Saturday, January 10, 2015

अब मैंने भी देखी पीके

अब मैंने भी देखी पीके
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पी नहीं , फिल्म देखी। लेखक  की दृष्टि सिनेमा को, सिने कलाकार को बुराई का पिंड मानने के पूर्वाग्रह (Biased) से ग्रसित है , इस दृष्टि से देखने पर लेखक की निम्न प्रतिक्रियायें हैं -
1. पीके , का किस सीन अब बच्चे अपने पेरेंट्स  साथ सहजता से देख रहे हैं , जल्दी ही भारतीय सड़कों पर ये दृश्य आम हो जायेंगे।
2. कार का जो उपयोग अभी कम ही जानते हैं , इस फिल्म की लोकप्रियता  साथ सब जान जायेंगे। हाई स्कूल के बच्चे अब माँ -पिता  बाइक की नहीं कार की जिद करेंगे।
3. पीना तो पुरुष के लिए भी अच्छा नहीं , अनुष्का के माध्यम से वर्किंग लेडी में ड्रिंक्स को सामान्य रूप में लेने को पीके प्रेरित करती है।
4. विवाह पूर्व सेक्स भी सामान्य सी बात है,  फिल्म द्वारा यह ,पुनः इस रूप में दिखाया गया है।
5. 2 घंटे के साथ में ही , अंतरजातीय , अंतरराष्ट्रीय दो अजनबियों में ऐसा प्रेम हो जाता है कि दूसरे दिन विवाह कर सकते हैं। फिल्म ने यह परोसा है। जिसे फॉलो कर अनेकों युवा मुसीबत गले लगा चुके हैं।

आकर्षक पैकेजिंग -प्रेजेंटेशन
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अच्छी पैकेजिंग में सडा ,हानिकर भी हम  ,मजे से खा लेते हैं। अपना नुकसान करा के विक्रेता /निर्माता को मालामाल बना देते हैं।  ऐसा ही यहाँ है , करोड़ों की पैकेजिंग के साथ , लोकप्रिय कुछ कलाकारों के साथ , हमारे समाज को हानि देते षणयन्त्रों को छुपाकर हमें यही नहीं अनेकों फ़िल्में प्रेजेंट कर रही हैं।

पहली बार लेखक की अति आक्रमकता
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सब धर्मगुरुओं को "रोंग नंबर" बताने वाले , सबमें बड़े  "रोंग नंबर" यही हैं। जी , हाँ ये फिल्म वाले।

"मंदिर, देश में बहुत नारी-पुरुष , जाते हैं !
मस्जिद कुछ कम जाते हैं !
गुरद्वारे और चर्च और कम जाते हैं!
किन्तु सिनेमंदिर जिनमें ये "रोंग नंबर" बैठे हैं!
बडे -बूढ़े नारी पुरुष हर बच्चे जाते हैं "

क्या पाता है बच्चा वहाँ से ?
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माता पिता को भुला वहाँ से
"रोंग नंबर" फैन हो जाता है
और
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वासना लिए घूमता नज़रों में
मर्यादा नारी से भूल जाता है
और भी
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समय बर्बाद फेवरेट के पीछे ,
कर पढ़ने में पीछे रह जाता है

क्या देता , क्या लेता इनसे ?
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इनको प्रौन्नत धन व्यय से करता
स्वयं अभावों से जूझता रह जाता है।

कब तक हम  पैकेजिंग और प्रेजेंटेशन के अंदर के , घातक तत्वों को पहचानने की दृष्टि नहीं पायेंगे। कब तक अच्छे दिखते के प्रलोभनों में आ अपना जीवन , ख़राब करते जाएंगे? कब तक ?

