Saturday, February 9, 2013

मौत स्वागत योग्य नहीं होती


मौत स्वागत योग्य नहीं होती
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विवेक हीनता  के हावी होने पर एक या कुछ , हत्यारा बन एक या कुछ स्त्री/पुरुष की जान ले लेते हैं .
फिर अपराध सिध्द होने पर कुछ मौत की सजा पा स्वयं मारे जाते हैं .

इस तरह के दुखद हादसे से पहले (निर्दोष और मासूम ) भी कुछ अनाथ , बेसहारा होने को लाचार होते हैं . अपने प्रियजन को खोने का आजीवन दुःख को श्रापित हो जाते हैं .

बाद के घटना क्रम में न्याय ( तथा-कथित , संविधान अनुसार )  पालन में दोषी का परिवार इसी श्राप से पीड़ित होता है .

असमय मौतें बार बार दोहराई जाती हैं , कहीं सही  शिक्षा या सबक ना लिया जा रहा है . ना ही सही शिक्षा सबक दिया जा सका है .

अकेले मारे जाने वाले ही नहीं ,  इनके मारे जाने से कटुतम  और  स्थाई बिछोह को विवश होते परिवार-जन  जिनके ह्रदय में इन मौतों ने जीवन जीने की कोई भी अभिलाषा अधूरी छोड़ दी है तो मौत स्वागत योग्य नहीं होती है .

हादसे तो पूर्व से ज्ञात नहीं होते हैं . पर दंड तो पूर्व-नियोजित होता है . हादसे से पीड़ित परिजन यदि अपराधी को क्षमा नहीं करते हैं , तो अपराधी की मौत से यद्यपि प्रसन्न होना होता है . 

श्रध्दा-सुमन अकाल मारे गए व्यक्तियों के लिए . साथ ही आशा का एक दीप प्रज्वलित करते हुए कि शीघ्र ही सही शिक्षा और सबक लेते हुए , क्रिया और प्रतिक्रियाओं में ये अप्रिय प्रसंग किन्ही व्यक्तियों और  निर्दोष परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत होना बंद हो जायेंगे।

Friday, February 8, 2013

संस्कार

संस्कार

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अच्छे संस्कार हैं , या कोई संस्कारहीन हीन है , यह टिप्पणी अक्सर ही सुनते हैं ,सब करते हैं . कोई के अच्छे कार्य , या बुरे के जिक्र में भी संस्कार कारण निरुपित किया जाता है . क्या होते हैं संस्कार , कैसे दिए जा सकते हैं . संस्कार हीन कोई कैसे हो सकता है . प्रश्न के उत्तर सब के पास हैं .शब्द अलग हो सकते हैं . आशय प्रायः समान ही होगा .

