Friday, May 15, 2015

क्या बेटी होना पाप है ?

क्या बेटी होना पाप है ?
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परिस्थितियाँ प्रश्न की बनीं अगर
"क्या बेटी होना पाप है ?"
इतना ही मात्र लिखेगी लेखनी यह
सभ्यता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है

दुर्भाग्य को यदि बदल न सकें हम
मनुष्य होने की फिर महिमा क्या ?
--राजेश जैन
16-05-2015

Thursday, May 14, 2015

मुश्किल है

मुश्किल है
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मुश्किल नहीं है मेरे लिए
मुझे नहीं किसी और को तुम चाहो
मुश्किल है मुझे तब कि
किसी और के साथ तुम खुश ना हो

कुछ सुंदर को छोड़ शेष होती हैं उपेक्षित
चाहत को भी घर लाकर करते हैं उपेक्षित

हमारी ख़ुशी क्या , मालूम नहीं है तुम्हें
हैरत तुम्हारी ख़ुशी मालूम नहीं है तुम्हें

गर्भ में ही मारकर कम कर रहे हो हमें
ऐसे भी मारोगे मरने का गम नहीं हमें

गम इस बात का हमने जन्मा है जिसे
कैसा पिलाया दूध गुण न मिले हैं उसे

नारी को सम्मान और सुरक्षा देना नहीं आया है
दुःख की है बात , नारी के लिए भटकना पाया है

जीवन भर ख़ुशी के लिए ढेर साधन जुटाया करते हैं
कला नहीं ख़ुशी जीने की उनमें दुःख उठाया करते हैं
--राजेश जैन
15-05-2015

Wednesday, May 13, 2015

प्रतिभावान

प्रतिभावान
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क्या हुआ अब तक भुला उसे देना है
सभ्यता को यथा नाम रूप दे देना है
भय मुक्त हो समान मनुष्य है नारी
देश -समाज को अपने ये रूप देना है

अगर अपने परिवार की नारी सदस्या को लेकर गहन विचार करें तो हममें से अनेकों इस बात से सहमत होंगे कि हमारे अपने परिवार में 1. माँ ,पिता से ज्यादा या  2. बहन , हम से ज्यादा या 3. पत्नी , पति से ज्यादा या 4. बेटी ,बेटे से ज्यादा - प्रतिभाशाली रहीं हैं। लेकिन जीवन भर पुरुष से ज्यादा परिवार के प्रति समर्पित होते हुए भी , जिसे आज जीवन में ज्यादा सफल होना कहते हैं , उसमें पुरुष से नारी पिछड़ गईं हैं। ज्यादा प्रतिभावान होने पर भी भौतिक उपलब्धियाँ उनके हिस्से में कम आईं हैं। यही नहीं अगर उन्होंने इस स्पर्धा में हिस्सा लिया है तो उनका उत्साह वर्धन नहीं किया गया है एवं अनेकों जगह उनसे छल किया गया है।  क्यों ऐसा हुआ है ? हमारी समाज व्यवस्था में कुछ दोष रहे हैं। हमारे पुरुषत्व अहं उनके प्रगति में अवरोध बनें हैं। ऐसे में नारी - समाज व्यवस्था के प्रति उग्र प्रतिक्रिया को बाध्य हुईं हैं। कई आज - पुरुष प्रकार के मनुष्य से चिढ गई हैं।
हममें से जिनको भी ऐसा लगता है , उनसे आव्हान है नारी का साथ देकर - समाज व्यवस्था के दोष दूर करने के लिए और पुरुषत्व भ्रम को मिटाने के लिए अपने अपने सामर्थ्य से अपने अपने स्तर से और अपने अपने तरीके से प्रयास करें।
प्रतिभावान ,उसके हिस्से में भी आयें उपलब्धियाँ 
समान अवसर एवं न्याय से सब पायें उपलब्धियाँ 
हो विस्तृत पुरुष सोच ,न्याय ,और समाज हमारा
अधिक प्रतिभावान गर नारी वह पायें उपलब्धियाँ 
--राजेश जैन
14-05-2015

Tuesday, May 12, 2015

आपसी सम्मान

आपसी सम्मान
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पुरुष नारी की नियति उन्हें साथ होना है
दीर्घ यह साथ तो काहे का रोना धोना है ?

