Wednesday, April 10, 2013

मानवीय और सामाजिक कर्तव्य

मानवीय और सामाजिक कर्तव्य 
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युवतियाँ (जो हमारी बहन और बेटियाँ हैं ) विशेष कर व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत या छात्रावास में निवास करते अध्ययनरत होती हैं . वे बहुत समय ऐसा पाती हैं जब किसी परिस्थिति में उन्हें क्या करना है या क्या नहीं करना है उसका निर्णय उन्हें स्वयं करना होता है . क्योंकि हर समय अनुभवी और बड़े परिवारजन उनके साथ नहीं होते हैं .अध्ययन या कार्यालयीन /व्यवसायिक विषय पर निर्णय तो उनके विषय दक्षता के ही होते हैं जो सही ना होने पर थोड़े कठिनाई या क्षति के साथ भूल सुधार और परिवर्तित किये जा सकते हैं .

जिन निर्णय के प्रभाव नारी जीवन पर विपरीत हो सकते हैं वे विपरीत लिंगीय आकर्षण से सम्बंधित हैं 
युवतियाँ घर के बाहर जहाँ भी अकेली (परिजनों से दूर ) होती हैं वहाँ अधिकतर पुरुषों की उनके आसपास सक्रियता इस नीयत से होती है कैसे वे युवती को प्रभावित कर लें ,उनकी निकटता उन्हें मिल जाए . अगर इसमें सफल हुए तो आगे बहुत सी मनबहलाव संभावनाओं  के द्वार उनके लिए खुल जाते हैं . यहाँ पुरुषों का एक ठीक विपरीत चरित्र देखा जा सकता है ,वही पुरुष जो घर में बहन ,बेटी या पत्नी से संस्कारों ,परम्पराओं और संस्कृति की दुहाई देता है , अन्य की बहन ,बेटी या पत्नी से आधुनिकता के नाम पर स्वछन्द व्यवहार की अपेक्षा और उसको प्रेरित करने लगता है .वह सफल अगर होता है तो फिर नारी उसके लिए सुविधा या उपभोग की वस्तु होती है .जब तक अच्छी लगी साथ रखी ,और पुरानी या असुविधाजनक लगी तो अलग कर दी . युवतियाँ अगर उनके मंतव्य समझने में भूल कर बैठी या विलम्ब कर बैठी तो उनका साथ करने का लिया निर्णय उनके आगामी जीवन पर दुष्प्रभाव कारक सिध्द हो जाने वाला होता है .
इन दुष्प्रभाव को जीते युवतियों के हावभाव से भनक जब तक घर के पुरुषों को पहुंचती है तब घर का परंपरागत पुरुष (पिता ,भाई ,पति इत्यादि ) युवती के दुःख में स्वयं दुखी हो लेता है . और यदि परिवार की नारी का शोषण उनकी सहनशीलता के बाहर होता है तो उनकी हिंसकता आत्मघाती /युवती के लिए हानिकारक/घातक  या फिर उस पुरुष की  ख़राब परिणिति का कारण बनती है . जो  किसी दूसरे  की बहन बेटी के साथ पथ भ्रमित करने वाली आधुनिकता का व्यवहार करते हैं. जबकि स्वयं की घर की नारियों के साथ वे परम्परागत ,उच्च चरित्र समर्थक पुरुष होते हैं .

अगर पाँच -दस प्रतिशत युवतियाँ भी इस तरह की स्थितियों (विपत्ति ) में जा पहुँचती हैं . तो समाज को इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना होता है . शोषित नारी अवसाद ग्रस्त ,दुखी होती है उसके परिजन दुखी हो जाते हैं .प्रतिक्रिया में यदि अपराधिक कृत्य  घटित हो गया तो स्वयं और दूसरे पक्ष के लोगों के गहन दुःख के कारण तैयार हो जाते हैं .और समाज में दुखी कोई विद्यमान हैं और यदि उनकी संख्या दस प्रतिशत तक की है तो समाज सुखी कैसे हो सकता है .


