Monday, March 11, 2013

जीवन बुनियाद

जीवन बुनियाद
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कोई भी विशाल निर्माण (भवन , ब्रिज इत्यादि ) की मजबूती में सर्वप्रथम जो बात महत्वपूर्ण होती है .वह उसकी  बुनियाद पर निर्भरता है . अर्थात भूमि के ऊपर का दर्शित प्रत्यक्ष महल की आयु , वह भूमि के अन्दर जिस बुनियाद पर निर्मित है की गहराई तथा मजबूती पर निर्भर करता है .

यही बात वृक्ष में भी देखी जा सकती है . भूमि के ऊपर दिखने वाले कई प्रजाति के वृक्ष विशाल आकार के दिखते हैं . लेकिन हजारों वर्ष की आयु उन वृक्षों को मिलती है जिनकी जड़ भूमि के भीतर विशाल आकार और गहराई तक फैलती है . 

उपरोक्त उल्लेख को पढ़ सभी को यह प्रश्न उठेगा कि सर्वज्ञात इस लौकिक सत्य के माध्यम से कहा क्या जाने वाला है ? लेखक को ज्ञात है आज सभी का समय बहुत कीमती है , जिसे व्यर्थ व्यय करना सभी को बेहद अखरता है . अतः संक्षिप्त में वह बात रख रहा हूँ .

जीवन शैली में आई व्यस्तता के कारण हम किसी बात को गंभीरता से सोच नहीं पा रहे हैं . हम सभी उतावलेपन का शिकार होते चले जा रहे हैं . हम सभी को व्यग्रता शीघ्र धन उपार्जन की है . शीघ्र मान प्रतिष्ठा की है . शीघ्र अपनी विशाल कोठी और आरामदेह वाहन की है . शीघ्र ही विभिन्न लौकिक सफलताओं की हैं . हम किसी से कम बनने या रहना नहीं चाहते हैं .

इस उतावलेपन के कारण आसपास अन्य  सभी जो  करते हैं हम उस पर अंधाधुंध अनुकरण करने का प्रयत्न करने लगते हैं . इस कमजोरी या उतावली में हम बहुत सी बातों को महत्त्व नहीं देते .

हमारी योग्यता क्या है , हमारा परिवेश क्या है ,हमारे संस्कार क्या हैं , हमारे पारिवारिक ,सामाजिक ,राष्ट्रीय और मानवीय दायित्व क्या हैं . और हमारी व्यक्तिगत रूचि के विषय क्या हैं . ये सारे प्रश्न के सही उत्तर पाए बिना . हम  अंधाधुंध अनुकरण के साथ बिना ठीक जीवन बुनियाद के अपने जीवन को जीना चाहते हैं . फिर    जीवन में अवसाद झेलते हैं और सच अनुभव जब होता है तो विभिन्न अपराध बोधों में घिरे होते हैं . एक तरह की बेध्यानि में जीते 70-80 वर्ष के होते हैं , तो विभिन्न अपेक्षाओं की पूर्ति होते ना देख जीवन संध्या में निराश और पछतावे में होते हैं .

स्वतंत्रता को 65 वर्ष हो गए . स्वतन्त्र होने के पूर्व परतंत्रता ही प्रमुख समस्या लगती थी . उपरोक्त अनियोजित जीवन बुनियाद  और भ्रामक और छद्मता के अनुगामी हो आज जिस मंजिल पर देश और समाज आ पहुंचा है . कतई स्वस्थ नहीं है .

हम सतर्क हों . बुनियादी सुधार अभी संभव हैं . उसके लिए हममें से प्रत्येक को स्वयं की जीवन बुनियाद सुधार लेनी चाहिए . अन्यथा हम धराशाही हो सकते हैं . हमारा देश और समाज दूसरी अप-संस्कृति के हाथों पुनः परतंत्र हो सकता है .

हममें से प्रत्येक विभिन्न प्रतिभाओं के साथ जन्मा है . अपनी प्रतिभा को पहचाने . अपने कर्तव्यों को पहचाने . अपने आचरण और कर्मों में धीरे-धीरे सुधार लायें .
और याचक के रूप में शेष विश्व के समक्ष ना जाते हुए ,दूसरों को अपने उपहास का अवसर ना दें . लेखक ज्यादा कुछ सलाह नहीं दे सकता आप अपने विवेक और न्याय से ही सलाह करें ....


