Tuesday, December 9, 2014

Gender Equality

Gender Equality
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अभी हमारी दृष्टि में क्षमता विकसित होनी शेष है।
पुरुष दृष्टि अभी नारी देह को निहारने तक सीमित हो रही है।
जिस दिन नारी मन तक वह दृष्टि पहुँचने लगेगी।
उस दिन उसे अपने और नारी में समानता दिख सकेगी।
तब पुरुष नारी को वस्तु नहीं एक मनुष्य मानेगा।

नारी संघर्ष में विकसित दृष्टि वाले पुरुष का सहयोग मिलता रहा है।
जब यह संघर्ष सही दिशा और लक्ष्य पा लेगा तब नारी -प...ुरुष का पूरा समाज मनुष्य हो जायेगा।
नारी पुरुष दैहिक भिन्नता का अपना अपना महत्व है। नारी और पुरुष दैहिक संरचना में भिन्न होते हुए भी ,
एक जैसे और प्रमुखता से मनुष्य कहे जायेंगे। अभी मनुष्य में जानवर के गुण की विद्यमानता भी है।
जानवर से गुण लोपित होंगे तब पूर्ण मनुष्य हम होंगे और उस दिन से ही मानव सभ्य कहलायेगा।


--राजेश जैन
09-12-2014

माँ -और नारी लाज

माँ -और नारी लाज
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एक राज्य में बढ़ती घटनाओं के बीच , एक युवती पर बलात्कार का अपराधी पकड़ा गया।  राजा ने उसका दंड अपराधी के मुख से सुनकर ही दंड देने का निर्णय किया।  और अपराधी से तीन दिन में अपने दंड हेतु विचार कर बताने को कहा।
माँ को अपने पुत्र की करतूत सुन गहन क्षोभ हुआ। उसे अपने संस्कारों की कमी पर क्रोध आया।  वह राजा से मिली और उनसे कुछ प्रार्थना की। राजा ने विचारोपरान्त उस माँ से सहमति जताई।
दूसरे दिन एक मैदान में एक वृक्ष से उस अपराधी को बाँधा गया फिर अकेला छोड़ दिया गया। कुछ देर बाद मैदान में उसकी माँ आई पुत्र से कुछ बात कर ही रही थी तब एक दुष्ट किस्म का व्यक्ति आया. पुत्र को बँधा देख और अधेड़ स्त्री को अकेला देख वह उससे दुराचार का प्रयास करने लगा , वह माँ गिड़गिड़ाते और रोते इधर उधर भागती रही। उस दुष्ट को नारी लाज की दुहाई दे अनुनय करती रही। दुष्ट ने कोई दया नहीं दिखाई। उसे एक वृक्ष के पीछे खींच ले गया।  दृश्य देख अपराधी पुत्र की आँखे झुक गई , क्रोध और विवशता से वह कांपने लगा ।
कुछ देर में राजा के सैनिक आये जिन्होंने , दुष्ट को काबू किया और माँ को वापिस घर भेजा।
तीसरे दिन राजा ने दरबार लगा कर उसके किये अपराध की सजा पूछी , माँ पर हुए शोषण के साक्षी उस पुत्र ने , अपने लिए मौत की सजा माँगी।
पड़ोसियों ने माँ से पुत्र के समक्ष किये स्टेज में स्वयं के स्थान पर अपनी बेटी को क्यों नहीं भेजा पूछा तो -उस वीर नारी ने कहा , बहन पर यह दुराचार देख , पुरुष समाज अपनी बहन -बेटी का हत्यारा बनता।
लेकिन माँ - पुत्र के पहले होती है इसलिए उसने स्वयं उस स्टेज को अंजाम दिया।
--राजेश जैन
09-12-2014

Sunday, December 7, 2014

Candy Crush

Candy Crush
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candy crush गेम खेलते और वर्ग पहेली (cross word puzzles ) हल करते भी समय निकाला जा सकता है ,यह तब उचित है जब समक्ष कोई समस्या नहीं है। किन्तु यदि समक्ष समस्यायें हैं तो इनसे बेहतर उन life puzzles (जीवन पहेली ) सुलझाने में समय लगाना है।

समाज समस्यायें किसी पहेली या गेम से कम मनोरंजक नहीं हैं। इन्हें play (खेलने) करने या solve (हल ) करने में entertainment (मनोरंजन) और satisfaction (संतोष )  इन गेम या पज़ल्स से कम नहीं ज्यादा मिलता है।

हर जगह धन से ही कुछ किया जा सकता है ऐसा भी नहीं है . निःसंदेह प्रत्यक्ष सहायता धन से सरल है . किन्तु अप्रत्यक्ष सहायता समाज और देश में (बल्कि विश्व में भी ) सच्ची वैचारिक क्षमता बनाना है। सही सोच सभी में प्रेरित करने से जब अधिसंख्य सही तरह से समझने के योग्य होंगे तो स्व-अनुशासित होंगे और बुराइयों को बढ़ाने में नहीं अपितु कम करने में योगदान देंगे . जिससे अनेकों समस्याओं और बुराइयों का स्वतः ही अंत होता है। इसमें धन नहीं खर्च होता है लेकिन सहायता का क्षेत्र विस्तृत होता है। अरबपति भी चाहें तो कुछ हजार पीड़ितों की ही सेवा सहायता कर सकते हैं , जबकि ऐसी वैचारिक प्रेरणाओं से जब दृष्टिकोण सुधरता है तब हित - अनेकों का होता है , कई पीढ़ियों का होता है।

आप चाहें तो solve करें या खेलें निम्न प्रश्नों को गेम या puzzle रूप में , कि कैसे आये /हो सके ?

