Saturday, May 4, 2013

ऐसा सपना तो स्वयं हमारा ही रहा है


ऐसा सपना तो स्वयं हमारा ही रहा है 
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हमारे बच्चे भारतीय परिवार में पालकों को बहुत मान -सम्मान और श्रध्दा से देखते ही हैं .
परिवार से हम भी बहुत स्नेह रखते हैं .आज स्वहित और परिवार हित को ध्यान कर हम अधिक धन अर्जित करने के जी तोड़ प्रयास करते हैं .इसमें सफल होने पर हमारे बच्चे हमें और भी अधिक चाहते हैं . फिर धन -बाहुलता उन्हें जीवन मजे के राह पर प्रशस्त करती है .

आज अनेकों तरीके हैं जिसमें ना-ना प्रकार के जीवन सुख (विलासिता ) ,आनंद उठाये जा सकते हैं .
हमने परिवार हित के लिए जीवन जिया है तो उसका अपेक्षित प्रतिफल हमें मिलता है . हमारे बच्चे की प्रसन्नता में धन अभाव कभी रोड़ा नहीं बनती .पर इतने साधनों से सारे सुख उपलब्ध करने के लिए कभी समयाभाव आड़े होता है .ऐसे में बच्चा (जो अब युवा हो चुका है ) लाचार होता है उसे कुछ समय और बचाना पड़ता है ताकि धन-उपभोग सरल हो सके .

वह अब हमसे कुछ कम वार्तालाप कर पाता है . ऐसे में हम स्वस्थ और अपने दैनिक क्रम में स्वयं व्यस्त हैं तो कोई बुराई नहीं है .पर अस्वस्थ हैं और अपनी कोई विशेष दिनचर्या नहीं है . और खाली समय हमारे पास है तो बच्चे की लाचारी में हमें अपनी उपेक्षा प्रतीत होती है .

यहाँ हमें यह विचार रखना होता है कि बच्चे के सुखमय जीवन जो उसे उपलब्ध हो रहा है ऐसा सपना तो स्वयं हमारा ही रहा है .हमारे हर्ष का विषय है जो 
अब यह सपना साकार हुआ है और बच्चा अपने परिवार सहित बहुत सुखी है .हम सफल ना होते धन बाहुलता उपलब्ध ना करा पाते और मध्यम वर्गीय ही रह जाते तो बच्चों के जीवन को इतना सुविधामय और सुखमय बनाने का हमारा सपना अधुरा रहता . तब ऐसी उपेक्षा नहीं लगती तो बच्चे के संघर्षमय जीवन की सच्चाई से हम उदास होते .

विचारपूर्वक अगर हम सकारात्मकता रखें तो 
हमें उपेक्षा नहीं लगेगी . हम सकारात्मक सोच के साथ आधे अधूरे स्वास्थ्य के साथ भी सृजन और रचनात्मकता बनाये रखने में सफल होंगे .और बच्चे स्वयं के सुखी हैं तो समाज के वंचितों के सुख के लिए बहुत कुछ कर सकने में समर्थ होंगे .जिसके लिए इस देश और समाज में बहुत कुछ कर सकने की गुंजाइश शेष है .

हम सफल इसीलिए रहे हैं क्योंकि वस्तुस्वरूप पहचानना हमारे लिए सरल रहा है .
वंचितों के सुख  के लिए कुछ करने का संकल्प लें तो  इसमें भी हम सफल रहेंगे और मानवता और समाज हित कर सकेंगे .

Friday, May 3, 2013

तुम्हारे मातृभूमि ऋण उतारने

तुम्हारे मातृभूमि ऋण उतारने
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गुलमोहर का चटक लाल रंग
ज्यों प्राणी पर यौवन निखार
लगता सूर्य को दे रहा चुनौती
आपकी ग्रीष्म की तपती धूप
ना बिगाड़ सकेगी कुछ भी मेरा

यद्यपि आप का लक्ष्य नहीं बुरा
देकर तपन बनाते भूमि उर्वरा
पर हिल जाती आत्मा पथिक की
मेहनत और चलने से प्रखर धूप में

उनकी नयनों को मेरा रंग सुहाता
मै उनसे यह कहना चाहता
ना शंका रखो सूर्यदेव प्रति तुम
प्राणीयों रखो कुछ सावधानियाँ

उर्वरित हो यह पृथ्वी उपजायेगी
जो अनाज सावन माह उपरान्त
सेवन से दमकोगे प्राणियों तुम
जैसा दमक रहा आज मेरा रंग