वास्तव में एक नवजात शिशु के लालन -पालन कर ...उसे किशोर वय में पहुँचते तक , सांसारिक जीवन के दृष्टिगत माँ- पिता और घर में अन्य बड़े अपने बच्चों के सरल ,सहज और सुखी जीवन की आशा से सिखाते ,बतलाते हैं . इस पूरी प्रक्रिया के लिए जो शब्द है प्रयोग किया जाता है वह "संस्कार" है . इस तरह दिए जा रहे मिल रहे संस्कार का स्तर , पालकों की तथा बच्चे की स्वयं की योग्यता पर निर्भर करता है . अंध-विश्वास , या गलत पूर्वाग्रह से कोई पालक प्रभावित है तो , उनके बच्चों में यह दोष परिलक्षित होने की सम्भावना हो जाती है . और जिन घरों में जीवन स्वरूप का सही ज्ञान , और सांसारिक ,धार्मिक ,व्यवहारिक और नैतिक शिक्षा की पर्याप्तता है . उस घर के बच्चे संस्कारवान होंगे और अपने कर्मों और आचरण से अन्य को प्रभावित करते हुए सफल और सुखी जीवन व्यतीत करेंगे , इसकी सम्भावना प्रबल होती है . संस्कारवान संतान ना केवल परिवार बल्कि समाज ,देश और विश्व के लिए हितकारी होती है . अतः यदि हम अपने बच्चों को सही संस्कार देते हैं , तो यह आत्म विश्वास हमें होना चाहिए कि हम इस से अपने बेटी या बेटा बाल्यकाल में सच्ची सेवा सुश्रुषा नहीं कर रहे हैं , अपितु मानव समाज और देश की सच्ची सेवा कर रहे हैं . जिस समाज या देश में नागरिक अधिकांश संस्कारवान होते हैं वह उन्नति की ओर बढ़ता है . संस्कारवान संतान ही परिवार , देश और समाज के लिए अपनी सच्ची जिम्मेदारियों को समझते हुए अपने कर्म और आचरण रखता है . हमारे दिए अच्छे संस्कार ही हमारे पुत्र या पुत्री को बुरी संगत में पड़ने से रोक लेती है . वर्ना आज बुरी संगत और अनेकों बुराइयां चंहु ओर उपलब्ध हैं , जो आधुनिकता के नाम पर किसी के भी अच्छे कर्म और आचरण से विमुख करने में विलम्ब नहीं करती .
संस्कार कैसे दिए जाते हैं ?  मेरा मानना है ,मानव बच्चा बालपन से ही बुध्दिमान होता है . उसका मस्तिष्क हमारे कथन से प्राप्त होने वाले निर्देश को हमारे स्वयं के इन (निर्देश के विषय ) पर हमारे आचरण और कर्म से तुलना करता है . कहने का आशय यह है कि अनकही बातें वह हमारी करनी से भी ग्रहण करता है .  ऐसे में स्वयं हमारी कथनी और करनी में अंतर ना हो तो बच्चा हमारे बताये मार्ग पर चलना सीखेगा . हमारी कथनी और करनी में अंतर देखेगा तो भ्रमित होगा . कभी एक ही प्रसंग में हमारे कहे ढंग से कार्य करेगा और कभी हमें क्या करता देखता है उस अनुसार कार्य करेगा . और स्पष्ट करने के लिए उदाहरण से बात करें तो , यदि हमें बच्चे को धार्मिक संस्कार देने हैं तो हमें मंदिर जाना , स्वयं धर्म चर्चा में हिस्सा लेना और धर्म अनुसार अपने आचार और व्यवहार रखने होंगे , और यही फिर ऐसा करने के लिए बताने पर उसमें धार्मिक संस्कार पड़ेंगे . हम स्वयं मंदिर ना जाएँ और बच्चे से कहें प्रतिदिन मंदिर जाना अच्छा है , तो वह हमारे शब्द और व्यवहार में अंतर भापेंगा . कभी मंदिर जाना उचित मानेगा कभी जाना उचित नहीं भी समझेगा .
इसी तरह हम यदि चाहें कि हमारा पाल्य झूठ न कहे, बड़ों से सम्मान से पेश आये , घर के बाहर बड़ों का आदर करे , देश के प्रति सम्मान रखे और , शराब ,सिगरेट ना पिए तो यही बातें उसे हम स्वयं करते हुए भी दिखने चाहिए . हम अपने माता -पिता से सम्मान से पेश आयें , उनकी सेवा करें , पास-पड़ोस के लोगों से सम्मान-जनक संबोधनों और शालीनता से बातें करें , उनके दुःख के प्रति संवेदना प्रदर्शित करें . अपने कार्य को निष्ठा पूर्ण ढंग से करें . हम शाकाहारी हों ,शराब ,सिगरेट छूते ना हों  तब ही बेटी /बेटा सदमार्गी और सदाचारी होगा . 
अच्छा सिर्फ कहा जाना , संस्कारी बनाना सुनिश्चित नहीं कर सकता . आचरण और कर्म में यदि हम कोई कमी रखेंगे तो बच्चों को अच्छा कहा और समझाया  जाना अपर्याप्त सिध्द होगा . उसके संस्कारहीन बनने की सम्भावना बनेगी . भले ही लौकिक शिक्षा कितनी भी अच्छी क्यों ना हासिल कर ले वह .
आज देश /विश्व और समाज में बहुत बुराई और समस्याएँ हैं . इन्हें दूर करने के लिए हर घर के बच्चे के संस्कार अच्छे हों यह आवश्यक है . तब ही आने वाली पीढ़ी सुखी भी हो सकेगी और समाज से बुराई और समस्या कम करने में सफल भी हो सकेगी.

