Monday, January 14, 2013

कृपया सम्मिलित करो मेरे मान को


कृपया सम्मिलित करो मेरे मान को 
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घर में आर्थिक अभाव कारण से 
पति की आय अपर्याप्त होने से 
होकर व्यथित वह निकलती घर से 
कुछ कमा लाऊं इस आशा से 

ताकि बच्चे मेरे पढ़ सकें 
पुस्तक और गणवेश दिला सकूँ 
कुछ पौष्टिक भोज्य जुटा सकूँ
पति का कुछ भार हल्का कर सकूँ

शक मन में पति के जन्मता 
हर रात आता शराब पीकर वह 
मारता , पीटता संदेह वश में उसे 
थकी जो घर बाहर के कार्य से 

चौका -बर्तन करने जब पहुँचती 
शिकायतें सुनती घर मालकिन की 
घर व कार्य स्थल में अपमानित  होती 
कहानी नित दोहराती पूरे जीवन में 

आदत पढती इन बातों की उसे  
लगता यही होता जीवन अबला का
और नहीं कृपया आप समझो मालकिन
क्योंकि आप भी हो नारी मेरी जैसी 

मान सम्मान को आप लड़ रही नारी के
कुछ पहले आप तो दे दो मुझ को 
अवश्य जरुरत मेरी थी जो 
मै आई थी काम मांगने आपसे 

लेकिन आपको भी जरुरत सहायक की 
आप को मिल जाएगा सम्मान पुरुष से 
पहले आप नारी करो मान थोडा मेरा भी 
परिस्थिति विकट मेरी को समझ कर 

नारी आप भी बना रही अबला मुझे 
घर लाये ब्याह कर मुझसे पति मेरे 
जो तुम ना दे सको सम्मान मुझे आप
सबको पसंद अबला हैसियत मेरी रखना 

उन्नति से विश्व की अतः कुछ नहीं 
मिलता उपेक्षित नारी के इस रूप को 
शोषण के विरुध्द उठ रहे सुर में 
कृपया सम्मिलित करो मेरे मान को 



 

   
      

अन्धकार से आलोक तक


अन्धकार से आलोक तक 
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ध्रुव प्रदेशों में , रात और दिन छह महीनों के होते हैं . वैसे स्थान पर एक शिशु रात आरम्भ होने के समय जन्मता है , और पांच माह का हो स्वर्ग सिधार जाता है . उसने पृथ्वी पर, जितना समझ सका पूरा जीवन अन्धकार ही देखा . उसके ऐसा देखने से पृथ्वी के बारे में यह सच नहीं होता . पृथ्वी से हमेशा ही अंधकार और आलोक क्रमशः आता जाता रहा है . कोई यह ना जाने तो भी यह सच बदलता नहीं है.

आज मनुष्य समाज में बुराई की भरमार है . ऐसे समय में हम जन्म ले जीवन भर यही सब अनुभव करते हैं . ऐसे में हमने बुराई रुपी अन्धकार को अपने सम्पूर्ण जीवन में देखा . हम समझने की भूल कर सकते हैं .  यह मान सकते हैं ,मनुष्य समाज है तो बुराई का अस्तित्व होगा ही. लेकिन बुराई विहीन (आलोक रुपी) मनुष्य समाज  कभी तो रहा होगा . और फिर कभी आज के अन्धकार के बाद यह  आलोक पुनः व्याप्त होगा . इसे   अनुभव नहीं होने के बाद भी मान लेना पूरा ज्ञान है . और जब इसका विश्वास समाज में ज्यादा को हो जाए तो ही इसके प्रयत्न होंगे और यही प्रभात के आलोक का मनुष्य समाज में पुनः सर्वत्र व्याप्त होने का कारण बनेगा.

हम सभी ने स्वयं या अपनी माँ बहनों को ऊन या धागों के काम के बीच उन्हें इनकी गुत्थियों में उलझने से परेशान अवस्था में देखा होगा . इन गुत्थियों को धैर्य और धीरे से सुलझाने पर ये सुलझ जाती हैं . जबकि अधीर होने पर इनकी गाँठ सख्त होती जाती हैं और सुलझाने के गलत यत्नों से इनमें नई गांठ लग और अधिक उलझने की सम्भावना बन जाती है . कभी कभी इन गांठ को सुलझाना कठिन हो इन्हें अलग कर फेंकना  ही उचित विकल्प बन पड़ता है .