गुलमोहर ,सूर्य जोड़ी का सन्देश
ग्रहण करता इस ऋतू में 'राजेश'
लाओ ज्ञान में प्रखरता सूर्य भांति
फिर फैलाओ सूर्य सी दक्षता से

भौगोलिक सीमा से ना बंधना
प्रति पारिश्रमिक आस न करना
कहाँ लेते सूर्यदेव हमसे कुछ ?
देते निरंतर जीवन उर्जा सबको

नहीं सामर्थ्य 'राजेश' तुम्हारा
जितना सूर्य शक्तिशाली जैसा
जितना है लगाओ अधिकतम
सूर्य की भांति मानवता हित में

पुष्प लदी गुलमोहर शाखायें
जो झुकती वसुंधरा की ओर
कहने और दर्शाने को 'राजेश'
देखो कितनी विकट ऋतू में भी
मैंने लाया यह निखार स्वयं में
धरा की ओर झुकती मेरी शाखाएं
मातृभूमि से विनम्रभाव दर्शाती
गोद में जिस की माँ स्नेह पाकर
बना बीज से आज बड़ा मै पेड़

तुम्हारे मातृभूमि ऋण उतारने
तुम्हारे माँ मनुष्य संतानों को
देने नयन शीतलता के लिए
असहनीय विषम तपन के होते हुए
खिलता चटक रंग ये लाल लिए

प्रखर सूर्य ,दमकते गुलमोहर से
ले सन्देश सर्वहित के लिए कर्म करो     


मानवता के सिपाही

मानवता के सिपाही
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पिछली शताब्दी के तीन अवसरों पर जो हुआ उससे कुछ अलग हुआ होता ...
 उन्नीस सौ उन्नीस (जलियाँवाला बाग) :- अँग्रेज जनरल का आदेश निहत्थे निर्दोषों पर गोली दागने के होने पर  उन सिपाहियों ने गोली  निर्दोषों पर बरसाने के स्थान पर सिर्फ बन्दूकों का मुख आदेशकर्ता की ओर मोड़ दिया होता . (मारने की आवश्यकता नहीं थी ).
 उन्नीस सौ सैतालीस :- देश का बँटवारा नहीं किया जाता अगर इतना संभव नहीं था तो बँटवारा निश्चित हो जाने के बाद यहाँ से वहाँ ,और वहाँ से यहाँ अपनी भूमि बदल रहे लोगों को ससम्मान तिलक और श्रीफल के साथ विदा किया जाता .
 उन्नीस सौ चौरासी :- जब अपनी तरह की स्वामिभक्ति प्रदर्शित करने के लिए हत्याओं और हिंसा को कुछ के द्वारा उकसाया जा रहा था .तब हिंसक होने के स्थान पर हिंसा के शिकार हो रहे निर्दोषों को बचाने में हम जुटते 
ऐसा किये जाने का प्रतिफल यह होता कि ....
प्रथम अवसर (उन्नीस सौ उन्नीस) :- भारतीय मातहतों को अत्याचार के ऐसे आदेश अँग्रेज सत्ताधीशों द्वारा आगे  नहीं किये जाते . और उस समय मारे गये निर्दोषों ,नारियों और मासूम बच्चों का जीवन तो बचाया ही जाता .
 द्वतीय अवसर (उन्नीस सौ सैतालीस ) :-जिन्होंने प्राण गवाएं उनके प्राण बचते . जिन माँ ,बहनों की लाज लुटी उनका नारी सम्मान बना रहता . और नई सीमा के दोनों और ह्रदय वैमनस्य के स्थान पर हार्दिक मधुरता स्थान पाती . बाद के समय के तीन युध्द (अब तक ) ना होते .  देश में बाह्य आतंकवादी जब तब घुस पैठ कर हिंसा ना मचा रहे होते .
तृतीय अवसर (उन्नीस सौ चौरासी ) .. हम भ्रात-हन्ता नहीं बनते . तीन हजार हमारे ही भाई असमय ना मारे जाते अपना जीवन पूरा जी पाते .
निज स्वार्थ के सिपाही ना बन हम न्यायप्रिय या कहें सभ्य मानव बनते तो पूरा समाज हित सुनिश्चित होता  .
जो हुआ अगर इतना विषैला है . तो उसके विषाक्त प्रभाव को नष्ट करने के लिए मानवता को कलंकित करने वाला यह इतिहास हम जितनी शीघ्रता से विस्मृत करें उतना अच्छा  होगा .
और साथ ही अब उत्पन्न हो रहे या होने वाले अन्याय और अनैतिकता के ऐसे अवसर पर हिंसक होने  के स्थान पर भाईचारा और बड़प्पन का परिचय देते हुए सामाजिक माधुर्य का वातावरण निर्मित करने में सहायता करें .
हमें सिपाही  ही बनना है यदि ,तो हम निजस्वार्थ के सिपाही बनने के स्थान पर "न्याय और मानवता के सिपाही" बने ...