स्थिति इतनी विकट यदि  नहीं बनी .पुरुष मित्र की चंचल मन प्रवृत्ति को युवती ने जल्दी भाँप लिया और छुटकारा ले लिया तो भी असफल (कुछ प्रकरण में एक से अधिक भी होते हैं , जब तक कोई समुचित साथ मिलता है ) सम्बन्धों  और उससे छले जाने की कटुता और एक तरह का अपराधबोध उसके सीने पर असहनीय भार के तौर पर आजीवन रहता है . (भारतीय परिवार में सदस्यों के चरित्रवान रहने की आवश्यकता लगभग प्रतिदिन चर्चा में रहती है ) .
यह एक तरह से सौ किलोग्राम के पीठ पर लदे अदृश्य भार के सदृश्य होता है .जिसको जीवन भर ढोते जाने की लाचारी छली गई नारी को निभानी होती है .

किसी के जीवन प्रारम्भ होने पर यदि जीवन लक्ष्य एक हजार कि .मी . के जीवन पथ पर चलने के बाद मिलता मान लेवें . तो इस अदृश्य भार  (सही निर्णय/सावधानी  ना लिए जाने के परिणाम स्वरूप ) को ढोने की लाचारी से जीवन पथ पर बढ़ते कदम शिथिल हो जाते हैं . ढोते -ढोते आरम्भ से कुछ अस्सी -सौ कि. मी . तक पहुँच ही जीवन श्वांस टूटती हैं . उच्च जीवन शिखर /लक्ष्य तक पहुँचने की योग्यता रहते हुए भी उससे बहुत दूर रहते हुए ही जीवन सार्थकता जिए बिना हमारी बहन /बेटी या माँ चली जाती है . 

नारी ममता /करुणा की देवी होती है . अपनी ही पुरुष संतान पर दोषारोपण नहीं कर पाती .बलवान होने से बेटा ,भाई ,पति या पिता उसकी निर्देश /सलाह या प्रार्थना की उपेक्षा करता है .
पुरुष के कुत्सित बहलावों में आ उस समाज के सुख की रक्षा में विफल होती है जिसमें स्वयं उसके पुत्र /पुत्रियों (जननी है नारी सभी की ) को जीवन यापन करना होता है .
छलने के प्रतिफल में पुरुष भी जीवन सार्थकता को पाने में असफल होता ही है . वह स्वयं गलत निर्णयों /अपनी भूलों को लादे वह भी जीवन पथ पर जीवन शिखर या लक्ष्य से बहुत दूर जीवन श्वाँस खो देता है .

हम  आदरणीय /प्रिय माँ /बहनों और बेटियों एवं अपने अपने पतियों की प्रिया पत्नियों से विनम्र अनुरोध करते  हैं . स्वयं इन भूलों में ना पड़ो. स्वयं को बचाओ. उन पुरुषों को बचाओ ,जो किसी ना किसी आप की  ही तरह की नारी का पुत्र,पति या भाई हैं .

आपका स्वयं का बचाव अपने सम्पूर्ण  स्वरूप में स्वयं के निकट पुरुष सम्बन्धियों  के साथ समाज का बचाव करने वाला सिध्द होगा . नारी  जननी है. संस्कारों की प्रथम प्रदाता भी है . अतः नारी  से अनुरोध का आरम्भ करते पुरुषों से भी अनुरोध है . हमें अपनी ही बहन ,बेटी या माँ जो  नारी रूप में इस समाज में रहती है के साथ .हम  नारी- गरिमा का ध्यान कर आदर पूर्वक व्यवहार करें  .परिवार, समाज और देश को सुरक्षित एवं विश्वसनीय बनाना हमारा परम कर्तव्य है .जन्मजात रूप से ही हम ज्यादा शक्तिशाली हैं अपनी शक्ति न्यायप्रियता में हम लगायें . कब तक हम सब अपनी भूलों का अनुभव ना कर दूसरों को दोषारोपित करने का क्रम चलाएंगे . तथा इस समाज को क्रमशः बुरा ,और बुरा बनाते चले जायेगें . यह दिशा बदलनी अभी ही से आरम्भ करें .  यह सभी का मानवीय और सामाजिक कर्तव्य है .

राजेश जैन 

Monday, April 8, 2013

सभी बनें प्रिय प्रतिभाशाली ऐसे



सभी बनें प्रिय प्रतिभाशाली ऐसे
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"केवल अपने हित ही जीकर,जो चला गया "

तो फिर क्यों कोई उसके गुणगान करे ?

होगी प्रतिभा किन्तु वह पर की किस काम की ?



