Wednesday, January 9, 2013

जगमगाता जीवन हार

जगमगाता जीवन हार
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जन्मा , वह शुरू हुई तब जीवन मोतियों का बनना एक हार
सूर्य निकल नित सफ़ेद एक मोती पिरोता इसमें बढ़ता है ये हार 
चंद्रमा आ निशा में जोड़ता काला मोती प्रतिदिन एक इस हार में 
प्रत्येक मनुष्य का इस तरह बन बढ़ता ऐसा एक जीवन हार

जन्म से जीवन अंत आते आते इतना बढ़ता यह जीवन हार
एक श्वेत एक काला मोती साठ हजार जाते लग इस हार में
बहुत कुछ समानता पर हर का बनता जीवन हार ये निराला
जगमग या बुझते मोती अलग होते कम ज्यादा  जीवन हार में

सद्कर्म ,सदाचार और सद्प्रेरणा बढ़ाते जगमग इस हार की
बुरे कर्म जीवन में हम से होते बुझाते वे जगमग इस हार की
जिसमें बहुत होते जगमगाते मोती कभी ही बिरले बनते ऐसे हार
 जगमगाते एवं बुझते बराबर मोती होते बहुधा बनते ऐसे हार

जगमगाते शोभा रहते दीर्घ काल तक समाज गले के बन हार
विकसित और सभ्य होता राष्ट्र करता धारण अनेक ऐसे हार
इतिहास पृष्ट पर नहीं उल्लेख मिलता जो जीवन न बनते ऐसे हार 
आओ 'राजेश' यत्न करें मानव समाज धारे मेरे जीवन हार को

--राजेश जैन

Monday, January 7, 2013

2012- फेसबुक कहानी -2


2012- फेसबुक कहानी -2
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"बुराई विहीन मनुष्य समाज" की रचना में चुनौतियां के अपने आंकलन से स्वयं के ही सामने निरा मूर्ख सिध्द होने पर , इस दिशा में बढ़ते कदम ठहरने को जब हो रहे थे . अनायास अगस्त अंत में एक दिन मित्र सन्देश आया . अपरिचित को भी जोड़ने में कभी कोई कठिनाई नहीं लगी थी . उन्हें जोड़ लिया . कुछ दिनों में उन्होंने हिंदी साहित्य के कुछ समूह पर उसे आमंत्रित कर लिया . जिसमे एक समूह लघु कथा लेखन और दूसरा छंदमुक्त काव्य  का था .वह  अपने अपरिपक्व विचारों को किसी तरह से लिपिबध्द तो कर रहा था , पर इन दोनों ही विधाओं से कोई नाता नहीं था . विशेषकर काव्य कही जा सकने वाली दो पंक्तियाँ भी लिखना उसके लिए अत्यंत ही कठिन था .

पर समूह में सक्रिय रूप से भाग ले सकने के लिए कुछ इन शैलियों में लिखा जाना आवश्यक था . पहले कुछ लघु कथा लिखी जो लघु कथा कम निबन्ध से ज्यादा बने . पर उन फेसबुक मित्र की मित्रता निभाने का भाव बड़ा अनुकरणीय था . चाहे लो लिखा गया हो उसमें बड़ी से कोई शिक्षा पढ़ लेना और उसपर दाद देते हुए वे मनोबल बढाने में तनिक विलम्ब नहीं कर रहे थे . उत्साहित हो तब उसने छंदमुक्त काव्य लेखन के प्रयास आरम्भ किये .

समाज में सुख-शान्ति बढे ,यह किसी भी तरह के लेखन के मूल में स्वभाव के कारण आ ही जा रहा था . जब वह यह मानता (अपनी सीमित समझ से ) कि उसने अब बड़ी अच्छी रचना लिख दी है . पोस्ट करता तो प्रतिक्रिया ऐसी कहीं दिखाई ना देती . पर पुनः आभार उन मित्र का माना जो छंदमुक्त पर भी बड़े आत्मीयता से अच्छी टिप्पणियाँ देते . इस बीच संदेशों के आदान प्रदान में उन्होंने एक हिंदी लेखों का समूह भी निर्मित कर दिया और उसका एक एडमिन (कुछ में से ) भी बना दिया . इस मान के लिए अभिभूत तो वह हुआ , पर पिछला अनुभव एडमिन का अप्रिय रहा था . कुछ दिनों उपरान्त स्वतः उस विशेषाधिकार को त्याग दिया उसने .

