Sunday, June 7, 2020

समस्या की जड़ ? ...

समस्या की जड़ ? ...

ट्रेन में 970 किमी का सफर हुआ था, अभी 270 और बाकि था।
मैं राम राम करते बहुत कष्ट की हालत में, ट्रेन में सवार हो सकी थी। अब भीषण वेदना में थी। अपने भरतार को मना भी किया था कि इतना लंबा सफर, इस हालत में न कर सकूँगी।
मेरी आपत्ति पर गुस्सा कर उसने, मुझे, पीठ पर दो घूँसे मार दिए थे। समझने को तैयार नहीं था कि मैं, सात माह के पेट से हूँ।
हम लोगों में भरतार को, पत्नी की सुनना पसंद नहीं होता है। जो भी करना है, खुद ही तय करते हैं। मैं गरमी में पसीने पसीने हो, घंटों तक लाइन में, प्यासी और जैसा तैसा खाते हुए खड़ी रही, फिर ट्रेन में सवार हो सकी थी। सफर में भी तेज लू लपट से मेरा, जी ख़राब लग रहा था।
भरतार से डर के मारे, कुछ कह नहीं पा रही थी। वह, कभी थोड़ी दया करता तो पानी, खाना ला देता था।
मेरी किस्मत को क्या मंजूर था, मुझे समझ नहीं आ रहा था। शादी को दस बरस हुए, बच्चा नहीं हुआ तो हम आस छोड़ चुके थे। तब सुखद आश्चर्य हुआ जब मैं, पेट से हो गई थी। अपने बच्चे को लेकर, सपने देखने लगी तो, कोरोना विपत्ति सिर पर आ बैठी थी।
कोई बोल रहा था, गाड़ी कोटा से आगे निकल रही है। तकलीफ से मैं रो रही थी। चिंता अलग सता रही थी कि बच्चा पहले ना आ जाए। सतमासा, इस बुरे हाल में अगर जन्मा तो शायद बच न सकेगा। मैं सोच रही थी, अगर ऐसा हो तो, भगवान मुझे भी साथ ही मार दे।
किस्मत अच्छी यदि होती तो, मैं गरीबी ही क्यूँ होती? जो जो नहीं चाहती थी वो हुआ। डब्बे में जो औरतें थी, उन्होंने जैसे तैसे प्रसव करवाया। बेटी हुई, कुछ समय रोई थी, मगर बच न सकी। मालूम नहीं, इतने कष्ट और ख़राब तबियत में, मैं क्यूँ न मरी थी।
मैं रोती रही थी। भरतार को कोई दुःख न दिखा। जन्मा और मर गया शिशु, बेटी थी ना, इसलिए। बेटा होता तो शायद, उसके ना बच पाने का वह दुःख करता। 
ट्रेन अंततः गंतव्य को पहुँची थी। वहाँ, मिले ट्रैक्टर से गाँव को रवाना हुए थे। बीच में, मैं अपने मायके उतर गई थी। भरतार , अपने गाँव चला गया था।
माँ, भौजी तब मेरी देखभाल में लगी रहीं। मैं ठीक हो गई तब भी, किसी से बोलती कुछ न थी। महिना भर होने को आया। इस बीच मेरे पर बीती की, गाँव भर में चर्चा रही।
बात टीवी वालों तक पहुँच गई थी। बनारस से टीवी वाली एक लड़की आई, बोली, मेरा नाम आरुषि है, मुझे तुम्हारा इंटरव्यू लेना है। तुम पर बीती, सब लोग देखेंगे-सुनेंगे।
मुझे कोई रूचि नहीं थी। खूब मनाते रही तो, मैं तैयार हुई। वह पूछती, मै ऐसे जबाब देते गई -
आरुषि- ट्रेन में जन्मी तुम्हारी बेटी बच न सकी, तुम किस का दोष मानती हो?
मैं- सिनेमा हिरोइन, कैटी का।
आरुषि ( आश्चर्य से)- वह कैसे?
मैं- मेरा भरतार, उसका दीवाना है। मुझे, मुंबई लेकर आया था कि कैटी के बँगले पर माली का काम करेगा।
आरुषि- किया फिर माली का काम, उसने?
मैं- क्या करता, बँगले में झाँकने भी नहीं मिला। लेकिन तो भी कैटी, उसके सपने में, उसकी घरवाली है। 
आरुषि- लेकिन इससे, तुम्हारी नवजात बेटी के ना बचने का संबंध तो नहीं होता?
मैं- है, कैटी, अपनी कमाई के लिए, अपने जलवे दिखा कर मेरे भरतार जैसे ही, कई गाँवो वालों की सपने में घरवाली बन जाती है। गाँव के खेत के अच्छे काम छोड़, सब मायानगरी में आ जाते हैं। ऐसे ही, मेरा भरतार आ गया। मुंबई में रहने को खुला, खाने पीने को पौष्टिक मिलता नहीं। कई साल मुझे बच्चा नहीं हुआ। बच्चा कोख में आया तो, ये कोरोना आ गया। मैं पहले आना नहीं चाहती थी, अभी मुंबई छोड़ना नहीं चाहती थी। भरतार ने मुझे, घरवाली जैसा मान दिया नहीं, उसका बस चलता तो वह कैटी को घरवाली बनाता। उसने मेरी सुनी नहीं, जबरन वापिस ला रहा था। मैं सह नहीं सकी, बच्ची समय से पहले पैदा हुई और बच न सकी।
आरुषि- लेकिन उसे कैटी ने तो मारा, नहीं?
मैं- कैटी, स्वार्थ और कमाई के लालच में, अपने जलवे से आदमियों के सपने में बस जाती है। फिर आदमी, अपनी जोरू को दासी बस मानता है। ऐसे ही मेरा भरतार अगर, कैटी के पीछे पागल होकर, मुझे मुंबई नहीं ले जाता, फिर कोरोना के कारण ऐसी हालत में मुझे वापिस न ला रहा होता तो, मेरी बच्ची ना यूँ जन्मती, ना ही यूँ मरती। सब कैटी के कारण हुआ है।             
फिर आरुषि ने मेरा, यह इंटरव्यू टीवी पर दिखाया था। गरीब मैं, मुझे क्या फायदा होना था। कहते हैं टीवी वालों की खूब कमाई हुई। क्या कहते हैं, कुछ.... टीआरटी... (टीआरपी) बढ़ने से। कैटी को भी फायदा, हुआ होगा। यह सुन कर कि लोग कितने पागल हैं, उसके जलवों से, उसके दो किलो वजन बढ़ गया होगा ....  



--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
07-06-2020


Saturday, June 6, 2020

साक्षात प्रेम पर्याय- सुकेती ....

साक्षात प्रेम पर्याय- सुकेती ....

