Tuesday, December 10, 2019

सीन रिक्रिएशन - फिर उदित हुआ एक काला सूरज ...

सीन रिक्रिएशन - फिर उदित हुआ एक काला सूरज ...

गुलाबी रंग का सलवार सूट पहनी उस लड़की को मैंने स्कूटी खड़ी कर कैब में जाते देखा था। उसके आकर्षक अंगो और सुंदर मुखड़े ने मुझे आवेशित कर दिया था। तुरंत ही मेरा मस्तिष्क उसे भोगने की युक्ति करने में सक्रिय हो गया था। तय था कि स्कूटी लेने वह वापिस आएगी। मैंने आसपास लोगों की नज़रें बचा उस स्कूटी के पहिये की हवा निकाल दी थी। सजी-धजी सुंदर और धनवान लड़कियों को भोगने को इक्छुक मेरे कुछ और साथी थे, जिनसे शीघ्रता से चर्चा कर मैंने एक घृणित योजना तय की थी।
आशा अनुरूप वह शाम को स्कूटी लेने पहुँची है। स्कूटी में हवा नहीं देख वह परेशान सी दिख रही है। तब गऊ की सिधाई अपने मुखड़े पर ओढ़ मैंने उसके समक्ष मददगार होना दिखलाया है। उसके पास विकल्प नहीं होने से, उसने मेरे झाँसे में आ हवा भरवाने के लिए मेरी मदद स्वीकार की है। अब मैं स्कूटी धकेलने लगा  हूं वह मेरे साथ चलने लगी  है।
लगभग पचास कदम पर अब मेरा दूसरा साथी भी आ गया है मुझसे उसका बात करता देख लड़की और ज्यादा परेशान दिख रही है। उसने कदम कुछ धीमे किए हैं लगता है वह अब मोबाइल पर किसी से बात कर रही है।
यह हमारे लिए शुभ संकेत नहीं है। हम अब ट्रक तक शीघ्र पहुंचना चाहते हैं। हमने कदम तेज किए हैं। भयभीत सी वह लाचारीवश हमारे पीछे साथ चल रही है। लगभग 300 मीटर पर अब हम अपने ट्रक तक पहुंच गए हैं। हमें ट्रक के साइड में पहुंचता देख, हमारे दो और साथी ट्रक के दोनों गेट से उतरे हैं। अब मैंने स्कूटी सड़क के किनारे झाड़ियों तरफ धकेल दी है। मेरे बाकी के तीन साथियों ने लड़की से मोबाइल छुड़ा लिया है। उसके मुंह पर हाथ रख हम सबने उसे उठाकर ट्रक धकेल कर बैठा दिया है। हम सभी अब ट्रक में बैठे हैं। मैं अब ट्रक चला रहा हूं। हम पूर्व निर्धारित स्थान जो कि यहां से लगभग 25 किलोमीटर दूर है, पहुंचना चाहते हैं। लड़की प्रतिरोध कर रही है चिल्लाने की कोशिश में है। यह समझ उसके ही दुपट्टे से हमने उसका मुहँ बाँध दिया है। वह मदद के लिए व्याकुल दिख रही है। हम पर काम वासना आवेश सवार है। हम चारों के घर में किसी की बहन है, किसी की बेटी है किसी की पत्नी है। किसी की यदि नहीं भी है तो माँ तो सभी की है। कामान्धता से दुष्प्रेरित हमारे हृदय में उनके साथ कोई ऐसा करे तो कैसा होगा, न तो यह विचार आ रहा है, ना ही इस लड़की को भोगने के अतिरिक्त कुछ दिखाई दे रहा है।