ऐसा लगा लड़खड़ाते कदम सयंत हो रहे हैं . लगभग प्रतिदिन ही कुछ लिखा जाता और पोस्ट होता . नोटिफिकेशन की संख्या मित्र के उत्साहवर्धन नीति के तहत इतनी आ रही थी कि लेखन का क्रम चल सके .

पर व्यक्तिगत कुछ जीवन लक्ष्य के लिए संकल्पित हो  उन मित्र ने अपनी फेसबुक डीएक्टिवेट करने की सूचना दी . यहाँ आकर नोटिफिकेशन में कमी आई . विचार करने पर लगा कई असफल प्रयत्न के बाद भी बार बार यत्न से जीवन में सफल होने के कुछ उदहारण कुछ विभूतियों द्वारा समय समय पर दिए गए हैं . अतः बहुत अनुकूल कुछ नहीं देखते हुए भी आशावान रह वह जुटा रहना चाहता है . आशा है पुनः हाथ थाम , कंधे से कन्धा मिला आगे साथ बढ़ने वाले उन मित्र महोदय की  सक्रियता फेसबुक पर जल्द ही बढ़ेगी .
 
फेसबुक पर वह नहीं आता और लेखन के यत्न ना करता तो ना ही ऐसे कुछ विद्वानों से संपर्क सूत्र बनते . ना ही लेखन के यत्न में विचार रुपी मोती खोजने अपने अन्तर की इतनी गहराई में उतरता . ना ही मंथर गति से सही उसके आचार-विचार में सही दिशा में परिवर्तन आते . यह उपलब्धि व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर संतोष का कारण तो बन रहा था .
 
पर सच्चा संतोष पाने का उसका स्वप्न अधूरा रहते वर्ष 2012 समाप्त हो गया था ... 
 
 "कैसे पतन की दिशा में अग्रसर हो रहे व्याप्त व्यक्तिगत आचार -व्यवहार को वह थामे ?" कैसे इस दिशा में कार्यशील महानायकों का साथ दे सके ? कैसे वह इनसे जुड़े ? और कैसे इन्हें अपने से जोड़े  ?ताकि कुछ के सयुंक्त प्रयासों से एक ऐसा ज्योतिपुंज निर्मित हो सके जिससे सच्चा  मानव पथ आलोकित हो  .. उस पर चलने और बढ़ने की जागृति सामाज में आ जाए ...
यह स्वप्न कब पूरा होना आरम्भ होगा ?

Sunday, January 6, 2013

गौरव बोध




गौरव बोध
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                                 पद स्थापना नई जगह हुई . जिस अपार्टमेंट में रेंटल फ्लैट लिया . उसमे एक किराना व्यवसायी परिवार रहता था . परिचय हुआ तो उन्होंने पत्नी से उनकी शॉप से अच्छा किराना मिलता है , अतः वहां से लेने का आग्रह किया . आगे किराना वहां से लिया जाने लगा . एक दिन उसने पत्नी से कहा किराना अच्छी शॉप से लिया करेंगे , पत्नी ने पूछा क्यों ? उत्तर में कहा .. दुकान छोटी है यहाँ क्रय करने आने वाले दिन के लिए किलो ,आधा किलो या 100 gm लेने वाले छोटे लोग आते हैं भीड़ ज्यादा रहती है . पत्नी ने सहमति जताई . आगे किराना बड़ी ,प्रसिध्द शॉप से लिया जाने लगा. 

कुछ दिनों उपरांत उसने पत्नी से कहा ... सुनो ,तनु किराना पुरानी दुकान से ही लिया करेंगे . पत्नी के चेहरे पर असमंजस के भाव आये बोलीं ... अब क्या हो गया ?

