Friday, June 6, 2014

जबलपुर - संस्कारधानी ?

जबलपुर - संस्कारधानी ?

जबलपुर को संस्कारधानी विशेषण कब ,किसने और क्यों दिया , यह किसी को ज्ञात हो तो कमेंट्स में बता दीजियेगा।
किन्तु यह तो तय की जबलपुर की किसी पीढ़ी ने ऐसा कुछ किया होगा जिसने शेष भारत को प्रभावित किया होगा और "संस्कारधानी" जैसा सुन्दर शब्द हमारे जबलपुर को मिला होगा , जो शायद किसी अन्य नगर के नाम के साथ नहीं जुड़ता है।

जबलपुर में आजकल हमारे बच्चों के पढाई का माध्यम इंग्लिश है अतः उनको संस्कारधानी शब्द का अर्थ बताया जाना उचित होगा , जिससे वे इस शब्द में समाहित गौरव (बोध) अनुभव कर सकें।

संस्कार उन गुणों का किसी व्यक्ति में होने का नाम है , जिससे उसके आचार ,विचार ,व्यवहार और कर्म ऐसे होते हैं , जो स्वयं उसका ही नहीं अपितु अन्य का जीवन भी सहज , सुखी और सार्थक करता है।  और जहाँ से ऐसे अच्छे गुण या संस्कार मिलते हैं , उस स्थान ,धर्म , समाज , विद्यालय या शास्त्र (बुक) को संस्कारधानी कहा जाता है।

जबलपुर की किसी या कुछ पीढ़ी (यों)  ने उच्च संस्कार देने की एक अच्छी परम्परा रखी होगी , हमें इस परम्परा को आगे बढ़ाने का दायित्व है , जबलपुर में होने से हमें इस कर्तव्य के साथ न्याय करना चाहिए।

हिंदी भाषी क्षेत्रों के अलावा , यहाँ देश के अन्य भाषा प्रदेशों (महाराष्ट्र ,गुजरात , पंजाब , आंध्र ,केरल ,कर्नाटक इत्यादि )से आकर बस गए परिवार भी  इस सुन्दर सुरम्य नगर में सुखद जीवन यापन कर रहे हैं। लेकिन कुछ घटनायें , यहाँ भी ऐसी हो जाती हैं , जो इस नगर की गौरवशाली परम्परा पर प्रश्न चिन्ह अंकित कर देती है। हमें विचार और उपाय करने चाहिये जिससे हमारा नगर गरिमा बरकरार रख सके।

थोड़ा सा अन्य विषय इस लेख में लेते हैं।

आकर्षण की भावना
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 जानवरों में भी होता है , लेकिन मनुष्य में तो लगभग सभी में होता है वे अन्य को प्रभावित कर अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं।  आकर्षित करने का लक्ष्य मनुष्य में एकमात्र काम अपेक्षा से ही नहीं होता , बल्कि जीवन के अलग अलग अवस्था में अलग अलग अपेक्षा से आकर्षित करने का होता है।  और आकर्षित करने के अलग अलग साधन भी उपयोग किये जाते हैं।
ज्ञान , कला ,व्यवहार , रूप और वस्त्रों इत्यादि से  आकर्षित करने की चेष्टा होती है।  तब भी किन्हे आकर्षित करने का किसी का लक्ष्य होता है , उसे जाने समझे बिना अन्य भी उसकी तरफ आकर्षित हो जाते हैं।  तब उसे (आकर्षित करने वाले को ) यह अच्छा नहीं लगता है। विशेषकर रूप , वस्त्र और एक्सेसरीज से आकर्षित करने वाले व्यक्ति की अपेक्षा कुछ अपने प्रियजनों से रहती है।  लेकिन इन उपायों से आकर्षण जो उनमें होता है , कोई भी आकर्षित होता है। और कुछ दुर्गुणी, अवांछित चेष्टा भी करते हैं। कोई मदिरा या अन्य नशे में रहकर भी ऐसा कर देता है , जबकि सामन्यतः वह अच्छा भी होता है।

