Thursday, December 27, 2012

उन्हें सार्थक होता वह सपना दिख रहा था ...


उन्हें सार्थक होता वह सपना दिख रहा था ...
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वे प्रथम श्रेणी शासकीय अधिकारी हैं , उन्हें स्वयं के छोटे छोटे कार्य करना भाता है . एक सुबह अपनी कार की घर के सामने पोर्च में सफाई कर रहे थे . तब एक युवक उनसे पूंछकर पास आया . कहने लगा सर , आपकी कार में साफ़ करने का कार्य चाहता हूँ . वे उसकी बात सुन रहे थे , उस समय उनकी तेरह वर्षीया पुत्री रिची भी यह वार्ताल...ाप सुन रही थी . वे ,कम पढ़े-लिखे , थोड़े निर्धन से उस युवक को कोई उत्तर देते उसके पूर्व रिची ने आवाज दी -- पापा एक मिनट सुनिए .. उन्होंने युवक को रुकने कहा और बेटी की तरफ बढ़ गए . रिची ने उन्हें थोडा दूर साथ ले जाने के बाद कहा , पापा -- उसे काम दे दीजिये , हमें अपने आसपास के निर्धनों की इस तरह की अपेक्षा पूरी कर देनी चाहिए .. बेटी से ऐसा सुनते हुए उनकी रूचि बढ़ी उन्होंने सिर हिलाया . रिची ने तब आगे कहा .. अगर कम पढ़े लिखे इन गरीबों को साधारण आवश्यकता का धन परिश्रम से मिल सके तो वे चोरी , जेब-कतरने का कार्य या जुएँ और अन्य बुरे मार्ग से धन बनाने का कार्य शायद न करें . उन्होंने रिची से कहा तुम सही कहती हो . तुम्हारे कहने पर में उसे कार्य दे देता हूँ . वे युवक के पास वापिस आये , उन्होंने उससे उसका अपेक्षित राशि के बारे में जानकारी ले उसे दूसरे दिन से कार्य पर रख ने की सहमति दी . युवक जब चला गया तो वे मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे ..दो बातें इस सुबह की उन्हें अच्छी लगी थी --
एक --- सुबह उन्होंने आवश्यकता-मंद घर आये को निराश नहीं किया था .
दो --- अपनी बेटी में सह्रदयता के जिन संस्कारों का बीजारोपण उसके बचपन से कर रहे थे ... उन्हें सार्थक होता वह सपना दिख रहा था .

Tuesday, December 25, 2012

दोष स्वयं अपने जिस दिन पहचान के


दोष स्वयं अपने जिस दिन पहचान के 
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जितने हम उतने विचार किसी भी पहलु पर
आचरण ऐसा जो ना पहुचाये क्षति किसी को 
नहीं अखरता है मित्र या अपरिचित किसी को 
अतः सर्वमान्य इसलिए सदाकाल से अहिंसा  

दामिनी असम्मान प्रेरित हो रहे जो प्रदर्शन 
गर लेते प्राण या स्वास्थ्य किसी निर्दोष के 
अपराध नहीं कम वह दामिनी असम्मान से
अंतर क्या हुआ उस या इस अपराधी में तब 

पहले ने छीना जीवन स्वप्न नवयुवती का 
दूजा छीने परिवार भरण पोषण करने वाला  
अगर ना नियंत्रण आन्दोलन अभियान पर 
कृपया ना थोपो आप इस देश राजधानी पर 

भुगतता है देश अव्यवस्था पहले ही बहुत 
ना करो हिंसक आव्हान बढ़ा देते जो दुखड़े 
उचित है लें शपथ सामने स्व-अंतरात्मा के 
नहीं डिगेंगे हम सदाचार व नेक संस्कार से  

दोष व्यवस्था में दिखते हम सबको बहुत हैं 
पर दोष स्वयं अपने जिस दिन पहचान के 
राजेश करेंगे उन्हें दूर जब एक एक करके 
व्यवस्था दोष भी दूर होंगे एक एक करके 
 

Monday, December 24, 2012


नहीं मात्र दोषी दामिनी के दोषी बनते वे जीवन दायिनी के    
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प्रथम दृष्टया दिखते मात्र दामिनी अत्याचार के वे दोषी  
मनुष्य वेश में ऐसे पशु करते अबला पर जो अत्याचार 

नारियां मुख अपना छिपातीं जिन की कोख से वे जन्मते  
पले गोद पिता-भाइयों की लज्जावश सिर झुकता उनका