वह बोला पड़ोस की भाभी को हर शनिवार वह एक स्टील की बकेट में 4-5 किलो का गरम नाश्ता ले जाते देख रहा था .समझ नहीं आता था कहाँ ले जाती हैं . एक शनिवार घर वापस आते मैंने देखा , भाभी एक फूटपाथ पर बैठे दरिद्र , भूखे लोगों को उनके प्लेट में बड़ी आत्मीयता से बकेट से नाश्ता परोस रही थी . यह भावना मुझे बड़ी प्रिय लगी . व्यवसाय सब करते हैं , आजीविका कमाने के लिए सब कुछ न कुछ करते हैं . अपने लिए और परिवार की फिक्र सब कर रहे हैं . लेकिन कुछ ही ऐसे आज दिखाई देते हैं , जो स्वयं और परिवार से ऊपर दूसरों के बारे में भी कुछ सोच रहे हैं .



तनु ने प्रश्न उठाया पर वह तो मंदिर के सामने अपने लिए पुण्य प्राप्त करने की भावना से ऐसा करती हैं .
वह बोला -- प्रेरित भले ही कोई भावना कर रही हो पर बेसहारा को कुछ सहारा तो वो कर रही हैं .. हम उनके शॉप से सामग्री खरीद कर कुछ लाभ का सहारा देने की भावना रखेंगे ... ताकि उनका परिवार यह पुण्य कर्म की निरंतरता रख सके ..
तनु ... पति का मुख , एक गौरव बोध से निहारने लगी ....


Zozila to Rohtang


Zozila to Rohtang


जबलपुर के चार मित्रों ने अगस्त १२ में ,१० दिवस का भारतीय फौज को समर्पित जबलपुर से जोजिला , रोहतांग के बीच टूर किया . इन स्थानों को जबलपुर से और भी लोगों ने घूमा होगा . लेकिन अनुराग जी और उनके मित्रों के प्रवास की विशेषता "भारतीय फौज को समर्पित" नाम दिया जाना था .इससे बढकर जो बात प्रभावित करती है वह यह कि इन्होने छायाचित्र प्रदर्शनी जबलपुर रानी दुर्गावती संग्राहलय में दिनांक ५/०१/१३ और ६/०१/१३ को लगा कर जबलपुर वासियों से प्रवास के अदभुत अनुभव और वहां इन मित्रों द्वारा लिए गए २०० से अधिक आकर्षक छायाचित्र शेयर किये . इवेंट का आमंत्रण इन्होने फेसबुक पर भी किया . पहुँचने पर गर्मजोशी से स्वागत तो किया ही . प्रसन्नता से जो बताया वह मनुष्य जीवन की वास्विकता को सरलता से चित्रित करता है . उनके अनुसार प्रकृति के इतने करीब देखते हुए उन्हें अनुभव हुआ के अपने दैनिक जीवन में अपनी उप्लब्धियों और अहम् को लेकर हम बढे होने की भ्रान्ति रखते हैं ,जबकि लद्दाख की मनोरम वादियों , वहां की झील ,झरने नदियों और नैसर्गिक हरियाली और पक्षियों के कलरव और सुन्दरता से बढ़कर हम नहीं होते हैं. कृत्रिमताएँ जिनमे हम प्रकृति से दूर अपना जीवन बसर करते हैं उनमे कई बुराई हम अनायास या बाध्य हो धारण करते हैं . प्रकृति के बीच रहकर हम मनुष्य जीवन की प्रकृति को सहज और सरलता से समझते हैं ..

उन्हें इस अनुकरणीय परम्परा आरम्भ करने के लिए बधाई और आमंत्रण के लिए आभार के साथ मैंने विदा ली .