मेरे अतिरिक्त मेरे 3 साथियों ने उसके हाथ पाँव दबा रखे हैं। मैंने ट्रक की गति बढ़ाई है। अब लगभग 20 मिनट में मैंने पुल तक का रास्ता तय कर लिया है। यहाँ सुनसान और सिर्फ रात का अंधेरा है। हम आसानी से लड़की को उठाकर नीचे पिलर के किनारे आ गए हैं। जहाँ हमने लड़की के ही कपड़ों से उसके हाथ-पाँव बांध दिए हैं। मुंह पर से कपड़ा हटा उसकी नाक बंद कर हम जबरन अपने साथ लाइ हुई शराब के घूँट घूँट उसके गले में उतार रहे हैं ताकि नशे के प्रभाव में उसका प्रतिरोध कम हो जाये और वह हमें सहयोग करने लगे।
लेकिन अपेक्षित असर नहीं हो रहा है। वह लगातार रो रही है, हमें भैय्या भईया बोल छोड़ देने को गिड़गिड़ा रही है। हमें उसका भैया कहना बिलकुल भी नहीं भा रहा है। आजकल कौन है भला जो किसी पराई सुंदर युवती से भैय्या/चाचा आदि संबोधन पसंद करता है! उसने रो रो कर अपना सुंदर मुखड़े का आकर्षण खत्म कर लिया है। लेकिन हमारे भीतर समाये अमानुष के लिए मुखड़े का आकर्षण या उसकी कोई याचना के महत्व नहीं रह गया है। हमने उसके मुहँ में कपड़ा ठूस दिया है, ताकि उसके रोने चिल्लाने की उसकी आवाज सुन, कोई आकर हमारा प्लान चौपट ना कर दे।
अगले छह घंटे तक हम सभी ने अपनी मनमानी की है। इसके बाद वह लड़की अचेतन जमीन पर पड़ी है। शराब का नशा हमारा काफूर हो चुका है। हम बहुत थक चुके हैं। सामान्य रातों में इतने थकने के बाद हमें गहरी नींद आ जाती है। लेकिन आज हमने जो किया है उससे डर कर हमारी नींद उड़ गई है। घृणित काम करके हमें अपनी हुई भीषण गलती का अहसास हो गया है। हम समझ चुके हैं हमारे कृत्य उजागर होते ही हमारे परिवार का, सारे पुरुषों का और हमारे राष्ट्र का सिर बाकि विश्व, मानवता और संपूर्ण नारी जाति के समक्ष लज्जा से झुक जाने वाला है।
यह करने के बाद होना यह चाहिए था कि हम सब पेट्रोल स्नान कर खुद को अग्नि के समक्ष कर दें। लेकिन जो हम इतने मनुष्य होते तो यह करते ही नहीं। हमें अपने हैवान को आवरण देकर फिर मनुष्य दिखना है। हममें नैतिक साहस भी नहीं कि हम इस घृणित कार्य की सजा के लिए जलने की पीड़ा भोगें और अपनी इहलीला अपनी कम उम्र में ही खत्म कर लें।
हमने इन सबका एकमात्र उपाय जानकर बेसुध पड़ी लड़की को पेट्रोल स्नान कराया है और उस पर तीली डाल उसे आग के हवाले कर दिया है। जलने की पीड़ा से बेसुध इस लड़की में ना जाने कहाँ से शक्ति आ गई है वह उठ खड़ी हुई है बचने के उपाय में इधर उधर दौड़ लगा रही है। हम उसकी वेदना के साक्षी होकर स्वयं को धिक्कार तो रहे हैं। किंतु तब भी हमारा जो जीवन जीने योग्य नहीं बचा है, उसे जीने का लालच नहीं छोड़ पा रहे हैं।
लो अब वह लड़की धराशाई हो गई है। हमें इत्मीनान हो गया कि वह मर गई है।
अब हम चारों को अपने बचाव के लिए खुद को सामान्य दिखाई देना है। हम पर अँगुली उठाते अन्य सबूतों को नष्ट करना है। इसकी मंत्रणा करके हमने निर्णय ले लिए हैं और उस पर काम करने के लिए हम घटना स्थल से पलायन कर रहे हैं।
अब प्रातः की पौ फटने को है। देश की धरती पर आज फिर एक काला सूरज उदित होने को व्यग्र है ...

