकार कर लिया था। फिर चूँकि मेरे पास, इतनी बचत राशि नहीं थी। अतः मेरे पापा ने, इसकी व्यवस्था करने के लिए, ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। उन्होंने, अपने प्रोविडेंट फण्ड में जमा राशि से, उन्हें इसका भुगतान किया। तब, हमारा डिवोर्स हो सका था।  

बाद में पता चला था कि मुझसे डिवोर्स होते ही, सुजाता ने, अपने से दुगुनी उम्र के, 48 वर्षीय प्रौढ़, चीफ साहब से विवाह रचा लिया था। स्पष्ट था कि पैसा, सुजाता के जीवन में, प्रमुख सिद्धांत था। 

पापा, माँ एवं मेरे लिए, यह सारा घटना क्रम, अत्यंत सदमा देने वाला रहा था। मेरे डिवोर्स के एक वर्ष के अंदर ही तीन महीने के अंतर में, पहले मेरे पापा एवं फिर माँ दोनों का, हृदयाघात से देहावसान हो गया। 

एक गलत वधु के चयन ने, मेरा संसार ही उजाड़ दिया था।

लोगों के मुझ पर आक्षेप, व्यंग्य, एवं हँसने से मैं अवसादग्रस्त हो गया। इस अवसाद से उबर पाने में, मुझे 3 वर्ष लगे। तब तक मैंने, सन्यासी होने का निर्णय कर लिया था। 

अब मैं, साधु बन चुका था। मैं, जानता था कि कुछ समय में जब मेरी ख्याति फैलेगी तब मेरे आस-पास, भक्तों में नारी भीड़ भी होने लगेगी। तब मेरा चरित्र, कसौटी पर होगा। 

मैंने संकल्प लिया था कि जिन नारी की, मुझमें श्रद्धा होगी उन्हें मैं, किसी तरह फुसलाऊंगा नहीं। 

मैं, नहीं चाहूँगा कि किसी लड़की-युवती का घर उजाड़ने का दोषी, मैं हो जाऊँ। अगर मैं ऐसा करता तो फिर, मेरे चीफ साहब तरह के पुरुष एवं मुझ में क्या अंतर रहेगा?

आज, लगभग पाँच वर्ष हुए हैं। आश्चर्यजनक रूप से मेरे भक्तों की भीड़ में, अभी मुझे सुजाता दिखाई दी है …   

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

01-11-2020