जल्दी में यह लेख लिखने का अभिप्राय यह है , जबलपुर के जो मित्र समूह में इसे पढ़ पा रहे हैं , वे कल ,"कला वीथिका" में जा लद्दाख के वादियों के नयनाभिराम छायाचित्र को देखने के अवसर का लाभ अवश्य लें . ताकि इस तरह के जन हितकारी उद्देश्य लेकर इन मित्रों का लगाया समय और श्रम व्यय अकारथ न जाये . और इस से हम वंचित न हों ...

(Kala Vithika, Rani Durgavati Sangrahalya, Opp. Hotel Krishna, जबलपुर)
धन्यवाद ...
राजेश जैन


Saturday, January 5, 2013

प्रणय सम्बन्ध (क्षमा करें महानायकों )...

प्रणय सम्बन्ध  (क्षमा करें महानायकों )...


प्रणय सम्बन्ध बिलकुल ऐसा विषय नहीं जिसको बुरा समझा या कहा जाये  ...
यह प्राणी प्रकृति में सहज एक आवश्यकता है .
                     अन्य प्राणी की तुलना में , इस पर ज्यादा तार्किक मस्तिष्क मनुष्य को मिला है , जिसने जीवन में विवादों को टालने के लिए इन संबंधों के लिए कुछ मर्यादाएं निर्धारित कर एक "मानव सभ्य समाज "  की अवधारणा दी . जिस प्रकार उदर को भोज्य आवश्यक है , जो जीवन उर्जा देते हुए आयु सुनिश्चित करता है . प्रणय भी एक तन और मन की आवश्यकता है ,जो प्राणी जीवन क्रम बनाये रखता है . लेकिन जिस प्रकार भोजन करने और उसके विचार में मनुष्य सिर्फ प्रतिदिन 1 डेढ़ घंटा देता है , उसी प्रकार एक आयु सीमा में पहुँच ऐसे  मनुष्य का  कुछ समय इन संबंधों के लिए आवश्यक हो जाता है .

जिस तरह पूरा दिन रात सिर्फ भोजन विचार में लगाना उचित नहीं ,उसी प्रकार प्रणय चर्चा / प्रणय दर्शन के लिए पूरे दिन रात लगाना औचित्यपूर्ण नहीं होता है .

यौन अपराधों के बढने पर सभी चिंतित हो रहे हैं . सब नियंत्रित करने पर तर्क वितर्क कर रहे हैं . पर नियंत्रित क्या किया जाए जिससे कमी आये इस पर समझते हुए भी सब उसे भुलाये हुए हैं . सोचते हैं दंड भय और कड़ाई से पालन कमी लाएगा . अगर यह कमी हासिल भी की जाये तो लगता है अस्थायी ही होगी . क्योंकि व्यभिचार की बुराई फैलने का कारण अपर्याप्त व्यवस्था से ज्यादा कुछ दूसरा है .

                    80    के दशक में जन्मा आज का युवा बचपन से सरे आम वह दृश्य देखता आया है , जिसमें एक  पुरुष प्रणय याचना -- नारी से चुम्मा और प्यार देने के गीत गाता  हुआ करता है . ऐसे बच्चे ने यह भी देखा है गाने वाला वह पुरुष किस तरह पूरे देश वासियों के ह्रदय में बसता  है . जीवन में सफलतम कहला रहा है . और अरबों की संपत्ति अर्जित कर चुका है . उसे देश महानायक भी मानता है . फिर कोई  महानायक की नक़ल करते आज का युवा युवतियों पर फिकरे करता है ,तो क्या वह बुरा है?  जबकि यही करता हुआ दूसरा महानायक है .
                  कार्यालय यह विद्यालय में दिन के समय नेट पर शाम को दूरदर्शन और सिनेमा में तथा रात्रि मदिरा पार्टी में यौन विषयक चर्चा बहुतायात और दिन रात की अवधि में अधिकांश होती मिलेगी तो कोई भी दंड प्रावधान या  कड़ी व्यवस्था असरकारक होगी इस में संदेह जन्मता है .
किये जाएँ ये प्रावधान आपत्ति नहीं . पर अगर कोई इस देश को अपना या समाज को अपना मानता है . यह उस जनसमूह में खड़े युवाओं को अपना बेटा -बेटी या भाई-बहन  सा मानता है तो इतना जिम्मेदार अवश्य बने , "जो आचरण विनाश की ओर  ले जाता है " उस हेतु दुष-प्रेरित उन्हें ना करे और वह भी अपने 70 -80 वर्ष के जीवन के लिए ,  अपनी अति स्वार्थ-लिप्सा की कमी को लेकर .