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
11.12.2019


Monday, December 9, 2019

मेरी क्षमा याचना ...

मेरी क्षमा याचना ... 

पहला कारण:  अपनी अभिव्यक्ति प्रतिभा का परिचय देने के लिए मैंने अप्रिय होते भी पिछले दिन, अपनी कल्पना शीलता से उस एक बेटी की आपबीती लिखी जो गैर जिम्मेदार कापुरुष में हावी हो जाने वाली चरम वासना का शिकार हुई। फिर जिन्होंने अपने में छुपे डरपोक कापुरुष से दुष्प्रेरित होकर, अपने घिनौने अपराध का दंड भुगतने की कल्पना में, नैतिक साहस नहीं होने के कारण उसे मार डाला। मेरी क्षमा याचना भयावह रूप से अकाल मारी गई उस मृतक बेटी से (तथा उनके परिवार जनों से).
दूसरा कारण : विवेक बोध आ जाने के बाद, इस समाज और इस राष्ट्र में चालीस से अधिक वर्ष जीवन यापन करते हुए भी, मैं आदर्श और प्रेरणा रख सकने में असफल रहा। हमारे बाद आई पीढ़ी को, अगर मैं आदर्श और प्रेरणा के सच्चे उदाहरण दे सकने में समर्थ होता तो निश्चित ही आज कोई कापुरुष न होता। हमारे समाज में  हर कोई, किसी बेटी के साथ ऐसी भयावही, वीभत्स, घिनौनी और नृशंसता करने से हतोत्साहित होता। मेरी क्षमा याचना हमारी नई पीढ़ी से कि मैं अपने दायित्वों का सही निर्वहन न कर सका।
तीसरा कारण : नित दुराचार की शिकार उपरांत मारी जाती बहन बेटियों के प्रति संवेदना अनुभव होने से, मेरी लेखनी से, ऐसी आपबीती की रचना हुई जिसे "अनुपम  हिन्दी साहित्य" समूह के एडमिन्स द्वारा जबकि यह समूह के विव्दजनों के ह्रदय को क्षोभ एवं करुणा से उव्देलित कर रही थी, मानवीय संवेदना के आधार पर उपयुक्त नहीं मानते हुए इसे विलोपित कर दिया गया। अनजाने में वह कोण मेरी निगाह में नहीं आ सका, अतः  सभी एडमिन से क्षमा याचना।
चौथा कारण : सभी पाठकों से भी, जिन जिन को मेरा सृजन, पढ़े जाने योग्य नहीं लगा, उनसे भी मेरी करबध्द क्षमा याचना।
अंत में मेरा संक्षिप्त स्पष्टीकरण- आपबीती की रचना के पीछे मेरा उद्देश्य नारी गरिमा को क्षति पहुँचाने का कतई नहीं था। लिपिबध्द करते हुए पूरी सतर्कता से अश्लीलता को पुष्ट करने वाले शब्दों से भी मैं बचा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य हर पुरुष के हृदय तक "नवयुवा उस बेटी के मनोभाव पहुँचाने के थे जो अपने परिवार और अपने सपनों के लिए आगे पड़ा जीवन जीने की जिज्ञासु होते हुए भी जघन्यता का शिकार हो अपमानित भी होती है और अकाल मार दी जाती है"। इसे रचते हुए मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि एक बार इसे पढ़ लेने वाला कोई व्यक्ति अपने जीवन में कभी ऐसा निंदनीय/घृणित काम नहीं करेगा। 

मैं अपने सामाजिक दायित्व बोध को देर से सही लेकिन अब पहचान पा रहा हूँ। इसलिए मैंने अपनी हर रचना प्रकाशित करते हुए अपने नाम के साथ अपनी माँ एवं (स्मृतिशेष) पापा का नाम लिखना आरंभ किया है। दोनों ही ये नाम आज मेरा धर्म है।  जो मुझसे कहते हैं - "हम तुम्हारे जन्म के निमित्त अवश्य हुए मगर अपना जीवन तुम्हें जग कल्याण में योगदान करते हुए स्वयं सार्थक करना है " ..  

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
10.12.2019

Sunday, December 8, 2019

सीन रीकन्स्ट्रक्शन

सीन रीकन्स्ट्रक्शन-
उफ़, कितनी घिनौनी होती है ये पुरुष नग्नता ....


