Saturday, April 11, 2020

आज चाहिए रानी लक्ष्मीबाई सी वीराँगना ..

आज चाहिए रानी लक्ष्मीबाई सी वीराँगना..

विश्व-विध्यालय में, मैं इतिहास की प्रोफेसर थी। मैं स्वयं डॉक्टरेट थी। कई छात्र छात्राओं ने, मेरे मार्गदर्शन में पीएचडी की थी/कर रहे थे। नेहा भी इस समय मेरी ऐसी विध्यार्थी थी।
उसने पीएचडी का विषय "आज चाहिए रानी लक्ष्मीबाई सी वीराँगना" चयन किया था।
उसे गाइड करने के लिए, मुझे भी रानी पर, गहन अध्ययन करने का सौभाग्य मिला था। इस सबमें, मैं उनकी अनन्य प्रशंसक हुई थी।
रानी झाँसी के अतिरिक्त, मैं एक और व्यक्ति से अत्यंत प्रभावित थी। ये, डॉ॰ वर्गीज़ कुरियन थे, जो हमारे देश मे सफेद क्रांति के प्रणेता थे।जिन्होंने अद्भुत प्रशासनिक कौशल और समर्पण का परिचय देकर, कोआपरेटिव के माध्यम से, दुग्ध उत्पादकों को अच्छे जीवन अवसर उपलब्ध कराये थे। डॉ॰ कुरियन ने, सहकारिता में, उपलब्धियों के माध्यम से, देश/समाज सेवा का, अभूतपूर्व कीर्तिमान भी रचा था।
इन दो आदर्शों ने प्रेरित कर मुझे यह ललक दी थी कि काश! मैं, अपने जीवन में, कुछ ऐसी उपलब्धियाँ अर्जित करूँ। 
फिर दुनिया पर, यह कोरोना संक्रमण विपदा आई थी। मेरा तभी से, इसमें अपनी कोई भूमिका लेने का मन करने लगा था।
लॉक डाउन के कारण मुझे, छुट्टियाँ मिली हुईं थीं। अपने 8 एवं 5 वर्षीय दो बेटों, बैंक अधिकारी पति (जिनकी ड्यूटी जारी थी) एवं पापाजी (पति के पिता) के बीच, घर में सानंद रह रही थी।
साथ ही सोते जागते, हर समय, मेरे मन में वैचारिक घोड़े दौड़ते रहते थे। सरकार एवं प्रशासन के समक्ष, कोविड-19 से पेश आ रही चुनौतियों में, निपटने में, सहायक होने के लिए, मेरे अपने योगदान का प्रकार खोजती रहती थी।
तब एक नई समस्या उत्पन्न हो गई थी। हमारे नगर के झुग्गी-झोपड़ी में संक्रमण सामुदायिक प्रसारण चरण (Community Transmission Stage) में आ गया था।
 नारी ह्रदय में ममता एवं करुणा का वास, ज्यादा होता है।
मुझे हजारों के मारे जाने की आशंका दिखने लगी। लगने लगा कि अभाव में एवं कम पढ़े लिखे, वहाँ के लोगों को, उनके घर तक भोजन की व्यवस्था न की जा सकी तो, अराजकता फ़ैल सकती है। सरकार, प्रशासन और डॉक्टर्स की मुश्किलें और बढ़ सकती है। साथ ही कोरोना से मौत विकराल रूप ले सकती है।
चुनौतीपूर्ण इस परिस्थिति में मेरे दिमाग में एक योजना आई थी।
अपने दो आदर्शों में से एक, मुझे प्राण तक बलिदान करने को प्रेरित कर रहीं थीं। दूसरे सहकारिता आंदोलन के नेतृत्व की, मुझे, सूझ बूझ ग्रहण करने को प्रेरित कर रहे थे। दिन में मेरे मन में, इसकी विस्तृत कार्य विधि ने आकार ले लिया था।
अब मुझे प्रतीक्षा थी, शौर्य (मेरे पति) के ड्यूटी के बाद घर लौटने की।