Zozila to Rohtang -- यात्रा वृतांत - एक कल्पना (भाग एक )

Zozila to Rohtang -- यात्रा वृतांत - एक कल्पना (भाग एक )
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प्रदर्शनी में प्रदर्शित छायाचित्र जिसमें जंगल ,पहाड़ सरिताओं और झीलों के अतीव सुन्दर दृश्य , भारतीय सेना के साहस के कारनामों को कहते प्रेरक चित्र और कारगिल , लद्दाख और वादियों के स्थानीय जीवन को दर्शाते चित्रों को एकसाथ इतनी अधिक मात्रा में तथा इतने सुन्दर चित्रांकन को देखने का बहुत अच्छा अवसर हमें मिला . हमने नयनाभिराम प्राकृतिक छटा को देख आयोजक , प्रवास करने वाले अपने मित्रों की ह्रदय से प्रशंसा भी की . पर हम में से अधिकतर उसके पीछे के कुछ तथ्यों पर सोचने का वक्त ना  निकाल सके होंगे .. तनिक कल्पना मैंने की है जो निम्नानुसार है .
 
चार मित्र प्रवास शौकीन एक शाम तय करते हैं . किसी रोचक यात्रा पर जाया जाए . एक मित्र कश्मीर की वादियों में पूर्व में दुर्गम स्थानों की सैर कर साहसिक कारनामा पूर्व में ही कर चुका है . और उनके इस साहस का जिक्र लिम्का बुक में भी दर्ज हो चुका है . वे अन्य अपने मित्रों को उन्ही स्थानों  पर चलने का प्रस्ताव करते हैं . कुछ सोच विचार के बाद तय हो जाता है . परिवार को बच्चों की शिक्षा की दृष्टि से साथ ले जाना ठीक नहीं लगता . तय किया जाता है लक्सरी  निजी गाडी मर्जी से चलने और रूक लेने की दृष्टि से उचित होगी .
 
यात्रा   आरम्भ करने का समय आ जाता है .. गाड़ी बारी बारी से एक एक मित्र के द्वार उन्हें लेने के लिए पहुँच रही है .. यात्री साजो सामान के साथ गाड़ी में बैठते हैं . द्वार पर विदा करने , माँ -पिता , भाई , पत्नी बच्चे खड़े होते हैं . इन्हें 10 दिनों की लम्बी अवधि के लिए विदा करते हुए , वह भी दुर्गम स्थानों की सैर के लिए , आखों में अश्रु आने को आतुर होते हैं . पर विडम्बना उन्हें अन्दर ही रोकने का लगभग असंभव यत्न किया जाता है . विदा करते हुए अपने अश्रु दिखा वे यात्रियों के साहस को कम जो नहीं होने देना चाहते . चारों घरों के द्वारों पर लगभग यह दृश्य उत्पन्न होता है . अपनों की इस शंका और विछोह के दुःख को समझते , ये चारों साहसी पत्नी और बच्चों से आँखे चुराते गाड़ी में आ बैठते हैं .. 
 
10 दिनों घर परिवार में उनकी अनुपस्थिति में भी सर्व कुशलता बनी रहे यह ख्याल उन पलों में प्रमुख रूप से ह्रदय में है , यात्रा की रोचकता और कल्पना से जो मन पुलकित रहा है इस घडी वह दब गया है . चारों ही इस समय चर्चा करने के स्थान पर खामोश हैं   ...
 
जबलपुर शहर की सीमा से बाहर गाड़ी आ गयी है .. और गंतव्य की दिशा में तेज गति से फर्राटा भरने लगी है ....
 
