Saturday, February 23, 2013

आतिथ्य -भारतीय परम्परा

आतिथ्य -भारतीय परम्परा 
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वैभवपूर्ण प्राचीन भारतीय संस्कृति और उसको पुष्ट करती प्राचीन धरोहर (मंदिर , स्मराकें ,धर्म विश्वास ,ग्रन्थ,नदियाँ ,जलाशय  इत्यादि ) विदेशी सैलानियों को देश भ्रमण को आकर्षित करते हैं . 
इस आकर्षण के वशीभूत वे भारत आ पहुँचते हैं . विदेशी युवतियाँ जब अकेली होती हैं , तब विदेशी चलन से दुष्प्रभावित होकर यहाँ के कुछ पुरुष उन पर वासनामयी दृष्टि रखते हैं . वे समझते हैं विदेशी युवतियाँ शारीरिक संबंधों के बारे में स्वछन्द होती हैं . ऐसी सोच से प्रभावित हो उन से संबंधों को लालयित हो ऐसे आचरण करते हैं जो प्रख्यात भारतीय आतिथ्य के अनुरूप नहीं होता . प्रतिवर्ष कुछ ऐसे ही अनैतिक प्रयासों में उनसे दुराचार के कुछ प्रकरण बनते हैं ,उनमें से कुछेक प्रकरणों में विदेशी नारियों को प्राण भी गवानें पड़ते हैं . यह आधुनिकता , ललचाई नियत से किये कृत्य पूरे भारतीयों का सर शर्म से झुकाते हैं .   यह आतिथ्य -भारतीय परम्परा के पूर्णतः विपरीत है .हम अतिथि को भोजन स्वयं भूखे तक  रह कर कराने के त्याग के लिए पहचाने जाते थे . उनकी प्राण और सम्मान रक्षा में अपने प्राणों को  तक खतरे में डालते थे .
ना हम अपने समाज में अच्छाई बचा पा रहे हैं , ना ही परंपरागत अच्छाई पर चल पाते हैं . ऊँची ऊँची पढाई कर हम कुछ सीख रहे हैं या सीखा जो था वह भी भूल रहे हैं ?

जिन्होंने ना पृथ्वी के ऊपर किसी सीमाओं को जाना या माना  . जिन्हें हजारों किलोमीटर कई कई देशों की सीमाओं पर से गुजरते बिना पासपोर्ट और वीजा के उड़ने की आदत है . साइबेरिया में जब जलवायु , तापमान सहन करना उन्हें मुश्किल हो जाता है . अपने प्राणों को बचाये रख सकने की चिंता में और अपने बच्चों को जन्म देने के लिए साइबेरियन पक्षियों के अनेकों जोड़े पूरे भारत के विभिन्न जलाशयों के आस पास अपना बसेरा हजारों किलोमीटर दूर आ बनाते हैं . ग्रीष्म ऋतू में यहाँ जलाशय सूखने लगते हैं और यहाँ का तापमान उन्हें अप्रिय होता है तब 4-5 महीनों के प्रवास उपरान्त अपने मूल बसेरों की ओर लौटना चाहते हैं . पर हम पुनः अपना आतिथ्य भूलते हैं . हममें से कुछ इन सुन्दर अतिथि पक्षियों का शिकार करते हैं . और इस तरह हमारी दुष्टता से कुछ पक्षी हर वर्ष आने के बाद यहाँ से कभी लौट नहीं पाते . 

वेदना और लज्जा अनुभव होती है .  आधुनिकता जनित मानवता से पतन के इन प्रकरणों को देख और सुनकर . 

Monday, February 18, 2013

gold medal


गोल्ड मैडल
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आज जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज (जहाँ का मै पूर्व छात्र हूँ ) में स्नातक और स्नातकोत्तर छात्र जो अपने ब्रांच में प्रथम आये हैं को स्वर्ण पदक (गोल्ड मैडल ) प्रदान किये जा रहे हैं . गोल्ड मैडल जिन्हें मिल रहा है उनको संबोधित करते मै लिखना चाहता हूँ ..