तब हम सहज नहीं रह पाते हैं।  अतः हमारे वस्त्र कहाँ हम जा रहे हैं , किन लोगों के बीच से जाना है , किन के साथ हमें होना है आदि पर विचार कर हमारे वस्त्र का चयन होना उचित होता है।  किसी भी तरह के वस्त्र में लेखक कोई खराबी नहीं मानता अगर वे आसपास के व्यक्तियों और अवसर को मैच करते हों।

थोड़ा शरीर झलकते वस्त्र जहाँ पति -पत्नी के बीच अच्छे हो सकते हैं , वही भाई -बहन माँ -पिता को असहज करते हैं।  ऐसे वस्त्र अनायास ही उनकी आँखें नीचे करते हुए हम से बात करने को विवश करते हैं।  हम स्वयं भी ऐसी ही हालत में होते हैं। वस्त्र आधुनिक भी हों ,सुविधा पूर्ण भी हों और रूप में चार चाँद लगाते हों सभी अच्छे होते हैं , लेकिन अवसर और स्थान अनुरूप ही हम पर सजते हैं।  हम सब्जी बाजार में तो निश्चित ही वाटर पार्क वाले वस्त्रों में नहीं जा सकते हैं।

अब शारीरिक और मानसिक दोनों के स्वास्थ्य लाभ के लिए आव्हान
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आयें , रिज रोड (जबलपुर )पर वाक करने . स्वस्थ भी बनें , जबलपुर की संस्कारधानी होने की परंपरा भी चर्चा के साथ पुष्ट करें।  और समाज में सुख का संचार करें।

राजेश जैन
07-06-2014

Thursday, June 5, 2014

दामाद के गुणों की चर्चा

दामाद के गुणों की चर्चा
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                      "सामाजिक अपेक्षाओं को चलो छोड़ते हैं
                       राष्ट्रीय अपेक्षाओं से मुक्त चलो होते हैं
                       परिवार तो अपना समझते हैं ना हम ?
                      चलो आज परिवार दायित्वों की कहते हैं"

पुत्री का विवाह तय करते समय माँ-पिता की मुख्य चिताओं में से , सामने परिवार का प्रतिष्ठित और बनने जा रहे दामाद का चरित्रवान (या सुशील ) और मृदुभाषी होना प्रमुख रहता है।

इन चीजों के होने से अपनी प्रिय बेटी को नये परिवार में भेजते हुए , उनके (पुत्री और दामाद ) के सुखद जीवन की सुनिश्चितता लगती है।  इससे सहमत होने के उपरान्त हम विचार करें कि पुत्री के माँ-पिता की यह खोज और पुत्री सरल कैसे होगी?
निश्चित ही जब नवयुवकों में /परवारों में इन गुणों का होना व्यापक होगा। पश्चिमी चलन का अनुशरण करने की अंधी-प्रवृत्ति में भारतीय समाज में भी चरित्रवान रहना दिनोदिन जीवन आदर्शों में से लुप्त सा होता जा रहा है।  इस मानव नस्ल का संरक्षण हमारे स्वयं के ऊपर है। हम चरित्रवान रहेंगे तो यह नस्ल लुप्त ना हो सकेगी।  और तब हम अपनी पुत्री का विवाह करने जायेंगे तो मनोरुप वर ढूंढ पाएंगे।

आवश्यकता है पच्चीस -तीस वर्ष के बाद हम जिस बात को शीर्ष महत्व देंगे , उसे पच्चीस -तीस वर्ष पहले (आज ) समझ सकें।  अगर उस वक्त की हमारी अपेक्षाओं को दूरदर्शिता से आज समझ लेंगे तो हम स्वयं चरित्रवान होंगे। जब ऐसा होगा तब हम पत्नी -बच्चे और परिवार के प्रति अपने दायित्वों का कुशल निर्वहन कर सकेंगे।  इस तरह हमारा परिवार सुखी और सफल हो सकेगा।  ऐसे परिवारों से बनता हमारा समाज सुखी होगा।  शिकायतों , समस्याओं ,बुराइयों और दुष्कर्मों पर  व्याप्त विलाप तभी विराम पा सकेगा।

हम नारी के प्रति विनम्र हो सकेंगे।  उसे पत्नी रूप में भी उचित सम्मान और सुरक्षा दे सकेंगे।  चरित्रवान हम होंगे तो घर के बाहर नारियों से छिछोरी हरकतों से भी बाज आयेंगे।  इस तरह नारी का हमारे परिवार को मजबूत करने के योगदान की दृष्टि से घर के बाहर का विचरण ( मूवमेंट्स) खतरों और अपमान रहित होगा।