रात्रि भोजन के पूर्व पापा जी, शौर्य और मैं पापा जी कमरे में अधलेटे से चर्चा कर थे। तब मैं, अपनी ठानी बताने के लिए, तन कर बैठ गई थी। उन्हें, अपनी योजना का ब्यौरा सुनाया था। मैंने फिर उनसे, उनके परामर्श के लिए पूछा था।
शौर्य से पहले, पापा जी ने उत्तर दिया था- बेटी, तुम्हारा कार्य दो चार दिनों का नहीं, महीनों का हो सकता है। तुम, सोच लो बनाये रख सकोगी यह हौसला? जबकि वह चुनौतियाँ भी आ सकती हैं, जिनकी तुम्हें अभी कल्पना ही नहीं।
मैंने दृढ़ता से कहा था- पापा जी, मुझे ज्ञात है कि मेरे इस कार्य में मेरी, जान तक जा सकती है।
पापा जी ने कहा था - ठीक है बेटी, घर में, सबके लिए भोजन तैयार करना और बच्चों की सम्हाल मैं ले लेता हूँ। मेरी ओर से, हाँ है।
अब गेंद, शौर्य के पाले में थी।           
हमेशा की तरह अपने ओंठों पर मन मोहिनी, मृदु मुस्कान (जिस के कारण, कभी मैं उसकी प्रेम दीवानी हो, उन पर, अपना दिल हार बैठी थी)  लाते हुए, शौर्य बोले थे-
मुझे, एक महान पत्नी का पति के, पहचान बनने की ख़ुशी होगी।
फिर, बच्चों सहित सबने एक साथ भोजन ग्रहण किया था।
सोने जाने के पूर्व मैंने कार्य/योजना क्रियान्वयन की, रुपरेखा एक रजिस्टर में दर्ज की थी। फिर अति उत्साह में मन को संयत किया था, और सोने के लिए, शौर्य के बगल में जा लेटी थी। जानती थी कि पर्याप्त सोना, फिटनेस एवं कार्य दक्षता की दृष्टि से आवश्यक था।
अगला दिन रविवार था। पापा जी, बच्चों के साथ और रसोई में बिजी रहे थे।
सबेरे से ही शौर्य ने, मोबाइल पर पहले, उस स्लम एरिया के पार्षद के सहयोग का आश्वासन प्राप्त किया। तत्पश्चात कुछ उनकी सहायता एवं कुछ अपने कॉंटॅक्ट के जरिये,  मेरी योजना में आवश्यक, दस पिक अप वाहन, दस तखत, इतने ही सिलेंडर,चूल्हे, टेंट-चेयर, पाँच क्विंटल आटा, आवश्यक नमक किराना, 100 किलो, टमाटर, प्याज मिर्ची आदि तथा पेपर लिफाफे आदि की व्यवस्था कराते रहे। जिसके होने के बाद लगभग पचास हजार का व्यय एक दिन के लिए अनुमानित था। यह मैंने अपनी बचत में निकालना तय किया था।
फिर शौर्य ही ने पचास महिलाओं एवं कुछ ड्राइवर वाहन के परमिट, पास भी अरेंज करा लिए थे।
मैंने अपनी सह-शिक्षिकाओं एवं विद्यार्थियों में से नेहा सहित, 50 को अपनी योजना विवरण सुनाते हुए, अपने सद्कार्य एवं प्रयोजन में हिस्सा लेने को राजी किया था।
मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही थी कि शौर्य के सहयोग से, एक दिन में ही इतनी व्यवस्थायें कर लीं गईं थीं।
इससे अगली सुबह से ही हमारी योजना क्रियांवित किया जाने का रास्ता प्रशस्त हो गया था।
जिस तरह चुनाव में मतदान दल, चुनाव बूथ के लिए प्रस्थान करते हैं (मुझे मतदान कराने का अनुभव था), उसी तरह, सभी साधन सामग्री के साथ, नियत समय पर हम सबने, दस टीम में विभक्त होकर, अपने अपने साधन सामग्री के साथ झुग्गी झोपडी इलाके  के दस चिंहित स्थानों की ओर रवानगी ली थी। 