"मैं तो कब से खड़ी इस पार 
ये अँखियाँ थक गईं पंथ निहार" 
यह गीत उन दिनों सुकेतीके हृदय में बस गया था। वह बताये जा रही थी। मैं ग्लानि बोध में सुनते जा रहा था। मैं बिस्तर पर और मेरी पत्नी एवं सुकेती बेड के समीप कुर्सियों पर बैठी हुईं थीं। 
मुझे स्मरण आ रहा है। तब, सिनेमा के प्रति बढ़ते क्रेज़ ने मेरे किशोरवय मन को प्रभावित किया था। मैंने अपनी शिक्षा, सुकेती के प्रेम एवं घरवालों के दुःख की परवाह नहीं की थी। मैं घर से भाग आया था।ग्लैमरस दुनिया में आकर, मैंने उसके निर्मल प्रेम को भुला दिया था। 
मुंबई आकर फुटपाथ पे सोता था। चौपाटी पर भेल पूरी के स्टॉल पर बर्तन धोने का काम करता था वहीं, उसी भेल पूरी से, पेट भरता था। और जब समय मिलता सिने स्टूडियो का चक्कर लगाया करता था।  

 मैं 1940 में, शिमला में जन्मा था। हमारे किशोरवय का शिमला, छोटा कस्बा था। मेरे एवं सुकेती के, स्कूल अलग अलग थे। मगर स्कूल आते जाते, हममें नैन मटक्का हो गया था। मेरे शिमला से भाग आने के बाद, सुकेती को मैंने जल्द ही विस्मृत कर दिया था। 

यद्यपि मेरी फिल्मों को मिली लोकप्रियता के बाद, अपने घरवालों से मिलने तथा अपनी फिल्मों की शूटिंग के सिलसिले में शिमला जाता रहा था। और तब जिस पर सुकेती और मेरी आँखे चार होतीं थी उस सड़क पर, मुझे सुकेती का ख्याल आ जाता था। 
साठ के दशक में किशोरवया लड़की का प्रेम अत्यंत पावन-निर्मल होता था। जिसमें शारीरिक स्पर्श नहीं होता था। नैनों के रास्ते प्रेम, हृदय में स्थान ले लेता था। 
शिमला की सड़कें ज्यादा चलती दिखतीं थीं मगर उन पर सुकेती नहीं होती थी। शायद उसकी शादी कर दी गई थी। 
ऐसे प्रेम को, वह 60 से अधिक वर्षों में भी, भुला नहीं सकी थी। इसका प्रमाण यह है कि उस निर्मल प्रेम के वशीभूत, वह आज, मेरे सामने बैठी थी। 
वह मेरे गंभीर रूप से बीमार होने के समाचार के बाद, इस जीवन में आमने सामने की पहली एवं अंतिम मुलाकात करने आई थी। वह, अपनी भावनाओं को, बेलौस व्यक्त करने के विचार से आई थी। मेरी भूलों को बताने आई थी। वह अपने लिए दुःखी नहीं थी। मेरे लिए दुःखी थी। बिस्तर पर लेटा, मैं सुन रहा था। 
वह कह रही थी - तुम अस्सी वर्ष के हो चुके हो तुम्हारे मरने के समय पर दुःख नहीं प्रकट करुँगी। इस उम्र में आकर कोई भी इंसान कभी भी मर सकता है। मेरे पति को मरे 4 वर्ष हो चुके हैं। मैं भी मर ही जाऊँगी। 
तुम्हारे बारे में, अपने हृदय की, तुमसे बतलाना है देश ने तुम्हें महानायक की तरह माना। 20-25 वर्ष पूर्व तक मैं भी तुम्हें महानायक मानती रही। तुम बूढ़े होने लगे तुम्हारा स्थान नये लोग भरने लगे। अभिमानी तुम सहज जीवन क्रम को, मानने तैयार न हुए। तुम उन्हीं भूमिकाओं में चिपके रहना चाहते रहे। मैं होती तुम्हारी जगह तो, इन 25 वर्षों में दूसरी भूमिका ग्रहण करती। 
सिने महानायक बस रह जाने की अपेक्षा, यथार्थ महानायक होने की दिशा में बढ़ती। देश में अपने लिए मिली लोकप्रियता एवं लाभ का, ऋण, इस देश और समाज को चुकाती। मैं प्राप्त के बदले देश को, देश का  अपेक्षित वापिस देती। 
इस का स्मरण रखती की मेरे प्रशंसक, मेरे कहने को मानेंगे। प्रौढ़ होते तक मैं, रेअलाइज कर लेती कि अपने यौवन काल में, स्वार्थ एवं कामुकता वशीभूत, मैंने अपने देशवासियों को गलत मार्ग पर भटकाया था। 
समाज के चलन बिगाड़ने का जो पाप मुझसे, अनायास हुआ था। उसकी भरपाई समाज और नई पीढ़ी के हित में क्या है, वैसे विचार, वैसे अपने कर्मों के उदाहरण पेश कर, उन्हें सच्चे मार्ग पर चलने को प्रेरित करने के, पुण्य कर्म के माध्यम से करती। 
बुजुर्गियत के वर्षों में तुम जैसे, तेल, मसाले और टॉयलेट क्लीनर आदि के विज्ञापन में और धन बनाने में, मैं समय नहीं गँवाती।      
कहते हुए वह चुप हुई थी। मेरी पत्नी उसकी स्पष्ट और कटु बात से चिढ़ती प्रतीत हो रही थी। सुकेती ने, यह बात समझी थी। अतः जल्दी विदा माँगी थी। 
सुकेती का मैंने आभार माना कि, इतने वर्षों उसने, अपने हृदय में मेरे लिए स्थान दिए रखा था एवं मेरे अंत समय में मुझसे मिलने आ पहुँची थी। 
फिर वह जा रही थी। मेरी पत्नी के, उसको विदा करने के अंदाज से, लग रहा था जैसे कि कोई भूत से उसका पीछा छूट रहा था। वह, सुकेती को बँगले के बाहर तक छोड़ने गई थी।  
सुकेती चली गई थी। वह क्या कह कर गई थी, मैं इतने में सब समझ गया था। सुकेती, मेरे मरते तक के समय के लिए विचार करने की प्रेरणा दे गई थी। कदाचित यह प्रेम के प्रति, सुकेती का कर्तव्य निर्वाह किया जाना था। 
एक गीत मुझे ख्याल आ रहा था- 
"हम इंतज़ार करेंगे, क़यामत तक
खुदा करे कि क़यामत हो, और तू आए"