बहिनें उनकी स्वयं कुचलती अपने हाथ की वे अंगुलियाँ 
जिनसे रहीं रक्षा सूत्र थी बांधती कलाईयों पर पशुओं की 

जिन गावों शहरों में जन्मे जहाँ हुआ लालन-पालन उनका 
माटी धिक्कारे करती अचरज ऐसे नहीं थे संस्कार वहां के 

जिन पुरुषों पर हावी होते मन में कुत्सित ऐसे विचार 
राजेश करता हाथ जोड़ प्रार्थना करें स्वयं वे पुनर्विचार   

कृत्य अमानुष नहीं शोभित है सभ्य हुए मनुष्य समाज में 
नहीं मात्र दोषी दामिनी के दोषी बनते वे जीवन दायिनी के    

Monday, December 17, 2012

देवदूत





देवदूत 




                   मानव समाज चाहे इस देश का हो , देश के किसी धर्मावलम्बियों का हो , किसी भाषा भाषी का हो , देश के किसी क्षेत्र विशेष का हो या देश की सीमाओं से बाहर विश्व मानव समाज की बात ले लें , सभी में कुछ ना कुछ ऐसी बुराइयाँ हैं , जो सभ्य मानव समाज को शोभा नहीं देती हैं. ना सिर्फ ये चिंता की बात है , बल्कि विद्यमान बुराइयों का बढ़ता -क्रम ज्यादा चिंतित करता है . और भी बड़ी चिंता का विषय है विश्व मानव की आज की पीढ़ी में कोई एक व्यक्ति , संगठन , धर्म या कोई क्षेत्र मानव समाज में बढती बुराइयों की रोकथाम में सफल नहीं हो सका है . बल्कि कहा जाये तो इसके लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किये जा रहे हैं .
                बुराइयों के प्रति आज इनमें से कोई चिंतित होता है , तो वह संकीर्ण सोच के साथ बुराइयों से अपने परिवार , अपने धर्म या अपने देश को कैसे इन बुराइयों से, बचा ले इसके लिए ही उपाय करता दृष्टव्य होता है . बुराई को जड़ से निर्मूलन की बातें, चिंता करने का अभिनय मात्र सिध्द होता है . अन्दर का सत्य संकीर्णता ही होती है . जो अपने समझे जाते हैं , यह जो अपनी श्रृध्दा हम पर प्रगट करता है , बचाव के उपाय में इतनों की चिंता किसी भी प्रयास का कटु यथार्थ है .सभी को समालोचना के अंतर्गत ले लेने के बाद पढने वाले के मन में यह प्रश्न अवश्य उत्पन्न हो सकता है . लेखक बुराई की रोकथाम का कोई ठोस उपाय दे सकता है ? इस पर यहाँ उल्लेख उचित है , अब तक जो लिखा गया है वास्तव में दूसरे तरह की एक चर्चा की मात्र भूमिका है . और जो लेखक लिखने का लक्ष्य ले लिख रहा है वह आरम्भ अब होता है .