(शेष भाग अगली पोस्ट में)
-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन 
11.04.2020

 



Thursday, April 9, 2020

एक घर की जिम्मेदारी ...

एक घर की जिम्मेदारी ....

ऑन्टी एवं दीदीयों, की रोजमर्रा की डाँट-फटकार, शिकायतें भी लगता है, एक तरह का मनोरंजन ही होता था।
विकल्प कई होते थे, जैसे- एक कान से सुनो, दूसरे से निकाल दो।
या       
कोई ज्यादा ही भड़क रहीं हों तो,  बिना दिल पर लिए, ईंट का जबाब पत्थर से दे दो, और सिर झटक के, (नज़र बचा के) हँस लो, इत्यादि।
ऐसी बहस में, ज्यादा ही कोई बुरा मान गई, तो भी क्या होता था!
ज्यादा से ज्यादा, उस घर का काम छूट जाता था।
इसकी भी, फ़िक्र नहीं करनी होती थी, काम खुद करने की फुरसत नहीं आज मालकिनों को, यहाँ छूटता तो कहीं और लग ही जाता था।
ऐसे ही दस घरों में विभिन्न तरह के काम करते हुए, मैं, लगभग पंद्रह हजार कमा लेती थी। किसन (मेरे पति) मजदूरी से 25 हजार कमा लाते थे। बूढी सास सहित दो छोटे बच्चों के परिवार में, इतने से ही खर्चा अच्छी तरह चल जाता था। कुछ बचत भी हो जाती थी। जिसे हम बैंक में जमा करा देते थे।
यह सब बातें, 20 मार्च के पहले की, बीती बातें हुईं थीं। उस दिन के पहले, कुछ दिनों से कोरोना, कोरोना सुनाई पड़ रहा था।
21 मार्च से इसका डर बढ़ गया था। सब काम-धंधे बंद होने लगे थे। गाड़ी, ट्रेनें बंद होने लगीं थीं। टीवी खोलो तो, डरावनी बातें पता चलतीं थीं। आसपास के परिवार, सब गाँव जाने लगे थे।
तब किसन ने कहा था, हम कहीं न जायेंगे।
फिर किसन और मुझे, मालिक, मालकिनों ने काम पर आने को मना किया था। लेकिन विश्वास दिलाया था कि बिना काम किये के, आधे पैसे देंगे। 
हमने संतोष किया था कि 18-20 हजार भी हुए तो, किसी तरह गुजारा चल जाएगा।
दस दिन हुए थे आस पास सूनापन रहने लगा था। कामकाजी हम, बिन काम के घर बैठे तो हाथ-पैर में दर्द लगने लगा था।
अच्छा यह हुआ कि हमारे शहर में कोरोना नियंत्रित हो जाने से, थोड़ी छूट हो गई थी।
मेरे पास में 5 घर ऐसे थे, जहाँ परिवार में जवान तथा दीदी भी सर्विस करती थीं। अब, उन घरों में, दीदी के घर पर रह जाने के कारण, मेरे न होने से भी, काम की विशेष तकलीफ, नहीं रह गई थी।
मुझे चिंता उन 5 घरों की हुई, जहाँ अंकल-ऑन्टी रिटायर्ड थे और घर में दो ही, ऐसे सदस्य थे। मैंने, मोबाइल से इन घरों में काम पर आने को पूछा था तो, वे ख़ुशी से तैयार हुए थे। 3 अप्रैल से, मैंने इन घरों में काम फिर शुरू कर दिया था।
"तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो
तुमको अपने आप ही सहारा मिल जाएगा"
हमें, गाने की इन दो पंक्तियों ने, ऐसा सहयोग करने को प्रेरित किया था।
पहले दिन ही, नूतन ऑन्टी ने, जो शौकिया सिलाई भी करतीं थीं, उन्होंने, मुझे घर में उनके द्वारा सिले हुए मुँह, नाक कवर करने वाले, 100 कपड़े (मॉस्क) दिए थे। अंकल ने, सावधानियाँ बताईं थी। सावधानियों एवं मॉस्क के प्रयोग से मैंने, उस दिन से काम शुरू कर दिया था।
बहुत से मजदूर/माली गाँव चले गए थे। इसलिए मेरे वाले घरों में, गमलों एवं बगिया की देखरेख नहीं हो पा रही थी। किसन के लिए कहे जाने पर, मैंने उसे इन घरों में काम पर लगवा दिया था।
गीता ऑन्टी के घर में, जहाँ वे चिढ़चिढ़ बहुत करती थीं, उनके घर अंकल की पेंशन कम थी। मुझे दिए जाने वाले पैसों को लेकर भी काटा काटी होती थी। सामान्य हालातों में, मैं, उनके, काम नहीं करने की, सोचा करती थी। लेकिन गीता ऑन्टी-अंकल सबमें ज्यादा बूढ़े थे। मैं न करूँ तो, उन्हें कोई दूसरा, मिलने वाला नहीं था।
इतने दिन, मैंने काम नहीं किया तो सारा घर अस्त-व्यस्त हुआ था। अतः इन विशेष परिस्थिति में मैंने इस घर को नहीं छोड़ने का फैसला लिया हुआ था।
हम घर में टीवी भी देखा/सुना करते थे, जिस पर सभी तरफ से आपसी सहयोग की अपील सुनने मिलते थी।
मेरा गीता ऑन्टी के घर 10 तारीख का महीना चलता था।
शायद गीता ऑन्टी ने मेरे काम न करने वाले दिनों में, मेरे काम करने के महत्व को, पहचाना था। पिछले दिनों में वे,मुझसे बहुत प्यार से पेश आ रहीं थीं। आज जब में काम कर वापिस जाने लगी तो, उन्होंने मुझे रोका था।
जो मेरा पैसा कई बार माँगे जाने के बाद, मुश्किल से ही और काटा काटी के उपरांत देतीं थीं, उन्होंने इस बार, बिना कटौती के पूरे 1000 रूपये देने के लिए, मेरे तरफ बढ़ाये थे। मेरे लिए उनका, यह व्यवहार आश्चर्यजनक था। लेकिन मैंने भी, कुछ और तय कर रखा था। मैंने पैसे लेने से मना कर दिया था।
वे चौंक गईं, कहने लगीं, ऐसा क्यों, क्या तुम्हें और ज्यादा चाहिए हैं?
मैंने कहा, नहीं, मैं, आपके घर, बिन तनख्वाह के काम करुँगी।
उन्हें संशय हुआ कि मैं किसी नाराजी में मना कर रहीं हूँ। वे मुझे लेने को मनाने लगीं, और बोलीं, बेटा क्यों नाराज हो? हम बूढ़ों का, तुम्हारे सहारे बिना चल न पायेगा।
मैंने कहा, ऑन्टी, मैं नाराज नहीं हूँ।
उन्होंने पूछा, फिर तनख्वाह क्यों नहीं ले रही हो।
मैंने कहा - ऑन्टी, हमारे प्रधान मंत्री, हम सब से अनुरोध कर रहे हैं कि, मुसीबत के इस समय में,  हम सब, एक घर की जिम्मेदारी लें।
इस पर, मैंने, आपके घर के काम की, जिम्मेदारी लेना तय किया है।
मेरे उत्तर पर ऑन्टी मुझे विस्मय से यूँ देख रही हैं, जैसे किसी बेसुरे ने लता मंगेशकर जैसे सुर ताल में कर्णप्रिय, मधुर गायन, सुना दिया हो ... 
-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
10.04.2020
   
