Friday, August 15, 2014

भारतीय बच्चे

भारतीय बच्चे
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जब तक माँ -पिता की छत्रछाया रहती है , ये अगर पचास -साठ वर्ष के भी हो जायें , उनके समक्ष बच्चे ही होते हैं.
जीवन भर अपने माँ -पिता के त्याग - निस्वार्थ उनके लाड़ का स्मरण रखते हैं।
कितने भी बड़े पद - हैसियत के हो जायें , उनके समक्ष छोटे ही होते हैं।  आदर उनके लिये आजीवन रखते हैं।
उनकी असहाय (आश्रित) अवस्था में भी अपने पास ही रखते हैं।  वृध्दाश्रम में नहीं भेजते हैं।
उनकी सेवा-सहायता को व्यस्तता में भी तत्पर होते हैं।
अपनी निज महत्वाकांक्षाओं को भुला , आवश्यकता हो जाये , तो जीवन के कुछ वर्ष उनको समर्पित करते हैं। अर्थात अपने जीवन के वर्ष , उनकी आयु बढ़ाने को दे देते हैं।

यह वो संस्कृति होती है। जिसमें परिवार ,समाज और माटी (इस देश) में , त्याग , विश्वास , भाईचारा और परस्पर स्नेह की पावन गंगा अनवरत बहती है।

                                                  "धन्य हमारी भव्य संस्कृति है
                                                  अन्य को जीवन आधार देती है
                                                जीवन यहाँ मनुष्य का मिला तो
                                                अन्य जीव पुष्टि की प्रेरणा देती है "


इस संस्कृति का बचाव किया जाना मनुष्य अस्तित्व (मानवता ) के लिये बेहद आवश्यक है।

हम भारतीय हैं . अहो भाग्य ,यह दायित्व हमारा है।

-- राजेश जैन
15-08-2014

Wednesday, August 13, 2014

भारतीय माता-पिता

भारतीय माता-पिता
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अपनी छोटी सी आय में ,छोटे घरों में , परिवार के भरण -पोषण की व्यवस्था हेतु संघर्षरत रहते हैं. बच्चों को उच्च संस्कार और शिक्षा दिला पाने का अधिकतम प्रयास आजीवन करते हैं।
बच्चे उनको दिये हुये विश्वास को अगर बनाये रखते हैं।  इतने में ही गौरवान्वित होते हुये अपने जीवन को धन्य मानते हैं।
पूरे विश्व में इस तरह की पैरेन्टिंग ( माँ-पिता बनने ) की निस्वार्थ मिसाल सिर्फ भारतीय माता-पिता ही प्रस्तुत करते हैं।  इस संस्कृति का बचाव किया जाना मनुष्य अस्तित्व (मानवता ) के लिये बेहद आवश्यक है।

हम भारतीय हैं . अहो भाग्य ,यह दायित्व हमारा है।

-- राजेश जैन
13-08-2014
 

Sunday, August 10, 2014

नारी -आधुनिक परिधान और बढ़ते अपराध

नारी -आधुनिक परिधान और बढ़ते अपराध
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नारी की देश और समाज में दशा सुधारने या उन्हें शोषण और अत्याचार मुक्त करने का विषय उठाया जाता है , तब कुछ तर्क उठाये जाते हैं। जिसमें प्रमुख उनकी वेशभूषा / परिधान को देश में होने वाले उन पर शोषण का कारण बताया जाता है।
लेखक ऐसी अनेकों नारी का उदाहरण दे सकता है , जो समय /समय में विभूषित तो आधुनिक परिधान (जीन्स ,गाउन आदि ) में होती हैं और शीलवान भी होती हैं।  इसके विपरीत परम्परागत परिधानों में भी नारी को शील से भटका हुआ भी देखने में आता है।  अतः कहा जा सकता है कि सुशीला होना परिधान निरपेक्ष होता है।
जब आधुनिक परिधान पर नारी विरुध्द अपराध का कारण आरोपित किया जाता है।  तब पुरुष अपनी कमजोरी से ध्यान बँटाता प्रतीत होता है। क्योंकि अपराध तो छोटी छोटी बच्चियों के साथ भी हो रहे हैं. कुछ हद तक इस तर्क को माना भी जाये तब भी इन अपराधों के उन्मूलन का यह बहुत ही सतहीय उपचार लगता है।
पुरुष की नारी विरुध्द दुष्टता के दूसरे कारण जड़ में हैं। उन जड़ों को पहचान कर उन्हें नष्ट करने पर ही नारी को हम अपनी संस्कृति अनुरूप गरिमा और आदर दे सकेंगे। और स्वयं अपने परिवार का सुख सुनिश्चित कर सकेंगे।
वास्तव में देश में फिल्मों के अस्तित्व में आने के बाद नारी शोषण के अपराध क्रमशः बढ़ते गए हैं।  फिर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर वल्गर सामग्री की उपलब्धता और पुरुष वासना -जनित सोच में उसे स्कूल /कॉलेज में पढ़ती तथा आजीविका को बाहर निकलती नारी तक पहुँचाने की कुत्सित प्रवृत्ति इन अपराधों की जड़ है।  इसमें नशाकारक सामग्रियों का सेवन पुरुष ( और फुसलाई गयी नारी) द्वारा कर लेना कैटेलिस्ट (उत्प्रेरण) का काम करता है। इन कारकों के प्रभाव में पुरुष दृष्टि ख़राब होती है।  वह हर नारी को वासना की दृष्टि से देखता है।  अधिकाँश पुरुष घर-परिवार की पृष्टभूमि और अपनी सामाजिक स्थिति को ध्यान में रख एक मर्यादा का निर्वाह करते हैं। लेकिन कुछ अनुशासन और मर्यादा को ताक पर रख छिछोरेपन पर उतरते हैं। उन्हें दिखती हर नारी वासना पूर्ती का साधन ही लगती है।  पास -पड़ोस और सगे संबंधों को भी वे विस्मृत करते हैं।

