Friday, July 13, 2018
Thursday, July 12, 2018
Sunday, July 8, 2018
अच्छा हुआ कि - औकात हमारी तुमने समझा दी
इतरा के - अपनी ज़िंदगी पर गुमां कर रहे थे हम
वक़्त ही था - उसकी औकात बनाता था
वक़्त ही था - जो मेरी औकात बताता था
उसने समझा उसकी औकात कि - वह मेरी औकात समझाये
मासूम था बेचारा नहीं जानता था - ये सब वक़्त की बात है
दफ़ना लिया उन्होंने - अपने सीने में हमें
मौत थी हमारी - फिर भी बेहद हसीन थी
इतरा के - अपनी ज़िंदगी पर गुमां कर रहे थे हम
वक़्त ही था - उसकी औकात बनाता था
वक़्त ही था - जो मेरी औकात बताता था
उसने समझा उसकी औकात कि - वह मेरी औकात समझाये
मासूम था बेचारा नहीं जानता था - ये सब वक़्त की बात है
दफ़ना लिया उन्होंने - अपने सीने में हमें
मौत थी हमारी - फिर भी बेहद हसीन थी
Friday, July 6, 2018
ज़िंदगी नाम है मुश्किलों से पार पाने का
मुश्किलें नहीं जिसमें उसे ज़िंदगी कैसे कहिये
लिखते कि इक दिन गुजर जाना है
लिखते कि दिल नेक , एक बताना है
नेकदिल से जी,ज़िंदगी होती इस वजह
नेकदिली की लिख लिख के जी जाना है
भविष्य के गर्त में - बहुत आशंकायें छिपी होतीं मगर
वर्तमान हो के गुजरता है - बेहतरीन यादगर बन कर
मोहब्बत हर जगह उसे खोजने की जरूरत क्या
खोजें वे तरीक़े जिनसे मोहब्बत निभाई जाती है
जो पानी में बह जायें
ऐसे ख़्वाब देखना दुःख देते हैं
ज़िंदगी जी के यूँ हम दिखलायें
जो औरों की ख़्वाब बन जाये
उदास नहीं होना कि - तुम्हारी तारीफ नहीं लिखते
इस कदर निजी हो तुम - दिल में छिपाये रखते हैं
उसी से सब साथ चाहते हैं
जिसके साथ सब होते हैं
कोई छांव , दरख़्त , कोई साये तक साथ नहीं
इसलिए तन्हा , बेचारे हैरान हैं
इक उम्मीद कि - ज़िंदगी बहार ले आएगी कभी
अच्छी यूँ रही कि - ज़िंदगी ख़ुशी ख़ुशी गुज़र गई
तुम्हारे अनुसार
हम नहीं चल सकते
हमारे अनुसार तुम चलो
हमारी चाहत क्या अजीब नहीं?
हमारे गुस्से से ,
किसी को क्या फर्क पड़ता है मालूम नहीं
पर तय है कि हम ,
अपने बेशक़ीमती लम्हें बिगाड़ते हैं
क्या होती है स्मार्टनेस?
उसके लिए दिल में भरी है नफ़रत
वह मिले तो
उससे अज़ीज कोई नहीं दिखाते हैं
क्या होती थी मर्यादा?