सामाजिक बुराई के बढ़ने पर हम इसी तरह अधैर्य का परिचय आज दे रहे हैं . ज्यादातर इस पक्ष के मानने वाले वाले हैं , सभी बुराई व्यवस्था गत सख्ती से ठीक हो सकती हैं . जबकि सख्ती कई विषयों में हल नहीं देती बल्कि समस्या को बढ़ा देती हैं . 

वास्तव में व्यवस्था समानांतर अनुशासन के लिए ठीक है . पर पूरा इस पर निर्भरता से ज्यादा कुछ या स्थाई उपलब्धि नहीं मिलती है . हमारी शिक्षा , संस्कार और धर्म नैतिकता , न्यायप्रियता , परस्पर विश्वास ,प्रेम और करुणा हमारे ह्रदय में स्थापित कर सकते हैं . इसके लिए समाज और परिवार के बड़ों  के आचार ,व्यवहार और कर्मों में इस अनुशासन को देखते और सुनते छोटों में सरलता से इन के पालन की प्रेरणा दे जा सकती है . इस तरह जब सब अच्छे बन सकेंगे तो बुराई अपने आप कम होती है . फिर व्यवस्था बची बुराई पर नियंत्रण पाने में सफल हो जाती है .

बुराई की सब चर्चा और तर्क-वितर्क ही करें . तो आपसी दोषारोपण से गुत्थियाँ और कसती जायेंगी . पर धैर्य से हम सब विवेक और त्याग की रीति अपनाएंगे तो गुत्थियाँ ( अर्थात बुराई ) कम होते हुए समाज और देश में सुखमयी ताज़ी और  सुगन्धित बयार  जैसी सर्वत्र फ़ैल हमें सुरक्षित और प्रसन्नता का बोध कराएगी .

अंधकार और प्रकाश हमेशा व्याप्त नहीं रहता . आज के अन्धकार के बाद का प्रभात हमें ही लाना है ... आवश्यकता संकल्प और इक्छा शक्ति प्रदर्शित करने की है ...

जो सुर्ख़ियों में हैं , लाइम लाइट में है , नायक रूप प्रसिध्द हैं , जिनका बड़ा प्रशंसक वर्ग है ... उन्हें सब देख सुन रहे होते हैं . जैसा ये करते हैं , उनकी नक़ल देखने वाले करते हैं . ये वर्णित बड़ों से बड़े हैं . इन पर प्रथम दायित्व आता है . ये अनुशासित हो नैतिकता के आचरण और कर्म करें . इनसे प्रारम्भ होती अच्छाई की धारा इस धरा पर से बुराई को बहा ले जाने में सफल होगी  

               

Sunday, January 13, 2013

स्वार्थ - महत्वकांक्षा

स्वार्थ - महत्वकांक्षा 
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हमारी महत्वाकांक्षा प्रगति की ओर प्रेरित करती है . संकल्प हेतु प्रेरित करती है . इक्छाशक्ति बढाती है . कर्मठ बना सकती है . लक्ष्य पर पहुंचा सकती है . इस तरह मनुष्य जीवन सार्थक करने में योगदान कर सकती है .
यह सब व्यक्तिगत हित में होते हैं . हमारे जीवन स्वप्न ,हमारी महत्वाकांक्षा प्रेरित सद्गुणों और अनुशासित व्यवहार और कर्मों से फलित होते हैं . पर जब हम सर्वहित के दृष्टिकोण से देखें तो  आवश्यक नहीं हमारी उपलब्धियां सर्वहित कारी ही हों .