जारी क्रमशः ----

Thursday, February 7, 2013

अच्छा हमारा घर-परिवार

अच्छा हमारा घर-परिवार
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50-60 वर्ष पहले के सफल सिनेमा घराने जिनका वर्चस्व हिंदी सिनेमा में था . वे जिस तरह दूसरे परिवार की नारियों को परदे पर चित्रित करते थे . वह स्वयं उन्हें नारी मर्यादाओं के अनुकूल नहीं लगता था . इसलिए घर के पुरुष परदे पर आते थे . अपनी बहनों ,पत्नी और बेटियों को परदे पर आने नहीं देते थे .
जिस तरह वे अपने बच्चों का जीवन सुनिश्चित करना चाहते थे , उस तरह का समाज बनाने /व्यवस्था बनाने के प्रति उदासीन रहे . उन्होंने अपने घर में स्वस्थ परम्परा और मर्यादा के प्रयत्न किये पर समाज और देश में स्वस्थ परम्परा और मर्यादा के लिए अपने कर्तव्य भुलाए रखे . सिनेमा में कुछ भी अच्छा नहीं था कहना ठीक नहीं होगा . लेकिन सभी अच्छा भी नहीं था . व्यावसायिक लाभ के लिए जो चित्रित किया गया . उसके दर्शन और वैसी नक़ल से नई पीढ़ियों में स्वछन्दता बढ़ी . आचरण विपरीत हुए और उनके सोच और सपने स्थापित मर्यादाओं से अलग होने लगे . विशेष कर युवा आधुनिकता के नाम पर जो देखने और करने लगे उससे समाज बदलता गया . समाज में बुराई बढ़ी तो चपेट में फिल्मकारों के घर भी आये .आसपास की बुराइयाँ घर के भीतर घुसपैठ करते गई .
पुरानी पीढ़ी के अधिकाँश फ़िल्मकार अब कई जीवित नहीं हैं ( कुछ हैं भी ) . वे अपने परिवार नारी सदस्या को जो करते, बनते नहीं देखना चाहते थे , उनके घरों की बेटियों और बहुओं ने करना आरम्भ किया . वे सिनेमा पर्दों पर उस तरह आने लगीं , जैसे अन्य परिवार की नारियों को उनके बुजुर्ग चित्रित करते थे (और ऐसा अपनी नारियों के लिए नापसंद करते थे ).
सहस्त्रों वर्षों से अपेक्षित पारिवारिक चरित्र यहाँ के जनमानस में ऐसा ही रचा बसा है . इससे विपरीत हमेशा से संघर्ष और विषाद की सम्भावना उत्पन्न करता है .
सिध्द यह होता है जैसा हम परिवार में चाहते हैं . वह वातावरण अगर देश समाज में नहीं बनायेंगे तो देश ,समाज में व्याप्त बुराइयों से अपने घर को निरापद नहीं रख सकेंगे . अतः सब अपने घर को भी अच्छा रखें यत्न करें कि पास पड़ोस के घर भी उतने ही अच्छे रहें . इससे समाज अच्छा बनेगा . तब बाहर से कोई बात घर के अन्दर आएगी तो वह भी अच्छी ही होगी .
उपाय कठिन सा लगता है , पर सभी की सच्ची भूमिका निभा लेने से सरल बन सकता है . दूसरों का अवलोकन कम कर हुए , आत्म-अवलोकन अधिक कर आचरण और कर्म करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है . नित दुखी और विचलित कर देने वाले हादसों से यही मन्त्र मुक्त करा सकेगा . यही मन्त्र प्रभावकारी होगा .
 

Wednesday, February 6, 2013

स्व-आलोचक


स्व-आलोचक
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कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर दृष्टि डालें . देश कुछ हादसों /आन्दोलन का प्रत्यक्ष-दृष्टा बना जब , महानगरों से लेकर दूरस्थ ग्रामों के महत्वपूर्ण से लेकर अति साधारण नागरिकों तक ने जिस पर गंभीर चिंतन -चर्चा और सक्रिय भागीदारी और जागरूकता प्रदर्शित की . ये थे
* घुसपैठी आंतकियों द्वारा मुंबई में होटल ताज़ ,रेलवे-स्टेशन और अन्य स्थानों पर अंधाधुंध फायरिंग (गोलियाँ बरसा कर ) सैकड़ों निर्दोषों की जान ले ली और अपनी... भी गंवाई .

* दिल्ली में , भारत के बाहर भेजा गया कालाधन ( बैंक में जमा किया गया ) , को वापस भारत लाये जाने की मांग के साथ भारत के विभिन्न हिस्से से आंदोलनरत नागरिकों ने प्रदर्शन किया उत्पन्न संघर्ष से घायल एक महिला को जान तक गंवानी पड़ी .