प्रतिभाशाली हम उसे कहेंगे

प्रतिभा से अपनी पहचाने जो

कहाँ जरुरत इस प्रतिभा उपयोग की 


प्रतिभाशाली हम उसे कहेंगे

मानव समाज का जो भला करे

जो ना देता जीवन अवसर तो

नहीं बनता मनुष्य भिन्न जानवर से

विचारो यह और भिन्नता लाओ

सदकर्म करो कुछ ऐसे, हे प्रिय ,प्रिया

आज जरुरत देश को इस योगदान की


प्रतिभाशाली हम उसे कहेंगे

जो मोड़े रुख मनु भटकाव दिशा का

कदम रोक दे फिसलन पथ पर उनके


प्रतिभाशाली हम उसे कहेंगे

जो आकृष्ट कर सके उस पथ की ओर

जिसके साथ साथ बहती सरिताएं

करुणा ,दया और स्नेह लिए प्रवाह में

आसपास जिसके तरुवर वे सुन्दर

जिनमें फलते फल परस्पर विश्वास के

मध्य क्यारियों में जिसके खिलते पुष्प

बनाते स्थल सुरभिमय जो


प्रतिभाशाली हम उसे कहेंगे

जो बनायें सुन्दर पथ ऐसे

परिवार ,मोहल्ले ,नगर अपने में

न सिर्फ देश अपने में बल्कि पूरे विश्व में


प्रतिभाशाली हम उसे कहेंगे

जो लगाये जन्मजात मनु प्रतिभा को

सर्वहिताय और सर्वसुखाय कर्मों में

जब बनेगा यह समाज , हे प्रिय ,प्रिया ऐसा

हमारा हित होगा अनायास ही पूरा


सभी बनें प्रिय प्रतिभाशाली ऐसे

भावना रखता में , हे प्रिय ,प्रिया आपसे

परहित में जो स्वहित अपने जीकर

जो चला गया हम कहे जायें, जाने पर ऐसा



परतंत्र विचारों , बाह्य संस्कृतियों के प्रति सम्मोहन से मुक्ति

परतंत्र विचारों , बाह्य संस्कृतियों के प्रति सम्मोहन से मुक्ति
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विदेशियों की परतंत्रता की जंजीरों से देश जकड़ा था हमारा आत्म-सम्मान ,स्वाभिमान विवशता में रोता था . हममें से जिन्होनें अतिरिक्त वीरता दिखाई ,उन्होंने प्राणों की ,परिवार की और अपनी जीवन लालसाओं को ह्रदय से परे कर राष्ट्र को स्वतन्त्र करने का लक्ष्य लिया .
उनमें अनेकों शहीद हुए , प्राणों की आहुतियाँ दे दी .इस विचार से उनके दूसरे भाई -बहन , बेटे- बेटियां स्वतन्त्र भारत में इस विवशता से मुक्त होंगे . देश के सभी हिस्सों से ऐसे वीर बलिदान हेतु आगे आये थे .
किसी क्षेत्र या जाति अथवा धर्म को कम या ज्यादा बताना एक तरह से उन लड़ाकों का अपमान ही होगा जिन्होनें देश को समग्रता से एक मानते और विचारते हुए अपने जीवन सुखों और प्राणों का बलिदान किया .
फिर भी पंजाब का उल्लेख अलग से करना होगा . इस माटी के सपूतों ने अदभुत वीरता और त्याग की अनेकों गाथाओं की रचना की .
ऐसे सभी सपूतों जिन्होनें जीवन और जीवन सुखों की आहुति दी, उनके ह्रदय में कहीं भी यह संकीर्ण भावना नहीं थी कि देश स्वतन्त्र होने पर कई हिस्सों में बँट जाए . फिर इस तरह चाहा जाना ,हमारे द्वारा उनके बलिदानों का अपमान करना सा लगता है .
देश स्वतन्त्र हुआ . उसके बाद इस तरह के बलिदानों की आवश्यकता नहीं रहनी चाहिए थी . स्वतन्त्र भारत में किसी को जीवन पर यह अपने जीवन सपनों को तज देने की लाचारी नहीं होनी चाहिए थी . और ना ही आत्मसम्मान और स्वाभिमान से किसी को कोई समझौता करना लाचारी होनी चाहिए थी . ऐसा सामाजिक और राष्ट्रीय परिदृश्य हम निर्मित करते तो स्वतंत्रता के वीरों /शहीदों को हमारे द्वारा यथोचित सम्मान या सच्ची श्रध्दांजलि होती .
अप्रिय है यह लिखना ऐसा परिदृश्य नहीं बना . स्वतन्त्र देश का स्वतन्त्र नागरिक  प्रभुत्व शाली राष्ट्रों का, उनकी जीवन शैली ,संस्कृति और तौर  तरीके से प्रभावित रहा और  पिछलग्गू  वैचारिक परतंत्रता में जकड़ा रहा .
इस परतंत्र विचारों के कारण हम अनायास उन शक्तियों को ही पुष्ट करते रहे जो इस उपमहाद्वीप की भव्य परम्पराओं और उच्च चरित्र को पनपते देखना पसंद नहीं करती थी . और इस कारण समय समय पर स्वतंत्रता के बाद भी बाह्य ताकतों ने हमें ही उपयोग कर हमारी घरेलु कलह को चालाकी से उग्र रूप प्रदान करने में सफलता पाई . भाई -भाई के बीच हिंसा उत्पन्न कर एक दूसरे के प्राणों का दुश्मन बनाया .