महानायकों आपका जीवन अधिकतम 100 वर्षों या उस से कुछ ज्यादा होगा . पर भारत एक राष्ट्र या मनुष्य एक प्राणी नस्ल का जीवन करोड़ों वर्ष का हो सकता है यदि अपनी अनियंत्रित वासनाओं से आप पथगामी को दिग्भ्रमित ना करें तो ...

क्षमा करें महानायकों  ...

Wednesday, January 2, 2013

2012- फेसबुक कहानी -1

2012- फेसबुक कहानी -1


                   वह गणित में कुशाग्र रहा है . पहले कुछ वर्षों फेसबुक के विषय में सुनते हुए भी रूचि नहीं लगी थी . मार्च में अनायास इक फेसबुक आईडी बनाई .कुछ दिनों में लगा सिर्फ वल्गेरिटी या समय की खराबी नहीं कहा जा सकता इसे . जो कुछ अधकचरे दर्शन या विचार थे मन में किसी किसी साधन से पोस्ट करने आरम्भ कर दिए . एक दिन एक समूह निर्मित कर दिया . अपनी समझ के विषय में स्वयं प्रमाण पत्र जारी किया और असाध्य से सामाजिक प्रॉब्लम का क्या गणित बनाया उसे लगा सरलता से हल हो जाएगा . एक हल निकाला त्रुटिपूर्ण हल में आया उत्तर अति संतोष कारी मिला.  अपरिचितों के लाइक को गंभीरता से लेते हुए . अपरिचितों को मित्र सूची में जोड़ने के लिए अति आशावान हो सन्देश प्रेषित करने लगा .  फिर समूह पर एक बहुत ही टेलेंटेड सफल विदुषी महिला को ला , एडमिन बनाया .उनको सन्देश लिखने लगा .   एक दिन सन्देश की प्रत्युत्तर में उन्होंने दीदी संबोधन अगर उचित लगे तो दीदी लिखने का अधिकार दिया . वह दीदी तो नहीं जीजी (बहन का संबोधन ) उन्हें करने लगा .                    
                      विचारों को मानों पंख मिल गए . वे ऊँची उड़ान भरने लगे लगा , विश्व जीत लिया . फिर समूह सदस्य बढाने की युक्ति कर एक दिन एक अन्य अपरिचित नारी को समूह पर सदस्य बनने को प्रेरित किया . समूह पर जुड़ने के बाद एक पोस्ट पर विचारों के अंतर पर अप्रिय शब्द उपयोग होने लगे .  जीजी ने संदेशों के माध्यम से नाराजगी व्यक्त कर एडमिन के शक्ति प्रयोग कर अनुशासित करने कहा . सख्ती स्वभाव में नहीं थी उसके , सोचा कुछ अवधि में स्वयं सयंत हो जायेंगे सब . तो भी एडमिन के गुण ना होने की बात अनुभव कर एडमिन से स्वयं को वंचित कर लिया . यहाँ विवाद ओर  गहरा गया . अपशब्द प्रयोग करने के आरोप में समूह पर से उन्हें विदा किया गया .पर जीजी  अपरिचित भाई से नाराज हो गई .
                 भाई ने स्वाधीनता दिवस पर आई एक पोस्ट

 "हमको आजादी आधी रात को मिली थी ,जिसका सवेरा अभी तक नहीं हुआ है "

