Saturday, July 13, 2019

मोहब्बत यही है -
तेरी ख़ुशी को तरजीह दे दी है
मेरी ख़ुशी अब सवाल नहीं है

Friday, July 12, 2019

अपने क्यों होते हैं पराये

अपने क्यों होते हैं पराये
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`दुनिया पराई होती ही है, ऐसे में अपने भी क्यों हो जाते हैं पराये?  आइये आज हम इस व्यापक घटना के कारणों को समझने की कोशिश करें। (आलेख में कुछ विज्ञान की टर्मिनोलॉजी का प्रयोग समझने के लिए आसान होगा है, अतएव आगे कुछ ऐसे शब्द आपको पढ़ने मिलेंगे।)

वास्तव में मानव मन में अन्य बातों के साथ में, एक बड़े हिस्से में भावनाओं का स्थान होता। और भावना का एक गुण उसमें ज्वलनशीलता का होना होता है।  मन के सामान्य तापमान में हमारे मन में भीतर विराजित भावना तब ज्वाला पकड़ लेती है जब हमारे आसपास किसी की ऐसी ही भावना से उसकी स्पर्धा होने लगती है। 8 अरब मानव सँख्या के इस विश्व में एक आध सैकड़ा हमारे अपने और कुछ सैकड़ा हमारे परिचित होते हैं। शेष हमारे लिए अजनबी से या पहले ही पराये से होते हैं। यहाँ वर्णित ये कुछ सैकड़ा/हजार मानवों का संपर्क हमारे जीवन में ज्यादातर वर्षों बना रहता है। इसलिए जो पहले ही पराये होते हैं उनके कम (या बिलकुल ही नहीं) संपर्क होने से हमारी और उनकी भावनाओं में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होने पाती है इसलिए वे हमारे मन के भीतर ज्वाला भड़काने में कम ही कारण बनते हैं। जबकि सबसे ज्यादा संबंध हमारा अपने रिश्तेदारों से और उससे कुछ कम हमारा पड़ोसी,सहकर्मी और अन्य परिचितों से रहता है। जिनके संपर्क में हम प्रायः रहते हैं उनमें कई कारणों से यथा - रूपवान, धनवान, बुध्दिमान, ख्यातिवान या उनका अनुकरण / प्रशंसागान आदि करने वालों के आधार पर हम स्वयं को उनसे हीन पाते हैं। ठीक उसी समय हमसे ऐसे श्रेष्ठ हमारे अपने/मित्र/परिचित हमें अपनी सफलता के बखान शाब्दिक रूप से या अपने हावभाव और आडंबर से हमारे समक्ष प्रदर्शित करने की भावना रखते हैं। यही वह समय होता है जब इस प्रतिस्पर्धा की हमारी और उनकी भावना में घर्षण (friction) उत्पन्न होता है और हमारे मन में ज्वाला धधकने लगती है। इसे ईर्ष्या अग्नि भी कहते हैं तथा इससे उत्पन्न तापमान हमें उनसे दूर छिटकाता है, जिनकी और हमारी भावनाओं के मध्य घर्षण हुआ होता है। यही छिटकाव ही 'हमारे जो अपने होते हैं उन्हें पराया बना देते हैं'। 

उपरोक्त विवेचना से हम कह सकते हैं कि हमने "अपने क्यों होते हैं पराये ?" इसका कारण तकरीबन वैज्ञानिक विधि से खोज लिया है। जब हमने किसी समस्या के कारणों को जान लिया है तो यह भी उचित होता है कि उसके समाधान का निर्णय भी हम करें। अतः थोड़े और शब्दों के जरिये यह लेखक इस हेतु आगे लिखता है कि -
'अपने न हो जायें पराये' इस हेतु हमें अपने मानसिक तापमान को सामान्य से कम रखना होता है ताकि भावनाओं में घर्षण और उसमें ज्वलनशीलता के विध्यमान गुण के कारण से चिंगारियाँ न उत्पन्न हों। मानसिक इस तापमान को सामान्य से कम रखने के लिए हमें अपने मन में विराजित "स्व-विवेक" को हर समय जागृत रखना होता है। हमारा विवेक ही हमें अपने पक्ष के साथ साथ अन्य के पक्ष का भी दर्शन कराता है। अन्य पक्ष के दर्शन से हमारा मन शाँत अर्थात ठंडा रहता है जिससे भावनाओं के घर्षण में अग्नि का स्तर हानिकारक स्तर तक नहीं पहुँचता है और 'हमारे अपने आजीवन हमारे अपने होते हैं'। 