सिने मंदिर की सच्चाई
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ये सिने मंदिर कोई जाये न जाये। सबमे बड़े ये "रोंग नंबर" , टीवी के माध्यम घर घर पहुँचे हुए हैं , करोड़पति बनाने के सपने और सत्य दिखलाने के धोखे में , गर्ल फ्रेंड -बॉयफ्रेंड चक्कर , नारियों में ड्रिंक्स , विवाहेत्तर संबंध आदि  जिसने  भारतीय समाज तंत्र की बुनियाद हिलाकर  रख दीं हैं। धन बटोर कर ये "रोंग नंबर", अपने हरम गरम रख रहे हैं। और पाखण्ड के पोल खोल देने के अभिनय कर स्वयं सबसे बड़ा पाखण्ड या करते हैं।

लेखक ने पहले भी लिखा है
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दुनिया भर की बुराई से आगाह करने के अभिनय करने वाले , सिने और सिने सोसाइटी की बुराई तो बताओ ।

--राजेश जैन
11-01-2015

Friday, January 9, 2015

क्षणिकायें -संकलित

क्षणिकायें -संकलित
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नत मस्तक
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"नत मस्तक हूँ , सत्य सम्मुख
 गर्दन सामने होती है
 जिस दिन लगे छल तुम्हें
यह गर्दन उतार सकती हैं "
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आत्म विश्वास
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"आत्मविश्वास से जब बढ़ते
 वह प्रगति हमें देता है
 अतिविश्वास में लेकिन
खतरा ठोकर का होता है "
बारात और अंतिम यात्रा
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"ख़ुशी देती है उमंग उत्साह
 इसलिये पर लग जाते हैं
 उड़ने की गति चलने से तेज
अतः ख़ुशी में आगे हो जाते हैं
दुःख करता हतोत्साहित
 वेदना से गति थम जाती है
 न मिलते शब्द संवेदना को
 कदम स्वमेव थम जाते हैं "

सठियाना
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"साठ साल की पकी उम्र में
 आशिकी पे कविता लिखेंगे
 युवा आशिकी पर डाका देख
 'मित्र', इसे सठियाना ही कहेंगे "

कोलम्बस नहीं पति महान है
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"जिम्मेदारी नहीं थी तो
 अमेरिका की खोज कर दी
 परिवार बना तो हमने
पत्नी प्रति जिम्मेदारी निभा दी
कभी न कभी तो आता
 अमेरिका दुनिया के सामने
 फ़ालतू रहे कोलम्बस ने
 पहले स्मार्टनेस दिखा दी "

यह दृष्टिकोण भी बनता है
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लड़कियों को भागने को उकसाते हो
 उन पर कलंक लगाकर
 अपने माँ -पिता के मस्तक पर
कलंक का टीका लगाते हो
बदलाव
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"ज़माना , विशाल वस्तु है ,
पूरा एक साथ न बदलेगा
 बदलाव तो होता आया है
सही दिशा इसकी जरुरी है
कमर हम कसलें करने की
 कुछ सही बदलाव हम देखेंगे
 आगामी पीढ़ियों के समाज में
 शेष हम सभी के बच्चे देखेंगे "

बेटी
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"ना जलायें हम अपनी बहुओं को ,
सयानी एकदिन बेटी हमारी होगी "

संवेदना
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"आँसू देने वाला करीब नहीं
 दुश्मन इसलिये दूर होता है
 आँसू पोंछने वाला संवेदना से
प्रभावित कर करीब होता है "
सीखना
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"सीखने की दृष्टि है अगर
 सीखा किसी से भी जा सकता है
 अहं अपना त्यागे तो
छोटों से भी सीखा जा सकता है "
--राजेश जैन
10-01-2015

नारी - पुरुष परस्पर शत्रु ?

नारी - पुरुष परस्पर शत्रु ?
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मंतव्य बहुत स्पष्ट हैं
विचार बेहद स्वच्छ हैं
रिश्तों को बचाने के लिए
अत्यंत सुदृढ़ संकल्प हैं


"नारी चेतना और सम्मान रक्षा " फेसबुक पेज ,  समाज हित और नारी गरिमा की पताका लिए चलने के लक्ष्य से बनाया गया था।


माँ का पुत्र से रिश्ता
पिता का बेटी से रिश्ता
भारतीय पति-पत्नी का रिश्ता
अनायास ही निभता है


गर्लफ्रेंड नाम का रिश्ता
बॉयफ्रेंड जो बनते हैं
रिश्तों की गरिमा की रक्षा
वे कम ही कर सकते हैं


नारी , लगातार छली जाने से , आज उग्र प्रतिक्रियाओं के साथ आ रही है - उनसे एक निवेदन


युध्द नहीं है ,शत्रु को मिटा डालें
खेल नहीं है विरोधी को हरा डालें
संघर्ष नारी शोषण विरुध्द हमारा
शोषण वायरस को हम मिटा डालें


