Friday, June 20, 2014

जोसेफाइट

जोसेफाइट
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बेटी को बैंगलोर से जबलपुर आना था , मुंबई में फ्लाइट बदलनी थी। प्लेन की खराबी के कारण आफ्टरनून की मुंबई-जबलपुर फ्लाइट कैंसिल हो गई , घंटों एयरपोर्ट पर बैठे रहने के बाद ,रात्रि में होटेल में रूम दिया गया। रूम शेयर किया बेटी ने  सीनियर "जोसेफाइट" (सेंट जोसेफ कान्वेंट पढ़ी ) ऑन्टी के साथ। वे ऑस्ट्रेलिया से अपनी माँ से मिलने जबलपुर आ रही थी। माँ रिज रोड ,जबलपुर में निवासरत हैं।  रात्रि दोनों  जोसेफाइटस  के बीच चर्चा होती रही।

सुबह जबलपुर एयरपोर्ट पर बेटी को रिसीव करने मै गया था। डुमना एयर स्ट्रिप से बाहर आते बेटी के साथ उन्होंने मुझे देखा , बेटी से पूछा- योर फादर ? बेटी के हाँ कहने पर मुझसे मुखातिब हुईं ,  कहा, यू आर वेरी लकी , बहुत अच्छी है आपकी बेटी , बहुत सुलझी सोच और कितने सुन्दर जीवन लक्ष्य हैं इसके।

एक पिता का सीना कितना फूलता है , बच्चे की प्रशंसा अपरिचित से सुनकर, यह अनुभूति बहुत निजी और आनंददायी थी। आपमें से अनेकों ने अवसरों पर ऐसा अनुभव किया होगा।

उन आदरणीया से वार्तालाप बहुत संक्षिप्त था , उन्हें सिर्फ धन्यवाद ही कह सका था।  लेकिन बिना पैसे खर्च किये किसी को हम कितना आंनद दे सकते हैं , सिर्फ सच्ची थोड़ी सी प्रशंसा करने से , यह हमें उन जैसे उदारमना व्यक्ति से सीखना चाहिए। (वैसे उन्होंने सीनियर जोसेफाइट होने से एयरपोर्ट पर रिफ्रेशमेंट का पेमेंट स्वयं किया था , बेटी (उनकी वर्षों जूनियर ) को नहीं करने दिया था ) .

वास्तव में यह प्रशंसा, अनुमोदन है सच्ची राह का, जो हमारे युवाओं और बच्चों को नेक राह का पथगामी बने रहने का मनोबल देता है।

--राजेश जैन
21-06-2014

Friday, June 13, 2014

भारतीय चरित्र

भारतीय चरित्र
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चैतन्य , अपने बड़े होते बेटे को , महापुरुषों के सद्कर्मों की और उनके जीवन में घटे सद्प्रेरणा (देने) वाले प्रसंग बताया करता था , जिससे बेटा 'उचित ' , की मानसिक जीवन बुनियाद आदर्श बन सके।
आज चैतन्य , अपने बेटे उचित के साथ बैठा था तब उसने पूछा , बेटे उचित,  क्या तुम जानते हो एक महापुरुष इस देश में राष्ट्रपिता कहे जाते हैं ?
उचित … जी हाँ पापा जानता हूँ।
अब चैतन्य उस महापुरुष के बारे में एक सच्चाई  उचित को बताने लगता है।
बेटे , उस महापुरुष ने अपनी माँ से किये वादे के कारण आजीवन देश और विदेश में रहते कभी शराब का सेवन नहीं किया था  , जबकि उन्हें ऐसे कई कार्यक्रम (अवसरों पर) में रहना होता था जहाँ शराब का सेवन अनेकों लोग करते थे।  जानते हो उनके परिवार की ही विडंबना के बारे में ?
उचित --- क्या पापा ?
चैतन्य -- बेटे , वह महापुरुष सभी को तो शराब छोड़ने की प्रेरणा देता लेकिन उनका स्वयं का बेटा अत्यधिक शराब सेवन करता था।  बेटे, देश लिए संघर्ष करते उन्होंने प्राण तक गवायें , किन्तु अपने बेटे को ही व्यस्तता के कारण वे खानपान की अच्छी प्रेरणा दे सकने में असमर्थ रह गये थे।
उचित -- तब तो पापा , यह अत्यंत  दुर्भाग्य पूर्ण था , जिसे राष्ट्र ने पिता माना वे , घर में अपनी संतान से ही पिता का आदर नहीं पा सके ।
चैतन्य -- हाँ बेटे , तुम मेरा पिता होने का एक सम्मान ,मुझे दे सकोगे ?
उचित -- पापा , अवश्य बताईये कैसे मै , यह सम्मान आपको दे सकूँगा ?
चैतन्य -- बेटे तुम  जीवन में उच्च सिद्धांतों का निर्वाह करना , आदर्शों की मिसाल पेश कर  "भारतीय चरित्र " का एक आइकॉन बनना। जो आज भारत की पवित्र माटी से विलीन होने की कगार  पर है।
उचित -- जी पापा , मै अवश्य यह करूँगा।  यह कहते हुये उचित की आँखों में संकल्प के भाव दृष्टव्य थे।