मैं दिन भर के काम से संतुष्ट भी थी और थकान अनुभव कर घर लौटने की जल्दी में भी थी। स्कूटी के पास पहुँची तो अगले पहिये में हवा न थी। दुःखी इधर उधर देख ही रही थी, तभी दो युवक मेरी तरफ आये थे। मैं तय नहीं कर पा रही थी कि इनसे सहायता लूँ या नहीं। तब इन दोनों ने जबरन सहायता का उपक्रम दिखाते हुए मेरी स्कूटी एक तरफ ले जाना शुरू कर दी थी। 
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी हालत में डरी हुई तो थी पर मूर्खता में, इस समय स्वयं से ज्यादा स्कूटी की परवाह करते हुए उनके पीछे चल रही थी। थोड़ा गेप बना, मैंने मोबाइल पर बहन को भी घटना की सूचना दी थी। 
आगे थोड़ा निर्जन स्थान था, जहाँ एक ट्रक खड़ा था। स्कूटी के पीछे चलते हुए मै जैसे ही वहाँ पहुँची थी, तभी ट्रक से दो और लोग कूदे थे और मै सम्हलती इसके पहले ही मेरे मुहँ पर ताकत से हाथ रख उन्होंने मुझे बलात उठा कर ट्रक में सवार कर दिया था। पहले ही साथ आ रहे दोनों युवक भी स्कूटी को झाड़ियों में धकेल ट्रक में आ बैठे थे। 
मैं उनके चँगुल में छटपटा रही थी। खुद को छोड़ देने और घर लौटने देने के लिए गिड़गिड़ा रही थी। विलाप कर रही थी। उन चारों की आँखों में मुझे जो दिखा था उसमें मुझे बचपन में पढ़ी कहानियों वाले दुष्ट राक्षस का साक्षात्कार मिला था। 
ट्रक चल पड़ा था। मुझे अब अंदेशा हो चुका था कि इनके चँगुल में, मैं शायद ही जीवित बचूँगी या बच भी गई तो जो बचेगा वह जीवन रहने योग्य न बचेगा। 
ट्रक चलने के साथ उनकी जबरदस्ती बढ़ गई थी। जो मेरे आत्म सम्मान को बुरी कदर आहत कर रही थी। अब मेरे हाथ पैर, मेरी ही ओढ़नी से बाँध दिए गए थे। चारों दुष्ट यूँ तो कद काठी और ऊपरी तौर पर मेरे आस पास रहने वाले सामान्य से युवकों जैसे ही थे, मगर मेरे वस्त्रों के भीतर मेरे अंदरूनी अंगों तक पहुँचते उनके हाथों का स्पर्श यूँ चुभता और जलाता हुआ अनुभव हो रहा था जैसे कि मुझ पर एसिड सा कोई पदार्थ उड़ेला जा रहा हो। विरोध की कोशिशों में मैं निढाल सी पड़ रही थी। तब उनने बोतलें खोल लीं थीं।
 मेरी आँखों में आँसू झर रहे थे। मेरी रूह तक रो रही थी, मगर इन वहशियों की आँखों में घिनौनी वासना के डोरे और मुख पर डरावने अट्टहास विजयी होने का भाव दर्शित थे। खुद शराब पीते हुए वे मेरे मुहँ को जबरदस्ती खोल मेरी नाक बंद कर बोतल से शराब उड़ेल रहे थे। जिसके घूँट कुछ, मेरे न चाहते हुए गले में उतर रहे थे सप्रयास उन्हें मैं बुलक देने की कोशिश कर रही थी। 
इन सबमें मुझे लग रहा था, मेरा मुखड़ा, रुलाई आँखों से निकलते अश्रु, नाक से निकल आई गंदगी, मुहँ से निकलती लार आदि से भयानक हो गया होगा। साथ ही भय से पेशाब और शायद मल भी मेरे वस्त्रों में निकल आये थे। इतनी सब गंदगी में अगर कोई और होते तो उनके वासना का खुमार उतर जाता।  ये इंसान होते तो शायद इस करुणाजनक मेरी हालत से इन्हें अपनी ही माँ/बहन/पत्नी/बेटी किसी का ख्याल आ जाता, लेकिन नहीं, ये इंसान नहीं थे। 
ना जाने कैसे इन्हें किसी नारी की कोख में स्थान मिल गया था। शायद दैत्य भी कोई इतना निर्दयी नहीं होता। अब एक जगह ट्रक रुक गया था। अँधेरे में कहीं ला, इन्होंने मुझे पटका था। फिर चीरफाड़ के, मेरे तन से सारे वस्त्र अलग कर दिए गए थे, और फिर शुरू किया था इन्होंने मेरे ऊपर चढ़ने उतरने का सिलसिला। 
कठोर भूमि पर पड़ा मेरा शरीर इनकी यातनाओं और जबरदस्त नोंच खसोट से लहूलुहान हो रहा था। मुझे इनकी हरकतों से यह विचार आया था कि "उफ़ ,कितनी घिनौनी होती है ये पुरुष नग्नता"।  
अर्धचेतन होने के पूर्व तो शायद सभी 10 बार मुझ पर से चढ़े उतरे थे। फिर मेरी चेतना लुप्त हो गई थी। न जाने कितनी और बार इन्होंने मेरे साथ अमानवीय घिनौने कृत्य किये थे। स्मरण नहीं कितनी देर बाद मेरी चेतना लौटी थी। 
तब मैंने इन्हें आपस में कहते सुना था, 'इसे जीवित छोड़ना अब ठीक नहीं'। फिर, एक को निगरानी के लिए छोड़ बाकि कहीं गए थे। मेरे शरीर की हालत तीव्र वेदनादाई थी। मुझे अहसास हो गया था मेरा कुछ वक्त ही और बचा है। "अब मैं अपने माँ - पापा और बहन के बारे में सोच रही थी। मेरा जिनसे प्यार भरा साथ अब, हमेशा के लिए छूट जाने वाला था। 
मुझे शिकायत हो रही थी कि क्या, यूँ मेरे अपमानित हो, मर जाने के लिए ये सारी उम्र त्याग कर मुझे पाल रहे थे। अपने लिए नहीं जी कर, बेचारे ये मेरे जीवन ख़ुशी के लिए चिंताओं में डूबे रहते थे। मुझे थोड़ा थोड़ा बड़ा करते करते ये नित दिन बूढ़े होते गये थे। इसके बाद भी अगर मेरी खुशहाली देखते, निश्चित ही ये अपने त्याग भूल, अपनी बिना ज्यादा हासिल के बिता दी ज़िंदगी से शिकायत नहीं रखते उसमें ही खुश होते।"
 