* बढ़ गए भ्रष्टाचार के रोकथाम के लिए दोषियों पर कार्यवाही की नीयत से दिल्ली में लाखों नागरिकों ने इकट्ठे हो कई दिनों तक शांतिपूर्ण आन्दोलन किया .

* दिल्ली की सड़कों पर चलती बस में दुस्साहिक रूप नारी शोषण का घिनौना कृत्य (बहुत पुराना घोर निंदनीय अपराधिक प्रकरण की दुखद पुनरावृति ) किया गया . पीडिता जीवन से संघर्ष करते तेरहवें दिन हार गई . उसकी अकाल मौत से पाषाण ह्रदय मानस के नयन भी अश्रुपूरित हुए  . ( देश के विभिन्न हिस्से में ये कुकृत्य प्रतिदिन दोहराए जा रहे हैं )

* देश की सीमा पर तैनात (देश के ग्रामीण क्षेत्रों के ) दो साहसी फौजियों को दुश्मन के द्वारा न केवल निर्दयता से मार डाला अपितु उनके शव के साथ भी पैशाचिकता प्रदर्शित करते उनके सर सहित विभिन्न अंगों को धड़ से पृथक कर गायब कर दिया गया . पूरा देश पुनः उद्वेलित हुआ . दो सैनकों के शव का असम्मान हरेक को स्वयं अपना अपमान भी लगा . परिवार और हर सच्चे मनुष्य को , सभ्यता के इस काल में इस तरह के उत्पन्न कारुणिक दृश्य से गहन मानसिक वेदना हुई .

सभी उपरोक्त बातें , अलग अलग मंचों से अलग अलग विचारकों से और विभिन्न पक्षों से अपने अपने पूर्वाग्रहों अनुसार विभिन्न तरह से निरुपित और चर्चा में रही हैं और आगे भी रहेंगी . इस तरह या इस से भिन्न पर इतनी ही दुष्प्रभाव /प्रभाव कारी घटनाएं पहले भी हुईं हैं . हमारा दुर्भाग्य/भाग्य आगे भी घटित होती जायेंगी .

दुर्भाग्य यह भी है , कुछ लोग कितनी भी गंभीर और दुखद घटना हो , अपने हित आग्रहों अनुसार उसे सही भी ठहराते देखे जा सकते हैं . साफ़ है अपने पूर्वाग्रहों , अन्धविश्वास , अंध-श्रध्दा और अज्ञानता के कारण उन्हें  दोष उनमें दिखाई देगा जो निर्दोष है .

इसे हम मानसिक रोग कहेंगे . वह अस्वस्थ आचार -विचार मन में घर किये हुए हैं . जिसके कारण दूसरों की प्रताड़ना से स्वयं हर्षित होते हैं (sadism ) .

तमाम इस तरह के दुखद घटनाक्रमों के उपाय अपने अपने तरह से सब सुझाव रूप में सामने लाते हैं . सही भी है . जिस तरह घाव कोई हो जाए . हम उपचार करते हैं . पहले घाव की ड्रेसिंग ( सफाई ) की जाती है . फिर उसपर मलहम का कपास रखा जाता है . फिर पट्टी (बेंडेज ) बांध दी जाती है . खाने को दवाई भी साथ दी जाती है . गंभीरता अनुसार इंजेक्शन भी लग सकते हैं . नियमित अन्तराल में घाव को जांच और पुनः पट्टी बदलना भी पड़ सकता है .