६५ वर्ष पूर्व परतंत्रता की जंजीरों से मुक्त हो हम स्वतन्त्र हुए . स्वतन्त्र होने के पूर्व पृथ्वी का जो क्षेत्र भारत  कहलाता था . वह हमारे पूर्व शासकों की धूर्तता के कारण एक नहीं रह सका . धूर्तता से स्वतन्त्र होने के पूर्व ही इन्होंने कुछ तत्कालीन व्यक्ति (यों ) के ह्रदय में व्यक्तिगत महत्वकांक्षा का बीज रोपित कर दिया . स्वतन्त्र होते होते जिसके कारण वे राष्ट्राध्यक्ष बनने लालायित हुए . पृथ्वी के इस हिस्से में एक काल्पनिक रेखा खिंची . इस रेखा के दोनों ओर मानव लहू से धरती लाल हुई . हमारे ही माँ बहनों की लज्जा , स्वार्थ सम्मोहन में स्वयं हमारे अपनों द्वारा ही क्षत -विक्षत की गई . जो धूर्त थे उन्हें बिना धन का मनोरंजन लगा . घडियाली आंसू उनके भी दिखे . पर एक का दो हुआ देश , चंहु ओर हानि ही सह रहा है  तब भी  और आज तक .

स्वार्थ - महत्वकांक्षा ने अपमान और हिंसा के जो निंदनीय प्रतिमान उस समय बनाये , उससे उपमहाद्वीप के मानुष मन में वैमनस्य का  स्थाई भाव विद्यमान हुआ . वह पीढ़ी जिसने यह सब प्रत्यक्ष देखा सहा , अधिकांश संसार से विदा हुए . पर  वैमनस्य का यह भाव थोडा भी कम नहीं हुआ . कहें तो बढ़ ही गया .

६५ वर्ष के बीते समय में काल्पनिक इस रेखा पर कई युध्द , संघर्ष हुए और आज तक जारी हैं. राष्ट्र रक्षा पर दोनों ही ओर अपार धन राशि सिर्फ हथियार प्रबंधन पर व्यय हुई . जो कहीं ओर लगती तो अविभाजित भारत आज एक विकसित राष्ट्र के रूप में पहचान बना सकता था. काल्पनिक  रेखा के दोनों ओर संघर्ष में कितनी ही माँ की गोद सूनी हुई ,कितनी ही दुर्भाग्य शाली नारियों का सिंदूर लील लिया गया  . और कितनी ही बहनों का रक्षा सूत्र उनके हस्तों में ही रह गया , वह कलाई जिस पर वह शोभित होता था , हमेशा को खो गई .

विडम्बना , घोर दुःख  "इस पूरे दुर्भाग्य पूर्ण क्रम को जिस दृष्टिकोण से देखा जा रहा है" , नहीं लगता क्रम निकट भविष्य में थमेगा .
फिर कोई अनहोनी घटित होगी फिर कुछ घरों ,नगरों में कोहराम और मातम के दृश्य दिखेंगे और फिर अपर्याप्त उपाय होंगे .. संवेदना और सहानुभूति कुछ समय उमड़ेगी . राष्ट्र प्रेम के गीत बजेंगे , गाये जायंगे . नए भी बनेंगे . पर जिनका ऐसा करीबी ऐसी शहादत   देगा उसके ह्रदय की पीर और बाद के जीवन संघर्षों की दर्दनाक दास्तान जानने का समय किसी के पास न होगा .
                
  स्वार्थ - महत्वकांक्षा आज भी अस्तित्व में है . जो इन बातों से बेपरवाह पहले थी , अभी है और आगे भी रहेगी .
धिक्कार स्वार्थ - महत्वकांक्षा .... महा धिक्कार स्वार्थ - महत्वकांक्षा 

Saturday, January 12, 2013

प्रेरणा - मानवता और समाज हित


"प्रेरणा - मानवता और समाज हित"
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धर्म , महामानव (महापुरुषों और महान नारियों ) द्वारा प्रस्तुत आदर्श , साहित्यकारों (सभी भाषा और क्षेत्र के ) , हमारे ऐतेहासिक ग्रथों (धर्म और इनके अतिरिक्त आदर्श के ) , घर-परिवार और पास-पड़ोस से अबोध उम्र से प्राप्त संस्कार , शैक्षणिक और धार्मिक गुरुओं और हमारी संगत वे कारण होते हैं , जिनसे हमारी जीवन शैली , शिष्टाचार , हमारे जीवन आग्रह और मानसिक धारणाएं प्रभावित होती हैं . जिन्हें एक शब्द में हम हमारे "पूर्वाग्रह" या "जीवन विश्वास" कह सकते हैं . 

