Tuesday, October 13, 2015

बहन जी

बहन जी
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बजरंगी भाईजान… .
एक फिल्म आई बजरंगी भाईजान ,जिसमें
हीरो ने हिरोइन से पहले बहन जी बोला है
मेरा नाम बहन जी नहीं , रसिका सुनते ही
पवित्र भाव खत्म ,हीरो मंगेतर बन डोला है
कॉलेज में …
कॉलेज पढ़ने जाती सलवार सूट परिधानों में
वह स्टूडेंट कॉलेज में बहन जी पुकारी जाती है
ऐसे उपहास से बहन जी शब्द कहा जाता कि
वहाँ वह भारतीय परिधान पहनने में शर्माती है 
बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड …
पाश्चात्यता ने फिल्म एवं मीडिया माध्यम से
भारतीय संस्कृति पर इस तरह हमला बोला है  
बहन ,बेटी ,पत्नी , गरिमामय रिश्ते संकट में
बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड नए रिश्ते का अब डंका बोला है
--राजेश जैन
13-10-2015
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Monday, October 12, 2015

पापा और बेटी

पापा और बेटी
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सजी दुकानों में नये नये सामानों ने
बेटी तुम्हें जब तब ललचाया था
मै चाहता ,तुम्हें दिलवाना लेकिन
सभी कुछ नहीं दिलवा पाया था

तुमने सीमा क्षमता पापा की जानी
बुध्दिमानी पर अचरज में ,मैं होता था
हर चीज़ नहीं बनी तुम्हारे लिए
तुमने छोटी उम्र में ही यह समझा था 

प्रतिस्पर्धाओं में योग्यता जितनी
सफलता में संतोष ,जीवन कला होती है
यह संस्कार तुम ग्रहण कर सकी ,
जिससे अपराध बोध से मैं बच सका था
--राजेश जैन
12-10-2015
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Saturday, October 10, 2015

नारी-पुरुष रति चाह

नारी-पुरुष रति चाह
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नारी-पुरुष रति चाह , पति-पत्नी में ख़ुशी देती है
सभी सुंदर से संबंध ,पिपासा से तृप्ति न होती है
भूख ,कुछ भोजन से समय समय की पूरी होती है
पूरा भोज्य मै खाऊँ की तृष्णा में तृप्ति न होती है

दूसरे की थाली के अच्छे व्यंजन देख झपट जाना
माँसल , बलिष्ठ तन देख नीयत ख़राब हो जाना 
स्वयं के भोजन या विवाहित साथी पर है अन्याय
बेहतर इससे अपने में अच्छाइयों को परख जाना

फेसबुक से पहले ,मनोरुग्णता की माप नहीं थी
कई के कामातुर मन में क्या ऐसी भाँप नहीं थी

सोशल साइट्स से यद्यपि रुग्ण चाहत प्रकट हुई है
किन्तु स्वस्थ मन को चंगुल से बचने को सीख दी है
काम-रुग्णता मीडिया ,फिल्म-वीडियोस ने फैलाई है
उसे थामने उपाय करें ,यह चुनौती पीढ़ी को बताई है
--राजेश जैन
11-10-2015
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Thursday, October 8, 2015

नये बन रहे समाज के जब होंगे पचास वर्ष

नये बन रहे समाज के जब होंगे पचास वर्ष
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नब्बे प्रतिशत से ज्यादा नारी -पुरुष
परिवार में पत्नी-पति हो रहते आये हैं
कुछ कड़वे-पीड़ा के किस्से परिवार में
हजारों वर्ष के सिलसिले में होते आये हैं

लंबी अवधि में कड़वाहट के कुछ किस्से से
उचित नहीं समाज संरचना बदल देना है
अनुभवों से सीख ,कड़वाहट देतीं जो उन 
कुछ कुरीतियों को उचित से बदल देना है

समाज विद्रोही अति प्रतिक्रिया ,प्रवृतियों से
समाज में डिवोर्सी नारी-पुरुष ज्यादा होंगे
गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड रिश्ते में भुगते ज्यादा होंगे
उपजे अवैध संबंधों से उनके दुष्परिणाम होंगे 

टूटे परिवार ,माँ या पिता विहीन बच्चों का
प्रतिशत समाज में ,पचास से ज्यादा होंगे
ऐसे नए समाज के सिर्फ पचास वर्षों में
कड़वे ,पीड़ादायी किस्से बहुत ज्यादा होंगे
--राजेश जैन
15 -10-2015
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Wednesday, October 7, 2015