यह गोल्ड मैडल उनका पहला या इसके पूर्व एक दो मिले हो सकते हैं .वास्तव में यह विद्यार्थी के आत्म-विश्वास बढाने के लक्ष्य से ताकि उनकी जो प्रतिभा है उसका उपयोग वे आगे भी अपने स्वच्छ कर्मों और आचरण से जीवन में इस तरह की सफलता दोहराते रहें ऐसी प्रेरणा के लिए दिया जाता है .
गोल्ड मैडल उन्हें मिला है वह ,यह सिध्द करता है उनमें विशिष्ठ योग्यता है . यह पदक देख और अपने पास संजो वह जीवन में अपनी इस योग्यता को सच्ची प्रकार अनुभव करें . साथ ही वे यह देखें उन्ही के इस देश और समाज में कितनी समस्याएँ और अभाव हैं . उन्हीं के कुछ साथी कितनी ही कठिनाई से इस पढाई के शुल्क और खर्च उठाते हैं . विशिष्ठ इस योग्यता जो ईश्वर प्रदत्त और उनके सही परिवेश और संस्कार से उन्हें मिल सकी है का प्रयोग वे इन सामाजिक समस्याओं और अभाव को कम करने में लगायें .
यह दिन उनकी अत्यंत प्रसन्नता के दिनों में से एक है . वे आज ऐसा सपना सजायें जिसमें आसपास के दुखद सामाजिक और व्यवस्था को एक सहज प्रसन्नता में परिवर्तित करने के लिए आगे के जीवन में वे कार्य करने में सफल हो सकें .

इस पुरूस्कार (राशि) को वस्तु रूप ना ग्रहण करें क्योंकि वस्तु प्रयोग के बाद समाप्त हो जाती है या पुरानी पड़ जाती है . जिसका औचित्य अन्य के लिए कुछ ज्यादा नहीं होता है . इस पुरूस्कार को वे प्रेरणा रूप ग्रहण करें . प्रेरणा हमेशा नूतन बनी रह सकती है और जिसका औचित्य अन्य के लिए भी उपयोगी हो सकता है .

किसी भी पुरूस्कार की प्रथा इस मंतव्य से ही रखी गई हैं , जिससे प्राप्तकर्ता अपनी अच्छाइयों को बनाये रखने के लिए प्रेरित हो . आज हो इसके विपरीत रहा है . पुरुस्कृत व्यक्ति दंभ में पड़ जाता है और अच्छाई भूल अहंकार जनित बुराइयों से घिर जाता है . मै आशा करता हूँ आज पुरुस्कृत हो रहे विद्यार्थी इस विषय में सतर्क रहेंगे अपनी अच्छाईयां बनाये रखेंगे ,उन्हें और बढ़ाएंगे . फिर उनका प्रयोग अपने ही साथ इस देश के अन्य नागरिकों के अच्छे जीवन निर्माण में करेंगे .

पुरूस्कार की राशि यदि आपका परिवार बहुत निर्धन नहीं हैं तो ऐसे सामाजिक कार्य को अर्पित करें जिससे इस समस्याग्रस्त परिदृश्य बदलने में सहायता हो . पुरूस्कार राशि निसंदेह इस दृष्टि से अत्यंत अल्प है . पर एक बेहद ही सक्षम परम्परा का आरम्भ बन सकती है . उस राशि का व्यक्तिगत प्रयोग (वस्त्र , आभूषण या ऐसा ही कुछ ) बहुत ही साधारण प्रयोग है . अचानक धन मिलने पर आज सभी इसी तरह प्रयोग करते हैं (अपने आलिशान भवन , वाहन , वस्त्र और आभूषणों के लिए ) . आपमें विशिष्ठ योग्यता है आप असाधारण सपना देखिये . आप ऐसा सपना देखिये कि इस देश का हर परिवार एक ठीकठाक से सुविधा वाले छोटे ही सही पर स्वच्छ घर में निवास कर सके . आज नारी असुरक्षा अनुभव कर रही है कैसे उसका यह भय समाप्त हो? आप विदेश जा सुविधा संपन्न जीवन का सपना ना देखें . आप की शिक्षा पर इस देश के नागरिकों के टैक्स से संग्रहित धन लगा है (आप जो अदा करते हैं उससे ज्यादा व्यय आपको शिक्षित करने के लिए महाविद्यालयों को उठाना होता है ). उसका प्रतिदान आप इस देश के समाज और व्यवस्था में अपनी योग्यता लगाकर दीजिये .
 