आज के व्यस्तता के समय में जब जीवन में प्रत्येक पल चलते विचार पर हर कोई कुछ लिखने का समय तो नहीं ले पाता पर बोल चाल में इन पूर्वाग्रह प्रेरित आदर्श की चर्चाएँ समय समय पर अवश्य करते हैं . हमारे पूर्वाग्रह , आदर्श और विश्वास त्रुटी रहित भी होते हैं त्रुटी पूर्ण भी हो सकते हैं . अगर ये त्रुटी पूर्ण हैं तो वैचारिक मंथन (स्वयं के अन्दर भी ) और प्रबुध्द जन के बीच चला हम इन्हें त्रुटी मुक्त भी कर सकते हैं .

त्रुटी मुक्त आदर्श और विश्वास के धनी मनुष्य अपने कर्म आचरण से सच्ची मानवता का प्रचार प्रसार कर सकता है . जो हमारे अनुज भाई -बहन और हमारी आगामी संतति को अच्छा मनुष्य बना सकता है . अच्छे मनुष्य जिस समाज में ज्यादा हैं ,वह समाज सभ्य मानव समाज होता है . इसमें आज के और आने वाले (संतति के लिए ) अच्छा समाज का मार्ग प्रशस्ति के उपाय निहित होते हैं . यह समाज हित के लिए आवश्यक है .

फेसबुक पृष्ट "प्रेरणा - मानवता और समाज हित"  इस उद्देश्य से निर्मित किया गया है . जिसमें हम उन सभी मित्रों और अपरिचित ऐसे प्रबुध्दों  का हार्दिक स्वागत करेंगे . जो अपने  सभी तरह के विश्वास प्रेरित मौलिक कुछ लिखना -पढना पसंद करते हैं . इसमें चित्र-विडियो रहित ऐसी पोस्ट आमंत्रित होगी , जिसमें व्यक्ति विशेष की आलोचना (निंदा ) न होगी . पोस्ट धार्मिक या राजनैतिक प्रशंसा या समालोचना से रहित होगी . किसी नाम (व्यक्ति ,धर्म या राजनैतिक )  के जिक्र भी जिन पर ना होगी और कॉपी -पेस्ट ना करते हुए स्व-रचित और स्व-सृजित होगी .
 इस  फेसबुक पृष्ट को उदेश्य नाम अनुरूप मानवता और समाज हित की प्रेरणा का ही होगा . किसी भी विवाद से बचाने का दायित्व स्वयं हिस्सा लेने वाले मित्र और प्रबुध्दों का होगा . स्व-प्रेरित, स्व-अनुशासित ऐसे पृष्ट पर हम आपका स्वागत करेंगे .. सभी के सयुंक्त प्रयासों से पावन इस लक्ष्य की दिशा में हम साथ बढ़ने के लिए उत्सुक और जिज्ञासु रहेंगे ..

आप सोच विचारने के उपरान्त ही इस पृष्ट को लाइक कीजिये ..
हम संख्या पर नहीं गुणवत्ता को प्रधानता देना चाहेंगे ...

हार्दिक  अभिनन्दन ,हार्दिक  प्रणाम .... महाशय , सम्मानीय और आदरणीय .....(समस्त ) , माँ -बहन बेटियों ...