सुखी समाज , हमारी संस्कृति रही है।  जिस के कारण ही बाहर लोग भारत के प्रति आकर्षित हुए थे , फिर कुटिलताओं से उन्होंने इसे क्षति पहुँचाई।  इस संस्कृति क्षति के लिये उन्होंने सिनेमा और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को अपना दूत नियुक्त किया। और हमारे ही समाज में से कुछ लोगों को सम्मोहित कर उनका प्रयोग देश और समाज की बरबादी के लिए किया .

हम सजग हो इसे समझें और अपना बचाव करें। अन्यथा जीवन संध्या पर अपनी लापरवाहियों पर पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं रहेगा। ऐसी आत्मग्लानि अनुभव होगी जिससे मुक्ति जीवन में संभव नहीं होगी।
    " भविष्य की बातों का पूर्वानुमान बुध्दिमानी है , जो हमें ज्यादा कर्तव्यनिष्ठ भी बनाती है। "
राजेश जैन
06-06-2014

Wednesday, June 4, 2014

कन्यादान?

कन्यादान?
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दान तो किसी वस्तु का मालिक अन्य किसी को वह वस्तु दे दे उसे कहते हैं।

क्या बेटी के माँ अथवा पिता , उसके मालिक होते हैं जो उसे दान करते हैं ? और क्या विवाह के बाद पति या ससुराल पक्ष उस पत्नी/बहु  (जो कल तक बेटी थी ,अब यह भी होती है ) का मालिक हो जाता है ?

अगर ऐसा है तब हमारी मान्यता अनुचित है। और नहीं तो  यह कन्यादान शब्द का गलत संधि विग्रह मात्र है।

कन्यादान निश्चित ही उस विवाह रस्म का नाम है , जिसमें अपनी प्रिय बेटी को , उसके सम्मान ,सुरक्षा और उससे पुत्रीवत स्नेह  और धर्मपत्नी के सभी अधिकार देने के लिए वधुपक्ष (सामान्यतः पिता ) , वर के माँ-पिता / वर को सौंपता है।

दहेज़ भी बाध्यता में देना या बाध्य कर लेना , अनुचित प्रचलन है।  आवश्यकता रीति रस्मों में आई खराबियों के  सुधार के साथ ,नारी-पुरुष दोनों के चरित्रवान होने की है।  और सुरक्षित सेक्स के नाम पर विज्ञापनों में दुष्प्रेरित करते प्रचार के झाँसे में नहीं आने की है।
ये स्वछंदता वास्तव में भारत के बाहर की खराबी है, छूत का रोग है जो पाश्चात्य समाज को दीमक की भाँति चट कर रहा है ,जिसे आधुनिक (MODERN ) कहलाने के नाम पर हम अंगीकार कर रहे हैं।

भारतीय संस्कृति और समाज के लिये यह आत्मघाती सिध्द होगा। हम अपनी भारतीय पहचान रखना चाहते हैं और इस भव्य अपनी संस्कृति का लाभ शेष विश्व को भी दिलाना चाहते हैं , तो हमें उनकी अपसंस्कृति को नहीं अपनाना होगा . अपितु अपने आत्मविश्वास और समाज हित कारी दृढ आचरण से उन्हें प्रभावित करना होगा।

राजेश जैन
05-06-2014

Tuesday, June 3, 2014

वास्तविक और वर्चुअल संसार

वास्तविक और वर्चुअल संसार
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सुबह हुई , स्वमेव कुछ तैयारी के बाद कदम प्रातः कालीन भ्रमण के लिए घर के बाहर को उठ जाते . उसकी नियमित दिनचर्या 14 वर्षों से ऐसी बन गई थी।  प्रायः  अकेला कभी सपत्नीक भ्रमण में रिज रोड पर पहुँच जाया करता , पत्नी को रसोई के कार्य होते अतः कुछ दूर साथ जाकर बीच से लौट जाया करती।  तब शेष भ्रमण में अकेला वह चलता फुटपाथ पर कुछ दृष्टि बाहर रख प्रायः अपने मन की गहराइयों में उतर जाया करता।