सुकेती के कहे गए शब्द शिकायत नहीं, अपितु मुझे सुकून प्रदान कर रहे थे।  
सुकेती को विदा कर लौटने पर, पत्नी तमतमाई हुई थी। मुझसे कहा, मूर्ख औरत है। यह शिष्टाचार भी नहीं कि मैं भी साथ बैठी हूँ, दो शब्द मुझसे भी कहती। यह भी अक्ल नहीं कि किसी रोगी से, किस तरह की बात की जाती है। आई अपने ज्ञान का पुलंदा खोल सुना गई है।    
मैं, सोचने लगा पत्नी तो अन्य प्रशंसिकाओं तथा साथी नायिकाओं से मेरे संबंध को सहन करते आई थी। क्या, कारण है कि इतना चिढ़ी हुई है? मुझे लगा कि मेरी पत्नी सुकेती के निःस्वार्थ - निर्मल प्रेम की शीर्ष ऊंचाई का अनुमान नहीं करना चाहती है। 
उससे भी पहले, सुकेती मेरा प्रेम होने का ख्याल, पत्नी पर हावी है तथा जलन दे रहा है।   
प्रकट में मेरे होंठों से एक ही शब्द प्रस्फुटित हुआ था - उफ़्फ़ ....
--x--
मैं इतना लोकप्रिय सिने नायक हुआ था। अतः बुध्दिमानी तो मुझमें स्वतः सिध्द होती थी। मैं, सुकेती की कहि बातों को समझ सका था। जबकि किसी और समय, कोई और ऐसा कहता तो, अपने अहं (ईगो) में, इसे समझना नहीं चाहता। 
लेकिन पिछले तीन महीनों में बिस्तर पर लगने से, मैं ऐसे टूटा था कि मेरे दंभ, अहं एवं अपनी प्रसिध्दि की, जो अकड़ मुझमें थी, वह सब निकल गई थी।  
आसन्न मौत की निराशा मेरे मन में, स्थाई रूप से समा चुकी लगती थी। शुक्र कि तब सुकेती आई थी। उसकी निःसंकोच एवं अधिकार बोध से, कही गईं कड़वी सी बातों ने, मृत्यु शैय्या पर, मुझ पर छा गई, निराशा को दूर कर दिया था। 
अगर फिर मिलती सुकेती, तो मैं शिकायत में कहता 'हुजूर आते आते बहुत देर कर दी'।
कहता - काश, सुकेती तुम 25 वर्ष पूर्व आतीं एवं ऐसी प्रेरणा तब देतीं। मैं अपनी पूर्व की भूलों को सुधार करता। जैसा तुमने परिभाषित किया, वैसा यथार्थ महानायक बनता। 
उफ़ मगर, अब कुछ करना संभव नहीं। जैसे कि सिने पर्दे पर, मैंने आदर्श किरदार निभाये थे। अपने प्रशंसक समूह के सामने मैं, अब वैसे वास्तविक आदर्श पेश कर सकने की हालत में नहीं रहा हूँ। मैं समझ पा रहा हूँ कि मेरे पर्दे के पीछे के यथार्थ किरदार में, आदर्शों का अभाव रहा है।
मैंने, अपने फ़िल्मी सफर के आरंभ, से पहले, कठोर एवं आदर विहीन फुटपाथ का जीवन देखा था। जब मुझे फ़िल्में मिलने लगीं और मेरी फ़िल्में चलने लगीं। तब मुझे मिलने वाले सम्मान, प्रसिध्दि एवं धन ने मेरे अस्तित्व पर अहंकार की मोटी परत चढ़ा दी।
मेरे आँखों पर, मेरी सफलता बोध की, पट्टी चढ़ गई थी। मैं देख न सका था कि मेरे सिने किरदार एवं यथार्थ जीवन शैली में कोई मेल था ही नहीं।
मैं बुध्दिमान रहा मगर मैंने अत्यंत मूर्खतापूर्ण कार्यों में, अपना जीवन व्यर्थ कर लिया था।
मैं समझ नहीं सका था कि मेरे भोले प्रशंसक मेरे व्यसनों में लिप्तता देख-सुन गलत निष्कर्ष निकाल सकते थे कि 
"आदर्श परदे पर दिखाने एवं अभिनीत किये जाने वाली बात है जबकि जीवन सार्थकता धन वैभव, अति विलासिता और कामुकता पूर्ण जीवन शैली में है।  
सुकेती अपने निर्मल प्रेम के (मेरे ) पीढ़ियों को दिग्भ्रमित किये जाने वाले उदाहरण बन जाने से आहत हुई थी। उसे लगा था कि मैंने अपने में, महान संभावनाओं और समाज अपेक्षा, के साथ न्याय नहीं किया था।  
कितनों को इतनी लोकप्रियता और इतने प्रशंसक मिलते हैं, भला? अनेक जीवन मुझे पहले मिले होंगे, अनेक आगे मिलेंगे मगर निश्चित ही इतनी लोकप्रियता नहीं रही होगी/रहेगी। मैंने अपनी आत्मा की यात्रा में मिला, यह बिरला एवं अनुपम अवसर दुर्भाग्यपूर्ण रूप से निरर्थक जाने दिया था।
अब मैं ही, स्वयं को धिक्कार रहा हूँ। मुझे लगा रोग, मुझे कुछ दिनों का ही अवसर दे रहा है। मौत मुझसे बहुत दूर नहीं है।
मैं अब चाहूँ भी तो अच्छी शिक्षा देने वाला, (साक्षात) किरदार, स्वयं नहीं बन सकता हूँ। ऐसे कार्यों को अंजाम नहीं दे सकता हूँ, जिससे एक उदाहरण बन कर अपने प्रशंसकों को, उनके हित एवं समाज हित के मार्ग पर चलने को प्रेरित कर सकता। 
अब क्या, किया जा सकता है? यह सोचना मैंने आरंभ किया। ज्यादा समय नहीं है, देख शीघ्र तय किया। अपने परिवार को एकत्रित होने कहा था।
मैंने पूर्व में ही अपने बेटे-बेटियों के बँगले और अच्छे व्यवसाय/कारोबार  लगवा दिए थे।
मैंने अपने नाम की संपत्ति में से 50-50 करोड़ और, पत्नी तथा प्रत्येक बच्चों को, अतिरिक्त देने की इक्छा जताई।
मेरी शेष संपत्ति, जो लगभग 2500 करोड़ थी, को, कोरोना संदिग्धों के परीक्षण के लिए, प्रधानमंत्री केयर फंड में देने के लिए कहा। 
सभी पहले ही खुशहाल थे, भाग्य से वे चरित्रवान थे। सबने इसमें कोई आपत्ति नहीं की ।             