Friday, January 11, 2013

नारी -पुरुष समान अधिकार

नारी -पुरुष समान अधिकार 
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नारियों पर अत्याचारों का इतिहास बहुत पुराना है इसी क्रम में ताजे कुकृत्यों के कारण आज देश की नारी , युवा और प्रबुध्द जन अत्यंत आक्रोषित हैं .प्रदर्शनों , प्रसार माध्यमों पर चर्चाओं और fb पर कई तर्क-वितर्क और समाधान खोजे गए , सुझाये गए हैं . इस संवेदनशील विषय पर जिसने भी बिना गहन सोच-विचार कर लिखा या कहा उस पर वक्तव्य वापिस लेने और क्षमा मांगने का दबाव भी बना . यह सब मैंने देखा सुना है . इसलिए मै  पूरी सतर्कता के साथ ही अपनी बात रखने के चेष्टा कर रहा हूँ . और जो अंश किसी को ठेस पहुंचाते लगेंगे उसे में विलोपित भी कर दूंगा . ऐसी किसी भी स्थिति के लिए अग्रिम क्षमा याचना के साथ लिख रहा हूँ .
नारियों के वस्त्रों पर तर्क वितर्क आये . आधुनिक पीढ़ी ने और नारियों की तरफ से उन्हें ज्यादा सहमत नहीं किया .  नारी वस्त्रों से ज्यादा जो इन अपराधों के कारण है  उस  मूल कारण या समस्या की जड़ भी कह सकते हैं उसे लिखने की कोशिश कर रहा हूँ . 
आज आधुनिक माध्यम जिसमें नेट , मोबाईल , दूरदर्शन , सिनेमा  और कंप्यूटर स्टोरेज सम्मिलित हैं उस पर  अश्लील पिक्चर और विडियो की भरमार है . कोई भी बहुत कम प्रयास से या कहा जाए तो अनचाहे ही अपने सम्मुख इन सामग्रियों को पाता है . कोई भी  मूल कर्तव्य और प्रयोजन जिसको लेकर वह इन साधनों का उपयोग कर रहा है ,सरलता से भूल और भटक जाता है . इन सामग्रियों में नारी (ज्यादातर ) और पुरुष दोनों ही निवस्त्र या  मात्र अधोवस्त्र में उत्तेजक और कामुक मुद्राओं में दर्शाए गए होते है. इन का कुछ समय ही दृष्टि से गुजारने से ही इनके नेत्र में ऐसा दोष आ जाता है , जिससे अपरिचित नारी की तो छोडिये , घर परिवार , पास पड़ोस की ऐसी नारियों को जिनसे वह मर्यादाओं के रिश्ते से जुड़ा होता है उन्हें ही बुरी दृष्टि से देखता है . फिर यहाँ नारियों ने क्या धारण किया है वह महत्वहीन हो जाता है . पूरी गरिमा से वस्त्र धारण की हुई युवती को भी इनकी दृष्टि वस्त्र के पार सब कुछ देखने की शक्ति संपन्न हो जाती है . ऐसे में हमारी माँ , बहन पत्नी या बेटियां कैसे अपने तन ढंके उस से ज्यादा आवश्यक यह लगता है की इन अश्लील सामग्रियों पर कम या निर्वस्त्र (दुर्भाग्यशाली) नारियों के तन को किस तरह से ढका जाए. चूँकि यह सामग्रियां देश की सीमाओं के बाहर प्रचुरता से निर्मित और प्रसारित की जाती है अतः देश के अन्दर किये जाने वाले सारे उपायों पर पानी पड़ जायेगा . आज के युवा, नारी और नीति निर्धारक अपने मांग और क्रियान्वित किये जाने उपायों में इस पर गंभीरता दें .
जो नारी -पुरुष इन (अश्लीलता) व्यवसायों से धन अर्जन कर रहे हैं उन्हें यह प्रस्तुति नागवार लग सकती है . उनसे हाथ जोड़ क्षमा याचना करता हूँ . एक अनुरोध भी उनसे मेरा है . धन अर्जन के सम्मान पूर्ण बहुत विकल्प हैं अगर वे अन्य विकल्पों पर जाएँ तो अवश्य उनके पास कुछ कम धन और वैभव आएगा . पर समाज और नारियों की बड़ी भलाई होगी . उनके त्याग से समाज वैभव बढेगा ...  और नारी वास्तव में पुरुष समान अधिकार समाज में अनुभव कर सुरक्षित किसी भी  समय, किसी स्थान आने जाने की स्वतंत्रता ले सकेंगी           