आवश्यकता ऐसे कारकों की उपलब्धता पर नियंत्रण की है।  पुरुष जो जन्म किसी परिवार में लेता है। कोख से जन्मा नारी से होता है।  परिवार में यदि रहता है तो नारी भी उसके परिवार की अंग होती है। वह झूठे बहानों/तर्कों का सहारा लेने की जगह यदि इन वस्तुओं का अस्तित्व मिटाने का साहस और इक्छा शक्ति का परिचय दे सके तो ही यह देश भव्य सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप मार्ग और दिशा में लौट सकेगा।  अन्यथा हर परिवार की नारी पर उसके विरुध्द अपराधों की आशंका रहेगी। और वह परिवार का भाग्य ही होगा कि उनकी परिजन नारी निर्दोष और शीलवान जीवन जी सकेंगी।

लेखक पुरुष है , नारी क्या सोचती और समझती है।  उसकी राय /मत बिना लेख अधूरा ही होगा।  स्वस्थ चर्चा अपेक्षित है।

--राजेश जैन
10-08-2014

Saturday, August 9, 2014

मानसिक कुण्ठायें

मानसिक कुण्ठायें
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ग्लैमर पसंद इस युग में सिध्दांत , नैतिकता और न्यायप्रियता ताक पर रख छोड़ी गईं हैं. योग्यता से अधिक अति महवकांक्षाओं के शिकार हो सभी अधिक से अधिक ऐशो-आराम के सामान जुटाने के चक्कर में अति व्यस्त हो गए हैं। वासनापूर्ती की प्रधानता वैचारिकता पर हावी है।  सभी प्रयास (भ्रष्ट और अनैतिक भी ) के बाद भी अर्जित धन ,ऐशो-आराम और वासनापूर्ती की अतृप्त पिपासा को मिटा नहीं पाता है।  परिणामस्वरूप  मानसिक कुण्ठाओं का बसेरा मनो मस्तिष्क में होता है।नारी को गरिमा प्रदान नहीं की जाती है।  उसको फुसलाया जाता है। फिर नारी शोषण के नित नए किस्से देश को देकर इस पीढ़ी के लिखे जाने इतिहास को कलंकिंत कर रहे हैं। नारी को एक लज्जाजनक जीवन जीने की विषम परिस्थिति में ला छोड़ रहे हैं।  तब भली बातें और अच्छे विचार के प्रति भी प्रतिक्रियायें गन्दी होती हैं।  कुंठित मन अच्छे सन्देश ग्रहण नहीं कर पाता है।
कभी अनुकूलताओं का वह दौर भी लगातार चलता है।  जिसमें अच्छी बातों को भी ध्यान में नहीं लाया जाता है।  दोनों तरह के ( अति आशा और निराशा वादी ) भली बातें और अच्छे विचार के हास्य -उपहास में टालते हैं।  ऐसा समझाने वाला या लिखने/कहने वाला के प्रति कोई आदर ना दिखाते हुए उस स्वस्थ -परोपकारी मना व्यक्ति की हँसी उड़ाई जाती है।  हमारी संस्कृति की परम्पराओं से विपरीत अपसंस्कृति के प्रभाव में एक बेहद निकृष्ट सा जीवन जीकर उसमे अच्छाई और महानता दिखाना आज आम बात है।
फिर भी इस समाज और देश में ऐसे भले- परोपकारी ऑनेस्ट व्यक्तिओं की आवश्यकता रहेगी।  जो ऐसा कर रहे हैं वास्तविक नायक वे ही हैं।  उन्हें चुनौतियों/अनादर से घबराना नहीं चाहिये।  ऐसे सभी महामनाओं को लेखक का नमन है।