जी हाँ , हम ना तो नारी को और ना ही पुरुषों को मारेंगे
हम प्रबुध्द ,बुद्धिमत्ता से मन में आ बैठी बुराई को मारेंगे


नारी , घर घर व्यथित है, पुत्री की माँ है तो , पत्नी है तो। चालीस , पैतालीस की हो जाने पर  , उनमें से अनेकों अपने गृहस्थी में मन लगा संतुष्ट हो गईं हैं (जॉब  करती हैं ,अतिरिक्त जिम्मेदारी से अतिरिक्त व्यस्त हैं )। नई उम्र की युवती /किशोरी शोषण विरुध्द अति आक्रमकता से आगे आईं हैं। पेज को लोकप्रिय बनाने के लिए ताकि ,अच्छे संदेशों का प्रसारण ज्यादा कर कुछ नारी हित और समाज हित उद्देश्य पूर्ण किये जा सकें , पेज एडिटर की हमें आवश्यकता है।
दोनों तरह की नारियाँ , पाठक तो मिल रही हैं। पेज एडिटर नहीं।  जो , मनीषी नारियाँ हैं , दूसरे के सुख में मिलते आनंद के अलोकप्रिय हो चले तरीके में जिनका विश्वास है , उनमें से पेज द्वारा और एडिटर तलाशें और तराशें ,जायेंगे। इस कार्य में धन नहीं मिलेगा ,समय अपना खर्च होगा। बदले में सिर्फ सामाजिक अपने दायित्वों के निर्वहन का सुख मिलेगा। कैंडी-क्रश /टेलीविजन से बेहतर गेम /मनोरंजन इसमें है। बिगड़ते कुछ सही राह पर आयेंगे।
नारी , पुरुष कोई शत्रु नहीं हैं , विरुद्ध पक्ष मान कर न तो उन्हें तहस -नहस करना है , न ही हराना है। अपनी बुध्दिमानी से ठीक कर परस्पर अनुकूल बनाना है।


--राजेश जैन
09-01-2015

Thursday, January 8, 2015

नारी द्वारा पुरुष पर अत्याचार

नारी द्वारा पुरुष पर अत्याचार
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लेख भारतीय नारी पर ध्यान में रख लिखा जा रहा है , विदेशों में नारी अलग तरह की है। पूर्व आलेखों में , नारी का पक्ष रखने से इस लेखक से ,सभी नहीं किन्तु कुछ पुरुषों ने बहुत पीड़ा अनुभव की है। विशेषकर उन्होंने जिन्होंने विवाह के बाद पत्नी से सामंजस्य ने बैठने पर पत्नी द्वारा न्यायालय में प्रकरण डाले हैं। नारी से इस देश में मुख्यत:, पुरुष दो तरह से पीड़ा पाता है। 
1. 498a में झूठे केस
झूठे केस जब डाले जाते हैं तो आरोप सिर्फ पुरुषों पर नहीं होता है , बल्कि ससुराल पक्ष की नारी (सासु माँ , ननद आदि ) पर भी आरोप होते हैं। अतः यह सिर्फ पुरुष विरुध्द होते हैं ऐसा नहीं है। क्यों उत्पन्न होती हैं झूठे प्रकरणों की संभावना ? कुछ समय पूर्व समाज में दहेज़ प्रताड़ना , उसमें नववधू की हत्या या आत्महत्या को प्रेरित करने के प्रकरण बढ़ गये थे।   तब कानून बनाया गया था । सामाजिक जागृति से और क़ानून के डर से वास्तविक दहेज़ प्रताड़ना के प्रकरणों में अब कमी  है। नई जेनरेशन के युवा भी, अब दहेज़ विरुध्द होते जा रहे हैं। लेकिन क़ानून है और दहेज़ प्रताड़ना के केस अभी भी दर्ज होते हैं , जिसमें ज्यादातर झूठे भी सिध्द हो जाते हैं।
वास्तव में झूठे प्रकरण के पीछे नववधु के चरित्र पर शंका या पति की अति रसिकता में दूसरी युवतियों से संबंध वह कारण होता है , जिसमें नवयुगल के बीच सामंजस्य नहीं बन पाता है। और मारपीट , डाँट डपट और अपमान से वधु मायके चली जाती है , जहाँ बदले की भावना से ,और परिचितों के उकसावे से ससुराल पक्ष पर केस दर्ज हो जाता है। अर्थात नारी द्वारा, जिसे पुरुष पर अत्याचार जिसे कहा जाता है , उसके मूल में फिर दोष पुरुष पर ही सिध्द होता है। क्यों पति , अति रसिक है , विवाह बाहर संबंध रखता है ? यदि पत्नी चरित्र हीन है , तो उसका भी चरित्र , पुरुषों ने ही तो निबटाया है। भले उसके लिए जिम्मेदार पति नहीं , किन्तु अन्य "पुरुष ही" तो हैं।
2. पुरुष अगर नारी से पीड़ित हो तो कोई कानून का और सुनवाई का न होना।
नारी भी कई अपराधी हो जाती हैं।  छोटे मोटे अपराध करती हैं।  वह पुरुषों से तो ताकत में जीतती नहीं , हत्या नहीं करती , पुरुष से जोर जबरदस्ती का सेक्स भी नहीं करती। इसलिए नारी प्रताड़ना का स्पेसिफिक कानून नहीं बना है । सचाई यह है नारी अत्याचार जितने भी होते हैं , उससे सैकड़ों गुणे ज्यादा पुरुष द्वारा अत्याचार होते है , और निर्ममता में भी वे नारी अपराधों की तुलना में हजार गुना होते हैं ।
--राजेश जैन
08-01-2015