ध्यान रखें पिछली सदी में हमारे समाज के विशिष्ठ व्यक्ति स्वतंत्रता के लिए लड़ अपना जीवन लगा रहे थे . इस शताब्दी में हमें अपने भाई-बहन और समाज की भलाई के लिए बुरी प्रवृत्तियों ,बुरी शक्तियों और ढोंगी नायकों के विरुध्द लड़ देश और समाज को बुराई से स्वतन्त्र करना है .यह पराक्रम दर्शाने का अवसर (opportunity) आपको मिली है इस अवसर को न्याय प्रदान करें .
जिन्हें गोल्ड मैडल नहीं मिला है वे उदास ना हों . कारण हो सकते हैं , परिवेश संस्कार उचित प्रेरणा उतनी पर्याप्त उनके साथ नहीं रही हों .पर जीवन में सफलता का यह अवसर अंतिम नहीं है . आरम्भ कीजिये आप को और अवसर आगे हैं .
 
जैसे कॉलेज के इस ऑडिटोरियम जिसमें यह समारोह हो रहा है . वह कॉलेज के उन आदरणीय पूर्व विद्यार्थी के द्वारा निर्मित कराया गया है जो गोल्ड मैडलिस्ट नहीं थे . पर अपनी प्रतिभा से जिन्होंने धन तो एकत्र किया ही . साथ ही ऐसी सद्बुध्दि भी कायम रखी . जिसके बलबूते उन्होंने अपने इस पूर्व महाविद्यालय को अपने जीवन में स्मरण रखा और उसकी आज की आवश्यकता को समझ यह भवन निर्मित करा कर दिया . गौरव है कॉलेज को उन पर .आप सभी इस गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाएं और देश और समाज की आज की आवश्यकताओं को अनुभव कर अनमोल योगदान दे साबित करें हम भी कम नहीं हैं .
 
किसी माता-पिता को गोल्ड मैडल या इस तरह के सम्मान में अर्जित अपने पाल्य की धन राशि से लगाव नहीं होता . लेकिन वह गौरव जो उनका पाल्य उन्हें इस तरह दिलाता है अनमोल होता है . और ऐसी संतान पा उन्हें अपना जीवन सार्थक हुआ अनुभव होता है

 

Saturday, February 16, 2013

ईश्वरीय सहायता


ईश्वरीय सहायता
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वर्ष 1997 के अंतिम महीनों की बात है . मुझे विभाग के महत्वपूर्ण कार्य के कंप्यूटरीकृत करने का लक्ष्य मिला . मै इलेक्ट्रिकल इंजिनियर था . उस समय कंप्यूटर जानकार विभाग में कम थे . मुझे स्वयं कम ही जानकारी थी . फिर भी असाइन लक्ष्य पर काम करने की चुनौती स्वीकार करते मैंने स्वयं अपनी और मातहत कर्मियों का कंप्यूटर ज्ञान बढ़ाने का गंभीर प्रयास आरम्भ किया . अपने साथी कर्मियों से मैंने बड़े-छोटे का भेदभाव छोड़ा . मित्रवत समवेत कार्य की परम्परा बनाई . छोटे कार्य भी स्वयं मैंने करने आरम्भ किये और प्रेरणा ग्रहण करते हुए , मेरे मातहत कर्मी भी इस भेद को कि क्या उनकी ड्यूटी है छोड़ अगर जरुरत हुई तो कक्ष की झाड़ू पोंछा भी मेरे कहे बिना बेहिचक करने लगे . मुझे उन दिनों उस कक्ष में रात दिन भी रहना पड़ा . यह अवसर भी आये जब मैंने शेविंग या टूथ ब्रश तक पूरी रात वहां गुजारने के बाद कार्यालय में ही किये . 