मुझे मालूम है कि अच्छा कार्य होते हुए भी, इस 2500 करोड़ के दान का, वह अच्छा प्रभाव (Impact) तो नहीं पड़ सकेगा, जो मेरे 25 वर्ष के निरंतर सद्कर्मों से पड़ता। 
मरणासन्न अवस्था में होने पर मुझे, इससे अच्छे अन्य कोई, विकल्प रहे ही नहीं हैं।  
सुकेती के आने के चौथे दिन, आज मैं अंतिम श्वाँस ले रहा हूँ ऐसे प्रण (संकल्प) के साथ कि अगले जन्म में, मैं सिने महानायक नहीं यथार्थ महानायक होकर दिखाऊँगा। अपनी पीढ़ियों को वह मार्ग दिखाऊँगा, जिस पर चलकर, कोई जीवन का अधिकतम आनंद उठा पाता है। जिस मार्ग पर चलना जीवन सार्थक करना होता है। 
यह होता है या नहीं, आगे देखने वाली बात रहेगी, अब अलविदा  ... 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
06-06-2020

Thursday, June 4, 2020

साथ का महत्व ..

साथ का महत्व ..

उस रात मेरी आँखों में नींद नहीं थी।  मैं दो घटनाओं से अत्यंत अधिक व्यथित था। मेरा हृदय विलाप कर रहा था। मेरी आँखों में अश्रु भरे हुए थे।
मैं, सोच रहा था प्रत्येक मनुष्य जो, अपने प्राणों को बड़ी फ़िक्र से बचाये रखता है। ऐसे में कोई कैसे एक कॉप (पुलिस अधिकारी) होकर, किसी अन्य नस्ल के व्यक्ति के छोटे से अपराध पर, उसकी निर्दयता से हत्या कर सकता है? या
खेत में थोड़ा नुकसान पहुँचाने पर, कोई अन्य व्यक्ति, केरल में, एक गर्भवती हथिनी को, अन्नानास में विस्फोटक खिला कर, कैसे मार सकता है?
ऐसी असहनीय मानसिक पीड़ा की हालत में मैं, पूरी रात सो न सका था। मेरा दिमाग तर्क कर रहा था। एक तरफ तो मेरे देश में, कोरोना से अपने प्राणों पर भय देख, करोड़ों लोग घर में कैद या लाखों लोग पैदल सैकड़ों किमी दूर अपने गाँव की ओर जा रहे हैं। दूसरी तरफ, ये लोग क्रूर रूप से हीन/मूक प्राणियों के प्राण ले रहे हैं।
अगली सुबह, चमत्कारिक रूप से, मैंने, स्वयं में एक दिव्य शक्ति का अनुभव किया था।
जिसके होने पर मैं हवा में, अत्यंत ऊंचाई पर उड़ान भरकर तीव्र गति से अमेरिका जा पहुँचा था। वहाँ उस मर्डरर कॉप को, मैंने अपने पीठ पर टाँगते हुए, फिर उड़ान भरी थी और उसे एक निर्जन टापू पर उतार दिया था।
ऐसी ही अगली उड़ान में, मैंने केरल से हथनी के हत्यारे व्यक्ति को लिया था। उसे भी एक अन्य निर्जन टापू पर, पहुँचा कर छोड़ दिया था।
टापू पर छोड़ते हुए, मैंने, दोनों के दिमाग की मेमोरी वाली, बटन ऑफ कर दी थी। जिसके कारण दोनों ही को, पहले की कोई स्मृति नहीं रह गई थी।
फिर मैंने, अपनी दिव्य शक्ति के माध्यम से, अपने ज्ञान पटल पर, दोनों टापू के दृश्यों को लेकर, दोनों की निगरानी आरंभ की थी।
दोनों ही, निर्जन प्रदेश में अकेलेपन से घबराये, इधर उधर दौड़-भाग और भटक रहे थे। यद्यपि वहाँ पीने को जल और खाने को फल/वनस्पति की कोई कमी नहीं थी, वे खा पी तो रहे थे लेकिन उससे, उन्हें तृप्ति और शाँति नहीं मिल रही थी। वे, निरंतर विक्षिप्तों की तरह भटक रहे थे। 
अंततः तब पुलिस वाले को टापू पर, एक अश्वेत व्यक्ति मिला था। उसे देख वह यूँ खुश हुआ था जैसे उसे, उसका गॉड मिल गया हो।
अश्वेत से उसकी भाषा अलग थी मगर, दोनों आँखों एवं भाव भंगिमा से, प्रेम-करुणा की भाषा में, अपनी भावनायें एक दूसरे से आदान-प्रदान कर रहे थे। एक से भले दो की तरह, वे परस्पर साथ से, अत्यंत खुश थे।
ऐसे ही अन्य टापू पर केरल के उस व्यक्ति को, एक हथनी मिली थी। उससे मिल कर उसे ऐसे लगा था कि उसे, अपनी इष्ट देवी मिल गई हो। वह प्रेम से, तोड़-तोड़ उस हथनी को, विभिन्न तरह के फलों का सेवन करा रहा था। हथनी के द्वारा, सब उदरस्थ करते देख, उसे, असीम आत्मिक शाँति मिल रही थी।
स्पष्ट था कि कोई साथ नहीं हो तो किसी का भी साथ मिल जाये, कितना प्यारा लगता है। लेकिन ऐसे बहुत से मिलें तो, दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, उनके होने का महत्व मनुष्य भुला देता है। एक दूसरे से ईर्ष्या, नफरत और यहाँ तक की दूसरे की जान का दुश्मन हो जाता है।  
दो दिनों तक, मैंने इन्हें उन टापुओं पर यूँ ही रहने दिया था। फिर उन्हें उनके मूल स्थान पर पहुँचा दिया था। उनकी मेमोरी बटन फिर रिसेट कर दी थी। इस स्थिति में उन्हें अपने पूर्व की सारी स्मृति एवं निर्जन प्रदेश में बिताये समय का, स्मरण आ गया था।
अब पुलिस वाले को अश्वेत व्यक्ति की हत्या पर गहन वेदना एवं पश्चाताप हो रहा था। ऐसे ही केरल पहुँचाये गए व्यक्ति को मूक हथनी की हत्या को लेकर गहन वेदना एवं पश्चाताप हो रहा था।
निर्जन प्रदेश के, अपने एकमात्र साथी की स्मृति और यहाँ उनके द्वारा की गई हत्या के, ग्लानि बोध ने मिलकर, दोनों को विक्षिप्त कर दिया था। दोनों विक्षिप्त की तरह, अपने अपने नगरों में भटकने लगे थे। लोग उन्हें देख, यह एक दूसरे को बताते रहे थे कि अपने क्रूर हत्या के अपराध बोध ने, इन्हें पागल कर दिया है।
मैंने, अपने ज्ञान पटल पर दिव्य शक्ति के जरिये, ऐसा होते हुए भी देखा था।
जब मुझे यह तसल्ली हो गई कि दोनों ही व्यक्ति, अब आजीवन विक्षिप्त ही रहेंगे और इस तरह अपने क्रूर करतूतों का दंड भुगतेंगे, तब मैं अपने इष्ट ईश्वर के धर्मस्थान गया। मुझे मिली, अपनी मिली दिव्य शक्ति को मैंने, उनके चरण कमल में, अर्पित कर दी।
और मैं, अब मानसिक रूप से शांत होकर, सामान्य मनुष्य की तरह वापिस लौट आया हूँ  ...

(नोट-  मानव में ऐसी दिव्य शक्ति होना, मेरी कपोल कल्पना है। जिसके माध्यम से, अपने कुछ संदेश लिखता हूँ। कृपया ऐसे किसी दिव्यशक्ति धारी की खोज या किसी पाखंडी के झाँसे में न आयें)


--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
04-06-2020

Wednesday, June 3, 2020

बड़ा कौन?

बड़ा कौन?
(आपबीती आधारित )
एक अधिकारी ने ग्रामीण अंचल के विभागीय दौरे से लौटते हुए एक घर की बाड़ी में भुट्टे लगे देखे तो खरीदने की मंशा से घर का दरवाजा खटखटाया।
दरवाजे पर आयी महिला से उसने पूछा कि- कुछ भुट्टे चाहिए हैं, मिल जायेंगे, क्या?
महिला ने झिझकते हुए बताया कि- अभी बाड़ी कि पूजा नहीं हुयी है अतः अभी भुट्टे नहीं तोड़े जा सकते हैं।
फिर कुछ सोचते हुए स्वयं ही, कहा ठहरिये और अन्दर चली गई। कुछ मिनट के बाद हाथ में 8 -10 भुट्टे लेकर आयी।
अधिकारी ने भुट्टे लिए और सोचते हुए कि शहर में ये 12 -15 रुपये में मिलेंगे। अभी इनकी बाड़ी कि पूजा नहीं होने पर भी, मेरी बात का सम्मान रख इन्होने भुट्टे तोड़ ला दिए हैं।
बड़ी उदारता सी दिखाते हुए, महिला के तरफ 20 का  नोट बढ़ा दिया। महिला ने लेने का कोई भाव ना दिखाते हुए कहा- ना साहब, पैसे ना दीजिये। आपके या मेरे बच्चे भुट्टे खायेंगे कोई अंतर नहीं है, एक ही बात है।
अधिकारी ने एक बार और आग्रह किया। फिर भी ना कहे जाने पर, महिला को हाथ जोड़ धन्यवाद कहा और वापस गाडी में बैठ रवाना हो गया।
शहर तक के शेष रास्ते में, वह सोच रहा था कि मेरे गणितीय ज्ञान से मूल्यांकन करने की तुलना में, महिला का मानवीय मूल्यांकन ज्यादा अच्छे ज्ञान का परिचायक है। 
महिला ने अपने अंधविश्वास से बढ़कर, अपरिचित के बच्चों की जिव्हा तृप्ति को, पारंपरिक पूजा से बढ़कर मान लिया था। अपनी आस्था विपरीत, बाड़ी की पूजा बिना, भुट्टे तोड़ लिए थे। 
सीधी सरल सी उस ग्रामीण महिला की मानसिक समृध्दि के आलोक में, वह यह सोचने को विवश हुआ था कि मैं एक अधिकारी और वह साधारण गृहणी, इनमें बड़ा कौन है?
निश्चित ही, महान वह महिला थी, जिसने स्कूल की शिक्षा भी शायद पूरी ना की थी। 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
04-06-2020

लेखक जी ..