अपने आग्रह तो
मैं चाहता कि सब मानें
औरों के आग्रह से मगर
मतलब न रखता हूँ
मनुष्य हूँ मुझे मिला
उन्नत मस्तिष्क है
फिर भी विवेकवान का
परिचय न रखता हूँ

नुसरत अंजुम ... (कहानी)

नुसरत अंजुम ...  (कहानी)


मिनी ब्रेड पर मक्खन लगा कर स्वयं मुझे खिलाते हुए बहुत ही प्यार से मुझसे कह रही थी-
पापा, इतना काम करोगे तो बीमार पड़ जाओगे।
मैंने जबाब दिया था-
बेटी, चिंता न करो। इस तरह के मौके बहुत नहीं होते, जब हमें मानव समाज को इतना देना होता है। 
दीपा, (मेरी पत्नी) भी ब्रेक फ़ास्ट के लिए, डाइनिंग टेबल पर साथ थीं हम पापा-बेटी को सुनते हुए वे, हल्के से मुस्कुरा बस रहीं थीं।
मिनी ने कहा-
पापा, अच्छा नहीं लगता, आप 18-18 घंटे काम पर रहते हो, लगातार 20 दिन हो गए हैं।
मैंने, प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-
बेटे, लेकिन रोज वापिस तो आ जाता हूँ ना! 
तुम्हारे दादा ने, जब मैं कॉलेज पढ़ता था, एक बार कहा था, 'बेटे, कभी मौके आते हैं, जब हमारा जीने से भी अच्छा, मर जाना होता है। मानवता के लिए, कभी ऐसे बलिदान का अवसर आये तो, तुम मरने से भी नहीं डरना।'
मिनी बेटे, तात्पर्य यह है कि मानवता हमसे आशा कर रही है, अभी जितना दे सकते हो, दो अपना इसके खातिर। 
दीपा तब पहली बार, बोलीं थीं-
काम जितना बन पड़े कीजिये, मगर अशुभ न बोलिये।             
मैंने मुस्कुरा कर दोनों के कंधे, प्यार से थपथपाये थे।
फिर पोर्च में अपनी गाड़ी में आ बैठा था। ड्राइवर ने गेट बंद किया था। कार चलने लगी तो मैंने कहा-
आबिद, ऑफिस चलो। 
मैं पुलिस अधीक्षक था। स्वास्थ्य कर्मियों पर, हमारे एक इलाके में, कल हुई, पथराव एवं बदसलूकी की घटना पर, राज्य सरकार ने अत्यंत नाराजी ज़ाहिर की थी। मुझ पर एवं जिलाधीश पर, जिससे अत्यंत मानसिक दबाव था।
कार्यालय में अपने अधीनस्थ, दस अधिकारियों से बैठक करते हुए, मैं कह रहा था-
सख़्त कार्यवाही से लोग डरेंगे जरूर, मगर उनके दिमाग का शरारत/अपराध करने वाला कीड़ा, इससे मरने वाला नहीं है। उसी से उलझ, इस विपदा की घड़ी मेंजिससे, हम देश और समाज को रचनात्मक योगदान नहीं दे सकेंगे।
फिर मैंने, अपने दिमाग में आई योजना, उन्हें सुनाई थी। उनको विकल्प दिया था कि जो चाहें, वही मेरे साथ चलें, जान को खतरा हो सकता है। अतः जो घरेलू जिम्मेदारीवश, जान पर खेलना न चाहें, उन्हें अभी छूट है। चार अधिकारी, जिसमें एक लेडी भी थी ने, मेरे साथ, यह खतरा उठाने का विकल्प लिया था।
मैंने कलेक्टर महोदय को मोबाइल कॉल के जरिये, अपनी योजना बताई थी।
उन्होंने कहा था-
मैं इस हेतु प्रशासनिक कवर देता हूँ। मगर आप सोच लीजिये, यह युक्ति काम न आने पर, आपकी जान खतरे में हो सकती है। सरकार हम पर सख्त कार्यवाही करेगी सो अलग।
मैंने उन्हें आश्वस्त किया था-
नहीं, यह सब नहीं होगा,सर !
मेरे आत्मविश्वास ने उन्हें, सहमति को बाध्य किया था। 