सिलसिला चल रहा था . विभाग में मेरे से वरिष्ठ पर मेरे से चिढने वालों को यह सब होता अच्छा नहीं लगता . वे अपने तरह से मुझे विचलित करने के लिए मुझे जब-तब बुला बहाने बहाने से अप्रिय बातें करते . मुझे मार्च 98 तक लक्ष्य हासिल करना था . उनके इस तरह दखल से मुझे निराशा घेरने को देखती .

ऐसे समय में अन्य विभाग से एक महिला अधिकारी की हमारे विभाग में पोस्टिंग हुई . वे इलेक्ट्रोनिक इंजिनियर थीं अतः कंप्यूटरीकरण  के इस कार्य के लिए उन्हें भी मेरे साथ किया गया . उनके आते ही उनके लिहाज के कारण मेरे उन वरिष्ठ का दखल कम हुआ . उन्होंने भी विभाग में नई होते हुए साथ ही अस्थायी पद स्थापना होने पर भी इस कार्य में पूरी निष्ठा प्रदर्शित की और  मेरे मातहत सहित सभी के सयुंक्त प्रयासों से मार्च 98 में हमने लक्ष्य में सफलता पाई .

विभाग से सयुंक्त अनुशंसा में उन्हें मेरे साथ सम्मिलित भी किया गया . यह उदाहरण उस उक्ति को चरितार्थ करता है "हिम्मते  मर्दा मददे खुदा " . उनकी प्रतिनियुक्ति हमारे विभाग में कठिन काम करने की मेरे हिम्मत को मदद पहुँचाने की ईश्वरीय सहायता थी .


स्वास्थ्यगत भोजन परहेज के तथ्य

स्वास्थ्यगत भोजन परहेज के तथ्य
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स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी होती है तो रोग मुक्ति के लिए कई भोजन परहेज पालन करने होते हैं . जब परहेज अन्य (परिजन) को करवाने होते हैं तब हम उसका पालन सख्ती से होता देखना चाहते हैं . क्योंकि हमें उनकी चिंता होती है और हम चाहते हैं की वे रोग-मुक्त शीघ्र हो जाएँ . भोजन की उनकी रूचि के किसी व्यंजन पर जब रोक होती है तो वे कुछ मात्रा के लिए अनुनय करते हैं . हम कई बार उन्हें सख्ती से मना करते हैं . जो उन्हें अप्रिय लगता है ,जबकि हमारी मंशा उनके शीघ्र स्वास्थ्य -लाभ की होती है .
इससे विपरीत कभी हम स्वयं रोगी होते हैं और परहेज पालन हेतु परिजन की दृष्टि हम पर होती है . अब इसी तरह के प्रसंग में उनकी सख्ती हमें अरुचिकर लगती है . जबकि उनकी मंशा हमारे शीघ्र स्वास्थ्य -लाभ की होती है .
हम और परिजन वास्तव में परस्पर हितैषी होते हैं , और नहीं चाहते कि हममें से किसी को रोग के गंभीर परिणाम , परिवार को भुगतने पड़ें .
इन तथ्यों को दृष्टिगत रख ऐसे रोगी होने पर प्रत्येक को स्वयं सोचना चाहिए .
* हम परिवार के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं .
* हम अपने दायित्वों के लिए कितना और जीने की इक्छा रखते हैं .
* परिवार रोग के कारण हमें खोता है तो उस पर कितनी विपत्ति आ जाने वाली है .
और
* अपने इस जीवन में हम औरों के लिए क्या और कितना करना चाहते हैं .
हम शीतल -मन से जब यह सोचते हैं , तो स्वयं ही परहेज पालन करते हैं . तब जिव्हा-तुष्टि के लिए अपने प्रिय भोज्य को त्याग देना हमें अप्रिय नहीं लगता है . यह त्याग हमें दीर्घायु बना सकता है और हमें परोपकारी भी बना देता है .
 

