Monday, April 6, 2020

अपनी नफ़रत पर काबू नहीं करे वह इंसान कैसा!
मोहब्बत नहीं, नफरत गर हो तो देश बनेगा कैसा!

डैड, क्या कहते हैं आप?

डैड, क्या कहते हैं आप?

राजनेता के तौर पर मेरा कद बहुत बड़ा है। इससे, एक बड़ा वर्ग मेरा प्रशंसक है। या यूँ कहिये के मेरी शक्तिशाली होने और तंत्र पर प्रभाव होने से, मुझ से लाभ उठाने के इच्छुक लोगों का मेरे इर्द गिर्द जमावड़ा है। जिनमें पुरुष नारी और युवा बूढ़े सब हैं।
मेरे इर्द गिर्द, नित कई तरह के आयोजन होते हैं। ये कार्यालय में भी होते हैं, जहाँ मेरा, अधीनस्थ बड़ा स्टाफ होता है। मेरे ऑफिस में विज़िटर्स भी बहुत होते हैं। मैं शिरकत करता हूँ जिनमें, ऐसी रात्रि पार्टियाँ भी, बहुत होती हैं, जहाँ, औरत मर्द, जाम भी टकराते हैं।
ऐसी सब जगह, प्रकट में, सभी के साथ, मुझे मधुरता से पेश आना होता है। समय समय पर, जन प्रतिनिधि के चुनाव में, अपना चुना जाना यूँ ही सुनिश्चित होता है। नेता, मंत्री, बने रहने के लिए, सभी के मत चाहिए जो होते हैं।
अपने मन की मगर कहूँ तो, मुझे इन सब में पसंद होता है, आकर्षक युवतियों से घिरा होना।
यह मेरा मन दर्पण है, जिसमें, मुझे सब झलक जाता है। इस मन दर्पण के सामने, मैं स्वयं की करतूतें छिपाना चाहूँ तो भी छिपती नहीं हैं।
मै अपनी ख़राब करनी को यहाँ, अच्छाई के श्रृंगार की परत भी देना चाहूँ, तब भी इस दर्पण में यह कुरूपता छिपती नहीं है।
मैं यह कहूँ कि अक्सर कई युवतियों के हित में, उन्हें नियम कायदों से विलग लाभ प्रदान करवा देता हूँ। ऐसी युवतियों से इसके एवज में उनसे कुछ दिल का सुकून पा भी लेता हूँ, तो इसमें बुरा क्या है? लेकिन नहीं, यह मन दर्पण, जिसे बदला भी नहीं जा सकता, इसे मेरी खराबी जैसा, दिखा दिया करता है।
मेरा डायरी लिखने की आदत विद्यालीन समय से है। उस समय की मन निर्मलता में, मैंने, डायरी लिखते हुए, इसमें सच ही लिखने की आदत बनाई हुई थी।
सफलताओं के मद में यद्यपि, मेरे काम तो ख़राब कर दिए, मगर डायरी में सच लिखना, मैं अब भी जारी रखा करता हूँ।
सुंदर युवतियों के साथ, मेरी ओछी हरकतें भी, मैंने अपनी डायरियों में बिन लाग लपेट के, और सही लिखी हुई हैं।
मुझे इस बात का अंदाजा भी है कि इनमें से कुछ भी या एक भी डायरी, मेरे विरोधियों के हाथ लग जायें, तो मुझे कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
मुझे ज्ञात है, जिन्हें कानून में अपराध बताया गया है एवं हमारी समाज मर्यादायें धिक्कारती हैं जिन पर, मैंने ऐसे अनेक कार्य किये हैं। जिनका स्वयं मेरी हस्तलिपि में किसी को मिल जाना, मेरी स्वीकारोक्ति जैसा प्रयोग किया जा सकता है। जिससे अदालत मुझे कारावास भेज सकती है या मेरा सार्वजनिक जीवन में चरित्र हनन, सरलता से किया जा सकता है।
किसी पेशेवर तरह के अपराधी के हाथ ये डायरी या इनमें से कोई 1 ही, लग जाये तो, मुझसे ब्लैक मेलिंग का सिलसिला आरंभ हो सकता है। जिसका अंत मेरी मौत तक चल सकता है।
इन सब खतरों के बाद भी, मेरी लिखी डायरी, मैं दो कारणों से नष्ट नहीं करता हूँ।
एक कारण यह है :-
इसे पढ़कर, मुझे अपनी मर्दानगी पर नाज़ होता है। मैं गिन पाता हूँ कि कितनी युवतियों से, किस किस तरह की यौन हरकतें/करतूतें मैंने की हैं।
जिसे बेड टच निरूपित किये जाते हैं, वे काम मैंने, अपनी चालाकियों से, कैसे कैसे, इतनी सारी युवतियों के साथ किये हुए हैं।
इन्हें मैंने, कभी कार्यालय में, कभी रात्रि पार्टीज में और कभी सार्वजनिक कार्यक्रमों में, अपनी धूर्तता से और झूठी छवि बनाये रखते हुए, अंजाम दिए हैं।
डायरी में मैंने, अपनी ही लेखनी से, श्रृंगार रस के प्रयोग से बहुत ही अच्छी भाषा में, प्रत्येक किस्से लिखे हैं।