Saturday, March 9, 2013

प्रेरणा -मानवता और समाज हित


प्रेरणा -मानवता और समाज हित 
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जीवन एकरसता बदल जाए 
ये सोच साथ फेसबुक पर आए   
हम छाया चित्र प्रदर्शन को लाये 
सब अपनी रचना साथ यहाँ छाये  

हम निकालें समाज हित यहाँ से 
हम बड़ा सकें मानवता इस सहारे 
मनोरंजन और विचार विमर्श से 
कर सकें बुराई नियंत्रण साथ  में 


गड़ाते नेत्र मॉनिटर पर 
करते नेत्र ज्योति कम 
समय बहुमूल्य व्यय करते 
ब्राड बेन्ड पर करके व्यय 

यद्यपि नहीं यह व्यापार 
किन्तु इतना निवेश हमारा 
कुछ हासिल हो बदले में इसलिए 
प्रेरणा -मानवता और समाज हित 

के माध्यम उपस्थित होता नित मै  
त्रुटी युक्त अनुमोदन होता बुरा 
अनुमोदन तब ही आप आप करें 
अगर उद्देश्य उल्लेखित होता पुष्ट 

राजेश जैन 
09-03-2013

https://www.facebook.com/PreranaManavataHit

कृष्णा

कृष्णा

 4 जून 1978 - ज्ञानचंद आज दुखी, किस्मत को कोस रहे हैं। 3 पुत्रियों के कल तक पिता थे। आज पत्नी को प्रसव वेदना हुई, अस्पताल ले जाते वक़्त वे पुनः पुत्री जन्म से आशंकित थे। ऑपरेशन कक्ष से दरवाजा खुलने पर नर्स को निकलते देख ज्ञानचंद की चिंता चरम पर पहुंची। किसी तरह कंठ से बोल निकले पूछा। डिलेवरी नार्मल हुई ना? बेरुखी से नर्स ने कहा, हां, आप के बेटी जन्मी है। लगा कानों में किसी ने गरम शीशा उड़ेला हो। ज्ञानचंद, लोक लाज वश भी भाव-भंगिमा में प्रसन्नता नहीं दर्शा सके, उन्हें सदमे से उबरने में 10-15 मिनट लगे। तीन दिन बाद अस्पताल से पत्नी और नवजात बेटी को घर लाते समय तक वह साधारण आर्थिक परिस्थिति के गृहस्थ काफी हद तक सामान्य हो चुके थे। परिवार में ज़िन्दगी सामान्य ढर्रे पर चलना आरम्भ हो चुकी थी। रीति से पुत्री का नामकरण करते हुए नाम रखा गया "कृष्णा"। कृष्णा, अपनी बड़ी तीन बहनों (एक पाँच, दूसरी तीन और तीसरी दो वर्षीया ) के कौतुक का विषय हो गई। तीनों उसे गोद में लेने, हंसाने और खिलाने की कोशिश करतीं। माँ का ध्यान अपनी अपेक्षा कृष्णा पर ज्यादा देख अपनी उपेक्षा से रूठती भी थीं। 

समय धीमे धीमे बीत रहा था दो-ढाई वर्ष की वय में ही कृष्णा दूसरे बच्चों से ज्यादा समझदार प्रतीत होने लगी। बाल सुलभ उसकी हरकतें, सामान्य माँ-पिता को अत्यंत प्रिय लग सकती थी किन्तु ज्ञानचंद और उसकी पत्नी, पुत्र ना होने तिस पर चार पुत्रियों के होने से दुखी रहते, उन्हें यह देख भी प्रसन्नता ना होती। 

अभाव ग्रस्त भारतीय परिवार में जिस तरह बच्चे पलते हैं, वैसा लालन-पालन कृष्णा और उसकी बहनों का होता रहा। यद्यपि स्कूल में कुशाग्रता के कारण कृष्णा अपनी शिक्षिकाओं और सखियों में शीघ्र चहेती हो गई। घर में अपनी ओर माँ-पिता की बेध्यानी और अभाव के बाद भी शिक्षिकाओं और सखियों के स्नेह में बिना विशेष पीड़ा के कृष्णा कक्षा और उम्र में बढ़ने लगी। 16-मई 96 को कृष्णा के बारहवीं के परिणाम की पूर्व संध्या पर भोपाल से फोटोग्राफर और अखबार टीम कृष्णा का इंटरव्यू लेने आई। किसी को इसका कारण कुछ समझ नहीं आया था। दूसरे दिन समाचार पत्र में इंटरव्यू के साथ कृष्णा के मेरिट में प्रदेश में द्वितीय स्थान के प्रकाशित समाचार से, पहली बार कृष्णा को लेकर घर में प्रसन्नता देखने मिली थी। ये प्रसन्नता कृष्णा के लिए ज्यादा दिन नहीं रही। उसकी चिकित्सा विज्ञान में रुचि को अनदेखा कर माँ-पिता ने दकियानूसी सोच रख, उसे बाहर भेज कर शिक्षा दिलाने की मनाही कर दी। कृष्णा में जागृत हुई अनायास महत्वाकांक्षा, वहीं दमित हो गई। अभाव में प्रसन्नता से समझौते की अभ्यस्त किशोरी छिन्दवाड़ा में ही, कला संकाय में पढ़ते हुए अच्छे अंकों से स्नातक परीक्षा पास करने में सफल हुई। और पोस्ट ग्रेजुएट के लिए प्रवेश लिया। 