 पर अपनी ओर से जोड़ा
"हर रात्रि के बाद सुबह प्रकृति ले आती है पर स्वतंत्रता की पहली सुबह हम सच्चे नागरिकों को ही लाना है ,
पिछले चूक गए हों हम ना चूकें .
नहीं तो दायित्व अगली पीढ़ी पर जाने का सिलसिला यूं ही चलेगा
तब यह प्रश्न अगली पीढियां भी करते जाएँ यह हमारी खेदजनक असफलता होगी "
और समूह पर पोस्ट कर दिया .
                           पहले ही नाराज जीजी की पारिवारिक पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लिए पूर्वज तो थे ही , साथ ही उन्होंने ऐसे वरिष्ठ आदरनियों को समूह पर आमंत्रित कर रखा था जिनका या जिनके बड़ों का भी स्वतंत्रता की लड़ाई  में भूमिका रही थी .
भाई का "पिछले चूक गए " शब्द उन्हें चुभा , भाई को क्षमा मांगने को निर्देश किया . भाई यद्यपि अभिमानी नहीं था .  पर मूर्ख था किसी दृष्टि से टिप्पणी उचित नहीं है यह समझ ही ना थी .  क्षमा मांगने से बचते हुए एक दिन समूह से किनारा कर लिया .मूर्ख जिसे भाई सा मान जीजी दे बैठी थी एक दिन अपनी मित्रता सूची  से उसे वंचित कर मूर्ख मित्र से समझदार दुश्मन श्रेयस्कर है जताया .
भाई ने ह्रदय में किसी जगह गलती की चुभन अनुभव की . भले ही जीजी अपरिचित थी , भौगोलिक दृष्टि से इतने दूर थे जीवन में मिलना संभावित ना था . पर अपरिचित ही सही वैचारिक भाई बहन का रिश्ता खोया था . लगा वास्तविक जीवन में कुछ खो गया . फेसबुक को अत्यंत गंभीरता से लेना पसंद था .
             लक्ष्य जिसमें समाज को बुराई विहीन देखने का स्वप्न था हवा हो गया था . विचार जो ऊँचाइयों पर पहुंचे थे भले ही भ्रम में सही लक्ष्य को आसान पहुँच में देख रहे थे , तेजी से यथार्थ कठोर धरातल पर उतर आये थे.   सम्हाला था शक्ति पुनः जुटाई थी . धरातल पर पहुँच लक्ष्य अत्यंत कठिन लगा था . फिर भी जूनून है  लगा हुआ है .
               मालूम है समाज को बुराई विहीन करने के यत्न अपर्याप्त संख्या में आज हो रहे हैं . ऐसे में वह लक्ष्य  "समाज को बुराई विहीन" करने का निरंतर और दुर्गम और दूरस्थ प्रदेश की ओर स्थापित होता जायेगा . भाई का जीवन जैसा आगे बढेगा उसके यत्न और लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम क्रमशः शिथिल होते जायेंगे .लक्ष्य और दिशा में बढ़ने के बीच  दूरियां बढ़ जायेगी , किसी दिन जीवन समाप्ति का पल आएगा , सुन्दर कल्पना "बुराई विहीन मनुष्य समाज "  स्वप्न बन अंतिम मुंदते नयनों  में अधूरा कैद हो चला जायेगा .
                  "एक मनुष्य का जीवन अवश्य छोटा है, नश्वर है . पर मनुष्य जीवन अनश्वर है ."        
                                                              अतः उसके सुखी बनाये जाने के प्रयास यह भाई भी करेगा कुछ अभी के भद्रजन भी करेंगे और आगामी मनुष्यों में से कुछ करते रहेंगे .
पर इतना बड़ा मूर्ख शायद ही कोई दूसरा होगा जिसका सामर्थ्य तो कुछ ना होगा ..

अपने आधे अधूरे दर्शन और लेखन से जो इसे साधने का प्रयत्न कर रहा होगा ...
एक मूर्ख ही वह करता है जिसका प्रतिफल कुछ नहीं होता ....   है ना ?  