फिर हम उस इलाके में पहुँचे थे। कल हुई घटना पर, पुलिस कार्यवाही के भय से, वहाँ सब घर में बंद दिख रहे थे। हमारे साथ आई, ट्रैक्टर ट्राली में, पत्थर रखे हुए थे। 1 छोटे चौराहे में, मेरे 4 मातहत साथी एवं मैं, वर्दी में नहीं थे, मेरे हाथ में स्पीकर था। मैंने, कहना शुरू किया था-
मैं, पुलिस अधीक्षक अपने चार साथियों के साथ आपके बीच निहत्था आया हूँ। साथ में पत्थर भी लाया हूँ। जो आपके प्रयोग के लिए हैं।
कोई और शोरगुल न होने से, मेरी आवाज गूँज रही थी।
मैंने कहना जारी रखा था-
जिस प्रकार, हम आये हैं उससे, आपको, कोई खतरा नहीं है।  
मैं, अपील कर रहा था कि-
यहाँ आइये, या फिर आप घर से ही सुनें, और बाहर आयें तो, आपस में दूरी रखने तथा मास्क की सावधानी रखें।
 फिर रुका था, इन्तजार किया था। एक-दो करके, 3-4 मिनटों में, हमारे आसपास, करीब 100 पुरुष-स्त्री आ गए थे। ज्यादातर ने, पहचान छिपाने के लिए, मुहँ पर कपड़ा या नक़ाब डाला था, मगर यह कपड़ा/नकाब कोरोना के खतरे की दृष्टि से अच्छा था।
अब बहुत ही संयत, मधुर और ओजस्वी संबोधन का दबाव मुझ पर था। मेरी योजना की सफलता इसी पर निर्भर थी।
मैंने आगे कहना आरंभ किया-
कल आप में से कुछ लोगों ने, हमारी स्वास्थ्य एवं प्रशासन की टीम जो, आपकी ज़िंदगी की फ़िक्र में, सेवा देने पहुँची थी, पथराव किया, जिसमें तीन युवा  डॉक्टर्स एवं स्टाफ बुरी तरह जख्मी हुए हैं। 
आप सोचिये, जिन की मदद से, हममें से जो, कोरोना संक्रमित हैं, उनकी प्राण रक्षा की जा सकती है। वही अगर घायल रहे तो कैसे, यह संभव होगा?
मैं बोलते हुए रुका था, देख रहा था की आसपास भीड़ धीरे धीरे, आठ सौ हो गई थी।
हमारी स्थिति शिकार के लिए बँधे पाड़ों  जैसी थी, सामने की भीड़ में, कुछ लोगों की हिंसक प्रवृत्ति रूपी शेर, कभी भी, हम पर हमला कर सकता था।
फिर मधुर स्वर में आगे कहा था-
जो विपत्ति आज हम पर आई है, उसे हराने के लिए हमें आज़ादी के संघर्ष के तरह का जज़्बा रखना होगा, एक जुट रहना होगा। तभी ज़िंदगी की जीत होगी और मौत हारेगी। आप देखिये हम पाँच निहत्थे, अपने प्राणों तक का बलिदान देने के लिए, रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चंद्र बसु, चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंग तथा राजगुरु की तरह तैयार हैं। 
कोरोना पर हमारी जीत, आपके, हमें मिले सहयोग पर निर्भर होगी। हमने पिछले 20 दिनों में, कोई बर्बरता की हो और यदि, आप, हमें दुश्मन की तरह देखते हैं, तो आप हम पाँचों की हत्या कर दीजिये। पत्थरों से मारे जाने के लिए, हम ये पत्थर लाये हैं। 
आप आइये, इन्हें उठाइये और हमें मार दीजिये। अन्यथा मौका दीजिये कि हम आप की नहीं अपितु अन्य नागरिकों पर भी आसन्न विपत्ति से, सबकी रक्षा के लिए, कारगर व्यवस्था बना सकें। 
फिर रुक कर कहा-
अब मुझे और कुछ नहीं कहना है। आप को ही करना है, हमसे सहयोग या हमारी हत्या। 
फिर मैं, चुप हो गया था।
तब भीड़ में से दस-बारह लोग, ट्रॉली की तरफ बढ़ने लगे थे।
ठहरो!,