लेखक ने उपरोक्त लघु कथा में तो पात्र चैतन्य से सच्चा "भारतीय चरित्र "  बनने की प्रेरणा अपने बेटे(उचित)  को ही दिलवाने का अपेक्षा उल्लेखित की है।  लेकिन कथा के बाहर लेखक यह अपेक्षा सम्पूर्ण आज के समाज से करता है , कोई चाहे पुरुष हो अथवा नारी और युवा हो या वरिष्ठ  वह भारतीय होने से जीवन में  "भारतीय चरित्र " चरितार्थ करे।

राजेश जैन
13-06-2014

 

Wednesday, June 11, 2014

माँ की आज्ञापालन का यह कैसा दंड

माँ की आज्ञापालन का यह कैसा दंड
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उस काल में विलायत से शिक्षा प्राप्त करने जाना , इसका मतलब पाँच सात वर्षों तक अपनी जन्मभूमि से कट जाना होता था।  समाचारों का परिवार आदान -प्रदान पत्रों (डाक) के माध्यम से होता था। विलायत में पढ़ाना अत्यंत खर्चीला था अतः भारत से बिरले ही शिक्षा को जाया करते थे। हालाँकि "फॉरेन रिटर्न्ड" की एक बहुत ही सम्मानीय पहचान आजीवन एक बड़ी उपलब्धि होती थी।

ऐसे में उसे विलायत भेजा जा रहा था। माँ का दुःख अवर्णीय था। उन्हें सबसे ज्यादा चिंता इस बात की थी , बेटे का खानपान बिगड़ जायेगा। उन्होंने जाते हुये बेटे को शिक्षारत रहते शराब ना पीने की आज्ञा दी। बेटा भी माँ भक्त था। माँ की इस आज्ञा का विलायत में भी और आजीवन पालन किया।

नाम लिखने की आवश्यकता नहीं , वह इस माटी का ऐसा सपूत था। जो विश्व में सर्वाधिक जाना जाने वाला भारतीय रहा है और शायद रहेगा भी। उनके किसी कर्म या योगदान पर लेख में कोई टिप्पणी ना करते हुये लिखूँगा। ( विवाद अनेकों खड़े किये जाते हैं , यह लेखक इस लेखनी को विवादों से परे रखना चाहता है ).

कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें सम्मान दिया। वे भारतीय करेंसी पर छपते हैं। उस करेंसी का प्रयोग शराब के विदेशी ब्रांड के देश में प्रमोशन के लिये , उसके व्यवसाय पर और उसके ख़रीदे जाने पर बहुत अधिक होता है। क्रिकेट टीम अपनी जीत पर शैम्पेन खोल सेलिब्रेशन करती है।

देर रात्रि चलने वाली पार्टी में उसी करेंसी से मदिरा का दौर चलता है। बच्चों के लिये कुछ अच्छा घर तक ले जाये या नहीं , मुखिया कमाई (करेंसी ) का बड़ा हिस्सा उस पर खर्च कर लड़खड़ाता घर पहुँचता है।

बात , लड़खड़ाते घर पहुँचने या पार्टी में मौज मस्ती पर ही रुक जाती शायद कम चिंताजनक थी। पी गई शराब से नीयत और दृष्टि ख़राब कर भारतीय नारी की लाज भी तार तार करने के अनेकों केस हो रहे हैं। उसके प्रभाव में दिमाग पर नियंत्रण खोकर अनेकों दुर्घटनायें सड़कों पर होती हैं।

यही नहीं आज कॉलेज में पढ़ती और शिक्षित हो निकलती (कुछ ) नारी भी भारतीयता छोड़ शराब और सिगरेट में अपनी आधुनिक पहचान मानती है।

माँ की आज्ञा मान उनने अपने कर्म और आचरण से जो उत्कृष्ट योगदान राष्ट्र को दिया , उसके एवज में उन्हें मरणोपरांत करेंसी पर विराजित कर दिया गया। जो शराब के सिलसिले को भारत में बढ़ाने के लिए बहुत अधिक मात्रा में प्रयोग की जा रही है।

वह माँ कैसा अनुभव करती , अगर अपने निष्ठावान बेटे को उस मुद्रा पर छपा देखती , जिसका प्रयोग भारतीय संस्कृति के तिरस्कार में ज्यादा होने लगा है।

माता निष्ठ उस बेटे , और उस माँ के सम्मान लिए क्या देश में आगामी "मदर्स डे " से नई छपने वाली करेंसी से उनका फोटो अलग करना चाहिए ? इस पर हम विचार करें .......