उधर नागपुर में हेमंत जिसके पिता, राजनीतिक दबदबा रखते थे ने 3 वर्ष पूर्व समाचार पत्र में छपे इंटरव्यू तथा कृष्णा के फोटो से प्रभावित हो, कृष्णा को अपने सपनों में बसा लिया था। इस वर्ष जब हेमंत के पिता दिवाली बाद, उसका विवाह करने के लिए गंभीर दिखे तो हेमंत ने कृष्णा से, अपने विवाह की इच्छा प्रकट कर दी। 

31 जुलाई 99 को लड़के वालों और वह भी राजनीतिक दबदबे वाले प्रतिष्ठित घराने से, स्वयं विवाह का प्रस्ताव, कृष्णा के पिता को दूरभाष पर मिला तो खुशियों का स्तर कृष्णा के मेरिट में आने वाले दिन से भी ऊँचा जा पहुंचा था। 

आमंत्रण अनुसार, आज 9 अगस्त को कृष्णा और पिता, हेमंत के परिवार और निकट सम्बन्धियों से मिलने जा रहे हैं। जिससे दिवाली बाद विवाह तय करने को दिशा मिल सके। सुबह घर से रवाना होते समय बरसात और मौसम के रुख से पिता चिंतित थे। बस जो उन्हें मिली वह भी बहुत ठीक नहीं थी। अन्य यात्री भी असुविधा अनुभव कर रहे थे। बरसते पानी में धीमे गति से बस सौंसर पहुंची थी। बस यात्रियों की असुविधा और बढ़ गई जब पता चला कि आगे नदी में बाढ़ से नागपुर रोड अभी बंद है। 

आधे घंटे खड़े रहने के बाद जब बारिश कुछ थमी तो ड्राईवर ने इस आशा से की अब बाढ़ उतरने के आसार हो रहे हैं, बस आगे बढ़ाई थी। बस जब जाम नदी पर पहुंची तो पानी का स्तर उतरता दिख रहा था। कुछ देर खड़े रहने पर जब पानी रोड पर लगभग दो फुट ही रहा तो आगे के कुछ वाहनों ने पुल पार करना आरम्भ कर दिया। कुछ को पार कर लेने के बाद, इस बस के ड्राईवर ने भी यात्रियों के भयभीत होने पर भी बस पुल पर उतार दी थी। कृष्णा आगे जीवन की कल्पनाओं में खोई कुछ जागी कुछ सोई थी। ड्राइवर की जल्दबाजी से असहमत थी। पर कुछ ना कर सकी। 

"बस के पानी में उतरते ही हिचकोले अनुभव कर उसका कलेजा मुँह को आता है। आधे पुल पर पहुँचने पर एक धड़ की आवाज के साथ बस पानी तरफ झुकती है। चीख पुकार मचती है। कृष्णा को चारों तरफ पानी का अहसास होता है। आँख बंद हो जाती है सांस लेने में कठिनाई होती है। जागी आँखों में चल रहे सपने गुम हो जाते हैं। छटपटाहट कुछ देर रहती है फिर कृष्णा की चेतना लुप्त हो जाती है। "

खोजियों और गोताखोरों को अगले दिन अन्य यात्रियों के साथ कृष्णा का शव (पानी में फूला हुआ ) मिलता है। प्रत्येक जीवित व्यक्ति के हृदय में उमंग, भावनाओं, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और जीवन सपनों की सुखद कल्पना होती है। जिसे तमाशबीन कृष्णा के शव को देखते हुए समझ नहीं सके थे कि किन अपूर्ण कामनाओं को अपने सीने में लिए, मासूम यह युवती अचानक दुनिया से चली गई थी। 


(नोट -  9 अगस्त 1999 को हुई छिन्दवाड़ा म प्र जिले की ह्रदय विदारक बस दुर्घटना में एक भी यात्री जीवित ना बच सका था। 14 वर्ष पूर्व अपने तब की जीवन दृष्टि और कल्पना से बस में मारे गए यात्रियों के अकाल गमन से अधूरे उनके जीवन स्वप्न को, कृष्णा के काल्पनिक पात्र को माध्यम से चित्रित करने का मैंने प्रयास किया था। कृष्णा, अगर ऐसी अकाल मौत का शिकार ना होती तो कृष्णा का आगामी जीवन क्या हो सकता था, यह कल्पना भी मेरी डायरी में लिपिबद्ध है। आज जब में इसे, की-इन कर रहा हूँ तो उसमें अपने 14 वर्ष के और जीवन अनुभव से कुछ संशोधन कर प्रस्तुत कर रहा हूँ। यथार्थ को पलटते हुए कृष्णा की बस दुर्घटनाग्रस्त नहीं होती है।) आगे - 


कृष्णा आगामी जीवन की कल्पनाओं में खोई कुछ जागी कुछ सोई थी। वह, ड्राइवर की जल्दबाजी से असहमत थी। पर कुछ ना कर सकी। (ऊपर वर्णित कहानी के अंतिम से पहले, पैराग्राफ के इस वाक्य को निम्न तरह संशोधन के साथ कहानी का यह भाग आगे यूँ बढ़ता है )