अब, आज मैं न बचूँगी
मेरे साथ हुए के विचार से 
बाकि पूरा जीवन 
ये सिहरते रहेंगे

मेरे जीवन में न, जिया जीवन अपने लिए 
मेरे मरने के बाद बाकि बचा कैसे ये जियेंगे 
हे ईश्वर तू होता है हमारा रखवाला कैसा?
ऐसे मरने के लिए हमें क्यों देता है जीवन 

ओ मेरी माँ, ओ मेरे पापा, ओ मेरी बहना
न कह सकूँगी अंत में जो है मुझे कहना
माफ़ कर देना इन्हें ये बेटे हैं किसी माई के
इन्हें पैदा करने में नहीं दोष उस माई के 

मर के मैं देखूँगी
कैसे दिखाते कालिख पुते चेहरे अपने
जिन्हें कहते ये दुष्ट 
माँ, बहन, बेटी, पत्नी, भाई औ पिता अपने 

लो, अब बाकि तीन लौट आये हैं। अब सबने मुझ पर कोई तरल पदार्थ उड़ेला है। गंध से जो पेट्रोल मालूम पड़ता है। एकबारगी में जिंदा जलाये जाने की कल्पना से काँप उठती हूँ। लेकिन सारी रात मेरा शरीर और मेरी रूह इनके कृत्यों से जिस प्रकार जलाई गई है। उसने मुझे यूँ जलाये जाने पर होने वाली वेदना को सहन करने की ताकत दे दी है। इन्होंने रात भर जो किया वह जरूर जघन्य अपराध था। लेकिन अब ये जो करने वाले हैं मुझ पर एहसान है। 
भला कौन! भारतीय नारी होगी जो इस घिनौनी हरकत को झेल जीना चाहेगी?
मेरा जो होना था हो चुका है। मैं इन्हें कोई अभिशाप नहीं दूँगी। मैं चाहूँगी कि जिन माँ बहनों के हाथों तिलक, रक्षा सूत्र ये बँधाते हैं, उनकी रक्षा के लिए ये जीवित रहें। 
क्यूँकि, अगर किसी के माँ जाये होने पर, ऐसा ये किसी की बेटी के साथ कर सकते हैं तो और भी ऐसे कई माँ जाये होंगे "जो इनकी भी माँ-बहन और बेटी के साथ ऐसे घिनौने कृत्यों को उत्सुक होंगे"। इनके ना होने पर उन्हें ऐसा मौका सरलता से मिल सकता है। मैं अंत में यह चाहती हूँ, "जो मेरे साथ इन्होंने किया - इनकी माँ,बहन,पत्नी बेटी के साथ कोई न करे"।  
लो अब माचिस की 1 जलती तीली इन्होनें मुझ पर फेंकी है। आह कितनी तीव्र जलन मुझे होने लगी है। गला रुँधा हुआ है मेरा, चीख तुम तक ना पहुँचेगी, इससे कोई "ये न समझना कि अस्मिता यूँ नोचे जाने और जिंदा जलाये जाने से मुझे पीड़ा नहीं हुई थी"। 
मेरी अंतिम इक्छा "ओ, प्रिय मेरे देशवासियों - मेरी अधजली लाश पूरी न जलाना, इसे नुमाइश के लिए रखना, ताकि देख सकें लोग - "कोई सुंदर बेटी, अपनी लाज लुट जाने और जिन्दा जला दिये जाने के बाद कैसी वीभत्स रूप को प्राप्त है" और "कैसे जिसमें संस्कारहीन पुरुषों की करतूतों की तस्वीर प्रतिबिंबित होती है"। "मेरी इस हालत को देख ज़माना ऐसा न करने की सीख अगर ले लेगा। मैं संतोष कर ना लूँगी की मेरा मरना  व्यर्थ नहीं गया।" 
ओह्ह जिंदा जलने की वेदना कल्पना से बहुत अधिक दर्दनाक असहनीय है। अब मेरा हृदय खाक हुआ है - अलविदा, दिशा  .....