राजेश जैन
11-06-2014

Tuesday, June 10, 2014

फेसबुक- एक उत्कृष्ट माध्यम

फेसबुक- एक उत्कृष्ट माध्यम 
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अगर हमारी कला , लेखन , 'उपचार जानकारी' या कोई और विशिष्टता , हमारी आजीविका का जरिया नहीं है तो फेसबुक वह माध्यम है जिससे उसका प्रसार हम पूरी दुनिया में त्वरित और उसके मूल रूप में कर सकते हैं।

इसका प्रसार समाजहित और मानवता को पुष्ट कर सकेगा। हम बहुत उपयोगी या दुनिया के लाभ का कुछ प्रस्तुत करते हैं , तो उसकी कॉपी कई स्थानों पर यूजर कर
ते हैं। इसे चुराया जाना ना कह कर इसे प्रसार ही कहा जाना उचित होगा। क्योंकि इसमें हमारा नाम या ख्याति ना फैलता हो विशेष अंतर नहीं करता , वास्तविक समाजहित या मानवता निज अपेक्षा विहीन होती है। 

अश्लील प्रदर्शन और सामग्री यद्यपि ज्यादा कॉपी और लाइक किये जा रहे हैं .हालाँकि यह फेसबुक की खराब प्रयोग है। इससे हित किसी का नहीं होता। बल्कि यह समाज में अनाचार ,व्यभिचार और दुष्कर्मों को उकसा कर पावन भावना को क्षति पहुंचा रहा है . 
यह उस अनुकरणीय भावना के विपरीत है जिसमें सामाजिक सौहाद्र और परस्पर महीन सूत्र से बंधकर मानव सयुंक्त प्रयासों से "आदि मानव" के जानवर तुल्य स्तर से आज की मानव प्रगति साकार कर सका था। 

हमारे सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल निश्चित ही शीघ्रता से इसकी रोकथाम करने में सफल होंगे। उसके लिए उन्हें आर्थिक लाभ के मोह से छुटकारा प्राप्त कर मानव सभ्यता को सशक्त और पवित्र करने को प्रधानता देना होगा।

इस पीढ़ी को त्याग का उत्कृष्ट उदाहरण रखना होगा , जिसका प्रतिफल समाज की देश की आगामी पीढ़ियों को मिल सकेगा। आगामी पीढ़ियाँ कोई और नहीं हमारे बच्चे और उनके बच्चे (हमारे अपने ) ही होंगे.

धन मूर्च्छा , भोग मूर्च्छा और सुविधा मूर्च्छा से हमें निकलना होगा। हमें जागृत होना होगा।

राजेश जैन
11-06-2014

Monday, June 9, 2014

परिष्कृत

परिष्कृत
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हम में शायद सभी , इन अपने परिजनों को चरित्रवान ही देखना चाहते हैं  ……

भाई ,बहन , माँ ,पिता

और विवाह हो चुका हो तब  ……

पति/पत्नी (स्पाउस) , बेटा और बेटी

अगर सहमत हैं , तो हमें स्वयं को भी चरित्रवान होना चाहिये , क्योंकि हम दूसरे अपने परिजनों से इनमें से कोई ना कोई रिश्ता रखते हैं।

जब तक दूसरे के दृष्टिकोण से हम अपने को नहीं निहारेंगे , अपने दायित्वों को नहीं समझ सकेंगे ……

कुछ समय निकालें प्रतिदिन , थोड़ा आत्मावलोकन करें , तो हम स्वयं  को परिष्कृत (Sophisticated) कर सकेंगे।  और इस तरह अपने समाज और व्यवस्था को सुधारने की अपनी और सब की अपेक्षा (expectation) पर न्याय कर सकेंगे , (आशाओं पर खरा उतर सकेंगे ).