हर पृष्ठ एक कहानी हो गया है। पुरुष नज़रिये से, हर कहानी में, मधुर रस भरा है, कि कैसे? किसी युवती के साथ भीड़ से नज़र बचा के किस तरह के, बेड टच का आनंद लिया जा सकता है। अवश्य ही, हर किस्सा, नारी दृष्टिकोण से करुण एवं वीभत्स रस का उदाहरण है।
बेड टच की एक शुरुआत से, किन किन युवतियों को, कैसे कैसे, मैं अपने बिस्तर तक ले आ सका हूँ, यह कुटिलता भी देखी जा सकती है।
किन्हें, चालाकी और अपने शक्ति से, प्रभावित करते हुए, मैंने उनकी सहमति से सब किया है।
और किन के साथ मैंने, उनकी सहमति बिना, जबरदस्ती से किया है। और अपने प्रभाव से, जबरदस्ती के पहले या बाद, उनके लिए किये फेवर के माध्यम से, उनको कोई व्यवसायिक लाभ दिलाते हुए, उन्हें चुप रहने को विवश किया है।
इन डायरियों में, यह भी उल्लेख है कि कितनी युवतियों ने, मुझे पहचान कर, मेरी शुरूआती करतूतों में ही, मुझसे किनारा किया है और, कितने से मेरे संबंध कुछ महीनों / सालों चले, जिनसे ऊब कर,बाद में, मैंने ही किनारा लिया है।
मुझे तो ऐसा भी प्रतीत होता है कि मेरी ही उम्र का, कोई अति लोकप्रिय कुँवारा सिने अभिनेता भी यदि, मेरी डायरियाँ पूरी पढ़ ले तो अवसाद ग्रस्त हो सकता है कि, जितनी सुंदरियों के सहमति से, या जबरदस्ती के सुख मेरे हैं, उसके आगे, उसके तो कुछ हैं ही नहीं।
अन्य शब्दों में लिखूँ तो यह सही होगा कि, मैं यह लिखूँ कि, किसी विकृत मानसिकता के मर्द, जिसे अपने मनोरंजन के लिए, अश्लील साहित्य या कामुक वीडियो की दरकार होती है, उनसे भिन्न, ऐसी जरूरत, मेरे लिए, मेरी खुद की डायरी पूरी करती हैं।
जब कोई युवती का संग न हो और मेरी रात तन्हा हो, तब शराब की चुस्कियों बीच, मैं इनमें से किसी डायरी को, आनंद लेते हुए पढ़ लेता हूँ।
डायरी को नष्ट न करने का दूसरा कारण यह है कि:-
मेरे लिए, आत्मघाती सिध्द हो सकने वाली ये डायरियाँ, मेरे लिए, अब तक लाभकारी रही हैं। अब की, मेरी 54 की उम्र तक, मेरी दो बार शादी हुईं हैं।
पहली पत्नी का साथ, मेरा 15 सालों का रहा था।
जब मैं उससे बहुत ऊब चुका था, तब सुनियोजित तरह से एक दिन मैंने भूल का अभिनय करते हुए, उस समय तक लिखी डायरी तक, उसकी पहुँच सुलभ कराई थी।
मुझे आज भी याद है कि कैसे? मेरे से छिपते हुए, उसने दो दिनों में, सारी डायरियाँ पढ़ ली थी।
उसने, मुझसे, तीसरे दिन, बेडरूम में लड़ाई की थी। और तब, हमारी 12 साल की हुई बेटी की, फ़िक्र न करते हुए, चौथे दिन कार चलाते हुए, ब्रिज की रेलिंग तोड़, कार सहित नदी में गिर, उसने आत्महत्या कर ली थी।
आत्महत्या वाला सच, मुझे ही मालूम था जबकि, दुनिया की नज़र में, यह दुर्घटना थी।
दूसरी पत्नी से, मेरा वैवाहिक जीवन तीन वर्ष ही चला था। वह तथाकथित बेड टच से शुरू हुए, सिलसिले के बाद, मेरी पत्नी बनी थी।
उससे विवाह के तीन वर्ष के बाद, उससे ऊबने पर एक दिन मैंने, उसे भी पूर्व आजमाई तरकीब के तहत ही, सुनियोजित तौर से, अपनी डायरियाँ पढ़ने के अवसर सुलभ कराये थे।
मेरा मंतव्य इस बार भी पूरा हुआ था। अपने पति पर यौनिक तौर पर एकाधिकार अभिलाषी, जैसा किसी भारतीय पत्नी में, सहज अधिकार बोध होता है, उसी भावना के अधीन इस पत्नी ने भी, एक रात मुझसे लड़ाई की थी। और फिर, हमारे पाँच सितारा होटल में स्टे के एक दिन, पाँचवे तल से गिर कर, वह मृत पाई गई थी।
इस बार, कुछ खोजी पत्रकार, इसे दुर्घटना मानने तैयार नहीं थे। वे इसे हत्या सिध्द करने के लिए, मेरे पीछे लगे थे। कुछ के मुँह बंद कराने के लिए, किसी किसी बिचौलिए के जरिये, उन्हें खासा पैसा भी भिजवाया था, ताकि उनके मुंह को बंद रखा जा सके।
अंततः, बिना किसी राजनैतिक हानि के, मुझे, इससे भी समय के साथ, निजात मिल गई थी।
प्रभावशाली हैसियत में मेरा जीवन, यूँ ख़ुशी से बीत रहा था कि तब एक नई बात, दुनिया में उभर के, सामने आई थी।