यहाँ उसे विवेक (स्व ) और कामना नाम का पति -पत्नी का जोड़ा मिलता।  विवेक वह अपने विचार क्षमता को कहता और कामना ,सभी जीवन लालसाओं ,चाहतों का नाम होता।  पत्नी की भाँति कामना उसे जीवन पथ पर प्रगति की ओर अग्रसर करती ( चलने को उकसाती )  . विवेक (पति) कामना को नैतिकता और न्यायसंगत शैली में नियंत्रित करता।

विवेक और कामना इस जोड़ी का साथ अनुभव करता उसका भ्रमण 6 कि मी का कब पूरा होता उसे पता नहीं होता और उसके कदम गृह में प्रवेश कर जाते। पिछले 2 वर्षों के ऊपर से उसने एक नई हॉबी बना ली थी।  पूर्व में फेसबुक को समय की व्यर्थता मानता था , अब उसको उसने उपयोगिता में शामिल कर लिया था।

पति -पत्नी द्वय (विवेक और कामना ) का साथ कर उसकी लेखनी कुछ लिपिबध्द कर देती।  और वह उसे फेसबुक पर पोस्ट कर देता।  कुछ उसके तरफ से पहल से और कुछ उसकी पोस्ट से आकृष्ट हो उसके मित्र बन गये थे। उनमें अधिकाँश वास्तविक संसार में उसके अपरिचित थे लेकिन इस वर्चुअल वर्ल्ड में उसके करीबी थे।

वह पूरे दिन वास्तविक और वर्चुअल संसार में स्विच करता रहता।  सुबह के किये विवेक और कामना के साथ से फेसबुक के मित्रों के साथ का संसार वर्चुअल था।  और कार्यालीन और परिवार दायित्व वास्तविकता थी।

आरम्भ में जिन बातों से शिकायत जिन व्यवहार को मूर्खता पूर्ण मान उत्तेजित हो , क्रोध में प्रतिक्रिया प्रगट करता और स्वयं और दूसरों को अप्रियता बाँटता था. अब अपने वर्चुअल संसार में जा वापस आकर उन्हीं परिस्थितियों में धीर गंभीर और संयत रहता , अब आवेशित अपने व्यवहार को ही मूर्खता मान स्वयं पर हँस लेता।

लोग कहते क्या जरुरत है 6 कि मी चल , एक  घंटे प्रतिदिन ख़राब करने , बच्चे सोचते क्या जरुरत बिना लाभ के घंटे -दो घण्टे फेसबुक पर व्यर्थ करने की। वह सोचता धूम्रपान में नहीं ,मदिरा सेवन में नहीं ,फ्यूल व्यर्थ करने में नहीं खर्च किये पैसे , इस वर्चुअल संसार से अपरोक्ष धन अर्जन ही था।

वह ,विवेक -कामना के बीच के मंथन से मिला इसे अमृत मानता था। जिसको बाँट मानवता और समाज हित पोषित करना अपना सामाजिक दायित्व मानता था। इसमें कोई जबरदस्ती ना कर वह इसे इंडिविसुअल की इक्छा पर छोड़ता।  इसे ग्रहण करे या ना करें .

मॉर्निंग वॉक से इस तरह शारीरिक और मानसिक फिटनेस के लाभ को अनुभव करता था।  अब दो संसार में जीता था।  एक संसार से सृजन की प्रेरणा लेता और दूसरे (वास्तविक ) संसार में उसे क्रियान्वित करता जीवन पथ पर क़दमों के कुछ निशान छोड़ता वह निरंतर चला जाता था।

इस लाभान्वित व्यक्ति की तरह नहीं भी तो अन्य तरह से नियमित वॉक करने से सभी को कुछ अवश्य अच्छा हासिल हो सकता है। दिनचर्या में शामिल कर देखिये इसे।

राजेश जैन
04-06-2014

Monday, June 2, 2014

वृक्ष


वृक्ष
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पौधा छोटा होता है , अपने फल ,फूल और शीतलता छोटे दायरे में उपलब्ध करा पाता है। वृक्ष बड़ा होता है उसका दायरा बड़ा होता है।