               पिछले 60-70वर्ष में हमारे देश में जिन बातों ने प्रमुख रूप से लोकप्रियता पाई उसमें हिंदी फिल्म , और दूसरा क्रिकेट खेल है . खेल को अलग रख यहाँ हिंदी फिल्म से सम्बंधित उल्लेख मूल कथानक है . हम सबने देखा है कई ऐसे अभिनेता और अभेनेत्रियाँ इस अवधि में आई हैं , जिनके प्रति देशवासी पागलपन की हद तक भी आसक्ति प्रदर्शित करते रहे हैं. एक अभिनेता जो इस तरह सफल हुआ , अपनी 45-50 वर्ष की उम्र तक लगभग 20 वर्षों तक सफलता के शिखर के आसपास रह सका है . इन 20 वर्षों में आज के रुपये शक्ति अनुसार 100 से 200 करोड़ तक की संपत्ति बना लेना उसके लिए कठिन नहीं रहा है . फिल्मों में आने के पहले ,ऐसा सफल होने वाला कोई अभिनेता अपवाद में ही मध्यम वर्ग से अधिक आर्थिक हैसियत का रहा हो . सब मध्यम वर्गीय पृष्ठ-भूमि से आकर ही इस अति संपन्न कहलाई जाने वाली संपत्ति के अधिकारी हुए .
              अर्जित संपत्ति भी लेख का विषय वस्तु नहीं है .मोटे तौर पर एक अति सफल अभिनेता के प्रशंसक देश के 10 करोड़ लोग रहे , इन्होने अभिनेता की निर्मित 100 केन्द्रीय भूमिका वाली फिल्मों में से औसतन 20 फ़िल्में उसके प्रति पसन्दगी रहते देखी . एक फिल्म के लिए 3 घंटे लगते हैं , इस तरह प्रत्येक ने 60 घंटे उस अभिनेता के कारण अपने जीवन के उस पर लगाये . इस तरह 600 करोड़ घंटे कुल (देश) के उस अभिनेता पर व्यय किये गए,दिन के समतुल्य कहे जाएँ तो ये 25 करोड़ दिन होते हैं, और इनका वर्षों में कहा जाये तो लगभग 6 लाख 85 हजार वर्ष होते हैं . फिल्मों से दर्शक ने कोई अच्छी शिक्षा ली उसमें पूरा संदेह तो है ही , उसे छोड़कर लिखूंगा , दर्शकों ने कुछ विशेष पाया हो नहीं लगता पर अभिनेता ने एक बड़ी प्रसिध्दि , लोकप्रियता और संपत्ति अवश्य प्राप्त की . ऐसी प्रसिध्दि 20 वर्षों के सार्वजनिक जीवन में किसी भी अन्य क्षेत्र में मिलना असंभव सा है. जबकि बौध्दिक , मानवीयता यहाँ तक की रूप-सौन्दर्य की दृष्टि से समकालीन उनसे बेहतर अनेकों इसी देश में उपलब्ध थे . अंतर ये था , उन्होंने फिल्मों में आने में रूचि नहीं ली या अगर ली भी तो उन्हें वे अनुकूल परिस्थिति नहीं मिल सकीं जो फिल्मों में आने में सफल को सप्रयास या अनायास प्राप्त हुईं.
             सामान्य मनुष्य के जीवन की औसत आयु 68.5 वर्ष लें तो उपरोक्त वर्णित देश के व्यय घंटे 10000 मनुष्य जीवन के तुल्य होते हैं . स्पष्ट है देश ने उस अभिनेता के लिए 10000 मनुष्य जीवन दिए . दूसरे शब्दों में अभिनेता को एक जीवन में जो दिया गया वह उसके 10000 मनुष्य रूप जीवन समतुल्य दिया गया . अपने 1 जीवन में ही 10000 जीवन के बराबर का प्रेम ,लोकप्रियता और प्रसिध्दि प्राप्त करने वाले किसी व्यक्ति का इस देश , समाज और मानवता के प्रति कर्तव्य बहुत बड़ा बन जाता है . लेकिन उपलब्ध सम्मान भाव से अभिनेता दर्प में चूर हो जाते हैं ,वैभव के कारण सुविधा के आदी होते हैं , और विलासिता में डूबते हैं . अतः उन्हें इस दृष्टिकोण से वस्तुस्थिति को देखने चेतना नहीं रहती है .
         
               जिस तरह सौन्दर्य प्रसाधन को चेहरे पर चढ़ाया जाता है , सोने के पूर्व उसे विधिवत उतारना भी आवश्यक होता है . उसी तरह जीवन में अहंकार , विलासिता और उपभोग अपने ऊपर चढ़ा लेने पर , जीवन समाप्ति के पूर्व उन्हें विधिवत तज देना उचित होता है . इतिहास में विलासिता ,प्रतिष्ठा और दर्प की अधिकता मरते तक कायम रखने के अनेकों उदहारण मिलते हैं . चाहने वालों के जीवन काल तक तो ऐसे मरने वालों की यदा कदा चर्चा मरने के बाद शेष रह जाती देखी गई है. पर 50 -60 वर्षों बाद सब विस्मृत कर दिए जाते हैं. लेकिन अपने जीवन में ही जिन्होंने यह सब अर्जित किया और मरने के पूर्व इनके मोह से छुटकारा प्राप्त कर अधेड़ावस्था से धीरे -धीरे सात्विकता जीवन में ला परोपकार के कार्य किये , वे अपवाद हैं ,गिने चुने हैं और अमर हो गए हैं, इन्हें चिरकाल तक मानव समाज उनके योगदान के लिए स्मरण करता है .