इससे आपसी सहयोगी भावनायें पनपती हैं जो हमारी संयुक्त क्षमतायें तथा योग्यतायें, ज्यादा विकसित करने में सहायक होती हैं। इसे अन्य शब्दों में ऐसा लिख सकते हैं कि - दुनिया में इस तरह जब हमारे अपने ज्यादा रहते हैं तब हम किसी भी समस्या के प्रति उनकी बैकिंग होने से आश्वस्त रहते हुए अपने कर्म और व्यवहार रखते हैं। ये परिस्थितियाँ हमें तनाव रहित एवं चिंता रहित रखने में मददगार रहती हैं जो हमारी कार्यक्षमता में वृद्धि लाती है और हम संयुक्त रूप से सभी अपने ज्यादा सफल एवं ज्यादा आनंदमय जीवन और साथ का लाभ उठाकर अपने समय पर अंततः इस दुनिया से विदा लेते हैं। 

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन 

13-07-2019

Tuesday, July 9, 2019

उकेर चित्र व्यर्थ न कर समय ये दर्शाने को
कि कैसे हैं दुनिया वाले
दे समय स्व सुधार के विचार को
कि दुनिया का चित्र निखर जाये 

Monday, July 8, 2019

मी: - तू, अब इंसान अच्छे क्यूँ नहीं बनाता?
खुदा : -
तादाद कम थी तब नफ़ासत से बनाता था
तादाद बढ़ गई अब वह किस्म बनती नहीं

जब हम थोड़े में खुश रहते हैं
औरों की ख़ुशी की गुंजाइश करते हैं
हमारी ख़ुशी को ज्यादा की दरकार होती है
तब हम औरों की ख़ुशी तमाम करते हैं

Sunday, July 7, 2019

लगता तो है यूँ ही कि
ज़माना ख़ुद समझदार है मगर
अपनी होशियारी बघारे बिन
ये दिल है कि मानता नहीं

वह भी सच था, जब समझते थे- जी ना पायेंगे तुम बिना
यह भी सच है, इक अर्सा जीना पड़ा हमें- इक दूजे के बिना

Saturday, July 6, 2019

कोरा वादा !



कोरा वादा !