Thursday, January 10, 2013

धरती पर ही स्वर्ग

धरती पर ही स्वर्ग 

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                     रेलवे स्टेशन ओवर ब्रिज पर तेज ठण्ड में फटे से कम्बल और चादर में दोहरी हो जाने के बाद भी इधर उधर से ठंडी हवाओं की चुभन से बदन सिहर उठता था . ऐसे में नींद भी कभी हलकी ही लग पाती थी . अभाव , हो गए रोग , जीवन में ना बचे किसी तरह के सम्मान और आज की तेज ठण्ड सहनशीलता के बाहर हो गए थे . बार बार नींद टूट रही थी . और मन में विस्मृत से हो रहे बचपन के दिनों से बीते जीवन की धुंधली पड़ी बातें याद आ रही थी एक सपना सा बन जीवन कटु यथार्थ चल रहा था उस रात . क्यों आई , बाबा ने इतने लाड़-दुलार से पाला था ?, क्यों दकियापाने में उसे स्कूल न भेज कम उम्र में ही विवाह करा ससुराल भेज दिया था?  नन्हेलाल ने शादी के तुरंत बाद कितने प्रेम से रखा था उसे एक औलाद पैदा करते तक तो घर में ही घुसा  रहता था ,हर समय उसके आगे पीछे मंडराता रहता . न रसोई में ठीक से काम करने देता . और ना परिवार के सदस्यों से कोई शर्म करता . उसके अनियंत्रित हाव भाव से कभी उसे बहुत लज्जा सी महसूस होती सास-श्वसुर के सम्मुख .
                       सबकुछ ठीक और बड़ी प्रसन्नता से चलते अचानक नन्हेलाल को क्यों ख़राब संगत मिल गई ? शराब , बीड़ी और गांजे के नशे में पड़ अब वह गाली गलौज और मार पीट पर उतारू हो जाता घर आने पर. श्वसुर गुस्से के  तेज  थे  . बर्दाश्त से बाहर होने पर , अबोध पोते की फ़िक्र भी ना की उन्होंने  . नन्हेलाल के अपराध की सजा उसे भी भुगतनी पड़ी . घर निकाला होने पर जैसे -तैसे किराये की खोली मिली . नन्हेलाल कभी तो कुछ कमा लाता कभी खाली नशे में घर लौट खाने को मांगता . ना होता कुछ , ना दे पाती कुछ तो मार खाती . इतने पर भी निकल रहा था जीवन . बेटू १४ -१५ का ही हुआ था . थोडा बहुत स्कूल  जा पढना सीखा था . भगवान ने दृष्टि उस पर से और टेढ़ी कर ली . बेहद नशा करने और अभाव के खानपान से रोग ग्रस्त हो नन्हेलाल एक दिन साथ छोड़ चला गया ,दुनिया से. और दो तीन ही    वर्ष बीते होंगे बेटू एक दिन घर से निकला तो ना लौटा फिर . आसपास के उसके संपर्क के लोग कहते . बम्बई भाग गया , सिनेमा में काम करेगा, कह कर . भगवान पर उसकी भी श्रध्दा बहुत थी . पर लगता था जन्म देने के कुछ ही बरसों बाद वह भुला चुका था उस अबला को . एक से एक कठिन परीक्षा ले रहा था उसकी . घर में ना पति और ना ही बेटा. अकेली देख , गाँव में बड़ा कहा जाने वाला  एक दुष्ट आ घुसा घर में एक रात , रोने गिडगिडाने पर भी ना दया आई उसे . कालिख पोत ही उसके जीवन पर निकला था वह . दूसरे दिन प्रचारित भी कर दिया अपना दुष्कर्म उस निष्ठुर ने अपनी शूरवीरता बताते हुए . ताने -उलहाने से त्रस्त हो गई .
