Tuesday, March 24, 2020

उसने कहा था (2) ..

उसने कहा था (2) ..

जहाँ मैंने जन्म लिया था, जहाँ वैभव एवं विलासिता से भरपूर जीवन का मुझे वरदान मिला लगता था, जहाँ मेरे अपने और उनका प्यार मिला था, उस माटी को हमेशा के लिए मैंने अलविदा कह दिया था।
जहाज में खतरनाक यात्रा पर निकलते हुए मुझे आगे क्या होगा उसका कोई भय नहीं सता रहा था। मेरे आँखों के समक्ष मेरे आइलैंड का समृध्दि वैभवपूर्ण, आधुनिक और उन्नततम, संपूर्ण परिदृश्य घूम रहा था, जिसमें पूरे सुविधा-साधन, यथावत विध्यमान थे, मगर जिनके उपभोगों का आनंद लेने कोई मनुष्य उपलब्ध नहीं थे।
आगे का समय अत्यंत नाटकीय रहा था। पहला दिन बिना ज्यादा यत्न के समुद्र में अकेले बीत गया था। रात अँधेरे में भी जहाज अनजान दिशा में बढ़ता जा रहा था। मैं जागते-सोते हुए, जहाज चालन जारी रखे हुई थी।
शायद तब मैं निद्रा अधीन थी कि एकाएक, एक तीव्र शोर के साथ जहाज तीव्रता से डाँवाडोल होने लगा था। मेरी नींद खुल गई थी। दिमाग सक्रिय हुआ था। लगता था कि मेरा जहाज, किसी विशाल ब्लू व्हेल मछली से टकरा गया था।
जहाज एक तरफ झुकने लगा था। शायद उसमें पानी भर रहा था। आनन फानन ही मैंने लाइफ जैकेट पहनी थी। कुछ खाने की सामग्री और पेट्रोल कैन एक लाइफ बोट में डाली थी और मैंने जहाज को छोड़ दिया था।
कुछ देर आगे तो मैं जल राशि से जूझती रही थी। फिर थकान से चूर, अचेत हो गई थी। मेरी चेतना जब लौटी तो मैंने स्वयं को, किसी जहाज के केबिन में बेड पर लेटे पाया था। आसपास कोई दिखाई नहीं पड़ा था। मैंने उठने की कोशिश की थी लेकिन कमजोरीवश मेरा दिमाग चकराया था और मैं बिस्तर पर वापिस गिर गई थी।
कोई घंटे भर बाद, यूनिफार्म में सुसज्जित, एक युवती आई थी। उसे देख मुझे प्रसन्नता हुई थी कि धरती पर मेरी आशंका के विपरीत मेरे अतिरिक्त भी मानव अस्तित्व बरकरार है।
उसने मुझे पीने को फ्रूट जूस दिया था। खुद के, परिचय में बताया था कि जिसमें इस समय हम सवार हैं, वह इस भारतीय समुद्री जहाज की कैप्टन है। उसने यह भी बताया कि उन्होंने, कल रात अपने जहाज के पास ही, मेरी बोट जिस पर मैं अचेत पड़ी थी, देखी थी। और उन्होंने, मुझे बचाया (Rescue किया) था।
मै, पिछले 16 घंटे से अचेत रही थी। उनका जहाज, भारत लौट रहा है और जहाज अभी मुंबई पोर्ट से 9000 से अधिक नॉटिकल माइल्स की दूरी पर है। जहाज को मुंबई पहुँचने में 35 दिन लगने हैं।
मेरा बच जाना एक चमत्कार जैसा था। और मेरे लिए, सुखद आश्चर्य यह था कि अपने आइलैंड पर मौत के ताँडव के साक्षात्कार से, मेरे मनुष्य अस्तित्व मिट जाने की आशंका निर्मूल सिध्द हुई थी।
मैंने आगे के दिनों में, कैप्टन से, अपने आइलैंड की विभीषिका और अपनी मानसिक दशा शेयर की थी। कैप्टन बहुत प्यारी थी, उसने जहाज पर ही मेरा इन्फेक्टेड होने की संभावना का परीक्षण करवाया था। जो नेगेटिव आया था।
उसके व्यवहार और आत्मीयता से मैं उस पर मोहित हुई थी। मुझे अनुभव हुआ था कि ये भारतीय अत्यंत अच्छे इंसान होते हैं।
कोविड-19 के भारत सहित विश्व के ताजा अपडेट, वह मुझसे शेयर करती रही थी। जहाज पर आने के दिन, भारत में कोविड-19, प्रथम चरण में था। लेकिन हमारा जहाज, जब मुंबई पोर्ट पहुँचा था, तब मार्च की 23 तारीख थी और इन्फेक्शन यहाँ तृतीय और खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुका था।
कैप्टन ने ही गृह मंत्रालय से मेरे संबंधित विवरण देते हुए, भारत में मेरे प्रवेश दिलाने की औपचरिकतायें पूरी करते हुए मुझे अनुमति दिलाई थी। यहाँ सरकार की, मेरे जैसे अभागे शरणार्थी के प्रति उदारता ने, मुझे बेहद प्रभावित किया था।
मैंने अपने शैक्षणिक पाठ्यक्रम में भारतीय भव्य संस्कृति के विषय में पढ़ा था। जिसका साक्षात दर्शन, मुझे अब हो रहा था।
आज, 24 मार्च 2020 है। मुझे बताया गया है कि देश में कोरोना वायरस से निपटने के लिए कई प्रतिबंध लगाए गए हैं। संक्रमण चैन भंग करने के लिए कई सेवायें और कामकाज स्थगित किये गए हैं। देश में जागृति और सहयोग के लिए, नागरिकों से विभिन्न तरह के आव्हान और सहयोग की अपील की जा रही हैं। 