कृष्णा आगे जीवन की कल्पनाओं में खोई कुछ जागी कुछ सोई थी। ड्राइवर की जल्दबाजी से असहमत थी। उसने ड्राइवर से बस रोकने कहा। प्रत्युत्तर में

ड्राइवर -- सब तो निकाल रहे हैं, हम भी निकल लेंगे। 

कृष्णा -- अगर आप जाना चाहते हो तो हम सब को उतार दो। 

ड्राइवर बस किनारे कर रोक कर यात्रियों के तरफ प्रश्नात्मक दृष्टि से निहारता है। 

ज्ञानचंद ने कृष्णा को इस दृढ़ रूप में पहले नहीं देखा था। वे अचंभित होते हैं। कुछ और यात्री भी कृष्णा से सहमति जताते हैं। ड्राइवर इस विरोध के कारण खिसियाया सा है। तब पीछे एक बस का हॉर्न सुनता है। उसका ड्राइवर अपनी बस आगे बढ़ाता हुआ इस बस ड्राइवर की तरफ कटाक्ष दृष्टि से देखता है। कृष्णा बस से उतर कर उस बस के सामने खड़ी हो, उसे भी नदी के पानी को पुल से नीचे के स्तर पर आ जाने की प्रतीक्षा करने कहती है। वह ड्राइवर नहीं मानता है। कृष्णा को सामने से हटने कहता है। ज्ञानचंद, कृष्णा का हाथ पकड़ सड़क से किनारे की ओर हटाते हैं। 

उस बस का ड्राइवर और कुछ यात्री, कृष्णा पर हँसते हुए, उन्हें पीछे छोड़ते हैं। वह बस आधे पुल पर जा कर डगमगाती है। फिर दुर्भाग्यपूर्ण तरिके से पलट कर नदी की तीव्र धार में क्रमश डूबते जाती है। पुल के दोनों ओर के यातायात रत लोगों को यह डरावना दृश्य दिखता है। वहां हाहाकार मचता है। कोई कुछ कर सकने में असमर्थ है। उपस्थित तैराक भी पानी के तीव्र वेग से भय खाते हैं। नदी में उतरने तैयार नहीं होते। 

देखते देखते बस में उपलब्ध 50-55 लोग, असमय काल का ग्रास बन जाते हैं। कृष्णा कुछ ही पल पहले उनके हँसते मुख और अभी के डरावने दृश्य के तुलना से सदमे में पड़ बिलख कर रो पड़ती है। क्यों ना हो युवतियां स्वभावतः भावुक होती हैं। उधर इस बस के यात्री भयग्रस्त तो हैं पर चर्चा कर रहे हैं। कृष्णा ने पुल पर दुर्घटना का पूर्व आभास कर लिया था। उन्हें लग रहा है, इस मासूम सी लड़की ने आज, उनके प्राणों की रक्षा की है। इस बीच प्रशासनिक अमला आकर पुल पर यातायात रोकने का आदेश जारी कर राहत कार्य में व्यस्त हो जाता है। 

घर, वापिस आकर ज्ञानचंद, हेमंत के पिता को दूरभाष पर वृतांत सुनाते हैं। हेमंत का परिवार इसे सुन कृष्णा में, दैवीय शक्ति होना मानता है। मिलने का कार्यक्रम स्थगित किया जाता है। फिर दशहरे बाद एक दिन छिन्दवाड़ा पहुंच कर, हेमंत के परिवार वाले कृष्णा से, हेमंत के रिश्ते की स्वीकृति चाहते हैं। कृष्णा भी उन सब से प्रभावित होती है। 

3 - दिसंबर को विवाह दिन तय होता है। विवाह हो जाता है। कृष्णा को मायके से अलग, ससुराल में पारिवारिक और आर्थिक पृष्ठभूमि सुदृढ़ मिलती है। कृष्णा, पढ़ाई आगे जारी रखती है। हिंदी साहित्य में शोध कर डॉक्टरेट करती है। उसके श्वसुर विधायक निर्वाचित होते हैं। कुछ वर्षों में मंत्री भी बनाए जाते हैं। कृष्णा को इस बीच एक पुत्र की माँ बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है। 

हेमंत के सहयोग से प्रतिभावान कृष्णा को, स्व-व्यक्तित्व निर्माण का अवसर मिलने लगता है। समाज में नारी दशा पर स्वयं का अनुभव और आसपास नारियों की असमर्थता पर वह अत्यंत संवेदनशील होती है। 2007 में फेसबुक पर आकर, नारी में प्रेरणा और संबल बढ़ाने की दिशा में सक्रिय होती है। अपना समर्थन जुटता देख कृष्णा का उत्साहवर्धन होता है। वह फेसबुक पर 2013 में, एक पृष्ठ "नारी चेतना और सम्मान रक्षा " निर्मित करती है। 