हम घर में पपीता का पौधा लगायें तो उसके फल हमें ही उपलब्ध होते हैं , किन्तु यदि आम का वृक्ष हमारे घर में हो तो उसकी बयार , फल पास पड़ोस में दूसरों को भी मिलते हैं।

हम अपने परिवार के लिये अच्छा करते हैं तो यह पौधे वाला गुण है , हमारे सद्कार्य और गुणों का लाभ हमारे परिवार तक सीमित होते हैं।  लेकिन हमारे सद्कार्य और गुणों का दायरा हम विस्तृत कर सकें तो उसका लाभ घर -परिवार के अतिरिक्त समाज तक पहुँचता है। जिस तरह वृक्ष विस्तृत दायरे में अपने फलों का लाभ प्राणियों को देते हैं।  उसी तरह यदि हम गुणवान हैं तो हमें घर-परिवार की परिधि में ही नहीं सिमट जाना चाहिये। हमें सद्कार्य समाज में भी करना चाहिए , जिससे ये संचारित होकर पूरे देश में फैल सकें और उससे हमारा देश समाज स्वस्थ हो सके।

और अगर हम में अवगुण हैं ,तो हमें स्वयं में सिमट जाना चाहिए , परिवार तक को उससे बचाना चाहिए ताकि वह उसकी चपेट में ना आयें।

हमारे दादाजी , स्मोकिंग किया करते थे , उन्हें इसकी खराबी का ज्ञान था , इसलिए वे बच्चों से छिप कर ऐसा करते थे। हम बच्चे अपनी मम्मी से जब पूछते तो वे कहती यह बुरी चीज होती है इसलिए छिपते हैं।

हमने स्मोकिंग को बुरा माना /जाना और इस लत से मुक्त रहे।

अपनी बुराई को अपने में सिमट पहचान कर उससे मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। यत्न करने से सभी कार्य किये जा सकते हैं। बुराई मिटा लें तो अच्छाई तो सभी में जन्मजात  होती है , उसका लाभ परिवार समाज तक पहुँचायें।

हमारा सामाजिक दायित्व अच्छाई का प्रचार -प्रसार है और बुराई का उन्मूलन है  ....  स्वयं में बुराई मिटाते हुये समाज में कम करें , देश समाज व्यवस्था से जो हमें शिकवे /शिकायतें हैं स्वयं कम होगीं

राजेश जैन
03-06-2014

Sunday, June 1, 2014

मँझधार में जाने से कतराती कश्तियाँ

मँझधार में जाने से कतराती कश्तियाँ
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लेखक , प्रशंसक शीर्षक से लिखे लेख में ही यह लिखना चाहता था , लेकिन हमारे पढ़ने के धैर्य से लंबा लेख ना हो जाये। इसलिये पृथक लिखना उचित था।

बहुत तीव्र मस्तिष्क , जानकार , प्रतिभा के धनी बच्चे और बड़े देखने मिलते हैं।  उन्हें कहीं सफलता के कठिन स्तर को छूते देखा जाता है।  लेकिन अंततः एक खुशहाल परिवार और पूर्व-अपेक्षा ज्यादा धन वैभव की मंजिल पर थमते उन्हें देखा है।

बच्चे मेहनत करते हैं , अनेकों आई आई टी , आल इंडिया पी एम टी , या ऐसी ही कुछ चुनौती पूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते हैं, शीर्षस्थ शिक्षा संस्थानों में पहुँचते हैं।  फिर अब तक किये कड़ी मेहनत और रहे अनुशासन के जीवन से उकता कर ना तो मेहनत के उस भाव को कायम रख पाते हैं ना ही अनुशासन की अब तक की जीवन शैली को आगे बढ़ाते हैं।  यहाँ पहुँच जाना उनका अच्छी जॉब और एक धन वैभव युक्त जीवन प्रायः सुनिश्चित  कर देता है इसलिए। कुछ फिर भी मेहनत करते हैं , उन्हें एक और मंज़िल पानी होती है. यू एस ए या यूरोप में जॉब चाहिये होता है। वहां उनका जीवन बहुत ही सुविधाजनक हो जाने वाला होता है , वहाँ का स्वच्छंद सा जीवन युवा उम्र में और सिस्टम पूरे जीवन के लिए उन्हें सरस लगता है।