यह थी, मी टू नाम का अभियान, जिसमें सफल लोकप्रिय और पैसे वालों के विरुध्द उनके यौन अपराध का खुलासा करते हुए, उनकी यौन रूप से शोषित की गईं, औरतें सामने आने लगीं थीं।
यह अभियान हमारे देश तक भी पहुँच गया था।
जीवन का यही वह वक़्त था, जब, मैं सबसे ज्यादा चिंताओं में रहा था। मुझ पर डर सवार हुआ कि इतनी औरतों में से कोई, या कुछ औरतें, मेरी करतूतों का भंडाफोड़ न कर दें।
मेरी खुश किस्मती रही कि ऐसी कोई महिला, मेरे विरुध्द मुँह नहीं खोल सकी थी।
मुझे इसकी वजह समझ आ रही थी कि मेरी पीड़ितायें, मेरी की हुईं मदद (फेवर) से एक समृद्ध और प्रतिष्ठा पूर्ण जीवन का आनंद ले रहीं थीं। मुझ पर आरोप लगा कर, वे स्वयं बदनाम नहीं होना चाहती रहीं होंगीं।
हमारी समाज में नारी से, ऐसे चरित्र की अपेक्षा एवं परंपरा ने मेरी लिए कोई मी टू समस्या या चुनौती खड़ी नहीं होने दी थी।
मगर मजेदार बात यह हुई थी कि मेरी दूसरी पत्नी के आत्महत्या के बाद, जिस ख्याति प्राप्त पत्रकार ने, मुझसे ब्लैक मेल किया था, मी टू की जद में वह आ गया था। उस पर, उसकी बेटी की फ्रेंड ने ही, यौन शोषण का खुलासा कर दिया था।
इससे भी मजेदार बात तो यह हुई थी, उसने मेरे पास आकर प्रार्थना की थी कि मैं अपने प्रभाव से, उसके विरुध्द मी टू मामले पर, कानूनी कार्यवाही को, शिथिल करवाने में मदद करूँ।  मैंने, उसे झूठा ढाँढस दिया था, मगर किया कुछ नहीं था। वह, आज जेल काट रहा है।
अब, समय ने करवट ली है। आज मैं अकेला हूँ। अपनी लत और औरतखोरी की रही आदत के कारण परेशान हूँ।
कोरोना संक्रमण के, पिछले दो महीनों से व्याप्त खतरों में, मैं नए किसी, बेड टच की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ।
युवतियाँ भी, सब दूर दूर, सावधानी से मिल रही हैं। मेरी ऐसी तनहाई को, दो माह हुए हैं। कोरोना ने मुझ पर, विकट मुसीबत खड़ी की है।
यहाँ, मैं इस मनःस्थिति में विचलित था। वहीं अचानक आज मेरी बेटी जो 21 वर्ष की हुई है, ने ब्रेकफास्ट पर अजीब बात की है।
वह कह रही है-
पापा, मुझे लगता है कोरोना जानलेवा संक्रमण तो है, मगर यह सदियों से एक वायरस से किसी पुरुष के इन्फेक्ट होने के खतरे के लिए मुझे, टीका (Vaccine) सा प्रतीत हो रहा है।
मैं उसकी इस बात पर, एक सवाल उठा कर फँस गया, मैंने पूछा:  निधि (मेरी बेटी का नाम) कौनसा वायरस?
वह किसी मंच पर वक्ता के जैसी, कहने लगी है कि-
पापा, वह वायरस, जिससे इन्फेक्टेड हुआ कोई पुरुष, हमारे समाज में, किसी स्त्री से बेड टच के, और उससे शारीरिक संबंध के, मंतव्य लिए घूमा करता है। 
पिछले कई दिनों से कोरोना के भय ने, ऐसे इन्फेक्टेड पुरुष को, किसी भी परिचित अपरिचित युवती से, कम से कम, तीन फ़ीट की दूरी रखने को विवश कर रखा है। 
जिससे मुझे लगता है कि हमारे समाज में, आज, नारी ज्यादा निर्भया हो रही है। 
मैं नहीं कहती कि प्राणघातक यह कोरोना वायरस, यूँ ही फैला रहे। मगर डैड, यदि यह रहता है तो कोई, सुंदर, लड़की/युवती के मन पर से, बेड टच और रेप का खतरा और भय उठ जाता है। 
फिर, किसी भी बहन या बेटी को पर्दे/बुर्के में, और सुरक्षा की दृष्टि से घर में कैद रहने के, अभिशाप से मुक्ति मिल जाती है।
फिर, आत्मप्रशंसा के भाव मुख पर लिए खिलखिलाते हुए मुझसे पूछती है -
डैड, क्या कहते हैं आप?
मुझे लग रहा है, जैसे किसी ने चोरी करते हुए, मुझे रंगे हाथ पकड़ लिया है।
एक खिसियायी मुस्कुराहट के साथ, मैं कहता हूँ- वाह निधि, क्या कहने तुम्हारे!
फिर काम की व्यस्तता का बहाना कर, जल्दी डाइनिंग टेबल छोड़ता हूँ।
मेरा दिमाग यह विचार लिए, असमंजस में है कि क्या? -
यह निधि का सहज विचार है या, इसने भी मेरी कोई डायरी पढ़ ली है ....