दिल में रखते थे प्यार
मगर
चेहरे से रुखाई दिखाते थे
लिखते हैं हम - बहुत कुछ तो ज़िंदगी में लिख देंगे
छूट जाए जो लिखना - बाद आप खुद समझ लेना
कुछ हैं
जो आज भी सँस्कार देकर
और कुछ
सँस्कार लेकर जिया करते हैं
नापसंदगी किसी की वक़्त पे समझ ले , भाई
नासमझ तू रहा तो - नफ़रत में तब्दील होगी
पसंद हो जो बात - अपनी हो कहाँ जरूरी है
रखो दिल में कि - दिल को ख़ुशी मिलती है
मुश्किलें नहीं जिसमें उसे ज़िंदगी कैसे कहिये
लिखते कि इक दिन गुजर जाना है
लिखते कि दिल नेक , एक बताना है
नेकदिल से जी,ज़िंदगी होती इस वजह
नेकदिली की लिख लिख के जी जाना है
भविष्य के गर्त में - बहुत आशंकायें छिपी होतीं मगर
वर्तमान हो के गुजरता है - बेहतरीन यादगर बन कर
मोहब्बत हर जगह उसे खोजने की जरूरत क्या
खोजें वे तरीक़े जिनसे मोहब्बत निभाई जाती है
जो पानी में बह जायें
ऐसे ख़्वाब देखना दुःख देते हैं
ज़िंदगी जी के यूँ हम दिखलायें
जो औरों की ख़्वाब बन जाये
उदास नहीं होना कि - तुम्हारी तारीफ नहीं लिखते
इस कदर निजी हो तुम - दिल में छिपाये रखते हैं
उसी से सब साथ चाहते हैं
जिसके साथ सब होते हैं
कोई छांव , दरख़्त , कोई साये तक साथ नहीं
इसलिए तन्हा , बेचारे हैरान हैं
इक उम्मीद कि - ज़िंदगी बहार ले आएगी कभी
अच्छी यूँ रही कि - ज़िंदगी ख़ुशी ख़ुशी गुज़र गई
तुम्हारे अनुसार
हम नहीं चल सकते
हमारे अनुसार तुम चलो
हमारी चाहत क्या अजीब नहीं?
हमारे गुस्से से ,
किसी को क्या फर्क पड़ता है मालूम नहीं
पर तय है कि हम ,
अपने बेशक़ीमती लम्हें बिगाड़ते हैं
क्या होती है स्मार्टनेस?
उसके लिए दिल में भरी है नफ़रत
वह मिले तो
उससे अज़ीज कोई नहीं दिखाते हैं
क्या होती थी मर्यादा?
दिल में रखते थे प्यार
मगर
चेहरे से रुखाई दिखाते थे
लिखते हैं हम - बहुत कुछ तो ज़िंदगी में लिख देंगे
छूट जाए जो लिखना - बाद आप खुद समझ लेना
कुछ हैं
जो आज भी सँस्कार देकर
और कुछ
सँस्कार लेकर जिया करते हैं
नापसंदगी किसी की वक़्त पे समझ ले , भाई
नासमझ तू रहा तो - नफ़रत में तब्दील होगी
पसंद हो जो बात - अपनी हो कहाँ जरूरी है
रखो दिल में कि - दिल को ख़ुशी मिलती है
Thursday, July 5, 2018
क्या होती है स्मार्टनेस?
उसके लिए दिल में भरी है नफ़रत
वह मिले तो
उससे अज़ीज कोई नहीं दिखाते हैं
क्या होती थी मर्यादा?
दिल में रखते थे प्यार
मगर
चेहरे से रुखाई दिखाते थे
हमारे गुस्से से ,
किसी को क्या फर्क पड़ता है मालूम नहीं
पर तय है कि हम ,
अपने बेशक़ीमती लम्हें बिगाड़ते हैं
तुम्हारे अनुसार
हम नहीं चल सकते
हमारे अनुसार तुम चलो
हमारी चाहत अजीब नहीं?
हमारी मोहब्बत को - मूक जानवर भी समझ लेते हैं
उम्मीद उनसे नहीं - जिन्हें मोहब्बत समझ आती नहीं
तज़लील आप हमें करें - गिला कोई नहीं
जानते आप - हमें , अपना मानते ही नहीं
चल नहीं सकूँगा - तब भी गिला नहीं होगा मुझे
कि खुश कोई तो है - जो गिराना मुझे चाहता था
उसके लिए दिल में भरी है नफ़रत
वह मिले तो
उससे अज़ीज कोई नहीं दिखाते हैं
क्या होती थी मर्यादा?