हेमंत के सहयोग से कृष्णा, एक मासिक हिंदी पत्रिका भी इसी नाम से प्रारम्भ करती है। प्रबुध्द पुरुष और जागरूक नारी का ओजस्वी लेखन "नारी चेतना और सम्मान रक्षा " फेसबुक पृष्ठ और पत्रिका को लोकप्रिय बनाता है। इससे धीरे धीरे इस देश की और समाज की नारी का आत्म-विश्वास बढ़ता है। नारी की दशा धीरे-धीरे सुधरने लगती है। 

2023 आते आते देश की नारी में भारी बदलाव दृष्टिगोचर होने लगता है। कुछ दशक पूर्व की नारियों की प्रवृत्ति जिसके वशीभूत वह पाश्चात्य संस्कृति को आधुनिक और अनुकरणीय मान पाश्चात्य नारी बनने की दिशा में बढ़ती थी, बिलकुल बदल जाती है। देश और समाज को एक सशक्त नेतृत्व, कृष्णा के रूप में मिलता है। 

भारतीय गरिमा से पूर्ण नारी रूप आधुनिकता का प्रतीक बन जाता है। 2030 आते आते अकेले भारतीय ही नहीं शेष विश्व की नारी भी, इस आधुनिकता के पथ पर चलने लगती है। नारी अब भोग की वस्तु जैसी प्रयुक्त नहीं हो रही है। ना ही पुरुष इसे, इस हलके रूप में देखने की धृष्टता कर रहा है ना ही नारी अपने इस तरह के उपयोग (शोषण ) को अब तैयार है। 

कृष्णा 2032 तक विश्व की सबसे चर्चित महिला हो जाती है। विश्व चैनल पर दिए अपने इंटरव्यू में वह राज की बात बताती है। 

9 अगस्त 99 को बस दुर्घटना में वह स्वयं मर गई है, यह मानती हुई कृष्णा, अपने शेष जीवन को समाज की धरोहर मानने लगी थी। उसके बाद से उसे अपने स्वहित के लिए जीने की कोई इच्छा नहीं रह गई थी। कृष्णा अपने इष्ट ईश्वर, द्वारा इस अवसर को एक पुनर्जन्म लिया मानती है। ईश्वर का संकेत समझकर, अपने जीवन को, मानवता और समाज हित में प्रेरणा देने को समर्पित करने का संकल्प लेती है।  कृष्णा अपना जीवन इसी ध्येय में लगाये हुए है। आज की नारी की स्थिति को इस रूप में ले आ सकने का मूल कारण कृष्णा, यही बताती है। 

इसी तरह और 20 वर्ष सक्रिय रहते हुए, सन 2052 में साधारण परिवार में जन्मी, और 74 वर्ष के जीवन में असाधारण व्यक्तित्व में परिवर्तित कृष्णा की, जब मृत्यु  होती है, तो पूर्ण विश्व इसे अपनी व्यक्तिगत क्षति मान कर बिलखता है। । 

इस कृष्णा के काल्पनिक पात्र प्रेरणा से निर्मित "नारी चेतना और सम्मान रक्षा " फेसबुक पेज का यूआरएल निम्न है। । 

https://www। facebook। com/narichetnasamman/

----राजेश चंद्रानी मदनलाल जैन

10-03-2013



Friday, March 8, 2013

कष्टमय जीवन को आमंत्रण


कष्टमय जीवन  को आमंत्रण
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तहसील मुख्यालय के छोटे नगर (वारासिवनी म .प्र  .) की आज से 30-35 वर्ष की सच्ची घटना है . एक बाबा एक दिन वहां पहुंचे . थोड़े अभावों और  कम पढ़े लिखे मौहल्ले में अपना ढेरा  जमाया . अंधविश्वासों के कारण कुछ लोग बाबा के पास जुटने लगे . उन्हें भोजन और मान मिलने लगा .वे चमत्कारों की बातें करते . लोगों का कौतुहल जागा .बाबा ने एक रात बताया वे सुबह चारपाई उड़ा कर दिखायेंगे . दूसरे दिन सुबह सड़क पर एक खटिया सहित 10-15 लोग बाबा के साथ इकठ्ठे हुए . बाबा ने खाट के चारों पाँव को चार भिन्न व्यक्तियों  के कंधे के ऊपर हथेली पर रखवाया . कुछ मन्त्र उच्चारित किये . फिर कहा देखो खटिया उड़ रही है . खाट हथेली पर रखे लोगों ने कहना आरम्भ किया हां उड़ रही है और एक दिशा में वे और खाट लिए  बाबा के पीछे  दौड़ने लगे . बाबा ने दौड़ते अन्य लोगों को भी बारी बारी खटिया हथेली पर रख खटिया के उड़ने को अनुभव करने कहा . सभी ऐसा करते ,पुष्टि करने लगे . खटिया उड़ रही है . उन्हें आगे दिशा में चला रही है . उस दिन 200-250 मीटर दूर तक अन्य लोगों ने दृश्य अपने घर-दूकान से देखा . कुछ चमत्कार से सहमत और कुछ कोरी अंध-श्रध्दा  कहे सुनते देखे गए .
इस तरह दूसरे दिन भी बाबा ने यह चमत्कार दिखाया उस दिन भीड़ में 80-90 लोग शामिल थे . तीसरे दिन चर्चा ज्यादा बड़ी सुन हरिशंकर जी भी भीड़ में पहुंचे , उन्हें देख कुछ और पढ़े लिखे लोग भी आ जुटे . बाबा को ससम्मान अभिवादन करने से हरिशंकर जी से बाबा प्रसन्न हुए . उन्होंने खटिया का एक पैर हथेली पर रखने हरिशंकर जी को दिया . और तीन अन्य साथियों के साथ हरिशंकर जी ने भी अनुभव किया . खटिया के साथ वे भी खटिया उड़ रही है कहते दौड़ने लगे . बाकि तीन पावों  से तो लोग बारी-बारी बदल खटिया का उड़ना परिक्षण करते रहे पर हरिशंकर जी का उत्साह बना हुआ था . वे सामने वाले खटिया के पाँव के नीचे बने हुए थे .