1. नारी चेतना और सम्मान रक्षा
2. प्रेरणा मानवता और समाज हित
3. कैसे हों सभी -"सम्भ्रांत "

बहुत समय निकलेगा स्कोप अनन्त है , मनोरंजन और संतोष बहुत है। बस आवश्यकता अपने को समस्या-मुक्त (बुराई मुक्त भी ) मानने की नहीं है . बुराई और समस्या से घिरा यह समाज है उसी समाज के हम अंग हैं।यदि हमारी स्थिति अच्छी है जिससे हम सुरक्षा और बुराई से रक्षा करने में समर्थ अनुभव करते हैं तो ऐसी हमारी स्थिति तो हमारा सौभाग्य है जब हम सरलता से इन दायित्वों को निभा सकते हैं।

--राजेश जैन
07-12-2014

Saturday, December 6, 2014

विचारणीय प्रश्न
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एक आदरणीय ने कुछ दिन पूर्व चर्चा में कहा …आपको क्या लगता है आप सबको बदल सकते हो?
इस सीधे प्रश्न को मै तैय्यार न था .... हड़बड़ा कर कहा - नहीं !

प्रश्न विचारणीय था , विचार किया , उत्तर तब भी यही है - "नहीं" , कोई सभी को अपने तरह से नहीं बदल सकता।

लेकिन
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आठ अरब जीवन में से एक जीवन का महत्व नगण्य (negligible) ही होता है , ऐसे में एक मनुष्य जीवन इस असंभव प्रयास में जाया हो भी जाए तो क्या अंतर पड़ता है। लेकिन ऐसा विफल प्रयास भी तब ही उचित है जबकि वह मानवता और समाज हित के प्रयोजन में लगाया जाये।

--राजेश जैन
07-12-2014

Friday, December 5, 2014

5 Dec.

 5 Dec.
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आज 5 Dec. है , मेरे एक फ्रेंड की पत्नी का जन्म दिन , लगभग 15 वर्ष की पत्नी द्वारा स्मोकिंग पर आपत्ति और रोकटोक के बीच मेरे फ्रेंड ने पिछले वर्ष स्मोकिंग छोड़ने का प्रण कर अपनी पत्नी को बेशकीमती उपहार दिया था। प्रसन्नता में इस पर ऐसा एक आलेख भी मैंने इसी पेज पर लिखा था।
कुछ दिनों पूर्व उन्होंने मुझे सखेद बताया था , वे निभा नहीं सके हैं ,उन्होंने स्मोकिंग पुनः आरम्भ कर दी है। मैंने मन में बुरा माना किन्तु प्रत्यक्ष में मुस्कुराकर कहा 5 Dec. इस वर्ष भी आएगा ,भूल सुधार का अवसर ना चूकना।
आज 5 Dec. है ,आशा है फिर एक बार मेरा मित्र अपनी पत्नी को यह बेशकीमती उपहार अवश्य दे पायेगा।
लिखने का दूसरा अभिप्राय भी है , थोड़ा भी भला कर पाना और भला को निभा पाना कितना दुरूह (कठिन) हो गया है।  इसको ध्यान में रख बुरा कुछ करने के पहले हमें अनेकों बार सोचना चाहिए।  बुरा किया तो आसानी से जाता है , लेकिन जब उसे मिटाने का और भला करने की बारी आती है तो वह कितना कठिन हो जाता है।
स्मोकिंग एक अस्वास्थ्यकारी बुराई है जो स्वास्थ्य हानि के साथ अनावश्यक व्यय का कारण होती है और पति -पत्नी के बीच अनुराग के समय के बीच व्यर्थ तकरार के कारण उत्पन्न करती है।
--राजेश जैन 
05-12-2014