मुझे भी इसी प्रयोजन से, अभी एक टीवी न्यूज़ चैनल के कार्यालय में लाया गया है। उद्घोषिका मुझे अपने साथ बीती सारी स्थिति दर्शकों को बताने को कहती है।
उसके कहे अनुरूप मैं, उसने कहा था, के पिछले भाग में वर्णित सारी आप बीती बयान कर चुकी हूँ तथा अंत में मेरे रक्षक देश के प्रति अनुग्रह बोध में एक मार्मिक अपील करते हुए, मैं कह रही हूँ -
मेरे रक्षक और शरणदाता, भारत देश के मेरे समस्त प्यारे नागरिक, ज्यादा दिन नहीं हुए, आज से लगभग दो महीने पूर्व तक, मेरी नस्ल, मेरे मजहब, मेरी अमीरी, मेरी खूबसूरती, मेरी आधुनिकता, अन्य पर हासिल हमारी अग्रणी उन्नति और मेरी मातृभाषा, ऐसे कई अभिमान और भेद की परतें, मेरे दिमाग पर चढ़ी हुईं थीं। लेकिन जिस विभीषिका ने, हमारे आइलैंड पर से मानव जीवन का नाश कर दिया उसकी साक्षी होने पर मेरी दिमाग पर चढ़ीं समस्त ये परतें खुल गईं हैं। 

एक समय मुझे जब यह संशय हुआ कि धरती पर कदाचित मैं ही अकेली मनुष्य तो नहीं रह गईं, तब मेरी सर्वप्रथम फ़िक्र, धरती पर मनुष्य प्रजाति को, लुप्त होने से कैसा बचाये जाए, यह रही है। मुझे ख़ुशी है कि भारत की विशाल जनसँख्या अब तक सुरक्षित है। मेरी कामना है कि यह आबादी इस महान भूमि पर कायम रहे। मेरी अपील है कि मुझ भुक्तभोगी की, इस कारुणिक स्थिति से, आप सभी सबक लें तथा अपने दिमाग से सारे भेदभाव मिटा कर, कोविड-19 को हमारे आइलैंड की तरह विकरालता पर पहुँचने से रोक लें। 

भोग विलास लोलुपता को कुछ दिन टालें। मेल मिलाप, भ्रमण कुछ दिनों तक स्थगित रखें। इमरजेंसी के अतिरिक्त घरों से बाहर नहीं निकलें। स्वच्छता, बार बार हाथ मुहं साबुन/हैंड वाश से धोना आदि आदत बनायें। हैंडल, दरवाजे आदि बार बार स्टरलाइज करें एवं मुहँ पर बाँधे जा रहे नकाब/कपड़ों को जल्दी जल्दी धो-सुखा कर प्रयोग करें।  