-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
06.04.2020

Sunday, April 5, 2020

यूँ तो चिकित्सा उपकरण कोई
दिल की धड़कन गिन लेते हैं
उनमें अच्छे ख्याल क्या बस रहे
साहित्य माध्यम से झलकते हैं

Saturday, April 4, 2020

कायरोना ...

कायरोना ...

मैंने, बचपन से ही, बाप को, जब मर्जी हो, अम्मा पर गुस्से में बरसते एवं उनकी पिटाई करते देखा था।
धारणा तभी से बन गई थी मेरी, कि पति नामक जीव को, पत्नी पर अत्याचार का वरदान है।
अम्मा को हर तीज, त्यौहार पर, पति की दीर्घ आयु के लिए व्रत, उपवास करते देखा था।
मुझे यह भी स्पष्ट हो गया था कि भले ही अधमरे होते तक पिटते रहे, मगर मरी नहीं है तो पत्नी को सुहागन ही बनी रहना है।
जैसे आज तर्क चलते हैं कि आर्थिक निर्भरता एवं कम शिक्षित होने के कारण, नारी की यह दशा होती है, मेरी अम्मा के प्रकरण में, ऐसा भी नहीं था।
मेरी अम्मा, मेरे बाप से ज्यादा पढ़ी थी। बाप चौथी और अम्मा इंटर, पास थी। बाप रिक्शा चलाकर कमाता तो, माँ, घरों में बर्तन झाड़ू पोंछा कर कमाई करती थी।
सच था कि बाप ज्यादा कमा लेता था।  मगर उसके निजी खर्चे भी ज्यादा थे। दारु, बीड़ी, तंबाकू तो थे ही, रंगीनियत भी उनका प्रिय शगल था।
साफ़ है, आर्थिक निर्भरता नहीं थी, अम्मा की बाप, पर। यह होने पर भी, छह बच्चे पैदा करना, उनके लिए खाना बनाना, उनकी देखरेख करना के साथ ही बाप नशे में घर लौटे तो पिटते हुए भी उसके पैर दबाना, उसके कर्तव्य थे।
क्यूँ न हों, आखिर परमेश्वर तो पति ही होता है ना! 
अपनी कुशाग्रता के कारण, पढाई के लिए, घर में मौजूद सर्वथा विपरीत परिस्थितियों में भी, मैंने अम्मा के बढ़ावे के कारण कक्षा बारह तक की पढ़ाई की थी, वह भी अपनी कक्षा में शीर्षक्रम के सहपाठियों में गिने जाते हुए।
तब, ग्रामीण परिवेश में जैसा होता है, अठारह वर्ष की होते ही, मेरे बाप को मेरे ब्याह की फिक्र हुई थी। मेरी योग्यता को देखते हुए, उसने मेरे लिए योग्य वर ढूँढ लिया जो मेरे बराबर ही पढ़ा लिखा था। था तो पास के ही गाँव का मगर, मजदूरी हैदराबाद में करता था।
मुझसे छह वर्ष बड़ा था। सुना था, कमाई की बचत में से खरीद ली गई, उसकी एक खोली थी।     
बाप, अम्मा को खुद की बढ़ाई जैसे बता रहे थे- 'ख़ुशी' (मेरा नाम) बड़े शहर की ज़िंदगी देखेगी!
अभी से, चार साल पहले ब्याह हुआ। शुरूआती दिनों में ही मेरी किसी ऑफिस में सहायिका की नौकरी की जिद पर, पति ने हँसिया दिखाकर धमका दिया था, काट दूँगा, मेरी आज्ञा के खिलाफ कोई काम किया तो! 
पति नामक जीव का, यह रूप बचपन से ही देखभाला था, अचरज नहीं हुआ था। उससे भयभीत, उसकी दासी बन रहने लगी थी।
तीन साल में ही दो संतान जन्म चुकी थी, तब मेरे परमेश्वर ने मुझे एक घर में रसोई एवं गृह सेविका के काम की अनुमति दे दी थी।
जीवन यूँ ही चल रहा था, परमेश्वर जब सानिध्य चाहता, बहुत प्रेम से पेश आता और जब दारु पी, किसी बाहरी बात से दुःखी हो पहुँचता, कोई बहाना ले मेरी पिटाई कर देता।     
सब बचपन से मन में बैठी मेरी धारणा अनुरूप ही चल रहा था, ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं थी।
अभी जनवरी में ही पता चला, तीसरी संतान गर्भ में आ चुकी है। फरवरी से 'मिली मेम के' घर में भैय्या जी और उनकी बातों से सुनने मिलने लगा, कोई कोरोना वायरस, महामारी बन आया है दुनिया पर!
मार्च आया तो सब तरफ चर्चा होने लगी, कोरोना भारत में भी फैलने लगा है। भैय्या जी एवं मिली मेम तो, चिंतित दिखने लगे, लेकिन हमारी बस्ती में लोग डर की हँसी उड़ा रहते थे।
फिर मालूम हुआ 22 मार्च को कामधाम / मार्किट सब बंद रहने हैं। हमें घर में ही रहना है। दो दिन बाद ही बताया गया कि 21 दिनों सब बंद रहेगा।
काम नहीं होगा तो कमाई कैसे होगी? विचार कर परमेश्वर एवं आसपास के लोग,लुगाई सब, चिंता करने लगे।
26 तारीख को परमेश्वर काम पर नहीं गए थे। मुझे भी काम पर नहीं जाने कह रहे थे। मैंने बताया था, कुछ रूपये जमा कर रखें हैं। जाकर आती हूँ, मिली मेम, से रूपये, ले आऊँगी। परमेश्वर खुश हुआ था, अनुमति दे दी थी।
मिली मेम ने हाथ धुलाये थे, मुहँ में बाँधने को मास्क दिया था। मैंने काम करना आरंभ किया था। भैय्या जी एवं मेम टीवी पर न्यूज़ सुन रहे थे। तब में पोंछा लगा रही थी। टीवी पर कोई कहते सुनाई दिया था - मजदूर और गरीबों की सरकार को कोई परवाह नहीं है। सब बंद कर उन्हें भूखा मरने छोड़ा जा रहा है। 
मजदूर और गरीब के बारे में बात आने से, मैं पोंछा लगाते हुए साथ, टीवी को देखते-सुनते जा रही थी।