--राजेश जैन 

Thursday, May 2, 2013

निज स्वार्थ के सिपाही


निज स्वार्थ के सिपाही 
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विश्व में प्रतिदिन सहस्त्रों मनुष्य की मौत होती है .
जो मौतें रोगों से होती हैं  या दुर्घटना में ( किसी  द्वेष के बिना, किसी असावधानी से होती है . )
ऐसी मौत से भी परिजन मातम को बाध्य होते ही हैं . वास्तव में मौत कभी हर्ष का विषय नहीं होता है ..
लेकिन वह मौत जो किसी ने जानकर किसी को दी हो . वह मौत परिजन मातम का कारण बनने के अतिरिक्त  एक लम्बी अवधि का वैमनस्य बीज उत्पन्न करती है . जिसके विषैले प्रभाव से और भी मौतों का सिलसिला बनता रह सकता है .

मनुष्य सभ्य नहीं कहा जाता था तब तक तो छोटे छोटे कारणों से किसी के प्राण ले लेना चलन था .
लेकिन सभ्य कहलाने के बाद यदि अभी भी वह चलन है तो हैरत है ...
अप्रिय लगेगा अवश्य पर सच यही है हम अभी भी असभ्य मनुष्य समाज ही हैं .

मनुष्य नस्ल का भेद ,
राष्ट्र सीमा ,
भाषा ,
धर्म ,
आर्थिक स्तर ,
और जाति आदि
यदि ऐसे संघर्ष उत्पन्न करती है जिससे निर्दोषों की या जानकर किसी की हत्या होती है .
तो यह भेद या सीमाएं सभ्यता के द्योतक नहीं रहते .

हमें या तो ये भेद और सीमाएं समाप्त करने चाहिए या अगर भेद रखे जाने के हम पक्षधर हैं तो उन्हें निभाने में हमें ज्यादा लचीला होना चाहिए जिससे हमारे अन्दर से दुष्टता भाव इतना नियंत्रित हो जाए  कि वह किसी के  प्राण हनन में परिणित ना हो .
जिस दिन युध्द ,संघर्ष या छिपे तरीके से हत्या और जाने बूझे मौत की वीभत्सता देखने केअभिशाप से समाज मुक्त होगा .
उसदिन सचमुच हम सभ्य होंगे .

जलियांवाला में उन्नीस सौ उन्नीस में , हजारों मौतों को दुश्मन का कृत्य कहा गया .
उन्नीस सौ चौरासी की हजारों मौतें तो कोई दुश्मन के द्वारा नहीं की गईं .
जलियांवाला में नाम अवश्य अंग्रेजों का हुआ पर मारने वाले उसमें भी यहीं के जन्मे थे .
मारने वाला किसी का सिपाही या दुश्मन का आदमी या अपना पराया नहीं होता वह तो "निज स्वार्थ के सिपाही"  होता है .

जलियांवाला के सिपाही भारतीय हो के भी भारतीय के सीने पर गोली दाग रहे थे . क्योंकि उस आदेश को मानने पर ही उनके प्राण और नौकरी सुरक्षित रहनी थॆ. उन्नीस सौ चौरासी में भी मारने वाले अपने कुकृत्य को कारनामे के रूप में रख अपने मालिकों से उपकृत होने का स्वार्थ देख रहे थे .

हमें स्वार्थ को नियंत्रित करना होगा जिससे इस तरह घोर अनैतिकता और अन्याय अपने जीवन में हम ना करें .
जब ये नियंत्रण स्वयं से आरम्भ कर सकेंगे तब मानवता के पथ पर समाज प्रशस्त  सकेगा और हमारा समाज "सच्चा सभ्य मनुष्य समाज" हो सकेगा .


इस समय हम हैं अतः यह दायित्व हमारा है ...