अन्य सावधानियों में, भारत में प्राचीन समय से उपयोग की जा रही आयर्वेदिक जड़ी-बूटियों एवं औषधीय गुण वाले पेड़-पौधों की पत्तियों और उनकी छालों आदि का सेवन भी करें। भले ही, कोरोना संक्रमण पर इनके कारगर होने के प्रामाणिक लाभ, अभी नहीं बताये गए हैं, मगर इनके लाभकारी रहने की पूरी संभावना है। पूरे आइलैंड में अकेले जीवित बच पाने वाली, मैंने भी वहाँ एक वृक्ष से रिसते तरल का सेवन, व्दीप के संक्रमण के चपेट में आने के दिनों में किया है। अभी समय आपके हाथ में है। इसे हमारे व्दीप जैसी लापरवाही से नहीं बिता दीजिये। अन्यथा हाथ से यह समय निकल सकता है और फिर मेरे जैसे, अपने सभी को खोकर, यही हाथ मलते रह जाने की, पीड़ादायी विवशता हम पर आ सकती है।  फिर में हाथ जोड़ कर कहती हूँ 'नमस्ते भारत' साथ ही अपने खूबसूरत ओंठों पर मनमोहक मुस्कान बिखेरती हूँ। उद्घोषिका ने बाद में, मेरा धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बताया है कि उनके इस कार्यक्रम की दर्शक सँख्या 7.4 करोड़ से ज्यादा रही है।
उसने आशा जताई है कि मेरा टीवी पर दिखाया और मेरी आपबीती का बताया जाना, भीषण आशंकाओं को रोक पाने की दृष्टि से, ज्यादा कारगर होगा।
उद्घोषिका ने यह भी बताया है कि इस तरह की अपीलें, यूँ तो बहुत लोग कर रहे हैं मगर, उन सब के प्रति हमारे लोगों के पूर्वाग्रह हैं, जिससे उसमें विरोध और कमियाँ देखने की सहज प्रवृत्ति के कारण, लाभकारी सलाह और निर्देशों का पालन भी कई वर्ग नहीं कर रहे हैं।
लेकिन आपके प्रति हमारे लोगों में कोई पूर्वाग्रह और विरोध नहीं होने से आपके बताये अनुभव का लाभ हमारा समाज अवश्य लेगा।
मुझे उद्घोषिका से यह सब सुनना संतोष प्रदान कर रहा है।
मुझे अपने पर के अनुग्रह, के अनुरूप, अपने आचरण से, अपने दुःख कम होते लग रहे हैं।
मेरे मन में, यह आशा उत्पन्न हो रही है कि शायद 24 मई 2020, वह दिन होगा, जब भारत यह घोषणा करेगा कि नागरिकों के परस्पर सहयोगी और मानवीय आचरण होने से अत्यंत कम सँख्या में जनहानि के बाद हमने कोविड-19 का घातक हो सकने वाला संक्रमण अपने भारत देश से खदेड़ दिया है  .... 

 -- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
24.03.2020

Monday, March 23, 2020

अनेकों से हो मगर
इश्क गर रूहानी रहे
तो भी चरित्र पर हमारे आता कोई दोष नहीं
कि रूहों का होता कोई जेंडर नहीं

उसने कहा था ..