पेज एडिटर

पेज एडिटर
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पंख मिले, फड़फड़ा कर ,
उड़ने की चेष्टा करता है
देखें यह उड़ पाता या
जमीं पर ही रह जाता है


पंख कमजोर तन वजनी हो
तो मुश्किल उड़ना होता है
तन हल्का पंख मजबूत तो
उड़ना ऊँचा संभव होता है

नारी चेतना के लक्ष्य से
नारी सम्मान रक्षा के लिए
पंख को मिल रही मजबूती
देखें पेज कितना उड़ पाता है


सच्चाई रही कायम और
निज अपेक्षा नहीं जोड़ी तो
पंख मजबूत तन हल्का हो
ऊँचें गगन तक उड़ पायेगा


लेते हुए प्रबुध्दों को साथ
पेज ये उड़ता ही जायेगा
सन्देश प्रीत , भलाई के दे
नारी-पुरुष मन करीब लाएगा
--राजेश जैन

जी हाँ , साथियों , सच्चे संदेश और आपसे  स्वस्थ चर्चा रखते हुए अब पेज पर हजार से अधिक लाइक आ चुकी हैं।  यानि प्रबुध्दों की रूचि -उत्सुकता जागृत हुई है। यह पेज अपनी आगामी योजना अंतर्गत , आगे के चरण में , मिसगाइड की गई , भोली युवतियों -बहन बेटियों की पीड़ाओं को "नारी चेतना और सम्मान रक्षा "पेज के मैसेज इन बॉक्स में आमंत्रित कर (गोपनीयता साथ उन्हें सन्देश /चर्चा से मार्गदर्शन देने के यत्न करेगा। जिससे उनके अवसाद दूर हो सकें , खो गया उनका आत्मविश्वास फिर वापिस आ सके। जितना भी नुक्सान परिवार और उनकी प्रतिष्ठा को हो चुका , उससे आगे न होने पाये  , उसके उपाय करने की कोशिश करेगा।
 इस तरह की , कॉउंसलिंग के लिये , प्रबुध्द और प्रगतिशील इक्छुक मनीषियों को ,एडिटर रूप में जोड़ेगा। यह प्रोसेस , वर्तमान एडिटर ने अपने अनुभवों से जिन्हें पात्र माना है , उनकी रिकमेंडेशन पर एडिटर बना जाएगा । जो एडिटर के दायित्व को स्वेच्छा से ग्रहण करना चाहते हैं , वे भी मैसेज से इंटरेस्ट प्रेषित कर सकते हैं। नारी वेदना अत्यंत कोमल विषय है , इसलिए इसमें सरल ,छल रहित व्यक्तित्व ही योग्यता होगी। प्रथम चरण में प्रगतिशील नारी एडिटर्स को प्राथमिकता रहेगी।
 इस पेज से स्नेह रखने के लिये धन्यवाद -