सामाजिक बुराइयाँ भी समाज के अधिकाँश सदस्यों के मन में विभिन्न तरह के ख़राब विचारों , स्वार्थ-लिप्सा , सुविधा-लोलुपता और वैयक्तिक भोगवाद की लालसा के कारण एक रोग के भांति हैं . विभिन्न स्तर और प्रकार से रोकथाम इन मानसिक अस्वस्थता के लिए जरुरी है . व्यवस्था में सुधार , कड़े क़ानूनी प्रावधानों और दंड प्रावधानों से तो की ही जा सकेगी . परन्तु साथ साथ ही मनुष्य ह्रदय स्व-सोच में से ये रोगी विचार , तर्क ,लालसाएं और जीवन शैली का कम किये जाने के उपाय भी करने होंगे .
इसके लिए प्रत्येक को आत्म-अवलोकन करना होगा गलत सिध्दांत , गलत सोच या छद्म नायकों जिनका अनुशरण करने से ये बुराइयाँ पनप रहीं हैं .उन्हें तजने की वीरता दिखाए बिना हम आज की सामाजिक बुराइयों और दुखद घटनाक्रमों से मुक्त नहीं हो सकते .
हमें यह सोचना होगा जिस तरह हम अपने बच्चों को अच्छा घर उनके जीवन के लिए सुनिश्चित करना चाहते हैं , उसी तरह एक समाज बनाना /व्यवस्था बनाना भी सुनिश्चित करें . कितना भी अच्छा घर यदि वह एक स्वस्थ समाज (आसपास यही है ) में नहीं विद्यमान है तो उसमें निवासरत हम और बच्चे बेखटके जीवन यापन नहीं कर सकते . आसपास की बुराइयाँ जब तब इस घर के भीतर घुसपैठ करती रहेंगी . और हम जब-तब दुखी होते रहेंगे .
हमें अपने हित के साथ समाज के हित की भी चिंता करनी होगी . इसके लिए हमें जो प्रिय (जो सामाजिक दृष्टि से अप्रिय हैं ) अपनी आदतों को स्वतः तजने का साहस प्रदर्शित करना होगा .
पर -आलोचक तो हम सभी हैं . हमें स्व-आलोचक भी स्वयं बनना होगा . तभी समाज से बुराइयाँ कम की जा सकेगी . अन्यथा बारी बारी बुराइयों के दुष्प्रभाव भुगतते रहना होगा . चाहे जितने भी सुरक्षित भवनों में हम रहते हों .

Saturday, February 2, 2013

पत्नी का यथोचित सम्मान बुराईयों की रोकथाम

पत्नी का यथोचित सम्मान बुराईयों की रोकथाम 
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कल के लेख में नारी के पत्नी रूप के महत्वपूर्ण चरित्र और उनके समुचित सम्मान के एक अजीब (इस तरह कम पढने सुनने मिलता है , इसलिए अजीब  ) दृष्टिकोण  से अपने विचार रखे थे . उसी के विस्तार में जाने से ऐसा लगता है कि जिस दिन हम पत्नी  के ऐसे सहयोग और त्याग को समझ नत मस्तक होंगे सामजिक बहुत सी बुराइयाँ कम हो जायेंगी ...

हम पत्नी का रिश्ता जब स्वीकारते हैं , तो पति-पत्नी के बीच कुछ आपसी समझ और वचन लिए-दिए जाते हैं , पति अपनी पत्नी के प्रति पूर्ण सम्मान रखेगा तो स्वतः  ही वह दूसरी स्त्री से दैहिक समबन्ध को उत्सुक ना होगा . इस तरह  दुष्कर्म और अवैध संबंधों के कारण उत्पन्न कटुता , वैमनस्य और संघर्षों के अप्रिय प्रसंग में कमी आएगी .

ज्यादातर देखा गया है , जोर जबरदस्ती का नारी शोषण , अविवाहित कम विवाहित पुरुष ज्यादा करते हैं . जिस दिन अपनी पत्नी के प्रति सम्मान रख वह इस तरह की दगाबाजी अपनी पत्नी से ना करेगा तो इस तरह के अपराध स्वयं घटेंगे .

हमारा देश अपने नारी नागरिक के साथ विदेशी नारियों के लिए भी सुरक्षित होगा ..

जो मानवता भी है और समाज हित भी सिध्द होगा  ... 


पत्नी भी नारी के अति सम्मानजनक अवतारों में से एक


पत्नी भी नारी के अति सम्मानजनक अवतारों में से एक
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हास्य बनाने या हीन दिखाने की  नियत से , जोक्स के माध्यम से या कुछ लेख करने के लिए चाहे या अनचाहे ( जो चलन में है उसकी नक़ल करते ) हम जाति विशेष या समूह विशेष पर उस जाति या समूह को पूरा सम्मिलित करते हुए (जनरलायीज ) लक्ष्य की प्रवृत्ति रखते हैं . जो उचित नहीं होती . इस लक्ष्य से कहे जाने का किसी किसी संवेदनशील निर्दोष (सच्चे ) के मन पर बुरा प्रभाव पढ़ता है .