आज दूरी भी ज्यादा हो गई और खटिया का उड़ना जारी था . देखने वाले आश्चर्य कर रहे थे , हरिशंकर जी जैसे समझदार को क्या हुआ है . व्यर्थ बातों में आ गए हैं . खैर खटिया उड़ते हुए 1 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करते बाबा के साथ पुलिस थाने के द्वार से अन्दर पहुँच थम गई थी . हरिशंकर जी ने रिपोर्ट दर्ज करा ढोंगी बाबा को पुलिस के हवाले किया . और अंध-श्रध्दा के बाबा के खेल को विराम लगा .

यह घटना स्मरण करने की वजह है वह है ...

देश में व्यभिचार ,सिध्दांत -नैतिकता विहीन धन अर्जन , स्वार्थ-परस्ती और छल-कपट की खाट के नीचे बहुसंख्यक इकठ्ठे हो रहे हैं . कहते जा रहे हैं हम उन्नति कर रहे हैं , आधुनिक हो रहे हैं . हम उन्नति कर रहे हैं , आधुनिक हो रहे हैं  के नाम पर प्रचलित मर्यादाओं ,परिवार संस्कृति और परहित भाव को ताक पर रख दिया है . इस छद्म आधुनिकता की दिशा में देश बढते हुए कहाँ तक अनैतिक हो जाएगा इससे  वैयक्तिक लालसाओं और सुविधा सम्मोहन और व्यस्त जीवन शैली में हम में अधिकांश बेपरवाह होकर अपने मनुष्य जीवन को बेमोल गवां रहे हैं . इतना होता तो चिंता नहीं थी पर हम अनायास अपने आगामी सन्तति के  आज से अधिक कष्टमय जीवन  को आमंत्रण दे रहे हैं ...

अपनी संतानों के अपराधी


अपनी संतानों के अपराधी
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देश में लड़कियों ,युवतियों और महिलाओं पर कई किस्म के शोषण नित प्रतिदिन होते देखे सुने जाते हैं . पढने जाने वाली बेटियां घर से स्कूल और कॉलेज तक इन चर्चाओं में पढ़ती हैं . उन्हें हर समय अपने ऊपर जोर जबरदस्ती न हो भय रहता है . इस भयभीत दशा में बीतता समय उनकी कार्यक्षमता और आत्मविश्वास को बुरी तरह प्रभावित करता है . यह देश आज 25-30 करोड़ किशोरियों का देश है . आज की यह किशोरियां कल की पीढ़ी की जननी हैं . इनका सही विकास ,सही नैतिक और व्यवहारिक शिक्षा और घर के बाहर सुरक्षित विचरण यदि हम उपलब्ध नहीं करा सके तो आगामी पीढ़ी जो इन की गोद में पलेगी के सही संस्कार और शिक्षा की सुनिश्चितता अपेक्षा नहीं की जा सकेगी .

देश को मिलने वाले आगामी नागरिक सच्चे नहीं होंगे तो देश का भविष्य आज से बेहतर नहीं हो सकेगा . 

अगर हम अपने देश के वातावरण को आज से अच्छा बनते देखना चाहते हैं तो हमें भारतीय नारी जो हमारी अपनी माँ ,बहन या बेटी है के प्रति अपनी दृष्टि निर्मल करनी होगी . जहाँ भी यह हमारे साथ है वहां अपने आचार -व्यवहार से उसे पूर्ण सुरक्षित होने का विश्वास दिलाना होगा . तब नारी का भारतीय पवित्र और पूज्य रूप भविष्य में मिल सकेगा . जो अपने त्याग ,करुणा और दुलार के लिए प्रसिध्द रहा है .

दूरदर्शन पर डेली सोप और फिल्मों में आधुनिकता प्रदर्शित करने के लिए वे चरित्र नहीं दिखाए जाने चाहिए जो ना तो नारी का पूर्ण पाश्चात्य रूप है और ना ही भारतीय रूप है . बल्कि आधा अधूरा (भ्रमित )कन्फ्यूज्ड रूप है . जो कभी इस और कभी उस ओर झुक जाता है .