उसने कहा था ..
तीन दिन पूर्व, उसने कहा था-
आज सिर्फ हम दोनों ही बचे दिखाई पढ़ रहे हैं। मानवजाति के अस्तित्व के दृष्टि से मैं, तुमसे संबंध बनाकर, तुम्हारे द्वारा बच्चे जन्मने का उपयोग लेता, मगर मैं, संक्रमित हूँ तथा मुझमें शक्ति भी शेष नहीं है।
अपरिचित उस युवक की, इस बेशर्मी का, मैं सुनते हुए, बुरा नहीं मान रही थी। अपितु मानव जाति के जीवनचक्र को स्थापित रखने की उसकी चिंता से प्रभावित हो रही थी।
वह आगे कह रहा था- अगर मैं मर जाता हूँ, तो  इस व्दीप (Island) में, कोई पुरुष नहीं बचेगा। अतः इस प्रलयकारी परिस्थिति में भी, जीवन चक्र सुनिश्चित करने के लिए, तुम, किसी प्रकार से जीवित निकलने की कोशिश करना। पूरी दुनिया में जहाँ भी कोई पुरुष मिले, तुम उसकी मदद से बच्चे जन्मना। यह तुम्हारा सृष्टि के प्रति दायित्व है।
उस दिन पस्त हो, फिर वह खामोश रह गया था। और आज, क्रमशः उसकी हालत में बिगाड़ बढ़ते जाने के बाद, वह मर गया है।
कुछ दिन पूर्व-
'जहाँ सर्व तरफ बसती थी खुशियाँ
आज वहाँ भयावह वीरानगी बस रही थी
समय ने मेरी ज़िंदगी में दिखाये थे जलवे
वे सब अब सिर्फ यादगार रहे थे '
मैं रो रही थी, मुझे चुप कराने वाला कोई नहीं था। थक कर मैं, स्वयं चुप हुई थी। बहुत से घर थे, जिनमें भोज्य सामग्री भरी पड़ी थीं। अब जिसमें, खाने वाला कोई नहीं था। उनमें से एक, सामने के एक घर में घुस, मैंने ड्राई फ्रूट्स खा कर शक्ति बटोरी थी। 
जहाँ तहाँ मरे लोगों के शव, जिनसे सड़ांध आ रही थी, जो बेचारे धार्मिक रीति से कफ़न-दफन को भी वंचित रह गए थे पर, फिर मैंने ध्यान दिया था। उनके शवों को कैसे ख़ाक किया जाए मैंने सोचा था।
सूने पड़े एक पेट्रोल पंप से, मैंने कई कैन में, पेट्रोल डाल, एक वैन में रखा था। और उसे चलाते हुए सब तरफ घूमा था। जहाँ भी, जिस भी घर-बाहर , मुझे मनुष्य शव मिलता, उसे घसीट घर से बाहर ला कर, मैं उस पर पेट्रोल उलेड़ती और तीली जला उसे, अग्नि के हवाले करती रही थी।
पूरे आइलैंड में, जो लगभग 600 वर्ग किमी में फैला था, मैंने अगले दो दिनों यही काम किया था। कहीं से भी भोज्य पदार्थ ग्रहण करती रही थी। सोती, फिर जागती और कैनों में पेट्रोल इकठ्ठा करती, और शवों का दहन करती रही थी। 
मुझे इस बात की परवाह नहीं रह गई थी कि विधि पूर्वक, अंतिम क्रिया न करने का, कितना पाप मेरे सिर लगेगा।
मैं उन्नीस वर्ष की लड़की थी। लगभग पचास वर्ष पूर्व, मेरे परदादा ने इस व्दीप पर आकर अपने नाते-रिश्तेदारों को आमंत्रित कर यहाँ बसाया था। खनिज संसाधनों की यहाँ  प्रचुरता होने से यहाँ वैभव, समृध्दि और विकास ने डेरा डाला था।
इस पर दुनिया की उच्चतम और बेहद आधुनिक किस्म के महल, मॉल सड़क, हवाई अड्डा आदि, सभी कुछ बनाये गए थे। यहाँ की अत्यंत भोग-उपभोग प्रधान जीवन शैली ने, दुनिया के रईस लोगों को आकर्षित किया था।