--राजेश जैन
08-01-2015

Tuesday, January 6, 2015

कनॉट प्लेस

कनॉट प्लेस
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दिल्ली का हृदय स्थल कनाट प्लेस , एक एम्स में पढ़ती , बेटी के साथ ऐसा होता है वहाँ . उस बेटी की पोस्ट से अंश (निम्न पैरा) लिए हैं , साभार 
"अभी मैं कनाट प्लेस में एक रेस्टोरेंट में बैठी थी. बस थोड़ा सा कुछ भी हल्का-फुल्का खाने का मन था. तभी मेरे सामने वाली सीट पर जिस पर दो लोगों के बैठने की जगह थी वहॉ दो बड़े ही शरीफ से दिखने वाले लोग आके बैठ गए. मैं सोच भी नहीं सकती थी कि वे कोई गलत हरकत करेंगे. आप को जान के अजीब लगेगा कि उनमें से एक ने बहुत तेजी से मुझे इशारा किया जैसे मैं कोई कॉलगर्ल हूं. दूसरा धीरे से बोला कि चलेगी क्या, कितना लेगी..........
सुनकर मई एकदम स्तब्ध रह गयी तभी पहला लड़का फिर बोला बस एक बार हमें खुश कर दो फिर हम तुम्हे मुंहमांगे पैसे देकर खुश कर देंगे।"
राजधानी का हृदय स्थल
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शायद ऐसा कहा जा सकता है , कनॉट प्लेस को।  और उसमें रोग , उपरोक्त पैरा से साफ परिलक्षित होता है। सोच सकते हैं , राजधानी में हाल ये है , देश के हृदय का हाल ये है , कैसे उन्नति कर सकती हैं ? ऐसे देश में नारियाँ।
आधुनिकता
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पाश्चात्य देशों के अनुकरण में , नई जेनरेशन ने आधुनिकता मानी है।  लेखक गया नहीं , कुछ नॉवेल और कुछ फिल्मों से ऐसा ध्यान है , वहाँ , बहुत सहजता से  ऐसे प्रस्ताव कर दिये जाते हैं , लेकिन , न सुनने के बाद पीछे भी नहीं पड़ता कोई। हाँ , सामने पक्ष भी 'यूज़ड टू' होता है , उसको ध्यान नहीं देता।
सँस्कार
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हमारे यहाँ ,ऐसा सुनना ,आहत करता है , युवती को ,  सँस्कार हमारे ऐसे हैं। अपनी बहन -बेटी में हम यही देखना चाहते हैं।
बनायें बहन -बेटी को आधुनिक
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पुरुषों ने स्वयं के लिए पाश्चात्यता अपना ली , खुले आम डिमांड रख दी , लेकिन अपनी पत्नी ने /बहन ने या बेटी ने , किसी लड़के से बात करली तो बुरा मान गये। ऐसा , ज्यादा दिन नहीं चल सकेगा। पुरुष , अपनी संस्कृति की सीमा में आ जाये , नहीं तो नारी ने , पश्चिमी संस्कृति अपना ली तो पछतावे के सिवा कुछ न बचेगा , जब चिड़िया चुग जायेगी खेत।
कॉल गर्ल
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फुसलावे से , प्रलोभनों से , कम पढ़ी -लिखी को , अभावग्रस्त को , या घर से भाग आई को , धनवान पुरुषों ने , (कुछ) भारतीय नारी को ,कॉल गर्ल' बना दिया है। यह आत्मघाती है। कालांतर है ,अब उन्हीं के परिवार से , कोई युवती  , कनॉट प्लेस या ऐसी ही पॉस लोकेशन पर ,कहीं अकेली हो तो उन्हें इस तरह के प्रस्ताव से , अपमानित होना पड़ता है। नारी के हौसलों को हम यदि बढ़ा नहीं सके , नारी उसकी दिशा ठीक न रख सकी तो परिणाम , अत्यंत निराशाजनक भविष्य के रूप में सामने होगा।
--राजेश जैन
07-01-2015

