Thursday, June 7, 2018

हक़ीक़त में जो मिलते - उतने हसीं नहीं
खूबसूरत हसीं ख़्वाब - हम देखते क्यों हैं

ख़्वाब और हक़ीक़त अगर बेमेल है इतनी
ख़्वाब सी मेल की हक़ीक़त बनाते क्यों नहीं


देखते तो हैं ख़्वाब में - हम मोहब्बत को अपनी
हक़ीक़त में मगर देना दगा - अज़ीब नहीं लगता

तेरी तरह ही इंसान है - ये तेरी मोहब्बत
अपने लिए नापसंद - तू दगा उसे देता क्यूँ है?

अपने लिए नापसंद - औरों से करता तू वह है
तुझे इंसान लिखूँ या - कोई और हर्फ़ मैं लिखूँ


 

Wednesday, June 6, 2018

या तो इश्क़ ही कर लो
या हासिल कुछ कर लो

Monday, June 4, 2018

दुश्मन भी ऐसा हो - मेरे सपनों का संसार है
इक तुम्ही नहीं दोस्त मेरे - ऐसा हर इंसान हो

एक बार पूछ तो लो उससे ....

एक बार पूछ तो लो उससे ....
-------------------------------
"इक तुम्हें मिली - इक उसे मिली ज़िंदगी
तुमने तो जी ली - उसे मर मर के जीने दी"

किस सोच से ? , किस उद्देश्य से ? या क्या जस्टिफिकेशन है? पुरुष की कई कई औलादें पैदा करने के पीछे इसमें हमें जाना नहीं है। यहाँ सवाल कई कई बार प्रसव की वेदना सहती बेचारी नारी के मनोभाव का है। एक छोटी सी तकलीफ जिसमें रिस्क ज़िंदगी की होती है अगर स्वयं अपने पर आती है तो हम सब भयाक्रांत हो जाते हैं किंतु एक नारी को गर्भवस्था के दौरान ऐसे कितनी बार ज़िंदगी का भय सताता है , किसी को यह सोचने की परवाह नहीं । चलो माना पैदा भी कर दिए मजबूरी में 6-8 बच्चे उसने , किंतु उसकी दयनीय करुणाजनक मनोस्थिति का अंत यहीं नहीं हो जाता है। इसके बाद बारी और भी ज्यादा गहन कष्टों की आती है। हमारे समाज के घर-परिवार में अभावों का बसेरा होता है।  बच्चे कपड़े को लालायित रहते हैं , अच्छे भोजन को तरसते हैं , शिक्षा की गंभीरता बताने वाला उन्हें कोई नहीं और संस्कारों एवं उचित आचरण की प्रेरणा देने वाला उन्हें कोई नहीं होता है। अपने बच्चों की अपूरणीय मंसूबों को देखना , समाज के उन्नत परिवारों के बच्चों से उन्हें पिछड़ते देखना , यह करुणामयी किसी माँ के हृदय पर कितना बड़ा दबाव होता है , किसी को समझना नहीं है। उसकी चिंता उसके दुःख की मनोस्थिति उसकी नियति होती है। अभावों और शिक्षा संस्कारहीनता में पले बढ़े , बच्चे बड़े होकर , चोर - जेबकतरे हो सकते हैं। अपने तरफ किसी लड़की को आकृष्ट नहीं होते देख जोर जबरदस्ती और दुराचार को उन्मुक्त हो सकते हैं। कोई और सिर झुकाने वाले काम उनसे हो जाए - तब भी दोष इस बेचारी माँ पर आता है कि किस माँ का जना है यह दुष्ट। इस देश के पुरुषों , मेहरबानी कर इस समाज - इस देश पर इतनी करो कि 'एक बार पूछ तो लो उससे' कि कितनी औलाद ख़ुशी से वह पैदा कर सकती है। कितना है घर में कि कितने बच्चों की परवरिश वह ख़ुशी से कर सकती है ? कितने बच्चे को उचित शिक्षा-संस्कार के लिए उसके पास वक़्त होगा ? जितना घर परिवार और बच्चों पर देने के बाद थोड़ा वक़्त अपनी निजी ख़ुशी के लिए भी निकाल सकेगी।
 ज्यादा औलादों की सब तरह की अपेक्षाओं की पूर्ति के दबाव में नारी , चाहे वह किसी भी संप्रदाय की हो उम्र से पहले बूढी होती है , और ज़िंदगी को समझे बिना दुनिया से रुखसत होती है। नारी के लिए ज़िंदगी का मायने इतने बस में सीमित न करो , उसे ज़िंदगी का हक़ ज्यादा नहीं दे सको तो कोई बात नहीं , अपने बराबर का तो उपलब्ध कराओ।
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
04-06-2018

रोज़ा-उपवास

रोज़ा-उपवास
---------------
अभी बच्चे और नवयुवा जिन्हें भूखे रहने का अभ्यास ही नहीं उन पर रोजा-उपवास की पाबंदी से किसी को धर्म लाभ नहीं मिलता , अपितु उल्टा होता है। मजहब के नाम पर किसी को भूख से तरसाना - उनका दिल दुखाना है। दिल दुखाना , मज़हब नहीं होता। बच्चे-नवयुवा , पढ़ने- जॉब में मन लगायें या भूख से व्याकुल रोजा या उपवास खोलने के वक़्त का बेसब्री से इंतजार करें? चिकित्सा विज्ञान भी पेट ,पाचन और स्वास्थ्य की दृष्टि से इसे उचित नहीं कहता। लंबे समय भूखे रहना और फिर गरिष्ठ भोजन पर टूट पड़ना अजीब है. धर्म गुरुओं को दकियानूसी रिवाजों को बदलने के लिए आगे आना चाहिए। अब वक़्त दसवीं - बारहवीं सदी का नहीं जहाँ कुछ को करते देखने की नकल करना बाकि उचित मानते थे। अब हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं , जहाँ अंधविश्वासों को जगह नहीं होनी चाहिए। अब हमारे सामने उन्नत विज्ञान है , हम पढ़े-लिखें हैं हमें तर्क संगत बातें करना चाहिए तर्क संगत आचार-व्यवहार करना चाहिए। मैं जानता हूँ - रोजा रखवाने के चक्कर में माँ-बीबी सारी रात जागा करती हैं , दिन में भी सो पाना मयस्सर नहीं होता। मज़हब से क्या मिलेगा पता नहीं किंतु तय है कि स्वास्थ्यगत समस्यायें तो उनकी बढ़ेंगी ही।
किसी भी धर्म मजहब में - नेक इंसान होना सबसे पहली जरूरत है। मज़हब के प्रति आदर है तो पहली कोशिश अच्छे इंसान बनने की होना चाहिए , इससे हमें धर्म लाभ मिलता है , हमारा समाज देश अच्छा होता है। फिर रोज़े उपवास भी ख़ुद से मन में आएं तो ही किसी को रखना चाहिए। संकोच,नकल या जोर जबरदस्ती से नहीं रखे जाने चाहिए।
--राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन
04-06-2018

Saturday, June 2, 2018

किसी वक़्त अज़ीज लगा करते थे
वक़्त हुआ अब अजनबी से हो गए हैं

'तारीख़ ए वफ़ा' में कुछ ही नाम मिलते हैं
खुशकिस्मती कि उसमें जिक्र हमारा होगा

Friday, June 1, 2018

जिसने रोज नए सबक न दिए - वह ज़िंदगी भी क्या है
जी तो लिए हम मगर - कैसे जीते हैं 'और' पता क्या है