नारी चेतना और सम्मान रक्षा

नारी चेतना और सम्मान रक्षा
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सभ्यता की ओर बढ़ती मानव यात्रा कभी ना समाप्त होने वाली यात्रा है। 
हम अभी भले सभ्य कहला रहे हैं , लेकिन बहुत कम ही सभ्य हैं.
जितने सभ्य हैं उतने उच्च सभ्य थोड़े कुछ ही हैं। अधिकाँश उससे समय पैमाने पर शताब्दियों वर्ष पिछड़े हैं।
जिन्होंने धन और प्रभाव की शक्ति किन्ही कारणों से प्राप्त करलीं हैं , वे मानव सभ्यता यात्रा में दिशा भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं.
वे अपने प्रभाव में उन कर्मों और आचरण की तरफ ही अन्य सभी को हाँकने का प्रयास कर रहे हैं।
ऐसा सदाकाल से होते आया है कोई नई बात नहीं है।
सभ्यता के मार्ग पर बढ़ते सच्चे सभ्य ,सभ्यता के पथ निरंतर निर्मित करते आगे बढ़ते जाते हैं.
और सभ्यता के भ्रम पैदा करते छद्म-सभ्य उन पथ पर  छूट पीछे रह जाते हैं , एक धुरी पथ में घूम वहीँ थम जाते हैं.
दिशा भ्रम के जिन कर्मों और आचरण का उल्लेख ऊपर किया है वह अति स्वच्छंदता का है।
जिसमें प्राणी अपनी 1.) मनमानी ही करने को प्रवृत्त रहता है और 2.) उदर पिपासा और 3.) काम पिपासा में अत्याचारी होता है।
यदि गौर किया जाए तो ऐसा जानवर का स्वभाव होता है.यदि ऐसी स्वच्छंदता की तरफ कोई बढ़ता है तो कैसे सभ्य हो सकता है ?
जबकि जानवरों सा रहकर क्रमशः स्वच्छंदता छोड़ न्याय और दया पर बढ़ता मानव सभ्य कहलाया है।
लेखक ने इस पेज ("नारी चेतना और सम्मान रक्षा ") के माध्यम से "सभ्यता की ओर बढ़ती मानव यात्रा कभी ना समाप्त होने वाली " क्यों बताया है उसका लेख अभी
अति संक्षेप में ऐसा है -
"सभ्यता की मंज़िल दूर है , जिस दिन तक स्थूल दृष्टि रख पुरुष ,नारी में उसके तन और रूप तक ही निहारेगा
(ऐसा दूसरे पक्ष से भी पढ़ा -समझा जाए ) उसकी मन की थाह पाने में विफल रहेगा।
उसमें तन की कुछ भिन्नता के अतिरिक्त मन की समस्त अपेक्षाओं में अपनी जैसी समानता नहीं दिखने लगेगी
उस दिन तक वह मानव सभ्यता के उत्कर्ष पर नहीं कहलायेगा। जिस दिन पुरुष दृष्टि इतनी समर्थ हो जायेगी वह नारी मन में भी
-सम्मान की अपेक्षा देख लेगा वह क्रमशः न्यायप्रिय होने लगेगा दिन से नारी पर पुरुष शोषण के किस्सों पर स्वतः विराम लग जाएगा (इसे भी दूसरे पक्ष से पढ़ा -समझा जाए )।
उस दिन नारी को समान अधिकार देने उसे अपने समान मानने में उसे कोई झिझक नहीं होगी।
जब तक वह दिन नहीं आएगा, मानव कमतर सभ्य ही माना जाएगा। "
नारी -पुरुष रिश्तों से अलग उदरपूर्ती , स्वास्थ्य सुविधा , मूल भूत अन्य आवश्यकतायें भी विषय हैं , जिनकी अपूर्णता और अपर्याप्तता  असभ्यता ही है।
उन पर चर्चा किसी और समय "प्रेरणा -मानवता और समाजहित " पेज से की जायेगी। 


--राजेश जैन
04-12-2014

Wednesday, December 3, 2014

नारी पुरुष सदैव परस्पर पूरक हैं

नारी पुरुष सदैव परस्पर पूरक हैं
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बेशक बेटे की कामना छोड़ो
बेशक भाई को भी तुम भूलो
पुरुष छल से व्यथित हे नारी 
पिता पुरुष तुम्हारा ना भूलो


मै पुरुष चाहो मेरा
विश्वास ना करना
धोखा खाये हमसे
विश्वास ना करना


संस्कारों पर अपने
तुम विश्वास करना
पुत्र न छले नारी को
उसे संस्कार दे देना


नारी पुरुष प्रकृति से बने पूरक हैं
जुदा नहीं हो सकते ऐसे पूरक हैं
अविश्वास के कुकृत्य मिटा डालो  
नारी पुरुष सदैव परस्पर पूरक हैं


सतर्कता रख न तुम छली जाओ
नई संतति में नई चेतना लाओ
नारी कृतज्ञ अभी पुरुष जीवित हैं
साथ उनके नई बुनियाद बनाओ


नारी गर अलग तुम हो जाओगी
न सृजक विध्वंसक कहलाओगी
सृष्टि में मानव प्रजाति के लिए
लुप्तता की दोषी बन जाओगी


सहनशीलता तुम्हारी इतिहास कहता है
वीरता बखान तुम्हारी इतिहास करता है
रच सकती हो तुम नया समाज इतिहास 
मानना अवश्य मेरा विश्वास कहता है


-- राजेश जैन
03-12-2014