लेकिन तभी, भैय्या जी ने, गुस्से में टीवी बंद कर दिया था। अभी गुस्से में दिख रहे भैय्या जी वैसे खुशमिजाज और अच्छे व्यक्ति हैं। भैय्या जी लेकिन तब मेम से कह रहे थे -
मूर्ख बनाते हैं ये सब, हर वक़्त ही, सिर्फ वोट की ही युक्ति सूझती है। कभी गरीबी के कारकों पर, जन-चेतना के ठोस प्रयास ही नहीं किये हैं। गरीबी बनाये रखने में ही, अपना हित देखा है।
मेम ने पूछा- कैसे आती, जन जागृति ? मैं, काम के साथ, दोनों कान, उनकी बातों पर रखे हुई थी।
भैय्या जी ने कहना शुरू किया था -
गरीब को, बताया जाता कि अब,पहले जैसी परिस्थितियाँ नहीं रहीं, जिसमें 10 औलाद में तीन बच पाना भी संतोष की बात होती थी।
गरीब को यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए था कि चिकित्सा विज्ञान उन्नत हुआ है। जन्मे हर बच्चे को बचा लिया जा सकेगा।
यह करते हुए, चिकित्सा सुविधा / तंत्र देश में सुलभ करते, जिससे गरीब इस बात की तसल्ली करता।
बताया जाता कि जो, ज्यादा बच्चे पाल सकते हैं। वे अमीर लोग, एक-दो पर सीमित हो गए हैं।
जबकि गरीब जिसके पास अभाव हैं, छह बच्चे करता है। इस तरह अपने पर और बच्चों पर ज्यादा अभाव लाद लेता है।
मजदूर को यह चेतना दी जाती कि नशे और जुयें पर उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। अगर यही (परिवार छोटा रहे तो) दो बच्चों पर, खर्च हो तो उनकी बेहतर शिक्षा सुनिश्चित हो सकती है।
 जिससे आगे के जीवन में उनकी संभावना बेहतर होती हैं और गरीब परिवार में जन्मा बच्चा आगे गरीब नहीं रह जाता है।
चुनाव के वक़्त कभी यह कभी वह खैरात बाँटी, लेकिन ठोस कार्यक्रम के जरिये उनको, अपनी एवं बच्चों की ज़िंदगी प्लान करने को प्रोत्साहित नहीं किया गया है। 
ये काम तो किये नहीं हैं, और गरीब/मजदूर से झूठी संवेदना दिखाते हैं। 
सत्ता पक्ष कोई अच्छी नीति भी लाये तो विरोध के स्वर मुखर कर देते हैं। पीछे कामना सिर्फ अपनी सत्ता की संभावना पुष्ट करने की होती है। 
धिक्कार है ऐसी राजनीति पर !
फिर आगे उनमें क्या बात हुई पता नहीं, मेरा उस कमरे में काम खत्म हुआ था। शाम को मेम से, मैंने अपने जोड़े पैसे लिए थे।
 ट्रेन/बस बंद कर दीं गईं थीं। अगले दिन 27 मार्च 2020 को हमारे बस्ती में भगदड़ का माहौल था। लोग अपने, बीबी, बच्चों सहित पैदल ही सुदूर अपने गाँव पहुँचने निकल रहे थे।
मेरे परमेश्वर ने भी यही किया था।
एक बच्चा उसकी गोद में, एक मेरी गोद में और एक मेरे गर्भ में लिए मुझे, चलना पड़ा था।
सामान्य व्यक्ति का भी, कुछ ही दिनों में कुछ सौ किमी चलना मुश्किल था। मुझ साढ़े चार माह की गर्भवती का, एक और बच्चे को लादे चलना तो अत्यंत ही मुश्किल था, मगर मुझे चलना था। मेरे परमेश्वर का आदेश था।
मुझे उसके हाथ में हँसिया होने का दृश्य, ऐसी हर कठिनाई के वक़्त याद आ जाता था। फिर मैं झींकते, मरते उसके आदेश पालन में जुट जाती थी।फिर छह दिन, कभी रेलपांतों पर और कभी सड़क पर चलते, जहाँ भी समाज सेवकों से खाना मिल जाता, उससे उदर पूर्ति करते हुए, ऐसे हम गाँव पहुँचे थे।
मेरे संतोष की बात यही थी कि तमाम परेशानी झेलकर भी, मैं जिंदा पहुँचने में सफल रही थी।
मेम/भैय्या जी के यहाँ, काम करते हुए, मुझे जिम्मेदार होने की प्रेरणा मिली थी।
मैंने, आस पड़ोस की औरतों को खुद ही हमसे दूर रहने की बात कही थी। हम कई जगह, भीड़ की आपाधापी में से होते हुए, आये थे। मुझे, टीवी से पता चला था ऐसे में हमारी संक्रमित होने की संभावना होती हैं।
औरतों ने, घर में अपने अपने मर्दों से, मेरी बात बताई थी। सब, हमसे खतरा जान कर, हमसे दूर रहने लगे थे।
हम ऐसे बिना बैनर लगाए, क्वारंटीन हो गए थे। 
फिर कोरोना खतरा खत्म हुआ था।
परमेश्वर को इस बीच, दारु, बीड़ी आदि नहीं मिले थे। बल्कि घर बैठे बैठे मेरी हालत और मेरी समझ बूझ को उसने अनुभव किया था। उसके व्यवहार में पहली बार मेरे प्रति कुछ सम्मान अनुभव हुआ था। 
हमने, इस औलाद के होने तक, वापिस हैदराबाद नहीं जाने का, तय किया था।
वह खेत के काम करने निकल जाता और मैं घर के कामों से निवृत्त हो आसपास की महिलाओं की मंडली इकट्ठी करती।
बड़े शहर से लौटी होने के कारण, उनको मेरी जानकारियों से, समझना अच्छा लगता था।
मेम के घर काम करते हुए, उनके सानिध्य में, मैंने जो सीखा था, उसके प्रयोग से, उनमें चेतना बड़ाई थी।
वे ज्यादा सफाई से रहने लगीं थीं। अपने बच्चों के लालन पालन में ज्यादा अच्छी हुईं थीं। नवयुवतियों ने कम बच्चे की शपथ ली थी।
फिर मेरी तीसरी संतान, बेटी का जन्म हुआ, हमने उसका नाम कायरोना रखा था...
-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
05.04.2020
              