Thursday, February 14, 2013

मनुष्य जीवन का आनंद (और वरिष्ठ नागरिक)

 मनुष्य जीवन का आनंद (और वरिष्ठ नागरिक)
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कुछ 70 से अधिक हो चुके क्रियाशील व्यक्तियों के क्रियाकलाप पर गौर करें ..

अ . 80 से अधिक 
के वे  हो चुके हैं अति प्रतिष्ठित ,अति सम्मानीय हैं . पूरा देश भ्रमण करते हैं . आदर और निष्ठा से स्वागत होता है , उनका . वे युवा पीढ़ी को सच्चा , और कर्मठ देखना चाहते हैं .उन्हें विभिन्न मंचो से संबोधित करते हैं .राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करते हैं . इससे उन्हें व्यक्तिगत लाभ कुछ नहीं है . एकमात्र अपेक्षित सम्मान ही ऐसी बात है , जो उनके लाभ में गिनी जा सकती है . फिर भी अपना आराम और सुविधा की फिक्र बिना वे अपना कर्तव्य मान यह कार्य कर रहे हैं .

ब . मध्यम वर्ग परिवार के मुखिया 80 वर्ष से अधिक के हैं . घुटनों की समस्या में चलने में कठिनाई है उन्हें . फिर भी नैतिकता के साथ व्यवसाय करते हैं . ग्राहक को गुणवत्ता का सामान और सेवा में उनका विश्वास है . अपने को इस तरह व्यस्त रखते अपनी शारीरिक पीडाओं से ध्यान हटा पाते हैं . इस उम्र में भी आय की अपेक्षा इसलिए है क्योंकि उन्हें लगता है नैतिकता से सारी उम्र व्यवसाय में ज्यादा पूँजी नहीं बना पाए हैं . महंगाई ज्यादा है सोचते हैं , कुछ स्वयं भी कमा लें तो उनके बेटे को घर चलाने में थोड़ी सरलता हो सकेगी . अपने ग्राहंकों की संतुष्टि से प्रसन्नता भी मिलती है .



स . प्रतिष्टित और सम्मान से देखे जाने वाले अरबपति 70 वर्ष से अधिक के एक सफल आज भी पूर्ण सक्रिय देखे जा सकते हैं . प्रसिध्द हैं अतः कोई भी सही गलत विज्ञापन , ब्रांड अम्बेसेडर या किसी भी ढंग से थोड़े से समय व्यय कर करोड़ों अर्जित कर सकते हैं . परिवार को यह धन नहीं भी आये तो कोई कमी नहीं है . पर अपनी प्रसिध्दि को एनकैश करते हैं . देश के युवा को गलत प्रेरणा या दिग्भ्रमित होने की उन्हें फ़िक्र नहीं . अपने परिवार का वैभव और महत्व बढाने को ही चिंतित हैं , जो उन्हें क्रियाशील रखे है .

द . 80 वर्ष से अधिक के ग्रामीण परिवेश के ना तो कोई ज्यादा सम्मान , ना ही धन कमाने की चिंता है . घर परिवार में बहुत पर्याप्त कुछ नहीं पर, पुत्र जीवन यापन जितना जुटा ही लेगा विश्वास है . फिर भी कृषि कार्य में अब भी लगे हुए हैं . सोचते हैं , कृषि कला है जिसमें वे दक्ष हैं . उसमें सक्रिय रहने से कुछ अनाज उत्पादन बढ़ता है . जो परिवार और दूसरों के उदर पूर्ती को मिलेगा तो संतुष्टि मिलेगी . बदले में सादा रहन सहन के कारण कोई मान तो नहीं मिल सकेगा . फिर भी इस उम्र में सक्रिय रहते हैं .जब तक जीवन है श्रम करते रहना चाहते हैं .