--राजेश जैन
09-08-2014

Friday, August 8, 2014

धरोहर

धरोहर
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कोई धरोहर किसी की अपने पास हो जितनी शीघ्र लौटाई जा सके अच्छा होता है।
अपवाद हैं ,इसके।  जिनमें से एक हमारा जीवन होता है।  जो सृष्टि की धरोहर होता है।  इसे लौटाने के पूर्व इस (जीवन ) को सार्थक करने के लिये दीर्घ रखने की आवश्यकता होती है।  सार्थक करने की सीमा अनंत होती है।  जितना अधिक हम कर सकें उतनी जीवन सार्थकता हमें लानी चाहिये।

--राजेश जैन
09-08-2014

Thursday, August 7, 2014

मानवतावादी /नैतिकता की मूर्ति

मानवतावादी /नैतिकता की मूर्ति
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जीवन में प्रतिकूलतायें भी आती है।  लेखबध्द कर पब्लिश करने की सोच इस बात से प्रेरित है कि अनुकूलताओं में कई बार इन विपरीत परिस्थितियों की कल्पना नहीं करते हुये, हममें से अनेकों स्वास्थ्य ,धन और समय व्यर्थ गँवाते हैं। इस तरह के लेख जिनके दृष्टि/पढ़ने में आते हैं।  वे अनायास कुछ ग्रहण कर अनुकूलताओं के दिनों में अपने को मजबूत बनाते हैं। फिर प्रतिकूलताओं का सामना कर्तव्यनिष्टा , साहस , नैतिकता और न्यायपूर्ण ढंग से करते हैं।

वे महान भी बनते हैं।  समाज और पीढ़ियों का पथ-प्रदर्शन भी करते हैं।

आपके प्रोत्साहन के कमेंट , मुझमें उत्पन्न हो रही एक लेखक /विचारक/मानवतावादी और नैतिकता की मूर्ति को तराशने में सहायक होते हैं। (कृपया आत्म-प्रशंसा ना समझी जाए )

हार्दिक आभार , धन्यवाद

--राजेश जैन
08-06-2014

कर्तव्यपालन

कर्तव्यपालन 
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माता-पिता वृध्द हों. गंभीर स्थिति में उपचार के लिये अस्पताल में रहना हो और करने वाले पुत्र/पुत्री का परिवार छोटा हो. तब परिवार को एक साथ कई परेशानियों से दो चार होना पड़ता है.
1.  अपने माता-पिता को गंभीर कष्टों में से जूझते /सहन करते देखना असहनीय होता है।
2.  बहु-बेटे / (या पुत्री-दामाद- आजकल के परिवार में संतान सिर्फ पुत्री भी होती है)   दोनों को अस्पताल और घर की व्यवस्था देखनी होती है। अगर ये भी प्रौढ़ावस्था में हों तो एक दूसरे पर आये भार का संतुलन इस तरह से बनाना होता है ताकि दोनों स्वस्थ बनें रहे। अन्यथा अनफिट हो जाने पर माता-पिता की सेवा कठिन बेहद हो जाती है।
3.  पहले से इन स्थितियों को भाँप कर बचत कर रखी हो तो ठीक है , अन्यथा अत्यंत महँगे हो गये अस्पताल शुल्क / दवाओं पैथोलॉजी के खर्चे उठाना मुश्किल होता है। बचत भी एकाएक बढ़ जाती महंगाई में अपर्याप्त हो जाती है।  इष्ट-मित्रो के सामने हाथ पसारने की स्थिति बनती है।  कई मानसिक द्वंदों को झेलना कठिन चुनौती होती है। इन सब से करने वाले की सेवायें और स्वयं के स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित होता है।
4. परिवार का व्यवसाय / कार्यालीन सेवायें चौपट होती है।  व्यय तो अतिरिक्त होते है।  चलती आ रही आय का ठिकाना नहीं रह जाता है।
4.  पहले रही पारिवारिक प्रसन्नता का बसेरा अचानक उठ जाता है।  परिवार सिर्फ दुःख - चिताओं का समय देख रहा होता है
अब तक परिवार का जीवन मधुर, सरल/सुहावन और अनुकूलता में चलता रहा होता है।  वे दृश्य ओझल होते हैं।अब हर कुछ जो हो रहा होता है ,एक से बढ़कर एक विपत्ति लाता है। अर्थात आशा कम , निराशा अधिक लाता है।

ये जीवन की वे चुनौतियाँ होती है , जब बीत रही होती हैं तो कोई पार ही नहीं लगता। लेकिन जीवन यथार्थ यह है सुख और दुःख दोनों के दिन स्थायी नहीं होते इसलिये इस विषमतम समय का भी पार आता है।  जो कर्तव्य पालन करने का गहन आत्मिक सुख प्रदान करता है।  जीवन में सुख और दुःख दोनों का महत्त्व होता है।  इनसे समता भाव से जूझ लेना अच्छा जीवन सबक होता है।  जो मानव में सज्जनता लाता है .कर्तव्यपालन की हिम्मत देता है। मानवता इस तरह पुष्ट होती है। ऐसे सज्जन लोगों से देश और समाज स्वस्थ रहता है।

--राजेश जैन
07-08-2014