                          एक वह जिसको ज्यादा जाना पहचाना नहीं जाता है , वह जो भी अच्छा -बुरा करे उसका ध्यान थोड़े ही कर पाते हैं . ऐसे जन सामान्य कई हैं . ये बुरे कर्म के उदहारण भी बनें तो समाज दिग्भ्रमित हो ,सम्भावना थोड़ी होती है . लेकिन जिन्हें चाहने वाले करोड़ों की संख्या में हों , उनके छोटे छोटे कर्मों को भी गंभीरता से ध्यान किया जाता है . वे जीवन में अति विलासिता (चमचमाती महंगी कारों , अति सुविधा-जनक बंगलो में , महंगे आभूषणों और वस्त्रों में हर समय दिखते या दिखाए जाते हैं ) , दैहिक संबंधों में भारतीयता की सीमाओं का उल्लंघन के लिए चर्चित होते हैं तो प्रशंसक वर्ग भी ऐसी ही प्रेरणा लेता है . कहीं और ये उतना बुरा ना भी माना जाये , पर भारत में जहाँ आधी से ज्यादा जनता दूसरे दिन क्या खायेंगे या पहनेगे और अपने बच्चों की स्कूल के शुल्क कैसे जमा करेंगे , उनकी किताब-कापियां कैसे दिलाएंगे इसको लेकर चिंतित होती है . इसे अनुचित कहा जायेगा . आम संघर्षशील व्यक्ति गरीबी (अपनी ) और अति विलासिता (दिखाई जाती ) के बीच द्वन्द में घिर , परिश्रम छोड़ बुरे मार्गों से ज्यादा और शीघ्रता से धनार्जन की दुष-प्रेरणा ले समाज में बुराई बढ़ाने वाले कर्मों को प्रवृत्त होता है. चरित्र के भारतीय मानदंड से विचलित होता है. 

                असामान्य सफलता अर्जित करने के बाद भी वे सामान्य मनुष्य जैसे अपने कर्तव्य की सीमा अपने घर-परिवार तक सीमित रखते हैं. और 45 -50 वर्ष के बाद भी चिंता अपनी और परिवार की संपत्ति और बढ़ाने के लिए कर बाद में भी आय के साधन ही बढ़ाते हैं . जबकि संतानों के लिए 10-20 करोड़ भी रखें और फिर इसमें वृध्दि के लिए उन पर विश्वास रखें तो कोई अन्याय नहीं होता है. प्रचुर धन-संपत्ति की विरासत संतानों को विलासिता जन्य दुष्प्रभावों में डालती है . इसके विपरीत ठीक-ठाक आर्थिक दशा सृजनशीलता के प्रति जागरूक रखती है .
             अगर वह सफल अभिनेता ,सफलता के इस शिखर पर आ 50 वर्ष के बाद का अपना जीवन स्वयं हेतु धनार्जन में ना लगा शेष 20- 25 वर्ष इस देश या मानव समाज से बुराई कम करने के लिए काम करे .समाज में बुराई क्या हैं ?अध्ययन करे . उन्हें एक बड़ा प्रशंसक वर्ग हासिल है , उनका नाम तथा व्यक्तित्व सर्वविदित है इस कारण उनके कार्य और सन्देश आसानी से लोगों में सद्प्रेरणा के रूप में प्रसारित हो सकते हैं . और इस तरह समाज से बुराइयों में कमी लाइ जा सकती है. अपनी आसक्तियों पर नियंत्रण कर अगर कोई अभिनेता ऐसा कर सकता है तो वह स्वयं को ईश्वर का भेजा देवदूत सिध्द कर सकता है . वह ऋण जो प्रशंसकों के प्रेम से उस पर चढ़ता है को भी अपने जीवन में उतार इतिहास पृष्ठों पर अमर हो सकता है. मानव समाज में बढती बुराइयों की रोकथाम में सफल हो सकता है . एक पहला ऐसा देवदूत आने वाले समय में और भी देवदूतों की परम्परा डाल सकता है . 