लेखक जी ..
मैं उदयपुर की रहने वाली हूँ। मैं लगभग नौ-दस वर्ष पूर्व फेसबुक पर नई आयी थी। तब मेरी उम्र 25-26 की ही थी। जीवन के ज्यादा अनुभव नहीं थे। ऐसे में अपरिचित लोग मुझे मित्रता निवेदन भेजते, उन्हें, मैं बिन सोचे विचारे ही स्वीकार कर लेती।
उन्हीं दिनों, 57 वर्षीय लख़नऊ के रहने वाले, एक प्रौढ़ व्यक्ति का मित्रता निवेदन आया था। वह, मैंने स्वीकार कर लिया था।
फिर उनकी पोस्ट, मेरे पढ़ने में आतीं, जिनसे पता चलता कि वह कोई लेखक हैं।
शुरू में, मैंने उनकी लंबी पोस्ट पढ़ने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। एक दिन फुरसत में, उनकी एक पोस्ट ध्यानपूर्वक पढ़ी तो लगा, उनकी शैली, थोड़ी हट कर है। फिर अक्सर मैं उनकी पोस्ट पढ़ने लगी, जिनमें उनके तर्क, लगभग हर मनुष्य में अच्छाई, निहित होना दर्शाते थे। 
उनकी अनूठी शैली से, संदेश बहुत सरलता से समझ आते थे। फिर मैं, उनकी बड़ी प्रशंसिका हो गई। मुझे, उनकी पोस्ट से, प्रेरणायें मिलतीं थीं।
समय के साथ, कुछ अच्छे अनुभव नहीं होने से, मैंने अपने फेसबुक मित्र में से अपरिचितों को विदा कर दिया। लेकिन अपवाद स्वरूप, उन्हें, मैंने फ्रेंड लिस्ट में, रहने दिया।
अब मैं 35 वर्ष की हो गईं हूँ। मेरी बड़ी बेटी 15 एवं छोटी 11 वर्ष की हो चुकी है। पिछले दिनों मैंने, उनका एक स्टेटस पढ़ा कि वे देशाटन पर होने से, फेसबुक पर ज्यादा सक्रिय नहीं रहेंगे। तब मुझे, अच्छा नहीं लगा कि उनकी पोस्ट नहीं आयेंगी। पोस्ट में एक बात से मुझे ख़ुशी भी हुई कि उनके भ्रमण कार्यक्रम में, उन्होंने, उदयपुर भी लिखा था।
मेरे पिता जैसे, इन लेखक जी से, मिलने की इक्छा मुझमें, बलवती हुई।मैंने उनकी कुछ पोस्ट फिर पढ़ीं, जिनमें उनके कहानी किरदार, अच्छी-अच्छी बातें बड़ी सरल एवं सहजता से कहते दिखाई पड़ते हैं, यथा :
आज व्याप्त नफरत के चलन पर, एक कहानी में, कहानी किरदार में, यूँ निराशा दिखती -
भले हम, एक दूसरे को मार काटते हुए, अपने को खत्म कर लें। अपने अहं नहीं बचा सके, तो क्या मुहँ दिखाएंगे अपनी आगामी पीढ़ी को? 
एक कहानी में किरदार पति, अपनी पत्नी की सुंदरता की तुलना भारत से यूँ करता-
तुम बुरा नहीं मानना, अगर मैं कहूँ कि तुमसे भी ज्यादा, प्यारा, मेरा भारत देश है, मेरी खूबसूरत नज़मा।
एक कहानी में ईर्ष्यालु देवरानी किरदार, अहसास करती-
जिस को वह मानती वही भगवान तो जिठानी का भी था। और भगवान यदि देवरानी के हिस्से में ख़ुशी लिख सकता था, तो जिठानी को भी तो ख़ुशी दे सकता था।
उनकी कहानी में, घरेलू झाड़ू-पोंछा करने वाली नौकरानी किरदार भी, जागरूक एवं अत्यंत समझदार होती, जो अपनी बूढी मालकिन से कहती कि- 
ऑन्टी, हमारे प्रधान मंत्री, हम सब से अनुरोध कर रहे हैं कि, मुसीबत के इस समय में,  हम सब, एक घर की जिम्मेदारी लें। इस पर, मैंने, आपके घर के काम की, जिम्मेदारी लेना तय किया है।
किसी कहानी में, भ्रष्टाचार चपेट में आई, अर्निंग बेटी के, किरदार पापा, यूँ समझाते बताये जाते- 
तुम स्वच्छता से कार्य में भी इतना अर्जित कर सकोगी कि जीवन यापन हो जाएगा। तुम अपना वह अस्तित्व बनाये रखो जिससे नारी पुरुष से श्रेष्ठ मनुष्य होती है। 
एक अन्य कहानी में, शहीद किरदार की विधवा हुई पत्नी के प्रति एक युवती में, यूँ सहानुभूति दिखती कि वह सोच रही होती-
काश में नारी नहीं, एक युवक होती, जो शहीद हो गए मेजर की, उस मासूम पत्नी का हाथ माँगने उसके घर जाता। फिर उससे विवाह करके, उसके जीवन से, मेजर पति की कमी, को दूर करने का भरसक प्रयत्न करता। 
एक कहानी में, अपनी अलग रह रही पत्नी को वापिस घर ले जाने के लिए किरदार पति यह कहते मिलता-
अब विश्वास दिलाता हूँ कि पिछले वर्षों के साथ में जिन पलों की खुशियों को हमने खोया किया है उसकी भरपाई हेतु अपनी किसी मूर्खता में एक भी पल ख़राब नहीं होने दूँगा।
एक हृदय विदारक रेप-मर्डर वाली कहानी में, रेप के बाद जलाई जाती पीड़िता की वेदना, उसके इन शब्दों के जरिये दिखाते-
ये न समझना कि अस्मिता यूँ नोचे जाने और जिंदा जलाये जाने से मुझे पीड़ा नहीं हुई थी। 
ओ, प्रिय मेरे देशवासियों - मेरी अधजली लाश पूरी न जलाना, इसे नुमाइश के लिए रखना, ताकि देख सकें लोग - "कोई सुंदर बेटी, अपनी लाज लुट जाने और जिन्दा जला दिये जाने के बाद कैसी वीभत्स रूप को प्राप्त हो जाती है" 
ओह्ह जिंदा जलने की वेदना कल्पना से बहुत अधिक दर्दनाक असहनीय है। 
एक अन्य पोस्ट में, फाँसी की सजा पाए, अपराधी किरदार, का पश्चाताप बोध ऐसे दिखाते-
मुझ अपराधी बेटे की मौत की आशंका ही जब मेरे माँ-पिता को भीषण दुःखदाई है, तब उनकी क्या हालत है जिनकी निर्दोष मासूम बेटी पर पहले मैंने दुराचार किया था और फिर अत्यंत वेदनादाई मौत को विवश किया था। 
ऐसी और भी अनेक पोस्ट के अद्भुत एवं सहज वाक्य रचना, मुझे स्मरण आये। तब मैं उनसे, मिलने की उत्कंठा रोक नहीं सकी।
मैंने अपने पतिदेव से उनसे, मिलने की अनुमति चाही। वे खुद भी मेरे कारण, फेसबुक में उनसे जुड़े थे। उन्होंने, उन लेखक की उम्र 65 से अधिक है, देख कर मुझे पर कोई खतरा नहीं देखते हुए, अनुमति दे दी।
तब मैसेंजर पर, मैंने लेखक जी के संबोधन सहित, उनके उदयपुर में होने वाली दिनाँक की जानकारी पूछी, साथ ही उनसे मिलने की जिज्ञासा प्रकट की।
इसके रिप्लाई में उन्होंने लिखा कि वे तीन दिन बाद, दो दिन, उदयपुर में रहेंगे। तब मिलने के समय बताएंगे। इसी में, उन्होंने अपना मोबाइल नं. भी लिखा।
तीन दिन बाद सुबह ही, पहली बार मैंने, उनसे मोबाइल पर बात की। उन्होंने एक फाइव स्टार होटल में, अगले दिन लंच पर आने का निमंत्रण दिया। कहा संभव हो तो, अपने पति को भी साथ लेकर आइये।