इस तरह जो शक्ति राष्ट्रीयता को पुष्ट कर सकती थी  वह विघटन में व्यय होती रही . 65 वर्षों बाद परिदृश्य यह है देश का युवा अपनी संस्कृति के बारे में कोई जानकारी नहीं रखता . परतंत्र विचारों को प्रसार करते आधुनिक साधनों पर वैश्विक संस्कृति से सम्मोहित हो सिर्फ और  सिर्फ भोग लोलुपता में आकृष्ट हो रहा है . जन्म यहाँ लेता है .बढ़ता पढता यहाँ है फिर अपने सपने तलाशने विदेशों में भविष्य ढूंढता है . और वहां हल्की श्रेणी का व्यवहार सहन करते हुए वहां के सिस्टम को पुष्ट करता है .
वहां भ्रमण कर या कुछ वर्षों निवास कर लौटे ,हमारे अपने  अपसंस्कृति का वाहक बन विभिन्न मंचों से आधुनिकता के नाम वह परोसते हैं .उससे धन और प्रतिष्ठा अर्जित करने में सफल होता कोई   दिखता है तो युवा या बच्चा जो देश हित के लिए ख़राब और गंभीर परिणामों को नहीं समझता ,सरलता जान इसकी नक़ल करते हैं


कब तक यह क्रम हम चलाएंगे . कब तक दूसरों की कुत्सित चालों को नहीं समझेंगे . इस माटी से बन कर यहाँ खून खराबा स्वीकार करेंगे . उस पर नियंत्रण के लिए अपेक्षित त्याग ना कर .यहाँ भविष्य नहीं रहा इस तर्क पर देश से पलायन करेंगें . अगर ये सब हमें स्वीकार है हम वैचारिक परतंत्रता में ही अपना हित जानते हैं तो क्या आवश्यकता थी इतने बलिदानों की कीमत में स्वतन्त्र होने की ?
यह यथार्थ यदि अप्रिय लगता है हमें , तो फिर  कुछ व्यक्तिगत त्याग को हम तैयार हों . लड़ें एकजुट हो वह लड़ाई जो हमें परतंत्र विचारों और बाह्य संस्कृतियों के प्रति सम्मोहन से  मुक्त कराये .
सच्चा स्वतन्त्र भारत बनायें . आपसी संघर्षों को हम ख़त्म करें .पूरे राष्ट्र का  वातावरण और परिदृश्य इतना आदर्श बनायें जिससे  यहाँ जीवन बिताना हमारे बच्चे विश्व में सबसे शांत और सुखद मानें .

हम ने  वह पराक्रम देखा है जिसमें अपने निजी हितों से ऊपर उठ अपनी आगामी सन्तति (बच्चों ) के हित को प्रमुख कर वीरता से बलिदान तक दिया गया  है .

आओ कुछ तो बलिदानी आगे आओ . जीवन बलिदान नहीं चाहते. कुछ जीवन सुखों और व्यक्तिगत हितों का बलिदान कर इस भारत वर्ष की प्राचीन भव्यता को पुनः स्थापित करें . हमारे पीछे जैसे पहले था विश्व ,फिर वह हमसे मानवता की प्रेरणा लेने हमारे पीछे आये .