एसिड अटैक



एसिड अटैक
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वर्ष 1985 में , गर्मी की एक रात में 19 वर्ष का एक लड़का , आँगन में सोया था , तब कोई उसके चेहरे पर एसिड डाल गया। अभी उसकी दृष्टि दुनिया देखने की बन ही रही थी , इस अटैक से जीवन भर के लिये उसकी दुनिया अँधेरी हो गई। नेत्र ज्योति खत्म हो गई और चेहरा भी बिगड़ गया। रिज रोड , जबलपुर पर पिछले आठ , नौ वर्ष से वे नियमित किसी-किसी का साथ ले , वॉक पर नियमित आते हैं।
राजकुमार कुरील
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जी -हाँ , लेखक को उन्होंने अपना नाम ये बताया।  आज वे लकड़ी से टटोल अकेले ही वॉक करते दिखे , तब लेखक ने पूँछकर उनका , हाथ थामा। लगभग तीन किमी , चलने के बाद , उनके मित्र मिले ,वे उनके साथ हुए , तब तक उनसे हुये वार्तालाप से ऐसी प्रेरणात्मक बातें पता चली जो ,लिखने के लिए , लेखनी मचल गई।
सुबह सवा चार बजे
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वे जागते हैं , बच्चों के लिए पानी , गर्म करने रखते हैं ,चाय बना लेते हैं , घर आँगन सफाई करते हैं । दैनिक स्नान इत्यादि से निवृत हो , वॉक को निकल जाते हैं।  आठ किमी , घूमते हैं , कहते हैं रिज रोड पर अच्छे लोग मिलते हैं . उनके मित्र , बने लोग रईस हैं . मित्रों को आवाज से पहचान लेते हैं। मैंने  पूछा कौन ने आवाज दी अभी , बोलते हैं -राजीव गुप्ता , ठेकेदार हैं। मैंने पूछा -क्या शौक हैं , कहा विशेष कुछ नहीं , फिर हंसकर बोले -रात में कभी कभी , मित्रों के साथ  बैठ जाते हैं।
शादी
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पूछा , शादी कब हुई ? बोले ,मैंने -शादी नहीं की। पूछा , अभी आप बच्चों की -कह रहे थे ? बोले -भाई के साथ रहता हूँ , उनके हैं। मैंने पूछा -घटना के पहले क्या , किया करते थे ? बोले - टेलरिंग करता था , फिर दुर्घटना के बाद , सदर में स्टैंड चलाकर , तीन भाइयों की शादी करवाई।
29 साल
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पूछा -लम्बा अरसा संघर्ष में गुजारा ? बोले -बैठ जाने से नहीं निकलता। अच्छा -बुरा चलता रहता है। अच्छे ,लोग मिलते हैं। सहारे की बात पर -हँसकर बोले , "तुम बेसहारा हो तो ,किसी का सहारा बनो , तुमको अपने आप ही सहारा मिल जाएगा"
मिसाल
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सबकुछ होकर भी ,नहीं होने का दुखड़ा रो रही दुनिया - सीखे राजकुमार साहब से , आँखे नहीं है , किन्तु निराशा में डूबों के सामने, अपनी कर्मठता से पथ प्रदर्शन का हौसला रखते हैं। आँखे नहीं हैं , साधारण है , रईसों से मित्रता प्राप्त है उन्हें। दोनों बातें सब में हैं ,अच्छाई और खराबी , लेकिन स्वयं मै अच्छा तो मेरे साथ अच्छाई ही करेंगे। आँखे ,न रही ,तब भी जीवन तो है।
हम
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देख नहीं पाते , 1985 की दुनिया ही , लड़कपन की नज़रों की ,तस्वीर बन रह गई . मोबाइल उपयोग करते उन्हें देखा ,फिर  भी नहीं जानते होंगे , कैसा दिखता है।  मैंने कहा फेसबुक पर लिखता हूँ।कहते हुए मैंने सोचा  क्या जानें वे ?-क्या होती है फेसबुक। इतना जान लिया - मै अच्छा हूँ। एसिड फेंकने वाले ने न जाने किस रंजिश का बदला लिया था . आज अगर इन्हें देखता होगा तो अपने किये पर ग्लानि से भरता होगा . किसी भी गलती की इतनी बड़ी सजा शायद नहीं होती . 29 साल का और न जाने कितना और चलेगा अँधेरा यह।   हम अच्छा बर्ताव कर , अनुभव करा सकें कि दुनिया अच्छी है , तो जब वे जायेंगे , यह तो रहेगा उन्हें स्मरण - दुनिया भली भी थी।
--राजेश जैन
06-01-2014