तभी, एक कड़कती नारी आवाज ने, उनके बढ़ते कदमों को रोक दिया था। वह बढ़कर मेरी तरफ आई थी, मुझसे माइक लिया था। लग रहा था, उसे वहाँ के लोग, पहचानते थे और वहाँ उसका प्रभाव, अच्छा था।
उसने, चेहरे पर से, नक़ाब हटाया था। वह लगभग 40 वर्षीया, सुंदर स्त्री थी। उसने, हमारे लिए, माइक पर अपना परिचय देते हुए, कहना प्रारंभ किया था-
मैं, नुसरत अंजुम कॉलेज में प्रोफेसर हूँ। 
फिर भीड़ की तरफ मुखातिब हो, इस तरह कहती गई थी-
माना कि हमें, पुलिस से एवं देश के अनेक लोगों से शिकायत है। मगर इनके कहने पर आज, हाथ में पत्थर नहीं उठाना है। हमारा, उठाया हरेक पत्थर, देश और दुनिया की मीडिया द्वारा भयानक रूप से बयान किया जाएगा। 
पहले से ही, हमारे विरुध्द फैली नफरत, इनके मारे जाने पर और बढ़ेगी। इससे, हम सबकी ही नहीं, अपितु दुनिया भर के हमारी कौम के लोगों की गुजर बसर में मुश्किलात बढ़ेगी। ये दुरुस्त फरमाते हैं, कम से कम कोरोना वायरस से लड़ाई में, इन्होने कोई काम, हमारे विरुध्द, नहीं किया है। 
आज इस समय में हम सारे बैर-वैमनस्य अलग रखें। इनको सहयोग कर हम कोरोना से जंग को जीतें। तथा इससे हम ज़िंदगी बचा सकने में कामयाब रहें तो, अपने हितों की लड़ाई बाद में लड़ें। 
ये महोदय, अपनी तुलना महान सेनानियों से, कर रहें हैं। हम आज बतायें, हम भी, देश के लिए सेवाओं और बलिदान की, एपीजे अब्दुलकलाम साहब एवं शहीद, परमवीर, अब्दुल हमीद मसऊदी की परंपरा, बढ़ाने वाले लोग हैं। 
हम घर वापिस जायें। 'शबे शबे बरात' की इबादत,घरों में करे। यह देश, हमें अपने मजहबी विश्वास बदलने नहीं कहता है। इबादत से नहीं रोकता है। 
शुक्रिया!
नुसरत के इस संबोधन का, उपस्थित लोगों पर, अच्छा असर हुआ था। लोग, हमें मारे बिना, घर लौटने लगे थे।
अपने पीछे की स्वास्थ्य टीम को वॉकी-टॉकी के जरिये हमने, क्षेत्र में परीक्षण पुनः शुरू करने के लिए कहा था। आश्चर्यजनक रूप से आज, उन्हें सभी का सहयोग मिला था। तीन घरों के लोग, संक्रमण संदिग्ध मिले थे, जिन्हें अस्पताल पहुँचाया गया था।
हमारा अहिंसक, विनम्र आखेट, सफल हुआ था, हमने हिंसक प्रवृत्ति रुपी शेर को मार गिराया था। 
यह घटना देश ही नहीं अपितु वर्ल्ड मीडिया पर चर्चा का विषय बनी थी।
पूरे देश में जागरूकता बढ़ाने में, सहयोगी सिध्द हुई थी।
अभी मैं, देर रात घर लौटा हूँ। दीपा एवं मिनी प्रतीक्षा करते मिलीं हैं। दोनों बहुत खुश भी हैं। दोनों ही, मुझसे, गले मिली हैं।
शिकायती स्वर में तब, मिनी ने कहा है-
पापा, सूझबूझ आपकी थी, जान पर खतरा आपने लिया था। मीडिया पर मगर, गुणगान नुसरत अंजुम के हो रहे हैं।
मैं बहुत थका हुआ हूँ मगर, मैंने मुस्कुराकर बेटी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा है
बेटे, कभी कभी, समाज हित में जो परिणाम अपेक्षित होता है, वह कैसे सुनिश्चित किया जाता है, उसका तरीका और उसका श्रेय किसको मिलता है, यहाँ वह गौड़ (महत्वहीन) हो जाता है। 