Friday, April 3, 2020

रचना का आभार
गृह में सृजन अनुकूलता रखतीं हैं
तब जाकर मेरी रचना
सजीव साहित्य प्रेरणा बनतीं हैं

Thursday, April 2, 2020

वह मुस्कुराया था ..

वह मुस्कुराया था ..

मुझे बेहद कोफ़्त होती थी। पिछले दिनों से उसकी की जा रही, अधिकाँश पोस्ट पढ़ते हुए।
मुझे अचरज होता था कि आखिर क्यों? मैं उसे पढ़ रही हूँ, ब्लॉक क्यों नहीं कर देती उसे।
वह अपनी कौमी कुँठाओं को, बड़ी निपुणता से, अपनी अच्छाई जैसे रूप में अपनी रचनाओं में लिख, पोस्ट करता था। जिसे और कोई पहचाने या नहीं, मैं भली प्रकार समझ रही थी।
वह मेरे कौम के प्रति, मेरे मजहब के प्रति अत्यंत चतुराई से अपने दुराग्रह लिख दिया करता था। जिन्हें पढ़ कर मेरा खून खौल उठता था।
तब मुझे लगता कि ऐसे ही वह लिखता रहा और मैं उसे पढ़ते रही तो कहीं, मुझे उच्च रक्तचाप की शिकायत न हो जाए। 
मैंने एक पोस्ट पर आपत्ति लिखी कि आप अपने पूर्वाग्रहों में लिख रहे हो। उसने जबाब दिया था- आप अपने पूर्वाग्रहों में पढ़ रही हैं।
मैंने लिखा, मैं ग्रुप एडमिन को रिपोर्ट करती हूँ, उसने लिखा- आपको आपत्ति है तो, मैं स्वयं डिलीट कर देता हूँ।
फिर पोस्ट डिलीट हो गई। बड़े विचित्र तरह का था वह।
भारत सरकार, मुझे एक खून माफ़ करती तो, मैं उस खूसट बुड्ढे के 'रुग्ण भेजे, को पिस्टल से, उड़ा आती।
फिर आया कोरोना संक्रमण, कोरोना के बारे में चेतना जागृत करने (आव्हान) के नाम पर, वह, फिर चालाकी भरी पोस्ट करने लगा।
मुझे अनुभव हुआ कि वह यूँ यह बाज नहीं आएगा।
मैंने सोचा, इससे ब्लॉक के जरिये ही बचना श्रेयस्कर रहेगा। अन्यथा सच में, मैं बीपी की मरीज हो जाऊँगी। 
उस रात, मैंने ब्लॉक कर दिया था।
दो दिन ही हुए थे, मैंने सोचा मालूम नहीं, क्या, अनर्गल प्रचारित कर रहा होगा। मुझे मालूम भी तो पड़े।
मैंने दो ही दिनों में, उसे अनब्लॉक कर दिया था। 
तब देखा कि एक आयोजन को, नागरिकों के लिए और विशेष कर हमारे ही कौम पर ज्यादा खतरा बताते हुए, वह लिख चुका था।
जिसमें, अपनी मूर्खता भरी कोशिश में, हमारी कौम से अंधविश्वास त्याग, कोरोना से लड़ाई में सहयोग करने का आव्हान कर रहा था।
मैंने, यह कहते हुए आपत्ति दर्ज कराई कि आयोजन तो और भी किये गए हैं, चूक तो और जगहें भी हो रही हैं, आप उनका उल्लेख थोड़े में लिखते हैं।
क्यों नहीं? जागृति उनमें जगाते, हमारी कौम की, हम फ़िक्र कर लेंगे। हमारे इष्ट हमें बचा लेंगे। यह हमारी आस्था और विश्वास है।
उसने, कुटीलता भरा जबाब फिर दिया कि माना, समझ की कमी हमारे लोगों में भी है। मगर अपेक्षाकृत, वे ज्यादा समझदारी का परिचय दे रहे हैं। आप ही, बतायें कि मैं समझदार को क्यूँ समझाऊँ, जो कम समझ दिखा रहे हैं, अपने प्रयास उनमें जागृति में क्यूँ न लगाऊँ? आखिर, मेरे सामर्थ्य सीमित जो हैं।       
मैं झुँझलाई थी। कहा था, हमारी कौम की जागृति का ठेकेदार बनने की जरूरत नहीं है, आपको।
फिर धमकाया था, एडमिन को पोस्ट रिपोर्ट करती हूँ।
वह कायर फिर डर गया था, उसने पोस्ट खुद डिलीट कर दी थी।   