फिल्म और डेली सोप निर्माता धन कमाने के इस उपाय और लोभ से बचें . वे विश्वास करें ,हमारे संस्कृति और समाज की मर्यादा से संस्कारित नारी का भव्य रूप ही घर-परिवार ,समाज, देश और मानवता की दृष्टि से उत्तम है .

बाकि के विश्व में धन की बाहुलता से मानव जीवन जितना ही सुविधा पूर्ण हो पर वहां का परिवार और उनमे स्नेह और त्याग का बोध और बंधन  हमसे बहुत कम है . अय्याशी में जीवन बिताने वाले वहां के स्त्री पुरुष के मध्य सम्बन्ध बहुत अस्थाई बनते जा रहे हैं . स्त्री पुरुष के कुछ माहया वर्ष में  सम्बन्ध विच्छेद से उनकी संतान उनका आदर उतना नहीं कर पाती है ,जितना भारतीय माँ-पिता और बड़ों को मिलता है .

अचरज होता है . नक़ल अच्छी बात की नहीं , अपने से ख़राब वस्तु की कर क्यों हम अपनी अच्छाई खोते जा रहे हैं ? बेख्याली में थोड़े से मन बहलावे की कीमत पर हम अपना जो बुरा कर रहे हैं उसको हम ही भुगतेंगें सोच परे भी रखें तो  हमारे कर्म आचरण अनुचित ही  हैं  .
हम अपनी संतानों के अपराधी बन रहे हैं जिन्हें अपने स्वार्थ में सही जीवन पथ पर बढ़ाने के स्थान पर हम उन्हें इस पथ  से विमुख कर दे रहे हैं .  अभी विवेक-बुध्दि उनकी अपने भले बुरे को पहचान की पहचान की नहीं है . लेकिन जब हो जायेगी धिक्कारेंगे वे हमें ऐसे स्वार्थी माता पिता की संतान होने के लिए .


Thursday, March 7, 2013

प्रिय पुत्री

प्रिय पुत्री ,

तुमने मेरे जन्म-दिन पर पत्र लिखा था जिसमें लिखित एक एक भाव ने पत्र पढने के क्षणों को मेरे जीवन के अविस्मरणीय पल बना दिया था . उसके पूर्व मैंने तुम सहित दोनों बेटियों को घर के प्रति दायित्व बोध रखती , समझदार , और प्यारी तो माना था पर यह नहीं जानता था कि तुम और दीदी (तुम्हारी ) अपने साधारण पिता और परिवार के लिए ह्रदय में इस तरह के असाधारण भाव और सम्मान रखती हो . तुम्हें मै साइंस और इंजीनियरिंग की प्रतिभावान स्टूडेंट तो जानता था , पर ऐसे भावपूर्ण पत्र को लिख सकने की तुम्हारी क्षमता से अपरिचित था . अभी आगे भी पुत्रियों के प्रति मेरे दायित्व निभाना शेष हैं . इन्हें मै निभाने का कार्य और प्रयत्न जारी रखूँगा . पर तुम दोनों ने जिस तरह गंभीरता और सजगता से अपने कार्य और कर्तव्यों को समझा है , तथा अपने आचार और विचार रख शैक्षणिक समय का सदुपयोग कर रही हो , मुझे विश्वास होता है तुम दोनों ही परिवार, समाज और देश के लिए गौरव पूर्ण उपलब्धियां अपने जीवन में हासिल करोगी . यह विश्वास मुझे यह भी बताता है कि आगे के पुत्रियों और परिवार के प्रति मेरे कर्तव्य लगभग प्रयत्नहीनता  (एफर्टलेस)  से मै पूरे कर सकूँगा . तुम, दीदी और मम्मी (तुम्हारी) ने जिस तरह मुझे सम्मान ,प्रेम और सहयोग दिया है मै  परिवार के लिए कम प्रयासों से दायित्व निभा सका हूँ . जिससे ज्यादा समय और श्रम  मैंने अपने विभाग और इस तरह देश के सिस्टम को चलाने में लगाया है . अपने सामर्थ्य अनुसार ज्यादा प्रयास लगायें हैं . और आत्मिक -संतोष अनुभव किया है .
अब तक जीवन में  जिस स्थिति में आ सका हूँ . उसे मै परिवार ,समाज और देश से बिना मूल्य चुकाए मिला मानता हूँ .अतः मुझे प्रतिदान हेतु सामाजिक दायित्वों का अनुभव हो रहा है . एक उत्कंठा ऐसी उत्पन्न हो रही है कि  मै अपने समय के उन मानव साथियों का बड़ा भाई , या पिता समान कर्तव्यों को समर्पित करूँ जिन्हें जीवन में अपरिहार्य कारणों से या तो उचित संस्कार ना मिल सके हों या जिन्होंने बुरी संगतों में या बुरे सम्मोहनों में प्राप्त संस्करों को विस्मृत कर दिया है . जिस से वे स्वयं और समाज कठिन वातावरण में जीवन को बाध्य हो रहे हैं .मेरे मन में उन्हें फिर से संस्कारित आचार और कर्म की भावना जागृत करने के लिए जीवन का शेष समय लगा देने की भावना जोर मारती है . मै चाहता हूँ कोई भी युवती/युवक  मुझमें अपने भाई की , छोटी बच्चे  पिता सी , और बढ़ी महिलायें और पुरुष  बेटे सी छवि देख सकें .अपने लेखन के माध्यम से इसे प्रतिदिन करते हुए संतोष होता है . मुझे लगता है ऐसे और  प्रबुध्द इस प्रकार से सक्रिय हुए तो हमारा देश और समाज सुखी बन सकेगा . वंचित तथा देश के बहन , बेटियां और नारियां सम्मान और सुरक्षित होने का बोध कर सकेंगी .