नुसरत अंजुम ने आज, वास्तव में. मुझसे बढ़कर सूझबूझ का परिचय दिया है...   


-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
09.04.2020

Tuesday, April 7, 2020

जिससे किया प्यार हमने
क्या उलाहना उसे देना
लाचारी कोई होगी उसकी
दुःख में साथ नहीं जो होता है  

#No_Hate_Speech



सब तो हैं इंसान यहाँ
कुछ इंसानियत तो सबमें है
मानवता न निखार सका इनमें
तो यह कमी मुझमें है

जितना हक़ देश पर हमारा
उतना ही अधिकार तुम्हारा है
कोई फिकरा ग़मगीन करे तुम्हें
तो माफ़ी चाहता दिल हमारा है

जीवन पथ ...

जीवन पथ ...


आपने, ही तो अपने बीच प्यार की शुरुआत की थी।
मैं रुआँसी हो बोल रही थी।
हमारे, द्वार गाजे बाजे और बारात ले आप ही आये थे।
मेरा शिकायती कहना जारी था। चेतन, सुन रहा था बोल कुछ न रहा था।
दो जन्मे बच्चे, आपके ही तो हैं, जिनने मुझ में आकर्षण घटाया है।
चेतन अभी भी चुप था।
मैं बोली, चुप क्यूँ हो, कहने को नहीं कुछ आपके पास?
इस बार, समझाने के स्वर में चेतन बोला।
तेरी बात मानता हूँ ना, क्या कहूँ इसमें?       
मेरी रुलाई फूट पड़ी, रोते हुए मैं बोली- तो क्यूँ, आपके पास नई नई लड़कियों के कॉल आने लगे हैं?
देख तू, गलत समझ रही है। ये ऑफिस कुलीग हैं या कॉलेज फ्रेंड हैं, मेरी!
झुँझलाहट सहित मैं बोली- पहले तो नहीं आ रहे थे ऐसे कॉल! माना ये सही है, तो फिर सामने बैठ कर ही क्यूँ नहीं बात करते, आप?
वह चुप हो गया था। शायद और झूठ कहने से बच रहा था।
यह हमारे बीच, चेतन के अवैध प्रेम संबंधों को लेकर, बात करने का पहला मौका था।
उसके, ऐसे कॉल आने के सिलसिले जारी रहे थे। और, हम दोनों में बातें, तकरार में, फिर दैनिक ही, इससे बढ़ती हुई कटुता के साथ होने लगी थीं। 
फिर आया था वह दिन, जब  चेतन ने चिढ कर, कुछ युवतियों से अपने विवाहेत्तर , संबंध होना स्वीकार लिया था।
मैं, स्वयं एक युवती हूँ, यह सुन कर मुझे, सबमें पहले तो इस बात पर रोष आया था कि
"किसी के घर तोड़ने वाले अवैध संबंध रखने पर ऐसी युवतियों को ग्लानि क्यों नहीं होती। "    
फिर, मैंने चेतन से ये अवैध संबंध, अभी ही खत्म करने के लिए, बच्चों की कसम उठाने को कहा था।
इसके जबाब में, उससे बेहद ही घटिया बात कही थी कि-
"तेरे को, मेरे इन संबंध से आपत्ति है, तो तू कर ले, कुछ ऐसे संबंध! मैं नहीं खत्म कर सकता इन्हें, समझी।"             
अब मुझे लग गया था कि चेतन, अभी जितना गुस्से में दिख रहा है, मैंने और कुछ कहा तो, मेरी और बच्चों पर शामत आ सकती है।
मुझे उस समय चुप कर लेना ही उचित लगा था।   
हमारे बीच नाराजी में, हम साथ रह तो रहे थे, मगर पत्नी-पति वाला ज्यादा कुछ नहीं रह गया था। चेतन को परवाह भी नहीं थी, उसने बाहर प्रबंध किये हुए थे।
फिर आया कोरोना संकट, जिसमें लॉक डाउन कर दिया गया। चेतन का ऑफिस जाना बंद हो गया। अवैध संबंध भी, उन युवतियों के तरफ से स्थगित कर दिए गए कि उन्हें संक्रमण न हो जाए।
चेतन घर बैठकर, चार दिनों, पहले जैसे तना रहा था।
पाँचवी रात, फिर उससे रहा नहीं गया था। जब बच्चे सो गए, तब मुझे अपने पास खींचने लगा था। मैंने उसके हाथ अपने ऊपर से हटा दिए थे। मैंने, मुहँ फुलाये रखा था।