दो दिन फिर मैंने, उसे लेकर, बहुत चिंतन मनन किया था, मुझे तरकीब सूझी थी।
मैंने उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट सेंड की थी। उसने उसी पल, एक्सेप्ट कर ली थी। ऐसे कि जैसे, उसे इस बात का ही, इंतजार था।
उससे फोन नं. ले, मैंने व्हाट्सअप में उसे ऐड किया था।
उसकी अगली पोस्ट जिसमें भी कथ्य कोरोना पर ही था। और लक्ष्य हम पर भी, मैंने तरकीब के तहत, 'मैं उसके तर्क से सहमत हूँ', दिखाते हुए प्रशंसा के कमेंट दिए थे। वह खुश हो गया था।
फिर मैंने, व्हाट्सअप संदेश किया था। क्या आपसे, वीडियो कॉल पर बात हो सकती है? 
उसने शीघ्रता से ऐसे जल्दबाजी में हामी भरी थी, कि कहीं, मैं अपने ख्याल से फिर न जाऊँ!
तुरंत ही, उसने खुद से वीडियो कॉल किया था, जैसे कोई, अपनी प्रेमिका के वीडियो कॉल की, प्रतीक्षा में हो।
मैंने कॉल काट दिया था, संदेश में लिखा था- 'अभी नहीं, अभी मुझे कुछ काम हैं। 
फिर मुझे, खुद पर आश्चर्य हुआ था। मैं, अपनी डीपी में, एक सिने एक्ट्रेस की पिक लगाती रही थी। मैं असली रूप में सबके सामने नहीं आती थी।
इसलिए उसके सामने, स्वयं, कॉल पर जाने के पहले, मैंने बालों की रंगाई की थी। थ्रेडिंग, फेसिअल, जितना घर में हो सकता था, किया था।
बात करने के लहजे की रिहर्सल भी की थी। फिर, आँखों में, काजल भी लगाया था।
सब ऐसे, जैसे किसी, सिने इंटरव्यू/ऑडिशन के लिए तैयार हुईं हूँ। 
उसे, कॉल किया था।
रिप्लाई के जगह संदेश मिला था, अभी मैं, एक ऑपरेशन की तैयारी में हूँ, ऑपरेशन से निबटने के बाद संदेश करूँगा।   
तब, मुझे ज्ञात हुआ था कि वह डॉक्टर था। फिर बात होने में,दो दिन लगे थे ।
इस बीच मैंने, अपने सभी परिचित, रिश्तेदारों को, प्रधानमंत्री के किये जा रहे आव्हान अनुसार, करने को समझाया था।
इस बार भी मैंने श्रृंगार किये थे फिर कॉल किया था, वह कुछ. थका दिखाई पड़ रहा था, अव्यवस्थित सा भी। मगर जितना वह, अपनी पिक में दिखाई पड़ता था उससे कम बूढ़ा।
पहले मैंने हँस हँस के बात की थी उससे। फिर मैंने, बताया था कि दो दिनों से मैं, अपने रिश्तेदार और परिचितों को इस समय देश की जरूरत अनुसार चलने को, कॉल कर समझा रही हूँ।
उसने कहा था, मैं प्रसन्न हूँ, यह जान कर!
मैंने कहा था- अभी, ज़िंदगी बचाना ही, बुध्दिमानी है। आपसी नफरत से तो बाद में निबट लेंगे।
उसने कहा था, ज़िंदगी इस बार बच गई तो, नफरत भी जाती रहेगी। फिर,
वह मुस्कुराया था। 
मेरी आशा विपरीत, उसने कॉल खत्म करने में, जल्दबाजी दिखाई थी।
हाथ जोड़कर, अभिवादन करते हुए, कॉल खत्म कर दिया था।
दो दिनों वह, सोशल साइट एवं व्हाट्सअप पर, सक्रिय नहीं दिखाई दिया था।
आज 3 अप्रैल 2020 को, खबरों में उसे, कोरोना संक्रमित होना बताया जा रहा है। वह संक्रमितों के इलाज करते, खुद संक्रमित हो गया है। 
किसी समय मुझे, उसका खून कर देने का ख्याल आया था।
लेकिन,
आज मैं, इस "कोरोना वॉरीअर" की, ज़िंदगी के लिए दुआ कर रही हूँ  .... 
-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
03.04.2020
       