आज तुम्हारा जन्म दिन है , उसकी तुम्हें बहुत बहुत शुभ-कामनाएं . तुमें यह बताना भी उचित होगा कि दोनों सपुतनियों को पा कर मुझे और तुम्हारी मम्मी को भी यह लगता है कि हमारे घर में विश्व की अच्छी बेटियों में से दो ने जन्म लिया है . तुम दोनों अपनी शिक्षा इसी तरह पूर्ण योग्यता से जारी रखो . और आधुनिकता में से अच्छाई और प्राचीन संस्कृति और संस्करों से अच्छाई ग्रहण करते हुए अपने आचार व्यवहार में संतुलन से   इसी तरह निरंतरता रखते हुए .. जीवन पथ पर पूरी भारतीय नारी के गरिमा के तरह अग्रसर होती जाओ .
तुम्हारा ,
पापा (राजेश जैन )
27-01-2013

Saturday, March 2, 2013

मन को स्पर्श- मानवता


मन को स्पर्श- मानवता
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तन का स्पर्श भौतिक वस्तु है . भौतिक वस्तु की संख्या सीमित हैं . हर भौतिक वस्तु की भांति इसकी (तन का स्पर्श) सीमाएं हैं . पूरे जीवन में एक शरीर को दूसरे से स्पर्श चाहे वह हाथ मिलाये जाने ,आलिंगन ,ममता , सहयोग ,कामसुख या किसी भी प्रकार का हो कुछ संख्या तक ही पहुँचता है .
 
दूसरी और मन का सच्चे अर्थ में स्पर्श मानवता है . यह असीमित है . एक के मन को स्पर्श कोई तब ही कर सकता है , जब उसकी भलाई कोई कर सके .कोई भी  भलाई प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से  किया जाना संभव है . भलाई जीवन में और म्रत्यु पर्यन्त भी की जा सकती है . उदहारण के लिए देखें एक छायादार , फलदायी वृक्ष कोई लगाता है . अब वह जीवित है या नहीं ,पर ग्रीष्म में लू लपट से व्याकुल कोई पथिक उस वृक्ष की छाया में रूकता है , तो शीतल छाया और बयार के माध्यम से वृक्ष लगाने वाला उस व्यक्ति के मन को स्पर्श करता है . उसके फल जब किसी की उदर पूर्ती को उपलब्ध होते हैं . तब भी व्यक्ति के मन को स्पर्श किया जा सकता है .
 हम जीवन में दूसरों के भलाई के परोक्ष और अपरोक्ष बहुत से कर्म कर सकते हैं . जो हमारे जीवन में और उसके उपरान्त भी अनंत  प्राणी मन को स्पर्श कर सकते हैं . मनुष्य जीवन क्या है?  किस प्रकार सार्थक किया जा सकता है ? अगर हम सोच नहीं पा रहे हों तो इस दृष्टिकोण से देखें शायद जीवन दिशा मिल सके .
आज भौतिक चाह  के पीछे सब भागते हैं . जिनसे प्रेरणा ग्रहण की जा रही है या जिन्हें अपना आदर्श सब मान रहे हैं ,वे भौतिकत से सम्मोहित हैं . स्वयं उसके पीछे भाग रहे अतः अपने पथगामी (followers) को भी दिग्भ्रमित कर उसी पथ पर चला रहे हैं . भौतिकता को पाने में परस्पर संघर्ष संभावित होता है . इस कारण मनुष्य समाज में संघर्षों को जहाँ तहां देखा और अनुभव किया जा रहा है . संघर्ष में सुख नहीं है .
सुख सहयोग में है . सहयोग के माध्यम से ही  मन को स्पर्श कर किया जा सकता है . सुख मानवता में है . मानवता को पुष्ट किया जाना आवश्यक है .
विचार आचरण और कर्मों की समीक्षा इस कसौटी पर स्वयं करें .
निश्चित ही आप स्वयं सुखी होंगें और दूसरों के सुख का कारण बन मानुष जीवन सार्थक कर सकेंगे . समाज हित का वातावरण बनाने में सहयोगी बन सकेंगे।