मेरे पति अगले दिन व्यस्त रहने वाले थे, अतः मैंने उनसे कहा कि मैं अकेली ही आ सकूँगी।       
यह तय होने के बाद, मैं उनसे मिलने के लिए अत्यंत रोमाँचित हुई। मैंने याद किया कि मेरे स्टेटस में लगी, मेरी कैसी फोटो पर वे प्रशंसा लिखते थे। फिर अगले दिन मैंने, हमारा परंपरागत घाघरा कुर्ते वाला परिधान एवं हाथी दाँत के आभूषण पहने और उनसे भेंट करने, निर्धारित समय पर होटल जा पहुँची।
उन्होंने बेहद स्नेह से मेरा स्वागत भी किया। लेकिन उन्हें पहचानने में, मुझे कठिनाई हुई। वे फेसबुक में अस्त व्यस्त सी दाढ़ी एवं बेपरवाह कपड़ों में, डीपी में होते हैं। यहाँ जींस एवं सफेद शर्ट में, क्लीनशेव्ड, तथा काले रंगे हुए बालों में थे। 
यही बात मुझे खटक गई कि फाइव स्टार होटल एवं इस गेट अप में वे, किसी अन्य तरह से, मुझे प्रभावित करना तो नहीं चाहते।
वे अत्यंत आग्रहपूर्वक मुझे खिलाते रहे। लंच के अंत में मिष्ठान ग्रहण करते हुए, राजपूताना गरिमा में जीने वाली मैं, अपने को रोक नहीं सकी।
मैंने बेबाक कहा कि लेखक जी, आज आप फेसबुक से बिलकुल भिन्न एवं अत्यंत बदले हुए रूप में हैं। आपका उद्देश्य अकेले में, मुझे अन्य तरह से प्रभावित करने का तो नहीं है ?   
यह उन पर अप्रत्याशित शाब्दिक हमला था। एक पल को उनका मुखड़ा बुझा हुआ सा दिखाई पड़ा। फिर उन्होंने सप्रयास, स्वयं को संयत किया।
मुस्कुराते हुए उत्तर दिया-  बेटी, फेसबुक पर आप मेरी पोस्ट के माध्यम से मेरे मन एवं विचार से परिचित रही हैं। यहाँ जब आप पहली बार साक्षात भेंट करने आ रहीं हैं। शायद यह हममें पहली एवं आखिरी भी भेंट होगी यह सोचते हुए, मैं 67 की उम्र में, मानसिक के साथ, शारीरिक रूप से भी चुस्त दुरुस्त हूँ ऐसा प्रभाव आप पर बनाना चाहता था। इसलिए मैं इस रूप में तुम्हारे सामने हूँ। मेरा अभिप्राय कोई गलत होता तो मैं आपके पति को साथ लाने नहीं कहता। 
उनके इस सहज उत्तर से मुझे अनुभव हुआ कि मैंने बड़ी गलती की है।
मैंने कहा- लेखक जी, मुझे क्षमा कीजिये, मैंने गलत सोच लिया और बोल दिया है।
तब उनने उत्तर दिया - जी बेटी, यह दुर्भाग्य पूर्ण है कि मेरी वय के कुछ व्यक्ति छिछोरी हरकत करते पाए जाते हैं। इसी कारण तुम्हारे मन में यह शंका हुई है। तुम इसलिए दुःख नहीं करो। मुझे ख़ुशी है कि आपने, सूक्ष्मता से मुझमें परिवर्तन को नोटिस किया है। 
मैं, हर भारतीय नारी को यूँ ही जागृत और चौकन्ना देखना चाहता हूँ। मुझे अत्यंत ख़ुशी है कि अपनी कहानी जैसे, एक काल्पनिक एवं प्रिय किरदार से आज मैं जीवंत साक्षात्कार कर रहा हूँ।     
यूँ मेरी, उनसे अजीबो गरीब पहली और अंतिम भेंट खत्म हुई।इसमें अनुभवी लेखक जी के लिए मेरे ह्रदय में सम्मान, श्रध्दा में बदल गया था।
लेखक जी मुझे, अपने तर्क पूर्ण उत्तर से ग्लानि बोध से उबार रहे थे। मुझे मालूम नहीं मगर कि, मेरे संदेह करने से वे खुद, कितने आहत हुए थे ... 
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
03-06-2020

Tuesday, June 2, 2020

दो जून का भोजन ..

दो जून का भोजन ..