 

Sunday, April 7, 2013

मित्रो को पत्र


मित्रो को पत्र 
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किसी दिन फेसबुक फ्रेंड की संख्या बढ़ाने के प्रयास में मैंने आपको ऐसे ही फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा ,जिसे आपने सहृदयता से एक्सेप्ट किया . मैंने जो विचार और प्रस्तुतियां या सन्देश आपको लिखे उन्हें भी पुनः सहृदयता से ना सिर्फ आपने पढ़ा ही अपितु मेरा उत्साह भी बदाया .  

अपरिचित रहते बहुत गहन परिचितों सा और परिजनों सा सहयोग आपने दिया है .
इस बीच आज आपके फ्रेंड में से एक का रिक्वेस्ट मुझे प्राप्त हुआ ,मैंने उन्हें add कर लिया . मित्र बढ़ाना सिर्फ इसलिए चाहता रहा हूँ ,ताकि वे विचार जिन्हें मै अच्छे मानता हूँ ,ज्यादा में फैलाना चाहता हूँ .व्यक्तिगत स्वार्थ ना रख इसे मानवता और समाज हित में  मानता हूँ . 
मुझे इस का अनुभव है कि इन्हें पढना ज्यादा पसंद नहीं किया जाता . और पढ़कर कोई इसे अच्छा भी माने  तो उन्हें पालन करना आज ठीक नहीं समझता .फिर भी ऐसी कोशिशें मेरा मानना है निरर्थक इसलिए नहीं है क्योंकि आज अच्छे विचार और सिध्दांतों का अस्तित्व मिटता जाता है . अतः कोई ना भी ज्यादा गंभीरता दे और प्रकट में कोई लाभ ना भी दर्शित हो तो भी हमारे ये प्रयास इन्हें अस्तित्व में तो रख ही सकते हैं .

 हो सकता है समय चक्र बारी से पुनः इन्हें गौरव शाली स्थान पर कभी ला दे . तब तक कोई- कोई ही सही जैसे तैसे इन्हें जीवन्तता प्रदान करे . 

सादर,
राजेश जैन 

Saturday, April 6, 2013

स्वास्थ्यवर्धक सेवन


स्वास्थ्यवर्धक सेवन 
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स्वास्थ्य अच्छा होना साधारण बात है . और ख़राब हो जाना असाधारण बात है .जीवन जारी रखने के लिए उपयुक्त भोज्य सेवन आवश्यक है . रुग्णता आ जाने पर औषधि सेवन आवश्यक हो जाता है . 
इसलिए भोज्य और औषधि दोनों सेवन करने पड़ते हैं . लेकिन साधारणतः  भोज्य सेवन जिसमें आनंद भी है किया जाता है .(औषधि सेवन शायद ही आनंददायक होता हो )
 
उसी प्रकार मनुष्य समाज को एक जीव जैसा देखें तो उसके जीवन के लिए भी सेवन आवश्यक हैं . एक सेवन भोज्य है जो समाज के अंग मनुष्यों के ह्रदय में सदभाव और सद्विचार के माध्यम से मनुष्य समाज साधारण रूप से सेवन कर स्वस्थ जीवन जारी रखता है . मनुष्य समाज में रुग्णता की स्थिति में जो सेवन कर उसे पुनः स्वस्थ बनाया जा सके उसके लिए औषधीय रूप में कानून-व्यवस्था की सख्ती का सेवन करना होता है . 

और औषधिक सेवन निरंतर नहीं यदाकदा ही उचित है यह आनंददायी नहीं होता इसलिए इसका निर्माण (कानून-व्यवस्था का ढांचा ) किया तो जाना चाहिए पर उपयोग की परिस्थिति ना बन पायें यह प्रयास होने चाहिए .

आशय स्पष्ट है .. मानव  ह्रदय में सदभाव और सद्विचार बनें इनकी निरंतरता हो . जिसका सेवन मनुष्य समाज नियमित कर आनंद उठाता रहे . यह आवश्यक है . 

इसके लिए हम मनुष्य समाज के सदस्य होने के कारण हमारा कर्तव्य है हम अपने ह्रदय में सदभाव और सद्विचार को लुप्त ना होने दें .
सही भोज्य सेवन ना करने से रुग्णता आ घेरेगी यह अंदेशा होता है . फिर सही औषधि मिल सकेगी या नहीं इसमें संदेह भी रहेगा .अतः हम स्वयं अच्छे बनने के प्रति जागृत रहें यह हमारे आनंदमय जीवन के लिए उपयुक्त है .