Tuesday, December 11, 2012

आओ करें हम सम्मान अपनी माताओं का


आओ करें हम सम्मान अपनी माताओं का

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हम युवा हैं , पढ़ लिख रहे हैं तो   इस दृष्टिकोण से अपनी माँ को देखें 
अबोध थे हम ,जब नहीं ज्ञान था तब  आवश्यकता हमारी रोने से समझी 

लथपथ अपनी गंदगी से त्रस्त होते जब,  चिंता से हमें नहलाती , धुलाती 
आरम्भ किया पाठशाला जाना हमने तो  सर्दी में भी धुंधलके रहते जागती 

उदरपूर्ति हेतु हमें क्या पसंद , पौष्टिकता ध्यान रख सदा दूध-रसोई बनाई
लालन-पालन और गृहस्थी कार्य में दर्द को हमारे अपने से ज्यादा समझती
लीन हो चाहरदिवारियों में कैद सी रहकर ही वर्षों, अपना जीवन बिता दिया
युवा से वे अध्-बूढी हो गईं, युवा हो हम खोये अपने सपनों के उधेड़-बुनों में
कर देते बच्चे उनकी उपेक्षा, चल रहा यह क्रम यद्यपि सृष्टि आरम्भ से
पर 
माँ-पिता उपेक्षित, पहले से ज्यादा आज हुए, युवा ज्यादा महत्वकांक्षी  

वह तो माँ महान है बच्चों की उपेक्षा  सहकर भी, शेष जीवन बिता लेती है
सम्भावना 
पर मैंने अनुभव की है,  मेरी अपनी माँ को देख और समझकर 

चाहरदिवारियों के बाहर आतीं तो  पातीं, जीवन उपलब्धि अनेकों से बढ़कर
अपने नाम उपलब्धियां जोड़ सकती थीं, ना रखी उन्होंने ऐसी महत्वाकांक्षा    

समर्पित जीवन गृहस्थी -बच्चों में, 
संतोष किया परिजन उपलब्धियों के लिए 
कम से कम उनके त्याग इस महान का, हम करे सम्मान उनका इस तरह से  

प्रशस्त किया संस्कारों से जिस पथ पर, 
आगे बढ़ते हुए अपने पूर्ण सामर्थ्य से  
रत्न समाज या रत्न विश्व हेतु अपने को, नेक कर्मों से हम सिध्द कर सकें तो 

आडम्बर सम्मोहन के कारण मानव अब भ्रमित हो, मानवता से दूर जा रहा 
वापस उसे लाने के लिए यदि प्रयत्न हम करें तो कर पायेंगे सम्मान हम उनका 

माँ देती है सब हमें और मांगती कम हमसे, अनकही अपेक्षा यदि हम समझें तो
उपलब्धि अपनी ,
उनके लिए अर्जित हम करें तो गौरवान्वित अनुभव वे करेंगी  

बन कर ऐसी संतान हम सभी, आओ करें हम सम्मान अपनी माताओं का
माँ सम्मान में छिपा हुआ है हित हमारा ,समाज ,विश्व और मानवता का 

Sunday, December 9, 2012

लौट आओ भारतीय संस्कृति की सीमाओं में

लौट आओ भारतीय संस्कृति की सीमाओं में 

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विक्रयकर्ता के वस्तु मूल्य बताने पर
क्रयकर्ता मन शंकित हो उठता
वह लगता मोल भाव है करने
स्थिति वही वस्तु वजन की होती

क्या ऐसी पहले भी थी स्थिति ?
क्या तब था लेनदेन में अस्तित्व शंका का ?
क्या चिंता थी अधिक लाभ कमाने की ?
या संतुष्टि थी प्रमुख लेनदेन में ?

अगर यह लगता हमें है ,ऐसा नहीं पहले था
तो विचारें उन कारणों को हुए अब परिवर्तित हैं
बढ़ा लालच है प्रथम है कारण
खोता चरित्र भी है प्रमुख समस्या

मानवीय संवेदना ह्रदय में मुरझा रही है
सबको अब मात्र अपनी चिंता है
धन का महत्व हम इस तरह बढ़ा बैठे
अपने ऊपर बोझ गिरा बैठे

धन कमाने में नैतिकता छूटी
धन की चिंता में परोपकार भूल बैठे
जब आया धन अधिक हमारे पास तो हमने
सुख की निद्रा स्वयं अपनी ही खो दी

भले कर रहे सब निंदा हमारी
दूसरे के ऐसे कर्म लगते हमें निंदनीय
पर इन पर हम कान ना धर पाते
नेत्र दोष हमारे हो गए  

 भूखे दरिद्र के दुःख हमें न दिखते
वस्तु क्या मनुष्य भी विक्रय हेतु दिखते
कहीं खरीदते ठुमके सुंदरियों के
कहीं लगाते मोल लाचार की देह क्रय को

बिकने वाले भी धन लालच में
खोते मर्यादा और लज्जा समाज में
जहाँ नहीं जागृत मन को वश कर सकते
धन से ले मदिरा बांटते
मदिरा नशे में चूर हो कोई जब तो
फुसलाना उसे सरल हो जाता