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आफ़रीन लगभग बिफर कर बोली - हम आठ बहन-भाई पैदा किये हमारी अम्मी ने. मेरा भी ऐसा ही सिलसिला चालू कर दिया, आपने. मेरे ना कहते हुए भी बिना निरोध साधन के प्रयोग के लगे रहते थे आप, रात दिन में चार-छह बार. जो सिलसिला कम रखते हुए लंबे अर्से चलाया जा सकता था, ख़त्म एकबारगी हुआ.अब, अम्मी की तरह ताउम्र मैं भी बच्चों के लिए लगी रहूँगी. कहते हुए आफ़रीन का चेहरा, मानसिक पीड़ा और क्रोध से सुर्ख हो गया था.
यह सब सुन आदिल का परंपरागत पुरुष भड़क उठा था, उसका मन हुआ आफ़रीन के गालों पर दो चाँटे जड़े, मगर पहले से ही उदास हो रही आफ़रीन पर और दर्द बन कर टूटने से उसने किसी तरह खुद को रोका. प्रकट में कहा - आफ़रीन तुम अगर बच्चों के लिए लगी रहोगी, तो मैं कौनसा अलग कुछ जीऊँगा, मुझ पर तो उनके अतिरिक्त, तुम्हारा भी भार होगा. यूँ आरोप की भाषा में न कहो ये सब.
स्वयं पर हुई इस हिंसा ने आफ़रीन के तेवर और विद्रोही कर दिए. हुए दर्द से उत्पन्न विलाप करते हुए वह आप से तुम के संबोधन पर उतर आई. आदिल से बोली - तुम मेरे बोलने पर पाबंदी लगा सकते हो, मगर हर कौम की नारी जिसमें अपने अधिकार और जीवन के प्रति चेतना आई है, उन सबके आज के समवेत स्वर को तुम, पाबंद नहीं कर सकते. साथ ही मुझे अपने पर आर्थिक भार मानने वाले तुम, यह भी समझ लो कि इसके जिम्मेदार भी तुम्हारी पुरुष बबर्रता से उत्पन्न सोच है, जो नारी को अपने कैद में बनाये रखने से पुष्ट होती है. तुम जैसे लोग ही चाहते हैं कि हम पुरुष आश्रिता नारी, स्व-निर्भरता की दृष्टि से शिक्षित नहीं किये जायें. आफ़रीन इससे आगे भी कुछ बोलती रही, लेकिन आदिल तब तक कमरे से जा चुका था.
आगे तीन दिन तक अस्पताल में आने वाले रिश्तेदार और परिचित आफ़रीन की ख़ामोशी और उदासी का कारण, उसकी जन्मी बेटी (बेटा नहीं) को मानते रहे. आदिल इन तीन दिनों में कमरे में आया तब भी आफ़रीन, उसे नज़रअंदाज करते रही. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद एक रात आदिल जिसका गुस्सा अब शांत हो चुका था , आफ़रीन की चिरौरी करते हुए क्षमा याचना करने लगा. आफ़रीन ने उस प्रसंग के बाद पहली बार आदिल की ओर देखा और कहा माफ़ किया, तुम्हें. मगर अभी बिना रोके-टोके, तुम मेरी बात सुनो और उसे समझने की कोशिश करो कि- इस देश में घर में जितनी जगह नहीं है उससे ज्यादा बच्चे भरे हैं, जो उनके सहज विकास को सुनिश्चित नहीं करते. बाजारों, सड़कों और रेल में पैर रखने को जगह नहीं है. जहाँ देखो वहाँ कतार लगीं हुईं हैं. कार्यलयों, न्यायालयों आदि सब जगह काम के बोझ इतने हैं कि 10 मिनट में हल होने वाली समस्यायें दिनों, महीनों और सालों तक लंबित रहती हैं. हर कौम में अपनी आबादी बढ़ाने की होड़ लगी हुई है. बहुसंख्यक हो कर हमें, क्या प्राप्त होगा? वह भविष्य के गर्त में है मगर इस मूर्खता ने आज के मनुष्य के जीवन को नर्क कर रखा है. क्षेत्रफल में कहीं छोटे इस देश की जनसँख्या अगले कुछ वर्षों में - दुनिया में सबसे अधिक हो जाने वाली है. इस देश, इस समाज के प्रति क्या हमारा कोई दायित्व नहीं ? ये प्रश्न उठा वह चुप हो गई.
आदिल आज पहले ही सरेंडर था - उसने आफ़रीन से वादा किया कि वह अपनी दो से ज्यादा संतान नहीं करेगा. आफ़रीन को आदिल की बात पर न तो यकीन आया और न ही उसकी खराबियों को अनदेखा कर सकी. मगर प्रकट में उसके मुख पर, फीकी मुस्कान अवश्य दिखाई दी.
'तुम्हारा भी भार' शब्दों के प्रयोग ने आफ़रीन को और आहत कर दिया, उसने जबाब दिया - आप ये तो ना कहो तो अच्छा है, हमें घर-बच्चों में बाँध कर और वस्त्रों मैं कैद करके आप स्वयं बाहर की औरतों की अर्धनग्न-नग्न तस्वीरों,वीडियो को देखते रहोगे. आफ़रीन ने आदिल के फेसबुक, इंस्टा आदि के इन शौक की साक्षी होने पर ये कहा, लेकिन आदिल को यह कडुआ सच बर्दाश्त नहीं हुआ. इस बार क्रोध से तमतमा कर उसने यह भूलकर कि यह अस्पताल का कक्ष है और नवजात बेटी बगल में सोइ है, उसने अपनी लेटी पत्नी के एक हाथ से सिर के बाल पटा दिए और दूसरे हाथ से दो जोरदार थप्पड़ आफ़रीन के मुहँ पर जड़ दिए.
बेटी के जन्म देने के बाद खामोश-उदास सी लेटी थी आफरीन. इसके विपरीत पति आदिल ख़ुशी के मारे वाचाल हुआ जा रहा था. आफरीन को यूँ नवजात के प्रति उदासीन सा देख आदिल ने पूछा - क्या, हुई पीड़ा से ऐसी गमगीन हो? आफरीन ने सिर्फ नकारने मुखमुद्रा से इस बात का उत्तर दिया. आदिल ने फिर पूछा बेटा नहीं हुआ इससे निराश हो? इस पर भी आफरीन ने सिर्फ एक शब्द - "नहीं" कहा. अब आदिल कारण जानने को व्यग्र हो गया, प्रश्न किया- फिर क्या कारण है यूँ खामोश, किस विचार में डूबी हो? आफरीन की आँखे छलक आईं, कहा - हमारी शादी 14 अक्टूबर को हुई है, और आज 4 जुलाई ही तो है. कह कर चुप हो गई. आदिल ने सवाल किया- इसमें उदास होने की क्या बात है?

--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन 
06-07-2019


Tuesday, July 2, 2019

"लोगों का काम है कहना", समझ कर बेफ़िक्र हम इतने हैं
लोगों से बेपरवाह, बेख़ौफ़ हम काले कारनामे अब करते हैं