इ . 80 वर्ष के हैं .कुछ शारीरिक परेशानी ने मनोबल तोड़ दिया कुछ करने की इक्छा नहीं होती . घर में कमाया पर्याप्त है . पर दवाई पर व्यय करते बेटे को अच्छा नहीं लगता . उपेक्षा से और उदास हो जाते हैं सोचते हैं, जल्दी मृत्यु आ जाए तो अच्छा है .
फ . अति व्यस्त जीवन शैली , योग्यता अनुरूप महत्वाकांक्षा या जीवन सपनों के ना होने और अनियंत्रित जिव्हा तुष्टि के खानपान के कारण उत्पन्न तनावों और शारीरिक तथा मानसिक रोगों में बहुत 70 वर्ष से कम जीवन में ही दुखद विदाई लेकर अपने स्वयं के साथ अन्याय और आश्रितों को दुखी और निराश छोड़ जाते हैं .


हम दोष ढूँढने वाली अपनी दृष्टि दूसरों पर केन्द्रित कर , उनमें बुराई पा तिलमिला रहे हैं . आश्चर्य करते हैं ,इतना बुरा करते दूसरे कैसे आत्मग्लानि , लज्जा बोध या किसी तरह के पछतावे में पड़ने से कैसे बच सकते हैं ? क्यों नहीं सुधरते , सुधरें तो देश और समाज सुधरे .

जबकि बुराई भांप ने वाली हमारी  यह प्रखर दृष्टि स्वयं में कोई बुराई नहीं देख पाती .

समुचे सामाजिक परिदृश्य के लिए पूर्व राष्ट्रपति , अपने व्यवसायी पिता , एक तथाकथित सेलिब्रिटी (कोई भी हो सकता है ) तथा जनसामान्य में से वरिष्ठ व्यक्तियों को कल्पना पटल पर लाते हुए , सामाजिक दोष और बुराई पर हमारे स्वयं के व्यवहार और दृष्टिकोण को रखने का प्रयास किया है . .
यद्यपि अ,ब एवं द में उल्लेखित तरह की सोच और व्यक्तित्व दिनोंदिन बिरले होते जा रहे हैं . पर इनके अस्तित्व से यह विश्वास तो करना होगा कि जीवन में वैयक्तिक भोग से परे समाज , परिवार और देश के हित के लिए भी जीवन जीने या समर्पित करने की परंपरा रही है .

उल्लेखित स , इ एवं फ में वैयक्तिक भोग , छद्म आधुनिकता की प्रति स्पर्धा , देश और समाज के प्रति दायित्वों के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति प्रधान होते हुए अधिकाँश के मन और कर्म पर हावी होते जा रही है . अगर हम अपने समाज और देश की भलाई के लिए अपने अनैतिक हितों को तिलान्जित करने का साहस नहीं कर सकते तो क्या लाभ हमारे उच्च शिक्षित होने का या युवा या बलवान होने का ?

आधुनिकता या उच्च शिक्षा सिर्फ जीवन में वैयक्तिक भोग और इस से दुष्प्रेरित दूसरों के अधिकारों पर झपटना उनकी निजता का उल्लंघन को ही अगर दुष्प्रेरित करती है . तो यह आज के मानव समाज के साथ ही आगामी हमारी संतति के लिए सर्वथा अनुचित है .
हमें आधुनिकता की परिभाषा में और हमारी शिक्षा में व्यक्तिगत उपभोग और दूसरों के नैतिक अधिकार के लिए प्रत्येक के छोटे छोटे त्याग और संवेदना का एक उचित संतुलन शामिल करना चाहिए .
यह ऐसा उपाय है जिससे उन बुराई से हमें निजात मिल सकती है . जिसे अनुभव कर या शिकार हो हम व्यथित होते हैं और जब तब आंदोलित होते हैं . फिर यह ज्वार कुछ समय में शांत हो जाता है .जबकि बुराई अविराम जारी रहती हैं .
इतिहास या अपने पूर्वजों से जो सूचनाएं हम  पाते हैं वे दर्शाती हैं , किसी भी समय का मनुष्य समाज बुराई विहीन नहीं रहा है .  बुराई 100 वर्ष पहले भी अस्तित्व में थीं , 200 वर्ष पहले भी और इसी तरह 2000 या 10000 वर्ष पूर्व भी . बुराई के बारे में जो भिन्नता मिलती है, मात्र  बुराई के प्रकार कालांतर में बदले होते हैं तथा बुराई की मात्रा में अंतर मिलता है .