--राजेश जैन
10-06-2014

Sunday, June 8, 2014

नारी सही अर्थों में आधुनिक बने


नारी सही अर्थों में आधुनिक बने
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धन के लिये निर्भरता , पुरुषों पर थी। अकेली बाजार नहीं जा सकती थी। नारी के ऐसे दिन अब नहीं रहे हैं। पढ़-लिख कर नारी इस योग्य हुई है। धन अर्जित स्वयं करने लगी है। और धन पास हुआ तो बाजार जाने का आत्म-विश्वास भी जागृत हो गया है। ऐसा अच्छा हमें प्रसन्न करता है लेकिन ना मालूम अच्छे के साथ बुरा भी क्यों कुछ रहता है।

हमारी फिल्में, उसमें नायक /नायिका (रहे) की व्यक्तिगत जीवन में की खल( नायक /नायिकायें) वाली हरकतें , और उनका मीडिया और पत्रिकाओं द्वारा धन कमाने की लालच में (दुष्) प्रचार , नारी की उन्नति के लिए भी अभिशाप साबित हो रही हैं।

देखा देखी के चलन में पढ़ी-लिखी आज की नारी भी देर रात्रि पार्टियों में जाने लगी है। जो फिल्मों ने और वहाँ की तथाकथित सेलेब्स ने भारतीय समाज को दीं हैं। वहाँ (देर रात्रि पार्टियों ) मौजमस्ती साथ ड्रिंक्स के दौर चलते हैं। आधुनिक कहलाने के लिए रात्रि कालीन पार्टियों में ड्रिंक्स भी वह लेने लगी है। कुछ पुरुष उस ड्रिंक्स में मादक पदार्थ मिलाकर उसे सर्व कर रहे हैं। जिसके प्रभाव में नारी उसके साथ होने वाली वासना पूर्ती की हरकतों का विरोध नहीं कर पाती है। पुरुष के छल से ठगे जाने की कुछ घटनायें तो न्यूज़ बनती हैं , कुछ में दोषी पुरुष दंड पाता है (अभी ताजा ऐसी खबर जयपुर की है ) . अनेकों नारी शोषण की ऐसी घटनायें प्रकाश में नहीं आ पाती हैं क्योंकि बदनामी का डर और ब्लैकमेलिंग का शिकार हो कोमलकाया छली गई नारी हिम्मत नहीं करती और स्वयं अपराधबोध से ग्रसित होती है। हालाँकि दोष ज्यादा पुरुष का है ,कानून से सजा भी पुरुष को मिलती है किन्तु आजीवन अभिशाप नारी के हिस्से आता है।

पढ़ी लिखी नारी जाने क्यों स्वयं को आधुनिक दिखाने की कोशिश करती है , और पुरुष के पैतरों में आकर पुरातन काल से जैसी छली जाती रही वैसी छली जाती है , आधुनिक नहीं पुरानी नारी का परिचय भी नहीं ( जो कम से कम अपना सम्मान तो रख पाती थी ) दे पाती है। आधुनिक नारी कहेंगे , जो पढ़ लिखकर अपने भले को भली-भाँति समझती है। ऐसी राह चलती है जो अच्छी उपलब्धियों की ओर ले जाती है। अनुशरण करती नारी को ही नहीं ,समाज में भी सुखद वातावरण और परिस्थितियाँ निर्मित करती है।

महानगरों और अन्य बड़े नगरों का जो फैशन गया है इन देर रात्रि की पार्टियों में , आधुनिक दिखने नाम पर नारी स्मोकिंग को भी दुष्प्रेरित हो रही है। ताजा सर्वे कहता है नारी में धूम्रपान की प्रवृत्ति 1980 की तुलना में आज बढी है जबकि इसी अवधि में यह पुरुष में कम हुई है। बदली हुई जीवन शैली तथा मिलावटी खाद्य सामग्री (एडिबल्स) का बुरा प्रभाव पुरुष की तुलना में शारीरिक बनावट के कारण नारी पर अधिक हैं कैंसर के खतरे नारी के अंगों पर अधिक हैं ही धूम्रपान जो कैंसर सबसे बड़ा कारण है नारी में आशंकाओं का इजाफा करता है । साथ ही बच्चा नारी के शरीर के अंदर पनपता है, वह जन्मजात खतरों के साथ दुनिया में आता है जिससे समाज पर कैंसर की भयावहता आशंकित है।

नारी को आधुनिकता क्या है यह समझना होगा। वास्तव में जो उपलब्धियों की ओर ले जाये , जो सुखद परिस्तिथियाँ और वातावरण निर्मित कर सके वैसा गुण आधुनिकता है। जिससे नारी भी सुखी होती है समाज भी सुखी बनता है। आधुनिक कहलाने के नाम पर अगर नारी कुटिल चालों की शिकार होकर अपना तथा परिजनों का जीवन कष्टमय करती है तो यह ठेठ पुरातन पंथी (आधुनिकता नहीं ) है , जिसमें नारी ठगी जाती रही है।
पढ़ने लिखने के अवसर नारी ने लिये हैं , ज्यादा स्वाधीन आज वह है तो इस अवसर का लाभ उठाये , उसे व्यर्थ ना गवायें। "नारी सही अर्थों में आधुनिक बने" , स्वयं का जीवन खुशहाल करे।  नारी के साथ ही परिवार में जीवन यापन करने वाले पुरुष लेखक की यही हार्दिक कामना है।