हम इस तरह की जागृति प्रदर्शित ना करें और कानून व्यवस्था पर जीवन आनंद की पूरी तरह निर्भरता रखें .ऐसी सोच  हमारे आनंदमय जीवन कल्पना और अपेक्षा को क्षति ही पहुचायेगा .

हमारे (जो इस तरह लिखते  ,सोचते  और जीवन जीते हैं ) लेखन प्रस्तुतियों  में  धन और मान बढ़ाने के उपायों  का ना होना किसी के मन में यह संदेह कर सकता है कि शायद हम दृष्टि दोष के शिकार हैं जो इसमें  जीवन आनंद को देख ही नहीं पा रहे हैं . और इस तरह के जीवन सुख से वंचित हो रहे हैं .
किसी को भी ऐसी शंका हो तो उनसे हमारा अनुरोध है ,कृपया वो जीवन को इस दृष्टिकोण से देखें समझें ,जिससे हम इसे देख पाते हैं .... वैभव और मान के साथ ऐसे त्याग और जीवन लक्ष्य भी अति आनंद श्रोत होते हैं 


Thursday, April 4, 2013

सज्जन मनुष्य नस्ल

सज्जन मनुष्य नस्ल
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दैनिक जीवन में जुड़ रहे नित नए साधनों और सुविधाओं के कारण जीवन शैली में एक शताब्दी में इतना बदलाव आया जिसके कारण 100 वर्ष पूर्व के जीवन के विवरण पढ़कर सहज विश्वास नहीं हो पाता .
कैसे उस तरह से वे ऐसा सब कर सकते थे ? 20-25 कि .मी . का पगडंडियों पर चल लेना . पानी के लिए घंटों समय लगाना . गेहूं -दालों का हाथ-चक्की पर पीसा जाना . और कोयले की सिगड़ी या लकड़ियों से चूल्हा जला कर घंटों रसोई में लगा रहना . इत्यादि .

समय बदला साधन बदले . पुराने साधन लुप्त हुए सब सहज स्वाभाविक है .
ऐसे बदलाव में एक ऐसी चीज भी बदल गई जिसे नहीं बदलना चाहिए था . मनुष्य की कई अच्छाई भी लुप्त हो गई . समाज से  आपसी सौहाद्र कम हो गया . स्वार्थ-विहीन कर्म (परोपकार) कम हो गए . 

अगर हमें यह अच्छा नहीं लगता तो विचार करना होगा ऐसा क्यों हो रहा है ? और क्या इस प्रक्रिया को रोका जाना  है . अच्छे मनुष्य की नस्ल बचाई जानी यदि आवश्यक लगती है तो हमें इस हेतु अभी से ही गंभीर प्रयास करने होंगे .

हम मनुष्य में जिन  अच्छाईयों की विद्यमानता चाहते हैं . सर्वप्रथम वे यदि हममें नहीं हैं तो अभ्यास से उन्हें अपने में उपजाना आरम्भ करना होगा . जिस दिन हम ऐसा कर सकेंगे उस दिन लुप्तप्राय सज्जन मनुष्य नस्ल में एक की वृध्दि हो जाने का संतोष करना होगा . 

हमारा स्वयं का इस तरह से बदलना ,हमारा यह विश्वास बढ़ाएगा कि समस्त नए साधनों और सुविधाओं के बीच भी मनुष्य सज्जन बना रह सकता है . तब आत्म-विश्वास से हम और भी कई को इस नस्ल में परिणीत कर सकेंगे . 

अच्छा कुछ और को मानना और स्वयं वैसा नहीं हो पाना कमजोरी प्रदर्शित करती है . हमारे  स्व-नियंत्रण पर प्रश्न चिन्ह लगता है . और इस असमर्थता से हम समाज को अच्छा नहीं रख पायेंगे . प्रकट में शायद इसे (व्यस्तता के कारण ) नहीं मान पायेंगे . पर परोक्ष रूप से हम अपने बच्चों और आगामी संतति पर अन्याय के दोषी होंगे .

जिस तरह एक अच्छा घर अच्छी प्रतिष्ठा और ठीकठाक वैभव हम अपने बच्चों को विरासत देना चाहते हैं . वैसे ही एक अच्छे समाज की विरासत देना भी हमारा कर्तव्य होता है . आखिर हमारा बच्चा (फिर उसके बच्चे ) इसी समाज में जीवन यापन करेंगे .