तीन माह पूर्व तक यहाँ का निवासी होना दुनिया में स्टेटस सिंबल था। और आज इस व्दीप के प्रति, बाकि दुनिया की वितृष्णा हमने देखी थी। इस स्तर पर, इस तेजी से, भाग्य को दुर्भाग्य में बदलते, संसार में शायद ही कहीं देखा गया था।
कोविड-19 के पहले, यहाँ की जनसँख्या 2721 हुई थी। कोविड-19 के फैलाव और उस पर यहाँ के भोगी प्रवृत्ति के लोगों की लापरवाही ने तीन माहों में पूरी तस्वीर बदल दी थी।
हमारे कुछ लोग, जो लगभग अढ़ाई महीने पहले हवाई जहाजों से, आइलैंड लौटे थे, उनमें स्वस्थ दिखते हुए भी, इंफेक्शन हमारे यहाँ पहुँच गया था। जिसका हमें आरंभ में आभास नहीं हुआ था। 
टीवी - इंटरनेट के जरिये दिखाये जा रहे, महामारी के अंदेशे को अनदेखा करते हुए यहाँ, हमने जश्न और पार्टी में सामूहिक भाग लेना जारी रखा था। परिणाम यह हुआ था कि मेरे अलावा शेष 2720 नागरिकों, जिनमें मेरे माता-पिता और 3 भाई बहन भी थे, ने दम तोड़ दिया था।
आरंभ में लोगों को कफ़न दफन मिलता रहा था, लेकिन पिछले दिनों मारे गए 2 सौ से अधिक लोग इससे भी वंचित रहे थे।
सारे शवों के दहन की धुन में, नितांत अकेलेपन में भी, मेरे दो दिन व्यस्तता में बीत गए थे। उपरांत अब, मुझे तन्हाई की भयावहता डराने लगी थी।
विश्व के शेष हिस्से में, यहाँ के संक्रमण की भयावहता, ज्ञात होने पर यहाँ तक की विमान सेवा भी रद्द कर दी गईं थीं। यहाँ सभी के मारे जाने से टीवी प्रसारण, इंटरनेट एवं मोबाइल आदि की सुविधा देने वाले नहीं बच पाने से, बाहरी दुनिया से कोई संपर्क और समाचार, बच नहीं रह गया था।
मुझे ध्यान आया था कि मैं, अपनी सुंदरता, सुरीली आवाज में गायन से आत्ममुग्ध रहती थी। औरों द्वारा की जाती, अपनी कुशाग्र बुध्दि की प्रशंसा पर, अभिमान किया करती थी।
अब मुझे अनुभव हुआ था कि अपनी विशिष्ठताओं पर, अनुमोदना और प्रशंसा करने को जब कोई और न हो तो, रूप, सुरीला स्वर और बुध्दमानी स्वतः महत्वहीन रह जाती है।
पार्क, गेम्स, आरामदेह घर-बिस्तर, खाने पीने की तरह तरह की सामग्रियों से भरे मॉल एवं एक से एक परिधानों की उपलब्धता में भी, मेरा मन नहीं लग रहा था।
मुझे खेद हुआ कि क्योंकर मैंने, उस जँगली वृक्ष से रिसते तरल का सेवन, संक्रमण फैलने वाले दिनों से करना शुरू किया था। क्यूँ , मेरे कहने के बाद भी, मेरे परिजन ने मेरे आइडिये की उपेक्षा की थी।
कदाचित उस तरल का सेवन मुझे संक्रमण से बचा पाया था। अगर मैं उसका सेवन नहीं करती तो शायद मैं भी, अब तक मारी जाती। और इस विडंबना से बचती, जिसमें मेरे आँसू पोंछ देने वाला कोई नहीं था और ढाँढस देने को कोई आता नहीं था। 
यहाँ की स्थिति देखते हुए मुझे यूँ लग रहा था कि कोविड-19 ने यूँ ही मौत का ताँडव शेष विश्व पर भी मचाया होगा।