जिस कश्ती की क्षमता बहुत जूझते की होती है , बहुत दूर तक चली जाने की होती है , सागर के शाँत से स्थान पर पहुँच अनुकूलताओं का अनुभव पाकर सिर्फ वहीँ वहीँ चक्कर लगाने लगती है।  छोटी किसी मंजिल पर पहुँच थम सी गई ज़िन्दगी ,एक सम्भावनाशील प्रतिभा और व्यक्ति का जीवन सुख तो सुनिश्चित कर देती है।  लेकिन इतना प्रदर्शन ( परफॉरमेंस ) लेखक को अपर्याप्त लगता है , क्योंकि समाज  और एक सिस्टम ने उनमें ये गुण विकसित किये होते हैं , इस प्रदर्शन से उसे (समाज या सिस्टम को ) समुचित प्रतिफल कुछ नहीं मिल पाता है ।

क्यों ये धन को जीवन सफलता मानने की भूल करते हैं ? इससे ज्यादा धन और सुविधा तो कहीं कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी कुछ कुछ उपायों से अर्जित करता है (उनकी बुराई नहीं प्रशंसा है क्योंकि वे परिवार अपेक्षा को अपनी मानी गई योग्यता से बढकर पूरी करते हैं ) . लेखक ये प्रश्न नहीं उठाता यदि हमारा देश या समाज सुखी होता।

जब वातावरण और परिस्थितियां प्रतिकूल हैं तब ही प्रतिभा संपन्न से अपेक्षा होती है , वे चुनौती उठा उन्हें बदल दे।  ऐसे में ऐसे अनेकों सपूत हमारे हैं , जो समाज और देश के पीछे आने वाले युवाओं को सच्चा नेतृत्व और मार्गदर्शन दे सकते हैं।उस अभिशाप से भी पीढ़ियों को मुक्त कर सकते हैं , जिसमें दुष-प्रेरणा घटिया सिने जीवन से मिलती है।    ऐसी देश और समाजहित की सुन्दर मिसाल और परम्परा कायम कर सकते हैं जिससे सद्प्रेरणा ही एकमात्र ग्रहण करने वाली वस्तु हो सकती है। जो आज की बुराई से निपटने के लिये बहुत ही प्रासंगिक जीवन है।

पूरा लेख पढ़कर उन्हें भी निराश होने की आवश्यकता नहीं जो किसी उच्च संस्थानों में शिक्षा पाने से किन्हीं भी कारणों से विफल रहे हैं , पिछले लेख में साधारण से लगने वाले व्यक्ति की जूझने की प्रवृत्ति से देश के शिखर तक की  यात्रा का वृतांत और  सभी के " आशा की किरण " के रूप में स्थापित होने का उल्लेख किया गया है।  प्रेरणा ग्रहण करने और हरेक को कुछ कर गुजरने की हिम्मत कर लेने के लिए वह उल्लेख ही पर्याप्त है।