क्या सुरक्षा के लिए देश से अन्य देशों में उनका पलायन हमें पसंद होगा . और यदि हाँ तो क्या आधुनिक ,सुविधा और वैभव संपन्न अमेरिकी या यूरोपीय संस्कृति हमें पसंद है ? क्या हमारे संस्कार और संस्कृति ठीक नहीं रहे हैं ?

हमारी इक्छा-शक्ति ,स्व-नियंत्रण , आत्मानुशासन और त्याग सज्जन मनुष्य नस्ल को लुप्त होने से बचा सकती है . मानवता यही है . अपना योगदान हम अपने जीवन उपरांत अच्छे समाज और अच्छी परम्परा को बढ़ावा देने के लिए जीवन रहते कर सकते हैं . अभी है बहुत समय हमारे जीवन में ... 

Wednesday, April 3, 2013

अविश्वसनीय ,अकल्पनीय

अविश्वसनीय ,अकल्पनीय 
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आधी से अधिक समस्या और बुराई अस्तित्वहीन हो जायें यदि हमारी विचार और सिध्दांत कुछ इस प्रकार हो जायें ...
(अ) .. अगर हम विवाहित पुरुष हैं तो विपरीत लिंगीय की हमारे जीवन में आवश्यकता ...
      (i) .. अंतरंग सम्बन्धों के लिए साथी ... अगले जन्म तक नहीं , पत्नी है अतः   नया साथ (अगले जन्म तक स्थगित)
      (ii) .. बहिन ,बेटी या माँ जैसा साथी ...   इसी जन्म में अनेकों हो सकते हैं , जहाँ तक किसी पर अनावश्यक बोझ ना बनें .

(ब) .. अगर हम विवाहित नारी  हैं तो विपरीत लिंगीय की हमारे जीवन में आवश्यकता ...
      (i) .. अंतरंग सम्बन्धों के लिए साथी ... अगले जन्म तक नहीं ,पति है अतः   नया साथ (अगले जन्म तक स्थगित)
      (ii) .. भाई,बेटे या पिता जैसा साथी ...   इसी जन्म में अनेकों हो सकते हैं , जहाँ तक किसी पर अनावश्यक बोझ ना बनें .

(स) .. अगर हम अविवाहित पुरुष /नारी  हैं तो विपरीत लिंगीय की हमारे जीवन में आवश्यकता ...
      (i) .. अंतरंग सम्बन्धों के लिए साथी ... एक की तलाश , लेकिन इसमें छल और धोखे को स्थान नहीं .
      (ii) .. भाई,बेटे या पिता जैसा साथी ...   इसी जन्म में अनेकों हो सकते हैं , जहाँ तक किसी पर अनावश्यक बोझ ना बनें .

मनुष्य अकेला ऐसा प्राणी है जिसने एक परिवार में जीवनयापन की कल्पना और ऐसे समाज का विकास किया . इसके बाद भी अनेकों ने प्राचीन काल से आज तक चित चंचलता के वशीभूत अपने लिए बहु-अंतरंगता और ऐसे साथियों के लिए छिपे तौर पर और कहीं उजागर (बेशरमी से ) तौर मर्यादाहीन आचरण किया है.
 समाज में आधी सी अधिक समस्या और बुराई के मूल में यह प्रवृत्ति ही कारण है . इस कमजोरी पर अगर हम नियंत्रण करें तो समाज शाँत और आज की बुराई को बहुत कम स्तर पर ला सुखी हो सकता है .
एक बारगी ऐसा हो जाये यह अविश्वसनीय और अकल्पनीय लगता है . पर किसी एक के लिए यह भारी कार्य असंभव होते हुए यह अनेकों के लिए बँट जाने से छोटा कर्म है . सभी इसे सरलता से कर सकते हैं . जिस दिन बहुसंख्यक ऐसा ठान लेंगे सामाजिक असंतुलन दूर होगा .एक स्व-संतुलित और सुखी समाज का मार्ग प्रशस्त होगा ...

आप इनमें से किस विकल्प को चुनेंगे ?
 या 
आज अन्य अनेकों इन से अलग विकल्प पर जैसा चल रहे हैं .. आप भी उसी पर चलना जारी रखेंगे ?