जैसे -

शारीरिक दोष या असुंदर व्यक्ति को अंधा , लूला ,लंगड़ा बहरा इत्यादि कहना .

जोक्स .. में जाति विशेष के पात्र रख उपहास उड़ाना .

या किसी खराबी के लिए किसी समूह पर हर समय दोषी बताना .

पत्नी भी ऐसी एक जाति (या समूह) है , जिस पर ढेरों जोक्स , या अपने किसी भी असफलता या अपने सुख की राह में रोड़ा जैसा बताने का एक चलन है . कुछ पत्नी से सच में दुखी हो सकते हैं . पर जो पत्नी के रूप में बहुत ही सच्चा साथ भी पाने का भाग्य रखते हैं भी चलन में पत्नी को इस तरह से लक्ष्य करते पाए जाते हैं .

इस तरह के प्रसंग में कभी हम भी हास्य या सहमती में हिस्सेदार हो मजे लेते हैं . पर पत्नी एक अस्तित्व पर इस तरह लक्ष्य  अन्याय लगता है .

भारत में परिवार में नारी के पुरुष से रिश्ते में , माँ ,बहन और बेटी (बहन और बेटी छोटी होने पर भी ) पूज्यनीय रिश्ता है . पर पत्नी से पुरुष का रिश्ता ऐसा है जिसमें उसे प्रत्यक्षतः  हीनता बोध के साथ देखा जाता है . जबकि पत्नी योग्यता में भी पति से बेहतर भी देखने मिल सकती है . पत्नी वह रिश्ता भी है जो शायद 95 % से अधिक पुरुष जीवन में स्वयं सहर्ष जोड़ते भी हैं . पर एक बार वह अपना माँ -पिता का परिवार छोड़ जो आ जाती है तो अपने ऊपर एक समस्या सी ही देखी और बताई जाने लगती है . लेकिन गौर करें तो सारे खुशहाल परिवारों में पत्नी , अपने पति का साथ नारी के समस्त रूपों में निभाती है .

स्पष्ट लिखा जाए तो .. दैहिक रूप से पति-पत्नी का रिश्ता निराला और पहले 
दो अजनबी रहे विपरीत लिंगी व्यक्तियों  को जोड़ने वाला तो होता ही है . पर मुझे लगता है पत्नी इस महत्वपूर्ण साथ के अतिरिक्त अपने पति की जिस प्रकार देखभाल , चिंता और आवश्यकता की पूर्ती करती है , वह माँ ,बहन और बेटी के दायित्वों   जैसे भी होते हैं .

माँ , जैसा लाड दुलार भी उसके आचार -व्यवहार और कर्मों में अपने पति के लिए होता है (माँ जैसे गर्भ में तो नहीं पाला होता है , पर अपने पति के बच्चों को ऐसा पाल वह बराबरी कर देती है ) .

बहन , जैसा स्नेह और त्याग पति के लिए कर रही होती है .

बेटी , जैसी चिंता और सम्मान भी करती है .

इस तरह पत्नी एक अकेली नारी .. पुरुष के नारी से रिश्ते के सभी रूपों का निर्वहन करती ही है .

साथ ही पति की माँ , बहन और उसकी बेटी के साथ भी पति तुल्य दायित्व भी निभाने का प्रयत्न भी करती है .

पुरुष अपनी कमी का दोषारोपण भी पत्नी पर  करता है .. जैसे पत्नी के कारण वह माँ से विलग होता है , या बहन से मधुर रिश्ता नहीं निभा पाता . कुछ प्रकरणों में यह दोष सही भी हो पर अधिकांश में ऐसा नहीं होता है .

इसलिए पत्नी को सम्मान पूर्ण तरीके से पति और उसका परिवार भी देखे तो यह पत्नी के प्रति न्याय होगा .

और कई तरह की सामाजिक बुराईयाँ हमारे इस सच्चे दृष्टिकोण से कम हो सकेंगी .

पत्नी भी नारी के अति सम्मानजनक अवतारों में से एक है यद्यपि समाज में उसकी सच्ची पहचान नहीं प्रचलित है