राजेश जैन
 02-06-2014



प्रशंसक

प्रशंसक
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हम जीवन में अनेकों तथाकथित सफल व्यक्तियों से प्रभावित होते हैं जिनके फैन (प्रशंसक) हो जाते हैं।  आज जिनके प्रशंसक होने का रिवाज चला है  वे लोग फिल्म या स्पोर्ट्स के ज्यादा हैं.  स्पष्ट है यह ग्लैमर निहारने और मनोरंजन उठाने में मुख्यता की आज की पीढ़ी की प्रवृत्ति को दर्शाती है। पढ़ने वाले हमारे मित्र इसे व्यक्तिगत मान सकते हैं। मोटे तौर पर इसे लेखक भी हरेक का व्यक्तिगत विचार मानता है । किन्तु लेख में  जब इनका प्रशंसक होना देश और समाज के लिए अहितकर बताया जाना है तो इसे व्यक्तिगत अधिकार अंशतया ही माना जा सकता है।  इनका (फिल्म या स्पोर्ट्स के लोगों का ) प्रशंसक होने से नागरिक ऐसा कुछ नहीं सीखता या प्रेरणा लेता है जो देश या समाज का भला करती हो। पहले दार्शनिकों , धर्म विद्वानों , अपने गुरुओं ,साहित्कारों , देश की रक्षा में लगे वीरों और समाज निर्माण से जुड़े विद्वानों , का प्रशंसक होने का चलन था। जिनका अनुशरण कर प्रशंसक ऐसी सद्प्रेरणा पाता था जो उनमें समाज और देश हित की भावना उत्पन्न करती थी।
धिक्कार ऐसे प्रसारण तंत्र का है जो वह बात प्रसारित करता  है जिससे उनके व्यावसायिक हित सधते हैं। ये उन लोगों की छवि बनाते हैं जो अहितकारी हमारी कमजोरी हो गए हैं। देश का मीडिया जब इस देश और समाज के हित के प्रति इतना बेपरवाह हो गया है तो हमारे जैसे लेखक  का धर्म है कि वे  ही अपने क्षीण सामर्थ्य में जितना हो सके सही नायकों को समझने की आवश्यकता को प्रस्तुत करते रहें। अब इसे किसी को महिमा मंडित करने का प्रयास के रूप में ना देखा जाये आगे जो लेख है।
एक बहुत ही साधारण परिवार में जन्मा एक व्यक्ति किशोर आयु में ही वैराग्य अनुभव कर दुनिया से दूर निर्जनों में भटकता है , कुछ वर्षों में वापस तो समाज में लौटता है किन्तु अपने जीवन के लिए सारी इक्छाओं को मार ,अन्यों  के लिए (देश और समाज ) जीने की भावना के साथ।  इसी जन्म में नये अवतरण के साथ उसको हर उम्र पड़ाव पर ऐसी सफलता और चर्चा मिली होती है जिनकी तुलना वह अपनी बचपन की परिस्थितियों से करता तो संतोष कर उसकी सफलता की यात्रा उस जगह तक जाकर ही थम सकती थी। लेकिन जन्म से जितना कम भाग्यशाली वह लगता था ,उतना कम नहीं बल्कि ऐसा भाग्यशाली वह था जैसे बिरले ही होते हैं। देश और समाज के लिये ठोस कुछ कर गुजरने की भावना ने उसे ऐसे किसी मुकाम पर थम जाने नहीं दिया। आज वह देश की आशा का किरण बन देश के उच्चस्थ स्थान पर विराजित है।  बहुत अरसे बाद किसी राजनेता के इतने अधिक प्रशंसक हमें देखने मिले हैं।
देश के लिए वह कुछ करे इस हेतु करोड़ों की  अपेक्षा उस व्यक्ति के ऊपर पहले ही बहुत अधिक हो गयी है इसलिए इस लेख में भी ऐसी कोई अपेक्षा जोड़ कर उसके कंधे पर यह बोझ लेखक नहीं बढ़ायेगा बल्कि क्रियान्वयन को भविष्य के ऊपर छोड़ेगा। यहाँ जिनसे अपेक्षा होगी वह करोड़ों उसके प्रशंसक से होगी।  अपेक्षा चूँकि करोड़ों में बँट जायेगी इसलिए उसका बोझ भी अत्यंत कम ही आएगा।
प्रशंसक अपने इस नायक से यह प्रेरणा और सीख अवश्य लें कि सफलता की मंजिल जीवन भर बदलती जाती है। अपनी किसी वय के लिए निर्धारित सफलता पर पहुँच वहाँ थम जाना उचित नहीं है।  बल्कि उस मुकाम पर पहुँच जाने के बाद अगली मंजिल निर्धारित करते हुए उस पर पहुँचने के क्रम को दोहराते जाना है। इस नायक से यह भी सीखा जा सकता है कि परिवार का हितैषी होते हुये भी अपने हितों के लिये संघर्ष का अवसर अपने परिवार के समर्थ सदस्यों को ही देना है। जिससे जीवन में वे निठ्ठल्ले ही ना रह जायें। इस नायक से यह भी सीखा जाना चाहिए की सफलता का पैमाना सिर्फ धन को ना रखा जाए।
अगर प्रशंसक ऐसी सही प्रेरणा उस जननायक से लेता  है तो उसका काम सरल करता  है , जिसे अपनी आशा की किरण प्रशंसकों ने स्वयं बनाया है      ……
--राजेश जैन
01-06-2014