वह चिरौरी सी करने लगा। बोला - सुन तो, तू पत्नी है मेरी। मेरे बच्चों की माँ है।
मैंने बोला, नहीं, ऐसे नहीं चलेगा। आपको पहले मेरी सुननी होगी।
बच्चों की नींद में खलल न पड़े, यह सोचकर वह, मेरे हाथ पकड़कर, मुझे ड्राइंग रूम में ले आया और बोला - चल तू बोल आज, मैं सुनुँगा।
हम सोफे पर आमने सामने आ बैठे थे।
क्या कहना है, यह सोचने के लिए, मैंने, कॉफी का बहाना किया था, बोली थी, मैं, कॉफी बना लाती हूँ, फिर कहूँगी। तब तक बैठकर, आप सोचिये।
फिर वह जब कॉफी पीने लगा, दो चुस्की कॉफी की मैंने भी ली, फिर प्रश्न किया, बोलूँ मैं?
चेतन हँसते हुए बोला, आज सब बोल दे, मैं सुनुँगा।
मैंने बोलना शुरू किया -
हममें बँधा दाँपत्य सूत्र, दोनों ही तरफ की कोशिश, से मजबूती पाता है। आपने मालूम नहीं कैसे!, अपने सँस्कार गँवा दिए। और अपनी तरफ से इस बंधन सूत्र को कमजोर करने लगे। 
मगर मुझे भली-भाँति भान रहा कि मेरे पापा ने अपनी हैसियत से बढ़कर, मेरे विवाह पर खर्च किया है, इसलिए नहीं कि मैं, इसे तोड़कर फिर उनके ऊपर अपना उत्तर दायित्व रख दूँ। 
(मैंने, उसके मुख पर दृष्टि डाली फिर थोड़ा रुककर आगे बोली) -
मैंने तय किया अपना विवाह सूत्र, कमजोर, मैं न करुँगी। अपनी बुध्दिमानी से आपको भी और कमजोर न करने दूँगी। 
मेरे बच्चे, आपके भी बच्चे हैं, इनका कोई और पापा नहीं होने दूँगी।         
मुझे, आप, यह वादा करो कि लॉक डाउन अभी और पंद्रह दिनों का है। इसमें आप अपने किये पर आत्म मंथन करोगे।
इस शर्त पर मुझे आपके बाँहों में आने में कोई ऐतराज न होगा।
चेतन बोला - चल वादा करता हूँ।
बाद में उस रात उसने कहा था - तेरा  यूँ हताश, उदास और ठंडी सी रहना, मुझे अखर गया है। 
फिर चेतन पिछले सप्ताह भर, बच्चों को स्नेह से खिलाता, मेरे साथ ज्यादा प्यार से पेश आता और अक्सर अकेले, गहन सोच में डूबा रहता।
आज 06 अप्रैल की रात हम, फिर ड्रॉइंग रूम में कॉफी पी रहे थे। आज, मैं चुप थी वह बोल रहे थे-
तू सुन, धन्य मेरा भाग्य, जो कोरोना हम पर विपदा सा आया है। मुझे यह फुरसत नहीं मिलती तो, मैं कभी यह सब, सोच नहीं पाता। अपनी निकृष्ट करनी को, कोई तर्क देता रहता और, तेरे और बच्चों के जीवन पर अनावश्यक चुनौतियों की परिस्थिति निर्मित कर देता। 
पिछले सात दिनों में, मैं, तेरा व्यवहार देखता रहता, फिर निगाह अपनी तरफ फेरा करता। तुझमें, कोई कमी नहीं दिखाई पड़ती। अपने में ऐसी काम लोलुपता दिखाई पड़ती जिससे हासिल कुछ नहीं होना था। 
मेरी शारीरिक सुख की चाह, मुझे मृगतृष्णा जैसी ही भटकाती रहती। 
एक से नहीं, फिर दूजी से नहीं और फिर अनेकों से भी नहीं, मेरी तृष्णा शाँत नहीं होती। ऐसे भटकने से हासिल कुछ होगा नहीं, मैं यह रियलाइज कर सका हूँ। 
मैं, तेरे और अपने बच्चों के साथ ही कुछ भी हासिल कर सकता हूँ, अन्यथा कुछ मिलना, सिर्फ भ्रम है हासिल होने का। 
मैं वादा करता हूँ अपने अवैध सारे रिश्ते खत्म कर लूँगा। 
अब से आजीवन, अपने जीवन पथ पर, मैं, तुझे साथ लिए चलूँगा  ....   

 -- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
07.04.2020