राजेश जैन
09-06-2014



 

मनुष्य भी एक विचार है

मनुष्य भी एक विचार है
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विचार , निराकार वह वस्तु है जो मनुष्य मन / ह्रदय में उत्पन्न हो बहुत  सी भौतिक वस्तुओंं को उत्पन्न करने का कारण बनती है।

उदहारण - आज के सुविधा संपन्न घर और उनमें उपयोग आती बहुत सी (लगभग सभी, प्राकृतिक वस्तुओं को छोड़कर ) सामग्री , किसी दिन मनुष्य मन में विचार रूप उत्पन्न हुईं और कालांतर में उसने मूर्तरूप लिया।

हर मनुष्य , जो जीव रूप आज अस्तित्व है अगली सदी तक (या अगली सदी में ) अस्तित्व विहीन हो जाएगा , और तब अगर किसी के स्मरण में आएगा तो एक विचार ही बन रह जाएगा।

हाँ , मनुष्य , दूसरी मनुष्य सृजित वस्तु से थोड़ा भिन्न है।  दूसरी वस्तु अस्तित्व में आने के पहले विचार में आती हैं ,जबकि मनुष्य अस्तित्व में होता है , उपरान्त विचार में रह जाता है।

जिस तरह विचार , हर मनुष्य के जीवन में अनेकों आते हैं , चले जाते हैं।  उस तरह मनुष्य भी अनेकों आते हैं ,चले जाते हैं। विचार जैसे अनेकों होते हैं , स्मरण में कुछ ही रह जाते हैं।  मनुष्य भी अनेकों हुए खो गए , कुछ ही स्मरण किये गए, शेष आरम्भ /अंत हीन काल चक्र में कहीं विलीन हो गए।

अब जब मनुष्य विलीन ही हो जाता है तो फिर आज उसका  अच्छा या बुरा रहना क्या अंतर करता है ? लोग कुछ भी कहें , चाहे बुरा कहलें वह अपनी मनमानी करले तो क्या अंतर पड़  जाएगा ?

वास्तव में बुरा क्या है , हम इसे समझें . अति कई  चीज की बुराई हो जाती है।
उदाहरण-  नारी पुरुष संसार में हर जगह मिल जाते हैं , नोंक झोंक इत्यादि सहज चलती रहती है।  उसमें अति हो जाये बुराई बन जाती है।  पति -पत्नी का रिश्ता एक बार बनता है ,एक से बनता है अच्छा होता है।  अनेकों से ऐसा रिश्ता (अति) बनाने का क्रम बुरा होता है। (एक से विवाह और उससे आजीवन साथ को संस्कृति या परम्परा बनाया गया है।  हम इसे बदलने का प्रयास ना करें )

जब मनुष्य विचार रूप ही रह जाने वाला है , वह भी कभी बिल्कुल ही विलीन हो जाने वाला है। तो क्यों ना हम मन की ही पूरी कर लें , बुरा लगे किसी को तो लगता रहे।  ऐसा भी (कु)तर्क हो सकता है।

इसका समाधान हम ऐसा करलें ।  अगर हम किसी को एक थप्पड़ मारने का मन होने पर उसे मार दें।  अगर इसे हम बुरा ना कहें तो बिना हमारी गलती पर कोई हमारे मुख पर तमाचा जड़ दे तो फिर हमें इसको भी बुरा नहीं कहना चाहिए। अगर हम अपने पर हिंसा जबरदस्ती को बुरा कहते हैं , तो हमें भी किसी के साथ हिंसक नहीं होना चाहिए। किसी पर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए।

इसलिये , भले ही हम इक विचार जैसे ही साधारण हैं , अस्तित्वहीन हो जाने वाले हैं  लेकिन हमारे कर्म ,आचरण और व्यवहार अच्छे होने चाहिये।  क्योंकि बुराई को हम बुरा कहते हैं।  इसलिये हममें भी बुराई नहीं होनी चाहिए।

अपनी बुराई हम जिस दिन कम कर लेंगे।  देश /समाज से बुराई स्वतः कम हो जायेगी  ।

--राजेश जैन
08-06-2014