Tuesday, January 1, 2013

साहित्य सरोवर

साहित्य सरोवर
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आदर्शों को जीते थे और उच्च सिध्दांत जो पालन करते
साहित्य रूचि से अपनी करते वे सृजन प्रेरक साहित्य का

समूह में मिल सब ऐसे ,निर्मित एक सरोवर साहित्य करते
देश में छोटे छोटे कई होते थे ,ऐसे पवित्र साहित्य सरोवर

साहित्यकार खिलाते इन सरोवरों में रंग बिरंगे अनेक कमल
रह जागरूक कर्तव्य निभाते ,मनुष्य संतति प्रति सब अपने

देते भली सद-प्रेरणायें खिलाकर साहित्य कमल सरोवर में
कविता ,कथा और लेख रूप में होते थे कई रंग बिरंगे कमल

पढ़, देखकर  मंचन इनका लेते सब पथ प्रदर्शन जीवन का
दैनिक मनुष्य जीवन में ,दिखती भलाई और  सहज सरलता

आये जब पाश्चात्य देशों में निर्मित आधुनिक दर्शन साधन
साहित्य दिखलाया जाने लगा तब मिला इनमें विदेशी मसाला

नित देख चमक दमक इन साधनों पर प्रभावित हम होने लगे
धीरे धीरे हम भूले पढ़ना ,देखना और मंचन प्रेरक साहित्य का
खोयी लोकप्रियता साहित्य ने  हतोत्साहित हुए उच्च साहित्यकार
सृजन हुआ ओछे साहित्य का ,चहुँ दिशा फैलाई जिसने अपसंस्कृति

खिलते जो साहित्य सरोवर में थे ,उत्कृष्ट रंग के कमल के फूल
अश्लील व ओछे साहित्य के प्रदूषण से मुरझा जाते खिलने से पहले  

आडम्बर, प्रणय प्रमुख कर मोहक विज्ञापनों से किया प्रचार
धन की न कमी दर्शन साधनों में एक लगा दस बीस कमाते

दे बहुत पारिश्रमिक युवाओं को लिया उन्हें पाश्चात्य प्रभाव में
सम्मोहित कर दौड़ाया सबको चमकते दमकते सिनेमा की ओर

निर्मल थे जो साहित्य सरोवर ,हुए गंदगी और प्रदुषण सरोबार
विवश थे उच्च साहित्यकार क्योंकि उनका था सिध्दांत परोपकार

आदर्श-सिध्दांत वादी ,पूर्व पीढ़ी के साहित्यकार थे नहीं धनवान
जिनका होता साहित्य ही धन लेखक ,कवि हुए पैतरों आगे पस्त

साहित्य रचना से हटा ध्यान, हुई आदत फ़िल्मी ग्लेमर दर्शन की
सच्चे नायक बने कम अनुकरणीय तुलना में छद्म नायकों के

चला अतः समाज भ्रमित हो दिखलाई जा रही इस गलत दिशा में
दर्शन हुए जब आडम्बर के, बढ़ी जन आसक्ति प्रति आडम्बर के

आम शिकायत देती सुनाई , बुराइयाँ बढ़ रही प्रतिदिन बहुत सी
करते नक़ल आम हुआ देश में मदिरा और सिगरेट का सेवन
व्यसन जनित रोग बढे ,अनेक अस्वस्थ ,असमय प्राण गवांते
इन नशों के ख़राब प्रभाव में स्वयं और अन्य का चरित्र बिगाड़ा

करने से नक़ल आडम्बर की , बड़े इनमें जब बहुत ही खर्चे
ज्यादा धन कमाने की कामना में , ख़राब बहुत मार्ग अपनाए

ढोल दूर के सुहावने होते लगती मौज मजे दूर से आडम्बर में
देश भर के युवा दुष्प्रेरित होकर ,फिसल पड़े गलत इस पथ पर

चारों ओर समाज में अपने , हुआ हावी निज स्वार्थ सभी पर
परोपकार गायब अब समाज से , दिखती नहीं दया कहीं पर

'राजेश' कैसे करें साहित्य सरोवर निर्माण पुनः अब अपने देश में
निर्मूल कर सके जो बुराइयां और बनाये फिर भव्य देश को