दिल में रखते थे प्यार
मगर
चेहरे से रुखाई दिखाते थे
हमारे गुस्से से ,
किसी को क्या फर्क पड़ता है मालूम नहीं
पर तय है कि हम ,
अपने बेशक़ीमती लम्हें बिगाड़ते हैं
तुम्हारे अनुसार
हम नहीं चल सकते
हमारे अनुसार तुम चलो
हमारी चाहत अजीब नहीं?
हमारी मोहब्बत को - मूक जानवर भी समझ लेते हैं
उम्मीद उनसे नहीं - जिन्हें मोहब्बत समझ आती नहीं
तज़लील आप हमें करें - गिला कोई नहीं
जानते आप - हमें , अपना मानते ही नहीं
चल नहीं सकूँगा - तब भी गिला नहीं होगा मुझे
कि खुश कोई तो है - जो गिराना मुझे चाहता था
Monday, July 2, 2018
यद्यपि ..... बेहतर
यद्यपि ..... बेहतर
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यद्यपि काबिल नहीं कि - प्रेमिका बनाये इसलिए
दगा-झाँसा नहीं देता - तुझसे तो किन्नर बेहतर
यद्यपि काबिल नहीं कि - ब्याह करे इसलिए
दहेज नहीं लेता - तुझसे तो किन्नर बेहतर
यद्यपि काबिल नहीं कि - पत्नी रखे इसलिए
गृहहिंसा नहीं करता - तुझसे तो किन्नर बेहतर
यद्यपि काबिल नहीं कि - बच्चे पैदा कर सके इसलिए
भ्रूण-बेटी का हन्ता नहीं - तुझसे तो किन्नर बेहतर
यद्यपि काबिल नहीं कि - यौन संबंध करे इसलिए
बलात्कार नहीं करता - तुझसे तो किन्नर बेहतर
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन03-07-2018
काश तू पुरुष नहीं - हिजड़ा होता
काश तू पुरुष नहीं - हिजड़ा होता
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तू शराब पीकर घर आया था , तूने सो चुके दो बच्चों की परवाह नहीं की थी। तू बारात लेकर जिसे ब्याह कर अपने घर लाया था उस पत्नी का आदर नहीं रखा था। तू उसे बेरहमी से पीट रहा था , गंदी गालियाँ दे रहा था। पाँच वर्षीय तेरी बेटी इस शोर से जाग गई थी। माँ को पिटता देख उसने तुझे , मारने से मना किया था - तू सो जाये ऐसा निवेदन किया था। तू नशे में हिंसक जानवर हुआ था। तूने उस अबोध मासूम बेटी को इस बुरी तरह मारा कि उसके कान-आँख से रक्त निकल आया। अस्पताल पहुँचने पर उसे मृत बताया गया था।
तूने कैसे भुला दिया कि वह बेटी तेरे ही माध्यम से , तेरी पत्नी के गर्भ में आई थी. उसने गर्भ में पीड़ाजनक नौ माह गुजारे थे। उसे गर्भ में पालने और प्रसव देने के लिए तेरी पत्नी की कई दफे जान पर बन आई थी। सब तकलीफों के बाद आखिर उसने तेरे घर जन्म लिया था। जितनी पीड़ा उसने जन्म लेने के पहले भुगती थी उस कष्ट के एवज में बेचारी वह 70 - 80 वर्ष का पूरा जीवन जी लेने की अधिकारी थी। तूने पाँच वर्ष की उस कमजोर बेटी और अपनी आश्रिता पत्नी पर अपनी मर्दानगी (शूरवीरता) दिखाई थी। एक की जान ले ली थी , एक की नजरों से तू गिर गया था।
काश तू पुरुष नहीं हिजड़ा होता , ना तेरी पत्नी होती और ना ही तेरे घर बेटी सिर्फ पाँच वर्ष जीने के लिए पैदा होती। पाँच वर्ष की उम्र जीवन क्या है समझ नहीं पाती है। तेरे जैसे दुष्ट ने पाँच वर्ष में ही उसके जीवन का खात्मा कर दिया। काश तू पुरुष नहीं हिजड़ा होता ..
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
02-07-2018
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