आरोप-प्रत्यारोपों में क्यों जीवन खोना है ?
मधुरता के साथ से जीवन सुमधुर होना है

रख परस्पर सम्मान ,अपनों सा रहना है
पीड़ाकारी भाषा-व्यवहार से हमें बचना है

साक्षर मनुष्य होने का परिचय हमें देना है
व्यवहार ,भाषा,कर्मों में शिष्ट हमें होना है

कमजोर अगर नारी तो धर्म, सहारा देना है
उत्कृष्ट उनके गुणों को हमें संरक्षण देना है

सुरक्षा-विश्वास रीत निर्मित हमें कर देना है
उच्च संस्कार, रिश्तों में हमें मर्यादित होना है

परस्पर न शत्रु हम , मित्र भाव में हमें रहना है
प्रणय ही न एक, अनेक रिश्तों में हमें जीना है

मरने से किसी के कभी न भूचाल आ जाना है
मरा आपसी सम्मान ,आकाश ही खो जाना है
--राजेश जैन
13-05-2015

Monday, May 11, 2015

मदर्स डे पश्चात (Post Mothers Day)


मदर्स डे पश्चात (Post Mothers Day)
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बेटे के जन्म के साथ पीयूष जिन अंगों में भर आया है
आँचल लेट जिन सोतों से बेटा पीयूष पान कर पाया है

पीयूष भरे इन सोतों से ही तो बचपन ने बाँकपन पाया है
युवा हुआ कामुकता में नारी लाज विचार ना कर पाया है

माँ ,नारी है , नारी माँ हो सकती विचार ना उसे आया है
आहत ,अनादर नित करता पीयूष ऋण न चुका पाया है

भूल ये शाश्वत सच को ,नारी किसी की बेटी या माँ भी है
मादक रूप दे उनके अंगों को ऐसे सब तरफ उकेर डालें है 

निज होते उन मादक अंगों को वीभत्स रूप में उकेर डाले हैं
माँ बेटी का सम्मान ,तन ही ना मन भी होता भुला डाले हैं

अनादर हुआ मातृत्व का , आहत हुआ नारी सम्मान है
सुरक्षा चुनौती उनको , आहत हुआ नारी स्वाभिमान है

फिर भी पीयूष पान कराती बेटे को, अपमानित ,वह माँ है
मैं नारी हूं या महज स्तनों का एकजोड़ा? पूछती वह माँ है
--राजेश जैन
11-05-2015
https://www.facebook.com/narichetnasamman

Saturday, May 9, 2015

मातृ दिवस (Mother's Day)

मातृ दिवस (Mother's Day)
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अनुपमा
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माँ के प्राण बच्चों में बसते रहते हैं
माँ दुआ के हाथ मशीन से चलते हैं
भगवान
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भगवान के गुण , माँ से मिलते हैं
साक्षात भगवान ,माँ में मिलते हैं
माँ की वृध्दावस्था
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मातृ दिवस से झलकता प्यार हमारा दिखावा सा लगता है
सब देखते ,माँ का बुढ़ापा उपेक्षित कोने में सिमटा रहता है

प्राण उनके हम में बसते हैं
हम उन्हें कोने में रखते हैं
--राजेश जैन
10-05-2015

मदर्स डे


मदर्स डे  (पूर्व संध्या पर माँ -बेटे से )
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तन अंश, बेटे हो ,गोद आये थे
तुम घर आँगन में खेल रहे थे
नित दिन नई आशा से सजकर
लगते कल ही ,मेरे बीत गए थे

ये घर आँगन हुए अतीत तुम्हारे
कदम भविष्य ओर बढ़ा चुके हो
पढ़ लिख गए तुम अच्छा ,और
नव निर्माण दायित्व ले चुके हो

करती स्मरण उन पूर्व दिनों को
अश्रु से अँखिया मेरी भीग रही हैं
इतना प्यारा था बचपन तुम्हारा
स्वार्गिक सुख अनुभूति हो रही हैं

तुम ,जैसे ही ,जॉब करने को
वहाँ कई बेटियाँ आई होंगी
तुम्हारे ही तरह छोड़ घर को
वे माँ की दुलरियाँ आईं होंगी

बेटे, स्मरण रखना मुझे तुम
जानना उनकी भी एक माँ है
फ़िक्र बेटी सुरक्षा की उसको
जैसी सताती तुम्हारी माँ को है 

मदर्स डे पे मेरा स्मरण आएगा
मेरे प्रति सम्मान उमड़ आएगा
सम्मान तुम करते नारी का यदि
तो मातृत्व मेरा सम्मान पायेगा
--राजेश जैन
09-05-2015