पहले समाज में छुआ-छूत और अन्धविश्वास बड़ी बुराई थी अब ये कम हैं तो दूसरी ज्यादा हैं . साथ ही जीवन स्वचालित सुविधा-विहीन और कम विज्ञान उन्नति का था अब ज्यादा उन्नत है ,सुविधापूर्ण है . बुराई की मात्रा भूतकाल में कितनी भी थी , अभी की तुलना में शायद हमेशा कम ही रही होगी (जो इसलिए भी लगता हो सकता है क्योंकि हमें भूतकाल की अच्छाई स्मरण रहती है और वर्तमान की कठिनाई ) . सच भले ही ऐसा ना हो पर आज की बुराई मात्रा देखना और सहना अनुचित लगता है . आज हम स्वयं को उच्च शिक्षित ज्यादा और सभ्य कहते हैं . अगर ऐसा है तो हमारी बुध्दिमानी और पढ़ा लिखा होना किस काम का , जब हम हमारे समाज और देश से इन बुराई को कम नहीं कर सकें तो .
हमने आधुनिकता के नाम पर जिन पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण किया है . वे असफल सामाजिक व्यवस्था हैं , जिसमें परिवार इकाई का अस्तित्व खतरे में है . और जहाँ मनुष्य मनुष्य ना रह रोबोट की भांति संवेदना शून्य होता जा रहा है . जो मनुष्य जीवन के अनमोलता को विस्मृत कर रहा है . जहाँ जीवन उदेश्य सिर्फ सुविधाओं और उपभोग में सिमटता जा रहा है .

ऐसी पाश्चात्य सभ्यता को अपने मनोमस्तिष्क पर हावी होने देना स्वयं अपने पर अत्याचार है, अन्याय है . तथाकथित सेलिब्रिटी जो इस पाश्चात्यता की जननी है के हमें  पथगामी नहीं होना चाहिए . हमारे अपने देश और समाज के हमारे सच्चे नायकों के पदचिन्हों पर हम चलें . हम इतना सच्चा समाज बनायें जिससे यह पाश्चात्यता हमारे पीछे चल वापस रोबोट से मनुष्य होना आरम्भ करे . और यह जाने की कम बुराइयों में मनुष्य जीवन का आनंद क्या होता है ?

Tuesday, February 12, 2013

सर्व हितकारी समाज


सर्व हितकारी समाज
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किसी वर्ग , जाति या नारी विशेष का जीवन कठिन होता हम देखते हैं . अगर हमें सहानुभूति है तो कठिनाई के और किसी कारण में नहीं जाना चाहिए .सर्वप्रथम उनकी कठिनाई को इस दृष्टिकोण से परीक्षण करना चाहिए कि कठिन स्थिति में होने के लिए स्वयं हम कितने जिम्मेदार हैं . जो थोडे  भी कारण हम स्वयं बनते लगते  हैं , अपने में से वे कम कर लेना उनकी कठिनाई दूर करने में सहायक होंगे .

वास्तव में दुनिया में बुराई का अम्बार देख हम सोचते हैं इतनी बुराई हम अपने दम पर दूर नहीं कर सकते . यह सच्चाई भी है . अकेले किसी एक  की क्षमता इतनी पर्याप्त  नहीं हो सकती है .
वास्तव में बुराइयों का कुल योग अनगिनत बन जाता है . पर जब सब इस तरह से अपने अपने बुराई के हिस्से को इस तरह कम करें तो बुराई सरलता से नियंत्रित हो सकती है .