                    अब कई पुरुष ललचाई दृष्टि से देखने लगे उसे . सहन ना कर सकी . भाग आई दूर शहर में . लेकिन कैसे करे  उदर पूर्ती ?, कहाँ छुपाये अपने तन को ?  यह समस्या तो गाँव से विकट आ पड़ी . स्टेशन पर दूसरे दरिद्रों जैसी आ पड़ी . कुछ मांगती , कुछ छोटे मोटे काम से कमाती . पेट तो भर लेती पर , दिन में जो सज्जन से लगते रात आ जोर जबरदस्ती करने लगते . गाँव में कुछ थे यहाँ तो लगता दुष्टों की मंडी थी . पर हां जान पहचान नहीं थी अतः गाँव जैसी बदनामी यहाँ ना लगती . संख्या याद नहीं कितने इज्जतदार से उसके सामने नंगेपन पर उतर चले गए . अभी पचास की हुई होगी . पर लगने लगी थी वृध्दा . वृध्दा दिखने से एक लाभ तो हुआ था . दैहिक शोषण करने वाले अब कम आकर्षित होते और भिक्षा थोड़ी सरलता से मिलती . जैसे तैसे ठण्ड की रात गुजरी थी . सुबह सूरज की गर्मी देती धूप खिल आई थी .जिस कोने में ओवर ब्रिज पर धूप ज्यादा मिल रही थी , वहां आ बैठ गई थी . गुजर रहे मुसाफिरों  के सामने हाथ पसार देती . एक ने बिस्कुट का पूरा पैकेट ही दे दिया था . वह खोल कुतरने लगी थी एक के बाद एक बिस्किट .
                       जयपुर से लौटी अपनी बेटी को ले निर्भ्रम ब्रिज पर से जा रहे थे . एक महिला का बड़ा हाथ देख ,रुक बेटी को पांच का सिक्का दिया , महिला को देने के लिए .बेटी ने पांच का सिक्का अपने पास रखा फिर दस का नोट निकाला  और महिला को दिया . बेटी के मन में करुणा के भाव विध्यमान हैं यह ,एक बार पुनः पुष्टि हुई . संतोष हुआ निर्भ्रम को . निर्भ्रम ने    महिला को देख मानो सब कुछ पढ़ लिया था उस पर बीती . सोच रहा था दस  रुपये से क्या होगा . ना तो इज्जत खरीद पाएगी , ना कोई आश्रय हासिल कर पाएगी . ना ही कपडे और ना ही उचित भोजन . पर सामर्थ्य ज्यादा नहीं था .एक की कोई समुचित व्यवस्था कर भी दे ,जैसे तैसे तो . ऐसे दरिद्र और उनके दुखड़ों की तो लम्बी श्रंखला है .
                     रात्रि में बिस्तर पर आ जाने पर भी सुबह दिखी उस महिला को चिंतन से नहीं निकाल सका है . सोच रहा है . अपने लेखन को और ओजस्वी बनाना होगा . और समय देना होगा . एक दामिनी की लाज और जीवन जाने पर सबने बहुत शोर मचाया है . कितनी दामिनियाँ तो सदियों से भुगतती आ रही है . सब क़ानून तो रहे हैं . जो शोर मचाते हैं . उनमे से ही कितने अकेली दामिनी को पा अपने सच्चे कर्तव्य को निभा पाते हैं ..  नहीं ! न व्यवस्था कारगर होगी , ना ही मृत्युदंड का भय . फिर आजकल न्याय भी तो कई बातों से प्रभावित होने लगा है .. अगर कड़ा सजा प्रावधान भी कर दिया गया तो , क्या सही न्याय से सभी पर न्याय किया जा सकेगा ? उस कानून अनुरूप .
मनुष्य के ह्रदय से संवेदना की मात्रा , न्यायबोध और कर्तव्य बोध की मात्रा जो घट शून्य के स्तर पर पहुँचने देख रही है . उसे वापिस बढाने  की आवश्यकता है . यह समझने , समझाने की आवश्यकता है जो जीव उस महिला के अन्दर है .. उसी प्रकार का सबके   , माँ ,बेटी ,बहन और पत्नी  को मिला जीव है . अगर यह समान है तो उसी भाव और दायित्व की दृष्टि अन्य पर भी रखना होगा . हमें अपने धर्म अपने समाज और अपने देश का सिर्फ दिखाने भर का गौरव गान नहीं करना है . इसे अपने सभ्य आचरण कर्मों से ,मानव सभ्यता के उस शीर्ष पर ले जा स्थापित करना है .. जिस से हमारा देश हमारा मानव समाज और हमारा धर्म धरती पर ही स्वर्ग रूप में परिवर्तित हो सके ...