तभी मेरे नकारात्मक विचारों की तंद्रा, उस युवक के सकारात्मक शब्दों के स्मरण ने, भंग की थी। जो उसने कहा था, वह मुझे याद आया था।
इससे मुझे एक तरह की, मानसिक शक्ति मिली थी। मैंने तय किया कि दुनिया के जिस भी हिस्से में, कुछ भी पुरुष-नारी मिलते हों, वहाँ की खोज पर मुझे, निकलना चाहिए ताकि, इस धरती पर मानव जाति के विलुप्ति के खतरे से लड़ने में, मैं अपना योगदान दे सकूँ।
इस हेतु 'मुझे कुछ अदद पुरुष-नारी की जरूरत थी। फिर वे चाहे कोई भी भाषाभाषी हों। चाहे, किसी मनुष्य नस्ल के हों। चाहे, किसी धर्म के मानने वाले हों। उनका खानपान, चाहे जैसा हो। उनकी शक्ल सूरत, चाहे कुरूप ही हों। इन बातों का अब, मेरी नज़र में, कोई महत्व नहीं रह गया था। ' 
अब मुझे किसी पुरुष से संबंध की तीव्र उत्कंठा थी। यह उत्कंठा, नेट-सिनेमा आदि और हमारे जोड़ों में प्रचारित, सुख से प्रेरित नहीं थी। वरन, औलाद जन्मने की चाह से प्रेरित थी। जो बकौल उस युवक - मानव जाति के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए आवश्यक थी।
मैं, नेवल इंजीनियरिंग की विद्यार्थी रही थी। मानव जाति के अस्तित्व रक्षा के संकल्प ने मुझे, व्दीप तट पर लावारिस खड़े जहाज में, अपनी संभावना के दर्शन कराये थे।
तब मैंने, वैन और कैन की सहायता से जहाज में फ्यूल , भोज्य , मेडिसिन , कपड़े आदि दैनिक जरूरत की सामग्री लादी थी, और अपने जहाज चालन की अल्प शिक्षा का प्रयोग कर, अपने प्रयोजन की पूर्ति की खोज में, जहाज को समुद्र में उतार, अनदेखी मंजिल की ओर मैं बढ़ चली थी। 
जहाज ने किसी तरह चलना शुरू कर दिया था। 
मेरे दिमाग में तब यह विचार कौंध रहा था कि-
कैसे! 'एक वायरस ने अपना कहर बरपा कर, मानव सभ्यता के विकास के क्रम में मानव मस्तिष्क पर चढ़ा दीं गईं, सारी परतों को नष्ट कर दिया था। 
मैं, धर्म, नस्ल, जाति, भाषा, देश, रूप, धन, पढ़े लिखे और अन्य अनेकों भेद का, इस समय कोई महत्व अनुभव नहीं कर रही थी। 
मेरा लक्ष्य सिर्फ इस हेतु, अपना जीवन बचाये रखना था, कि इसके होने पर ही, संतान पैदा करने में योगदान देकर, मनुष्य जीवन चक्र को बरकरार रख सकने में, मैं सफल हो सकती थी। मेरा जहाज मेरे संकल्प प्राप्ति की दिशा में विशाल जलराशि पर तन्हा बढ़ता जा रहा था। 
मुझे मेरा जीवन नारी रूप मिला था, जो ही, अपने ममता, करुणा और दया बोध से मनुष्य संतति के बारे में एक माँ जैसा विचार और आचरण कर सकती थी। 
इस समय, मैं स्वयं आगे आने वाली मनुष्य जाति की, धरती माता जैसी माँ, कहलाने का गौरव अर्जित करने की तीव्रतम अभिलाषी थी।  
कालांतर में यह पता चलने वाला था कि मैं अपने प्रयोजन में सफल होती हूँ भी या नहीं ...       
-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
23.03.2020