इस पर विश्वास नहीं है तो सब मिल यह कर के देखें . 
कुछ ही समय लगेगा जब हमारा समाज सर्व हितकारी बन जाएगा .


Saturday, February 9, 2013

मानव अंगों के प्रत्यारोपण का दंड प्रावधान


मानव अंगों के  प्रत्यारोपण का दंड प्रावधान 
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मनुष्य उन्नति के पंखों  के सहारे उड़ान भरता विकास के अकल्पनीय से शिखर पर आ पहुंचा है .अभियांत्रिकी और चिकित्सा विज्ञान अत्यंत उन्नत हो गए हैं . 

अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन में इस यात्रा के आरम्भ से अब तक बहुत परिवर्तन करते आज जीवन शैली आधुनिक हो गई है .
आपसी प्रेम में नयापन आया तो वैमनस्य और अपराधों में भी नई खराबियों ने स्थान पाया .  चिकित्सा क्षेत्र में उन्नति से पिछली सदी से मानव अंगों का सफल प्रत्यारोपण कर पीड़ितों की आयु बढाने में सहायता मिली है  .
इन सफलताओं को ध्यान करने से लगता दंड प्रावधान पुरातन रह गये  हैं . हमें अपराधों पर मिलने वाले दंड के प्रावधान बदलते हुए समाज की पुनः संरचना करनी चाहिए . जो वैमनस्य को घटाने में सहायक हो सकते हैं  . स्वयं अपराधी के साथ अन्य के भले के भी सिध्द हो सकते हैं.

विधिवेत्ता , चिकित्सा वैज्ञानिक और समाज शास्त्री मिल हो रहे अपराधों की रोकथाम और साथ ही अपराधों की जड़ का निर्मूलन के लिए  दंड प्रावधानों में बदलाव लायें . अपराधी के शरीर के उन अंगों को निकाल जरुरत मंदों को प्रत्यारोपित करने को दंड में सम्मिलित करें .ऐसे अंग निकालने की सजा जिनसे अपराधी के जीवन को खतरा भी नहीं हो और उन्हें अपराध पुनः ना करने का सबक मिल सके . साथ ही  अन्य को भी अपराधी वृत्ति की ओर ना जाने की शिक्षा और सीख  मिलती हो विस्तृत चर्चाओं के बाद तय किये  जायें . ऐसे अंग किडनी , रक्त और नेत्र हो सकते हैं . बाद में ऐसे जघन्य  अपराधी की  जब प्राकृतिक मौत होती है उसका शव चिकित्सा विद्यार्थियों को अनुसंधान के लिए भी देना दंड में सम्मिलित किया जा सकता है

इन प्रावधानों से जो लाभ हो सकते हैं वे
निर्दोष परिजन (अपराधी के ) बेसहारा और अनाथ होने से बच सकते हैं .
मौत की सजा से उत्पन्न वैमनस्य (अपराधी पक्ष के मन में  ) से बचा जा सकता है , और प्रति क्रियाओं में फिर जघन्य अपराधों की सम्भावना कम की जा सकती हैं .
ऐसे पीड़ित जिनका जीवन अंग प्रत्यारोपित कर बचाया जा सकता है लेकिन  जिन्हें दानदाता नहीं मिलते हैं की सहायता भी की जा सकती है .
अपराधी को दंड पा ने के बाद शांत मन से पछतावे का अवसर मिल सकता है . वे उस दृष्टिकोण से अपने कृत्य पर विचार कर सकते हैं जिसमें खराबी वे अपराध करते नहीं देख पाए हैं .

दंड के इस तरह आधुनिक प्रावधान , आधुनिक समाज के अनुरूप होंगे . और समाज में शान्ति परस्पर विश्वास और सहयोग को बढाने में सहायक भी हो सकते हैं .