धूर्तता के इन उपायों से
जो ना था इस देश का भोज्य
संस्कृति में जो था अब तक वर्जित
हुआ अब वह दैनिक प्रयोग में

जो भारत की पहचान थी विश्व में
जिस पर था गर्व हमें
कहते थे हम गौरव गान में
सारे विश्व से भारत महान है

ना भाता था शेष विश्व को
षड्यंत्र रच ईर्ष्यालु अन्य ने
किया गडमड्ड संस्कृति को भारत की
विश्व की दूसरी हीन संस्कृतियों में

अब भारतीय नहीं रह गए निराले
सुविधा भोगी बन रहे एक जैसे ही
आने वाले समय में दिखेगा
बुरा प्रभाव अभी से ज्यादा

मानव नहीं जीवन्तता से जियेगा
मनुष्य जीवन जो मिला अनमोल उसे
मदहोशी और स्व-लालच में
उसे पता न होगा कैसे गया यह जीवन बीत

राजेश का अति आशावान आव्हान है फिर भी
लौट आओ भारतीय संस्कृति की सीमाओं में
जिस तरह बदल रहे अन्य हमें आज
ले चुनौती बदलों उन्हें इस संस्कृति में  
समाज सुखी और विश्व सुखी तब ही होगा
मनुष्य सही अर्थों में मनुष्य रह सकेगा
परिवर्तन का अवसर आज हमारी पीढ़ी को
हम खोएंगे तो कोई जागरूक पीढ़ी भविष्य में
लेगी कर्तव्य यह अपने ऊपर
क्योंकि बचाने को मानव अस्तित्व  
इस पृथ्वी पर है मात्र यही विकल्प 

Saturday, December 8, 2012

भारत के हम हैं इसलिए बने आचार-विचार से भारतीय


भारत के हम हैं इसलिए बने आचार-विचार से भारतीय 

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चरित्र पति का नहीं ठीक हो ,नहीं ऐसा पत्नी को भाता
चरित्र-हीन पत्नी हो जाये ,नहीं ऐसा कभी पति चाहता 

भारतीय संस्कृति में परिवार नींव थी विश्वास आधारित
इस धरती ,समाज में पाश्चात्य प्रभाव के बढ़ने से पहले 

लोक-नाट्य ,लोक-झांकिया ,लोक-नृत्य और संगीत में 
प्रदर्शित और प्रचार कर नित दी यही जाती प्रमुख प्रेरणा

दाम्पत्यसूत्र सुखद निभता ,अवसाद मात्र अपवाद में होता 
चंचलता पर मन की सबकी सद-प्रेरणाएं रखती थी 
अंकुश

सर्व-मान्य , सर्व-विदित सिध्दांत पालन यह सर्वथा होता
एक पति ,पत्नी का प्रावधान ही रखा गया है संविधान में

विवाह विच्छेद ना हो तनिक मत-भेद या छोटे कारणों में
नियम ,न्यायालयीन प्रक्रिया भी हेतु अति कठिन बनाई

परतंत्रता ,बाह्य अपसंस्कृति ने विष बीज जो डाल दिए थे
आधुनिक माध्यम के प्रयोग से फैलाये स्वयं अपनों ने ही

जो ना था समाज यथार्थ , वह दर्शाया सामान्य घटना सा
औचित्यपूर्ण ठहराए जाते विवाहेतर ,विवाह पूर्व सम्बन्ध

जोर-शोर ,चमक-दमक से 
नाम दिया जाता आधुनिकता
धीरे -धीरे धुलते गए 
ह्रदय से संस्कार जो शताब्दियों से 

स्वछंद व्यवहार अपनाकर ,चरित्र महत्व विस्मृत हुआ 
दाम्पत्य-सूत्र टूटने होते ,अवसाद 
परिवार में छा जाता

कितने भी आधुनिक हो जाएँ अगर भारतीय हो कोई तो 
विस्मृत भले उपरी ह्रदय सतह से पर जड़ में बैठी गहरी 

राजेश ने किया अनुभव छोटे अपने अब तक जीवन में
चरित्र प्रमुख हर परिवार सदस्य में वहां सुखी सभी होते 

ना धन ,ना सुविधा अधिक दिलासा दे सकती हैं मन को
भारत के हम हैं इसलिए बने आचार-विचार से भारतीय