--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
08.12.2019



Thursday, December 5, 2019

नहीं सोचता कि
है एनकाउंटर - अन्याय या न्याय
रेप हत्या मगर
है निश्चित - एक बेटी पर अन्याय

हो सकते हैं हर किसी के नज़रिये - अपने अपने अनेक
मगर
बहन बेटी के लिए नज़रिये - निश्चित रखना होगा नेक

Wednesday, December 4, 2019

बेटी नहीं, अब बेटे के जन्म देने के पहले सोचना होगा ...

बेटी नहीं, अब बेटे के जन्म देने के पहले सोचना होगा ... 

इस दौर का नारी जीवन सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण है। खुले दरवाजे के बाहर आधुनिक सँस्कृति में उसके लिए खुल गए अनेक अवसर हैं मगर हमारे समाज में नारी के प्रति पुरातन संकीर्ण दृष्टिकोण की व्यापकता में दिमाग के बंद दरवाजे उसके अवसर के लिए बढ़ते पाँवों में बेड़ियाँ डाल दे रहे हैं।
इन परस्थितियों में मानसिक व्दंद में जीतीं अनेक नारी, जब तब बलात्कार और चतुराई से रचे पुरुष फरेब में उनकी हवस का शिकार होकर, जीवन से हाथ धो रही है या जीवित भी है तो मानसिक रूप से अधमरी जीवन जीने को विवश है।
ऐसे में धन्य वे माँ-बाप जो न सिर्फ कन्या (बेटी) के अभिभावक होने का साहस रखते हैं अपितु पुत्र नहीं फिर भी देश के प्रति दायित्व बोध प्रदर्शित करते हुए, छोटे और उन्नतिशील परिवार का उदाहरण बनते हैं।
हर पुरुष किसी परिवार में बेटा और/या भाई है। हमारे समाज में वह जिस तरह नारी से छल, दुराचार और उनकी हत्या तक कर दे रहा है, उसे विचरते हुए  लेखक को लगता है वह समय आ गया है कि -


"बेटी नहीं, अब बेटे के जन्म देने के पहले सोचना होगा 

अपनी मनुष्य काया में मानवता को शरण देना होगा"


यूँ तो देश में हर तरफ कन्या भ्रूण, जन्मी बेटियाँ बहाने बहाने और दहेज बलि शिकार मारी जा रही हैं लेकिन हरियाणा की बात करें तो यहाँ जनसँख्या अनुपात चिंताजनक हो गया है। 1000 पुरुषों के बीच नारी सँख्या 831 रह गई है। 

"कि ऐसे नहीं चल सकेगी यह सृष्टि 

बदलनी होगी नारी प्रति अपनी दृष्टि

पुत्र जन्म के पहले हमें बारम्बार सोचना होगा 

गर जन्मा उसे नारी रक्षा सँस्कार में देना होगा"



नित हिंसा और दुराचार यूँ तो हमारे हृदय को हिला देते हैं।  हम बार बार करुणा और क्षोभ के सागर में गोता लगाते हैं। तब भी ऐसे सुविधाजनक विचार से कि "अपनी बुध्दिमत्ता से हम सीधे इसकी चपेट में नहीं आये हैं".  हमें ऐसी आत्ममुग्धता का त्याग करना चाहिए। यह विचार गंभीरता से करना चाहिए कि जब संपूर्ण राष्ट्र दुराचार/अत्याचार छल और हिंसा के साये में है तो इस राष्ट्र के नागरिक हम कैसे स्वयं को इसके दायरे से बाहर समझने की भूल कर रहे हैं।
एक बार फिर हमारे अंतर्मन में संकल्प आना चाहिए और अपनी सुविधा लालसा तज जीर्णशीर्ण हुई समाज संरचना को अपने दृढ इक्छाशक्ति के साथ पुनः बुलंदी पर स्थापित करने में योगदान देना चाहिए।