Saturday, March 21, 2020

आवरण - चमगादड़!

आवरण - चमगादड़!

(कपोल कल्पित नकारात्मक कहानी, सकारात्मक संदेश ग्रहण किये जाने की अपेक्षा से रचित)

चमगादड़ हमारे भोज्य में नया नहीं था। दीर्घकाल से हम इसका सेवन कर रहे थे। चमगादड़, प्रचारित किये गए कोरोना वायरस का जनक नहीं था।
अपने विध्वंसकारी लक्ष्य में हमारी लापरवाही को हमने चमगादड़ का आवरण देकर प्रचारित कर दिया था।
दरअसल हमारे शासक साम्राज्य विस्तार (Imperialism) लोलुप रहे हैं। जो विश्व में अपने साम्राज्य विस्तार की हसरत के लिए अपनी सेना की मारक क्षमता किसी भी अन्य देश से ज्यादा रखना चाहते रहे हैं। इसी श्रृखंला में सैन्य  ताकत में अन्य परंपरागत हथियारों के साथ वे जैविक हथियार जोड़ कर अपनी सेना को दुश्मनों पर भारी करना चाहते रहे हैं।
मैं जैविक हथियार पर काम करने वाली अति गोपनीय टीम का प्रमुख वैज्ञानिक हूँ। आज से छह माह पूर्व मुझे ऐसे वायरस पर काम करने का आदेश मिला था जिसका टीका (Vaccine) और उपचार खोजे जाने के पूर्व ही जिसे फैला कर दुश्मन देश में उसे सर्वव्यापी महामारी (Pandemic) में उलझाया जा सके।
हालाँकि मैं, व्यक्तिगत रूप से साम्राज्यवादी (Imperialism) विचारधारा से सहमत नहीं था। किंतु अन्य नस्ल एवं कौम से एक तरह की नफरत होने से मुझे, हमारी नस्ल और कौम (Racial & Sectarian Discrimination) का वर्चस्व अन्य पर देखना मुझे पसंद था।
आदेशाधीन और व्यक्तिगत रूप से अन्य नस्ल के प्रति अपनी नफरत के वशीभूत मैंने, तब से अपनी आठ वैज्ञानिक की गुप्त (Secret) टीम एवं पचास अन्य सहायकों को लेकर इस पर काम करना शुरू किया था।
हमारा अन्वेषण इतना गोपनीय रखा गया था कि सहायकों को भी उद्देश्य का पता नहीं था। वे यह जानते थे कि हमारी टीम गंभीर रोगों के टीका और दवायें आविष्कृत करती है।
सर्वव्यापी महामारी (Pandemic) के लिए वायरस के प्रयोग/परीक्षण के लिए, हमें सरकार ने ऐसा कैदी उपलब्ध कराया था, जिसे फाँसी दी जाने वाली थी।
हमने उसे जानबूझकर बहुत सी  गंभीर बीमारियों के लिए जिम्मेदार वायरसों से एक साथ संक्रमित (Infected) कराया था। फिर परीक्षण के जरिये उसके शरीर में ऐसे वायरस को देखा था जिसकी पूर्व में कोई पहचान नहीं (Unidentified) की जा सकी थी।
इस नए वायरस को मैंने कोरोना (Coronavirus) नाम दिया था और संरक्षित कर उसके टीका पर खोज आरंभ की थी। मगर वह कैदी कोरोना संक्रमित होने पर चार ही दिन में मर गया था।
मुझसे और सरकार से तब एक मूर्खता हुई थी। कैद में मर जाना बताकर, उसके मृत शरीर को उसके परिजन को सौंपा गया था। जिसके कारण उसके दफन क्रिया में शामिल परिजन और अन्य कोरोना संक्रमित हुए थे और दो दिनों में ही गुणात्मकता (Exponentially) से इसका शहर में संक्रमण व्यापक हो गया था।
अब हम पर उसके औषधि और टीका शीघ्र खोजने का बेहद मानसिक दबाव हो गया था। अन्यथा अन्य के विनाश के प्रयोजन से लाया वायरस खुद हमारी नस्ल के लिए घातक साबित होने वाला था
हमें इस रिसर्च के लिए तीन अन्य कैदी उपलब्ध कराये गए। हमने हमारे लैब में संरक्षित कोरोना वायरस से इन्हें संक्रमित किया था एवं अपने प्रयोग आरंभ किये थे।
इस बीच एक सप्ताह के भीतर ही शहर में महामारी फ़ैल गई थी। हजार से अधिक हमारे लोग इस बीच मारे गए थे। और कई हजार अन्य संक्रमित हो गए थे। अस्पताल और कब्रिस्तान पर एकाएक बढ़ा दबाव क्षमता से अधिक था। चिकित्सा पेशे से जुड़े लोग स्वयं घातक दायरे में खुद अपने जीवन के लिए संघर्ष को बाध्य हो गए थे। इधर हमारे प्रयोग के लिए उपलब्ध कैदियों पर संक्रमण के प्रभाव और विभिन्न औषधियों के प्रयोग का हम दिन रात अध्ययन कर रहे थे। संक्रमण के लक्षण एक कैदी में दो दिन में, दूसरे में आठ दिन में एवं तीसरे पर चौदह दिन में दिखाई देने शुरू हुए थे। 
पहले कैदी ने दसवें दिन ही निमोनिया से दम तोड़ दिया था। चौदह दिन में दूसरे की हालत गंभीर हुई थी। लगने लगा था यह भी दो-तीन दिनों में ही दम तोड़ देगा। हमारे प्रयोग, उपचार ढूँढ ही नहीं पा रहे थे। सत्रहवें दिन दूसरा कैदी भी मौत से हार गया था। तीसरे पर कम घातक प्रभाव का कारण उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) ज्यादा होना लग रहा था। सत्रहवें दिन इतना ही नहीं हुआ था अपितु हमारे दुर्भाग्य से, स्वयं मुझ पर एवं हमारी टीम के कुछ सदस्य/सहायकों पर भी संक्रमण के लक्षण (Symptom) दिखाई पढ़ने लगे थे। हमारे द्वारा बरती जा रहीं सावधानी नाकाफी सिध्द हुई थी।