नारी को आदर

नारी को आदर
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सम्मान , अपनी माँ ,बहन , बेटियों का जिसमें जानते हैं
जिन गुणों का होना अपनी पत्नी में होना जरूरी मानते हैं
पीछे पड़ दूसरों की पत्नी ,बेटी को , गर्लफ्रेंड बना छलते हैं 
उनमें उन गुणों को मिटाते ,अपनी भूल क्यों ना मानते हैं

अवैध संबंध की होड़ लगाकर ,प्रचलन ऐसा ख़राब लाकर
माँ ,पत्नी ,बहन ,बेटी में , रख पाएंगे नहीं गुण बचा कर
बुरे चलनों में वे दुष्प्रभावित होंगी ,नारी गरिमा खो देंगी
चंचल चित ,ऊब ,साथ बदलना ,नारी चुनौतियाँ बढ़ा देंगी 

निभाने ,त्याग करने ,सम्मान करने को प्यार न जानेंगे
कामुकता के वशीभूत ,वासना को प्यार अगर मान लेंगे
काम वासना के सागर में ,मानव समाज को डुबा कर के
माँ ,बहन ,बेटी पत्नी से बनता परिवार विलुप्त कर देंगे

मानव सभ्यता की ,हासिल उच्च मंजिल से गिर जायेंगे
आज नहीं चेत पाये तो , मनुष्य जानवर जैसे हो जायेंगे

धर्म ,भाषा ,राष्ट्र ,संकीर्ण मनसिकता से ऊपर उठना होगा
मानवता निभा ,सभी नारी को आदर एवं सुरक्षा देना होगा
--राजेश जैन
07-10-2015
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Monday, October 5, 2015

एक मीठा ,पका ,ताजा फल

एक मीठा ,पका ,ताजा फल
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एक वृक्ष पर , बहुत मीठा , सुंदर सा एक फल लगा दिखाई देता है ,उसे देख ,देखने वाले के मन में ये अलग-अलग विचार आ सकते हैं -
1. इस फल को तोड़ ,मै खा लूँ  (सामान्य सोच )
2. यह फल , तोड़ मै , अपने बच्चे को खिला दूँ ( जिम्मेदार सोच)
3. यह फल , जिसके आँगन में वृक्ष है उसे खाना चाहिए (तार्किक सोच)
4. यह फल , स्वयं या घर परिवार के लिए खरीद लूँ ( धनवान की सोच )
5. यह फल उसे खाने को  मिल जाये , जो खाना नहीं मिलने से कई दिन से भूखा है (आदर्श सोच )
6. उस रोगी को खाने मिल जाए , जो और कुछ पचा नहीं पा रहा है , जिसके लिए यह फल सुपाच्य और पौष्टिकता देने वाला है ( न्यायिक ,आदर्श सोच)
अच्छे और सभ्य समाज में अधिकता , क्र. 4 से 6 तरह के विचार वालों की होगी , 2 एवं 3 तरह के विचार वालों की अधिकता से एक सामान्य समाज बनता है। जबकि जिस समाज में क्र 1 तरह के विचारों के धनी हों , वह समाज ,स्वार्थी और खींचतान और छल से सभी के लिए के लिए पीड़ादायक होता है।
--राजेश जैन
06-10-2015
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Sunday, October 4, 2015

नारी कमजोर है या कमजोर हो गई हो तो

नारी कमजोर है या कमजोर हो गई हो तो
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इन्द्राणी ने ऐसा किया ,राधे माँ ने वैसा किया
उन्हें विवश उस रस्ते पे ,किसने ,सहयोग किया ?

माना स्व-विवेक होना चाहिये ,साथ सदाचार होना चाहिए
गर भूल हुई हो ,किसी से ,क्या उसे ,हमें छल लेना चाहिए ?

कुछ नारी बन गई वस्तु सी है ,जो ,पुरुष मजे के लिए उपलब्ध है
क्या पत्नी ,बहन ,बेटी तुम्हारी ,चाहते वैसी उपलब्ध अन्य को हो ?

अतः ,दोष नारी पर न डालना होगा ,उसे नहीं पथ भटकाना होगा
बहाना उसकी भूलों का करके ,उसे मर्यादा बाहर न ले जाना होगा

व्यभिचारी नहीं , जिम्मेदार बनना होगा
कायर नहीं ,वीरता के आचरण करना होगा 
नारी कमजोर है या कमजोर हो गई हो तो
सहारा दे उनको मजबूत ,हमें करना होगा
--राजेश जैन
 05-10-2015
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