"पुनः अपनी भव्य सँस्कृति स्मरण करनी होगी 

रघुकुल रीत स्थापित करने कुरीतें तजनी होगी

फिर सीता रक्षार्थ दृढ हिम्मत संजोनी होगी

बुरे नर का वध कर हमें लंका जीतनी होगी"


--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
05.12.2019
  

Tuesday, December 3, 2019

आदर्श और राजेश .... (सन 2144 की कहानी)

आदर्श और राजेश .... (सन 2144 की कहानी)


दो मित्रों की यह कहानी
समय कहता आज अपनी जुबानी 


पिछली सदी में सुनो मित्रों
आदर्श और राजेश मित्र हुआ करते थे
आदर्श के गुणगान हमेशा
राजेश को उसकी नकल प्रेरित करते थे


राजेश की भरपूर कोशिशें भी मगर
आदर्श जैसा उसे न बना पाती थी
राजेश इसलिए उदास हो जाता
उसकी उदासी आदर्श से न छिप पाती थी 


मित्र को प्रसन्न रखने के लिए
आदर्श उसे समझाता था
राजेश कभी समझ खुश होता
कभी मगर व्याकुल ही रह जाता था 


व्याकुल राजेश से एक दिन
आदर्श गंभीर हो बोले
क्यों रहते तुम यूँ उदास
जब तुम इतने सच्चे और भोले 


मेरी नकल जो करते हो
कम ही ऐसा और करते हैं
मुझमें जो गुण निहित हैं
महापुरुषों के मिले अच्छाई अंश हैं 


मेरा अणु अणु अच्छाई से निर्मित
मनुष्य में ऐसा नहीं संभव है
जहाँ हो तुम यथार्थ राजेश
पूर्ण स्वरूप मेरा कल्पना है


मनुष्य हो तुम राजेश,

अपने में व्यर्थ सारी मुझसी अच्छाई परखते

मेरी संगत से आई अच्छाइयों को
ऐसे तुम क्यूँ अनदेखा करते 


देखो आज मैं मरणासन्न पड़ा हूँ
मगर नहीं तुम मेरा साथ छोड़ते
करते लोग नमस्कार उदय होते सूरज को
मगर तुम मुझ अस्ताचल चले को थामते 

इस जग में अब वह समय आएगा
कल्पना में भी आदर्श न रह जाएगा
मैं तो आज ही मर रहा राजेश 
जब मरोगे

तुम ही कल्पना रह जाओगे

तुम्हारी अच्छाई की महिमा
तुम्हें आज मैं बता जाता हूँ
समय आ गया मित्र मेरे
यह आदर्श अब मर जाएगा 


आदर्श जब नहीं रहेगा
रह गई बाकी जो
उन थोड़ी अच्छाइयों के

विश्व गुणगान करेगा  


अच्छाइयों का स्मरण आने पर
मेरे मित्र राजेश तुम्हें याद करेगा 


--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
04.12.2019

Monday, December 2, 2019

न्याय ...

न्याय ...

न्याय की आशा उस तंत्र से
स्वयं जो भ्रष्ट है
न्याय की आशा उसे
स्वयं जो कर्तव्यच्युत है


न्याय पाने के लिए हमें
कर्तव्य पर खरा उतरना होगा
कर्तव्य परायणता लिए हमें
तंत्र में विराजमान होना होगा

बे-ईमान खुद, ईमान की आशा
औरों से करते हैं
निश्चित उन्हें अब निराशा होगी
अब चालाकी की हिकमत सब करते हैं

शिक्षा से चालाकी नही हमें
नैतिकता ग्रहण करनी होगी
भूल अपनी अपेक्षायें राष्ट्र से
पहले राष्ट्र अपेक्षायें पूरी करनी होगी

शिक्षा की पूर्णता हमें
नैतिकता सिखा जाती है

गर शिक्षा से तुममें
सिर्फ चालाकियाँ भर आईं हैं
समझना 'राजेश' कि तुमने
शिक्षा अधूरी पाई है

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
03.12.2019