इस वायरस की इस भयावहता का पूर्वानुमान हमें नहीं हुआ था। मूर्खता यह भी की थी कि भयावहता से निपटने (Crisis management) की पूर्व तैयारी (आपदा प्रबंधन) भी नहीं की थी।
मानवता के दायित्वों अधीन हमारे अनुसंधान प्राकृतिक प्रकोप से बचाव को लेकर किये जाने चाहिए थे। इसके विपरीत हमने मानव निर्मित प्रकोप उत्पन्न करने चाहे थे। कहते हैं विनाश काल में बुध्दि विपरीत हो जाती है। इस विपरीत बुध्दि का परिचय देते हुए हमने आत्मघाती भूलें कीं। अपनी खोजों में लगे रहते हुए हमें स्वयं को अन्य स्वस्थ लोगों से पृथक करना चाहिए था ( (Isolate /Quarantine) रखना था, हमने वह सावधानी नहीं की थी
मैं संक्रमित होना मालूम पड़ जाने पर भी घर आता जाता रहा था। मुझे पत्नी से दूरी रखने का विचार आया था कि संक्रमण उस तक नहीं पहुँचे। लेकिन फिर मुझ पर निपट स्वार्थ हावी हुआ था।
मैंने सोचा अगर मैं मर गया तो मेरे लिए क्या पत्नी क्या बच्चे! मेरी इस स्वार्थ (Selfishness) प्रवृत्ति एवं कामवासना के वशीभूत मैंने, पत्नी से एक रात में ही तीन बार संबंध का सिलसिला बनाया था। यह तीन रात ही चला था कि मेरे पर वायरस प्रकोप अत्यंत बढ़ गया था।  चौथी रात मुझमें शक्ति नहीं बची थी। घर में मेरे बेटे एवं मेरी पत्नी पर भी संक्रमण के लक्षण दिखाई पढ़ने लगा था।
कदाचित हम स्वस्थ होते तो अपने अनुसंधान में सफल होकर कोरोना के टीके एवं इलाज खोजने में सफल होते मगर हम गंभीर अवस्था में पहुँचते हुए अपनी दिमागी और शारीरिक सक्रियता खोते जा रहे थे।
पिछले दिन मेरे टीम में मेरे मित्र से चर्चा हुई थी। हम दोनों ने ही माना था कि शायद हमारा स्वयं इस वायरस के घातक प्रभाव से बचना (Survival) मुश्किल है।
उसने यह भी बताया था कि
 'जब वह खुद ही मारा जा रहा है तो क्यूँ ना वह संक्रमण जिन्हें पसंद नहीं करता उन तक फ़ैला कर उनका भी मरना तय करे!' अपनी हैवानी हिंसकता एवं इस कुत्सित विचार से वह जानबूझकर, पिछली रात उस संप्रदाय के धर्म स्थान और उनके मोहल्ले गया था। ताकि रोग का विस्तार उन्हें घेरे में ले और ज्यादातर वे लोग संक्रमित हो कर अपने परिवार मित्रों तक यह संक्रमण फैलायें।
मेरे अंदर की नफरत और हैवानियत ने, तब अपनी गंभीर हालत में भी, इसे सुन कर कुटीलता की मुस्कान, मेरे ओंठों पर लाई थी।
कल ही हमने अपने लोगों के बचाव के लिए संक्रमण से बचाव के लिए 'क्या करें और क्या नहीं' (Do's and Don'ts) प्रसारित करवाई थी।
न्यूज़ चैनेल से हमें पता चला था कि
'मुनाफ़ा लालच में लोगों ने मास्क तथा हैंड वाश (Mask & Sanitizers) की कालाबाज़ारी शुरू कर दी थी। हमारी तरह, उन बेवकूफों की बुध्दि भी नष्ट हो गई थी। 'क्या कर लेंगे पैसों का अगर मर जाएंगे तो', यह वे समझ नहीं रहे थे। आज मैं मर जाने वाला हूँ मृत्यु शय्या (Death bed) पर अंतिम क्षणों में मेरी मानवता ने सिर उठाया है। वह मुझे धिक्कार रही है - लेकिन अब पश्चाताप से लाभ कुछ नहीं है।
मुझे अंतिम विचार यह आया है कि,
हिंसात्मक प्रवृत्ति, साम्राज्यवाद, नस्लवाद, नफरत, स्वार्थ, धन लोलुपता, कामान्धता आदि का हम पर हावी होना, कोरोना वायरस के वाहक बनेंगे जो मानव प्रजाति (Human species) के विनाश के लिए उत्तरदायी होगा। शायद हमारी मानव उन्नत जीवन शैली यहाँ मिट जायेगी। क्या भगवान ने धरती पर कोई देवदूत भेजा है, जो इस भीषण आशंका (ShatteringThreat) को पलट सके?
फिर, मैंने अंतिम श्वाँस भरी है ... 

-- राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
22.03.2020


Wednesday, March 18, 2020

मेरे वज़ूद को जानने की गर जुस्तजू
तो खुद को पहले पहचान लीजिये
आसां होगा फिर समझना मुझको
कि जो तुममें वही सब मुझमें भी है

Tuesday, March 17, 2020

नफरत के इतिहास पृष्ठ उलट उलट न पढ़िये
नफरत की नई इबारतें न तुम बनिये
सबके सुखमय जीवन अभिलाषी यहाँ की कौमें
सीख जीव दया, जीने दें इन्हें व प्रेम से खुद रहिये

Thursday, March 12, 2020

यूँ तो
लिखा गर पढ़ा ना जाये लिखना व्यर्थ होता है
मगर तू लिख कि
अच्छाई के लिए लिखने का यत्न, रत्न तुल्य होता है