इस समय हम हैं अतः यह दायित्व हमारा है ...
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किसी लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में जब तक बढ़ना होता है .
तब तक हम उस पर पहुँच ना जायें .
हम "मानवता और समाज हित" के लिए कठिन लक्ष्य ह्रदय में बसाये बैठे हैं .
अतः किसी निराशा से हमें बैठ जाने से बचना है .
हम क्रम यह निरंतर रखें ...
लक्ष्य पर कदम हमारे न पहुंचें कोई पछतावा न होगा यदि 
"हमारी प्रेरणा से कुछ सहस्त्र कदम उस दिशा में अग्रसर होने लगें 
और फिर किसी दिन कोई कदम उस लक्ष्य पर पहुँचने में सफल हो जाए "

वास्तव में पाषाण युग से इस युग तक मानव विकास के पीछे का रहस्य यही है 
किसी एक ने यहाँ तक मानव को नहीं पहुँचाया है . 
अपना पात्र अनेकों ने निभाया फिर परम्परा आगे बढ़ाने का दायित्व दूसरों को सौंप वे जाते रहे .
नवागन्तुक बढ़ाने का यह क्रम निभाते हैं .
इस समय हम हैं अतः यह दायित्व हमारा है ...

Wednesday, May 1, 2013

'मै बरगद', कहता तुमसे मानव

'मै बरगद', कहता तुमसे मानव
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 1 (क्या महिमा है बरगद की )...     

वाह, अस्तित्व बरगद पेड़ का देखो
रह सकता विद्यमान शताब्दियों तक
ऊपर पेड़ पर 'मानव पूर्वजों' को आश्रय
वृक्ष के नीचे थके हारे मानव को छाया

पक्षी बनाते टहनियों पर घोंसला
करते कलरव सुबह-शाम इस पर
फल अनंत सूक्ष्म जीवों का भोजन
श्रध्दा-नत होता मानव सम्मुख

प्राचीनकाल से तपस्वियों ने प्रकटाया
'ज्ञान' छत्रछाया में तप करने पर
फिर भी मानव आज इसे काट रहे
नष्ट कर सुन्दर प्रकृति मिटा रहे

 2 (बरगद ने जन्माई कवि अनुभूति)...

प्रशंसनीय "वह" जब बने ज्यादा अच्छा
मिटाने के पहले रहा था जितना
किन्तु आधुनिकता कह हम बना रहे
और पुरातन सारी शैली मिटा रहे

देख अनुभव में उठती शंकाएं
पक्षपात नहीं कथन में करेंगे
नए सृजन में कई अच्छाईयाँ 
आधुनिकता में बुराइयाँ भी भासित

मनुष्य जीवन सरलता के लिए
जो तंत्र बनाया पुरातन मिटा कर
उसमें क्या आज समाज सुखी है ?
या सच्चा था तब ज्यादा सुखी था

बनाये साधन जिनमें कई उपयोगिता
किन्तु ला खड़ी कीं भौतिक प्रतियोगिता
सबसे ज्यादा धनवान होना चाहते हैं
सबसे रूपवान बन जाना चाहते हैं
सबसे बुध्दिमान कहलाना चाहते हैं
सबसे ज्यादा लोकप्रिय होना चाहते हैं

मेरी मातृभाषा सबसे अच्छी है
देश मेरा महानतम है दुनिया में
मेरा धर्म ही सर्वोत्कृष्ट धर्म है और
मेरी मनुष्य नस्ल सबसे बेहतर है
और भी ना जाने कितने अभिमान हैं

ना मालूम क्या क्या सिध्द करेंगे
सिद्ध होगा या परस्पर लड़ मरेंगे

 3(कवि बरगदमयी हो करता निवेदन)...

मै बरगद कहता तुमसे मानव
नयन दोष दूर कर मुझे देखो
कितनों की मै करता सहायता
स्थायित्व से रख स्व-अस्तित्व
गंभीरता मेरे भाव में देखो
शीतलता स्वभाव में देखो
सहनशक्ति प्रशंसनीय देखो
शीत ऋतू नहीं ठिठुराती मुझको
झेलता सूर्य झुलसाती ग्रीष्म तपन को
सहता मूसलाधार बारिश वेग को भी मै
और जिस दिन में थक चला जाता
तब आगे युवा अपने छोड़ जाता
जो मेरे बाद में भी खड़े रहकर
चलाते परम्परा 'बरगद' सर्व हितकारी

मै खड़ा शताब्दियों से हूँ अतः
बताता प्रत्यक्ष देखी ही तुमसे
मानव तुम भी थे मुझ जैसे ही अच्छे
वापस आ जाओ मानवता के पथ पे
बन जाना जब फिर से अच्छे
नहीं शिकायत मिटा देना तब तुम मुझे

राजेश जैन
02-05-2013