Zozila to Rohtang -- यात्रा वृतांत - एक कल्पना (भाग -2 )
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10  दिवसीय भ्रमण कार्यक्रम क्रियान्वित होना इस तरह आरम्भ हो गया  था . दिन था 26 अगस्त 12 ,  10 दिनों बाद 4 सितम्बर भी कैलेंडर में आना ही था . देश समाज या विश्व में होने वाले घटनाएँ तो होनी ही थीं .पर इन मित्रों को इन 10 दिनों में दिनचर्या से भिन्न  कुछ और कर दिखाना था . किसी अन्य के सामने कुछ विशेष सिध्द करना हो ऐसे मंशूबे तो ना थे . पर अन्य दिनों से से भिन्न ये दिन उनके लिए साबित होने वाले थे .
गाड़ी हाई वे पर आ चुकी थी . स्वयं इन की गाड़ी रफ़्तार में  भाग ही रही थी . दूसरी दिशा से आने वाले वाहन भी रफ़्तार में चल रहे  थे .आवागमन संख्या भी बहुत थी . कभी पीछे से ज्यादा गति के शौकीन वाहन चालक इन की गाड़ी को ओवर टेक कर रहे थे .
 जबलपुर से निकले कुछ वक्त बीता तो , घर परिवार के तरफ से ध्यान हटने लगा था . इस तरह भावुकता से निकल सामान्य होते हुए  इनके बीच सामान्य चर्चाएँ प्रारम्भ हो गईं थी . सामान्य गतिविधि जैसे जल , गरम पेय , रिफ्रेशमेंट इत्यादि का क्रम भी चला था . बहुत जल्दी जल्दी तो नहीं पर गाड़ी , ड्राईवर को आराम देने उचित स्थानों पर ये रुकते चलते बढ़ रहे थे .
 सामान्य चर्चाओं के बीच  गंभीर प्रसंग पर विचारों का आदान प्रदान भी बीच में हो रहा  था . जो यह कहता था --10 दिनों में इन्हें बहुत सी बातें सिध्द करने का दायित्व था . लम्बे कार्यक्रम में जिसमें  यात्रा की थकान , अनियमित खानपान और तुलनात्मक रूप से कम आराम-दायक स्थिति में अपने स्वास्थ्य को बनाये रख अपने को फिट सिध्द करना था .
रोमांच-प्रेमी मित्र जिनके सुझाव से लद्दाख के मनोरम घाटियों की  दुर्गम यात्रा के बीच अभूतपूर्व आनंद है ,उनपर अन्य मित्रों के सम्मुख इस बात में सच्चाई को सिध्द करने का भार  था .
फोटोग्राफर मित्र को मनोरम प्रकृति को विभिन्न  कोणों से मनभावन छायचित्र कैमरे में कैद कर अपनी यह योग्यता मित्रों के सम्मुख पुनः सिध्द करनी   थी .
 चारों को ही  ,दुर्गम पथ जिस पर जरा सी असावधानी से चलने में अनहोनी की आशंका का भय  तथा  पीछे छोड़ कर आये परिवार  की कुशलता की चिंता और घबराहट पर भी काबू कर अपने को साहसी सिध्द करते हुए , प्रकृति की उस छटा जिसे "पृथ्वी का स्वर्ग" कहा जाता है का पूर्ण आनंद भी उठाना था  .
 इस तरह के साथ भ्रमण से आपसी सामंजस्य से  मित्रता  में प्रगाढ़ता बढती है यह भी सिध्द करना था .
कुल मिलाकर अपने को स्वयं के सामने ही सिध्द करना था . अपने को स्वयं के सामने सिध्द करने से आने वाला विश्वास अपने जीवन को सार्थक करने के लिए बहुत उपयोगी होता है . जीवन में  विभिन्न समय में अलग अलग प्रसंग पर स्वयं के सामने सिध्द करने के कुछ अवसर सभी को मिलते हैं  . 10 दिन का यह भ्रमण इन  चारों  के जीवन में इस तरह का एक अवसर था .
लगभग सोचे समझे ढंग से ही पहला  दिन   व्यतीत हुआ था . उनकी गाड़ी अब पानीपत में उस होटल की पार्किंग में पहुँच गई थी , जहाँ उन्हें रात्रि विश्राम करना था ...

जारी क्रमशः ----

--rajesh jain 10-01-13 (काल्पनिक वर्णन )