स्कूल में कक्षा 7 एवं 8 में नारायण, मेरे साथ पढ़ा था। फिर उसके पिता की मृत्यु हो गई, उसका पढ़ना छूट गया था।
तब पता चला था कि उसके पिताजी ज्यादा जमा पूँजी नहीं छोड़ गए थे। माँ और एक छोटी बहन के उदर पोषण के लिए उसका कमाना जरूरी हो गया था। उसने मेहनत से कमाना शुरू किया था। वह, सबेरे दो घंटे अखबार बाँटता, फिर दिन में एक पंचर बनाने वाले के सहायक की तरह काम करता था। 
मैं उसे ऐसा करते अक्सर देखता था। छोटी ही उम्र में उस पर आई जिम्मेदारी से मुझे, उससे अत्यंत सहानुभूति होती थी।
कभी कभी उससे मिलना होता तो, स्कूल के लिए मम्मी का लगाया अपना टिफिन, मैं उससे शेयर करता था। मैं, इतनी आत्मीयता से खिलाता कि मेरे साथ खाने में, उसे झिझक नहीं होती थी। उसे तन्मय हो, स्वाद ले लेकर, खाते देखता तो मुझे बड़ी संतुष्टि मिलती थी।
दो साल मैं उस कस्बे में, और पढ़ा था। फिर पापा की बदली हो गई थी। नए शहर में बड़ी क्लासेज और फिर कॉलेज में पढ़ते हुए, अध्ययन को ज्यादा समय देने से, इधर उधर की बातों पर ध्यान देने का, मुझे समय नहीं मिलता। ऐसे में मैं नारायण को भूल गया था।
फिर 15 साल समय व्यतीत हो गया।
कल, अन-लॉक-1 घोषित होने के बाद, बंद पड़ी अपनी फैक्ट्री फिर चालू करने के विचार से मैं, फैक्ट्री गया था। मेरे आठ श्रमिकों में से 2 ही बचे थे। बाकि 6 अपने परिवारों सहित, अपने गृह ग्राम लौट गए थे।
मैंने लगभग 70 दिनों से बंद पड़ी फैक्ट्री में, 2 श्रमिकों से साफ़ सफाई करवाई थी। फिर अगले दिन से थोड़ा ही काम आरंभ करेंगे, यह तय कर दोपहर कार से लौट रहा था। मन में चिंता यह चल रही थी कि बाकि श्रमिक कैसे और कब मिल सकेंगे।
मैं चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल, हरा होने का इन्तजार कर रहा था।  तब मेरी दृष्टि बाजू से गुजर रहे, व्यक्ति पर गई। यद्यपि उसके मुख पर मॉस्क था तो भी, मुझे लगा यह नारायण है। मैंने डोर का शीशा गिरा कर, कन्फर्म करने के लिए, दो बार नारायण नाम पुकारा।
दूसरी बार पुकारे जाने के बाद, वह व्यक्ति रुका था। मैंने हाथ हिलाया तो उसकी आँखों में, मुझे पहचान लिए जाने के भाव दिखे।  ट्रैफिक बत्ती, हरी होने ही वाली थी। अतः मैंने इशारे से उसे, आने कहा और साइड वाला डोर खोल दिया। वह साथ वाली सीट पर आ, बैठ गया था। मैंने, कार आगे बढ़ाई एवं आगे की पार्किंग में ले जा कर, कार खड़ी कर दी।
फिर उससे यूँ अचानक मिलने की ख़ुशी जताई। हँसते हुए, उससे हाल चाल पूछे।
नारायण ने बताया - पिछले छह वर्षों से, मैं इस महानगर में रह रहा हूँ। एक स्टील इंडस्ट्री में काम करता हूँ। अपनी बचत से, छोटी बहन का विवाह करवा दिया है। वह अपने ससुराल में खुश है। इस तरह एक बड़ी जिम्मेदारी मैंने निभा दी है। अब माँ के साथ एक कमरे में रहता हूँ। 
सत्तर दिनों से इंडस्ट्री बंद है। जमा किये बहुत से रूपये, इन दिनों खर्च हो गए हैं।
सरकार के आदेश होने पर भी, इंडस्ट्री मैनेजमेंट ने इन दिनों का, वेतन नहीं दिया है, अतः मन खट्टा है। अब आज से पुनः खुल रही, उस इंडस्ट्री में मैं फिर काम नहीं करना चाहता। मैं, दूसरे काम की खोज में निकला हूँ। 
 यह सुन मैं, मन ही मन शर्मिंदा हो रहा था। सोच रहा था कि मैंने भी, अपने श्रमिकों को बंद की अवधि में, आधा ही सही, वेतन दिया होता तो वे अपने गाँव नहीं लौटे होते और आज मुझे, श्रमिक समस्या नहीं हो रही होती। 
झेंप छुपाते हुए, मैंने प्रगट में कहा- हाँ, नारायण, प्रधानमंत्री के आह्वान पर देशवासियों ने, अपनी अपनी मानवता का परिचय दिया होता तो, देश में यूँ अफरा तफरी का वातावरण नहीं बनता।
फिर आदेशात्मक स्वर में कहा- नारायण, अभी लंच तुम मेरे साथ करोगे। साथ ही मैंने अपनी रईसी दिखाने को कहा- चलो आज मैं, तुम्हें फाइव स्टार में लंच करवाता हूँ। 
नारायण ने कहा - तुम्हारी भावना का आभार, मै लंच तुम्हारे साथ लेने तैयार हूँ मगर किसी सस्ते रेस्टारेंट में, लेना पसंद करूँगा। 
मैंने कहा- नारायण छोड़ो यह झिझक, आज तुम्हें, यह पुराना मित्र, मजे करवाना चाहता है।
उसने जबाब दिया - यह मेरी झिझक नहीं है अपितु सिध्दांत है, जो मुझे बताता है कि बुरे दिनों में मिली सहायता से मजे  नहीं बल्कि मूलभूत जरूरतों की पूर्ति  करना उचित होता है। अतः मेरी भूख के समय, उदर पूर्ति के लिए तुम, मुझे सादा भोजन करवा दो। 
कुछ पल मैं उसका मुहँ ही देखता रह गया, सोचने लगा यह कम पढ़ा लिखा व्यक्ति तो, इंसान बचा रह गया। मैं पढ़ा लिखा रईस, खुद में खुदा का भ्रम पाल कर, ना तो खुदा हो सका और ना ही इंसान रह गया हूँ। 
फिर उसकी मर्जी अनुसार मैं उसे एक साधारण भोजनालय में ले आया और हम साथ, थालियों में दिया गया, भोजन ग्रहण करने लगे। खाते हुए मैंने, उसे अपनी फैक्ट्री में काम का प्रस्ताव किया। उसने सहर्ष मान लिया। मैंने कहा- मैं तुम्हारे लिए वेतन निर्धारित नहीं करूँगा अपितु, तुम्हें यह विशेषाधिकार रहेगा कि तुम मासिक रूप से जितनी चाहो राशि, स्वयं के लिए आहरित करो। ठीक उस तरह से, जैसे फैक्ट्री तुम्हारी ही है।
उसने यह मंजूर कर लिया।
यह कहते हुए मुझे विश्वास है कि नारायण न्यायसंगत राशि ही लिया करेगा और तब, मुझे यह प्रतीत होने लगा कि नारायण के आने से फैक्ट्री के जरिये इसमें आय दोगुनी हो जायेगी ...
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
02-06-2020

Monday, June 1, 2020

अनुपमा (2) ..

अनुपमा (2) ..