 

Wednesday, April 1, 2020

स्वप्न या दुःस्वप्न? ...

स्वप्न या दुःस्वप्न? ...



मैं, यहूदी मंदिर (सिनेगॉग) में परिचित और आदर से लिए जाना वाला नाम रखता था।
देश-विदेश में, अपने अनुयायी को देख स्वयं को, नबी, होने का अहं रखता था।
हमने पहले ही तय किये कार्यक्रम अनुसार अपने छोटे देश के प्रमुख सिनेगॉग में एक धार्मिक सभा का आयोजन किया था। तब दुनिया के अन्य देशों में, कोविड-19 के संक्रमण का पदार्पण हो चुका था। 
मेरी उच्च शिक्षित, मेरी पत्नी और आधुनिकता से प्रभावित मेरी सोलह वर्ष की बेटी ने, आयोजन करने को लेकर घर में तर्क और आपत्ति की थी। अपने अहं में चूर, मैंने उनकी नहीं मानी थी। आँखे तरेर, उन्हें जो देखा, उनकी बोलती बंद हो गई थी।
वस्तुतः इसके अतिरिक्त भी, समय काल के मद्देनज़र एवं सरकार के आव्हान अनुसार, हमसे, इसे स्थगित किया जाना अपेक्षित था। किंतु अपने अतिविश्वास का परिचय देते हुए हमने यह नहीं किया था।
दो दिनी आयोजन में, छह बाहरी धर्मगुरु सहित, देश के कुछ सैकड़ा धर्म प्रेमी ने इसमें हिस्सा लिया था।
फिर विदेशी विद्वान लौट गए थे। और देश के नागरिक, अपने अपने शहरों को लौट गए थे। 
आयोजन को मिली सफलता से मैं गर्वित था और मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था।
दुर्भाग्य, मगर मेरी ये प्रसन्नता बहुत लंबी नहीं रही थी। आयोजन के तीन दिनों बाद से मेरी पत्नी को स्वास्थ्य संबंधी तकलीफें होने लगीं थीं। 
पहले मैंने उसे अनदेखा किया था। लेकिन तीन और दिन बीते थे कि, पत्नी की स्थिति गंभीर हुई थी। मुझे और मेरी बेटी को भी, कुछ तकलीफें आने लगीं थीं।
मैं उनसे निगाहें नहीं मिला पा रहा था।
तब एक और बड़ी भूल मैंने की थी। मैं, पत्नी को अस्पताल नहीं ले गया था। सातवें दिन, बेहद कष्ट में रहते हुए, मेरी प्रिय पत्नी ने दुनिया से विदा ले ली थी।
अपने अपराध बोध में और अपने कष्टों को भी छुपाते हुए, मैंने, उन्हें कब्रगाह में, दफनाया था।
सरकार की रोक की उपेक्षा करते हुए। मेरे नाम के प्रभाव में, सुपुर्दे खाक के समय, लगभग 40 लोगों ने भाग लिया था। 
दसवें दिन, जब मेरी बेटी और मेरी हालत इतनी बिगड़ी कि हम एक दूसरे की सेवा सुश्रुषा कर सकने की हालत में भी नहीं रहे थे। तब बेटी के सामने शर्मिंदगी से, मैंने, अस्पताल में भर्ती होने का प्रस्ताव किया था।
बेटी ने शहर के स्वास्थ्य विभाग में कॉल कर, लक्षण की वस्तुस्थिति सूचित की थी। उन्होंने अवगत कराया था कि यह लक्षण सारे, कोरोना संक्रमण के हैं।
हमें तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया था।
फिर आगे के बीस दिन में, एक बात मेरे संतोष की रही थी। मेरी प्यारी बेटी, कोरोना नेगेटिव हो गई थी।
मुझे अश्रुपूरित आँखों से, देखते और सिसकते हुए, वह अस्पताल से डिस्चार्ज हो घर लौट गई थी। 
मेरी हालत फिर और बिगड़ी थी। आज 2 अप्रैल 2020 को, मैंने अंतिम स्वाँस ली थी।
फिर ग्लानि बोध के कारण, मेरी आत्मा मुक्ति को नहीं पा सकी थी। वह पिशाच बन गई थी।
पिशाच रूप में, मैंने देखा था, उस आयोजन में शिरकत करने वालों के माध्यम से, लगभग डेढ़ महीने में ही, देश में संक्रमण, चौथे चरण में पहुँचा था। 
जनवरी 2021 के आते आते, मेरे छोटे से देश में, जिसकी कुल आबादी 29 लाख थी, में से सिर्फ साढ़े तीन लाख लोग जीवित बचे थे। 
तब विश्व पर से कोरोना संक्रमण खत्म कर लिया गया था। मेरा नाम जो पहले ख्यातिलब्ध था बदनाम हो चुका था। मेरे अनुयायी भी मेरा नाम लेकर थूकने लगे थे।
लेकिन, ईश्वर इतना निष्ठुर नहीं कि, किसी को, सारी ही खुशियों से वंचित से कर दे।
साढ़े तीन लाख सर्वाइव (जीवित रह गए) लोगों में, मेरी बेटी भी बची थी। संक्रमण से लड़ने में जिसने, जी जान लगा दी थी। अंध-विश्वास के विरुद्ध जिसने, जन चेतना फैलाई थी।
17 साल की आयु में ही वह, देश को, आगामी समय में नेतृत्व दे सकने की दिशा में अग्रसर होने लगी थी।
राष्ट्र नायक तो वह, होते ही जा रही थी। साथ ही तभी, कोरोना संक्रमण उन्मूलन में, उसके बलिदान एवं योगदान देखते हुए, उसे, 2021 का नोबल पुरूस्कार मिल रहा था।
तब मेरी नींद खुल गई थी। गला मेरा शुष्क अनुभव हुआ था। साइड टेबल पर गिलास को जग से, भरते हुए मैंने साथ ही सो रही पत्नी  सुंदर शांत मुखड़े को निहारते हुए अपना गला तर किया था।
मेरी पत्नी और सोलह वर्ष की बेटी होना ही, सपने में एकमात्र सत्य था। बाकि मेरा यहूदी एवं ऐसे किसी छोटे देश का नागरिक होना, सब सपने की बात थी।
अपने अध्ययन के अनुसार मुझे, यह भी ज्ञात है कि यहूदी धर्म और उसके अनुयायी बेहद अनुशासित लोग हैं। जिनमें अपने धार्मिक विश्वासों जितना ही आदर अपने राष्ट्र के प्रति होता है। यह विश्व की अनुकरण की जा सकने वाली कौमों में से एक है। जो विज्ञान की प्रमाणित बातों को अपनी मान्यताओं एवं जीवन में अंगीकार करती जाती है।
अब चाय की चुस्कियाँ लेते हुए, अपनी पत्नी और बिटिया को, मैं, अपने इस सपने के बारे में बता रहा हूँ, उन्होंने, इसे बहुत आनंद लेते हुए, सुना है।
फिर, मैंने उनसे पूछा है कि मुझे, इसे क्या मानना चाहिए
स्वप्न या दुःस्वप्न? ...
-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
02.04.2020