सरोज और अनुपमा में 11 वर्ष का अंतर ही था मगर गाँव के रिश्ते में सरोज, अनुपमा की चाची थी। वय में बहुत अधिक अंतर नहीं होने से और मन मिल जाने से, सरोज एवं अनुपमा, मित्रवत हो गए थे। अक्सर छुट्टी के दिन अब, अनुपमा सरोज के पास आ जाती थी।
एक दिन अनुपमा आई और उसने पूछा- चाची, भाई और 'भाई जैसा' होने में क्या अंतर होता है? 
सरोज ने तनिक सोचा फिर उत्तर दिया- कोई भी मनुष्य, हमेशा या पूरे जीवन भर, एक सा विचार और भाव नहीं रख सकता है। परिस्थिति और काल उसके चिंतन एवं भावनाओं को बदलती रहती है। खून के रिश्तों में ऐसा होते हुए भी विचार तो बदल सकते हैं मगर भाव नहीं बदलते हैं। 
ऐसे में, जो रिश्ते में नहीं, वह लड़का किसी समय भावातिरेक में, किसी लड़की के प्रति भाई सा भाव तो रख लेता है परन्तु किसी और समय, वह लड़की को लेकर 'भाई सा' भाव नहीं रख पाता है। 
इसके विपरीत सगा भाई, अपनी बहन के प्रति, सदा भाई वाला भाव ही रखता है। ऐसे, भाई और 'भाई जैसा' होने में अंतर होता है। 
अनुपमा तब बोली- समझ गई चाची कि क्यों मुझे, आपने, उस दिन रविंद्र को भाई सा मानते हुए भी, उससे सतर्क रहने को कहा था। 
सरोज बोली- हाँ अनुपमा, तुम ही रविंद्र को, खुद देख लो किसी दिन वह तुम्हारा रास्ता रोक, खड़ा हुआ था। फिर गलती के एहसास करने के बाद, तुम्हारे पापा से, तुम्हें अपनी छोटी बहन बता कर गया। ऐसे ही, उसका भाव आगे भी पलट सकता है। 
चूँकि बहन जैसी कहने वाला, हमसे ज्यादा निकटता प्राप्त कर लेता है। हम उस पर विश्वास करने लगते हैं। जबकि कोई अन्य युवक हमारे से वह निकटता नहीं पाता है, इस कारण हम उसके तरफ से चौकन्ने रहते हैं। तब, कोई 'भाई जैसा' युवक, हमारे लिए, किसी अन्य युवक से ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
तब अनुपमा ने पूछा- चाची इसका मतलब, रविंद्र फिर पहले जैसी हरकत पर उतर सकता है?         
तब सरोज समझाते हुए बोली- अनुपमा, उसकी दो बहनें हैं, इसलिए ऐसा शायद वह फिर कभी न भी करे। मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने तुम्हारा रास्ता रोक तुमसे कहा था कि खेत में, वह तुम्हें प्यार वाली फिल्म दिखायेगा। इससे यह अंदेशा रहता है कि वह, फिर ऐसा कर सकता है।
अनुपमा ने फिर प्रश्न किया- चाची, यह 'प्यार वाली फिल्म' का मतलब क्या होता है। 
तब सरोज बोली- यह अच्छा है कि तुम्हारे पास मोबाइल नहीं है। आजकल मोबाइल पर इंटरनेट के माध्यम से ऐसी ख़राब सामग्री, बच्चों तक बहुत पहुँच जाती हैं। ऐसी ख़राब सामग्रियाँ, अनियंत्रित शारीरिक उत्तेजना उत्पन्न करतीं हैं। 
एक बार कोई इन्हें देखले तो उसके देखने/पढ़ने की लत सी हो जाती है। आजकल, लड़कियों और युवतियों पर जो यौन अपराध बढ़ रहे हैं। वह इन्हीं अश्लील सामग्रियों के कारण हो रहे हैं।
निश्चित ही 'प्यार वाली फिल्म', रविंद्र, इन्हीं अश्लील तरह की सामग्रियों के लिए प्रयोग कर रहा था। यदि रविंद्र में यह लत है तो उससे, अपनी बचत करना, अपने पर खतरा कम करना होगा।     
अनुपमा ने फिर पूछा- चाची, आप इतनी सब बातें कैसे जानती हैं?
सरोज- मैंने मुंबई में, ऐसी खराबियों को पास से देखा और अनुभव किया है। 
अनुपमा ने अगला प्रश्न किया - चाची, मेरे मम्मी, पापा यह सब जानते होंगे या नहीं?
सरोज ने सोचते हुए कहा - शायद नहीं, और यही हमारे समाज में बहुत बड़ी कमी है। वास्तव में जो पेरेंट्स, नई कंप्यूटर तकनीक एवं इंटरनेट के जानकार नहीं उन्हें मालूम नहीं कि कितनी खराबियाँ, इनके माध्यम से प्रसारित हो रही हैं। जिनकी जद में उनके बच्चे आ रहे हैं तथा अपने वर्तमान और भविष्य पर अनायास खतरा ले रहे हैं।   
अनुपमा ने बताया- जी, चाची, हमारे मम्मी-पापा तो मोबाइल पर सिर्फ बात कर पाते हैं। 
सरोज ने निष्कर्ष जैसा निकालते हुए बताया - इसलिए, सर्वाधिक हितैषी होते हुए भी अनेकों पालक, अपने बच्चों की भलाई सुनिश्चित नहीं कर पाते हैं। ऐसे में, उनके बच्चों को मार्गदर्शन के लिए अन्य पर निर्भर रहना होता है। यह समाज का दुर्भाग्य है कि स्कूल/कॉलेज में बच्चों को मिलने वाले अधिकाँश गुरु भी, आजकल मार्गदर्शक के रूप में अपनी सही भूमिका नहीं निभा रहे हैं। 
अनुपमा (खुश होते हुए) बोली- चाची, मुझे तो भाग्य से आप मिल गईं हैं।
सरोज- यह तुम से ज्यादा मेरे भाग्य की बात है, अनुपमा। पिछले वर्ष कोरोना खतरा नहीं आया होता तो, हम आज भी मुंबई की धारावी बस्ती में श्रमिक परिवार के रूप में, एक छोटी खोली में जीवन यापन कर रहे होते। उसी को अपनी नियति मानते और साधारण की तरह रह जाते। हम कोरोना के कारण, लाचारी में 1200 किमी पैदल चलके गाँव आये। उस यात्रा में मैंने बहुत सी बातें देखीं, जिनसे उस पूरी यात्रा में मेरा दिमाग अत्यंत सक्रिय रहा। उसी समय, मुझे अपनी विशिष्टताओं का ध्यान आया। 
मैं समझ सकी कि कोरोना विपदा के माध्यम से भगवान ने हम सभी को अपने तौर तरीकों पर, गौर करने का अवसर दिया और उन्हें ठीक कर लेने का संकेत दिया था। 
अनुपमा प्रसन्नता से बोली- पर चाची, सभी ने इसे समझा नहीं। आपने समझा और आज आप यहाँ गाँव में, समाज हितैषी की तरह विख्यात हो रही हैं।
सरोज ने गंभीर भाव से कहा- वास्तव में अनुपमा, भगवान हर किसी को समय समय पर कुछ बातों के संकेत दिया करते हैं। मगर, हम इन्हें समझने में चूक जाते हैं।
अनुपमा ने जिज्ञासा से पूछा - चाची, पिछले दिनों में मेरे साथ जो हुआ उसमें मेरे लिए भगवान का संकेत, क्या था? 
सरोज : तुम उम्र जनित दैहिक आकर्षण के प्रभाव में अपनी पढ़ाई के तरफ से विमुख हो रही थीं। कुछ घटनाओं के माध्यम से भगवान का संकेत, तुम्हें, अपने भविष्य के प्रति सचेत करने का था। तुम सचेत हुईं भी और भविष्य सुनिश्चित करने के उपाय के लिए, तुम्हारी अंतर्प्रेरणा तुम्हें मुझ तक ले आई। 
इसमें भगवान का संकेत यह भी है कि तुम, अपने पालकों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार होकर अपने और उनके जीवन में कठिनाई बढ़ा लेने से बचो। इसमें ही तुम जैसी किशोरियों के लिए, भगवान का एक और इशारा भी है। 
अनुपमा का प्रश्न- वह क्या, चाची?
सरोज ने सलाह देने वाले अंदाज में कहा - अनुपमा, वह यह कि किशोरियों को स्कूल/कॉलेज के दिनों में पढ़ने पर ही, ध्यान देना चाहिए। किसी के प्रति उम्र जनित सहज आकर्षण को प्यार मानने की भूल नहीं करना चाहिए। यह समझना चाहिये कि गाँव बस्ती के लड़कों के चक्कर में पड़ने से पढाई और भविष्य चौपट होते हैं। 
दुनिया में सिर्फ इतने ही लड़के नहीं होते, जो आसपास दिखाई देते हैं। दुनिया में बहुत और अत्यंत योग्य लड़के होते हैं, जो लड़कियों की योग्यता हासिल करने के उपरान्त, उनसे विवाह और प्यार को उत्सुक मिल जाते हैं। 
अनुपमा सिर्फ मुस्कुराई तब सरोज ने आगे कहा- अनुपमा तुम्हारे लिए, योग्य लड़का, यहाँ गाँव में नहीं है। तुम अभी पढ़ो-लिखो और योग्य बनो।समय आने पर एक योग्य लड़का, स्वतः तुमसे परिणय करने आएगा। 
ऐसा सुनते हुए, अनुपमा के गोरे मुखड़े पर, गुलाबी रंगत आ गई, जिससे वह स्वर्ग से उतरी अप्सरा सी लग रही थी। तब सरोज ने उसे गले लगाया उसके माथे पर चुंबन लिया।
दोनों हँसने लगीं फिर अनुपमा ने विदा ली और सरोज, नीलम एवं अपने, छोटे छोटे बच्चों की देखभाल में व्यस्त हो गई ...   



--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
01-06-2020